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MPSE 6 Free Assignment In Hindi jan 2022

भाग-1

1. आधुनिक काल में राज्य के साथ अपने संबंधों में विकास से नागरिक समाज में बड़े परिवर्तन हुए हैं। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- डेविड ई. एप्टर ऐसे नागरिक समाज का उल्लेख करता है, जिसका संबंध समाज के स्वयंसेवी संगठन, गैर सरकारी संगठन, निजी शैक्षिक और धार्मिक सुविधाएँ आदि जैसे नेटवकों से है नागरिक समाज का संदर्भ-नागरिक समाज का विकास राज्य से उसके संबंध में आधुनिक काल में स्वयं प्रमुख परिवर्तनों से गुजरा।

18वीं शताब्दी के मध्य तक नागरिक समाज राष्ट्र “राज्य” शब्द के साथ कोटर्मिनस था। इस प्रकार यूरोपीय भाषा के शब्द, जैसे राज्य के लिए पर्याय शब्द थे।

इस वाक्यांश में राज्य से की प्राचीन रोमन (और प्रारंभिक यूनान) की पहचान ने निरंतरता प्रदान की। 18वीं शताब्दी के मध्य के बाद नागरिक समाज की अवधारणा तब समाविष्ट होने लगी, जब नागरिक समाज और राज्य अलग-अलग सत्ता के रूप में देखे जाने लगे।

उस समय राज्य राजनीतिक (कानूनी) क्षेत्र से तथा नागरिक समाज आर्थिक-सामाजिक संबंधों के क्षेत्र से पहचाने जाते थे।

यह ऐसा समय था जब मुक्त व्यापार दर्शन पर बल देने वाला आर्थिक पूँजीवाद प्रमुखता में आया और राज्य से इस क्षेत्र से अलग रहने की आशा की गई।

यह वाक्यांश एक शताब्दी से भी अधिक समय तक प्रचलन में रहा। तब लगभग 19वीं शताब्दी के मध्य तक नागरिक समाज और राज्य के बीच विभेदीकरण दुर्बल हो गया था।

राज्य के उत्कर्ष की पुनर्स्थापना संप्रभुता की कानूनी अवधारणा के लोकप्रियता में देखी जा सकती है। इसे राज्य की मात्र विशेषता के रूप में माना गया जो सामाजिक क्षेत्र के सभी अन्य भागों पर नियंत्रण करने का अधिकार देता है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

इसलिए राज्य, समाज में उसकी सर्वोच्च संस्था बन गया। एक दृष्टि से यह समकालीन समय तक मान्य रहा। उदाहरण के लिए, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और राज्य अधिकार की प्राधिकारवादी अवधारणा राज्य को समाज पर अति- प्रधानता अधिकार और प्रभाव प्रदान करती है।

तथापि यह ऐसा नहीं है कि नागरिक समाज ने राज्य की अवधारणा के विरुद्ध रक्षा कार्यवाही बनाने के लिए प्रतिक्रिया नहीं की राजनीति सिद्धांत में जिसे “बहुलवाद” कहा जाता है. उदाहरण के लिए, इस प्रकार प्रतिपादित किया जाता है कि राज्य बहुत-सी अन्य सामाजिक संस्थाओं में से एक है यद्यपि अधिक से अधिक इसे “अन्य समवर्गों में पहला” माना जा सकता है।

19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी में सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रभुत्व के लिए लगातार विवाद देखा गया। कुल मिलाकर, विवाद राज्य के पक्ष में हुआ। परंतु 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में नागरिक समाज ने अपने आपको नई तीक्ष्णता से प्रस्तुत किया।

समसामयिक नागरिक समाज : सिद्धांत और व्यवहार-समसामयिक (समकालीन) दशकों में नागरिक समाज के प्रक्षेपण के तात्कालिक कारण का पता उसके कुछ पिछले कार्यों से राज्य के पीछे हट जाने से लगाया जा सकता है।

काफी सीमा तक यह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ चलने की प्रवृत्ति है। यह सुविदित है कि भूमंडलीकरण से निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलता है और समाज के आर्थिक पहलू से निकलने के लिए राजनीतिक राज्य दबाव डालता है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

