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MSO 04 Free Assignment In Hindi

MSO 04 Free Assignment In Hindi jan 2022

भाग -1

प्रश्न 2. भारत में समाजशास्त्र की प्रारंभता का वर्णन एक विषय-क्षेत्र के रूप में कीजिए।

उत्तर-भारतीय समाजशास्त्र का ऐतिहासिक आधार पश्चिमी दर्शन और वैज्ञानिक परम्पराओं के आपसी टकराव के परिणामस्वरूप उभरने वाली परिस्थितियाँ हैं। इसके साथ ही भारत की अनेक आंतरिक प्रक्रिया, जैसे ब्रिटिश उपनिवेशवाद तथा स्वतंत्र गणतंत्र की स्थिति भी सम्मिलित हैं।

भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति में उपनिवेशवाद के परिणामस्वरूप होने वाले पश्चिमीकरण एवं आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि अन्य देशों की भाँति भारत में कुछ ऐसे विचारक हुए हैं, जिनकी कृतियों में हमें प्राचीन सामाजिक व्यवस्था की झलक मिलती है।

कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ मनु की ‘मनुस्मृति’ आदि प्राचीन ग्रन्थों में प्राचीन भारतीय समाज के विषय में काफी जानकारी मिलती है, लेकिन इन कृतियों का स्वरूप समाजशास्त्रीय नहीं था।

यूरोपीय शासकों एवं व्यापारियों ने अपने देश के मानवशास्त्रियों, प्रशासकों, इतिहासकारों एवं इसाई धर्म प्रचारकों को ग्रामीण समुदाय, संयुक्त परिवार, धर्म साहित्य एवं संस्कृति का अध्ययन करने के लिये बहुत अधिक प्रोत्साहित किया।

इन लोगों ने भारतीय समाज एवं संस्कृति को अत्यधिक गहराई से समझने का प्रयास किया, जिससे वे भारत पर सफलतापूर्वक अपना प्रभुत्व बनाए रख सकें। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज का गहनता से मानवशास्त्रीय अध्ययन किया।

एम.एन. श्रीनिवास ने (1973) में एक लेख में 1773 से 1900 तक के काल को भारतीय मानवशास्त्र के साथ-साथ समाजशास्त्र का प्रारम्भिक काल माना है। भारत में समाजशास्त्र पश्चिमी देशों से एक विज्ञान के रूप में ही आया।

भारत में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, का प्रारम्भ पाश्चात्य विचारकों में मार्क्स, हेनरी मैन एवं मैक्स वेबर के नाम आते हैं। हेनरी मैन ने अपनी कृतियों में हिन्दू कानून व्यवस्था आदि की चर्चा की और समाजशास्त्रीय विधि के माध्यम से इसके विश्लेषण की बात कही।MSO 04 Free Assignment In Hindi

मुख्य रूप से हेनरी मैन की अभिरुचि धर्म, विधि और नैतिकता के आपसी सम्बन्ध में थी। मैक्स मूलर, विलियम जॉन्स आदि भारत के प्राचीन साहित्य में अभिरुचि लेते थे। इन साहित्यों की व्याख्या से भी अनेक समाजशास्त्रीय तथ्य हमारे समक्ष आए।

ब्रिटिश काल में अंगेज प्रशासकों ने भी आदिवासियों और ग्रामीणों के जीवन और समाज का विस्तृत अध्ययन किया। इस संदर्भ में चार्ल्स मेटकाफ, बैडेन पॉवेल, नेस्फील्ड रिजले आदि के नाम प्रमुख हैं।

औद्योगिकीकरण और शहरीकरण से सम्बद्ध समस्याएँ भी धीरे-धीरे उभरकर सामने आ रही थीं। नगरीय समाज की सामाजिक आर्थिक स्थिति भी इस सामाजिक संबंध की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करने लगी।

भारत में विभिन्न प्रकार की जटिल परिस्थितियों में समाजशास्त्र का जन्म हुआ, क्योंकि हर प्रकार की क्रान्ति समाज में चल रही थी।

परन्तु भारतीय समाजशास्त्र में पश्चिमी समाजशास्त्र की झलक दिखायी दे रही थी, क्योंकि पाश्चात्य समाजशास्त्रियों ने ही भारत में समाजशास्त्र का प्रसार करने में अपना योगदान दिया था।

भारतीय जनसमूह के मनन-चिन्तन, रीति-रिवाजों पर अंग्रेजों का प्रभाव पड़ा। अपने समय के परम्परागत मार्ग को छोड़कर सामाजिक विचारधारा को नवीन रूप प्रदान करने का सम्पूर्ण श्रेय प्लेटो को दिया जाता है।

प्लेटो ने समाज की तुलना एक मानव शरीर से की तथा उसका अध्ययन का तरीका अत्यन्त सरल था।

उसका मानना था कि जिस प्रकार मानव ष्टारीर के अनेक अंग एक-दूसरे से संलग्न हैं, अलग करने पर उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार समाज के सभी अंग एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

सामाजिक विचारकों ने मनुष्य की प्रकृति के विज़य में बताया और कहा कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक तार्किक प्राणी है, इसीलिए उसे कर्म व विचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है।

समाजशास्त्र समाज के एक विज्ञान के रूप में सामाजिक संस्थाओं, समूहों, सामाजिक प्रक्रियाओं और सामाजिक संगठनों का अध्ययन कराता है। समाजशास्त्र का उदय सामाजिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से हुआ है तथा जिसकी उत्पत्ति ज्ञानोदय काल से मानी जाती है।MSO 04 Free Assignment In Hindi

इस काल में यूरोप में प्रौद्योगिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति व वाणिज्य क्रान्ति चल रही थी, वहीं दूसरी ओर फ्रांसीसी क्रान्ति भी फैल चुकी थी।

इसी काल में सामाजिक परिवर्तन करने वाली अनेक विभिन्न शक्तियों का जन्म हुआ, जिन्होंने सामंतवादी शासन की जड़ें हिलानी आरंभ कर दी। इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति जो प्रौद्योगिक विकास का परिणाम थीं,

यह बौद्ध काल में ही सत्ता में आया, जिसने समाज की प्रकृति तथा व्यक्ति की स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन करने आरम्भ कर दिए, जिसने अनेक प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया, जैसे-गरीबी, सामाजिक कुरीतियाँ तथा सांस्कृतिक समस्याएँ आदि।

इन्हीं सभी समस्याओं के कारण विद्वानों ने सामाजिक विकास करना ही महत्त्वपूर्ण समझा। इन्हीं के कारण सामाजिक समस्याओं से मुक्ति प्राप्त की जा सकती थी।

सामाजिक प्रगति के अतिरिक्त इन विद्वानों ने यह भी समझाने का प्रयास किया है कि सामाजिक बुराइयाँ दैवी नहीं हैं, अपितु ये सभी सामाजिक परिवर्तन की शक्तियों में ही छिपी हुई थीं, जिन्हें इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति ने और अधिक प्रज्ज्वलित कर दिया।

भारत में समाजशास्त्र का विकास विभिन्न देशों में उनकी संस्कृति, परम्परा और ऐतिहासिक दशाओं के अनुरूप अलग-अलग तरीकों से हुआ माना जाता है। समाजशास्त्र के विकास पर विभिन्न ऐतिहासिक अध्ययनों या अनुभवों व सांस्कृतिक अभिविन्यासों का प्रभाव पड़ा।

मुख्यतः भारतीय समाजशास्त्री पश्चिमी ज्ञान से अत्यधिक प्रभावित हुए, इसीलिए पश्चिम में विकसित समाजशास्त्र की संकल्पनाओं व श्रेणियों का ज्ञान वे पहले से ही रखते थे, जिन्हें भारतीय संदर्भ में उन्होंने कार्यान्वित किया।

इस प्रकार, इन विद्वानों ने समाजशास्त्र की वैधता को गम्भीर बौद्धिक विषय के रूप में कार्यान्वित किया, जिसके लिए उन्हें 19वीं शताब्दी के समाजशास्त्रियों की भाँति संघर्ष करना पड़ा।

योगेन्द्र सिंह जो एक कुशल सामाजिक विचारक थे, उनका मत है कि “उन समस्याओं के फलस्वरूप उत्पन्न एक बौद्धिक प्रतिक्रिया एक संज्ञानात्मक प्रतिक्रिया थी, जिसका सामना पश्चिमी समाज औद्योगीकरण और समाज में हो रही उथल-पुथल और रूपांतरण के परिणामस्वरूप कर रहा था।”

इस प्रकार, भारत में समाजशास्त्र का उदय उन नवीन परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए हुआ था, जिनकी उत्पत्ति पश्चिमी समाज में हो रहे परिवर्तन के परिणामस्वरूप हुई थी।

इस समय औद्योगिक मध्यम वर्ग का विकास नहीं हुआ। इस प्रकार, विभिन्न संघर्षों के पश्चात ही समाजशास्त्र का विकास सम्भव हो पाया था।MSO 04 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 3. 1950-60 के दशक में भारतीय समाजशास्त्रियों का मुख्य केन्द्रबिन्दु विलेज इंडिया था। आलोपनात्मक चर्चा कीजिए।

उत्तर-1950 और 1960 के दौरान मानवविज्ञानियों द्वारा ग्राम्य जीवन का बहुत विस्तार से विवरण प्राप्त होता है। इस समय जब औपनिवेशिक अधिकारी भारतीय ग्रामों की स्थिति का निर्माण कर रहे थे, जिनके परिणाम बहुत समय पष्ठचात प्राप्त किए जाने थे।

ये प्रशासक जिस विचारवादी व राजनीतिक ढंग से भारतीय समाज की रूपरेखा तैयार रहे थे, उसी आधार पर भारतीय समाज की संरचना की जानी थी।

