IGNOU MSO 01 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

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MSO 01 Free Assignment In Hindi

MSO 01 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

भाग-1

प्रश्न 1. सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस तथा ऐडमंड लीच के योगदान की चर्चा कीजिए।

उत्तर-क्लाउड लेवी स्ट्रास और एडमंड लीच का योगदान-लेवी स्ट्रास फ्रांस के समाजशास्त्री और मानवशास्त्री थे। ब्राजील के विश्वविद्यालय में उन्होंने वर्षों तक समाजशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।

संभवतः सामाजिक संरचना के सिद्धान्त में सर्वाधिक प्रेरक और विवादास्पद योगदान लेवी स्ट्रास का ही था जो अपने श्रेष्ठ, काल्पनिक और सगोत्रीय प्रणाली के अनुप्रस्थ सांस्कृतिक विश्लेषण के लिए विख्यात हैं।

लेवी स्ट्रास के लिए संरचना का अर्थ है लोग। वास्तव सामूहिक रूप से अपने दिमाग में नियम, समूह आदि की जो तस्वीर बनाते हैं, वही संरचना है। लोगों की सोच का जो तरीका है उसकी तुलना अनेक सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं से की जाती है।

उसकी धारणा को संरचनावाद कहते हैं। परंतु यह धारणा दूसरे संरचनावादियों से भिन्न है। लेवी स्ट्रास ने संरचना के बारे में एक दूसरे ढंग से ही चर्चा की है।

सामाजिक संरचना वास्तविक नातेदारी के प्रकारों या मिथकों या टोटम, जो सच है, को नहीं कहते हैं बल्कि संरचना का मतलब है एक मॉडल या नमूने का होना, जो कुछ शर्तों को पूरा करता है।

उदाहरण के लिए, मॉडल से किसी व्यवस्था का पता जरूर लगना चाहिए। व्यवस्था का अर्थ है अनेक चीजें एक साथ इस तरह से जुड़ी हुई हैं कि एक स्थान पर प्रभाव डालने से उसका प्रभाव दूसरे स्थानों पर भी पड़ता है। मॉडल का यह मतलब है कि एक मॉडल आसानी से दूसरे मॉडल में तब्दील हो सके।

उसने कहा कि सामाजिक संरचना के तत्त्व-जैसे भाषा, धर्म, बोली को हम वास्तविक रूप से जानने का प्रयास करें तो ये सामाजि संरचना बढ़ी। MSO 01 Free Assignment In Hindi

दरअसल हम ऐसी तस्वीर या मॉडल बनाते हैं जो हमारी इच्छाओं के अनुकूल होता है; जो कुछ वास्तविक भी होता है। वह कुछ आदर्श भी होता है।

ऐसे मॉडल को स्ट्रास ने संरचना मॉडल कहा, जो एक समाज के लोगों की दिमागी अवस्था, उसमें उनके सोच के तरीके और उनके सामाजिक और आर्थिक अवस्था पर निर्भर करता है।

इसीलिए उसने कहा कि सामाजिक संरचना का आभास होना एक मानसिक प्रक्रिया है और यह समाज में मनोवैज्ञानिक यथार्थ के रूप में उपस्थित होता है।

लेवी स्ट्रास ने सामाजिक संरचना को समझने के लिए मॉडल को दो हिस्सों में बाँट दिया। उसने कहा कि सामाजिक संगठनों के विशाल अस्तित्व के लिए मॉडल बनाने की आवश्यकता है जिससे तुलना करके वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है।

उसके अनुसार फ्रांस के समाजशास्त्रियों ने इस मामले में मानव विज्ञान की मदद ली, जिससे एक प्रक्षेपित तस्वीर उभर सके। उसने कहा कि इस प्रकार का मॉडल यांत्रिक मॉडल कहलाता है।

ऐसे मॉडल में मॉडल के तत्त्व उसी पैमाने पर शामिल किए जाते हैं जैसा उस घटना या संरचना में होता है।

इसका सरल अर्थ यह है कि उन सभी चीजों या सूची को जो वास्तव में है उनके मानसिक प्रतिरूप को शामिल करते हैं।

उसके अनुसार, सांख्यिकी का मॉडल वह है जिसमें घटना के भिन्न पैमानों पर प्रतिरूपों को जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए सामाजिक संरचना में जो है उसके स्वरूपों को अथवा जो वास्तव में नहीं है उसके मूल स्वरूपों को शामिल कर लेते हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

स्वयं स्ट्रास ने यह नहीं कहा कि स्केल या मापक से वे क्या समझते हैं। इस समस्या को एडमंड लीच जो उससे प्रभावित था और जो उसकी आलोचना करता था, ने सांख्यिकी मॉडल को समझने की कोशिश की है।

उसने कहा कि विधि के नियम यांत्रिक मॉडल के अंग हैं और ये नियम गिने जा सकते हैं और जिनकी निश्चित संख्या है,

उसे सांख्यिकी मॉडल कहते हैं। विधि के नियमों में गुणात्मकता होती है और व्यवहार का यह तरीका सामाजिक अनुशासन से स्वीकृत होता है। दूसरी ओर सांख्यिकी का मॉडल केवल व्यक्तियों द्वारा किए गए व्यवहार का औसत होता है।

लेवी स्ट्रास और लीच दोनों ही मानते हैं कि उनकी सामाजिक संरचना वास्तविक नहीं है वरन् केवल यह औसत प्रतिमान है जो इस रूप में वास्तविकताओं का पता कर लेते हैं। पर असल मॉडल तैयार करना एक औसत प्रारूप को तैयार करना है।

अधिकतर आलोचकों ने यह कहा कि दो अमूर्त मॉडल में सम्बन्ध बिठाना आसान है, परंतु एक यथार्थ और अमूर्त मॉडल में सम्बन्ध स्थापित करना बहुत कठिन है। इस प्रकार माना गया कि सामाजिक संरचना का मॉडल बनाने से लाभ है।

इससे संरचनावादी उन तत्त्वों को अलग कर देते हैं जो वास्तविकता से जुड़े हैं। दूसरी ओर सामाजिक संरचना के अमूर्त तत्त्व भी लोगों के दिमाग में साफ होने लगते हैं।

