IGNOU MSOE 3 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfist

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MSOE 3 Free Assignment In Hindi

MSOE 3 Free Assignment In Hindi July 2021 & Jna 2022

प्रश्न 3. धर्म पर आधारित दुर्थीम के दृष्टिकोण की जांच कीजिए।

उत्तर-समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के रूप में प्रकार्यवाद- प्रकार्यवाद् अत्यंत प्राचीन एवं उपयोगी सिद्धांत है। समाजशास्त्र का यह विश्लेषण जीव विज्ञान एवं शरीर विज्ञान पर आधारित एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें समाज को एकजुट करने वाले कारकों का अध्ययन किया जाता है।

इसके विश्लेषण के तरीकों में सर्वथा वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ स्वरूप को महत्त्व दिया जाता है, अतः यह एक वैज्ञानिक विधि है।

प्रकार्यवाद समाज की व्यवस्था को बनाए रखने वाले उपागमों के अंतर्संबंधों को ध्यान में रखता है तथा समाज को एक जटिल व्यवस्था मानता है जो आंतरिक स्तर पर जटिल और व्यवस्थित होता है।

प्रकार्यवाद समाज की आंतरिक संरचना में योगदान देने वाली संस्थाओं-परिवार, धर्म, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राजनीति आदि की क्रियाशीलता पर ध्यान देता है।

अतः प्रकार्यवादी विचारकों का उद्देश्य समाज की संरचना को बनाए रखना, उसके स्थायित्व को बनाए रखना तथा एकीकरण करना था। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

दुर्खिम्वादि प्रकार्यवाद- संरचनात्मक प्रकार्यवाद को संरक्षण देने वाले इमाइल दुर्खिम ने सामाजिक एकता को बनाए रखने वाले उपागमों पर अधिक ध्यान दिया है। दुर्खिमने सामाजिक संगठन में सामाजिक तथ्यों, सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों तथा प्रतिमानों को महत्त्व दिया तथा समाज की उस अंतर्व्यवस्था को जानने का प्रयास किया जो उसे आपस में संबद्ध करती थी।

इसके लिए दुर्खिमने सावयवी सुदृढ़ता तथा सामूहिक चेतना की सहायता ली। दुर्खिम की अवधारणा सामाजिक एकता के संदर्भ में कुछ विशिष्ट है। ‘वे सामूहिक चेतना’ की बात करते हैं तथा उसे ‘सामूहिक जागरूकता’ अथवा ‘सामान्य समझ’ कहते हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

उन्होंने टोटम की अवधारणा को बतलाते हुए टोटम द्वारा समाज के प्रकटीकरण को आरंभिक स्वरूप कहा तथा धर्म ने उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे तर्कपूर्ण बना दिया। अत: टोटम भी एक सामूहिक प्रक्रिया है जो सामाज द्वारा स्वीकृत है।

धर्म : एक प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य-धर्म एक सामूहिक प्रक्रिया है, जिसमें आस्था और विश्वास के साथ संगठित क्रियाकलाप होता है।

प्रकार्यवादियों ने धर्म को सांगठनिक रूप में देखकर ही विश्लेषित किया तथा धर्म के उसी रूप का अध्ययन प्रस्तुत किया जो सामूहिक एकीकरण में सहायक हो। अतः इन्होंने धर्म को प्रकार्यात्मक माना है जो सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ व सुनिश्चित अस्तित्व प्रदान करता है।

यह समाज को अथवा विभिन्न समाजों को विशिष्ट भावनात्मक संबंध के द्वारा आपस में जोड़ता है जो वचनबद्धता एवं विश्वास के रूप में स्थायित्व प्रदान करता है। धर्म सामूहिक चेतना है, जो केन्द्रीय मूल्य-व्यवस्था के रूप में उपस्थित है। अतः समाज का धर्म के साथ गहरा रिश्ता है।

दुर्खिम तथा धार्मिक जीवन का प्रारंभिक स्वरूप:-

दुर्खिम ने धर्म पर अध्ययन करते समय सभी समाजों के धर्म के मौलिक स्वरूप की खोज की। इनकी खोज ‘दी एलीमेन्ट्री फॉर्म ऑफ रिलीजियस लाइफ’ नामक पुस्तक में विस्तार से विवेचित है।

इमाइल दुर्खिम ने अपनी खोज के लिए ऑस्ट्रेलिया की अरूण्टा जनजाति को चुना, जिसके पीछे उन जनजातियों में धार्मिक मौलिकता का सुरक्षित होना था, जिसे दुर्थीम “आज तक का ज्ञात सबसे सरल तथा सबसे प्राचीन धर्म” कहते हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

इस अध्ययन के अंतर्गत अरूण्टा जाति के गोत्र, टोटम आदि का समावेश है। दुर्खिमने वर्तमान में उपस्थित धर्म की अत्यधिक संवेदनशीलता और समाज पर इसके अनुषंगी प्रभाव के कारण धर्म के प्रारंभिक स्वरूप की खोज शुरू कर दी, जिसके द्वारा वर्तमान धर्म को समझा जा सकेगा।

दुर्खिम की विशेषता है कि उन्होंने पूर्व परंपरा से आ रही अध्ययन पद्धति के विपरीत प्रत्यक्ष विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में धर्म का परीक्षण | किया, जिसके पीछे धर्म का उद्देश्य धर्म के आधारभूत तत्त्वों तक पहुंचना था।

इस खोज से सभी धर्म के जड़ों तक पहुंचा जा सकता है। | धर्म को सामूहिक घटना के रूप में देखते हुए दुर्खिम ने धार्मिक घटनाओं को सामूहिक माना है, व्यक्तिगत नहीं।

उनका मानना है कि धर्म के अभाव में व्यक्ति और मनुष्य लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकेंगे। धर्म संबंधी कर्मकांड सामाजिक अवधारणा की अभिव्यक्ति होते हैं।

दुर्खिम ने धर्म को वास्तविक तथा समाज की अभिव्यक्ति माना है तथा ऐसा कोई समाज नहीं है, जहां धर्म नहीं है। धर्म एक सामूहिक चेतना का प्रकटीकरण है, जो वैयक्तिक चेतना का संयोजन है।

दुर्खिम की धर्म की प्रत्यक्ष परिभाषा :

प्रत्यक्ष परंपरा में अपने आप को रखकर दुर्खिम ने वस्तुनिष्ठ एवं समुचित वैज्ञानिक परंपरा के अनुरूप धर्म की परिभाजा दी है। धर्म के विषय में दुर्खिम ने खोज और वैज्ञानिक दृष्टि को अत्यधिक महत्त्व दिया।

कुल मिलाकर दुर्खिम जिस प्रत्यक्ष परंपरा से आते हैं उसका अर्थ अवलोकित वस्तु से है, जिनके आधार पर धर्म को स्पष्ट किया जा सके, न कि काल्पनिक रूप से परिपुष्ट करना।

साथ ही यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिकता एवं तथ्यात्मकता से परिपूर्ण है। उनकी धर्म की परिभाषा द्रष्टव्य है “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा रिवाजों की एकीकृत व्यवस्था के रूप में है, जिसका अर्थ है वे पापपूर्ण चीजें जो अलग रखी जाती हैं तथा जो मना हैं … ये विश्वास तथा रिवाज जो एक नैतिक समुदाय से जोड़ते हैं जो उन रिवाजों को मानते हैं, जिसे गिरजाघर कहते हैं।”

इमाइल दुर्खिम ने चर्च अथवा धार्मिक स्थल को एक सामूहिक संचालक के रूप में माना, जहां नियमित रूप से विशिष्ट अनुयायी उपस्थित होते हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