मेटकॉफ ने ग्रामीण भारत के सम्बन्ध में एक टिप्पणी की, जो निम्न है-“भारतीय ग्रामीण समाज कुछ गणतंत्रात्मक था, उनके पास वह सब कुछ था, जिसकी उन्हें इच्छा थी और बाहरी सम्बन्धों से वे लगभग असंपृक्त थे।

वे वहाँ टिके रहे, जहाँ कुछ भी नहीं टिक सकता। “एक के बाद दूसरा वंश आया, पीढ़ियाँ बदलती रहीं, एक आन्दोलन के बाद दूसरा आन्दोलन आया, लेकिन ग्रामीण समुदाय वैसा ही रहा।”

मेटकॉफ के इस विवरण का अत्यधिक विरोध भी किया गया फिर भी यह एक सुप्रसिद्ध व प्रभावशाली प्रतिनिधित्व करने वाला मूल्यांकन माना जाता है।

गाँव को जमीन का सामुदायिक स्वामित्व करने वाला एक आत्मनिर्भर समुदाय माना जाता था और अनेक व्यवसायों के समूह की

कार्यात्मक एकता ही उसकी पहचान थी। सामाजिक सामंजस्य व सरलता ही गाँवों की मुख्य विशेषता थी। यह भारतीय सभ्यता की एक आधारित इकाई के रूप में देखी जाती है।

भारत को गाँवों का देश माना जाता है। देश की जनसंख्या का तीन-चौथाई भाग गाँवों में ही रहता है। ‘गाँव’ शब्द एक जाना-पहचाना शब्द है, क्योंकि इसका उपयोग आदिकाल से ही किया जा रहा है।

यह सामाजिक सम्बन्धों को स्थायित्व प्रदान करने वाला संगठन है। ‘गाँव’ शब्द के स्थान पर पहले ‘ग्रिहा’, गिरोह या झुण्ड शब्द का उपयोग किया जाता था। MSO 04 Free Assignment In Hindi

सिम्स ने गाँव शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है-“गाँव वह नाम है, जो साधारणत: प्राचीन कृषकों की बस्ती को दर्शाता है।”

विशेषतः समाजशास्त्र के अन्तर्गत गाँव को एक समुदाय माना जाता है। इसलिए कुछ विचारक ‘गाँव’ की परिभाषा ‘ग्रामीण समुदाय’ के रूप में करते हैं।

Peake के अनुसार, “ग्रामीण समुदाय परस्पर सम्बन्धित तथा असम्बन्धित उन व्यक्तियों का समूह है, जो अकेले परिवार से अधिक विस्तृत एक बहुत बड़े घर या परस्पर निकट स्थित घरों में कभी अनियमित रूप में तथा कभी एक गली में रहता है

तथा मूलतः अनेक कृषि योग्य खेतों में सामान्य रूप से कृषि करता है, मैदानी भूमि को आपस में बाँट लेता है और आसपास की बेकार भूमि में पशु चराता है, जिस पर निकटवर्ती समुदायों की सीमाओं तक वह समुदाय अपने अधिकार का दावा करता है।”

सेण्डरसन (Sanderson) के कथानुसार, “एक ग्रामीण समुदाय वह स्थानीय क्षेत्र है, जिसमें वहाँ निवास करने वाले लोगों की सामाजिक अन्तर्किया और उनकी संस्थाएँ सम्मिलित हैं,

जिनमें वह खेतों के चारों ओर बिखरी झोंपड़ियों या ग्रामों में रहता है और जो उनकी सामान्य परिस्थितियों का केन्द्र है।” MSO 04 Free Assignment In Hindi

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ग्रामीण समाज जो कि ग्रामीण समुदायों का एक संगठन है, जिनके सदस्यों के मध्य अनौपचारिक, सरल व परम्परागत सम्बन्ध पाए जाते हैं। इन परम्परागत सम्बन्धों के कारण ही उनकी समस्त आवश्यकताएँ इन समुदायों के माध्यम से पूर्ण हो जाती हैं।

इसके अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए ए.आर. देसाई ने कहा है कि “गाँव, जो ग्रामीण समाज की इकाई है। यह एक ऐसा रंगमंच है, जहाँ ग्रामीण जीवन का मुख्य भाग स्वयं हमारे समक्ष आता है और कार्य करता है।”

देसाई जी का अभिप्राय है कि ग्राम सामुदायिक निवास स्थान की प्रथम स्थापना है गाँव जो कि मनुष्य का प्राचीनतम स्थायी समुदाय कहा जाता है।

क्रोपाटकिन (Kropotkin) के शब्दों में, “ऐसी कोई मानव जाति या कि राष्ट्र का हमें ज्ञान नहीं है, जिसमें ग्रामीण समुदायों का युग न रहा हो।”

‘ग्रामीण समुदाय’ जिसे एशिया के अन्दर कृषि अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में स्थान मिला। रेडफील्ड ने 1965 में कृषक अध्ययन और भारतीय ग्राम अध्ययन के मध्य सम्बन्ध देखा और इसी के आधार पर उन्होंने ‘लघु समुदाय’ की संकल्पना की थी।

सामाजिक मानवविज्ञानियों ने जिनमें पाश्चात्य व भारतीय विद्वान थे, ने 1950 के प्रारम्भ में ही क्षेत्रीय अध्ययन शुरू किया। ग्रामीण जीवन का विस्तृत अध्ययन जो व्यापक क्षेत्रीय कार्य के पश्चात तैयार किया गया और भारतीय गाँवों को एकाकी समाज नहीं माना गया। MSO 04 Free Assignment In Hindi

ग्रामीण अध्ययन के आधार पर यह ज्ञात हुआ कि भारत के गाँव औपनिवेशिक शासन के नवीन कृषि विधान आरम्भ करने से पूर्व आर्थिक व सामाजिक रूप से, एकीकृत व समृद्ध थे। इसके पश्चात सामाजिक ग्रामीण जीवन देश के सभी भागों में विद्यमान था।

भारत कृषि प्रधान देश है तथा यहाँ कि अधिकांश जनता गाँवों में निवास करती है। अत: यहाँ की समस्या समझने के लिए गाँवों का अध्ययन जरूरी है।

भारत में गाँवों के अध्ययन को इसलिए अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ, जिससे कि वे ग्रामीणों की विभिन्न समस्याओं को भलीभांति समझकर उनकी मुक्ति के प्रयास कर सकें। ये समस्याएँ थीं-आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य भूमि-समेकन कार्यक्रम और सरकार द्वारा नई पूर्व योजनाएँ।

अतः इन समस्त समस्याओं को देखते हुए ग्रामीण पुनर्निर्माण की आवश्यकता को अनुभव किया गया। केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों ने गाँव के सदस्यों की निर्धनता एवं निरक्षरता को दूर करने के लिए विभिन्न योजनाओं का सूत्रपात किया है।

पचास और साठ के दशक में गाँवों के अध्ययन को बहुत महत्त्व दिया जाने लगा, क्योंकि इस समय समाज में परिवर्तन की गति तीव्र हो गई थी।

इस समय मानवविज्ञानियों को परम्परागत सामाजिक व्यवस्था के विवरणों का लेखा-जोखा रचना अत्यन्त आवश्यक था। MSO 04 Free Assignment In Hindi

इसके अध्ययन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए श्रीनिवास ने लिखा है, “जहाँ तक हो सके हमें मूलभूत रूप से और तेजी से बताते हुए समाज के तथ्यों को आगामी दस वर्षों में रिकार्ड कर लेना चाहिए।”

परन्तु गाँवों के अध्ययन में विभिन्न प्रकार की बाधाएँ भी सामने आयीं। प्रतिभागी पर्यवेक्षण’ जिसे इन अध्ययनों में प्रमुखता दी जाती थी, उनके कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाए गए।

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प्रश्न 5. ग्रामीण भारत की कृषीय वर्ग संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर-यदि हम स्वतंत्रता के बाद के भारतीय ग्रामीण वर्ग की संरचना का विश्लेषण करें, तो हमें चार प्रकार के वर्ग मिलते हैं-कृषि | क्षेत्र में तीन वर्ग हैं, भू-स्वामी, आसामी और मजदूर जबकि चौथा वर्ग है गैर-कृषि वालों का।

ए.आर. देसाई के अनुसार भू-स्वामी लगभग 22%, आसामी लगभग 27% तथा श्रमिक वर्ग के 31% लोग तथा 20% गैर कृषक हैं। कृषकों का एक बड़ा भाग सीमान्त किसान होते हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम भूमि होती है।

कुल उत्पादन का लगभग 35% किसानों द्वारा बेचा जाता है। विक्रय के इन सौदों में से लगभग 65% वस्तुएँ गाँव के ही व्यापारी को बेच दी जाती हैं। मण्डियों में कृषि उत्पादों का विपणन अधिकतर बिचौलियों के हाथों में होता है, जो कि वस्तुत: व्यक्तिगत हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वे ही ऋण प्रदान करने के साथ-साथ उत्पाद की बिक्री यानी दोनों की सुविधा का नियंत्रण करते हैं। इस प्रकार, बड़ी संख्या में श्रमजीवीजन भूमि की गैर आर्थिक उपयोगिता वाली भूमि के बड़ी संख्या में स्वामी तथा कम संख्या में शिल्पी, स्वरोजगार में लगे लोग ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों के दु:खद आर्थिक जीवन को दर्शाते हैं। कृषि संरचना के अन्तर्गत हम कृषि सम्बन्धी विषयों का विश्लेषण करते हैं