लेवी स्ट्रास ने एक संरचना का निर्माण किया। वैसे तो वे ब्राउन से एकदम अलग हैं लेकिन संचार की संरचना के लिए दोनों एक ही बात करते हैं। सामाजिक संरचना संचार से सक्रिय होती है। संरचना कोई मनमानी चीज नहीं है। यह नियमों पर आधारित होती है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

संरचना के स्वरूप की चर्चा की जाती है, उसके तत्त्व की नहीं। यानी उसने बराबर गणित की चर्चा की तथा उससे जुड़े रहे। इसके चलते ही वे संरचना की एक काल्पनिक गणितीय धारणा उपस्थित कर देते हैं।

लेवी स्ट्रास ने संरचनात्मक भाषा विज्ञान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि भाषा सामाजिक संरचना का अंग है। पहले नातेदारी का सम्बोधन भाषा से जुड़ा था अथवा ऐसा माना जाता था। इसलिए नातेदारी की जानकारी के लिए भाषा की चर्चा की जाती थी।

लेवी स्ट्रास ने इस तरह की चर्चा को असम्बद्ध कहा और कहा कि भाषा की संरचना जानने से हम उन बातों की जानकारी प्राप्त कर लेंगे।

संरचनात्मक भाषाशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें भाषा के साथ-साथ नातेदारी, परिवार, विवाह जैसी चीजों की धारणा बनी रहती है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि वास्तविकता क्या है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम देखना क्या चाहते हैं।

लेवी स्ट्रास ने कहा कि भाषा और संस्कृति अपनी संरचना में एक जैसी हैं और यह भी कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे के समान हैं। भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से कार्यों में भी समान हैं।

ऐसे वक्तव्य में स्ट्रास ने भाषा को बहुत महत्त्वपूर्ण माना। उसने कहा कि सभी समस्याएं भाषा की हैं। भाषा संस्कृति का सबसे उत्तम तत्त्व है। हम सभी चीजों को भाषा के माध्यम से जानते हैं।

नातेदारी और परिवार तथा विवाह के अध्ययनों के सम्बन्ध में उसने कहा कि नियम नातेदारी को निर्देशित करता है। यह इन निषेधों पर निर्भर करता है, जो स्वप्न को भी निर्देशित करता है।

एक उदाहरण देकर उसने कहा कि निकट सम्बन्धों में यौन सम्बन्ध का जो निषेध है, वह स्त्रियों के विनिमय से सम्बन्धित है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

जानवरों में यौन सम्बन्ध सभी से बनते है, परंतु मानव में निषेधों के चलते एक श्रृंखला बन जाता है। अपनी पुस्तक ‘टोटमवाद’ में उसने उन प्राकृतिक वस्तुओं, कुलों के प्रतीकों को अलग-अलग रूप से चुना। टोटमवाद से प्रकृति और संस्कृति के सम्बन्ध का पता चलता है।

टोटम की चर्चा करते हुए स्ट्रास ने कहा कि इसके द्वारा अपने समूह के बाहर विवाह करने के नियम का पता चलता है।

आदिम जातियों की मानसिक अवस्था लगभग पिछड़ी हुई होती है और यह मिथकों को विकसित करती है एवं इसका इस्तेमाल करती है। वे कहते हैं कि ये एक तरह से वे मानसिक मान्यताएँ हैं, जिनका व्यवहार पर असर पड़ता है।

स्ट्रास की प्रशंसा इसलिए की जाती है कि उसने हमारी मानसिक प्रक्रिया, मूल्य प्रभावित उपकरण और एक नियमित छवि निर्मित करने की प्रक्रिया को उजागर किया है।

उसकी आलोचना इसलिए की जाती है कि यह सिद्धान्त बड़ा अस्पष्ट है और इसने अनेक चीजों को एक साथ मिला दिया है।

सारांश-सामाजिक संरचना एक ऐसी महत्त्वपूर्ण अवधारणा है जिस पर लगभग हर समाजशास्त्री एवं मानवशास्त्री ने अपना योगदान दिया है, चाहे वह समाज के एक भाग का ध्यान आकर्षित करने से सम्बन्धित हो या पहले के विचारों का समर्थन या फिर सामाजिक संरचना का सिद्धान्त।

वास्तव में सामाजिक संरचना से सम्बन्धित बहस दो विज़यों पर आधारित है। पहला समाज के किस भाग में संरचनात्मक सम्बन्ध है और दूसरा सामाजिक संरचना वास्तविक है अथवा मानक, शोधकर्ता जिसका निर्माण करते हैं। सामाजिक संरचना पर दो श्रेष्ठ विचारों से लेवी स्ट्रास संरचना सम्बन्धी अपनी प्रणाली से जुड़े हुए हैं,

इनके अनुसार सामाजिक संरचना वह प्रतिमान है जो सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करने के लिए बनाई गई है। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार सामाजिक संरचना एक आनुभविक सत्ता है।

ब्राउन ने लेवी स्ट्रास संरचना के बारे में असहमति प्रकट की और कहा कि प्रतिमान के रूप में सामाजिक संरचना का विचार भ्रांतिमूलक है। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार शब्द संरचनात्मक प्रकार लेवी-स्ट्रास के शब्द प्रतिमान के समान हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

मानवशास्त्री एस.एफ. नाडेल ने ब्राउन और स्ट्रास के विचारों को मिलाने का प्रयास किया। अपनी पुस्तक ‘द थ्योरी ऑफ सोशल स्ट्रक्चर’ नाडेल इस बात से असहमत थे कि सामाजिक संरचना एक आनुभविक वास्तविकता है।

उसने इस बात से अहसमति जताई कि सामाजिक संरचना का वास्तविकता से कुछ लेना-देना नहीं है।