इन हितों को सुलभ करने के लिए बड़े पैमाने में गैर-सरकारी संगठनों का उद्भव हुआ है। परंतु भूमंडलीकरण (वैश्वीकरण) के अलावा, समाज का प्रमुख स्थिति में आने का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि पूर्वी यूरोपीय देशों में साम्यवादी सर्वसत्तात्मक राज्यों के विरुद्ध उसकी चुनौती सफल हुई है।

साम्यवादी राज्यों ने समाज को इतना अधिक दबाया हुआ था कि इसने एक मजाक को जन्म दिया कि साम्यवाद में राज्य की समाप्ति तो नहीं हुई।

परंतु नागरिक समाज को प्रतिशोध के रूप में समाप्त किया गया। साम्यवादी राज्यों द्वारा मजदूर संघों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया था।

सरकार द्वारा बुद्धिजीवियों पर मुकद्दमे चलाए गए। ये सभी साहस और दृढ़ता से साम्यवादी प्रणाली के विरुद्ध खड़े हुए और अंततः इस प्रणाली को विघटित करने में सफल हुए। पौलैंड, चेकोस्लावाकिया, हंगरी ने इस कार्य का शुभारंभ किया।

इस प्रणाली में प्रमुख शक्ति सोवियत संघ ने पेरेस्त्रोइका (पुनर्निर्माण) और खुलापन (ग्लास्नॉस्ट – की नीतियों के कारण मुख्य रूप से धीरे-धीरे स्वयं भी खुलापन अपनाया। इस नीति का अनुसरण मिखाइल गोर्बाचोव द्वारा किया गया था।

इससे पूर्वी यूरोप पर साम्यवादी प्रणाली की पकड़ ढीली हो गई। इस प्रकार 20वीं शताब्दी के अंत तक पूर्वी यूरोप की स्वतंत्रता को राज्य पर नागरिक समाज की विजय माना गया।

यह समझा जाना चाहिए कि नागरिक समाज के हाल ही का पुनरुत्थान साम्यवादी राज्यों के सर्वसत्तात्मक अधि क फैलने का कारण ही नहीं है, बल्कि दक्षिणपंथी सत्तावादी तानाशाहों की शासन व्यवस्थाओं की सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी इस प्रवृत्ति के लिए उतनी ही अधिक उत्तरदायी है।

विशेषकर लैटिन अमेरिका में बार-बार सैनिक तानाशाहों के कारण उन समाजों के भिन्न-भिन्न वर्गों में भारी असंतोष उत्पन्न हुआ। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

नागरिक समाज में सहयोगात्मक लोकतंत्र में प्रमुख संस्थागत उपाय के रूप में देखा गया है। इससे भी अधिक “नागरिक समाज और संबद्ध सामाजिक आंदोलनों ने राज्य संस्थाओं के बाहर से राज्य के कुछ कार्यकलापों के राजनीतिकरण के रूप में सिद्धांत प्रस्तुत किया।”

इसे औसत नागरिक की शंका से परे राज्य के कार्य की अधिकांशतः प्राविधिकीकरण किया जा रहा भी माना गया। नागरिक समाज और संघर्ष समाधान-नागरिक समाज की चर्चा से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नागरिक समाज संघर्ष निवारण, परिरोधन (नियंत्रण) और समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका कैसे निभाता है।

अतः इस बिंदु पर विस्तार से विवेचन इस प्रकार किया जा सकता हैसाधारणतया, यह राज्य है जिसे अंतत: संघर्ष समाधान निर्धारित तथा क्रियान्वित करने का एकाधिकार है।