यह एक सार्वभौमिक परिभाषा है, जिसमें दुर्खिम ने एक तो सभी धर्मों को विश्वास तथा रीति-रिवाजों की क्रियात्मक व्यवस्था के रूप में माना है तथा दूसरे धर्मों में पवित्र तथा अपवित्र संबंधी अवधारणा होती है, जो विश्व को दो वर्गों में विभक्त करती

पवित्र तथा अपवित्र:

दुर्खिम ने पवित्र तथा अपवित्र को अत्यधिक महत्त्व देते हुए इन्हीं के आधार पर धार्मिक घटना की उत्पत्ति को स्वीकारा है। दुर्खिम ने इस संदर्भ में धर्म को तीन क्रियाओं से संबद्ध माना है

(क) पवित्र-अपवित्र के बीच भेद।
(ख) आस्था के रूप में व्यवस्था
(ग) नियमादि की व्यवस्था।

दुर्खिमके अनुसार अपवित्र तथा पवित्र को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है

(i) अपवित्र उपयोगिता से संबंधित क्षेत्र में सन्निहित है, जबकि पवित्रता की संकल्पना उच्चादर्शों तथा असामान्य से जुड़ी है।

(ii) पवित्रता तथा अपवित्रता मानव द्वारा मान्य मूल्यों पर निर्भर हैं।

(iii) चूंकि यह धार्मिक जीवन का मूल है, अत: इसकी विशिष्टता सर्वमान्य होनी चाहिए।

इस प्रकार दुर्खिमने सभी धर्मों पर पवित्रता-अपवित्रता के लक्षणों के समान वितरण को स्वीकारा है, किंतु अलौकिक क्षेत्रों के संदर्भ में विश्वास अलग-अलग स्वीकृत हैं।

अत: व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो नैतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को पवित्र तथा शेष जिनका धार्मिक प्रकार्य से संबंध नहीं होता, अपवित्र मानी जाएंगी। उदाहरण के रूप में मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर के चिह्नों, यथा-त्रिशूल, ध्वज, क्रॉस, चांद-तारा, 786, ऊँ, आदि ये सभी पवित्र प्रतीक हैं।

अपवित्र का सम्मान भी कम है तथा अंतर्मन में इसके प्रति संकोच भी बना रहता है। अपवित्रता सदैव पवित्रता को दूषित करने की कोशिश में रहती है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

टोटमवाद : धर्म का प्रारंभिक स्वरूप

टोटमवाद को धर्म का आरंभिक स्वरूप और धर्म का केंद्रीय बिंदु मानते हुए दुर्थीम ने टोटम संबंधी विश्वासों तथा टोटमवाद की संरचना की समाजशास्त्रीय खोज की है।

दुर्खिमके अनुसार टोटमवाद की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं

(i) टोटमवाद का गहरा संबंध सांगठनिक गोत्र व्यवस्था से है।

(ii) टोटम में सम्मिलित जन एक ही गोत्र के होते हैं जो आपसी रिश्तों को मजबूत बनाने में एवं संगठन की संकल्पना को मजबूत करने में महत्वपर्ण भमिका निभाते है।

(iiI) टोटम के माध्यम से निषिद्ध कार्य का प्रायश्चित किया जाता है, जिसके प्रति समूह जिम्मेवार होता है।

(iv) टोटम पवित्र तथा अपवित्र के अंतर की प्राथमिक इकाई है।

(v) टोटम एक विश्वास है, जिसमें रीति-रिवाजों के साथ-साथ प्रतीक चिह्नों का प्रयोग किया जाता है जो समूह को दर्शाता है।

(vi) पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों के साथ आत्मा के तादात्म्य को टोटम द्वारा फलीभूत करते हैं।

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तः टोटमवाद एक धर्म है जो वस्तुओं के तीन वर्गों पर संधान करता है
(i) प्रतीक,

(ii) टोटम (पशु-पक्षी),

(iii) गोत्र। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

ये पवित्र माने जाते हैं।

गोत्र , टोटम तथा सृष्टिशास्त्र- दुर्थीम समाज को व्यवस्थित तथा एकीकृत करने में विश्वास रखते थे। धर्म विचारों की एक व्यवस्थित इकाई है। ये सिद्धांत ऑस्ट्रेलिया की जनजातियों पर किए गए शोध के परिणाम हैं।

धर्म में टोटम को निर्धारक मानते हुए दुर्खिमने टोटम को वर्गीकरण की प्रारंभिक पद्धति माना है जो प्रकृति के विभाजन का भी मुख्य आधार है।

गोत्र इसी टोटम की एक सामूहिक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत एक टोटम होता है। टोटमवाद को प्रकृति को भी वर्गों में विभाजित करने का श्रेय जाता है, यथा-सूर्य, चंद्रमा, तारे, पृथ्वी आदि को गोत्र में बांटता है।

एक गोत्र में समान टोटम एवं गुण होते हैं जो एक ही मांस से बने माने जाते हैं। यह साहचर्य वर्गभेद के साथ एकीकृत रूप में ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

दुर्खिम का धार्मिक संगठन सिद्धांत एक सामूहिक संगठन का आदर्श प्रस्तुत करता है जो सृष्टि को वर्गीकृत करने का भरसक प्रथम प्रयास है।

चूंकि प्राकृतिक तथा सामाजिक जानकारियां हमें धार्मिक विचारों में ढूंढ़ने से मिल जाती हैं, जिनमें कुछ प्रक्षिप्त अंश भी हैं, किंतु इससे पता चलता है कि संगठन की संरचना और धर्म के बीच गहरा रिश्ता है।

टोटम तथा समाज- टोटम गोत्र का चिह्न है, प्रतीक है उस संगठन का जो एक मांस से बने हैं। अतः टोटम ही सामाजिक संगठन का आधार बनता है।

इसमें भौतिक वस्तुओं को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। टोटम पवित्र शक्ति तथा गोत्र की पहचान है, अतः टोटम एक ही समय में गोत्र अथवा समुदाय अथवा समाज का प्रतिनिधित्व करता है तथा पवित्र शक्ति अथवा ईश्वर का भी। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार ईश्वर और समाज एक ही हैं जिनकी पूजा आरंभ से ही होती आ रही है।

धार्मिक रीति-रिवाजों की श्रेणियां तथा उनके सामाजिक प्रकार्य :-

रीति-रिवाज सभी धर्मों की एक खास विशेषता है जो धार्मिक पहलू के रूप में कार्य करते हैं। आस्था भी धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अंग है जो उन रीति-रिवाजों तथा वस्तुओं के प्रति होती है जो धर्म में मान्य हैं।

दुर्खिम ने धार्मिक रीति-रिवाजों को चार श्रेणियों में बांटा है

(क) बलि प्रथा- बलि के रूप में दीक्षा को भी माना जाता है तथा चढ़ावा, अर्पण या दान देना भी कह सकते हैं। बलिदान, समाज में टोटम के रूप में सेवार्थ उपयोगी वस्तुओं का दिया जाता है, जो जीवनदायक भी हो सकती हैं, जैसे-अनाज, धन, पशु आदि।

यह दरअसल एक अनुष्ठान है जिसमें सामूहिक सहभागिता के द्वारा पवित्र होने की अवधारणा सम्मिलित होती है।

(ख) मुखौटा, रंग-लेपन अथवा अनुकरणशील अनुष्ठान-इस अनुष्ठान में सामूहिक रूप से सदस्य विभिन्न पशुओं की आकृति एवं गुणों की नकल करते हैं तथा मुखौटे या रंग-रोगन के लेप का प्रयोग भी करते हैं।

