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शिक्षा का समाजशास्त्र

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MSOE 1 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. भारत में शिक्षा के संदर्भ में सकारात्मक भेदभाव और सकारात्मक कार्रवाई के मुद्दे की आलोचनात्मक जांच कीजिए।

उत्तर-सकारात्मक भेदभाव का अर्थ है-सुविधावंचित समूहों के सदस्यों का पक्षपात पूर्ण चलन कर उन्हें सम्मानित पदों पर बिठाना। भारत की स्थिति आरंभ से ही जातिगत संरचना पर आधारित रही है।

जातिगत ढाँचे एवं वर्गभेद के कारण शिक्षा एवं सभी संसाधनों का एकसमान बंटवारा नहीं हो सका। अतः सुविधावंचित वर्गों के कल्याण की चिंता स्वाभाविक हो उठी। यह एक आधुनिक परिघटना ही नहीं है,

बल्कि प्राचीनकाल में बौद्ध धर्म, जैन, सिक्ख आदि ने भक्ति आंदोलन के रूप में जाति व्यवस्था को नकारा था।
20वीं शताब्दी में इस प्रकार भी पहल करने वालों में विद्यासागर, गांधी जी, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर आदि नेता एवं समाज सुधारक थे।

औपनिवेशिक शासन में जीवन निर्वाह की दशा को बेहतर बनाने हेतु इनके प्रयासों को अंग्रेजी सत्ता ने भी महत्त्व दिया और सभी को समानता के सिद्धांत के तहत रखा गया। 1850 में बना कास्ट डिस्एबिलिटि एक्ट इसके लिए पहला अधिनियम था। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

1885 में प्रांतीय सरकारों ने सुविधावंचितों के बच्चों को शिक्षा प्रदान की। गैर-ब्राह्मण आंदोलन के पश्चात मद्रास सरकार ने गैर-ब्राह्मण के लिए पद आरक्षित किए। मैसूर के महाराजा द्वारा 1918 में गैर-ब्राह्मण वर्गों के उत्थान के लिए समिति का गठन किया गया।

इसी प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिफोर्स 1919 में आया, जिसमें सुविधावंचितों के अभ्यावेदनों पर विचार किया गया। इस प्रकार अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण पहली बार 1943 ई. में किया गया जिसमें 8.33 प्रतिशत सीटें आरक्षित थीं। जून 1946 में इसे 12.5 प्रतिशत कर दिया गया।

भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय एवं समानता के प्रति वचनबद्धता को देखते हुए यह स्थापित किया गया कि शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का बुनियादी साधन है, अतः शिक्षा में भी आरक्षण का प्रावधान लाया गया।

1953 तथा 1978 में पिछड़े वर्गों पर भारत सरकार द्वारा आयोग गठित किया गया, जिसमें कालेलकर आयोग की सिफारिशों को मतभेद के कारण खारिज कर दिया गया जबकि मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1990 में लागू कर दिया गया जो कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को लेकर थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को शिक्षा में अधिक सीटों के आरक्षण की बात की गई तथा उन्हें सभी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों एवं उच्च शिक्षा में भी आरक्षण दिया गया।

अतः भेदभाव की सकारात्मक अथवा पक्षपात अथवा आरक्षण की नीति उच्च शिक्षण संस्थाओं में भी है जो कि समानता लाने के लिए आवश्यक कदम है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

भारत में सकारात्मक भेदभाव एवं सकारात्मक कार्रवाई की नीति का सूत्रपात-भारत में सामाजिक असमानता एवं भेदभावपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन के लिए वर्षों से प्रयास किया जाता रहा है, किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस कार्य में भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य ने नीतिगत रूप से कार्रवाई करने का प्रयास किया।

हिन्दू जाति के अंतर्गत केवल जातिगत संकीर्णता ही नहीं थी, बल्कि धार्मिक एवं सांप्रदायिक विभिन्नता भी विद्यमान थी। धर्म को आधार मानकर कर्म का निर्धारण एवं समाज का संचालन किया जाता था, जिसमें निम्न जातियों का शोषण होता था।

मध्ययुग में भक्ति आंदोलन के रूप में एक युगांतकारी आंदोलन का आविर्भाव हुआ, जिसमें भेदभाव एवं छुआछूत पर कठोर प्रहार किया गया तथा एक ईश्वर की संकल्पना के साथ रक्त के आधार पर शुद्धता-अशुद्धता को नकारा गया।

19वीं शताब्दी के अंत एवं 20वीं शताब्दी के आरंभ में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा गांधी, ज्योतिबा फूले, डॉ. अम्बेडकर आदि प्रबुद्ध समाज सुधारकों ने नीतिगत रूप से इनके उद्धार का प्रयास किया। इनके प्रयासों से ही औपनिवेशिक भारत में नागरिकों की समानता का सिद्धांत पेश किया गया।

इस प्रक्रिया में ‘कास्ट डिस्एबिलिटि एक्ट’ (1850) भारत में पहला अधिनियम था। तत्पश्चात 1885 में सुविधावंचितों के बच्चों के लिए शिक्षा का प्रावधान किया गया।

साथ ही गैर-ब्राह्मणों के आंदोलनों ने मद्रास सरकार को प्रभावित किया और सरकारी सेवाओं में गैर-ब्राह्मणों के लिए पद आरक्षित किए गए। सर लेस्ले मिल्लर की अध्यक्षता में मैसूर के महाराजा द्वारा इस गैर-ब्राह्मण उत्थान के लिए 1918 में एक समिति का गठन किया गया, जो एक क्रांतिकारी कदम था।

1919, 1935 में विभिन्न प्रांतों की विधानसभा में दलित जातियों को आरक्षण प्रदान किया गया। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कदम अनुसूचित जातियों को पहली बार 8.33 प्रतिशत आरक्षण देकर उठाया गया। यह कार्य 1943 में सरकारी सेवाओं के संदर्भ में किया गया। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

1946 में इसे बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात एवं भारतीय संविधान के कार्यान्वयन के बाद सामाजिक न्याय एवं समानता के प्रति वचनबद्धता को संवैधानिक आधार मिला।

अनुच्छेद 46 का कहना है कि “राज्य कमजोर वर्गों एवं विशेष रूप से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को विशेष सुरक्षा प्रदान करेगा और सामाजिक अन्याय एवं हर किस्म के सामाजिक शोषण से उनका बचाव करेगा।”

शिक्षा समाज को दिशा-निर्देश देने का कार्य करती है। राधाकृष्णन आयोग (1948-49) का मानना है कि “शिक्षा समाज के उद्धार का प्रमुख साधन है, जिससे लोकतांत्रिक समाज की स्थापना होती है और जिससे इसके सदस्यों में समानता की भावना कायम एवं सुरक्षित रहती है।”

शिक्षा आयोग 1964-66 का मानना है कि शिक्षा का प्रधान उद्देश्य समान अवसर प्रदान करना तथा अल्पसुविधा प्राप्त वर्गों एवं जातियों की दशा को बेहतर बनाना है।