उन्होंने ब्राउन के इस मत को स्वीकार किया कि प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक संरचना में एक अलग पहचान रखता है, किन्तु अन्तर्वैयक्तिक प्रभाव की आनुभविक वास्तविकता इंद्रियगोचर सत्ता से अमूर्त स्तर की ओर चले गए जहाँ व्यक्ति ऐसा अभिनेता बन जाता है, जो अन्य से सम्बन्धित भूमिका को अभिनीत करता है।

उन्होंने सामाजिक संरचना को परिभाषित करते हुए कहा कि हम मूर्त जनसंख्या और इसके संव्यवहार से अमूर्त द्वारा समाज की संरचना तक पहुँचते हैं, जो अभिनेताओं के दूसरे से सम्बन्धित उनकी अभिनय क्षमता में प्राप्त सम्बन्धों की प्रतिमान या पद्धति है।

इनके अलावा कुछ अन्य समाजशास्त्रियों ने भी सामाजिक संरचना में भूमिका को महत्त्व दिया है। पारसन्स के अनुसार सामाजिक पद्धति की संरचना ‘मानकीय संस्कृति का संस्थात्मक प्रतिमान है।

‘ सामाजिक संरचना का उद्देश्य मानवीय संव्यवहार को नियंत्रित करना है। पीटर ब्ला ने भी सामाजिक स्थितियों के बारे में कहा कि इनके मध्य जनसंख्या का विभाजन होता है।

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प्रश्न 3. मार्क्स और वेबर की विचारधाराओं की विशिष्टता की जाँच कीजिए।

उत्तर-कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर दोनों ही जर्मनी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैं तथा इन दोनों को आगस्त काम्टे और हरबर्ट स्पेन्सर के साथ समाजशास्त्र के अग्रदूत की संज्ञा दी गई है।

मार्क्स तथा वेबर दोनों ने पूँजीवादी व्यवस्था, धर्म, वर्ग और सत्ता पर अपनी व्याख्याएँ अलग-अलग तरीके से की हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

धर्म के बारे में कार्ल मार्क्स का मानना है कि मानव जीवन, विश्वास आदि पर भौगोलिक परिस्थिति, जनसंख्या वृद्धि आदि कारकों का प्रभाव अवश्य ही पड़ता है।

परंतु इनको निर्णायक कारक के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उन साधनों को ढूँढ़ने की होती है,

जिनके द्वारा उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके ताकि उसका शारीरिक अस्तित्व बना रहे। मनुष्य पहले जीवित रहेगा तब कहीं वह इतिहास का, समाज का, दर्शन, धर्म आदि का निर्माण कर सकेगा।

इसलिए प्रथम विषय जीवन है, फिर कहीं धर्म आदि का विषय आता है। जीवित रहने के लिए मनुष्य को भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता होती है तथा उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन की आवश्यकता होती है तथा इसके लिए उत्पादन के साधनों की जरूरत पड़ती है।

इसके साथ-साथ उसे अन्य व्यक्तियों के साथ इस सन्दर्भ में उत्पादन सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। इसी आधार पर वह कहता है कि जब हल-बैल उत्पादन के साधन थे,

तो किसान और जमींदार के बीच एक निश्चित प्रकार का सम्बन्ध था। पर जब मशीन उत्पादन का साधन बना, तो उस सम्बन्ध ने बदलकर पूँजीपति और श्रमिक के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों का रूप ग्रहण कर लिया।

उत्पादन-साधनों के सम्पूर्ण योग से ही समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण होता है जो कि वास्तविक नींव है, जिसके अनुसार मानव जीवन के अन्य पक्षों; जैसे-वैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक, बौद्धिक या धार्मिक जीवन आदि का निर्माण होता है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार धर्म कारण नहीं, बल्कि आर्थिक व्यवस्था का परिणाम होता है। इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक समय में विकसित होने वाले प्रोटेस्टेंट धर्म का कारण भी आर्थिक व्यवस्था है। स्पष्ट शब्दों में प्रोटेस्टेंट धर्म पूँजीवाद के विकास का उपोत्पाद है।

मार्क्स के ठीक विपरीत मैक्स वेबर का मत है कि प्रोटेस्टेंट धर्म में अनेक आर्थिक आचारों का समावेश है जिसने पूँजीवाद का विकास किया है।

वेबर का कथन है कि यद्यपि पूँजीवाद के विकास में प्रोटेस्टेण्ट धर्म एकमात्र कारण तो नहीं है, फिर भी इसके बिना आधुनिक पूँजीवाद का विकास उस सीमा तक सम्भव नहीं था

जैसा कि आज हम देख रहे हैं। यही कारण है कि पूँजीवाद का सर्वोत्तम विकास आज प्रोटेस्टेण्ट धर्म को मानने वाले देशों में ही हुआ है।

इस रूप में वेबर के अनुसार सामाजिक जीवन और आर्थिक संगठन में धर्म का अपना महत्त्व है, जबकि मार्क्स का विश्वास है कि धर्म जनता के लिए अफीम के समान है। यह केवल निरर्थक ही नहीं, अपितु प्रगति के पथ पर एक रोड़ा भी है।

पूँजीवाद की प्रकृति के सम्बन्ध में भी मार्क्स और वेबर के विचार अलग-अलग हैं। मार्क्स के अनुसार पूँजीवाद की प्रकृति श्रमिकों के शोषण के अनुकूल है।

पूँजीवादी व्यवस्था वास्तव में शोषण की व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत धन या उत्पादन के साधन केवल कुछ इने-गिने व्यक्तियों के हाथ में ही केन्द्रित हो जाते हैं।MSO 01 Free Assignment In Hindi

इसके फलस्वरूप धन का असमान वितरण पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का प्रमुख लक्षण होता है। इसका परिणाम यह होता है कि इस व्यवस्था के अंदर आर्थिक न्याय एक सपना बनकर रह जाता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिक मूल्यों का उत्पादन करता है, परंतु उसका बहुत कम भाग उसे वेतन के रूप में मिलता है।

यह वेतन केवल इतना ही होता है कि श्रमिक और उसके आश्रित किसी तरह जीवित रहते हैं। उनकी निर्धनता, दुख और कष्टों की कोई सीमा नहीं होती।