परंतु संघर्ष के कारण बढ़ते जाने और राज्य भी अन्यथा, इस विषय में सदा प्रभावकारी ढंग से कार्य नहीं कर सकता है तो सामाजिक संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर इस कार्य में भूमिका निभानी आरंभ की विशेषकर, सहयोगात्मक लोकतंत्र के विचार के प्रसार से ही अन्य बातों के साथ लोगों की सहभागिता के लिए दो महत्त्वपूर्ण माँग की पहला, समाज के संसाधनों के अधिक समान भागीदारी के लिए और ऐसे अधिकारों तथा सुविधाओं तक पहुँचने के लिए मांग है जिन्हें इस समय राज्यों के लिए लोगों को देना अनिवार्य है।

दूसरे, दावे का संबंध समाज का शासन व्यवस्था में सहभागिता से है। इन दोनों बिंदुओं का समाज में मानव अधिकार और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यापक जनभावना से उदाहरण सहित उल्लेख किया जा सकता है परिणाम गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए खुला निमंत्रण है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

वे लोगों को इन माँगों के संबंध में उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा कर सकते हैं। फलस्वरूप इसकी संघर्ष परिहार, परिरोधन (नियंत्रण) और संघर्ष समाधान में भी अधिक व्यापक भूमिका है। इस संबंध में सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा अधिकार अच्छे उदाहरण हैं।

पर्यावरण संतुलन संरक्षण एक अन्य उदाहरण है। ये अधिकार, जैसा कि अभी तक ज्ञात है, सरकारों और लोगों में कभी-कभी सघर्ष उत्पन्न कर देते हैं। फिर भी, अंतिम विश्लेषण में स्वयंसेवी गैर-सरकारी अभिकरणों का हस्तक्षेप भी दावों और प्रतिदावों का समायोजन करता है।

इस प्रवृत्ति को कुछ उदाहरण लेकर समझाया जा सकता है। अल्पसंख्यक अधिकारों के संवर्धन में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और मानव अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र द्वारा प्रत्याभूत अधिकारों का आह्वान करने में हो सकती है और संघर्ष के दीर्घकालिक संभावना के नियंत्रण के लिए, इनके क्रियान्वयन के लिए सरकार पर दबाव डालने में हो सकती है।

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2 परमाणु युद्ध लड़ने या उसे रोकने के लिए शीत युद्ध के प्रतिद्वंद्वियों द्वारा अपनाई गई रणनीतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

उत्तर- परमाणु युद्ध लड़ने अथवा इसे रोकने के लिए कई रणनीतियाँ हैं। इस उद्देश्य से जिन रणनीतियों की पहचान की गई है, वे

(1) न्यूनतम अवरोधन, MPSE 6 Free Assignment In Hindi

(2) विश्वसनीय आक्रमण की पहल,

(3) सुनिश्चित विनाश। कौन-सी रणनीति के कई रूप हो सकते हैं। किस रूप में यह रणनीति अपनाई जाए यह संबद्ध राष्ट्र की सक्षमता पर निर्भर करेंगे।

आक्रमण की पहल करने की सक्षमता के लिए बड़े रणनीतिगत बल की आवश्यकता होती है जोकि पहले आक्रमण में ही शत्रु की उल्लेखनीय क्षति कर दे और उसके अधिकांश रणनीतिक बलों को नष्ट कर दे।

आक्रमण की पहल की उपयोगिता शत्रु को यह बताने में है कि किसी भी गंभीर उत्तेजनात्मक कार्यवाही के कारण ऐसा आक्रमण किया जाएगा कि उसके रणनीतिक बल नष्ट हो जाएँगे।

आक्रमण उपरोक्त न्यूनतम आक्रमण नहीं अपितु व्यापक रणनीति के तहत किया गया हमला होगा। अन्य शब्दों में, अचानक हुए हमले को झेलकर इतनी शक्ति जुटाना कि आक्रमणकारी को गंभीर क्षति पहुँचाई जा सके।

अमेरिका का मानना था कि परमाणु हथियारों की संभावना की धमकियों के कारण अंत में कोरिया युद्ध समाप्त हो गया और चीन बातचीत करने के स्तर पर आ गया।

बाद में राष्ट्रपति आइजनहॉवर ने सुरक्षा की समस्या के समाधान के लिए अवरोधक रणनीति अपनाई। 1954 में अमेरिका के जॉन फोस्टर डलेस ने व्यापक प्रतिघात का सिद्धांत दिया।