1953 एवं 1978 में दो आयोगों का गठन किया गया, जिसमें कालेलकर एवं बी.पी. मंडल प्रमुख थे। कालेलकर की सिफारिशों को मतभेद के कारण स्वीकार नहीं किया गया, किन्तु मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1990 में लागू कर दिया गया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के द्वारा भारत सरकार के विशेष कर्त्तव्यों के जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि शैक्षिक संस्थाओं में इसमें परिवर्द्धन किया गया तथा अनुसूचित जातियों के लिए 15% तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 5% आरक्षण किया गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) ने भी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को रियायत दी जाए। 1982 में अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के प्रतिशत को 5 से 7.5 कर दिया गया। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

बाद में अनुसूचित जातियों के लिए 15% एवं जनजातियों के लिए 7.5% सीटों को आरक्षित किया गया।
भारत सरकार ने इन समूहों के उत्थान के लिए आरक्षण के अलावा भी कई कदम उठाए हैं।

छात्रवशत्ति योजना, सुधारात्मक प्रशिक्षण, शैक्षिक त्रुटियों को दूर करने की विशेष व्यवस्था आदि। एक अन्य मुद्दा भी विचारणीय है जिसमें ओ.बी.सी. को आरक्षण देना है। इसके संदर्भ में सभी राज्यों ने अपना अलग-अलग आरक्षण प्रतिशत रखा है।

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प्रश्न 2. क्या शिक्षा लोकतंत्रीय व्यवस्था को सुगम बनाती है? चर्चा कीजिए।

उत्तर-भारत में राष्ट्र निर्माण

औपनिवेशिक समाजों में राष्ट्रीय पहचान राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता जैसी संकल्पनाएं औपनिवेशिक इतिहास के इर्द-गिर्द निर्मित की जाती हैं। राज्ट्र चेतना की प्रक्रिया एवं प्रत्याशा के समावेश का इतिहास में सर्वाधिक महत्त्व है।

भारत के संदर्भ में युवा पीढ़ी को सामाजिकता का पाठ पढ़ाने में स्वतंत्रता संघर्ष का ज्ञान सर्वाधिक महत्त्व रखता है। विद्यालयों में मानसिक रूप से उन्हें पूर्व परिभाषित तरीके से तैयार किया जाता है।

कुमार ने राष्ट्रवाद की कुछ ऐसी विरोधी विचारधाराओं की जाँच की, जिनसे स्कूलों ने युवाओं को समाजिक बनाने का प्रयास किया था और ऐसा करने में उसने कुछ ऐसे तरीकों को दष्ठाया जिनमें इतिहास का प्रयोग विशिष्ट विचारधाराओं के मतारोपण के लिए किया जाता है।

अंतत: कुमार, राज्य की राष्ट्र निर्माण योजना को समझने के लिए चयन एवं प्रस्तुतिकरण को समझने के लिए प्रक्रमों पर बल देते हैं। कुमार के अनुसार इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि युवा मस्तिष्क के निर्माण के लिए वक्तव्यों की प्रस्तुति कैसे की जाती है।

भारतीय शिक्षा पद्धति राष्ट्र निर्माण के विस्तष्टत उद्देश्य में सहायक है और इसी कारण से छोटी उम्र से बच्चों का राष्ट्रीय विरासत से सामंजस्य स्थापित किया जाता है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

आरंभिक चरणों से ही शिक्षा का सुविचारित प्रयोग राष्ट्र-निर्माण के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। फलतः अतीत का ज्ञान ऐसा महत्त्वपूर्ण माध्यम है, जिससे भावी पीढ़ी की राष्ट्रीय पहचान बनाने, उनके समाजीकरण एवं संस्कृतिकरण को सुनिश्चित करता है।

इसी कारण स्कूल सैद्धांतिक भूमिका निभाते हैं। स्कूल बच्चों को प्रेरित करने के लिए राष्ट्र की पूर्व ऐतिहासिक उपलब्धियों के सरकारी ज्ञान का प्रयोग करता है, ताकि बच्चे इन्हें समझकर आज्ञाकारी नागरिकों के रूप में अपने कर्तव्यों को भली-भांति पूरा कर सकें।

युवाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से नागरिक की भूमिकाओं से रू-ब-रू कराने में इतिहास महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुमार का कथन है कि दोनों राष्ट्र अपनी राष्ट्र निर्माण योजना की वजह से बंटवारे की समान घटना को किस प्रकार अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत करते हैं।

भारतीय पाठ्यपुस्तकों में सन 1919 से सन 1947 के काल को “गांधीवादी युग” के रूप में देखती हैं, जिसका भारतीय राष्ट्रवादी संघर्ष में विशिष्ट महत्त्व है, चूंकि गांधीजी ने इस आंदोलन की प्रकृति को बदल दिया था।

अत: इस भाग में गांधीजी के व्यक्तित्व, उनकी विचारधाराओं एवं मुहिमों को उजागर किया गया है। इस प्रकार भारतीय पाठ्यपुस्तकें उनके व्यक्तित्व तथा विचारों को प्रस्तुत करती हैं।

इस प्रकार ‘राष्ट्र निर्माण’ राष्ट्रीय विकास का प्रतीक बन गया है। इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में किसी नाम या घटना का उल्लेख करना अथवा इनकी उपेक्षा करना आदि बातें इस सर्वोपरि राष्ट्रीय विचारधारा के मार्गदर्शन पर निर्भर करती हैं। कुमार के अनुसार यह ‘स्मृति की राजनीति’ को दर्शाती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष को लेकर भारत और पाकिस्तान के दृष्टिकोण के बीच का फर्क ऐसी घटनाओं के चयन से जुड़ा हुआ है, जिनका वे उल्लेख करते हैं। कुछ विशेष वृतांतों एवं घटनाओं को जहाँ एक संदर्भ में अधिक प्राथमिकता दी जाती है, वहीं दूसरे संदर्भ में उनकी अनदेखी की जाती है।

यह प्रवृत्ति, जिसे कुमार ‘उल्लेख की राजनीति’ कहते हैं, संघर्ष के पिछले सत्रह वर्षों (1930-47) के दौरान होने वाली घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में बढ़ जाती है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार पिछले दशकों में राष्ट्र निर्माण की विचारधारा भारतीय एवं पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बन गई है। यद्यपि दोनों राष्ट्रों की स्वतंत्रता की समझ एक-दूसरे से पृथक है।

कुमार इसे भारतीय संदर्भ में रखकर देखते हैं तो पता चलेगा कि भारत का विभाजन क्यों हुआ, जबकि पाकिस्तानी परिप्रेक्ष्य से इसकी अलग जानकारी प्राप्त होती है अर्थात किस प्रकार विभाजन कराया गया।

कुल मिलाकर देखा जाए तो इतिहास को सैद्धांतिक मतारोपण के साधन के रूप में देखा जाता है।
निस्संदेह, राष्ट्र राज्य द्वारा नागरिकता की प्रखर स्थिति को भी महत्त्व दिया जाता है तथा यह राष्ट्र निर्माण परियोजना के सातत्य के लिए अत्यावश्यक है।

राष्ट्र निर्माण की अवधारणा के स्थायित्व के लिए नागरिकों में देशभक्ति की भावना जाग्रत करना आवश्यक है। राष्ट्र राज्य का अस्तित्व समान नागरिकता के विचार पर अवस्थित होता है।

यह सांगीकरण, अल्पसंख्यक संस्कृति एवं उनके अधिकारों को अपने अधीन कर लेता है। देश के सम्मान तथा अखंडता के लिए अल्पसंख्यकों की संस्कृति और उनके अधिकारों की उपेक्षा की जाती है।

