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MSOE 2 Free Assignment In Hindi Jan 2022

भाग – 1

प्रश्न 1. चीन के डायस्फोरा के स्वरूप का संक्षेप में परीक्षण कीजिए।

उत्तर-चीनी डायस्पोरा-चीनी का डायस्पोरा विश्व के सबसे बड़े डायस्पोराओं में से एक है। संख्या और विस्तार की दृष्टि से वह अन्य सभी समुदायों से अधिक है जो अपने मूल स्थान अथवा मातृभूमि से बाहर चले गए।

एक आकलन के अनुसार 3.3 करोड़ चीनी प्रवास के लिए चले गए हैं जिसमें हांगकांग, मकाउ और ताईवान के प्रवासी भी शामिल हैं।

पूर्व काल में चीनी डायस्पोरा- चीनी लोगों का विदेशों में प्रवास का लम्बा इतिहास रहा है। सबसे उल्लेखनीय प्रवास मिंग राजवंश के समय हुआ था। इसके अधिकांश प्रवासी हान चीनी थे।

प्रवासन की अगली लहर युआन राजवंश के दौरान आई जब शासकों ने व्यापार उपनिवेश स्थापित करने में रुचि दिखाई। 14वीं शताब्दी तक कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा और सिंगापुर में चीनी बस्तियाँ बस गईं थीं।

15वीं शताब्दी में, चीनियों ने थाईलैण्ड में और 16वीं शताब्दी में फिलिपिन्स में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे। 17वीं शताब्दी में पश्चिमी जगत के देशों में श्रमिकों की माँग थी जिससे चीनी उन देशों में चले गए।

फ्रांसीसी और अंग्रेजों द्वारा एशिया में उपनिवेशों की स्थापना से भी प्रवासन में वृद्धि हुई। 1868-1939 के दौरान लगभग 63 लाख चीनी केवल हांगकांग से ही चले गए।MSOE 2 Free Assignment In Hindi

इस समय वे मख्य रूप से करारबद्ध पुरुष मजदूरों के रूप में कार्य करते थे। कुछ चीनियों ने आस्ट्रेलिया के स्वर्ण क्षेत्रों, उत्तरी अमेरीका के पश्चिमी तट और न्यूजीलैण्ड की ओर रुख किया।

अधिकांश चीनियों को हाशिए पर रखने की परिणति 1880 के दशक से संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में वास्तव में उनके प्रवेश निषेध से हुई।

इसका कारण नस्लीय कानून था। अत: 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से 1940 के दशक तक, कुछ उल्लेखनीय अन्तरालों के साथ चीन से प्रवासन मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के यूरोपीय उपनिवेशों की ओर था।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रवासन- चीनी गणतंत्र की स्थापना के पश्चात अधिकांश प्रवासन चीन के परिधीय क्षेत्रों ताइवान, हांगकांग, मलेशिया और इंडोनेशिया से हुआ। इन आरम्भिक प्रवासियों में से अधिकांश अकुशल मजदूर थे, जो पश्चिमी यूरोप विशेष रूप से ब्रिटेन जा रहे थे,

लेकिन 1960 और 1970 के दशक में अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड की राह खुल जाने से एक अलग प्रकार का प्रवास शुरू हुआ। कुशल, शिक्षित पेशेवर और उनके परिवारों का प्रवासन होने लगा।

विशेष रूप से 1979 के सुधारों के बाद चीन ने अपनी अन्तः- उन्मुखी नीतियों को समाप्त कर दिया। फलतः कर्मकारों और चीनी छात्रों ने पश्चिमी देशों की यात्रा की।MSOE 2 Free Assignment In Hindi

1980 में कनाडा में चीन के 215 विदेशी छात्रों की संख्या 2001 में बढ़कर 11,138 हो गई। संयुक्त राज्य में 2002-03 में लगभग 64,757 छात्र अध्ययनरत थे। जापान में वर्ष 2000 में 64,000 विदेशी छात्रों में लगभग आधे चीनी थे।

पहचान :- घर से आत्मसातीकरण (घुलना-मिलना) और संबंध-प्रवासी चीनी अपने आत्मसातीकरण की मात्रा, परिवेशी समुदायों से अपने परस्पर संबंध और चीन के साथ अपने संबंध में बहुत विविध थे। थाईलैण्ड में, प्रवासी चीनियों ने व्यापक स्तर पर स्थानीय समुदाय के साथ अन्तर्विवाह किए और घुल-मिल गए।

म्यांमार में चीनियों ने बहुत कम अन्तर्विवाह किए, लेकिन व्यापक रूप से बर्मा की संस्कृति को अपना लिया। मलेशिया और सिंगापुर में प्रवासी चीनियों ने एक विशिष्ट सामुदायिक पहचान बना रखी है।

फिलिपिन्स में अनेक युवा चीनी प्रवासी अच्छी तरह घुल-मिल गए हैं, लेकिन अधिक आयु वाले को विदेशी माना जाता है।

चीन महाद्वीप और ताईवान में आप्रवासियों के साथ घरेलू संबंध विकसित हो रहे हैं और यह काफी जटिल है। कम्यूनिस्ट राष्ट्र निर्माण के प्रारंभ में चीनियों से केवल चीन के प्रति एकल निष्ठा से उम्मीद की गई थी।

उत्प्रवासियों को पूंजीवादी घुसपैठियों के रूप में शक की नजर से देखा जाता था। डेंग जिआओपिंग के सुधारों के बाद चीनी डायस्पोरा से देश द्वारा चीन के आर्थिक विकास में सहायता के लिए आग्रह किया गया।