इस रणनीति का उद्देश्य सहनीय कीमत पर अवरोध को अधिकतम करना था। तर्क यह था कि स्थानीय प्रतिरक्षा व्यापक प्रतिशोध के पूर्ण अवरोधन द्वारा की जाए ताकि संभावित आक्रामक आक्रमण का मार्ग न चुन सके।

इस प्रकार से कोरिया जैसा परोक्ष युद्ध होने की स्थिति में अमेरिका, रूस अथवा चीन के विरुद्ध परमाणु हथियारों के प्रयोग द्वारा प्रतिघात लेगा। परंतु व्यापक प्रतिघात के सिद्धांत के अनेक आलोचक हुए हैं।

सर्वाधिक अहम् आलोचना यूरोपवासियों द्वारा की गई थी जिसमें अमेरिका के सोवियत संघ के प्रति व्यवहार की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लगाया गया। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

क्या अमेरिका यूरोपीय क्षेत्र में स्थानीय संघर्ष होने की अवस्था में समग्र परमाणु युद्ध का जोखिम लेगा? क्या विचारधारा के पनपने से मूल सिद्धांत में संशोधन किया गया।

यह संशोध न रोबर्ट मैकनमारा ने सुनिश्चित विनाश, क्षति, सीमितता और लोचदार प्रतिक्रिया की रणनीतियों के अंतर्गत किया। व्यापक प्रतिघात की संकल्पना के सीमित विकल्प थे। मैकनमारा का मत था कि इसके अंतर्गत अन्य ठिकानों पर आक्रमण करने की योजना बनाना अनिवार्य था न कि शहरों पर जैसा कि व्यापक प्रतिघात में होता है।

इसके अतिरिक्त आरंभिक हमले के प्रति लोचदार प्रतिक्रिया व्यक्त करने की आवश्यकता थी जिसमें परंपरागत और परमाणु प्रतिघातक हमला होगा, न किसी संदेहास्पद आक्रमण के विरुद्ध केवल व्यापक प्रतिघात।

अमेरिका और रूस दोनों दूसरे हमले (प्रतिघातक) के लिए सक्षम थे, परंतु 1970 के दशक तक अमेरिका ने भी मान लिया था कि परमाणु क्षेत्र में वह सोवियत संघ से आगे नहीं था।

इसी के उपरांत परमाणु हथियारों को सीमित करने की बात आई जिसका परिणाम स्ट्रेटिजिक माम्स लिमिटेशन टॉक्स के रूप में सामने आया। सोवियत परमाणु सिद्धांत और रणनीति के तीन प्रमुख मूल संघटक थे

(1) सैनिक संतुलन के संबंध में सोवियत संघ का उद्देश्य मात्रात्मक और गुणात्मक ” श्रेष्ठता” रहा है। साल्ट वार्ता के उपरांत ही सोवियत संघ अमेरिका पर भी श्रेष्ठता की स्थिति की बात को छोड़ पाया।

(2) सोवियत संघ का मत था कि युद्ध का आरंभ सोवियत संघ पर अचातक आक्रमण से होगा और यह लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष नहीं होगा। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

सोवियत संघ पहल से युद्ध तभी करेसा जर माटो के हमले को स्पष्ट चेतावनी हो या फिर वह प्रत्युत्तर में हमले की अपनी क्षमता पर विश्वास रखेगा परंतु इनके लक्ष्य सैनिक केंद्र अथवा संचार अड्डे होंगे, न कि आम नागरिक।

परमाणु धमकी की पृष्ठभूमि में सोवियत संघ परमाणु हथियारों को बढ़ाने और इनकी गुणवत्ता सुधारने के कार्य में जुटा रहेगा।

(3) सैनिक सिद्धांतों और रणनीति के कुछ अपने नियम होंगे। सोवियत संघ का मानना था कि अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो शक्तियों और सोवियत संघ के नेतृत्व वाली वारसा शक्तियों के बीच युद्ध साम्राज्यवादियों और समाजवादियों के मध्य तीसरा और निर्णायक युद्ध होगा और यह युद्ध सोवियत संघ के लिए “न्यायसंगत” युद्ध होगा।