महाजन के अनुसार, “राष्ट्र राज्य प्रबल वर्गों की संस्कृति को अपनाता है और अल्पसंख्यक संस्कृतियों को उपेक्षित एवं दरकिनार कर देता है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

अल्पसंख्यक संस्कृति राष्ट्र के राजनीतिक रूप से सशक्त व्यक्ति जीवन पर निर्भर करती है जो कि विस्तृत रूप से एक व्यक्ति समान नागरिकता के उदारवादी आदर्श में विश्वास रखती है।

अल्पसंख्यक समुदाय उदारवादी राष्ट्र राज्यों में भी सांस्कृतिक रूप से उपेक्षित रहता है। राज्य की समांगी (homogenizing) प्रवृत्तियाँ सभी संस्कृतियों के पक्ष में नहीं होतीं तथा ये समाज के प्रभुतासंपन्न वर्गों के ही अनुकूल होती हैं।

उदाहरणस्वरूप, नौकरी प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को राष्ट्रभाषा का ज्ञान होना जरूरी है। भारत में बहुत से मामलों में समुदायों को दरकिनार किया जाता है लेकिन छोटा परंतु प्रबल अल्पसंख्यक समुदाय राष्ट्रीय संसाधनों को नियंत्रित करता है।

यह आधुनिक एवं आधुनिक बनने वाले कुलीन वर्गों की नई किस्म की अल्पसंख्यक गति है जो राष्ट्रीय जीवन पर आधिपत्य कायम करती है और जो अल्पसंख्यकों की संस्कृति को न केवल कम महत्त्व देकर बल्कि उन्हें समान अवसरों से दरकिनार करके और उपलब्ध संसाधनों तक उनकी पहुँच को कठिन बनाकर जनसंख्या के बड़े वर्ग को नुकसान पहुँचाती है।

केवल सांस्कृतिक पहचान ही नहीं है, जो इस स्थिति में संकटग्रस्त है, बल्कि इससे सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुँचाती है। राष्ट्र निर्माण योजना के दौरान ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती कि अल्पसंख्यक पहचान, राष्ट्रीय पहचान के व्याप्त विचार के विरुद्ध हो।

“राष्ट्रीय पहचान” स्वयं को बहुसंख्यकों के राजनीतिकसांस्कृतिक लोकाचार के माध्यम से अभिव्यक्त करती है और जो राष्ट्र राज्य की आधुनिकीकरण एवं विकास संबंधी बृहत विचारधारा में दबी रहती है।

प्रश्न 3. समाजीकरण और शिक्षा के प्रक्रमों के बीच के मुख्य अंतरों को उजागर कीजिए।

उत्तर-समाजीकरण क्या हैं?-उपर्युक्त कार्यों को पूरा करने के लिए शिक्षा का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाना चाहिए कि उसमें मौलिक सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व हो और शिक्षण विधि इस प्रकार की हो कि बालक सामाजिक परिस्थितियों के प्रति समंजन करने में सक्षम हो सके।

दूसरे शब्दों में, बालक का समाजीकरण करना है। शिक्षा का यह एक प्रमुख उद्देश्य है कि बालक में साथीपन की भावना का विकास हो। बालक जब जन्म लेता है तब यह पाशविक आवश्यकताओं की पूर्ति में ही लगा रहता है।

ज्यों-ज्यों वह बढ़ता है, उसमें समाज की आकांक्षाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों के अनुसार परिवर्तन आने लगते हैं। प्रौढ़ व्यक्ति समाज के आदर्शों से ही प्रेरित होते हैं। हम भाषा का व्यवहार करते हैं। समाज में भाषा का बड़ा महत्त्व है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

व्यक्तियों एवं वस्तुओं के प्रति हमारी कुछ अभिवृत्तियाँ होती हैं। बालक को इन सब सामाजिक प्रक्रियाओं को सीखना है तभी वह अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सकेगा।

ड्रेवर महोदय के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने सामाजिक वातावरण के प्रति अपना अनुकूलन करता है और इस सामाजिक वातावरण का वह मान्य, सहयोगी एवं कुशल सदस्य बन जाता है।”

मारगरेट मीड और लिण्टन जैसे मानवविज्ञानियों के अनुसार किसी समूह की संस्कृति को ग्रहण करने की प्रक्रिया को समाजीकरण । कहा जाता है। संस्कृति के अंतर्गत किसी समूह की परम्पराएँ, अभिवृत्तियाँ, ज्ञानराशि, कला एवं लोककथाएँ आदि आती हैं।

रॉस का कथन है कि समाजीकरण में व्यक्तियों में साथीपन की भावना तथा क्षमता का विकास और सामूहिक रूप से कार्य करने की इच्छा निहित है।

कुक के अनुसार समाजीकरण की प्रक्रिया का परिणाम यह होता है कि बालक सामाजिक दायित्व को स्वयमेव ग्रहण करता है और समाज के विकास में योगदान देता है।

मनोविश्लेषण के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में इदम्, अहम और परम अहम् कार्य करते हैं। उनके अनुसार परम अहम् का विकास समाज के आदर्शों की अनुभूति से होता है। समाजीकरण में यह परम अहम् बड़ा सहायक होता है।

समाजीकरण किस प्रकार होता है?-समाजीकरण सामाजिक अंत:क्रिया से होता है। इसमें बालक एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। यह सामाजिक अंत:क्रिया दो स्तरों पर होती है। प्रारम्भिक अंत:क्रिया व्यक्तियों के मध्य होती है और गौण अंत:क्रिया व्यक्ति के मध्य होती है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

सामाजिक अंत:क्रिया कई रूपों में प्रकट होती है। प्रथमतः प्रतिद्वन्द्विता का रूप है जिसमें अविभाज्य लक्ष्य को दो या दो से अधिक व्यक्ति प्राप्त करना चाहते हैं और उसके लिए संघर्ष करते हैं। दूसरा रूप सहयोग का है। इसमें सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयत्न होता है।

व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए प्रतिद्वन्द्विता एवं सामूहिक उपलब्धि के लिए सहयोग अत्यावश्यक सामाजिक अंत:क्रिया का तीसरा रूप संघर्ष है। संघर्ष में पारस्परिक विरोध होता है।

समंजन चौथा रूप है। समंजन में पारस्परिक अनुकूलन निहित है। सामाजिक अंत:क्रिया का परिणाम हम दूसरों की रुचियों के साथ तादात्म्य के रूप में देखते हैं। संकेत एवं अनुकरण भी प्रभावशाली अंत:क्रियाएँ हैं। इन अंत:क्रियाओं से बालक का समाजीकरण होता है।

समाजीकरण करने वाले तत्त्व-बालक का समाजीकरण विद्यालय, परिवार, समुदाय सभी जगह होता रहता है। इस प्रकार समाजीकरण की प्रक्रिया में कई तत्त्व कार्य करते हैं। यहाँ पर हम कुछ प्रमुख तत्त्वों पर संक्षेप मे विचार करेंगे