फलतः उन्हें अनेक सुविधाएँ प्रदान की गईं और उनके लिए विशेष प्रावधान किए गए।

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प्रश्न 3. फिजि में भारतीय डायस्फोरा के स्वरूप की विस्तारपूर्वक चर्चा कीजिए।

उत्तर-फिजी में भारतीय डायस्पोरा- क्रोकोम्बे के अनुसार 1811 में सर्वप्रथम अकोवला नामक एक भारतीय नाविक ने हंटर जहाज को छोड़कर फिजी की भूमि पर पाँव रखा और वहाँ लगभग 2 वर्ष तक रहा।

उसके बाद वह सोलोमन द्वीप पर चला गया, जहाँ उसने अपना शेष जीवन बिताया। यहीं से फिजी और दक्षिण सागर के अन्य द्वीपों में भारतीय डायस्पोरा समुदाय के बसने की प्रक्रिया का आरम्भ होता है।

यद्यपि भारत- फिजी अन्तर्संबंधों का लिखित इतिहास बहुत कम है लेकिन उनके बीच के अमूर्त प्रभाव को फिजी के विभिन्न भागों में महसूस किया जा सकता है।MSOE 2 Free Assignment In Hindi

1879 में फिजी में करारबद्ध मजदूरों के रूप में भारतीयों का आगमन हुआ। ये यहाँ कपास और गन्ने के बगानों में कुली मजदूरों के रूप में काम करने लगे।

उन्होने ऑस्ट्रेलिया की एक बड़ी कम्पनी कोलोनियल शुगर रिफाइनिंग कम्पनी में भी काम किया। नारायण के. लक्ष्मी के अनुसार, “कुल मिलाकर 1879 से 1916 तक कुल 60,537 भारतीय फिजी में करारबद्ध मजदूरों के रूप में काम करने के लिए आए।”

क्रोकोम्बे लिखते हैं कि “अनुबंध (करार) की शर्तों में 5 वर्ष की अवधि निश्चित थी और इसके बाद यदि वे फिजी में रहना चाहते थे तो उन्हें फिजी में 10 वर्ष गुजारने के बाद भारत जाने के लिए निःशुल्क यात्राधिकार (Passage Emigration) मिलता था।

जो भी मजदूर जिन्दा बचे उनमें से 60% ने वहीं रहना पसंद किया”।
स्वतंत्र कर्मकारों के रूप में फिजी पहुँचने वाले भारतीय कारोबारों एवं अन्य कर्मकार को मुक्त प्रवासी कहा जाता था।

फिजी सहित अन्य दक्षिणी सागर के तटों पर कुछ नाविक जहाज को छोड़कर व्यापारियों के रूप में बस गए । ऐसे करारबद्ध मजदूर जिन्होंने वहीं बसने का निर्णय लिया, लेकिन वे अब खेती का काम नहीं करना चाहते थे, छोटे कारोबारी बन गए। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

के.एल. गिलियन के अनुसार दोनों प्रकार के करारबद्ध मजदूरों को मिलाकर 1998 तक 140 के पास दुकानदारी के लाइसेंस और 192 के पास फेरी के लाइसेंस थे जो 1916 में बढ़कर क्रमश: 1508 और 974 हो गए तथा 80 गहने बनाने वाले भी थे।

क्रोकोम्बे के अनुसार फिजी में व्यापार करने वालों का सबसे बड़ा समुदाय गुजरातियों का था। 1936 में इनकी संख्या 1500 थी।

उनके द्वारा नियोजित मुख्य व्यापार में भारत के कपड़े, सूती सामान और अन्य वस्त्र अन्य उत्पाद शामिल थे। पंजाबी समुदाय परिवहन, साहूकारी, सुरक्षा और अन्य सेवाओं में नियोजित था।

इस प्रकार, बड़ी संख्या में भारतीयों ने विभिन्न व्यवसायों को अपनाया और सरकारी कर्मकार तथा कुशल पेशेवर बन गए।

1920 से लेकर 1960 के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक की अवधि में फिजी में भारतीय डायस्पोरा समुदाय की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई और वे फिजी की कुल जनसंख्या के आधे (50%) से अधिक हो गए।

इस समय तक फिजी में भारतीय समुदाय को अत्यधिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, जिससे तंग आकर वे सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए।

1970 के बाद फिजी में सामाजिक एकता- 1970 में फिजी स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सभी आप्रवासी भारतीयों ने फिजी की नागरिकता प्राप्त कर ली। लेकिन जिस भूमि पर वे काम करते थे, उस पर उन्हें अधिकार नहीं दिया गया। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

उनके पट्टे को अगले 30 सालों के लिए नवीकृत कर दिया गया । इससे भारतीयों की स्थिति में गिरावट आ गई।

उनमें दीर्घकालीन सुरक्षा और अपनेपन की भावना का अभाव व्याप्त हो गया, लेकिन सत्येन्द्र पी. नन्दन के अनुसार, “सभी प्रकार की अड़चनों के बावजूद शिक्षा में इंडो-फिजियन की सफलता फिजी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।”

वर्तमान समय में, फिजी में भूमि पर 87% मलिकाना हक स्थानीय फिजियों के पास है। भारतीयों के पास 2% से भी कम भूमि है।