सोवियत संघ इस युद्ध को आरंभ नहीं करेगा और न ही एकाएक आक्रमण करेगा। दूसरी ओर क्रांतिकारी आदोलन और अन्य न्यायसंगत युद्धों को वह समर्थन देता रहेगा।

सोवियत संघ के पास युद्ध अयोधन की क्षमता थी परंतु युद्ध को इतना अवश्यंभावी नहीं माना जा सकता। विशेषकर खश्चेव के शांतिपूर्ण तरीके से मिलकर चलने के विचारों ने युद्ध होने के संबंध में सोवियत सोच को ही बदलकर रख दिया।

खश्चेव के अनुसार विश्व में परमाणु परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में कोई भी युद्ध होना बता के लिए हानिकारक होगा। तथापि, इसका अर्थ यह नहीं होगा कि सोवियत संघ समाजवाद के प्रचार के लिए कार्य न करें और रणनीति के लाभों को प्रयोग में न लाए। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

(4) राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक शक्ति का सामान्य संतुलन तथा समाज और आम नागरिकों की सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विशेषताओं पर आधारित रणनीति को महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना जाएगा। यह सोवियत संघ की विचारधारा पर आधारित होगी।

रणनीति तैयार करने में लेनिन, स्टालिन, खश्चेव अथवा ब्रेझनेव द्वारा प्रतिपादित समाजवाद की अहम् भूमिका होगी। परमाणु युद्ध के संबंध में सोवियत संघ का उद्देश्य मात्रात्मक और गुणात्मक “श्रेष्ठता” रहा है।

साल्ट वार्ता के उपरांत ही सोवियत संघ अमेरिका पर अपनी श्रेष्ठता की स्थिति की बात को छोड़ पाया।

परमाणु युद्ध के संबंध में अमेरिका और सोवियत संघ की विचारधारा और सिद्धांतों में “विजय” के मुद्दे पर अंतर था। सोवियत संघ के लिए “विजय” का अर्थ सैनिक, राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति था।

इससे अभिप्राय सोवियत संघ का कम से कम नुकसान, नाटो/अमेरिका की हार तथा युद्ध के बाद के विश्व पर वर्चस्व स्थापित करना था जबकि अमेरिका की दृष्टि से युद्ध का अर्थ यथास्थिति बनाए रखने से था।

यह वैश्विक संतुलन को बनाए रखना चाहता था तथा विश्व में अमेरिका की श्रेष्ठता स्थापित करने के उपरांत अवरोधन की नीति के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था कायम रखने के लिए कार्य करना चाहता था।

1983 के एक बहुचर्चित भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति, रोनल्ड रीगन ने प्रश्न किया था-“क्या बदला लेने की अपेक्षा जीवन बचाना बेहतर नहीं है?” उन्होंने दीर्घावधि अनुसंधान कार्यक्रम की बात की ताकि अमेरिका आक्रामक रणनीतिक परमाणु अस्त्रों की धमकी करके रूस के किसी संभावित प्रक्षेपास्त्र हमले से प्रतिरक्षा करने की थी।

आक्रमणकारी परमाणु प्रक्षेपास्त्रों को अप्रचलित होने के तरीके बताने के लिए वैज्ञानिक समुदाय को संबोधित करते हुए रीगन वास्तव में, परमाणु युग में सुरक्षा रणनीति के रूप में युद्ध अवरोध पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे थे।

अमेरिका का नया मत था कि शत्रु को व्यापक क्षति पहुँचा सकने वाली प्रतिघात क्षमता की अपेक्षा प्रतिरक्षा क्षमता पर आधारित युद्ध अवरोधन बेहतर विकल्प था। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