इसके द्वारा वे अनुकरणीय पशु की आत्मा व गुण को समुदाय के सदस्यों में प्रवेश करवाते हैं। यह नवीन उत्पादन का बोधक भी है, जो प्रजनन का प्रतीक है।

(ग) स्मृति अनुष्ठान-इस अनुष्ठान को परंपरा का स्थानांतरण या नयी पीढ़ी को इतिहास का ज्ञान कराना भी कहते हैं। इसमें अपने पूर्वजों के पौराणिक इतिहास का स्वांग किया जाता है।

यह अपनी परंपरागत ज्ञान की जानकारी से समाज द्वारा समाज को जोड़ने का कार्य है।

(घ) पापनाशक अनुष्ठान-यह अनुष्ठान जीवन में घटित घटनाओं; जैसे–मृत्यु, आपदा, दुर्भाग्य आदि के नाश अथवा शमन के लिए किया जाता है। इसमें अंतिम संस्कार की क्रिया आदि शामिल हैं।

धर्म तथा ज्ञान का निर्माण:- MSOE 3 Free Assignment In Hindi

धर्म की उत्पत्ति को विचारों से उत्पन्न मानते हुए दुर्थीम ने विचार अथवा ज्ञान एवं धर्म को संबंधित किया है। धार्मिक विचार प्रकृति तथा सामाजिक संरचना को श्रेणियों में विभक्त करते हैं।

अत: ब्रह्माण्ड की व्याख्या आदि ज्ञान विचारों की श्रेणियों से ही प्राप्य हैं, जो सामाजिक हैं। अतः मानव के आकाशीय, कालवाचक तथा अन्य विचार सामाजिक हैं।

दुर्खिम ने समय और स्थान को केन्द्रीय रूप में मानते हुए व्याख्या प्रस्तुत की है। इस प्रकार वर्गीकरण को सामाजिक अनुष्ठानों से जोड़ते हुए एक उदाहरण देखा जा सकता है

काल के निर्धारण में वर्ष, महीने, सप्ताह आदि को अनुष्ठान, भोज, समारोहों के आधार पर वर्गीकृत करना। अतः कैलेण्डर सामूहिक क्रियाओं के तालमेल से ही निर्मित है।

दुर्खिम के धर्म के समाजशास्त्र पर आलोचनात्मक टिप्पणी:-

इमाइल दुर्खिम की महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘दी एलीमेन्ट्री फार्स ऑफ रिलीजियस लाइफ’ एक युग प्रवर्तनकारी समाजशास्त्रीय ग्रंथ होने के बावजूद आलोच्य है

(i) धर्म को वर्गीकरण का आधार मानते हुए दुर्खिम ने धर्म के प्रणेताओं की अनदेखी की है तथा इसमें वैयक्तिक सक्रियता पर चर्चा नहीं की है। साथ ही शक्ति के असमान वितरण के कारणों की अनदेखी की है।

(ii) सामूहिक चेतना के संदर्भ में अल्प चर्चा। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

(ii) दुर्खिमका धर्म विश्लेषण एक जनजाति पर आधारित है जो सार्वभौमिक सत्य नहीं हो सकता।

(iv) ऑस्ट्रेलिया के टोटमवाद को दुर्खिम ने सर्वाधिक प्राचीन कहा जो कि साक्ष्य के अभाव में संदेहपूर्ण है।

(v) दुर्खिम के धर्म के समाजशास्त्र के साथ-साथ उनके इस तर्क का भी खंडन किया गया जिसमें “मानव विचारों की सबसे आधारभूत श्रेणी की उत्पत्ति सामाजिक अनुभव से हुई है” बताया गया है।

(vi) इनके द्वारा बताए गए टोटमवाद के अनुरूप सभी जनजातियों में टोटम गोत्र होना चाहिए, किंतु कुछ में बिना टोटम के गोत्र हैं। अतः इमाइल दुर्खिम की आलोचना के बावजूद यह अनुसंधान सर्वथा धर्म की उत्पत्ति के कई संदर्भो को खोलता है जो दुर्खिम के मौलिक चिंतन की देन है।।

प्रश्न 4. धर्म के अध्ययन पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण की जांच कीजिए।

उत्तर-मार्क्सवादी सामाजिक विचार- कार्ल मार्क्स ने उत्पादन की प्रक्रिया को समाज से जोड़कर उसका संबंध विश्लेषित किया है। भौतिक वस्तुओं के निर्माण अर्थात भोजन आदि के लिए ही मानव एक-दूसरे से संबंध बनाते हैं और यही समाजीकरण का कारण बनता है।

मार्क्स ने उत्पादन के ढंग को अपने सामाजिक विश्लेषण का केंद्र बिंदु माना है। इसी उत्पादन के ढंग पर उन्होंने इतिहास का विभाजन व प्रत्येक युग-विशेष की व्याख्या की है।

अर्थात जिस काल में उत्पादन की शक्ति जिसके पास रही, उसी ने शासन किया तथा शेष समाज पर अत्याचार किया। यह प्रत्येक काल में होता रहा है, इनके बीच का संघर्ष ऐतिहासिक परिवर्तन लाता है।

कार्ल मार्क्स के विचार में उत्पादन के ढंग दो प्रकार के होते हैं- उत्पादन की शक्ति तथा उत्पादन के संबंध उत्पादन की शक्ति में उसका तकनीकी पक्ष आता है, जहां कच्चा माल, वैज्ञानिक ज्ञान, श्रमिकों की श्रमशक्ति आदि उपस्थित हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

उत्पादन का संबंध सामाजिक संबंध है, जो सेवक-मालिक अथवा उत्पादक-उपभोक्ता के बीच हो सकता है।
कार्ल मार्क्स ने सामाजिक संरचना को अर्थव्यवस्था पर आधारित माना है जहां वर्ग भेद को प्रमुख स्थान दिया गया है।

वर्ग संबंध ही समाज की अधिसंरचना तथा अधोसंरचना का निर्माण करते हैं तथा समाज की अधिसंरचना को अधोसंरचना आकार देते हैं।

मार्क्स कहते हैं कि शासक वर्ग की विचारधारा सामाजिक प्रकृति को विकृत कर देती है।

अधिसंरचना उत्पादन से संबंध बनाती है तथा वर्ग-संघर्ष के उपरांत अधोसंरचना द्वारा नए समाज का निर्माण होता है और यह अंतिम समाज साम्यवादी-समाजवादी होगा, जिसमें उत्पादन के साथ एकसमान संबंध होगा तथा कोई विरोध नहीं रहेगा।

धर्म का मार्क्सवादी विचार:-

कार्ल मार्क्स ने धर्म को भी वास्तविक और आर्थिक वास्तविकता से जोड़ा है। अतः इन्होंने धर्म को अन्य सामाजिक एवं आर्थिक संस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में ही समझने का प्रयास किया है।

कार्ल मार्क्स की धर्म संबंधी व्याख्या प्रकार्यात्मक थी, चूंकि उनका लक्ष्य धार्मिक सिद्धांत एवं धार्मिक विश्वास नहीं था, बल्कि समाजिक था।

कार्ल मार्क्स ने धर्म के बारे में कहा है कि धर्म एक भ्रम है, अतार्किक, विरोधी व पाखंड है। यह वास्तविकता से परे दिखावे एवं भ्रांति से संबंधित है। यह लोगों को उच्चादर्शों एवं कर्म से विमुख करता है।

कार्ल मार्क्स ने धर्म की प्रशंसा भी की है तथा कहा है-“धर्म धीरज बांधने का सामान्य आधार है-धर्म के विरोध में संघर्ष…संसार के विरोध में संघर्ष है, जिसकी आत्मिक सुगंध धर्म है। धर्म दबे हुए व्यक्ति की गहरी सांस है, हृदयहीन संसार का हृदय है। आत्मारहित परिस्थितियों की आत्मा है।”