ये सम्बन्ध इस प्रकार वर्गीकृत किए जा सकते हैं

(1. वे जो कानून द्वारा परिभाषित और क्रियान्वित हैं।

(2. वे जो रूढिबद्ध हैं और MSO 04 Free Assignment In Hindi

(3. वे जो अस्थिर हैं।

डेनियल थोर्नर तथा दीपांकर गुप्ता ने ग्रामीण क्षेत्रों में तीन वर्गों में वर्णित भू-स्वामी, आसामी और मजदूर कृषक। इस वर्गीकरण को इन्होंने अस्वीकार किया है। उनके तर्क का आधार था कि तीनों वर्गों में एक समय में एक ही व्यक्ति हो सकता है।

एक व्यक्ति अपने स्वामित्व की कुछ एकड़ भूमि आसामी को किराए पर दे सकता है। संकट की घड़ी में दूसरों की खेती में मजदूर की तरह काम कर सकता है।

उन्होंने कृषि सम्बन्धों का विश्लेषण तीन शब्दों में प्रयोग के माध्यम से किया है। कृषि जमींदारों के लिए मालिक, कृषि का काम करने वालों के लिए किसान और खेती श्रमिकों के लिए मजदूर ।

मालिक अपनी आय भूमि उत्पादन के हिस्से में से प्राप्त करता है। यह हिस्सा नकद और वस्तु के रूप में भी वसूल किया जाता है।

वह अपनी भूमि आसामी को दे सकता है या दैनिक मजदूर रखने वाले लोग जो छोटे भू-स्वामी या आसामी हो सकते हैं। मालिक दो प्रकार के होते हैं।

अनुपस्थित जमींदार और जो उसी गाँव में रहते हैं, जहाँ पर उनकी जमीन है। किसान जो काम करने वाले लोग होते हैं। किसान की आय बहुत कम होती है। उसके परिवार के सदस्य स्वयं भूमि पर श्रम करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं।

वे अपना पारिश्रमिक नकद और कभी-कभी वस्तु को मजदूरी के रूप में प्राप्त करते हैं। जब उन्हें ग्रामों में काम नहीं मिलता तब वे अन्य राज्यों में चले जाते हैं या तो कृषि मजदूरी करने या निर्माण एवं औद्योगिक मजदूर के रूप में काम करने चले जाते हैं। MSO 04 Free Assignment In Hindi

डेनियल थोर्नर ने तीन आधारों पर कृषि सामाजिक संरचना के तीन वर्गों का विश्लेषण किया है

(1. भूमि से प्राप्त आय अर्थात किराया, स्वयं की खेती से आय या पारिश्रमिक से।

(2. अधिकारों की प्रकृति, जैसे-स्वामित्व, बटाई और बिना किसी अधिकार के कार्य करना।

(3. किए गए वास्तविक कार्य सीमा अर्थात कार्य पूर्ण न करना, थोड़ा कार्य पूर्ण करना और दूसरे के लिए काम करना।

धनी कृषक और व्यापारी ऋणदाता आसामियों और भूमिहीन मजदूरों का इतना शोषण करते हैं कि उनके बीच के सम्बन्ध सदैव कटु रहते हैं।

उनके पास काफी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति होती है। गाँवों में सहकारी और ऋण समितियों के उदय ने निस्सन्देह मालिकों की शक्ति पर प्रभाव डाला है फिर भी वे मजबूत बने हुए हैं।

गाँवों में इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, गाँवों में सहकारी समितियाँ अधिक सफल नहीं हो पायी हैं। निजी व्यापारी सफलता से कार्य कर रहे हैं।

स्वार्थी लोग यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास करते हैं। यहाँ तक कि भूमि सुधारों से भी मालिकों और महाजनों की शक्ति कम नहीं हुई है। MSO 04 Free Assignment In Hindi

जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक उन्नति नहीं होती, तब तक उत्पादन के अधिक समान वितरण के लिए कोई आन्दोलन नहीं चलाया जाता,

जब तक छोटी इकाइयों को आर्थिक बल नहीं मिलता जिससे कि वे बड़े कृषकों और महाजनों तथा व्यापारियों के दबाव का मुकाबला कर पायें, तब तक वर्ग सम्बन्धों के सुधार करने में कोई सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।

कृषि श्रमिक जाँच मुख्यत: कुछ आर्थिक पक्षों से सम्बद्ध थी, लेकिन सामाजिक निर्योग्यताएँ तथा अधिकतर कृषि मजदूरों की निम्न सामाजिक स्थिति भी समस्या का कम महत्त्वपूर्ण भाग नहीं हैं। अधिकांश अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति तथा अनुसूचित जनजाति के होते हैं।

अतः यह हो सकता है उनकी कुछ कमियाँ सरकारी आरक्षण नीतियों के कारण समाप्त हो गई हों, फिर भी उनकी आर्थिक व सामाजिक | स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। गाँव में उन्हें सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं माना जाता है।

कृषीय समाजों के वर्ग विश्लेषण के क्रम में 20वीं शताब्दी के पूर्व में लेनिन ने वर्ग विश्लेषण की मार्क्सवादी विधि का प्रयोग किया है। उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘दि प्रीलिम्नरी ड्राफ्ट वे कीसिस ऑन द एग्रेरियन क्वेश्चन’ में कृषीय व्यवस्था और कृषक वर्ग के वर्ग विभेदन का विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

इसी प्रकार चीनी क्रांति ने नेता माओत्से-तुंग ने ‘हाओ टू डिफरेंशिएट क्लासेज इन रूरल एरियाज़’ में चीनी कृषक वर्ग के विश्लेषण के अन्तर्गत मार्क्सवादी संकल्पना का प्रयोग किया है।

बहुत कम समय में लेनिन और माओ विभिन्न समाजों में कृषक वर्ग संरचना को जानने का आधार बन गए।

लेनिन व माओ ने अपने अनुभवों के आधार पर चीन व रूस के कृषकों की विभिन्न श्रेणियों और उनके बीच एक-दूसरे के सम्बन्धों के स्वरूप को ज्ञात किया। लेनिन व माओ की रचनाओं के आधार पर कृषकों की श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं MSO 04 Free Assignment In Hindi

(i) धनी कृषक (ii) मध्यम कृषक (iii) निर्धन कृषक

(i) धनी कृषक-ये वे कृषक हैं, जिनके पास प्रचुर मात्रा में अचल सम्पत्ति है। वे बिना अपवाद के ही काश्तकारों को भूमि का एक भाग दे देते हैं, जिनकी रुचि भूमि में निहित होती है। आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग द्वारा वे भी कुछ श्रमिकों को नियुक्त करके पूँजीवादी किसान बनने का प्रयास करते हैं।

(ii) मध्यम कृषक-ये वे कृषक हैं, जिनके पास अपनी निजी भूमि कम होती है। वे अपनी आवश्यकता की पूर्ति इसी भूमि से पूर्ण करते हैं।

उनके पिता या परिवार के सदस्य मजदूरी करते हैं। इस वर्ग के कृषक न तो मजदूर के सदृश लगते हैं और न ही वे अन्य व्यक्तियों की भाँति साधारण कार्य करते हैं।

(iii) निर्धन कृषक-इन कृषकों के पास भी निजी भूमि का अभाव होता है। ये अपनी आय व जीवनयापन करने के लिए श्रम करते हैं।

ये वर्ग काश्तकार, सर्वहारी वर्ग हैं, जिन्होंने पूँजीवाद के विकसित हो जाने पर अपनी भूमि गँवा दी है। वे धनी किसानों को अपनी श्रम शक्ति बेचकर या यूँ कहें उनकी सेवा करके अपना जीवनयापन करते हैं। कई बार तो इनके कार्य के अनुसार उन्हें उचित पारिश्रमिक भी नहीं मिल पाता है।

लेनिन का विचार है कि इन श्रेणियों को स्थायी नहीं कहा जा सकता। कृषि में पूँजीवाद के विकसित हो जाने के कारण कृषक समष्टि की दो वर्गों में ध्रुवीकरण की ओर प्रवृत्त होगी।

इसके अन्तर्गत यदि देखा जाए तो बड़े पूँजीवादी किसान संख्या अर्थात सर्वहारा वर्ग की बड़ी संख्या अर्थात श्रमिक किसान।

इन दोनों वर्गों के हितों के परस्पर विरोधी हैं, क्योंकि पूँजीपति किसानों का शोषण करके उनसे अधिक कार्य लेना चाहते हैं, जबकि श्रमिक या मजदूर किसान अपने कार्य का पर्याप्त वेतन चाहते हैं।

इन दोनों वर्गों के हित परस्पर विरोधी होने के कारण कोई समझौता नहीं हो पाता। मार्क्स इस बात की आशा करते हैं कि पूँजीवादी कृषक का विनाश करने के लिए श्रमिक वर्ग क्रान्ति करेगा,

जिसमें सर्वहारा वर्ग को निश्चित रूप से विजय मिलेगी तथा एक नवीन समाज अर्थात श्रमिकों का शोषण समाप्त हो जाएगा। MSO 04 Free Assignment In Hindi

भारत में कृषि सामाजिक संरचना और परिवर्तन काफी दीर्घ अवधि के मध्य विकसित हुआ है। यह विभिन्न सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक कारकों द्वारा ऐतिहासिक रूप से आकार प्राप्त करती है।

पारम्परिक भारतीय गाँव जजमानों या संरक्षक और नीच या दास के बीच दो समूहों में विभाजित थे।

जजमान वे जाति समूह थे, जो भू-स्वामी थे और उस भूमि पर खेती करते थे। नीच वे व्यक्ति कहलाते थे, जो संरक्षकों को अपनी विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करते थे या यूँ कहें कि वे जजमानों की सेवा करने के लिए बाध्य होते थे।

संरक्षक नीच जाति या दासों को अपनी उपज का एक भाग भुगतान के तौर पर देना पड़ता था। यह सब पारस्परिक विनिमय पद्धति पर आधारित था। पारस्परिक विनिमय की यह पद्धति, जिसके अन्तर्गत सहभागिता समान स्तर पर नहीं थी।