परिवार-परिवार समाज की आधारभूत इकाई है। बालक परिवार में जन्म लेता है और यहीं पर उसका विकास प्रारम्भ होता है। वह माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, दादा-दादी आदि के सम्पर्क में आता है। ये सभी संबंधी बालक को परिवार के आदर्शों को प्रदान कर देते हैं। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार बालक पारिवारिक प्रथाओं को जान लेता है। समाजीकरण का यह प्रारम्भिक प्रयास होता है। बालक परिवार में रहकर सहयोग, त्याग आदि सामजिक गुणों को सीखने का प्रयास करता है।

उत्सव-भारत में अनेक प्रकार के सामाजिक एवं धार्मिक उत्सव मनाये जाते हैं। होली के दिनों में लोग आपसी द्वेष भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। दशहरे के समय लोग राम-रावण के युद्ध को देखने के लिए हजारों की संख्या में एक स्थान पर एकत्र होते हैं।

दीवाली के समय गणेश-लक्ष्मी का पूजन करके अपने घर को लोग प्रकाशित करते हैं। 15 अगस्त एवं 26 जनवरी तथा 2 अक्टूबर को सभाओं का आयोजन, चर्खा तथा तकली प्रतियोगिता तथा भजन-कीर्तन का आयोजन करके लोग खुशी मानते हैं।

बालक इन सब उत्सवों में भाग लेकर सहयोग, प्रतिद्वन्द्विता आदि गुण सीखता है। वह सामूहिक रूप से खुशी मनाना सीखता है।

विद्यालय-समाजीकरण करने में विद्यालय बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है। विद्यालय इस प्रक्रिया का औपचारिक अभिकरण है। अतः विद्यालय इस स्थिति में होता है कि वह बालकों को सामाजिक संस्कृति से परिचय कराये और सामाजिक प्रथाओं का मूल्यांकन करके नये समाज की रचना की प्रेरणा दे। विद्यालय भी एक प्रकार का समाज ही है।

यहाँ पर छात्रों के बीच में, छात्रों एवं अध्यापकों के बीच में, अध्यापकों के ही बीच में, छात्रों एवं प्रधानाचार्य के मध्य तथा शिक्षकों एवं प्रधानाचार्य के मध्य सामाजिक अंत:क्रिया होती रहती है। बालक का समाजीकरण करने में विद्यालय में निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान दिया जा सकता है

विद्यालय में सामूहिक कार्यों की व्यवस्था करना; नाटक, वाद-विवाद, सामूहिक शिक्षक आदि का आयोजन करना। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

सामूहिक अंत:क्रिया के अन्य विभिन्न अवसर प्रदान करना; यथा-विद्यालय एवं समाज के

सामाजिक कौशलों एवं सामाजिक अनुभवों की शिक्षा प्रदान करना। पत्र-लेखन, सहभोज, टेलीफोन का प्रयोग आदि ऐसे ही कौशल हैं।

सामाजिक अनुशासन की भावना पैदा करना। नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों के द्वारा सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था करना।

दण्ड एवं पुरस्कार के रूप में सामाजिक सम्मान एवं तिरस्कार की स्वस्थ भावना उत्पन्न करना।

छात्रों को उनकी योग्यताओं के अनुरूप महत्त्वाकांक्षी बनाना जिससे वे अच्छे पिता, अच्छे व्यवसायी या अधिकारी बनने का प्रयत्न करें।

खेल-खेलकूद भी बालक का समाजीकरण करते हैं। खेल में सामाजिक अंत:क्रिया का स्वाभाविक प्रदर्शन होता है। स्वस्थ संघर्ष एवं स्वस्थ प्रतियोगिता का यही दर्शन होता है। हार-जीत के आधार पर मनोविकार न उत्पन्न हो, यह भावना खेल ही प्रदान करता है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

सहयोग की भावना का भी स्वाभाविक विकास होता है। खेल में भाग लेने वालों में जाति एवं सम्प्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होता। खिलाड़ियों में अन्य भेदभाव भी नहीं होते।

स्काउटिंग तथा गर्लगाइडिंग-बालक का समाजीकरण करने में स्काउटिंग एवं बालिका का समाजीकरण करने में गर्लनाइडिंग का विशेष महत्त्व है।

स्काउटिंग जाति, सम्प्रदाय और यहाँ तक कि संकुचित राष्ट्रीयता को भी समाप्त करती है। स्काउटिंग बालकों को सामूहिक कार्य करने के अनेक अवसर प्रदान करती है।

अपने साथी को खोजने एवं दुश्मन का पता लगाने के खेल खिलाकर स्काउटिंग अनेक प्रकार की सामाजिक अंत:क्रियाओं से बालकों को परिचित कराती है।

बाल-गोष्ठियाँ-बालक अपने साथियों के साथ रहना एवं खेलना पसंद करते हैं। वे अपना एक समूह बना लेते हैं। यह समूह कभी-कभी गुप्त रूप से कार्य करता है।

इन बाल-समूहों के नियम अलिखित किन्तु दृढ़ होते हैं। जब कभी इनका कोई नया सदस्य बनता है तो अन्य पुराने सदस्य उस नये सदस्य को अपने साथियों की बातों से परिचित करा देते हैं।

बालक इन समूहों के प्रति बड़े वफादार रहते हैं। कभी-कभी इनके अपने कोड-शब्द होते हैं, जिनका प्रयोग करके ये अन्य बालकों का उपहास करते हैं।MSOE 1 Free Assignment In Hindi

इन गोष्ठियों में बालक सहयोग स्वामिभक्ति नियम-पालन आदि गुणों को सीखता है। इस प्रकार बाल-गोष्ठियाँ बालक का समाजीकरण करने में बड़ी सहायता करती हैं।

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भाग – ॥

प्रश्न 6. बहुसांस्कृतिक शिक्षा क्या है? समकालीन समाज में इसकी प्रासंगिकता की चर्चा कीजिए

उत्तर-बहुसंस्कृतिवाद आज के बदलते संसार में एक सामाजिक वास्तविकता के रूप में उभरा है। शिक्षाशास्त्रियों ने समाजों की शैक्षिक आवश्यकता के कारण शिक्षा में ‘बहुसंस्कृतिवाद’ नामक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य विकसित किया। आत्मसातीकरण प्रक्रिया, विलीनीकरण अवस्था, सांस्कृतिक विकल्प की विचारधारा, सांस्कृतिक अनेकवाद आदि बहुसंस्कृतिवाद हेतु अनिवार्य उपागम हैं।

बहुसंस्कृतिकवाद भूमंडलीकरण के दौर की एक खास विशेषता है जिसने विश्व ग्राम की संकल्पना को साकार किया है। इस संकल्पना के तहत शिक्षा व्यवस्था को भी प्रसार का पूर्ण अवसर मिला।

विविध सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अवस्थाओं का एक मंच पर उपस्थित होना शिक्षा जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन था अतः उपेक्षितों को अपने ही देश में वैश्विक स्तर की शिक्षा एवं संस्कृति मिल रही थी, जो उनकी पहुँच एवं प्रतिदर्श वृद्धि कर रही थी।

संस्कृति, समाज और बहुसंस्कृतिवाद संस्कृति और समाज क्या है?-संस्कृतियाँ एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं होती लेकिन एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।MSOE 1 Free Assignment In Hindi

संस्कृति का मतलब रीति-रिवाज, परंपराएं, कला, व्यवहार संगीत आदि है। इन्हें समाज में विरासत के रूप में प्राप्त करते हैं और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। इन संस्कृतियों में भी अनेक प्रकार की संस्कृति होती है। इनमें अनेक परिवर्तन आते रहते हैं।