इन अनुसंधान कार्यक्रम को रणनीतिगत रक्षा पहल और अन्य शब्दों में स्टार युद्ध कार्यक्रम कहा गया। एस.डी.आई. एक अनुसंधान कार्यक्रम था, जिसके अंतर्गत अंतरिक्ष पर आधारित नई प्रतिरक्षात्मक प्रौद्योगिकियों की संभाव्यता का पता लगाया जाना था।

नई प्रौद्योगिकियों का उद्देश्य रूसी प्रक्षेपास्त्रों की पहचान करना, पीछा करना और नष्ट करना था। प्रक्षेपास्त्रों के कार्यशील होने के समय पर ही उनकी पहचान की जा सकती थी।

इसकी उड़ान के मार्ग पर पीछा किया जाएगा और इसके उड़ान भरने से लेकर अपने लक्ष्य तक पहुँचने के बीच कभी भी इसे नष्ट कर दिया जाएगा। पूरी प्रणाली अंतरिक्ष में स्थित पहचान प्रणालियों पर आधारित होगी और उसके लिए जो हथियार प्रयोग में लाए जाएँगे वे लेजर किरणों, उच्च ऊर्जा कण किरणों, काइनेटिक ऊर्जा इत्यादि सहित अपरमाणु होंगे।

यह कार्यक्रम बैलस्टिक प्रक्षेपास्त्र विरोधी संधि 1972 से भी बेहतर कार्यक्रम था जिसमें अमेरिका तथा सोवियत संघ के कमान और नियंत्रण केंद्रों की एंटी बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र रक्षा प्रणाली से रक्षा की जाएगी।

ए बी एम ने प्रत्येक देश में एक कमांड और नियंत्रण केंद्र के लिए रक्षा प्रणाली विकसित करने की औपचारिक रूप से पहचान की जबकि एस.डी.आई. (स्टार वार) काल पूरे-माछा करना था।

सोवियत संघ ने अमेरिका के कार्यक्रम को गंभीरता में लिया और उसे यह लगर्न भाषण कि अमेरिका इस क्षेत्र में 1950 के दशक का एकाधिकार पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रहा भा।

इस कार्यक्रम के प्रतिपादकों द्वारा प्रायोगिकीय विकास संबंधी दावे व्यावहारिक नहीं बन पाए जिसके परिणामस्वरूप कार्यक्रम का कार्यक्षेत्र और आकार कम किया गया।

उसके बाद अमेरिका ने एस.डी.आई. के अधीन थियेटर प्रक्षेपास्त्र रक्षा प्रणाली ष्ट्रीय प्रक्षेपास्त्र रक्षा प्रणाली विकसित की। पहली रक्षा प्रणाली विशिष्ट राजनीतिक क्षेत्रों जैसे पश्चिमी यूरोप, अमेरिका और कनाडा की प्रमुख भूमि की रक्षा करने के लिए बनाई गई। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

3. अंतर-राज्यीय विवादों को हल करने के विभिन्न तरीकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर- जहाँ राज्यों के हितों में संघर्ष हो, वहाँ अनेकों विकल्पों में से युद्ध एकमात्र विकल्प हो सकता है, जिसके द्वारा संघर्ष या विवाद का समाधान ढूंढा जा सकता है।

समझौता-वार्ता मध्यस्थता सुलह करवाना पंच निर्णय और न्यायिक प्रक्रिया संघर्ष समाधान के कुछ उपाय हैं। परंतु, यह थ्य कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में संघर्ष बने ही रहते हैं, यह राज्यों के लिए आवश्यक हो जाता है कि वे अपने विवाद सुलझाने के लिए स्वयं कुछ उपाय विकसित करें तथा अन्य व्यवस्थाएँ अपनाएँ।

जब संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि युद्ध की संभावना उत्पन्न हो जाती है, तब कोई न कोई औपचारिक प्रबंध करना आवश्यक हो जाता है। कई बार राष्ट्रीय प्रतिष्ठा संघर्ष समाज के मार्ग में बाधा बन जाती है।

ऐसी परिस्थिति में आवश्यक होता है कि औपचारिक प्रक्रियाओं के अनुसार विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का मार्ग अपनाया जाए। विवादों के समाधान के लिए राजनयिक-राजनीतिक तथा न्यायिक उपाय अपनाए जाएँ। राजनयिक राज्यों में वार्ता, सदाशयता मध्यस्थता, जाँच तथा समझौता शामिल होते हैं।