नीच जाति समूहों की अपेक्षा उच्च जातियों के समूह भू-स्वामी थे, वे शक्तिशाली भी थे। जजमानी प्रणाली, जिसके ढाँचे के अन्तर्गत व्यवस्थित कृषीय सम्बन्धों की संरचना ने जाति-व्यवस्था की असमानताओं को अधिक

सुदृढ़ किया था। इसके अतिरिक्त जाति व्यवस्था ने असमान भूमि सम्बन्धों को मान्यता प्रदान की।समय के परिवर्तित होने के साथ-साथ जजमानी प्रणाली विघटित हो गई है और सामाजिक संरचना में गहन परिवर्तनों का अनुभव किया। इनके माध्यम से कृषिक वर्ग संरचना भी पूर्णतः परिवर्तित हो गई।

भारत के कृषीय जनसमूह को विभिन्न वर्ग श्रेणियों में विभाजित करने के लिए तीन मानक हैं :

(1. भूमि से कमायी गई आय का प्रकार, उदाहरणार्थ, किराया, खेती के फल व मजदूरी।

(2. भूमि में निहित अधिकारों का स्वरूप, उदाहरणार्थ, स्वामित्व, काश्तकारी या बटाईदारी का अधिकार आदि।

(3. निर्धारित कृषि कार्य की सीमा, उदाहरणार्थ, पूरा कार्य मजदूर परिवार द्वारा किया जाता है। दूसरों के लिए किये गए कार्य। थोर्नर ने भारत में कृषिक वर्ग संरचना में

निम्नलिखित मॉडल का सुझाव दिया (i) मालिक, (ii) किसान, (ii) मजदूर

(i) मालिक-ये वे लोग हैं, जिनको मुद्रा में सम्पत्ति अधिकारों से आय की प्राप्ति होती है और जिनकी सामान्य रुचि यह रहती है कि किरायों का स्तर ऊँचा बना रहे व मजदूरी स्तर निम्न बना रहे। ये काश्तकारों, उपकाश्तकारों और हिस्सेदारों से किराया एकत्र करते हैं।MSO 04 Free Assignment In Hindi

इन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है

(1. बड़े भू-स्वामी, जिनका बड़े-बड़े भू-भागों पर अधिकार होता है और जिनका विस्तार भी अधिक होता है।

(2. धनी भू-स्वामी, जिनके पास पर्याप्त मात्रा में उपजाऊ क्षेत्र होता है और जिस गाँव में वे रहते हैं, उसी गाँव तक यह क्षेत्र सीमित होता है, परन्तु ये भू-स्वामी खेती का निरीक्षण करते रहते हैं, भूमि के प्रबंधन व सधार में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेते हैं।

(ii) किसान-इन्हें भूमि के लघु खण्डों का स्वामी माना जाता है, जो अधिकांशतः अपने परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर खेती का कार्य पूर्ण करते हैं। मालिकों की अपेक्षा भूमि भी इनके पास कम होती है। इनकी भी दो उप-श्रेणियाँ हैं

(1. लघु स्वामी, जिनके पास परिवार की सहायता के लिए पर्याप्त जोत होती है।

(2. वास्तविक काश्तकार, जिनके पास किसी भूमि का स्वामित्व नहीं होता, लेकिन खेती करने का क्षेत्र बड़ा होता है, जिससे मजदूरों के रूप में कार्य किए बिना ही अपने परिवार का भरण-पोषण करने में सहयोग मिलता है।

(iii) मजदूर-वे मजूदर, जिनकी अपनी भूमि नहीं होती एक बटाईदार के रूप में कार्य करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं या अपनी जीविका चलाते हैं।

इस प्रकार, अर्थव्यवस्था के कृषीय क्षेत्र में पूँजीवादी सम्बन्धों के विकास ने भी प्राचीन वर्ग संरचना को परिवर्तित कर दिया। उदाहरणार्थ, भारत के अधिकांश क्षेत्रों में मालिक उद्यमशील किसानों के रूप में परिवर्तित हो गए।

इन्होंने काश्तकारों व बटाईदारों में मजदूरी के रूप में काम करना आरम्भ कर दिया। कृषि में भी पूँजीवादी विकास में उस प्रकार के विभेदीकरण को उत्पन्न नहीं किया, जिस प्रकार की मार्क्सवादियों ने भविष्यवाणी की थी। साथ-ही-साथ मध्य स्तर के किसानों की संख्या में वृद्धि हुई।

किसानों का व्यवसाय के प्रति तरीका भी परिवर्तित हो गया। पूर्व पूँजीवादी या पारम्परिक समाजों में किसान मुख्यतः उपभोग के लिए उत्पादन करते थे। MSO 04 Free Assignment In Hindi

खेतों पर उनके उनके परिवार के सदस्य श्रम करते थे। किसान वर्ग के लिए कृषि करना जीविकोपार्जन का साधन भी था और उनकी जीवन-शैली भी,

परन्तु आधुनिक समय में भू-स्वामी कृषि को एक व्यवसाय के रूप में देखने लगे। वे अपने खेतों पर काम करने के लिए भी आधुनिक मशीनों का उपयोग करते थे,

जिससे ‘नकदी फसल’ उत्पादित करते जो बाजार में ऊँचे दाम पर बिकती थी और इस प्रकार, अधिक धन उत्पन्न करते थे। इस प्रकार लाभ प्राप्त करने का उद्देश्य कृषीय उद्यम का अंग बन जाता है।

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भाग – ॥

प्रश्न 8. सामाजिक विभेदन क्या है और भारत की जनजातियों में सामाजिक विभेदन कैसे पनपता है?

उत्तर-सामाजिक विभेदीकरण स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाली एक अल्पकालीन प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत विभिन्न व्यक्तियों या समूहों के बीच एक प्रकार का विभाजन पाया जाता है,

जिसमें ऊँच-नीच या हीनता की भावना रहती ही नहीं है। यह एक तटस्थ प्रक्रिया है। सामाजिक विभेदीकरण के आधार जैविक हो सकते हैं, जैसे-रूप-रंग, उम्र, यौन विभेद, स्वास्थ्य इत्यादि।

सामाजिक विभेदीकरण एक ऐसी सामाजिक स्थिति को जन्म देता है, जिसके अन्तर्गत स्वास्थ्य, आय, प्रस्थिति, शक्ति इत्यादि सामाजिक सुविधाओं के उपभोग की दृष्टि से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सामाजिक तौर पर असमान माना जाता है। इन्हें हम सामाजिक असमानता के प्रभाव मान सकते हैं।

विभिन्न विद्वानों ने विभेदीकरण के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अपने विचार व्यक्त किए हैं, जो निम्न प्रकार हैं MSO 04 Free Assignment In Hindi

रिजर के शब्दों में, “यह एक वष्ठाानुक्रम पद्धति है, जिसमें वंशागत तथा सामाजिक रूप से अर्जित व्यक्तिगत अंतर सामाजिक कार्यों को करने तथा सामाजिक स्थानों को भरने का आधार बनते हैं। यह प्रक्रिया सामाजिक असमानता और सामाजिक स्तरीकरण की पूर्वगामी है।

स्टेबिंस ने सामाजिक विभेदीकरण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “यह विस्तृत सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें लोगों के बीच आयु, लिंग, व्यक्तिक्रम, मानवजातीय और स्तरीकरण की भूमिकाओं के आधार पर भेद किया जाता है।

रेमण्ड एवं मुरे के अनुसार, “सामाजिक विभेदीकरण समाज का उच्च तथा निम्न सामाजिक इकाइयों में किया गया समतल विभाजन है।”

सोरोकिन सामाजिक विभेदीकरण को दो मुख्य श्रेणियों के संदर्भ में परिभाषित करते हैं अर्थात अंतरासमूह विभेदीकरण और दूसरा अन्तर । समूह विभेदीकरण। उनके अनुसार अंतरासमूह विभेदीकरण समूह के समूहों में विभाजन द्वारा प्रदर्शित होता है, जो किसी समूह में भिन्न कार्य करते हैं।

परिवार में पति व पत्नी के बीच श्रम का विभाजन अन्तरासमूह विभेदीकरण का एक उदाहरण है। दूसरी ओर अन्तरसमूह विभेदीकरण एक विस्तृत अवधारणा है, जो सामाजिक समहों अथवा सामाजिक प्रणालियों के विभेदीकरण को प्रदर्शित करती है।

सामाजिक विभेदीकरण की प्रक्रिया के प्रकार्यात्मक सिद्धान्त पर स्पेंसर ने अपना मत इस प्रकार रखा, जैसे-जैसे (समाज का) विकास । होता है उसके घटक भिन्न हो जाते हैं। यह संरचना में वृद्धि को दर्शाता है। इसके भिन्न अंग एक साथ एक समय पर भिन्न प्रकार की गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।

ये गतिविधियाँ केवल भिन्न नहीं होतीं, बल्कि इनके अन्तर इस प्रकार संबंधित होते हैं कि वे एक-दूसरे को संभव बनाते हैं। इस प्रकार दी गई विपरीत सहायता के कारण अंशों के बीच परस्पर निर्भरता बनती है और ये परस्पर निर्भर अंश एक-दूसरे के साथ रहते हुए संपूर्ण तत्त्व बनाते हैं, जो किसी व्यक्तिगत जीव वाले सामान्य सिद्धान्त पर गठित होता है।”

विभेदीकरण विषमस्तरीय या खड़ा बँटवारा है, जहाँ विभिन्न खण्डों की श्रेणीबद्धता की बात नहीं होती है।

जनजातियों के बीच सामाजिक विभेदीकरण मुख्य रूप से वंश समूहों, लिंग और आयु पर आधारित होता है। जनजातियों में भी विभेदीकरण के आधार पर नहीं होता बल्कि सामाजिक व्यवस्था, प्रथा और आस्था तंत्र के अनुसार इसमें भेद होता है। MSO 04 Free Assignment In Hindi