लेकिन मार्क्स कहता है कि इन शोषणों और अत्याचारों के कारण श्रमिकों में संगठन की भावना और वर्ग चेतना भी आती है, जो कि मार्क्स के अनुसार एक दिन क्रांति के रूप में प्रकट होगी एवं पूँजीवाद का विनाश हो जाएगा

इसके विपरीत वेबर का दृष्टिकोण पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति इतना उग्र नहीं है। चूंकि राजनीति और अर्थशास्त्र को एक साथ मिलाने के पक्ष में हैं; इस कारण पूँजीवाद का विश्लेषण करते समय उन्होंने उसे दो बुनियादी प्रकारों में बाँटा है।

उनके अनुसार एक है-राजनीतिक पूँजीवाद, जिसके अन्तर्गत साम्राज्यवादी पूँजीवाद और वित्तीय पूँजीवाद दोनों आ जाते हैं और दूसरा आधुनिक औद्योगिक पूँजीवाद।

राजनीतिक पूँजीवाद में लाभ कमाने के लिए युद्ध के साधनों को प्रयोग में लाया जाता है और राजनीतिक प्रशासनों पर सर्वोच्च अधिकार स्थापित किया जाता है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

राजनीतिक सत्ता प्राप्त करके उसके माध्यम से लाभ कमाने को राजनीतिक पूँजीवाद कहा जाता है। इसके विपरीत आधुनिक औद्योगिक पूँजीवाद से वेबर का तात्पर्य उस व्यवस्था से है जिसके अन्तर्गत अलग-अलग चीजों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अलग-अलग उत्पादन इकाइयां स्थापित की जाती हैं,

जो पूँजीवादी उत्पादन की पूर्व इकाइयों को कुचलकर उनकी कीमत पर अपना विस्तार करती हैं। यह व्यवस्था वहीं पनप सकती है, जहाँ उसके लिए आवश्यक राजनीतिक, सैद्धान्तिक और कानूनी सुविधाएँ हों।

पूँजीवादी इकाई के लिए किसी निश्चित स्थान पर कारखानों की स्थापना और उन कारखानों में काम करने वाले स्वतंत्र श्रमिकों का होना आवश्यक होता है।

कारखाने का मालिक अपने जोखिम पर कारखाने को चलाता है और बाजारों में प्रतिस्पर्धा करके उत्पादित वस्तुओं को बेचने के लिए आवश्यक प्रयत्न करता है। यह प्रक्रिया बुद्धिसंगत होती है।

मार्क्स की भाँति मैक्स वेबर ने भी व्यापार अथवा वित्त को आधार मानकर उत्पादन की इकाइयों को ही आधुनिक पूँजीवाद का आधार माना है।

परंतु वे मार्क्स के इस मत से सहमत नहीं हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था पूर्णतः एक व्यर्थ संगठन है तथा उसके विनाश से ही सामाजिक हितों की प्राप्ति सम्भव है।

वेबर पूँजीवादी व्यवस्था को तर्कसंगत मानते हैं, लेकिन उन्होंने न तो इस व्यवस्था के अन्तर्गत होने वाली अराजकता पर ध्यान दिया है और न ही इसके लिए कोई स्पष्टीकरण या कारण ही प्रस्तुत किया है।

अतः स्पष्ट है कि मार्क्स और वेबर दोनों ने ही धर्म, पूँजीवाद आदि के सन्दर्भ में अपने-अपने विचार दिए हैं और यहीं तक इन दोनों के बीच समानता है, लेकिन दोनों के इस सन्दर्भ में व्याख्या करने के नजरिए में भिन्नता है।

प्रश्न 5. उद्यमशीलता क्या है? उद्यमशीलता पर स्यूमपीटर के परिप्रेक्ष्य की चर्चा कीजिए।

उत्तर-उद्यमशीलता की अभी तक कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी जा सकी है। इस संदर्भ में विचारकों के विचारों में भी मतभेद है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

कुछ विचारकों के अनुसार कुछ विशेष किस्म के संगठनों के विनिमय के लिए नियमन प्रक्रिया बनाने में प्रशासन का एक अंग और इसके प्रकार्य उद्यमशीलता में शामिल हैं।

कुछ विद्वान सामाजिक या नवीन निर्णयों को इसमें सम्मिलित करते हैं, जबकि अन्य विद्वान आर्थिक संगठनों के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं। ऐतिहासिक संदर्भ में इस शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी शब्द से हुई है, जिसका अर्थ कुछ काम करने के अर्थ में लिया जाता था।

16वीं शताब्दी के दौरान सैन्य अभियानों में जुटे हुए लोगों को उद्यमी कहा जाता था। वास्तव में 17वीं सदी के बाद इस शब्द का प्रयोग सरकारी सड़क, पुल, बंदरगाह और मोर्चे सम्बन्धी संविदाकारों तथा बाद में वास्तुकारों के लिए फ्रांसीसियों द्वारा किया गया।

1800 के बाद इसका प्रयोग शैक्षणिक विषय में किया जाने लगा था, क्योंकि इसका प्रयोग फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों द्वारा किया जाने लगा। उन्होंने उद्यमी को संविदाकार, कृषक, उद्योगपति के रूप में लिया जो जोखिम उठाने वाले पूँजीपति के रूप में देखे जाते थे।

उद्यमशीलता की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि में वेबर और जोसेफ सम्प्टर के विचार बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। सक्म्प्टर ने पूर्व वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए उद्यमी को केवल प्रबन्धक वृत्तीय प्रवाह विकास प्रणाली के रूप में माना जबकि मैक्स वेबर के अनुसार पहचान बनाना एक जटिल काम है।

इन्होंने ‘द प्रोटेस्टेंट एथिक्स एण्ड स्पिरिट ऑफ केपिटलिज्म’ में इस बात की चर्चा की है। उन्होंने पूँजीवाद को समझने के लिए कुछ सैद्धान्तिक आधारों का निर्माण किया।