मार्क्स का विचार था कि जनता को यदि वास्तविक खुशी न मिले, तो भ्रामक खुशी आवश्यक है। इस पर विचार करते हुए कहा है कि धर्म शासन करने का एक माध्यम बनता है जो शोषितों एवं गरीबों पर प्रभाव जमाता है।

धर्म का उन्हें भ्रमित करना कि अगले जन्म में तुम वास्तविक खुशी पा लोगे, एक साजिश है। मार्क्स ने धर्म को आधारभूत दु:खों की अभिव्यक्ति तथा आर्थिक सच्चाइयों के लक्षण के रूप में देखा है।

अत: एक ऐसे समाज की सृष्टि की जाएगी जिसमें दर्द एवं कष्टपूर्ण आर्थिक परिस्थितियों का उन्मूलन कर दिया जाएगा और धर्म की भ्रमित भूमिका समाप्त हो जाएगी।MSOE 3 Free Assignment In Hindi

अतः धर्म पर मार्क्स ने जो विचार प्रस्तुत किए हैं वे पूरी तरह से एकांगी हैं। धर्म के मूल में रूढ़ियों से रहित स्वरूप के अंतर्गत मानवीयता

धर्म : दमन का एक उपकरण :-

मार्क्स ने धर्म को दमन के माध्यम के रूप में भी और दमन के अभिकरण के रूप में भी माना है।

ईसाई धर्म का उदाहरण देते हुए सद्कर्मों से मुक्ति पाने की बात कहकर मार्क्स ने व्यंग्य किया है कि ये यह सिखाते हैं कि गरीबी के कारण कष्टों को सहने पर भी वह विनम्रता से रह लेगा, ताकि अगले जीवन में इसके लिए पारितोषिक मिले।

इस प्रकार धर्म गरीबी को सहनीय बना देता है और क्रांति का शमन कर देता है। गरीबी को उसके पिछले जन्म के पापों से जोड़कर देखा जाता है, जो ईश्वरीय विधान कहलाता है।

इसके अतिरिक्त धर्म दमन के अभिकरण के रूप में भी कार्य करता है। यह उस वर्ग को शक्ति प्रदान करता है जो दमन करता है। । सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर अनुकूल बनाकर पेश किया जाता है।

किंतु भारतीय भक्ति आंदोलन में जिस भक्ति की बात की जाती है वह पूरी तरह से मार्क्स के विचारों से मेल नहीं खाती। यहाँ | धर्म का सुलभ और सरल स्वरूप परिलक्षित हुआ है, जिसमें अधिकांश निम्नवर्गीय लोग ही शामिल हुए और राजसत्ता को चुनौती दी। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

प्रभावशाली विचारधारा : धर्म —

मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘जर्मन आइडियोलॉजी’ में विचारधारा पर आरोप लगाते हुए उसे अवैज्ञानिक, मिथ्या और अस्पष्ट कहा है।

धर्म की गलत व्याख्या को लेकर भी मार्क्स ने आक्षेप लगाए हैं। धर्म को सामाजिक सत्यता से दूर मानते हुए मार्क्स फ्यूरबैक की धर्म की अवधारणा से प्रभावित थे।

फ्यूरबैक का कार्ल मार्क्स पर प्रभाव- हीगल से प्रभावित जर्मन दार्शनिक फ्यूरबैक ने अपनी पुस्तक ‘दास वैसस डैस क्रिसटेनटमस’ में धर्म एवं खासकर ईसाई धर्म की आलोचना की है।

इनके विचारों से कार्ल मार्क्स तथा एंजिल प्रभावित थे। फ्यूरबैक ने कहा था, “मानव अपनी हस्ती को वस्तुनिष्ठता में व्यक्त करता है तथा फिर अपनी बनाई हुई कल्पना के लिए स्वयं को एक वस्तु बनाता है. इस प्रकार एक विषय में बदल जाता है।”

मार्क्स फ्यूरबैक के निम्नलिखित बातों से अत्यधिक प्रभावित थे

(i) धर्म मानव की कल्पित अभिव्यक्ति है।

(ii) धर्म के साथ ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति की आवश्यकता के लिए जुड़े होते हैं।

(iii) मानव धर्म को उत्पन्न करता है तथा उसकी परिपक्वता में धर्म पीछे छूट जाता है।

मार्क्स फ्यूरबैक से प्रभावित अवश्य थे, किंतु उनके विचार भ्रमित संसार के कारणों की खोज करता है तथा आत्म के अलगाव के प्रश्न पर वे व्यावहारिक, सामाजिक तथा आर्थिक रूप को उत्तरदायी मानते हैं।

अतः मार्क्स धर्म के प्रधान आलोचक हैं, किंतु वे धर्म को सामाजिक अर्थव्यवस्था और प्रताड़ना का कारण नहीं मानते, बल्कि धर्म को उसके सहायक के रूप में देखते हैं जो समस्या को चिरस्थायी बना देता है तथा उसे हल करने का ढोंग करता है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

अधिसंरचना के रूप में धर्म :- मार्क्स ने समाज की संरचना का आधार अर्थव्यवस्था को माना है। आर्थिक व्यवस्था ही उत्पादन संबंधी अथवा वितरण संबंधी साधनों की आधारभूत संरचना का निर्माण करती है।

धर्म को मार्क्स ने अधिसंरचना कहा है जो अधोसंरचना से निर्मित होती है तथा धर्म अधिसंरचना के रूप में केवल एक उपागम है।

चूँकि अधिसंरचना में बदलाव अधोसंरचना में परिवर्तन से होता है, क्योंकि तब धार्मिक विश्वास के रूप में समाज में प्रकृति की जटिलता के लिए अनिवार्य साधन था, किंतु आगे चलकर यह वर्ग समाज में श्रमिकों की मजबूरी के रूप में स्थापित हुआ।

मार्क्स की अधिसंरचना में उपस्थित सभी उपागम धर्म, राज्य, राजनीतिक, सांविधिक, दार्शनिक, कलात्मक सभी एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तथा आर्थिक कारण प्रबल रूप से प्रभावित करता है।

मानवीय चेतना के उत्पन्न होने में भी आर्थिक कारणों का योगदान निर्विवाद है, अतः धर्म पर नियंत्रण से मानवीय चेतना का प्रभाव बढ़ेगा।

यहूदीवाद के प्रश्न’ पर मार्क्स :- कार्ल मार्क्स यहूदी होते हुए भी यहूदीवाद के आलोचक थे। कालांतर में उन्होंने प्रोटेस्टेंट अपनाया था। उन्होंने अपनी धर्म संबंधी व्याख्या में ईसाई धर्म को ही आधार बनाया, किंतु यहूदीवाद के विरोध में उनका स्वर आक्रामक हो जाता है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

मार्क्स ने धर्म को एक व्यक्तिगत मामला माना है तथा राज्य द्वारा व्यक्ति के नागरिक के रूप में ही हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

यहूदियों की कम संख्या के बावजूद उनकी आर्थिक क्षमता अथवा भौतिक समृद्धि ने यहूदियों को इस योग्य बनाया कि वे नागरिक समानता की बात कर सकें।

इस प्रकार मार्क्स यहूदियों की समृद्धि के पीछे आर्थिक समृद्धि मानते हैं तथा धनलोलुप व लालची लोगों के द्वारा इनको अलग जाति या समूह के रूप में माना जाता था।

धर्म के अध्ययन में मार्क्सवादी उपागम की आलोचना :

कार्ल मार्क्स ने धर्म की व्याख्या के साथ-साथ उसकी कड़ी आलोचना भी की है तथा उसे आध्यात्मिक ढोंग कहते हुए सबको अर्थ तंत्र से संचालित माना है।

वैसे मार्क्स के विचार मुख्यतः ईसाई धर्म को लेकर ही हैं। सार्वभौमिक सत्य के रूप में हीगल से प्रभावित मार्क्स ने ईसाई धर्म को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हुए उसकी आलोचना की, जो कि सही नहीं है।

धर्म को भौतिक तथा आर्थिक वास्तविकताओं से निर्धारित माना है जो कि वास्तव में सही नहीं है, अगर ऐसा होता तो प्रोटेस्टेंटवाद से पूर्व पूंजीवाद आ जाता।

इसे मैक्स वैबर के विचारों से खंडित किया जा सकता है कि धार्मिक संस्था नई आर्थिक वास्तविकताओं का निर्माण करती है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

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भाग – ॥ .