जनजातीय समाज में विभेदीकरण मातृवंशागत और पितृवंशागत होता है, जिनके तरीकों में भी भिन्नता होती है।

जनजातीय समाज में विभेदीकरण के कुछ प्रकार इस प्रकार हैं

(i) नातेदारी तथा वंश समूहों के आधार पर विभेदीकरण
(ii) लिंग के आधार पर विभेदीकरण –

(iii) आयु के आधार पर विभेदीकरण
(iv) स्थान तथा अनुक्रम के आधार पर विभेदीकरण

(v) व्यवसाय के आधार पर विभेदीकरण ।
(vi) शिक्षा के आधार पर विभेदीकरण

(vii) धर्म के आधार पर विभेदीकरण
(viii) भाषा के आधार पर विभेदीकरण

(ix) संगठन के आधार पर विभेदीकरण
(x) क्षेत्र तथा भौतिक वातावरण के आधार पर विभेदीकरण

(i) नातेदारी तथा वंश समूहों के आधार पर यह जनजातीय समाजों का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। नातेदारी उन लोगों को दर्शाती है, जो रक्त या विवाह के रिश्ते से सम्बद्ध होते हैं। रिसर्च के शब्दों में नातेदारी “जीव विज्ञानी सम्बन्धों की एक सामाजिक मान्यता है।”

जन्म या रक्त द्वारा संबंधित सदस्यों को रक्त सम्बन्धी कहा जाता है और विवाह द्वारा संबंधित व्यक्तियों को वैवाहिक सम्बन्धी कहा जाता है नातेदारी के माध्यम से व्यक्ति को संबंधियों,

उनके अधिकारों तथा आवश्यकताओं की विभिन्न श्रेणियों के मध्य अन्तर बनाने में सहायता मिलती है एवं व्यक्ति को सामाजिक समूह या नातेदारी समूह निर्माण में सहयोग प्राप्त होता है।

वंश, जिसका अर्थ संकुचित हैं, यह संस्कृति के उन नियमों से सम्बद्ध है, जो माता-पिता से उसके सम्बन्धों को स्थापित करते हैं। इसके अन्तर्गत व्यक्ति के पूर्वज एक ही रेखीय रूप से संबंधित होते हैं।

यह व्यक्ति की प्रस्थिति, उसके अधिकारों तथा कर्त्तव्य, मुख्यतः नातेदारी तथा वंश पद्धतियों द्वारा निर्धारित होते हैं। नातेदारी सम्बन्ध विवाह या रक्त सम्बन्ध होते हैं।MSO 04 Free Assignment In Hindi

रिवर्स के शब्दों में, “जीव विज्ञानी सम्बन्धों की सामाजिक मान्यता है। यह रक्त सम्बन्धी तथा विवाह के पश्चात बने सम्बन्धों को वैवाहिक सम्बन्धी कहते हैं।”

वंश समूह उन रिश्तेदारों के सामाजिक समूह हैं, जिन्हें सदस्य/वंशज एक ही पूर्वज से रेखीय रूप से सम्बन्धित होते हैं। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की प्रस्थिति कमोवेश आनुवंशिकीय सम्बन्धों द्वारा निर्धारित होती है।

प्राथमिक सामाजिक समूह के सदस्य नातेदारी से सम्बन्धित होते हैं। नातेदारी की पद्धति मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभक्त है-वर्गीकरणीय और विवेचनीय।

वर्गीकरणीय नातेदारी पद्धति, नातेदारों का विवरण शब्दावली द्वारा देने का तरीका है, जिसके एक से अधिक अर्थ होते हैं और नातेदारी की सीमा भिन्न होती है।

उदाहरणार्थ, अपने परिवार से बाहर के व्यक्तियों के लिए शब्दावली का प्रयोग, जैसे-पिता, भाई, बहन। विवेचनीय पद्धति-यह वह पद्धति है, जिसमें विशिष्ट सम्बन्धों के लिए विशिष्ट शब्दों का प्रयोग होता है। उदाहरणार्थ, पिता, माता, भाई जैसे शब्द जो केवल अपने परिवार के सदस्यों के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

इसी प्रकार वंशों को भी विभक्त किया गया-एकरेखीय वंश समूह तथा सजातीय वंश समूह। एकरेखीय वंश समूह उस समूह के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जहाँ वंश पिता से पुत्र की ओर अथवा माता से पुत्री की ओर विस्तारित होता है।

इस दृष्टि से यह परिवार से भिन्न है। परिवार को द्विपक्षीय समूह माना जाता है। एकरेखीय वंश समूह जिसके अन्तर्गत दस पीढ़ियों तक वंश को देखा जाता है।

सजातीय वंश समूह-यह प्रणाली अनेक भारतीय जनजातियों में पायी जाती है। जैसे-तमिलनाडु में नीलगिरी के टोडा, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में नागा आदि। मध्य हिमालय क्षेत्र के थारस और पूर्वी क्षेत्र के बोंडोस। अनल नागाओं में समाज।MSO 04 Free Assignment In Hindi

जनजाति दो सजातीय हिस्सों में अन्तर बताने में सहायता मिलती है एवं व्यक्तियों को सामाजिक समूह या नातेदारी समूह निर्माण में सहयोग प्राप्त होता है।

वंश, जिसका अर्थ संकुचित है, यह संस्कृति के उन नियमों से सम्बद्ध है जो माता-पिता से उसके सम्बन्धों को स्थापित करते हैं।

इसके अन्तर्गत व्यक्ति के पूर्वज एक ही रेखीय रूप से सम्बंधित होते हैं। यह व्यक्ति की प्रस्थिति, कामोवेश, आनुवंशिकीय सम्बंधित होते है।

यह व्यक्ति की प्रस्थिति, कामोवेश, आनुवंशिकीय सम्बन्धों द्वारा निर्धारति होते हैं। प्राथमिक सामाजिक समूह के सदस्य नातेदारी से सम्बंधित होते हैं।

नातेदारी की पद्धति मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित है-वर्गीकरण और दूसरा विवेचनीय।

वर्गीकरण पद्धति-नातेदारों का विवरण एक शब्दावली के द्वारा देने का ढंग है, जिसके एक से अधिक अर्थ होते हैं साथ ही नातेदारी की सीमा भिन्न होती है, जैसे-अपने परिवार से बाहर के सदस्यों के लिए इस शब्दावली का प्रयोग करना (पिता, माता, भाई, बहन)।

विवेचनीय पद्धति-जिसके अन्तर्गत विशिष्ट सम्बन्धों के लिए विशिष्ट शब्दावलियों का प्रयोग करना। (जैसे-पिता, माता, भाई, बहन) इन शब्दों को केवल अपने परिवार के सदस्यों के लिए ही प्रयोग किया जाता है।

वंश समूह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैंएक रेखीय वंश समूह तथा सजातीय वंश समूह।
एक रेखीय वंश समूह उस वंश के लिए प्रयुक्त होता है, जहाँ वंश पिता से पुत्र की ओर, माता से पुत्री की ओर विस्तारित होता है।

पिता की ओर से पितृवंशीय या पितृवंशागत समूह कहते हैं तथा माता की ओर से मातृवंशागत समूह कहते हैं।

अतः वंश एक रेखीय समूह है, जो दस पीढ़ियों तक देखा जाता है। अत: कुछ समाजों में वंश के विभाजन और उसके उपविभाजन होते हैं। MSO 04 Free Assignment In Hindi

उदाहरण के लिए मणिपुर के मोयोन नागाओं में इस प्रकार की अंश वंश प्रणाली होती है। इसलिए इसे दोहरा संगठन कहा जाता है ये विजातीय, अजातीय या सजातीय हो सकते हैं।

ये प्रणाली और भी अन्य जनजातियों में देखने को मिलती है, जैसे-नीलगिरी पहाड़ों के टोडा, उत्तर पूर्वी क्षेत्र के नागा (आओ, अनल, मोयोन आदि) अनल नागाओं में जनजाति दो विजातीय भागों में बंटी है-मोचल और मोशम अर्धवंश के अन्तर्गत आते हैं। एक ही अर्धवंश के सदस्य आपस में विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते।

(ii) लिंग के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण-सामाजिक विभेदीकरण का एक आधार पुरुषों एवं स्त्रियों में जीव विज्ञानी विभाजन है। प्रत्येक समाज में लिंग के आधार पर भूमिकाओं का विभाजन होता है। स्त्री जिसका अधिकतर श्रम एवं समय घरेलू कामकाज में व्यतीत होता है।

स्त्रियाँ केवल छोटे-छोटे कार्य ही कर पाती हैं, क्योंकि वे सन्तानें की देखभाल, उनका लालन-पालन उचित ढंग से करने में ही अपना सम्पूर्ण समय व्यतीत कर देती हैं। पुरुष केवल बाहरी कार्य करते हैं, जैसे-युद्ध, शिकार, मछली पकड़ना तथा गाएँ चराना आदि कार्य करते हैं।

घर के अन्दर पुरुष केवल अधिकारों और कर्त्तव्यों से संबंधित निर्णय लेते हैं। पुरुष ही गाँव की नीतियाँ तथा कानून का निर्धारण करते हैं।

गाँव में निर्णयकर्ता पुरुष ही होते हैं। यही वंश परम्परा परिवार में भी चलती रहती है, महत्त्वपूर्ण निर्णयों को लेने का कार्य पुरुष द्वारा ही किया जाता है।

अनेक जनजातीय समाजों में लिंग के आधार पर पृथक्करण देखने को मिलता है। उदाहरणार्थ, तंगखुल नामाओं के मध्य लड़के व लड़कियों के लिए युवा विश्राम तंत्र हैं, जिन्हें मायरलोंग तथा शानाओलोंग कहते हैं।