1970 में प्रदान किए गए पट्टों की अवधि की समाप्ति के बाद अधिकांश पट्टों का नवीनिकरण नहीं किया गया। स्थानीय फिजियों ने भारतीयों से काम करवाने की जगह खेत को खाली छोड़ देना बेहतर समझा। इससे पट्टाधारी भारतीयों की संख्या में काफी कमी आ गई।

1987 में तख्ता पलट के बाद बड़ी संख्या में लोग भारतीय लोग ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की ओर प्रवास कर गए। 1987 से लेकर 1990 के बीच लगभग 77,000 भारतीय फिजी छोड़कर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की ओर प्रवास कर गए।

मई 2000 में एक बार फिर तख्ता पलट की घटना हुई। इन घटनाओं के बावजूद फिजी में इंडो-फिजियन की संख्या देश की कुल जनसंख्या का लगभग 42% है।

स्थानीय फिजियन और भारतीय डायस्पोरा समुदाय एक- दूसरे में घुल-मिल नहीं पाए हैं और दोनों अलग सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश में जी रहे हैं। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

दोनों समुदायों को आपस में जोड़ने वाली कोई कड़ी नहीं है। सत्येन्द्र पी. नन्दन के शब्दों में, “फिजी की त्रासदी यह है रही कि फिजी के लोग और भारतीय लोग अलग-अलग सांस्कृतिक वातावरण में रहते हैं।

इसका आरंभ औपनिवेशीकरण प्रवास, बागान से हुआ और यह साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व एवं संस्थाओं, जैसे–अलग-अलग स्कूलों, पूजा स्थलों, जीवन शैलियों, गाँवों और कोरो, अलग-अलग संस्कारों, अनुष्ठानों एवं समारोहों, अलग-अलग भाषाओं और वास्तविकताओं के ज्ञान तक लगातार चलता रहा।”

फिजी में स्थायी रूप से रहने वाले इंडो- फिजियन ऐसे लोग हैं जो फिजी को ही अपनी मातृभूमि मानते हैं। यद्यपि उनमें से कुछ लोग प्रवास कर गए हैं, लेकिन उनकी आध्यात्मिक मातृभूमि फिजी ही है।

वे भारत को अपना पितृराष्ट्र मानने से इंकार करते हैं, जहाँ से वे प्रवास करके फिजी आए थे। उनकी स्थिति दुविधाग्रस्त है। इसके बावजूद वे एक राष्ट्र के रूप में फिजी के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं।

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भाग – ॥

प्रश्न 5. प्रवासी भारतीयों के डायस्फोरा संबंधी अनुभवों को उजागर करने में, साहित्य की भूमिका की, कनाडा के संदर्भ में, चर्चा कीजिए।

उत्तर-कनाडा में प्रवासी भारतीय उपन्यास : एक अध्ययन-कनाडा में भारत से प्रवास का दौर 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक से प्रारंभ होकर दीर्घकाल तक चला और ये उत्प्रवासियों के समूह भारतीय समाज के अनेक समूहों से संबंधित थे। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

भारतीय उत्प्रवासियों का कनाडा की मुख्यधारा में सम्मिलन एक बहुत ही कठिन घटनाक्रम है। यह उचित नहीं था कि उत्प्रवासी अनेक स्थानों पर राजनीतिक अतिक्रमणों के शिकार हो रहे थे जैसे-कीनिया, तंजानिया, युगांडा, त्रिनिदाद, जमैका और गुआना में इसलिए इनके स्थानांतरण के प्रोत्साहन दूसरे वर्गों की तुलना में अलग थे, जो प्रमुख रूप से आर्थिक अवसरों के कारण स्थानांतरित हुए।

इसके अलावा जो राजनीतिक बदलावों के दोषी हैं, वे दो बार विस्थापित हो चुके हैं। एक बार तो वे स्वेच्छा से स्थानांतरित हुए और दूसरी बार उन्हें जबर्दस्ती निकाला गया।

अतः सम्मिलन के विषय में उनकी सोच और योजना उनसे बहुत अलग है, जिनको अभी तक किसी राजनीतिक पक्षपात का सामना नहीं करना पड़ा था।

उत्प्रवासियों का प्रत्येक वर्ग अपने साथ इस विषय में सांस्कृतिक चिह्नों का एक संग्रह लेकर आया है, जिसमें धार्मिक व सामुदायिक आस्था, रीति-रिवाज, कल्पित व पौराणिक कथाएं, गीत व नृत्य, भोजन व पोशाक, कहानियां और कहावतें, पारिवारिक संपर्क व व्यक्तिगत व्यवहार आदि सम्मिलित हैं।

इन समस्त परेशानियों और उनमें विद्यमान प्रवासियों के मनोवैज्ञानिक, भौतिक व आर्थिक तनावों के साथ विदेशी सांस्कृतिक वातावरण, जिनमें प्रजातीय विभेदीकरण व्याप्त है, में सम्मिलन व सभा को भारतीय प्रवासियों के लेखकों ने अपनी कविताओं और नाटकों में और कहानियों व उपन्यासों में अपनी प्रमुख शैली के कारण समुचित रूप से वर्णन किया है।

वासनजी, रोहिंटन मिस्त्री, रेशार्द गुल, साइरिल देवीदीन, फरीदा करोदिया, लक्ष्मी गिल, उमा परमेश्वरम और अनेक ने स्पष्ट व अस्पष्ट रूप से अपने लेखों में उत्प्रवासियों द्वारा नई संस्कृति को अपनाने और साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान जो वे अपने साथ लाए थे, को छोड़ने पर विवश कर दिया।