प्रजातीय, जातीय, नृजातीय, भाषायी, वर्गीय, व्यावसायिक, लैंगिक एवं धार्मिक ये समाजों की उपसंस्कृतियाँ हैं जो समाज में सांस्कृतिक व्यवहार से परस्पर भिन्न होती हैं।

अतः संस्कृति जहां अपरिवर्तनीय एवं मानवीय विकास में स्थायी होती हैं, वहीं समाज परिवर्तनीय होता है। संस्कृति समाज की पहचान होती है।

बहुसांस्कृतिक समाज-बहुसांस्कृतिक समाज का आधार एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति सम्मान और सहनशीलता का भाव है। | बहुसांस्कृतिक समाजों में कुछ ऐसे जनसमूह आते हैं जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से समाजों में अपनी पहचान एवं समान अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं।

बहुसांस्कृतिक समाज सांस्कृतिक अधिकारों के लिए सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से नृजातीय एवं धार्मिक समूहों को अवसर प्रदान करते हैं।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक भिन्नताएँ बहुसांस्कृतिवाद शिक्षा में शिक्षार्थी व्यवहार, जीवनशैली, पहचान, विचार और सोच संबंधी एक ही संस्कृति से संबंध रखता है। कोई भी संस्कृति एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं होती। संस्कृति के सदस्य भी संस्कृति के अनेक तत्त्वों में सहभागी होते हैं।

संस्कृतिकरण और समाजीकरण सीखा और एक-दूसरे को बाँटा जाता है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा में कुछ विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति का लक्ष्य रखा जाता है जिनके अंतर्गत सांस्कृतिक समृद्धि एवं निकृस्तता से परे व्यक्ति सभी संस्कृतियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

सांस्कृतिक रूप से स्वयं का अभिजात्य समझने के कारण ही अनेक नृजातीय संस्कृति वाली जनजाति उपेक्षित रही जाती है कई बार संस्कृतियों में समानता के रूप भी परिवर्तन होते हैं।

सांस्कृतिक समन्वय से व्यक्ति कई प्रकार के व्यवहारों का अर्जन करता है तथा यह सार्वभौमयवाद की दिशा में अग्रसर होता है।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा के आयाम अनेक प्रकार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए छात्रों को विद्यालय में प्रवेश सुनिश्चित एवं आवश्यक समझा जाता है। इससे बहुसांस्कृतिक शिक्षा को समझने में आसानी होगी। सांस्कृतिक भिन्नताएँ बहुसांस्कृतिक शिक्षा में बहुमूल्य संसाधन होती हैं।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा का एक अन्य पहलू लोकतांत्रिक मूल्य है। लोकतांत्रिक मूल्यों एवं धारणाओं पर बहुसांस्कृतिक शिक्षा का अध्यापन एवं अध्ययन आधारित होता है।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा द्वारा समुचित ज्ञान और कौशल मिलता है। इसके कारण नस्लीय भेदभाव और अन्य प्रकार के भेदभावों से संघर्ष करने का ज्ञान मिलता है। लोकतंत्र में बहुसांस्कृतिक समाज को सदा ही बहुत महत्त्व दिया गया है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा क्यों आवश्यक है?

बहुसांस्कृतिक शिक्षा भूमंडलीय संसार में एक आवश्यकता बन गई है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है

समस्त छात्र समुदाय के लिए शिक्षा में समानता का अधिकार समान शिक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। शिक्षा व्यवस्था में छात्र ऐसी शिक्षा प्राप्त कर सकें जो एक दूसरे से भिन्न न हो।

सांस्कृतिक व्यवहारों के लिहाज से अनेकवादी समाजों में भिन्न-भिन्न कठिनाई होती है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा समाजीकरण प्रतिमानों, खानपान की आदतों, व्यवहार, वेशभूषा, मानदण्डों आदि इन आवश्यकताओं के प्रति बहुत ही संवेदनशील होती है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा इन अनेकताओं को पहचान कर इनके बीच संतुलन ला देती है।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा प्रदूषण, गरीबी, जनसंख्या का बढ़ना, परमाणु शस्त्र, भुखमरी, एड्स एवं अनेक प्रकार की बीमारियाँ आदि को समझने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा मानवाधिकारों, सामाजिक न्याय एवं वैकल्पिक जीवन चयनाधिकारों, सम्मान आदि के प्रति उसकी वचनबद्धता को समझने के लिए स्थान एवं मंच प्रदान करती है। बहुसंस्कृतिवाद हेतु उपागम :

आत्मसातीकरण-बहुसांस्कृतिक समाज की उपसंस्कृतियों के समेकन की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया आत्मसातिकरण अर्थात स्वांगीकरण है। आंग्ल-अनुरूपता और घरिया या कुढ़ालीपन अमेरिका के संदर्भ में इन दो पहलुओं का प्रायः उल्लेख किया जाता है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

आंगल अनुरूपता सिद्धांत पैतृक संस्कृति के पूरी तरह परित्याग की अपेक्षा रखता था। मेजबान समाज या प्रभावी संस्कृति में घुलमिल जाए और अपनी परंपराए छोड़ दे। यह अपेक्षा नृजातीय अल्पसंख्यक वर्ग से की जाती है। इसी को कुढ़ालीपन या घरि या कहते हैं।

सांस्कृतिक अनेकवाद-अमेरिका के संदर्भ में ही एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य सांस्कृतिक अनेकवाद या अनेकवाद है। सांस्कृतिक अनेकवाद का तात्पर्य यह है नृजातीय सांस्कृतिक परंपरा एवं समूह का अस्तित्व कायम रख सके और उसी समय अमेरिका के आम नागरिक पर उत्तरदायित्व निभाने में हस्तक्षेप न हो सके।

स्वैच्छिक सांस्कृतिक विकल्प संबंधी विचारधारा-सांस्कृतिक अनेकवाद ने व्यक्ति को नृजाति से संबद्ध एक संकीर्ण पहचान की नजर से देखा है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा : उद्देश्य और कार्यनीतियाँ

शिक्षक शिक्षार्थियों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी ले। यह बहुसांस्कृतिक परिवेश में बहुत आवश्यक है। सांस्कृतिक भिन्नताओं का शैक्षिक प्रक्रियाओं में सकारात्मक रूप से लाभ उठा सके।

विविध संसाधनों के रूप में बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक भिन्नताओं को मान्यता दी जाती है।

(i) पाठ्यपुस्तक में बहुसांस्कृतिक विज़यवस्तु हेतु सुग्राह्यता एवं विवेचनात्मकता-बहुसंस्कृतिवाद के प्रति संवेदनशील हो, यह अपेक्षा पाठ्यपुस्तक लेखकों और अध्यापकों दोनों से की जाती है।

चित्र निरूपण एवं दृष्टांत में किसी समूह की अदृश्यता को बहुसंख्यक प्रधान समाज में राष्ट्रीय अभिव्यक्ति के रूप में लिया जाता है। शिक्षार्थियों को पूर्वाग्रह ऐतिहासिक, समकालीन एवं घटनाओं की जटिलता का अहसास करने से रोकते हैं। चाहे “पुरुष हो या स्त्री”।