सम्प्टर का उद्यमशीलता एवं पूँजीवाद के संदर्भ में योगदान-सक्म्प्टर ने विविध चरणों में उद्यमशीलता के विभिन्न सैद्धान्तिक पक्षों पर विचार किया तथा मनोविज्ञान, आर्थिक सिद्धान्त, समाजशास्त्र सम्बन्धी कई उपागमों का प्रयोग किया। MSO 01 Free Assignment In Hindi

इसमें सबसे पहले उसने आर्थिक सिद्धान्त में उद्यमशीलता के समक्ष इतिहास का प्रतिपादन किया एवं इस संदर्भ में आर्थिक विचारधारा का इतिहास उसके ऐसे उपागम से काफी प्रभावित है, जो अभी भी शैक्षिणिक क्षेत्र पर हावी है।

सक्म्प्टर ने बारम्बार इस ओर इंगित किया है कि जब साधारण आर्थिक व्यवहार कमोबेश स्वचालित है, तो उद्यमी को सदैव ऐसे कार्यों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है जिन्हें इस रूप में लिया जाना चाहिए कि मानो उद्यमी को कुछ ऐसा करने में शामिल किया गया है, जो मूलतः नवीन है।

यह एक ऐसी अंतर्दृष्टि है जो काफी महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है, जैसे कोई ऐसा नवीन काम करता है लेकिन उसे यह नहीं पता होता कि उसे आगे कैसे बढ़ना है और इसलिए उसे नए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

सक्म्प्टर के अनुसार पूँजीवादी प्रक्रिया का अर्थ है वृत्तीय प्रवाह तथा इसे प्रवर्तकों और अनुयायियों द्वारा वितरित किया एवं बदला जाता है। कुछ निश्चित तकनीकी आर्थिक दशाओं के आधार पर व्यवसाय लाभ कमाना शुरू कर देता है।

यहाँ तक कि बढ़े हुए उत्पादन से बाजार की कीमतें गिरने लगती हैं। सक्म्प्टर के अनुसार यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि समुचित वृत्ताकार प्रवाह में आक्रामक उद्यमी जिनके पास रखने को कुछ नहीं है, वह नवाचार के विचार को सुदृढ़ करेगा।

सुस्थापित फर्मों की अड़चनों को दूर करने की उसकी सफलता उसके बल या अनुकूलन के ऐसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं जो परिवर्तनशीलता के साथ अन्त:क्रिया करता है। उसके इस उद्यमशीलता के सिद्धान्त को आर्थिक विकास के सिद्धान्त में देखा जा सकता है।MSO 01 Free Assignment In Hindi

उसने पूर्णतया एक नया आर्थिक सिद्धान्त बनाने का प्रयत्न किया। उसने कहा कि अर्थव्यवस्था के सभी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उद्यमी द्वारा किए जाते हैं और ये परिवर्तन धीरे-धीरे व्यावसायिक चक्र के माध्यम से अपने ही बूते पर काम करते हैं।

सक्म्प्टर ने इस बात को भी माना कि उसके सजातीयता के विचार ने परिवर्तन उत्पन्न किया, जो ऐसे परिवर्तन के विपरीत था जिसे बाहरी शक्तियों ने प्रस्तुत किया था तथा जो न केवल आर्थिक घटनाओं वरन् सभी सामाजिक घटनाओं पर भी लागू होता था

तथा इसे दो प्रकार की गतिविधियों के रूप में देखा जा सकता था-पहली सृजनात्मक और नवीन गतिविधियाँ थी व दूसरी आवर्तक और मशीनी गतिविधियाँ थीं।

उन्होंने उद्यमशीलता को नवीनता के रूप में लिया है। उनकी विभिन्न रचनाओं का अधिकांश भाग आर्थिक सिद्धान्त को विकसित करने के प्रयास से सम्बन्धित है। ये पूँजी, ऋण लाभ, व्यावसायिक चक्र जो उद्यमशीलता के सिद्धान्त के साथ जोड़े जाते हैं।

ऐसा करके सक्म्प्टर यह दावा करता है कि उद्यमशीलता को पहले से मौजूद सामग्री और बलों के नए तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

ये आविष्कारों की बजाए नयी बातों को करने से जुड़े हैं और इसके साथ यह भी कि कोई भी हमेशा के लिए उद्यमी नहीं रहता है। जब वह कोई नवीन गतिविधि कर रहा होता है, तभी उद्यमी होता है।

उन्होंने उद्यमी का आर्थिक वर्गीकरण किया है, जो निम्नलिखित है

(1. नयी वस्तुओं की खोज,
(2. उत्पादन के नए साधनों की पेशकश,

(3. नये बाजार की शुरूआत, MSO 01 Free Assignment In Hindi
(4. कच्चे माल की आपूर्ति के नए स्रोतों की खोज,

(5. नए औद्योगिक संगठन का सृजन।

सक्म्प्टर ने एक और वर्गीकरण किया है जो काफी प्रचलित है। यह उद्यमी के अभिप्रेरण से जुड़ा हुआ है तथा उनके अनुसार ऐसे तीन महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो उद्यमी को प्ररित करते हैं

(i) निजी हुकूमत की प्राप्ति का सपना और इच्छा-शक्ति,
(ii) जीतने की इच्छा,
(iii) किसी वस्तु को सृजित करने का आनंद।

वह कहता है कि उद्यमी को अभिप्रेरित करने के लिए केवल धन ही पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार उद्यमी सैद्धान्तिक नजरिए से निश्चित रूप से आर्थिक व्यक्ति नहीं होते। वह कहता है कि आर्थिक विकास के सिद्धान्त में अभिप्रेरण का उसका विचार मनोविज्ञान के क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

सारांश-इस बात में कोई शंका नहीं है कि सैद्धान्तिक दृष्टि से वेबर का योगदान बहुत है, लेकिन व्यवहार में यह कमजोर नजर आता है।

इस कमी के बावजूद भी वेबर के विचार को पूँजीवादी विकास के संदर्भ में उद्यमी के व्यावहारिक अनुप्रयोग को विकसित करने और इसकी रूपरेखा बनाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है

तथा वेबर की उद्यमशीलता की प्रारम्भिक परिभाषा समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में सम्प्टर की व्यक्तिवादी उद्यमशीलता को व्यापक करने के कार्य को सुविधाजनक बना सकती है।