प्रश्न 8. ‘टोटमवाद’ क्या है? यह मनुष्यों (संस्कृति) और प्रकृति के संबंध को कैसे प्रतिविबित करता है?

उत्तर-लेवि स्ट्रॉस को संरचनात्मक मानवशास्त्र के विकास के लिए जाना जाता है। बौद्धिक फ्रांसीसी यहूदी परिवार से संबद्ध लेवि-स्ट्रॉस का जन्म 28 नवम्बर, 1908 में ब्रूसेल्स में हुआ था।

लेवि ने पेरिस के सॉरबोन में कानून तथा दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया था। उन्होंने कानून का अध्ययन पीछे छोड़ दर्शन का अध्ययन जारी रखा और 1931 में, लोक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की।

1935 में उन्होंने ‘फ्रेंच-कल्चरल मिशन’ में भाग लेने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। 1935 से 1939 के बीच उन्होंने साओ पाओ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का अध्ययन किया।

विश्व के बहुत सारे विद्वानों के विचारों का अध्ययन उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय न्यूयॉर्क में रहकर किया। 1942 से 1945 तक उन्होंने न्यू स्कूल ऑफ सोशल रिसर्च में अध्यापन कार्य किया।

जैकबसन, जो कि भाषाविज्ञान संबंधी संरचनावाद के प्रमुख प्रणेताओं में से एक थे, के साथ मित्रता ने उनकी मानवशास्त्रीय संरचना को आकार प्रदान करने में मदद की।

यू.एस.ए. में वे फ्रेज बोआज के मानवशास्त्र संबंधी लेखों के संपर्क में रहे।

डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने हेतु लेविस ने दो शोध प्रपत्र पेश किए। एक ‘द फैमिली एण्ड सोशल लाइफ ऑफ नाम्बिकवारा । इण्डियन्स’ तथा दूसरा ‘द एलिमेन्ट्री स्ट्रक्चर्स ऑफ किनशिप’।

1973 में ‘एकैडेमिक फ्रेंसाइज’ के लिए चुने जाने पर उनकी लोकप्रियता बहुत बढ़ गई। यह फ्रांस के बौद्धिक जगत का सर्वोच्च सम्मान होता है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

इसी वर्ष उन्हें इरैस्मस का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। ऑक्सफोर्ड, हावर्ड व कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने उन्हें मानक डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।

स्ट्रॉस के लिए संरचनावाद से तात्पर्य ऐसी गहरी अदृश्य तथा स्वाभाविक संरचना से है जो मनुष्य जाति के लिए स्वाभाविक व सार्वभौमिक है। संरचना व्यवहार की ऊपरी सतह में परिलक्षित होती है जो एक संस्कृति में दूसरी संस्कृति से स्पष्टतः भिन्न होती है।

चेतनापूर्ण संरचनाएं ‘अशुद्ध’ होती हैं। अतः अचेतन से चेतन में परिवर्तित संरचनाओं के रूपांतरण पर विचार करना चाहिए। नातेदारी संबंधी अपने अध्ययन में लेवि स्ट्रास ने ‘अलायन्स सिद्धांत’ की स्थापना करने का प्रयास किया।

स्ट्रॉस के अनुसार निकट संबंधी के साथ व्यभिचार पर निषेध ही संस्कृति का सार है। यह निषेध विभिन्न समूहों के मध्य विचारों में संबंध स्थापित करते हैं। प्रतिबन्धित संबंध स्ट्रॉस के विचारों में बेहद महत्त्वपूर्ण है।

सूक्ष्म स्तर पर संरचनात्मक पद्धति को अपनाने की विधा को ‘नीयो-स्ट्रक्चरीलिज्म’ कहते हैं। लेवि स्ट्रॉस ने अपने सिद्धात से मानव विज्ञान जगत में हलचल पैदा कर दी।

कुछ विद्वान उनके मत से सहमत थे तो कुछ ने उनके मत से बड़ी आलोचना व्यक्त की। परंतु वह सत्य है कि वे एक ‘शैक्षणिक वंश’ निर्मित नहीं कर पाए।

यद्यपि ब्रिटिश मानवशास्त्री जैसे एडमण्ड लीच तथा रोडनी नीधम 1950 तथा 1960 के दशक में उनसे अत्यधिक प्रभावित थे। लुई ड्यूमो, जिन्होंने भारत के सामाजिक अध्ययन को ठीक से समझा था, वे भी स्ट्रॉस से बेहद प्रभावित थे। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

लेवि-स्ट्रॉस का टोटमवाद:-

लेवि स्ट्रास का टोटमवाद सन् 1962 में सर्वप्रथम फ्रेंच भाषा में प्रकाशित हुआ था। एक वर्ष पश्चात इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रसिद्ध मानवशास्त्री रोडनी नीधम ने किया।

रोजर सी. पुल ने टोटमवाद की प्रशंसा में लिखा है-“टोटमवाद के अंतर्गत लेवि स्ट्रॉस ने ऐसी प्राचीन मानवशास्त्रीय समस्याओं का अध्ययन किया, जिससे उसका आमूल उपचार हुआ। साथ ही इस पुस्तक के माध्यम से हमने विश्व को नए दृष्टिकोण से देखा।”

टोटमवाद की वास्तविकता- लेवि स्ट्रॉस टोटमवाद की वास्तविकता पर विश्वास नहीं करते थे। मनगढन्त बातों का ढकोसला से इसका सीधा संबंध है। इसकी रुचिपूर्ण बातों या मिथकों के कारण मानवशास्त्रियों के बीच यह लोकप्रिय रहा है।

स्ट्रॉस के अध्ययन का विषय टोटमवाद पर केन्द्रित न होकर टोटम संबंधी प्रघटना पर है। अन्य शब्दों में कहें तो यह एक विशेषण संबंधी अध्ययन है न कि ‘तात्त्विक’। कहने का तात्पर्य यह है कि लेवि स्ट्रॉस का अध्ययन बिन्दु यह है कि वे कौन-सी प्रघटनाएं हैं, MSOE 3 Free Assignment In Hindi

जिनके परिणामस्वरूप टोटम का अस्तित्व है, उन्होंने टोटम के अर्थ तथा प्रकारों का अध्ययन नहीं किया। अपने अध्ययन हेतु लेवि स्ट्रॉस के पास भी वही सामग्री थी, जो उनके पूर्व के विद्वानों के पास थी,

लेकिन लेविस ने ही एक नवीन दृष्टिकोण का विकास किया। उन्होंने अपने पूर्व के मानवशास्त्रियों के समान यह नहीं पूछा कि टोटमवाद क्या है?