मायरलोंग पुरुषों के लिए विश्रामगृह होते हैं और शानाओलोंग स्त्रियों के लिए बनाए गए विश्रामगृह कहलाते हैं।

(iii) आयु के आधार पर विभेदीकरण-सभी समाजों में आयु के आधार पर जनसंख्या का विभाजन होता है। एक समय आने पर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमता व परिपक्वता क्षीण अवश्य होती है।

बच्चा एवं वयस्क कार्य को अपने-अपने ढंग से करने का प्रयास करते हैं, जिस कार्य को युवा सरलता से कर सकता है परन्तु वयस्क उसी कार्य को उतनी सरलता से नहीं कर पाता, क्योंकि उसकी शक्ति का ह्रास हो चुका होता है। MSO 04 Free Assignment In Hindi

जनजातियों के अन्तर्गत बालक की युवावस्था में प्रवेश करने के लिए कुछ रीति-रिवाजों को निभाना पड़ता है। रीति का तात्पर्य युवक व युवती की औपचारिक मान्यता से है, जिससे वे समाज की परम्पराओं और प्रथाओं के अनुसार एक वयस्क की भूमिका को निभा सकें।

इस प्रथा को ‘मार्ग प्रथा’ के नाम से जाना जाता है। उदाहरणार्थ, नागाओं में इस प्रकार की प्रथा प्रचलित होती है। इन लोगों में विवाह द्वारा ही व्यक्ति ग्राम परिषद में सदस्यता के योग्य हो पाता है।..

(iv) स्थान तथा अनुक्रम के आधार पर विभेदीकरण- जनजातीय समाज में वंश के आधार पर व्यक्ति की प्रस्थिति निर्धारित होती है।

विभेदीकरण की इस अवधारणा को ‘स्थान पद्धति’ के नाम से जाना जाता है। समाज में कुछ वंश दूसरे वंशों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं एवं उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।

कुछ अन्य समाजों में उच्च कुल को ‘शाही खानदान’ की संज्ञा दी जाती है। दूसरी ओर निचले कुल वालों को सामान्य समझा जाता है। नागाओं में, गाँवों के मुखिया को गाँववासियों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ प्रस्थिति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त उसे विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं,

जैसे खेती के काम एवं गाँववासियों की मकान का निर्माण करने में मुफ्त तथा स्वयं सेवा करना। थरुसों व भूटिया जनजाति में समुदाय दो भागों में विभाजित होता है-श्रेष्ठ तथा निम्न। श्रेष्ठ वर्ग जिसके अन्तर्गत ‘कुरी’ नामक अनेक सजातीय उपविभाजन होते हैं। MSO 04 Free Assignment In Hindi

बाथा, बिर्तिया, दहैत, बदवैत और माततुम, जो समूह राणा समूह कहलाता है। यह थारू समुदाय के अन्य समूहों से श्रेष्ठ मानती हैं। इन समूहों में आपस में वैवाहिक सम्बन्ध एवं भोज भी नहीं किया जाता है।

आंध्र प्रदेश के अंध में भी समुदाय के अन्दर ही अनुक्रम की अवधारणा होती है। इसके भी दो वर्ग हैं-बरताती एवं खलताती। पहला वर्ग-स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ मानता है। इन दोनों वर्गों में भी आपस में वैवाहिक सम्बन्ध बनाने पर निषेध होता है।

(v)व्यवसाय के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण-जनजातीय समाजों में दो प्रकार के मिलते-जलते तरीकों में भमिकाओं के विभेदीकरण को समझा जा सकता है-परम्परागत और आधुनिक परम्परागत अर्थ में-हम परिवार भूमिका को मुख्य रूप से संसाधनों के उत्पादन तथा उसके उपयोग पर आधारित एक मुख्य घटक स्वरूप देखते हैं।

इसके अन्तर्गत सामाजिक विभेदीकरण मुख्य रूप से लिंग, आयु विशेषज्ञता तथा अन्य प्रस्थितियाँ, जैसे-पिता, माता, पुत्र आदि पर आधारित होता है। इसलिए प्रत्येक सदस्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी भूमिका का निर्वाह समाज के नियमों के अनुरूप करें।

यद्यपि सदस्यों के व्यवसाय सुनिर्धारित नहीं होते हैं, क्योंकि एक व्यक्ति जो एक व्यवसाय को करने में अच्छा है, सफल है, वह अन्य व्यवसायों में भी सफल हो। उदाहरणार्थ, एक किसान एक सर्वश्रेष्ठ कारीगर भी हो सकता है और कभी-कभी नहीं हो सकता है।

इसी प्रकार गाँव में भी गाँववालों के द्वारा मान्यता प्राप्त कुछ भूमिकाओं एवं प्रस्थितियों का विभेदीकरण होता है। मुखिया से अनेकों प्रकार की भूमिकाएँ निर्वाह करने की अपेक्षा की जाती है। गाँव का संस्थापक ही गाँव का प्रथम नागरिक माना जाता है,

जो अपनी प्रस्थिति के कारण विशिष्ट भूमिकाएँ एवं प्रकार्य पूर्ण करता है। इसके अतिरिक्त आधुनिक शिक्षा, आधुनिकीकरण तथा व्यवसाय एवं विशेषज्ञता के विस्तार की आवश्यकता के कारण अधिक विस्तृत और विभेदीकृत भूमिकाओं एवं व्यवसायों की माँग पैदा हुई है।

इसलिए व्यवसाय के आधार पर विभेदीकरण आधुनिक जनजातीय स्थिति में आज भी विद्यमान है।

व्यवसाय और देश के विभेदीकरण के कारण जनजातीय समाजों के विभेदीकरण के कारण जनजातीय समाजों में भी वर्ग व्यवस्था उभरकर सामने | आयी है।

(vi) शिक्षा के आधार पर विभेदीकरण-आधुनिक समय में सामाजिक विभेदीकरण के लिए शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण घटक है। ‘शिक्षा’ ही समकालीन जगत में प्रत्यक्ष रूप से व्यावसायिक उपलब्धियों को प्रभावित करती है। ष्ठिाक्षा को निरपेक्ष और आत्मनिर्भर घटक नहीं समझा जाना चाहिए।

शिक्षा सदैव वर्ग, जाति, प्रजाति और स्थान की पृष्ठभूमि से प्रभावित रहती है। यह बात विश्व के विभिन्न भागों में रह रहे जनजातीय तथा स्वदेशी लोगों के विजय में भी सत्य है।

भारत में जनजातीय लोगों के मध्य सामाजिक विभेदीकरण यह प्रकट करता है कि शिक्षित जनजातिगत लोग बाहर जाकर अच्छी नौकरियाँ ढूँढ़ते हैं,

जिससे उनका सामाजिक विकास उचित दिशा में हो सके और वहाँ के नियमों व संस्कृति को भी अपना सकें। इसके द्वारा जनजातिगत लोग धीरे-धीरे अपने मौलिक सामुदायिक जीवन से अलग हो जाते हैं

चाहे वह अपने पूर्व संस्कारों को भी नहीं भूल पाए, परन्तु बाहरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने का अवश्य प्रयास करते हैं।

शिक्षित जनजातीय लोगों के दूसरी पीढ़ी के बच्चों ने अपने समुदाय के सांस्कृतिक मूल्यों तथा नियमों को खो दिया है, क्योंकि सामाजिक विभेदीकरण को प्रभावित करने वाला शिक्षा का तत्त्व अधिकांश जनजातीय क्षेत्रों में प्रभावी हो गया है।

(vii) धर्म के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण-जनजातीय समाजों में धर्म के आधार पर दो प्रकार का सामाजिक विभेदीकरण देखने को मिलता है-‘प्रदत्त’ एवं ‘अर्जित’। परम्परागत समाजों में प्रदत्त स्थानों तथा प्रस्थितियों के कारण विभेदीकरण देखने को मिलता है।

प्रत्येक जनजाति कुछ सदस्यों को मान्यता देती है चाहे वे छोटे हों अथवा बड़े, पुरुष हों या महिलाएं। उदाहरण के तौर पर तंगखुल नागाओं में गोत्र के मुखिया का धार्मिक रूप से यह दायित्व होता है, जिसे पूर्ण करना पड़ता है

चाहे यह दायित्व कृषि से सम्बन्ध रखता हो और चाहे वह कटाई से संबंधित हो आधुनिक समय में विभेदीकरण की यह विधि अत्यन्त जटिल एवं जनजातीय समाजों से भिन्न है।

एक जनजातीय समह दसरे धर्म के मानने वाले जनजातीय अथवा और जनजातीय समूह से अलग होता है। एक धार्मिक समूह के अन्तर्गत भिन्न संस्थाओं और सम्प्रदायों ने सामाजिक विभेदीकरण उत्पन्न कर दिया है।

धर्म की असमानता के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण जनजातिगत लोगों में भी विद्यमान होता है।

(viii) भाषा के आधार पर विभेदीकरण-जनजातीय समाजों में सामाजिक विभेदीकरण लाने में भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है।

भाषा भिन्नता के आधार पर सामाजिक समूहों का विभेदीकरण होता है चाहे वह जनजाति समुदायों के बीच हो या जनजाति और गैर-जनजातीय समुदायों के मध्य एक ही जनजातीय और गैर-जनजातीय भाषा बोलने वाले लोग बहुत निकट सम्बन्धी लगने लगते हैं,

क्योंकि वे इसी के आधार पर अपने-आपको जनजातीय बन्धु निकट सम्बन्धी लगने लगते हैं, क्योंकि वे इसी के आधार पर अपने-आपको जनजातीय बन्धु मानते हैं। अतः भाषा और बोली विभेदीकरण भी सामाजिक पृथक्करण तथा सामाजिक विभेदीकरण में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाते हैं।