उद्यमशीलता की उत्तरजीविता, आधुनिक उद्यम के संगठन का विचार जो लाभ के अवसरों को उत्पन्न करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है और जिसे उत्तरजीविता के लिए सृजनात्मक व्यक्तित्व वाले विचार के रूप में भी देखा जा सकता है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

व्यवसाय से धन कमाना तथा वेबर की पद्धति सम्बन्धी कार्य जैसा कि उन्होंने ‘द प्रोटेस्टेंट एथिक’ में दर्शाया है, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देता है कि किस प्रकार वैश्वीकरण और उदारवाद की वर्तमान गतिशील स्थिति में पद्धति के कार्य और धन अर्जित करने के मूल तत्त्वों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसमें शायद उद्यमशीलता और पूँजीवाद में सिद्धान्त के सुधार व संशोधन की आवश्यकता है।

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भाग-II

प्रश्न 7. नागरिकता क्या है? विभिन्न प्रकार की नागरिकताओं पर चर्चा कीजिए।

उत्तर-नागरिकता की परिभाषा-प्राचीन समय से ही एक राजनीतिक समुदाय की वैध सदस्यता के रूप में नागरिकता को परिभाषित किया गया है।

रोम की न्याय-व्यवस्था में नागरिकता का आशय विधि के अनुसार व्यवहार करने की स्वतंत्रता, विधि से सुरक्षा मांगने और अपेक्षा करने की स्वतंत्रता था।

आधुनिक राज्य में कानूनी स्तर पर नागरिकता व्यक्ति और राजनीतिक समुदाय के सदस्यों के बीच अधिकारों और कर्त्तव्यों की निश्चित समानता को बताती है। वास्तव में किसी क्षेत्रीय राज्य की सहभागितापूर्ण सदस्यता को ही नागरिकता कहते हैं।

ग्रीक और रोम में पैदा हुई तथा मध्यकाल में नगर-राज्यों में प्रचलित तथा 19वीं और 20वीं सदी में पूँजीवादी समाजों में तेजी से फैली यह विचारधारा प्रारम्भ से ही पश्चिमी विचारधारा है।

कानूनी और राजनीतिक सिद्धान्तों के अनुसार नागरिकता का आशय किसी राष्ट्र-राज्य अथवा नगर के सदस्य के अधिकारों एवं कर्तव्यों से है। समाजशास्त्र में नागरिकता का सिद्धान्त टी.एच. मार्शल की विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

उसने नागरिकता को एक ऐसी हैसियत के रूप में परिभाषित किया है जिसे किसी समुदाय का पूर्ण सदस्य प्राप्त करता है। उसने नागरिकता के नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक तीन अंगों की चर्चा की है।

नागरिक अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं तथा जो कानूनी न्यायालय में संस्थागत हैं। राजनीतिक नागरिकता समाज में वोट डालने या राजनीतिक पद ग्रहण करने के माध्यम में राजनीतिक शक्ति के प्रयोग करने में सहभागिता की गारंटी देती है।

सामाजिक नागरिकता एक समुचित जीवन स्तर में भागीदार होने का अधिकार है और यह अधिकार आधुनिक समाजों के कल्याणकारी और शैक्षणिक व्यवस्था में समाहित हो चुका है।

मार्शल की परिभाषा की यह कहकर आलोचना की गई है कि यह आर्थिक नागरिकता के विषय में मौन है।

उपर्युक्त विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नागरिक किसी राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत रहने वाला वह व्यक्ति है जिसे राजनीतिक, कानूनी एवं सामाजिक सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त होते हैं।

वैश्विक नागरिकता प्रौद्योगिकीय विकास तथा व्यापार का राष्ट्रीयता से परे अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय बन रहा है,

जिससे नागरिकता की पुरानी अवधारणा फीकी पड़ती जा रही है और वैश्विक नागरिकता की अवधारणा जोर पकड़ती जा रही है।

वैश्विक नागरिकता उस प्रक्रिया की शुरूआत है जहाँ मिट्टी और खून की पहचान लुप्त होगी और हमारी चेतना विश्व नागरिक के रूप में विस्तृत होगी तथा जो जातीय और राष्ट्रीय इतिहास से उत्पन्न तनावों पर काबू पाने में हमारी सहायता करेगी। MSO 01 Free Assignment In Hindi

वास्तव में विश्व नागरिकता संकीर्ण राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करके पूरे विश्व का सदस्य बना है। 1960 में मार्शल मकलुहन ने विश्वगाँव की जो भविष्यवाणी की थी वह आज वास्तविकता बन गई है।

सूचना के वर्तमान युग में लोगों और पूँजी के प्रवाह की सहायता से नए प्रकार के सामाजिक ढांचे का उदय हो रहा है।

यह ऐसी सीमाओं से मुक्त विश्व की कल्पना करता है, जो प्रत्यक्ष रूप से सर्वदेशीय होती है। इसमें राष्ट्र के संकुचित दृष्टिकोण का कोई स्थान नहीं है।

यह लोगों को एक से अधिक देश और संस्कृति का दावेदार होने की छूट प्रदान करती है। वैश्विक नागरिकता की अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भारतीय दृष्टिकोण के काफी निकट है।

दोहरी नागरिकता सैद्धान्तिक रूप से दोहरी नगारिकता का तात्पर्य दो राज्यों की नागरिकता से व्यक्ति का लैस होना है।

किसी प्रवासी समुदाय के किसी अन्य अपनाने वाले समुदाय से आत्मसात होने का अर्थ अपनी जातीय और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए मेजबान देश के लोगों के आपसी लाभ के लिए सुखदायी होना है। दोहरी नागरिकता की अवधारणा आज के वैश्वीकरण में मात्र समय का भ्रम है।

दोहरी नागरिकता से स्थानीय लोगों में जलन की भावना पैदा हो सकती है, जिनको यह महसूस हो सकता है कि प्रवासियों को खुशहाली के लिए अपना देश छोड़कर जाने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है।