इन सभी लेखकों ने अपने उपन्यास व कहानियों में अपने ही जातीय समूह का वर्णन किया है। इन्होंने अपने लेखों में अपनी प्रजातीयता, कल्पित तथा पौराणिक कथाएं, रीति-रिवाजों, पारस्परिक व्यवहार और अपने मूल देश की विशेषताओं का आह्वान किया। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

अपने लेखों में अपनी सांस्कृतिक पहचान के सर्वोच्च मानकों से वे इस प्रकार से सरकारी बहुसंस्कृति पर भी एक प्रश्नवाचक चिह्न लगा रहे हैं और यह समाज को अनेक भागों में विभाजित करने का एक प्रयास है।

1962 और 1982 के मध्य इस समूह के 102 लेखकों ने लगभग 196 पुस्तकें प्रकाशित की थीं। इनमें से ज्यादातर ने केवल एक ही पुस्तक लिखी थी।

1982 का वर्ष भारत में अपने मूल को तलाशने वाले कनाडियाई लेखकों के लिए प्रमुख बदलाव का समय था। कनाडा के भारतीय उत्प्रवास उपन्यासकारों में सबसे प्रमुख रोहिंटन मिस्त्री हैं।

मिस्त्री ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को अपनी पुस्तकों का आधार बनाया है। मिस्त्री की तरह दूसरे प्रवासी लेखकों की तरह वासनजी भी अपने ही समुदाय पर बल देते हैं।

इसमाइलिज जिनको कि उन्होंने अपनी पुस्तकों में शामसी के रूप में प्रस्तुत किया है, इनका मूल स्थान भारत में गुजरात के पश्चिमी तट पर है।

इनका ज्यादातर भाग 19वीं शताब्दी में अफ्रीका के पूर्वी तट के देशों में स्थानांतरित हो गया था और ये कीनिया, युगांडा और तंजानिया में भारतीय समुदाय का प्रमुख हिस्सा बन गए।

20वीं शताब्दी के अंतिम उतरार्द्ध में ये यूरोप, कनाडा सहित उत्तरी अमेरिका में स्थानांतरित हो गए। 1970 के दशक में वासनजी स्वयं उत्तरी अमेरिका के रास्ते से तंजानिया से कनाडा आए।

भारतीय मूल की उत्प्रवासी महिला उपन्यासकार इस परिदृश्य में अंत में दिखाई दी, लेकिन कनाडा में भारतीय उत्प्रवासी उपन्यास में उनका प्रमुख योगदान है। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

इनमें प्रमुख हैं-अनिता राव बादामी, लक्ष्मी गिल, उमा परमेश्वरम, हीरो बोगा रामाबाई, एस्पीनेट और नलिनी कारियर। कनाडियन भारतीय प्रवासी समुदाय के धर्म, जाति, भाषा, लोग, शिक्षा व आर्थिक, रूपरेखा और कनाडा में प्रवेश के मार्गों में व्यापक विविधताओं के बावजूद भी इनके लेखों में भारतीय उत्प्रवासी समुदाय का चित्रण राष्ट्र, स्वदेश एवं देशहीनता, घर से दूर घर, स्वयं पहचान के विषय में ही किया गया है।

इसमें भी अनेक वर्गों के सदस्यों ने अपने लेखों में जो बदलाव प्रस्तुत किए हैं, वे स्वयं के समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक रूपरेखा में हुए बदलावों की ही प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 7. साइबर स्पेस में भारत के आभासी समुदायों के स्वरूप का वर्णन कीजिए।

उत्तर-साइबरस्पेस की परिभाषा- डेविड विटल ने विज्ञान कल्पित लेख न्यूरामेंसर के लेखक विलियम गिब्सन को ऐसा लेखक बताया है, जिन्होंने साइबरस्पेस की संकल्पना को लेखबद्ध किया।

गिब्सन स्वयं इस धारणा का श्रेय शॉकवेब राइडर के रचयिता जॉन ब्रूनर को देते हैं, जो बदले में एल्विन टोफ्लर को साइबरस्पेस की धारणा को शुरू करने का श्रेय देते हैं।

साइबरस्पेस का अभिप्राय मनुष्य की उस मानसिक रचना से है, जो वह कम्प्यूटर संचार तथा सूचना प्राप्त करने के अनुभव से प्राप्त करता है। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

इस संकल्पना की बहुत ज्यादा असमंजसता एवं अविश्वास इसमें है कि क्या वास्तव में कोई ऑनलाइन समुदाय है अथवा नहीं, क्या ‘आभासी समुदाय’ होते हैं? अथवा सब ‘साइबरस्पेस’ में कल्पनाओं तथा ‘वास्तविक जीवन’ एवं ‘आभासी जीवन’ के कोई कृत्रिम द्विभाजन है।

साइबरस्पेस लक्षण हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि हमारी ऑनलाइन अन्त:क्रियाएं हमारे आम जीवन से अलग होते हैं। तकनीकी स्तर पर, हम जो कुछ भी ऑनलाइन कर रहे हैं, वह मॉडम एवं दूरभाष संपर्क की मदद से संदेशों का पहुंचना है।

साइबरस्पेस को न केवल आम जीवन तथा शारीरिक रूप से अन्त:क्रियाओं के कारण भिन्न मानते हैं, बल्कि उन्हीं को इस तथ्य में देखा जाता है कि साइबरस्पेस का मूल ही काल्पनिक विज्ञान से है।