(ix) संगठन के आधार पर विभेदीकरण-जनजातीय समाजों में सामाजिक संरचना नातेदारी और सम्बन्धों पर आधारित होती है। गोत्र सम्बन्ध, प्राय: अधिकांशतः एक या अधिक गाँवों में फैले हुए हैं यह सभी समाजों में विद्यमान है।

जनजातीय समाजों में नातेदारी और सम्बन्धों के उत्तरदायित्व से हटकर कुछ सम्बन्ध होते हैं, जैसे-कुछ लक्ष्यों एवं लाभ की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सम्बन्ध जोड़ना।

लिंग तथा आयु के आधार पर भी संगठन होते हैं। उदाहरणार्थ, धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक उद्देश्यों के लिए भी महिला समाज का होना।

अविवाहित पुरुषों व स्त्रियों के लिए ‘युवा क्लब’ भारत के अनेक जनजातीय समाजों में होते हैं। मणिपुर के जनजातीय लोगों में इस पद्धति को ‘अरूप’ अर्थात दोस्ती या सहयोग देना कहते हैं।

कई स्थानों पर व्यक्ति ‘क्रेडिट संगठन’ या ‘कोपेरेटिव’ के रूप में आर्थिक कार्यों के संगठन भी चलाते हैं, जिसमें सदस्य समय-समय पर एक निश्चित धनराशि देते हैं और क्रमानुसार लाटरी के आधार पर पैसा लेते हैं। अतः संगठन के आधार पर विभेदीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

(x) क्षेत्र तथा भौतिक वातावरण के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण-क्षेत्र तथा भौतिक वातावरण के आधार पर विभेदीकरण जनजातीय समाजों की एक विशिष्टता है।

यह अवधारणा आन्ध्र प्रदेश के चंचु जैसे सरल जनजातीय समाज से लेकर मीजो और नागा जैसे अधिक विकसित जनजातीय समूहों में विद्यमान है।

हिमाचल प्रदेश के गद्दी जैसे समाजों में भी क्षेत्रीयता की अवधारणा देखी जाती है। कुछ नागा जनजातियों में जनजाति का एक प्रकार का द्विविभाजन होता है, परन्तु उसमें क्षेत्रीय विभेदीकरण बना रहता है।

इस प्रकार, क्षेत्रीय स्थानीय समूह अन्य भारतीय जनजातियों, जैसे-छत्तीसगढ़ के कमार, आंध्र प्रदेश के चंचु में देखने को मिलती है।

मौसम के आधार पर भी विभेदीकरण होता है। समाज में मौसम के विभक्तिकरण के कारण ही प्रत्येक मौसम से जुड़े कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। परिवर्तन भी सामाजिक विभेदीकरण उत्पन्न करने में अपनी भूमिका निभाता है।

प्रश्न 9. प्रवसन क्या है? क्या आप भारत में विद्यमान प्रवसन के कुछ पैटों की पहचान कर सकते हैं? चर्चा कीजिए।

उत्तर-प्रवासन का अर्थ-प्रवासन का तात्पर्य है आवास का परिवर्तन। प्रवासन शब्द का अर्थ भौगोलिक क्षेत्र में पशुओं और पक्षियों

जैसे जीवों का संचालन है। यह एक स्थान से दूसरे स्थान की, व्यक्तिगत रूप से आवास समूहों में, लोगों के संचलन की ओर संकेत करता है।साधारण बोलचाल की भाषा में प्रवासन का अर्थ जनसंख्या के आवागमन से लिया जाता है।

अन्य शब्दों में, मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान को आता-जाता रहता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका सामान्य निवास बदल जाता है। मनुष्य के निवास स्थान के परिवर्तन की इस घटना को प्रवासन कहते हैं।

डेविड एम. हीर के अनुसार, “प्रवासन या देशान्तरण का अर्थ है, अपने स्वाभाविक निवास को परिवर्तित कर देना।”

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “प्रवासन निवास स्थान को परिवर्तित करते हुए एक भौगोलिक इकाई से अन्य भौगोलिक इकाई में विचरण का एक स्वरूप है।”

काइस अन्य भागालिक इकाई में उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि देशान्तरण या प्रवासन के अन्तर्गत निवास में परिवर्तन हो जाता है तथा यह परिवर्तन अल्पकालीन न होकर दीर्घकालीन एवं स्थायी होता है।

साथ ही देशान्तरण के लिए किसी भौगोलिक इकाई को पार करना भी आवश्यक होता है।

प्रवासन के अन्तर्गत दो प्रकार की गतिशीलता हो सकती है। जब कोई व्यक्ति अपना देश छोड़कर दूसरे देश में जाकर बसता है, उसे परदेशवासी या बहिर्गन्तुक तथा स्वदेश छोड़कर बाहर जाकर बसने की प्रक्रिया को बहिर्गमन कहा जाता है।

इसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश से आकर किसी देश में बसता है तो उसे आगन्तुक या अप्रवासी तथा आकर बसने को अन्तर्गमन या अप्रवास कहा जाता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के जनांकिकी शब्दकोश के अनुसार एक देश के अन्दर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को तथा किसी स्थान पर अन्य जगहों से आने को कहा जाता है।

राष्ट्रीय सीमा को जब पार कर लिया जाता है तब इसके लिए एवं शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका के जनगणना ब्यूरो ने उन व्यक्तियों को जो एक देश छोड़कर दूसरे देश में चले जाते हैं

उन्हें देशान्तर अथवा प्रवास में सम्मिलित किया है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं उन्हें विचरणकर्ताओं में सम्मिलित किया है।

इस प्रकार वहाँ विचरणकर्ताओं व प्रवासित शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
आदिकाल से ही मानव घुमन्तू प्रवृत्ति का रहा है।

वह भूमि एवं साधनों की खोज हेतु, महामारियों, युद्ध, अत्याचार, भेदभाव के कारण तथा उन्नत जीवन की आशा में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसता रहा है। इस तरह जनसंख्या के प्रवास का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं विश्वव्यापी रहा है।

यदि हम इतिहास पर दष्टि डालें तो स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है कि ईसा से पर्व आर्य मध्य एशिया से आकर भारत में बसे। मध्यकाल में अंग्रेज एवं फ्रांसीसी उत्तरी अमेरिका एवं आस्ट्रेलिया को प्रवासित हुए।

स्पेनी एवं पुर्तगाली दक्षिणी अमेरिका में बसे। यहूदी एवं अरबी लोग उत्तरी अफ्रीका एवं अरब से यूरोप में जा बसे।

इस तरह विभिन्न देशों का इतिहास प्रवास की घटनाओं से भरा पड़ा है। लम्बे समय तक अथवा स्थायी रूप से जाने को ही प्रवासन कहा जाता है।जन्म, मृत्यु एवं देशान्तरण किसी देश की जनसंख्या को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।

अतः इन तीनों कारकों का अध्ययन करना आवश्यक समझा जाता है। जन्म का अध्ययन हम प्रजननशीलता के अन्तर्गत तथा मृत्यु का अध्ययन मृत्युक्रम के अन्तर्गत करते हैं। प्रावैगिक जनांकिकी का अध्ययन तब तक अधूरा समझा जाता है जब तक कि देशान्तरण का अध्ययन न किया जाए।

किसी समुदाय में जनसंख्या की वृद्धि तीन कारकों से संभव हो सकती है। उस समुदाय में जन्म लेने वालों की संख्या बढ़े, उस समुदाय में मरने वालों की संख्या घटे अथवा उस समुदाय में बाहर से व्यक्ति आए।

इसी प्रकार समुदाय की जनसंख्या में कमी भी तीन तरह से सम्भव है-उस समुदाय में मरने वालों की संख्या में वृद्धि हो, जन्म लेने वालों की संख्या में कमी आए अथवा उस समुदाय से कुछ लोग बाहर चले जाएं।

इस तरह, प्रवास किसी समुदाय की जनसंख्या के वितरण को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है। किसी समाज में बाहर से व्यक्तियों का आगमन अथवा उस समुदाय से बहिर्गमन को ही संक्षेप में निर्वासन या प्रवासन कहा जाता है।

देशान्तरण एक महत्त्वपूर्ण घटना है, जो जनसंख्या के आकार, वितरण तथा संरचना को शीघ्र प्रभावित करती है। प्रजननशीलता तथा मृत्यु जनसंख्या को बहुत धीमी गति से प्रभावित करते हैं

तथा उनके परिवर्तनों का पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है जबकि प्रवास एक आकस्मिक घटना है, जिसमें किसी प्रकार की निश्चितता नहीं होती है तथा इसका मापन तथा अनुमान लगाया जाना संभव नहीं होता। यदि

व्यक्तियों के एक बड़े समूह का एक साथ स्थानान्तरण हो जाए, तब इससे देश की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था, सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था में खलबली मच जाती है। यह सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार तथा जनसंख्या की संरचना आदि में परिवर्तन ला देती है।

प्रवासन का सम्बन्ध आर्थिक उतार-चढ़ावों, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं, भौतिक पर्यावरणों की प्रकृति, समूह के सामाजिक संगठन, भौगोलिक, राजनीतिक तथा जनसंख्या सम्बन्धी कारकों से घनिष्ठतम रूप से होता है। यही कारण है कि प्रवासन जनांकिकी के अध्ययन का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

इस सम्बन्ध में अपने मत व्यक्त करते हुए विभिन्न विचारकों के विचार निम्नलिखित हैं-

प्रो. बर्कले ने लिखा है कि “इन शक्तियों के साथ देशान्तरण वृहद तथा आकस्मिक परिवर्तनों से सम्बन्धित है। इस कारण से इसका अनुमान लगाना प्रायः सम्भव नहीं होता है