यदि ध्यान से देखा जाए तो दोहरी नागरिकता केवल भौतिक, आर्थिक लाभ और सुविधा के लिए है।

उदाहरणस्वरूप प्रवासी भारतीयों को यात्रा, शिक्षा, काम और भारत में कहीं भी सम्पत्ति खरीदने का अधिकार और योग्यता प्राप्त होती है। इससे प्यार और जुड़ाव की कोई भावना पैदा नहीं होती।

प्रश्न 8. प्रजातंत्र में नागरिक समाज की भूमिकाओं तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर-नागरिक समाज और लोकतंत्र में सम्बन्ध-नागरिक समाज को यदि ध्यान से देखा जाए, तो यह लोकतंत्र की रीढ़ है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

कुछ परिस्थितियों में नागरिक समाज सत्तावादी शासन को लोकतांत्रिक शासन बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है और यदि एक बार लोकतांत्रिक शासन की स्थापना हो जाती है,

तो उसे जीवित रखने में भी सहायता करता है। जैसा कि पूर्वी यूरोप के देशों, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस में नागरिकों ने नागरिक समाज की संस्थाओं का प्रयोग राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लाखों नागरिकों को दमनकारी शासकों के विरुद्ध एकजुट कर संघर्ष किया।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक समाज की संस्थाएँ नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में संयुक्त हितों को प्राप्त करने के लिए आधार प्रदान करती है।

यहाँ पर लोग स्वतंत्र सामूहिक और शान्तिपूर्ण ढंग से भागीदारी करते हैं। इससे लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा मिलती है,

जिन्हें वे अपने समुदाय के लोगों के बीच प्रसारित करते हैं। नागरिक समाज का आन्दोलन सरकारी नीति और सामाजिक प्रवृत्ति को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। इनकी स्वतंत्र गतिविधियाँ राज्य शक्ति के बराबर हो सकती हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

कैरोथर्स ने अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में जाये बिना अपनी पुस्तक ‘एडिंग डेमोक्रेसी एब्राड’ में लोकतन्त्र के विस्तार की एक रणनीति के रूप में चर्चा की है जो यथार्थवादी सुरक्षा हितों अथवा आदर्शवादी मानवीय प्रेरणा के अनुरूप है।

वह यह दावा करता है कि लोकतंत्र वास्तव में दोनों का मिश्रण है। उसने लोकतंत्र की सहायता के लिए तीन प्रमुख केन्द्रीय प्रश्नों की चर्चा की है-चुनावी सहायता, संस्थात्मक सुधार और नागरिक समाज सहायता। उसके विचार में लोकतंत्र सहायता लोकतंत्रीकरण की देन है।

लोकतांत्रिक होते राज्यों से बने वातावरण और परिस्थितियों ने इन देशों को बढ़ाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहायता के योगदान को सम्भव बनाया है।

निष्कर्ष के रूप में वह कहता है कि स्थानीय सन्दर्भो में अन्तर होने के बावजूद लोकतंत्र को बढ़ाने के लिए अमेरिका की गतिविधियाँ सबके लिए एक ही नीति का प्रयोग करती हैं,जो कोई स्वस्थ तरीका नहीं है।

लोकतंत्र की सहायता का यह तरीका शैक्षणिक सिद्धान्तों के सतर्क प्रयोग नहीं होकर व्यवहार के दौरान विकसित हुआ है।

यद्यपि दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिका के हस्तक्षेप का समर्थन नहीं किया जा सकता है, फिर भी विद्वानों में इस बात की सहमति है कि लोकतंत्र को स्थापित करने में नागरिक समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रथम स्थान है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

जॉन केन के अनुसार जहाँ कोई नागरिक समाज नहीं है, वहाँ एक राजनीतिक कानूनी ढाँचे के अन्तर्गत अपनी विशिष्टता, अधिकार और कर्त्तव्यों को चुनने योग्य नागरिक नहीं हो सकते।

लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका :

लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका या कार्य पर प्रकाश डालते हुए लारी डायमण्ड ने अपनी पुस्तक ” रिथिंकिग सिविल सोसाइटी” में उल्लेख किया है कि नागरिक समाज लोकतंत्र को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उसका विचार है कि लोकतांत्रिक समाज में इस प्रकार की संभावनाएं अधिक हैं कि लोकतंत्र का उदय होगा और वह स्थायी होगा। डायमंड के अनुसार नागरिक समाज के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य हैं

(1. राज्य के राजनीतिक दुर्व्यवहार और कानूनी उल्लंघन को रोक कर जनता द्वारा इसकी छानबीन करके राज्य शक्ति को सीमित करना।

(2. नागरिक के अधिकारों में वृद्धि करके तथा लोकतंत्र राजनीतिक कुशलता एवं कौशल में वृद्धि करके नागरिकों को शक्तिशाली बनाना

(3. नागरिकों में लोकतांत्रिक गुणों, जैसे-सहनशीलता, विनम्रता, समझौता करने की इच्छा, विरोधी विचारों को सम्मान देने की भावना पैदा करना एवं उन्हें विस्तार देना।

(4. राजनीतिक दलों एव अन्य संस्थाओं को अपने हितों को प्रस्तुत करने के लिए अवसर प्रदान करना।

(5. भर्ती करने, सूचना प्रदान करने एवं नेतृत्व करने वाली एजेन्सी के रूप में कार्य करना।

(6. एक ठोस आधार वाला नागरिक समाज झटके सहन करने में सक्षम होता है।

(7. एक मजबूत आधार वाला नागरिक समाज नये राजनीतिक नेतृत्व की पहचान करके उसे प्रशिक्षित करता है।

( 8. सफल आर्थिक एवं राजनीतिक सुधारों को प्रारम्भ करना जिसके लिये समाज और विधायिका में गठबंधनों के सहयोग की _ आवश्यकता होती है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

(9. अनेक गैर-राजनीतिक संस्थाएँ देश-विदेश में चुनावी निगरानी का कार्य करती हैं।

(10. रॉबर्ट डहल के अनुसार सरकार के ठीक ढंग से कामकाज करने के लिए नागरिक समाज में निम्नलिखित सांस्थानिक गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए

(1. सभा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

(2. मतदान का अधिकार।

(3. सरकारी पदों के लिए प्रतियोगिता।

(4. निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव।

(5. समर्थन एवं मतों के लिए मुकाबले का राजनीतिक अधिकार।

(6. सूचना के वैकल्पिक स्रोत।

(7. नीति-निर्माण के लिए संस्थाओं का मतों पर निर्भर होना।

(8. प्राथमिकताओं की अन्य अभिव्यक्तियाँ। यद्यपि नागरिक समाज और लोकतंत्र के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं।

नकारात्मक पहलुओं को यदि छोड़ दिया जाए तो कुछ ऐसे नागरिक समाज के पहलू हैं, जो लोकतंत्र को विकसित करने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे

(1. जनशिक्षा-जागरूकता लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। जनता को शिक्षित करने के द्वारा नागरिक समाज लोकतंत्र को बढ़ावा दे सकता है।

नागरिक संस्थाएँ विश्वभर में प्रचलित कानूनों और नियामक संस्थाओं के प्रति जागरूकता पैदा करने के माध्यम से अत्यधिक योगदान कर सकती हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

ज्ञानवान नागरिक ही प्रभावी लोकतन्त्र को जीवित रख सकते हैं। नागरिक समाज पुस्तिकाएँ, दृश्य-श्रव्य सामग्री,कार्यशालाएँ, समाचारपत्र आदि के माध्यम से सूचनाएँ दे सकते हैं तथा उनका ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।

(2. नागरिक समाज दावदारों को समर्थन प्रदान करके लोकतांत्रिक शासन को बढ़ावा देता है। नागरिक संस्थाएँ वंचित एवं तिरस्कृत सामाजिक वर्ग, जैसे-गरीब, महिलाओं और अक्षम- अपंग लोगों की आवाज बन सकती हैं,

जिनकी प्रायः उनके द्वारा चुनी गयी विधायिका और कार्यपालिका के सदस्यों द्वारा एवं माध्यमों से थोड़ी कम सुनवाई हो पाती है। इस प्रकार नागरिक सक्रियता दावेदारों को शक्ति प्रदान कर सकती है तथा राजनीति में अधिकतम सहभागिता में वृद्धि कर सकती है।

(3. सरकारी नीतियों के निर्माण में घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नागरिक समाज के निवेश से अधिक प्रभाव पड़ता है जैसे कि नागरिकों के समूह कथित ‘वाशिंगटन समिति’ के प्रति बहस की चिंगारी भड़काने में आगे थे।

उन्होंने निरन्तर पर्यावरण सन्तुलन सम्बन्धी मुद्दों को उठाया, गरीबी का गुणात्मक आकलन करके ऋण कटौती करने के लिए दबाव बनाया।

(4. सतर्क नागरिकों का एकजुट होना शासन में पारदर्शिता का कारण बन सकता है। नागरिक समाज द्वारा डाला गया निरन्तर दबाव, नियम के ढाँचे और क्रियाकलापों को उजगर करता है, जहाँ पर जनता की निगरानी और दृष्टि में उनका आकलन करना सम्भव हो सकता है।

सामान्यतया नागरिकों में इस प्रकार की जागरूकता का अभाव होता है कि सरकार क्या निर्णय लेती है? कौन निर्णय लेता है?

एवं किस उद्देश्य के लिए निर्णय लिये जाते हैं? नागरिक समाज अपने सुसंगठित ढाँचे के द्वारा पारदर्शिता पर लगायी जाने वाली वैधता पर प्रश्न कर | सकता है कि किसे, कब, किसके हित में क्या पारदर्शी बनाया गया है?

(5. जनता के प्रति जवाबदेही कई सम्बन्धित एजेंसियों को उत्तरदायी बना सकती है। नागरिक समूह जनता और सम्बन्धित नीतियों को लागू करने तथा उनके प्रभाव पर नजर रख सकते हैं, यदि उसके परिणाम विपरीत आ रहे हैं। MSO 01 Free Assignment In Hindi

स्वतंत्र नागरिक एजेंसियाँ विश्व बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मूल्यांकन की एक निष्पक्ष नीति रखती हैं। फलस्वरूप उन्होंने अल्पविकसित देशों के प्रति इन एजेंसियों की नीति की अधिकतर आलोचना की है।

(6. नागरिक समाज उपर्युक्त सभी गतिविधियों के द्वारा एक वैध लोकतांत्रिक शासन की स्थापना में योगदान देता है तथा जब लोगों की यह स्वीकृति प्राप्त हो जाती है कि एक शक्ति को शासन करने का अधिकार है तथा उनका इन निर्देशों का पालन करने का कर्त्तव्य है,

तो शासन वैध कहलाता है। इस प्रकार की सहमति का परिणाम यह होता है कि वैध शासन अवैध शासन और तानाशाही शासन की तुलना में अधिक सरल, उत्पादक और अहिंसक ढंग से कार्य करता है।

इन सब सकारात्मक पहलुओं के अलावा नागरिक समाज लोकतंत्र के लिए कभी खतरा भी बन सकता है। यदि नागरिक समाज की गतिविधियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हों,

यदि ठीक से नागरिक समाज के क्रियान्वयन की नीतियाँ ठीक से न बनायी जाएँ, सरकारी एजेंसियाँ नागरिक समाज से प्राप्त जानकारियों को संभाल नहीं पातीं।

इसके अलावा नागरिक संस्थाओं का भ्रष्ट होना, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, नागरिक समाज में आन्तरिक लोकतंत्र के अभाव आदि ऐसे कारक हैं, जो लोकतंत्र को विघटित कर सकते हैं।

इन तमाम नकारात्मक पहलुओं पर यदि थोड़ा-सा नियंत्रण कर लिया जाए, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि नागरिक समाज, लोकतंत्र के उद्भव एवं विकास के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, या हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र के प्रवर्तक के रूप में नागरिक समाज की महती भूमिका है। MSO 01 Free Assignment In Hindi

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