भविष्य में साइबरस्पेस में शारीरिक रूप से निवास किया जा सकता है।

साइबरस्पेस के साहित्य विचार को मानते हुए हम अपने संदेशों के संचार को इंटरनेट के माध्यम से आकाशीय रूप से जोड़ सकते हैं।

इसके बावजूद ऑनलाइन संचार के विषय में ऐसे बिन्दु हैं, जो हमें बहुआयामी अंतरिक्ष का ज्ञान कराते हैं। कम्प्यूटर के परदे पर जो शब्द अथवा आकृतियां आती-जाती रहती हैं, उनके विषय में भी कुछ ऐसा ही है, जैसे हम जब कोई संदेश भेजते अथवा प्राप्त करते हैं तथा वेबसाइट देखते हैं तो ऐसा आभास होता है जैसे कि परदे के पीछे भी कोई जीवन है। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

काल्पनिक विज्ञान के लेखक विलियम गिब्सन, जिन्होंने इस शब्द ‘साइबरस्पेस’ को बनाया, ने लिखा, “जो व्यक्ति कम्प्यूटरों का प्रयोग करते हैं तथा कम्प्यूटर पर खेल खेलते हैं,

वे यह विश्वास कर लेते हैं कि परदे के पीछे भी एक प्रकार की वास्तविक दुनिया है, ऐसी दुनिया जिसे तुम जानते हो कि वह है, लेकिन उसे पूर्णतः स्पर्श नहीं कर सकते।”

कम्प्यूटर पर्दे के पीछे एक अन्य स्थान का भ्रम शायद सबसे अच्छा प्रमाण है, जो साइबरस्पेस के वास्तविक अस्तित्व का बोध कराता है।

सेंडी स्टोन बताते हैं कि साहित्यिक कल्पनाओं में वर्णित साइबरस्पेस अभी तक अस्तित्व में नहीं आया है। विज्ञान के काल्पनिक उपन्यासों में साइबरस्पेस में शारीरिक रूप से जिंदगी बिताई जा सकती है।

यह वैद्युत तरीके से पैदा की गई एक वैकल्पिक वास्तविकता है, जो मस्तिष्क के सीधे संपर्क से आई है अर्थात यहां चित्रित व्यक्ति अपने शारीरिक शरीर से अलग हुए, ‘सामान्य’ स्थान में स्थित है।

‘सामान्य’ स्थान के भौतिकी के नियमों को साइबरस्पेस के लिए लागू करने की जरूरत नहीं है, हालांकि कुछ प्रयोगात्मक नियमों को सामान्य स्थानों में लागू किया जा सकता है, जैसे-साइबरस्पेस के रेखागणित को कार्टे के अधिकतर वर्णनों में माना गया है।

साइबरस्पेस के पुनः चित्रित शरीर का ‘मूल’ शरीर प्रमाणकर्ता स्रोत है-‘सामान्य’ स्थान में जिसकी शारीरिक रूप से उपस्थिति नहीं है, ऐसे किसी व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता।

लेकिन मृत्यु सामान्य अथवा साइबरस्पेस में वास्तविकता है, क्योंकि यदि साइबरस्पेस में कोई व्यक्ति मरता है तो सामान्य स्थान में भी वह शरीर मरता है तथा इसी प्रकार जब साइबरस्पेस में कोई जीता है तो शरीर भी जीवित रहता है।MSOE 2 Free Assignment In Hindi

आभासी समुदायों को समझना-आभासी समुदाय के विचार को प्रचलित करने का श्रेय हावर्ड रेनगोल्ड को जाता है।

जब वाणिज्य के लिए इंटरनेट विश्वव्यापी वेब के रूप में उपलब्ध हुआ, जिसमें संसार भर में इसकी ज्यादा अधिगम्यता तथा प्रयोग बढ़ा, तो कृत्रिम रूप से प्रतीयमान समुदाय की इस धारणा को उत्तेजित किया गया, लेकिन 1990 के पूर्वार्द्ध में इस पर बहुत ज्यादा वार्ताएं एवं विवाद हुए।

साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि आभासी समुदाय की धारणा उन व्यक्तियों के विषय में है, जो अनेक ऑनलाइन तकनीकों के माध्यम से उनके बीच स्थापित किए सामान्य मुद्दों एवं हितों में विद्यमान होते हैं।

आभासी समुदायों को दर्शाने वाले समर्थक सामान्यतः आभासी समुदायों का वर्णन इस प्रकार करते हैं, “सामाजिक समूहन जो नेट से पैदा होते हैं, जो समुचित रूप से लोगों द्वारा आगे बढ़ाए जाते हैं।

लम्बी सार्वजनिक वार्ताएं, जिन्हें मानवीय संवेदनाओं के साथ किया जाता है, साइबरस्पेस में व्यक्तिगत संबंधों का एक जाल बना लेते हैं।”

नसीम वाटसन का मानना है कि व्यक्तियों के उन समूहों को जो एक-दूसरे से ऑनलाइन अन्त:क्रिया कर रहे हैं ‘आभासी’ समुदाय का नाम देना ऐसा प्रतीत होता है मानो ये समुदाय ‘वास्तव में एक समुदाय नहीं हैं।

‘आभासी’ तथा ‘वास्तविक’ समुदायों के मध्य अंतर करना न्यायसंगत नहीं है।
वाटसन का मानना है कि ऑनलाइन समुदाय, ऑफलाइन समुदायों से अलग है, लेकिन उनका मत है कि वे भी समुदाय हैं। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

वाटसन समदाय के रूपक को ऑनलाइन अन्त:क्रिया करने वाले समहों के लिए स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के प्रयोग का भी परीक्षण करते हैं।