पाठ्यपुस्तक सामाजिक सच्चाई को प्रस्तुत करती है। सामाजिक आंदोलनों, असंतोष, यौन-शिक्षा, तलाक आदि विवादास्पद मुद्दों की चर्चा से बचा जाता है। जीवन संबंधी इन पहलुओं को पाठ्यचर्या में किंचित ही समेकित किया गया है। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

(ii) बहुसांस्कृतिक पाठ्यक्रम का विकास

(क) उपलब्धि-पाठ्यक्रम में पर्याप्त रूप से संगीत, कला, खेल, शिक्षा, राजनीति आदि के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की उपसंस्कृतियों की उपलब्धियों को प्रस्तुत किया जाए।

(ख) छात्रों की आवाज-बहुसांस्कृतिक शिक्षा के अनिवार्य अंग छात्र-जीवन के अनुभवों से लिए गए उदाहरण हैं। यहाँ छात्रों से अध्यापक नियमित रूप से बातचीत करते हैं।

(ग) संप्रेषण-अध्यापक और विद्यार्थी के बीच सांस्कृतिक भिन्नताओं की समस्या होती है। इस समस्या से बचने के लिए अध्यापकों को अन्त:क्रिया द्वारा छात्रों की दशाओं एवं आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

(घ)अध्यापन एवं अध्ययन शैली-समाजीकरण अध्यापन एवं अध्ययन शैलियों के अंतर्गत व्यक्तिगत भिन्नताओं को मन से दूर करने । के लिए एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ङ) औपचारिक पाठ्यक्रम-बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक विविधता में शिक्षक सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को सकारात्मक रूप से समेकित करने की कोशिश करते हैं। समकालीन सांस्कृतिक बहुसांस्कृतिक इतिहास की सुसंपन्नता एवं सभी संस्कृतियों के योगदान से निर्मित है।

समकालीन सांस्कृतिक रूप से छात्र के परिचय को बढ़ावा मिला है। छात्र और पाठ्यचर्या में बहुसांस्कृतिक शिक्षा में समसामयिक एवं ऐतिहासिक मुद्दों का आलोचनात्मक अध्ययन करता है। पाठ्यक्रम में संस्कृतियों की भिन्नताओं को दूर करने के लिए सकारात्मक भूमिकाओं में प्रस्तुत करना महत्त्वपूर्ण है।

(च) प्रच्छन्न पाठ्यक्रम-प्रच्छन्न पाठ्यक्रम को बहुसांस्कृतिक शिक्षा में औपचारिक रूप से नहीं पढ़ाया जाता। प्रच्छन्न का अर्थ गुप्त पाठ्यक्रम है। औपचारिक पाठ्यक्रम में मूल्यों एवं मानदंडों के कुछ हिस्से छिपे रहते हैं।

बहुसांस्कृतिक शिक्षा छात्रों की जिज्ञासा को बढ़ावा देती है। अध्यापक अध्ययन में बाधा उत्पन्न न करे, इस बात को जानने के लिए छात्रों और शिक्षक की अंत:क्रियाओं का मूल्यांकन करती

(छ) आलोचनात्मक चिंतन-लोकतांत्रिक समाज में छात्रों को आलोचनात्मक तरीके से सोचने की शिक्षा देना अनिवार्य है। जाति, वर्ग, प्रजाति, लिंग, नृजाति, आयु आदि बहुसांस्कृतिक शिक्षा सामाजिक-सांस्कृतिक सच्चाई से संबंधित हैं। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

(ज) अनुभव सच्चाइयाँ-समुदायों, उनके सांस्कृतिक मूल्यों एवं पहचानों को बहुसांस्कृतिक शिक्षा में शिक्षक के लिए अनुभव लेना आवश्यक है ताकि शिक्षक छात्रों के लिए निर्देशानुसार पाठ्यक्रम तैयार कर सकें। अध्यापक समाज की भावनाओं को समझकर समाज की सच्चाइयों को छात्रों को बताए।

(झ) समुदाय संसाधन-लघुकथाएं, कविताएं, प्रयुक्त प्रौद्योगिकी, वक्तागण, नेतागण आदि समुदायों के संसाधनों को कक्षा में शामिल किया जाए। ज्ञान अध्ययन एवं अध्ययन उद्देश्यों की संवेदनशीलता को व्यापक रूप से प्रयोग किया जाए। समुदाय ज्ञान का भंडार होता है।

प्रश्न 9. भारत में शैक्षिक सुधारों हेतु नीति ढाँचे की आलोचनात्मक जांच कीजिए।

उत्तर-शिक्षा नीतियाँ-26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया है। संविधान लागू होने के पश्चात अधिकारी रूप से देश में शिक्षा संरचना विस्तृत विचार किया जाने लगा तथा विभिन्न आयोगों, समितियों के माध्यम से नीति निर्माण द्वारा शिक्षा के विकास में सहायता ली जाने लगी।

शिक्षा संबंधी नीतियाँ संविधान में बनाई गईं। ये नीतियाँ शिक्षा संबंधी विषयों पर समाज और सरकार का दृष्टिकोण व्यक्त करती हैं।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, 1956-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना उच्च शिक्षा कार्यकलाप से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों को विनियमित करने के लिए की गई। MSOE 1 Free Assignment In Hindi

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1987-अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् की स्थापना तकनीकी शिक्षा प्रणाली के समुचित नियोजन एवं विकास के लिए की गई।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1993-राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की स्थापना का उद्देश्य शिक्षक-शिक्षा प्रणाली में मानदण्डों एवं मानकों को समुचित रूप से विनियमित करना था।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान परिषद् अधिनियम, 2004-अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थानों को विनियमित करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया।

प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम, 1957-साहित्य, कला एवं वास्तुकला के विभिन्न पहलुओं के संबंध में यह अधिनियम बनाया गया। शिक्षु अधिनियम, 1961-शिक्षुओं एवं उनके प्रशिक्षण के संबंध में यह अधिनियम बनाया गया।

अक्षम व्यक्ति अधिनियम, 1995-राष्ट्र निर्माण में अक्षम व्यक्तियों की पूर्ण भागीदारी के लिए यह अधिनियम बनाया गया। शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय नीतियाँ-स्वतंत्रता के बाद 1968 और 1986 में बनने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति का संबंध मुख्य रूप से व्यापक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968-इस नीति में स्पष्ट है कि 6-14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा देना चाहिए। 10+2+3 देश के सभी विद्यालयों में शिक्षा ढांचा संबंधी नीति थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986-इस नीति में उल्लिखित है कि देश के सभी क्षेत्रों में एक किलोमीटर के दायरे में विद्यालयों की स्थापना की जाए। आर्थिक एवं तकनीकी विकास के लिए शिक्षा को ही महत्त्वपूर्ण समझा गया।

कार्य योजना (POA), 1992-सभी राज्यों एवं संघशासित प्रदेशों को 31 दिसम्बर, 1993 में अपनी-अपनी राज्य कार्य योजना का प्रारूप तैयार करने हेतु परिपत्र भेजा गया।

शिक्षा का सार-तत्त्व एवं भूमिका-राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में सभी के लिए भौतिक एवं आत्मिक शिक्षा को अनिवार्य माना गया है। राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली-राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार विद्यार्थी को जाति, पंथ, स्थान अथवा लिंग पर मतभेद किए बिना शिक्षा प्रदान करना है।