उनका प्रश्न यह था कि ‘टोटम संबंधी प्रघटनाएं किस प्रकार व्यवस्थित होती हैं?’ इस तरह साठ के दशक में ‘क्या’ से ‘किस प्रकार’ की ओर प्रस्थान होना अत्यन्त ही क्रांतिकारी प्रघटना थी।

सर्वप्रथम उन्होंने अमेरिकन स्कूल के सदस्यों के शोध अभिलेखों को अस्वीकार किया, जिसके अनुसार टोटम संबंधी प्रघटना कोई स्वमूलक वास्तविकता नहीं है।

टोटमवाद का अपना कोई अस्तित्व या नियम नहीं है, बल्कि यह व्यक्तियों तथा सामाजिक समूहों की पशु
और वनस्पति जगत के साथ एकता सिद्ध करने की आदिवासियों की एक सामान्य प्रवृत्ति का परिणाम है।

उनसे पूर्व के विद्वान दुर्थीम और मैलीनोव्सकी के विचार से स्ट्रॉस असहमति व्यक्त करते हैं।

विधि अथवा प्रणाली :- MSOE 3 Free Assignment In Hindi

लेवि स्ट्रॉस का टोटमवाद मुख्यत: एक प्रणाली का अभ्यास है। उन्होंने टोटमवाद की प्रघटनाओं की एकता पर ध्यान केन्द्रित न करके इसको अनेक दृष्टिकोण से देखने का समुचित प्रयास किया है

1 अध्ययन के अंतर्गत दो अथवा अधिक शब्दों द्वारा वास्तविक या काल्पनिक के मध्य संबंध स्थापित करते हुए प्रघटना का विश्लेषण करना।

2 इन शब्दों के मध्य संख्याक्रम परिवर्तन की तालिका बनाना।

3 इस तालिका को विश्लेषण की सामान्य वस्तु की भांति, केवल इसी स्तर पर आवश्यक संबंध प्राप्त किए जा सकते हैं, आरम्भ में विचार किए गए अनुभवजन्य प्रघटना का दूसरों में एकमात्र संभव समुच्चय होने के कारण इसकी पूरी व्यवस्था का पहले ही खाका बना लेना चाहिए।

इसे समझने के लिए हम नातेदारी के क्षेत्र से एक सरल उदाहरण ले सकते हैं। उदाहरणार्थ, वंशानुक्रम को पिता अथवा माता से जाना जा सकता है।

यदि वंश को पिता से लिया जाता है और उसे ‘p’ तथा माता के लिए ‘qसे अभिहित किया जाए, तथा उन्हें अलग-अलग मल्य दे दिए जाएं तो यदि माता अथवा पिता के वंश को पहचान लिया जाए तो उसे हम 1 से सचित करेंगे. और यदि वंशन पहचाना जाए, तो उसे ‘0’ द्वारा सूचित करेंगे।

अब हम संभव क्रम परिवर्तन से संबंधित तालिका निर्मित कर सकते हैं, जिसमें

(1) ‘p’ 1 है तथा q° 0 है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi
(2) ‘p’ 0 है तथा ‘q’ | है।
(3) ‘p’ भी 1 है तथा ‘q’ भी 1 है।
(4) ‘p’ भी 0 है तथा q’ भी 0 है।

पहला क्रम परिवर्तन पितृसत्तात्मक सिद्ध हुआ, दूसरा मातृ-सत्तात्मक, तीसरा पितृ एवं मातृ सत्तात्मक दोनों तथा अंतिम न पितृसत्तात्मक न मातृसत्तात्मक पाया गया।

लेवि स्ट्रॉस ने टोटमवाद को दो विभागों में बांटा है। पहला, प्राकृतिक वस्तु (पशु, पौधे) तथा दूसरा, सांस्कृतिक (व्यक्ति, गोत्र)। लेवि

स्ट्रॉस के अनुसार टोटमवाद की समस्या तब उठती है जब दो गोत्र, जो कि अलग-अलग टोटम के अनुयायी हैं वे अनेक भ्रान्तियों से घिर जाते हैं।

मनुष्य स्वयं को अनेक प्रकार से प्रकृति से संबद्ध करते हैं और एक अन्य बात यह है कि वे अपने सामाजिक समूहों को पशु तथा वनस्पति जगत के लिए गए नामों से अभिहित करते हैं।

ये दोनों अनुभव भिन्न हैं किंतु जब इन क्रमों के बीच किसी प्रकार की परस्पर व्याप्त होती है तो इसका परिणाम टोटमवाद होता है।

स्ट्रॉस आगे लिखते हैं-“प्राकृतिक श्रृंखला में एक ओर श्रेणियां होती हैं तो दूसरी ओर विशिष्ट सांस्कृतिक श्रृंखला में समूह और व्यक्ति होते हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

वह प्रत्येक शृंखला में अस्तित्व के दो रूपों-सामूहिक और व्यक्तिगत में भेद करने के लिए तथा इन शृंखलाओं को अलग रखने के लिए अपेक्षाकृत मनमाने ढंग से इन शब्दावालियों का चयन करते हैं।”

उनका कथन है कि किसी भी शब्दावली का प्रयोग करो, बशर्ते उसका अर्थ भिन्न हो

प्रकृति श्रेणी विशिष्ट
संस्कृति समूह व्यक्ति

शब्दावालियों के इन दो समूहों को चार तरह से संबद्ध किया जा सकता है, जैसाकि पूर्व में दिए गए उदाहरण के मामले में है।

प्रकृति श्रेणी श्रेणी विशिष्ट विशिष्ट

संस्कृति समूह व्यक्ति व्यक्ति समूह

इस प्रकार टोटमवाद मानव जाति तथा प्रकृति के बीच संबंध स्थापित करता है और जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है इन संबंधों को चार प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है और हम उनमें से प्रत्येक के अनुभवसिद्ध उदाहरण देख सकते हैं।

ये चारों समीकरण समतुल्य हैं। इसका कारण यह है कि वे समान क्रिया के ही परिणाम हैं अर्थात तत्त्वों का क्रम परिवर्तन जिसमें एक प्रघटना है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

किन्तु लेवि स्ट्रॉस का मानवशास्त्रीय साहित्य में प्रत्यक्ष रूप से केवल पहले दो ही शामिल हैं, शेष दो अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। अप्रत्यक्ष होने का तात्पर्य अंतिम दोनों निष्कर्ष मूल रूप से ‘अजनबीयत’ का बोध कराता है।

विश्लेषण:-

कुल मिलाकर लेवि स्ट्रॉस के टोटमिज्म के अंदर ही कई विद्वानों ने स्पष्टीकरण किया है। इस दृष्टि से फर्थ और फोर्टस का नाम महत्त्वपूर्ण है।

इन दोनों का मानना है कि टोटमवादी व्यवस्था और प्राकृतिक उपागमों के बीच अन्तर्संबंध सदृश्य होते हैं। लेवि स्ट्रॉस ने इनके प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

अत: पशु-पक्षियों तथा पेड़-पौधों के साथ साहचर्य संबंध आन्तरिक व बाह्य दोनों होता है। लेवि स्ट्रॉस ने आन्तरिक साहचर्यता पर ज्यादा बल दिया।

टोटमवाद तथा वर्गीकरण :-

लेवि स्ट्रॉस ने टोटमवाद के वर्गीकरण को उपमान के रूप में माना है। अत: टोटमवाद स्थिर प्रक्रिया न होकर एक गतिशील प्रक्रिया । है जो परिवर्तन को स्वीकार करती है।