वे नील पोस्टमैन के आभासी समुदाय की धारणा के आलोचक हैं, जिनका संकेत इस ओर है कि ऑनलाइन समुदाय ‘वास्तविक’ से ‘आभासी’ को अलग करने की जानकारी देते हैं।

पोस्टमैन ऑनलाइन समुदाय के संदर्भ में समुदाय की धारणा का प्रयोग गलत मानते हैं, क्योंकि ऑनलाइन समुदाय पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं होता, जैसा कि वास्तविक समुदायों में होता है।

उनमें एक सामान्य बंधन के जरूरी लक्षण की कमी होती है। सामान्य अर्थों में, ऑनलाइन समुदाय में, ज्यादातर समुदायों का सामान्य बंधनों में मिलने अथवा बाध्यता का अभाव होता है।

ऑनलाइन समह का वास्तविक जीवन समहों से किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं होता इस बात का खंडन किया जा सकता है।

पोस्टमैन का मानना है कि इंटरनेट द्वारा ऑनलाइन अन्त:क्रिया के तरीकों पर एक नजदीकी दृष्टिपात करने से समुदायों की संरचना एवं उनमें बदलावों में इंटरनेट के विद्वानों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सुधार के चित्रण एवं सहयोग करने में सहायता मिल सकेगी। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

हममें से जो कुछ एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक वर्ग में आते हैं, जिनके पास भाषा, शिक्षा, प्रतिभा तथा आपस में जोड़ने के लिए जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता है, ऑनलाइन सामुदायिक संरचनाओं को पहले से ही मान लेते हैं।

वे उन कार्य-वातावरण जिनमें इस बात का विकल्प नहीं दिया जाता कि वे इंटरनेट संबद्धता तथा ऑनलाइन उपलब्ध सूचना एवं सामाजिक स्थान का प्रयोग करें अथवा न करें।

जिस प्रकार सरलता से रेडियो, दूरदर्शन, दूरभाष तथा मोबाइल/सेलफोन हमारी दिनचर्या के लिए जरूरत बन चुके हैं, उसी प्रकार ऑनलाइन होना भी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

स्वतंत्रता का उत्सव तथा साइबरस्पेस से सीमाओं का विलय यह अनुभव कराता है कि साइबरस्पेस केवल आदर्श में विशेषाधिकार युक्त वर्गों के लिए संभव है,

जो उन्हें विश्व के उन अन्य अल्प अधिकारों से युक्त व्यक्ति से अलग करता है, जो दैनिक कष्ट एवं अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनसे इन्हें अलग करता है।

आधुनिक रूप से साइबरस्पेस को एक आश्चर्यजनक भूमि कहा गया है, जहां जैसे ही हम स्वयं को एक आवरण तथा प्रतिमानों में परिवर्तित करते हैं, वैसे ही वहां लिंग, जाति तथा अन्य अलगाव के प्रतीक समाप्त हो जाते हैं।

द्विआधारी तर्क जो आभासी समुदाय को अवास्तविक मानता है और जो ऑफलाइन की दैनिक वास्तविकता से दूर है, गलत चित्रण भी करता है। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

आभासी समुदायों के लिए इसके अलावा इस साहित्यशास्त्र से यह संकल्पना स्पष्ट होती है कि समुदाय की संरचना व्यक्ति विशेष से शुरू होती है तथा तकनीकी सोच के व्यक्तिगत अलंकृतशास्त्र में निहित होती है।

यह स्पष्ट है कि यह साइबरस्पेस एवं ऑनलाइन तकनीक की आदर्शवादी एवं निश्चयवादी अवधारणाएं इस तथ्य को भूल जाती है कि व्यक्ति उन रीतियों, सत्ता संगठनों तथा नियमों से बंधे होते हैं, जो इन समुदायों को बनाते हैं।

जब भी हम ऑनलाइन क्रियाकलाप की चर्चा करते हैं तो ‘वास्तविक’ तथा ‘आभासी’ में विभाजन विद्यमान होता है।

आभासी जीवन बनाम वास्तविक जीवन के दोहरेपन को दूर करने के लिए, डॉन स्लेटर सुझाव देते हैं कि इसकी जरूरत इसलिए है कि ऑनलाइन संबंधों और पहचानों की प्रकृति के विषय में प्रश्न करने से हटकर ऑनलाइन पर व्यक्ति क्या करते हैं?’ स्लेटर सामाजिक संबंधों के ज्यादा समृद्ध एवं एकीकृत विवरण की मांग करते हैं, जो मानवजाति संबंधी अध्ययन पैदा करते हैं।

यदि ऑफलाइन तथा ऑनलाइन के विभाजन को मान लिया जाए तो उस सामाजिक ऑनलाइन अन्त:क्रिया का क्या होगा, जो ऑफलाइन में चलती है? स्थायी रूप से होने वाले ऑफलाइन संपर्क का उन व्यक्तियों के मध्य प्रतीयमान अन्त:क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?