समानता हेतु शिक्षा-राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के द्वारा महिलाओं, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को समान शिक्षा प्रदान करने के प्रयास किए जाएंगे। शारीरिक रूप से अक्षम लोग तथा अल्पसंख्यकों को समान शिक्षा प्रदान की जाएगी।

शिक्षा संबंधी संवैधानिक प्रावधानों को नीतियों के आधार पर प्रसारित कर शिक्षा का विकास किया जाता है। भारत में स्वतंत्रता के पश्चात दो व्यापक शिक्षा नीतियों को विशेष महत्त्व प्राप्त है-1968 तथा 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति।

इसके अतिरिक्त 1964-66 के आयोग भी महत्त्वपर्ण था जिसकी सिफारिशों पर केन्द्र सरकार ने ध्यान दिया। कछ नीतियों की चर्चा इस प्रकार है MSOE 1 Free Assignment In Hindi

(i) राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 (NPE, 1968)-शिक्षा से जुड़े अनेक पहलुओं पर कई नीतियाँ बनाई गईं। एक नीति में तो अनुच्छेद 45 को कड़ाई से लागू करने का प्रयास किया गया, जिसमें 6-14 वर्ष तक के आयु के बच्चों को नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा देना शामिल था।

इसके अतिरिक्त कई नीतियाँ बनाई गईं, जिनमें 1968 की शिक्षा नीति महत्त्वपूर्ण थी। इसके पश्चात 1986 की शिक्षा नीति आई जो 1968 की नीति का परिवर्द्धित रूप है, अत: उसकी चर्चा अपेक्षित है।

(ii) राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986-राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में विस्तार से शिक्षा की सुलभता एवं विकास संबंधी चर्चा की गई है। इस नीति को लागू करने के लिए एक कार्ययोजना तैयार की गई, जिसमें उसकी क्रियान्वयन संबंधी योजनाओं का भी उल्लेख है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताएं निम्नलिखित हैं

(क) राष्ट्रीय शिक्षा नीति सभी के लिए शिक्षा को अनिवार्य मानती है। चूँकि शिक्षा से ही भौतिक एवं आत्मिक विकास संभव है। शिक्षा ही हमारे संविधान में वर्णित समाजवाद, धर्म-निरपेक्षता एवं समानता संबंधित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु महत्त्वपूर्ण साधन है, अतः शिक्षा का व्यापक विस्तार होना चाहिए।

(ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की बात कही गई, जो सभी विद्यार्थियों को जाति, वंश, पंथ, स्थान, लिंग का भेदभाव करे बिना समान रूप से गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करेगी तथा संबद्ध योजनाएं चलाएगी।

(ग) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वंचित समूहों की आवश्यकताओं पर ध्यान देते हुए उन्हें अवसर प्रदान करने की चर्चा की गई है तथा शिक्षा सुविधाओं से वंचित लोगों को आगे बढ़ाने के लिए कई कार्य किए जाएंगे।

(घ) विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन किया जाएगा जिससे शिक्षा के विकास को पर्याप्त बल मिलेगा। इसके लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था संरक्षण एवं शिक्षा, प्रारंभिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा, एवं संकल्प, माध्यमिक शिक्षा गति-नियामक, व्यावसायिक शिक्षा, उच्चतर शिक्षा, मुक्त विश्वविद्यालय, ग्रामीण विश्वविद्यालयों आदि की स्थापना की जाएगी।

(ङ) तकनीकी एवं प्रबंधन शिक्षा के लिए बेहतरीन सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

साथ ही शिक्षा की विषयवस्तु एवं प्रक्रिया को नई दिशा देने का कार्य किया जाएगा। इस संदर्भ में सांस्कृतिक पहलू, मूल्य शिक्षा, मूल्यांकन प्रक्रिया तथा परीक्षा सुधार आदि कई मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षा के संबद्ध में क्रांतिदर्शी सूझ का परिचय दिया है।

स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान

नई शिक्षा नीति में 5 + 3 + 3 + 4 डिजाइन वाले शैक्षणिक संरचना का प्रस्ताव किया गया है जो 3 से 18 वर्ष की आयु वाले बच्चों को शामिल करता है।

पाँच वर्ष की फाउंडेशनल स्टेज (Foundational Stage) – 3 साल का प्री-प्राइमरी स्कूल और ग्रेड 1, 2
तीन वर्ष का प्रीपेट्रेरी स्टेज (Prepatratory Stage)
तीन वर्ष का मध्य (या उच्च प्राथमिक) चरण – ग्रेड 6, 7, 8 और
4 वर्ष का उच्च (या माध्यमिक) चरण – ग्रेड 9. 10. 11. 12

NEP 2020 के तहत HHRO द्वारा ‘बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ (National Mission on Foundational Literacy and Numeracy) की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है। इसके द्वारा वर्ष 2025 तक कक्षा-3 स्तर तक के बच्चों के लिए आधारभूत कौशल सुनिश्चित किया जाएगा।

भाषायी विविधता का संरक्षण

NEP – (2020) में कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृभाषा/स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को अध्ययन के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है। साथ ही इस नीति में मातृभाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिये प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है।

स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिये संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा परंतु किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी।

शारीरिक शिक्षा विद्यालयों में सभी स्तरों पर छात्रों को बागवानी, नियमित रूप से खेल-कूद, योग, नृत्य, मार्शल आर्ट को स्थानीय उपलब्धता के अनुसार प्रदान करने की कोशिश की जाएगी ताकि बच्चे शारीरिक गतिविधियों एवं व्यायाम वगैरह में भाग ले सकें।

पाठ्यक्रम और मूल्यांकन संबंधी सुधार इस नीति में प्रस्तावित सुधारों के अनुसार, कला और विज्ञान, व्यावसायिक तथा शैक्षणिक विषयों एवं पाठ्यक्रम व पाठ्येतर गतिविधियों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होगा। __

कक्षा-6 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को शामिल कर दिया जाएगा और इसमें इंटर्नशिप (Internship) की व्यवस्था भी की जाएगी।

‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (National Council of Educational Research and Training-NCERT) द्वार ‘स्कूली शिक्षा के लिये राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा’ (National Curricular Framework for School Education) तैयार की जाएगी।

छात्रों के समग्र विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कक्षा-10 और कक्षा-12 की परीक्षाओं में बदलाव किया जाएगा। इसमें भविष्य में समेस्टर या बहुविकल्पीय प्रश्न आदि जैसे सुधारों को शामिल किया जा सकता है।

छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिये मानक-निर्धारक निकाय के रूप में ‘परख’ (PARAKH) नामक एक नए ‘राष्ट्रीय आकलन केंद्र’ (National Assessment Centre) की स्थापना की जाएगी।

छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन तथा छात्रों को अपने भविष्य से जुड़े निर्णय लेने में सहायता प्रदान करने के लिये ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence-AI) आधारित सॉफ्टवेयर का प्रयोग।

शिक्षण व्यवस्था से संबंधित सुधार शिक्षकों की नियुक्ति में प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन तथा समय-समय पर किये गए कार्य-प्रदर्शन आकलन के आधार पर पदोन्नति।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा वर्ष 2022 तक ‘शिक्षकों के लिये राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ (National Professional Standard for Teachers-NPST) का विकास किया जाएगा।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा NCERT के परामर्श के आधार पर ‘अध्यापक शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ (National Curriculum Framework for Teacher Education &NCFTE) का विकास किया जाएगा।