लेवि स्ट्रॉस ने इस संदर्भ में गोत्र संबंधी उदाहरण देकर समझाया है। जैसे-तीन गोत्र-भालू, गिद्ध, कछुआ; ये तीनों भूमि, आकाश और जल के प्रतीक हैं। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 9. समाज में धर्म के भविष्य पर पीटर बर्जर के दृष्टिकोण की चर्चा कीजिए।

उत्तर-सैद्धान्तिक ढाँचा-1966 में बर्जर ने थॉमस लकमैन के साथ मिकर ‘द सोशल कन्सट्रक्शन ऑफ रिअॅलिटी’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें धर्म के सैद्धांतिक ढांचे के बारे में बताया गया है।

इस पुस्तक में ज्ञान के समाजशास्त्र, दृढ़ विश्वास, वचनबद्धता और सामाजिक संबंधों के अन्तर्संबंधों को बताया गया है।

लोग कैसे पुरानी घटनाओं और विश्वास को मान लेते हैं? वे क्यों अंधविश्वास और रूढ़ियों के आडम्बर में फँसे रहते हैं? सामाजिक जकड़न से वे मुक्त क्यों नहीं हो पाते हैं? इन समस्त विद्रूपताओं का चित्रण बर्जर के ‘द सैक्रेड कैनोपी’ (1967) में उपलब्ध है।

धर्म के क्षेत्र में व्यापक चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सोशल रिअॅलिटी’ (1969) में की है। धर्म के प्रति बर्जर का दृष्टिकोण मानववादी है। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कार्यों का विस्तार किया।

धर्म की ‘पौराणिक परिस्थिति’ को उन्होंने ‘आधुनिक परिस्थिति’ में ढाला है। इसमें उन्होंने आर्थिक गतिशीलता, पारिवारिक परिस्थिति व वैश्विक संरचना तीनों का मिश्रण कर दिया है।

उनका प्रारंभिक अध्ययन अमेरिका व यूरोप तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे वेबर ने इसे ईसाई व इस्लामी सभ्यता के धर्म में विस्तार किया।

उनकी पुस्तकों का गिरजाघरों पर विशेष प्रभाव पड़ा है। अक्सर इनका उदाहरण किसी संदर्भ विशेष में प्रस्तुत किया जाता है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

धर्म की संकल्पना :- बर्जर धर्म की वास्तविक परिभाषा पवित्र ब्रह्माण्ड के विचारों द्वारा प्रस्तुत करते हैं। धर्म मानव की शक्ति है। इससे वह अपनी अस्मिता निर्मित करता है।

धर्म को पवित्र पद्धति में ब्रह्माण्डीकरण भी कहा जा सकता है। बर्जर इस विचार को रुडोल्फ ओहो और मिरसिया एलिडा के लेखों से व्युत्पन्न मानते हैं। उनके अनुसार पवित्रता ‘रहस्यमयी गुणों और भयानक शक्तियों’ की ओर संकेत करती है।

यह मानव अस्तित्व की अपेक्षा दूसरी चीज है और उसी समय से यह उनसे जुड़ी हुई है। पवित्रता मानवीय अनुभवों के लक्ष्यों में बसती है।

इस प्रकार यह गुण प्राकृतिक घटनाओं और लक्ष्यों मानव और उन वस्तुओं को, जिसे मानव ने बनाया है, की विशेषता बताता है। यहां पवित्र पत्थर, पवित्र कपड़े, पवित्र समय, पवित्र यन्त्र, पवित्र स्थान, पवित्र मन और बहुत कुछ है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

धर्म का भविष्य :-20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि बर्जर अपने आरंभिक शोध ‘आधुनिकता धर्म को कमजोर करती है’ पर संदेह के लिए कारणों को उल्लिखित करते हैं।

वे धर्म को मजबूत व प्रबल शक्ति के रूप में दिखाते हैं। आधुनिकता एवं व्यक्ति, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी,

पूंजीवाद एवं बौद्धिक विचारों के उद्भव के बावजूद भी मानव की कल्पना और जीवन शैली पर धर्म का अपना प्रभाव स्थापित है। अपने लौकिकीकरण के शोध में विश्वास को दोहराते हुए बर्जर निम्नलिखित कारणों को प्रस्तुत करते हैं

  1. संयुक्त राज्य अमरीका में रूढ़िवादी और ईसाई धर्मोपदेश देने वाले चर्चों का विकास।
  2. उदारवादी चर्चों का पतन।
  3. दूसरे पश्चिमी समाजों में धर्म में रुचि बनाए रहना।
  4. विश्व के दूसरे भागों में धर्म के पनपने की शक्ति।

यद्यपि धर्म के प्रति पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण के लिए बर्जर की जमकर आलोचना भी हुई, तथापि इन वर्षों में उन्होंने अपने शोध का सफलतापूर्वक प्रतिवाद भी किया।

मूल बात यह है कि कुछ लोग आधुनिकीकरण और लौकिकीकरण के बीच आवश्यक संबंध देखते हैं, जैसे–आधुनिकता समाज पर धर्म की पकड़ को कमजोर बनाती है, जबकि मध्यकालीनता ठीक इसके विपरीत है।

बर्जर अपना दृष्टिकोण बेहद साफ रखते हैं। एकांगीपन उनमें नहीं है। बर्जर एक निश्चित संदर्भ में धर्म की जांच पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, क्योंकि एक क्षेत्र में जो सत्य है वह दूसरे में भी सत्य हो जरूरी नहीं।

दृढ़ तथा कट्टर आस्तिक से अतिबौद्धिक और छिन्द्रान्वेषी नास्तिक तक सातव्य है।

इसका मतलब यह हुआ कि जैसे-जैसे मध्यकालीनता से मनुष्य अपने आपको दूर करता गया उसके मन में धर्म के प्रति ललक उतनी ही कम होती चली गई। मनुष्य का आधुनिक सभ्यता के विकास में धर्म से अलग होना एक महत्त्वपूर्ण घटना है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

मध्यकालीनता की मुख्य पहचान धर्म की जकड़बंदियां व आधुनिकता की मुख्य पहचान धार्मिक जकड़बंदियों से मुक्ति है। जिस धर्म में कट्टरता अधिक होती है वहां वैज्ञानिक सोच का प्रभाव मंथर होता है।

इसका मतलब यह नहीं लगाना चाहिए कि किसी भी धर्म में मानवतावाद या उदारता नहीं है, दरअसल प्रत्येक धर्म का मूल उत्स मानववाद की हिफाजत करना ही है।

धर्म की प्रासंगिकता भी इसी में निहित है। लेकिन इतिहास गवाह रहा है कि सत्ता को प्राप्त करने हेतु मनुष्य ने तरह-तरह के प्रपंच का सहारा लेकर उसे धार्मिक जाम का रूप बनाकर अपने स्वार्थ के लिए उसका उपयोग किया है।

अतः मार्क्स ने सही कहा है कि “धर्म समाज के लिए अफीम है।” किंतु मार्क्स की संकल्पना को पूरी तरह समझने की जरूरत है। अतः धर्म अपने मूल रूप में सर्वकल्याणकारी और सद्भाव से युक्त विकास का दृढ़ प्रतीक है।

प्रश्न 10. निम्नलिखित पर संक्षेप में नोट लिखिए।

(i) धर्मांतरण

उत्तर-एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन की प्रक्रिया धर्मान्तरण कहलाती है। धर्मान्तरण के दो पहलू हैं। पहला तो यह है कि व्यक्ति अगर अपने धर्म में उपेक्षा का भाव देख रहा है तो वह ऐसा कर लेता है,

क्योंकि उसे अपना जीवन पुराने धर्म में असहज लगता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म परिवर्तन करने का पूरा अधिकार है लेकिन यह जब फैशन का रूप ग्रहण कर लेता है तो स्थिति दयनीय हो जाती है।