प्रवासी समुदायों के आभासी समुदाय इस प्रकार भौतिक एवं विशृंखलित हैं, जिनके परिणाम सारयुक्त हैं।

इसके अलावा वे न केवल सामाजिक एवं अंकीय स्थान का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि सांस्कृतिक संघर्ष का एक संपर्कीय क्षेत्र हैं। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

भारतीय अंकीय (Digital) डायस्पोरा- संसार के प्रवासी समुदाय वास्तविक रूप से अनेक आभासी समुदायों के निर्माण के लिए भूमण्डलीय अंत:क्रिया के अवसरों को जिम्मेदार मानते हैं।

प्रश्न उठता है कि इस प्रकार की अंत:क्रिया को बनाने में सफल तथा ऑनलाइन नेटवर्क द्वारा उन्हें सुरक्षित रखने के क्या निहितार्थ हैं? उनके द्वारा किस प्रकार की सांस्कृतिक रीतियों की पुनरुत्पत्ति की जाती तथा कायम रखी जाती है।

किस प्रकार के इतिहास को ग्रहण किया जाता है? अंकीय प्रवासी समुदाय किस प्रकार सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक भूतकाल एवं भविष्यों की पुनः कल्पना करते हैं? उन देशों की भावी पीढ़ियों का क्या भविष्य हो सकता है,

जहाँ इस प्रकार के अंकीय प्रवासी समदाय अपना घर बना लेते हैं। इसके अलावा इंटरनेट के आधार पर अंकीय मीडिया द्वारा प्राप्त तकनीकी अन्तरापृष्ठ इस प्रकार की अस्मिताओं तथा सामुदायिक व्यवहारों की पुनरुत्पत्ति को कैसा स्वरूप प्रदान करती है?

अमित राय (1995) का मानना है कि आप्रवासियों एवं अन्य प्रवासी सामुदायिक जनसंख्या द्वारा निर्मित किए गए ऑनलाइन समुदाय, उसी प्रकार की चिन्ताएं तथा विचारधाराएं पैदा करते हैं,

जो उन प्रवासी समुदायों के अंदर के दृश्य हैं, जो ऑनलाइन नहीं हैं। उनका मानना है कि इन समुदायों की अति उद्धरण की मनोवैज्ञानिक तार्किक संरचना दिखाई देती है, MSOE 2 Free Assignment In Hindi

जबकि वे अति उद्धरण की मूलभूत लोकतंत्रात्मक अथवा वैद्युत माध्यम की शक्ति पर साधारणतः सन्देह करते हैं, लेकिन हम यह विश्वास करते हैं कि इन अनेक प्रकार के अति उद्धरणों की अन्त:क्रियाओं को कम-से-कम उन विशेषाधिकारयुक्त व्यक्तियों, जो इन माध्यमों तक पहुंचने की शक्ति रखते हैं, उनके लिए संभव बना सकते हैं।

यह याद रखना जरूरी है कि आभासी समुदाय अमूर्त रूप में है, लेकिन फिर भी वे वास्तविक समाजों के तथा अनुमानित समुदायों के विशृंखलित प्रतिरूप हैं।

इस सन्देह के बावजूद कि यह एक शुद्ध उद्धरण है न कि कोई मानवीय आकृति, जिसमें ये उद्धरण निकलते हैं, हम सभी शुद्ध साइबरस्पेस में नहीं फैले हैं।

हम अमूर्त रूप व्यक्ति नहीं हैं तथा हम आभासी समुदायों के मध्य अन्त:क्रिया करते हैं, तब भी हम विशृंखलित अर्थव्यवस्थाओं तथा असमान स्थितियों में रहते हैं, इन्हें हमारे द्वारा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक अन्त:क्रियाओं के प्रमुख संरचना के तहत ही बनाया जाता है।

साथ ही हम उन ‘विशृंखलित विषयों’ के संदर्भ में बात कर रहे हैं, जो अपने उद्धरण की प्रकृति और विषय से जाने जाते हैं।

प्रश्न 8. संयुक्त राज्य अमरीका में भारतीयों को आदर्श अल्पसंख्यक समुदाय क्यों माना जाता है?

उत्तर-संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय डायस्पोरा की रूपरेखा-1970 से लेकर 1979 तक अमेरिका में प्रवेश पाए आप्रवासियों की दशकीय संख्या की दृष्टि से पूरी दुनिया में भारत का छठा स्थान था।

1993 तक वार्षिक श्रेणीक्रम में भारत को सातवाँ स्थान प्राप्त हुआ। 1996 तक भारत मैक्सिको और फिलिपीन्स के बाद तीसरे स्थान पर आ गया। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

अमेरिका में भारतीय ज्ञान कर्मकारों के बड़ी संख्या में प्रवेश का दूसरा कारण वहाँ श्रमिकों की अत्यधिक माँग रहा है। 1970 से आज तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आप्रवासियों के रोजगार, व्यवसायों, शिक्षा और आय के आधार पर सूचीबद्ध प्रवासियों में भारत का स्थान लगातार सबसे ऊपर बना हुआ है।

रोजगार की स्थिति-अमेरिका की जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में भारतीयों की संख्या 1980 में 3,60,000 थी जो 1990 में बढ़कर 820,000 हो गई।

वर्ष 2000 के लिए भारतीयों की अनुमानित संख्या 10,00000 थी जो समय से पहले ही पूरी हो गई। 2000 तक भारतीयों की संख्या 17 लाख तक पहुँच गई थी।

1980 की अमेरिकी जनगणना के अनुसार 16 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लगभग 75% भारतीय आप्रवासी अमेरिकी श्रमशक्ति में थे।

इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक 4 में से 3 भारतीय वयस्क या तो नौकरी में थे या नौकरी की तलाश में थे।

व्यावसायिक रूपरेखा-1980 के दशक में औसतन भारतीय आप्रवासियों का 1/3 व्यवसाय में था और बाकी अकार्यशील पति, पत्नी, बच्चे, अन्य आश्रित और विद्यार्थी थे।