वर्ष 2030 तक अध्यापन के लिये न्यूनतम डिग्री योग्यता 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. डिग्री का होना अनिवार्य किया जाएगा। उच्च शिक्षा से संबंधित प्रावधान NEP-2020 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘सकल नामांकन अनुपात’ (Gross Enrolment Ratio) को 26.3% (वर्ष 2018) से बढ़ाकर 50% तक करने का लक्ष्य रखा गया है, इसके साथ ही देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में 3.5 करोड़ नई सीटों को जोड़ा जाएगा।

NEP-2020 के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में मल्टीपल एंट्री एंड एक्जिट व्यवस्था को अपनाया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा (1 वर्ष के बाद प्रमाण-पत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री तथा 4 वर्षों के बाद शोध के साथ स्नातक)।

विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिये एक ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ (Academic Bank of Credit) दिया जाएगा, ताकि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके।

नई शिक्षा नीति के तहत एम.फिल. (M-Phil) कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया। । भारतीय उच्च शिक्षा आयोग

नई शिक्षा नीति (NEP) में देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये एक एकल नियामक अर्थात् भारतीय उच्च शिक्षा परिषद (Higher Education Commision of India-HECI) की परिकल्पना की गई है जिसमें विभिन्न भूमिकाओं को पूरा करने हेतु कई कार्यक्षेत्र होंगे।

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक एकल निकाय (Single Umbrella Body) के रूप में कार्य करेगा।

HECI के कार्यों के प्रभावी निष्पादन हेतु चार निकाय

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद (National Higher Education Regulatroy Council – NHERC)-यह । शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक नियामक का कार्य करेगा।

सामान्य शिक्षा परिषद (General Education Council -GEC)-यह उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिये अपेक्षित सीखने के परिणामों का ढाँचा तैयार करेगा अर्थात् उनके मानक निर्धारण का कार्य करेगा।

राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council- NAC)-यह संस्थानों के प्रत्यायन का कार्य करेगा जो मुख्य रूप से बुनियादी मानदंडों, सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण, सुशासन और परिणामों पर आधारित होगा।

उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (Higher Education Grants Council-HGFC)-यह निकाय कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों । के लिये वित्तपोषण का कार्य करेगा।

नोट – गौरतलब है कि वर्तमान में उच्च शिक्षा निकायों का विनियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसे निकायों के माध्यम से किया जाता है।

देश में आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) के समकक्ष वैश्विक मानकों के ‘बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय’ (Multidisciplinary Education and Reserach Universities-MERU) की स्थापना की जाएगी। विकलांग बच्चों हेतु प्रावधान

इस नई नीति में विकलांग बच्चों के लिये क्रास विकलांगता प्रशिक्षण, संसाधन केंद्र, आवास, सहायक उपकरण, उपर्युक्त प्रौद्योगिकी आधारित उपकरण, शिक्षकों का पूर्ण समर्थन एवं प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा तक नियमित रूप से स्कूली शिक्षा प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करना आदि प्रक्रियाओं को सक्षम बनाया जाएगा।

एक स्वायत्त निकाय के रूप में “राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच” (National Educational Technol Foruem) का गठन किया जाएगा जिसके द्वारा शिक्षण, मूल्यांकन योजना एवं प्रशासन में अभिवृद्धि हेतु विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकेगा।

डिजिटल शिक्षा संसाधनों को विकसित करने के लिये अलग प्रौद्योगिकी इकाई का विकास किया जाएगा जो डिजिटल बुनियादी ढाँचे, । सामग्री और क्षमता निर्माण हेत समन्वयन का कार्य करेगी।

पारंपरिक ज्ञान-संबंधी प्रावधान : भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ, जिनमें जनजातीय एवं स्वदेशी ज्ञान शामिल होंगे को पाठ्यक्रम में सटीक एवं वैज्ञानिक तरीके से शामिल । किया जाएगा।

विशेष बिंदु :

आकांक्षी जिले (Aspirational districts) जैसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में आर्थिक, सामाजिक या जातिगत बाधाओं का सामना करने वाले छात्र पाए जाते हैं, उन्हें ‘विशेष शैक्षिक क्षेत्र’ (Special Educational Zones) के रूप में नामित किया जाएगा।

देश में क्षमता निर्माण हेतु केंद्र सभी लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को समान गुणवत्ता प्रदान करने की दिशा में एक ‘जेंडर इंक्लूजन फंड’ (Gender Inclusion Fund) की स्थापना करेगा।

गौरतलब है कि 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा हेतु एक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या और शैक्षणिक ढाँचे का निर्माण एनसीआरटीई द्वारा किया जाएगा।

वित्तीय सहायता : एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों से संबंधित मेधावी छात्रों को प्रोत्साहन के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

पूर्ववर्ती शिक्षा नीति में परिवर्तन की आवश्यकता क्यों? बदलते वैश्विक परिदृश्य में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये मौजूदा शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता थी।

शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने, नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये नई शिक्षा नीति की आवश्यकता थी।

भारतीय शिक्षण व्यवस्था की वैश्विक स्तर पर पहुँच सुनिश्चित करने के लिये शिक्षा के वैश्विक मानकों को अपनाने के लिये शिक्षा नीति में परिवर्तन की आवश्यकता थी।

ई शिक्षा नीति से संबंधित चुनौतियाँ : राज्यों का सहयोग-शिक्षा एक समवर्ती विषय होने के कारण अधिकांश राज्यों के अपने स्कूल बोर्ड हैं इसलिये इस फैसले के वास्तविक कार्यान्वयन हेतु राज्य सरकारों को सामने आना होगा।

साथ ही शीर्ष नियंत्रण संगठन के तौर पर एक राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद को लाने संबंधी विचार का राज्यों द्वारा विरोध हो सकता है।

महँगी शिक्षा-नई शिक्षा नीति में विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया गया है। विभिन्न शिक्षाविदों का मानना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश से भारतीय शिक्षण व्यवस्था के महँगी होने की आशंका है।

इसके फलस्वरूप निम्न वर्ग के छात्रों के लिये उच्च शिक्षा प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

शिक्षा का संस्कृतिकरण – दक्षिण भारतीय राज्यों का यह आरोप है कि ‘त्रि-भाषा’ सूत्र से सरकार शिक्षा का संस्कृतिकरण करने का प्रयास कर रही है।

फंडिंग संबंधी जाँच का अपर्याप्त होना-कुछ राज्यों में अभी भी शुल्क संबंधी विनियमन मौजूद है, लेकिन ये नियामक प्रक्रियाएँ असीमित दान के रूप में मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं।

वित्तपोषण – वित्तपोषण का सुनिश्चित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय के रूप में जीडीपी के प्रस्तावित 6%खर्च करने की इच्छाशक्ति कितनी सशक्त है।

मानव संसाधन का अभाव – वर्तमान में प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में कुशल शिक्षकों का अभाव है, ऐसे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत प्रारंभिक शिक्षा हेतु की गई व्यवस्था के क्रियान्वयन में व्यावहारिक समस्याएँ भी हैं।

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