होता यह है कि जब व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन करके दूसरे धर्म में जाता है तो उसकी भावना पूर्व धर्म के प्रति मलीन हो जाती है। अपने धर्म का गुणगान करना और शेष धर्मों को हीन सिद्ध करना बेहद अमानवीय कृत्य है।

अतः धर्म का परिवर्तन व्यक्ति को उसी स्थिति में करना चाहिए, जब उसे अपनी वास्तविक स्थिति, धर्म के स्वरूप का बोध व जीवन की सार्थकता का ज्ञान हो जाए। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

देखने में यह आता है कि एक धर्म से व्यक्ति अन्य धर्म में जाता है और वहां भी चैन न मिलने पर कुछ दिनों बाद अन्य धर्म में रूपांतरण कर लेता है। अतः धर्म परिवर्तन मानवता को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

समाज के विकास में धर्मान्तरण के महत्त्व को सामाजिक संरचना के आधार पर समझा जा सकता है। जो समाज जितना असभ्य व बर्बर है, वहां उतनी अधिक संख्या में धर्म परिवर्तन की संभावना बनी रहेगी। इसके पीछे मूल कारण गरीबी, भूख, बेरोजगारी व अशिक्षा है।

जहां दरिद्रता है वहां की जनता बेचैन है। जिन धर्मावलम्बियों के पास अकूत संपत्ति है वे उन सब जगहों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए और वैश्विक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए ऐसी जगहों पर चारा अवश्य फेकेंगे।

बदले में उनकी मांग होगी, धर्म का रूपांतरण इस प्रकार एक तरफ परोपकार की भावना तो दूसरी तरफ कूटनीतिक हथकंडा। इस प्रकार का छल व प्रपंच हमेशा से समाज के लिए नुकसानदायक होता है।

अतः समाज के विकास के लिए धर्म का परिवर्तन कुछ निश्चित व विशेष परिस्थितियों में ही लाभदायक है। इसका स्वरूप निश्चित समय के पश्चात बदलता रहता है, लेकिन मानव हित में यही आवश्यक है कि धर्म का परिवर्तन नैसर्गिक रूप से किया जाए न कि प्रपंच के द्वारा। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

रैम्बो के अनुसार धर्मांतरण एक प्रकार का व्यामोह (आत्म विस्मरण) है। धर्म परिवर्तन एक जटिल प्रकार है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिवर्तन है अथवा एक विचार से दूसरे विचार के प्रति आस्था है।

धर्मांतरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू हैं। जब कोई बालक जन्म लेता है तो वह किसी-न-किसी धर्म में जन्म लेता है जो उसके परिवार और समुदाय का धर्म होता है।

सोचने-विचारने की क्षमता से युक्त होने पर किसी अन्य धर्म से प्रभावित होकर अपना धर्मांतरण कर सकता है। किन्तु किसी अन्य धर्म को अपनाना बहुत ही कठिन कार्य है चूँकि व्यक्ति की वैचारिक पृष्ठभूमि से उसका संबद्ध नहीं होता है।

इस प्रकार सफल धर्मांतरण व्यक्ति में आत्मविश्वास और दृढ़ता ला सकता है, किन्तु अपूर्ण धर्मांतरण व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद क्षति पहुँचा सकता है।

रैम्बो ने धर्मांतरण के रूप में दृष्टिगोचर होने वाले चरों के चार सेटों का उल्लेख किया है, जो निम्नलिखित हैं

(i) धर्मांतरण से व्यक्ति के आस-पास के संबंधी भी अत्यधिक प्रभावित होते हैं। यह परिवर्तन समाज, समुदाय, निकट संबंधी तथा मित्रमंडली को भी प्रभावित करता है। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

(ii) धर्मांतरण में नेता की भूमिका प्रमुख होती है। एक सुदृढ़ नेता ही धर्मांतरण की प्रक्रिया में उठने वाले प्रश्नों का जवाब दे सकता है। किसी समुदाय के व्यक्ति के सामने धर्मांतरण एक क्षणभंगुर प्रक्रिया होती है जिसमें नए विचारों को नेता द्वारा परिपुष्ट किया जाता है।

(iii) धर्मांतरण से व्यक्ति की विचार दृष्टि में व्यापक परिवर्तन आता है। उसकी विश्वदृष्टि भी बदलती है। नए धर्म के विश्वासों और कर्मकांडों को अपनाने से स्वाभाविक रूप से व्यक्ति की दृष्टि में अंतर आता है।

(iv) व्यवहार में परिवर्तन धर्मांतरण का व्यापक प्रभाव उद्घाटित करता है। एक व्यक्ति यदि धर्म ‘क’ से धर्म ‘ख’ में जाता है तो उसको धर्म ‘ख’ के सभी व्यवहारों का अनुपालन करना होता है जो एक व्यापक मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन है।

अत: कह सकते हैं कि धर्मांतरण एक मानसिक परिवर्तन है जिसका समुदाय पर प्रभाव पड़ता है तथा नयी जीवनशैली और संस्कृति को अपनाने के बाद मनुष्य नए जीवन का अनुभव करता है।

इसका दूसरा पक्ष है कि धर्मांतरण से धर्मों के बीच की दूरी घट सकती है अन्यथा इसका नकारात्मक और विरोधात्मक पहलू यह है कि धार्मिक वर्चस्व की जंग छिड़ सकती है।

(ii) संप्रदायवाद

उत्तर-साम्प्रदायिकता की परिभाषा-भारत में साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल तीन अवस्थाओं में हुआ है। प्रत्येक अवस्था की साम्प्रदायिकता की अपनी परिभाषा रही है जो अगली अवस्था में मिल गयी है।

19वीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में साम्प्रदायिकता का विकास हुआ, जब यहाँ इस बात पर बल दिया गया कि इस देश का हित इसी बात में निहित है कि सभी धर्मों के बीच समान सहभागिता का भाव रखा जाए और सभी आपस में मिलकर एक-दूसरे का सम्मान करें। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

इस बात से यह तथ्य निकलकर सामने आया कि भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्खों व ईसाइयों के अलग-अलग समुदाय हैं और भारतीय राष्ट्र की रचना इन समस्त समुदायों के आपसी सहयोग की भावना से निर्मित हुई है।

इससे आपसी एकता बढ़ने की बजाय आपसी रंजिश बढ़ गई। लोग अपने राजनेताओं का नवीन रूप देखने लगे। हिन्दू व मुस्लिम अस्मिता के समर्थक अपनी धर्म की भावना को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उठाने लगे।

इसका सीधा लाभ अंग्रजों को मिलने लगा। उनकी ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति कारगर होने लगी। जो 1857 की लड़ाई जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रसिद्ध थी, 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक से डगमगाने लगी।

धर्म के अनुयायियों का एकाएक समाज में सम्मान अत्यधिक बढ़ गया। वे अब अपनी संवेदनाओं को ज्यादा सशक्त तरीके से लोगों के सामने पेश कर पाते थे।

जनता भी उनकी बातों को ज्यादा आसानी से समझ पाती थी, क्योंकि मुद्दा धर्म का हो चुका था। परिणाम यह हुआ कि तरह-तरह के संगठनों का निर्माण होने लगा। MSOE 3 Free Assignment In Hindi

एक तरफ देश ब्रिटेन की दमनकारी शक्तियों से संघर्ष कर रहा था, तो दूसरी तरफ संप्रदायवाद उसके आंदोलन को कमजोर कर रहा था। परिणामतः देश को अन्ततः आजादी तो मिली, लेकिन विभाजन एक बड़ी त्रासदी थी।

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