1985 में यह संख्या दुनिया के सभी प्रवासियों की औसत 39% तथा 1987 की औसत 40% से कम नहीं थी। इस कम हिस्सेदारी की भरपाई प्रबन्धकीय, व्यावसायिक और कार्यकारी व्यवसायों में भारतीय आप्रवासियों में बड़ी भागीदारी से हो रही थी।MSOE 2 Free Assignment In Hindi

1975 से 1980 तक की अवधि में भारत से गए प्रवासियों में से 36% को इसके तरह के व्यवसाय प्राप्त थे। यह हिस्सेदारी जापान को छोड़कर एशिया के अन्य सभी विकासशील देशों से अधिक थी।

वर्तमान समय में अमेरिका में सूचना प्रौद्योगिकी के लोग में 3 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग काम कर रहे हैं।

यद्यपि यह संख्या अमेरिका में सूचना प्रौद्योगिकी में संलग्न श्रम बल का केवल 3% है लेकिन इनमें से काफी लोग अध्ययन और बड़ी कम्पनियों में एक्जीक्यूटिव हैं और कम-से-कम 15% सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित इकाइयाँ इनके द्वारा संचालित की जा रही हैं।

शिक्षा की रूपरेखा- शिक्षा के आधार पर अन्य प्रवासियों की अपेक्षा भारतीय आप्रवासी अमेरिकी श्रम बाजार के उच्च पदों के लिए बेहतर मानव पूँजी साबित हुए हैं।

1980 की अमेरिकी जनगणना के अनुसार भारत में जन्मे 25 वर्ष अथवा उससे अधिक उम्र के आप्रवासियों में 89% कम-से-कम हाई स्कूल की शिक्षा पाए हुए थे और 66% के पास कॉलेज की डिग्री थी।

2000 की अमेरिकी जनगणना के अनुसार 87% से अधिक भारतीय हाई स्कूल की शिक्षा पूरी कर चुके थे। अमेरिकी जनसंख्या के 20% से कुछ अधिक की तुलना में 62% भारतीयों के पास कॉलेज की डिग्री थी।

इनमे से अधिकांश भारत में इंजीनियरिंग और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उच्चतर शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। इस प्रकार अमेरिका में संख्या की दृष्टि से भारतीय तीसरे स्थान पर हैं, लेकिन शिक्षा की दृष्टि से उनका पहला स्थान है। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

1999 में भारत में जन्मे अमेरिकी निवासियों की संख्या जिनके पास विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और इंजीनियरिंग की डिग्री थी, 1,65,000 थी।

यह कुल विदेशों में जन्मे निवासियों, जिनके पास विज्ञान और इंजीनियरिंग की डिग्री थी, का 13% था। यह अनुपात अमेरिका में किसी एक डायस्पोरा समूह के सबसे बड़े भाग को दर्शाता है।

विज्ञान और इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त एक उपसमूह के रूप में भारतीय पेशेवरों में 30,000 के पास विज्ञान एवं इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट की डिग्री है।

यह सभी अमेरिकी निवासियों जिनके पास विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की डिग्री है, का 16% है। इस दृष्टि से भारतीय अमेरिका में चीन डायस्पोरा के बाद दूसरे स्थान पर आते हैं।

यू.एस. इंस्टी ट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन के वार्षिक सर्वेक्षण ‘ओपेनडोर्स, 2004’ के अनुसार 2003-04 में अमेरिका के विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वालों में भारतीय छात्रों की संख्या सभी विदेशी छात्रों की संख्या का 13.9% था।

इस प्रकार भारत ने अपनी नम्बर एक की छवि को लगातर तीसरे वर्ष भी बनाए रखा। 2004-05 में भी भारत अपनी सर्वोच्च स्थिति को बनाए रखने में सफल रहा है।

आय की रूपरेखा-1980 की जनसंख्या के अनुसार 1979 में आप्रवासी कर्मकारों की वार्षिक मध्यम आय के सन्दर्भ में भारतीयों का स्थान सभी पुरुषों, पूर्णकालिक पुरुषों और पूर्णकालिक महिला कर्मचारियों से ऊपर था

1990 की जनगणना के अनुसार अमेरिका में 25 वर्ष से अधिक आयु की 58% भारतीय जनसंख्या स्नातक अथवा इससे ऊपर की डिग्री प्राप्त कर चुकी थी। MSOE 2 Free Assignment In Hindi

अमेरिका में बसे 17 लाख भारतीय डायस्पोरा में 2 लाख परिवार करोड़पति हैं। भारतीय मूल के लोगों की मध्यम वार्षिक आय 60,093 अमेरिकी डॉलर है जो अमेरिका की मध्यम आय 38,885 अमरीकी डॉलर से काफी ज्यादा है। अमेरिका में भारतीय डायस्पोरा छोटे कारोबारों में संग्लन हैं और उसे अच्छी तरह से संचालित कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर, भारतीय मूल के लोग कुल 135,000 सुविधा केन्द्रों में से लगभग 77,000 सुविध । केन्द्रों के मालिक हैं जो 3 लाख से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।

अमेरिका के कुल 47,040 होटलों में से 17,000 होटलों के मालिक भारतीय हैं जो 7 लाख से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।

अमेरिका एशियन होटल ओनर्स एसोसिएशन भारतीय होटल व्यवसाय के समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। इस एसोसिएशन के अनुसार भारतीय होटलों का अनुमानित कुल बाजार मूल्य लगभग 36 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।

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