तथा अध्ययन करना कठिन होता है। यह आर्थिक उतार-चढ़ावों तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय घटनाओं से अत्यन्त घनिष्ठता से सम्बन्धित है तथा सम्भवतः जनांकिकी में अन्य किसी भी विषय की तुलना में अधिक ध्यानाकर्षक है।”

इस तरह, बर्कले का विचार है कि अनिश्चितता तथा बहुत ही अल्पकाल में भीषण परिवर्तन ला देने की क्षमता के परिणामस्वरूप ही प्रवास का विशिष्ट स्थान है।

प्रो. बर्कले कहते हैं कि अधिकांश शक्तियाँ जब मन्द गति से परिवर्तन लाती हैं तथा इनसे परिवर्तन लाने में समय लगता है। लोगों द्वारा समझदारी, नियंत्रण एवं नियोजन द्वारा इन परिवर्तनों की दिशा बदली जा सकती है तथा इनकी दर धीम की जा सकती है।

अतः एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी के आने के पश्चात प्रजननशीलता एवं मृत्युक्रम में परिवर्तन लाकर जनसंख्या को प्रभावित किया जा सकता है। परन्तु देशान्तरण इन दोनों के विपरीत है।

प्रो. बर्कले के शब्दों में, “प्रवासन सामान्यतया इन प्रक्रियाओं की सामान्य गति को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसका प्रभाव बहुत तेजी से होता है।

इसके द्वारा कुछ महीनों में ही करोड़ों लोगों का स्थानान्तरण हो जाता है तथा इससे लोगों के क्रियाकलापों तथा वितरण में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है।”

इस प्रकार जनसंख्या में परिवर्तन के तीन मौलिक कारक हैं

(1. प्रजननशीलता एवं मृत्युक्रम में परिवर्तन का प्रवासन।
(2. जनांकिकी में प्रजननशीलता तथा मृत्युक्रम का अध्ययन एवं विश्लेषण करना तो सहज है, परन्तु प्रवासन का नहीं।

इसका कारण यह है कि प्रजननशीलता तथा मृत्युक्रम के आँकड़े तो व्यवस्थित ढंग से पंजीकृत किए जाते हैं, परन्तु प्रवासन सम्बन्धी सभी सूचनाओं का पंजीकरण नहीं हो पाता है।

प्रवासन से सम्बन्धित उन्हीं सूचनाओं का रिकॉर्ड रखा जाता है, जो एक देश से दूसरे देश के लिए अथवा स्थायी रूप से दूसरे स्थान के लिए होता है।

व्यावहारिक दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक स्थान परिवर्तन को पंजीकृत करना संभव नहीं हो पाता। प्रवासन को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

समय के आधार पर-अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन प्रवासन। कारणों के आधार पर-आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक देशान्तरण आदि।

पीटरसन ने प्रवासन के पाँच सामान्य वर्ग बताए थे, जो निम्नलिखित हैं-आदिम, बलात, अभिप्रेरित, युक्त एवं व्यापक। प्रो. अल्फ्रेड सौबे ने प्रवासन का वर्गीकरण दो प्रकार से किया है

(i) आर्थिक देशान्तरण एवं (ii) जनांकिकीय देशान्तरण

(i) आर्थिक देशान्तरण-यह वह प्रवासन है, जिसका उद्देश्य आर्थिक स्थिति में सुधार करना होता है।
(ii) जनांकिकीय देशान्तरण या प्रवासन-स्थायी प्रवास से है, जिसमें मनुष्य अपने परिवार के साथ प्रवासित हो जाता है।

आर्थिक प्रवासन में मनुष्य को जब भी अवसर मिलता है वह अपने मूल निवास स्थान पर वापिस चला जाता है, जबकि जनांकिकीर देशान्तरण अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है। यह नए समाज में लिंग अनुपात की समस्या उत्पन्न नहीं करता है।

प्रवासन को एक अन्य तरह से भी वर्गीकृत किया जा सकता है :

(1. स्वतः प्रवर्तित प्रवासन तथा
(2. सुनियोजित प्रवासन।

यदि लोग एकाएक बिना किसी पूर्व योजना के एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चले जाते हैं, तब इसे स्वतः प्रवर्तित प्रवास कहा जाता है।

इस तरह के प्रवासन किसी आकस्मिक राजनीतिक घटनाक्रम अथवा प्राकृतिक आपदा के फलस्वरूप होते हैं। सामान्यतया प्रवास का सामान्य प्रवाह पूर्व नियोजित ही होता है।

सुनियोजित देशान्तरण के अन्तर्गत कुछ लोग किसी स्थान विशेष पर जाकर बस जाते हैं। फिर धीरे-धीरे अपने मित्रों सम्बन्धियों को भी वहीं बुला लेते हैं।

इसके अतिरिक्त कभी-कभी कुछ सरकारें अथवा संस्थाएँ कुछ किसी विशिष्ट योग्यता वाले व्यक्तियों को कुछ विशेष सुविधाओं का प्रलोभन देकर बुला लेती हैं।

वर्तमान समय में अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास सुनियोजित एवं संगठित संस्थाओं के माध्यम से ही होता है। प्रवासन का वर्गीकरण सामान्यतया निम्नलिखित रूप में किया जाता है
(i) आन्तरिक प्रवासन (ii) अन्तर्राष्ट्रीय प्रवासन

(i) आन्तरिक प्रवासन-जब लोग किसी देश के अन्तर्गत एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं, तो उनका यह स्थानान्तरण आन्तरिक देशान्तरण कहलाता है; जैसे-यदि कोई व्यक्ति वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से जाकर मुम्बई (महाराष्ट्र) में बस जाता है तब इसे आन्तरिक प्रवासन कहा जाता है।

प्रो. डोनाल्ड जे. बोग की धारणा है कि आन्तरिक प्रवास के अन्तर्गत अन्तर्गमन के लिए In-migrantion शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। जबकि बहिर्गमन के लिए Out-migration शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए।

In-migrant से तात्पर्य “ऐसे प्रवासी से है, जो एक राष्ट्र की सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरी जगह जाकर बस जाता है, जबकि दूसरे देश से आकर बसने को आव्रजन (Immigration) कहा जाता है।”

उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश से आकर दिल्ली में बस जाता है तो दिल्ली की दृष्टि से वह In-migrant कहलाएगा।

इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति इंग्लैण्ड से आकर कोलकाता में बसता है, तब यह अन्तर्राष्ट्रीय प्रवासन Immigration कहलाता है।

यदि कोई किसी स्थान या प्रदेश राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत है, तब इस प्रकार के बहिर्गमन को Out migration कहा जाएगा। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र की सीमाओं को पार कर दूसरे राष्ट्र में चला जाता है तब उसे Emigrant कहा जाएगा।

आन्तरिक प्रवासन का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है :

(i) वैवाहिक देशान्तरण (ii) अन्तर्घान्तीय देशान्तरण (iii) गाँव-शहर देशान्तरण (iv) सम्बद्धताजन्य देशान्तरण

(i) वैवाहिक देशान्तरण या प्रवासन-वैवाहिक प्रवासन वर अथवा वधू के कारण घटित होता है। इस तरह के प्रवासन गाँव से शहर, शहर से शहर, शहर से गाँव अथवा गाँव से गाँव को हो जाता है।

कभी-कभी इस तरह का देशान्तरण अन्तर्राष्ट्रीय भी हो सकता है, परन्तु इनकी संख्या नगण्य होती है।

(ii) अन्तान्तीय प्रवासन-इस तरह का प्रवासन किसी देश की सीमा के अन्तर्गत एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में होता है। इस तरह के देशान्तरण का निर्धारण प्रान्तीय सीमाओं के अन्तर्गत होता है।

(iii) गाँव-शहर प्रवासन-गाँव-शहर देशान्तरण चार प्रकार के हो सकते हैं

(1. गाँव से शहरों की ओर प्रवासन।
(2. गाँव से गाँव की ओर प्रवासन।

(3. शहरों से गाँव की ओर प्रवासन
(4. शहरों से शहरों की ओर प्रवासन।

गाँव से गाँव को प्रवासन रोजगार की तलाश में हो सकता है अथवा गाँव की उन लड़कियों का होता है, जो एक गाँव से दूसरे गाँव में ब्याह दी जाती हैं। शहर से शहर की ओर देशान्तरण नौकरी-पेशा लोगों के स्थानान्तरण के कारण अथवा काम की तलाश में होता है।

शहरी लड़कियों का विवाह भी इसका कारण होता है। गाँव से शहर की ओर प्रवासन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यह विकास के परिणामस्वरूप होता है। यह शहर के खिंचाव तथा गाँव के धक्के के कारण होता है।

शहरीकरण-गाँवों में जमीन व रोजगार की कमी पड़ने के बाद शहरों में बसना ही इसका कारण है। भारत जैसे विकासशील देश में जब गाँवों में कृषि कार्य से लोग फुर्सत पा जाते हैं,

तब कार्य की तलाश में शहरों की ओर चले जाते हैं, परन्तु गाँवों में कृषि कार्य पुनः प्रारम्भ होता है तो वे पुनः गाँवों में वापस आ जाते हैं। इसे Back migration अथवा Reverse Flow कहते हैं।

(iv)सम्बद्धताजन्य प्रवासन-इस तरह के देशान्तरण से अभिप्राय विदेश में नौकरी या व्यवसाय करने गए प्रवासनों के साथ उसके आश्रितों के प्रवासन से है। कमाने वाले सदस्यों का प्रवासन प्रायः एकाकी प्रवासन के रूप में होता है।

वे शहरों में रहकर धन कमाते हैं और गाँव में रहने वाले आश्रितों को धनराशि भेजते रहते हैं, परन्तु एकाकी परिवारों में वृद्धि के साथ सम्बद्धताजन्य प्रवासन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है।

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