न्यायिक प्रक्रिया में पंचनिय और न्यायिक निर्णय शामिल किए जाते हैं। राजनयिक (कूटनीतिक) उपाय समझौता-वार्ता संघर्षरत् राज्यों के बीच वार्ता या तो द्विपक्षीय होती है या फिर बहुपक्षीय भी हो सकती है।

ये वार्ताएँ संबद्ध राज्यों के मध्य बातचीत या तो राज्याध्यक्षों/शासनाध्यक्षों के बीच प्रत्यक्ष रूप से हो सकती है या फिर उन देशों के राजदूतों अथवा विशेष प्रतिनिधियों के बीच हो सकती है। जिन राज्यों के मध्य हित-टकराव है उनके बीच में वार्ता अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से भी हो सकती है।

वार्ता, सदाशयता, मध्यस्थता तथा समझौता इत्यादि पंच निर्णय और न्यायिक निर्णय की अपेक्षा विवादों को निपटाने के कम औपचारिक उपाय होते हैं। समझौता वार्ता प्रायः सदाशयता या मध्यस्थता से पूर्व अपनाए जाने वाला उपाय व मार्ग होता है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

इसमें परामर्श और संचार-संबंध शामिल होते हैं। 1965 के ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते में परामर्श का प्रावधान था। 1963 के अमेरिकी-सोवियत दूरसंचार समझौते में वार्ता और परामर्श निहित थे।

सदाशयता तथा मध्यस्थता -सदाशयता और मध्यस्थता दोनों के लिए एक तीसरे मित्र पक्ष की आवश्यकता होती है, जोकि विवाद सुलझाने के लिए अपनी सहायता दे सकता है। सदाशयता अथवा मध्यस्थता का प्रस्ताव या सुझाव, करने वाला कोई व्यक्ति हो सकता है या राज्य या फिर कोई अंतर्राष्ट्रीय संगठन।

सदाशयता और मध्यस्थता में अंतर मामूली-सा ही होता है। सदाशयता में कोई तीसरा पक्ष विवाद में फँसे दोनों पक्षों को एक मंच पर लाकर समझौते का सुझाव देता है परंतु वह स्वयं प्रत्यक्ष रूप से समझौता-वार्ता में शामिल नहीं होता।

मध्यस्थता में मध्यस्थ की भूमिका अधिक सक्रिय होती है, जिसमें वह स्वयं वार्ता में शामिल होकर शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयास कर सकता है। परंतु, मध्यस्थ के सुझाव बाध्यकारी नहीं होते हैं।

उदाहरण के लिए, 1966 में ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता कराने के लिए पूर्व सोवियत संघ ने मध्यस्थता की थी। सदाशयता और मध्यस्थता का क्षेत्र सीमित होता है। इसके लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

प्रयास यह किया जाता है कि विवादग्रस्त राज्य स्वैच्छिक वार्ता भागीदारी करें ताकि विवाद को सुलझाया जा सके। उदाहरण के लिए श्रीलंका-एल.टी.टी.ई. संघर्ष सुलझाने में सहायता के लिए नार्वे ने सदाशयता का सुझाव दिया था।

सुलह करवाना सुलह करवाने की प्रक्रिया में जाँच और मध्यस्थता दोनों शामिल होते हैं। कोई व्यक्ति या आयोग विरोधी पक्षों में सुलह करवाने का प्रयास कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र ने सुलह करवाने के अनेक प्रयास किए हैं। सुलह करवाने की प्रक्रिया में अनेक उपाय उपयोग में लाए जा सकते हैं ताकि विवाद का शांतिपूर्ण समाधान तलाश किया जा सके।

इसमें प्रायः तथ्यों की जाँच के पश्चात्, विवाद समाधान के सुझाव दिए जाते हैं ताकि विरोधी विचारों में सुलह करवाई जा सके। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

सुलह करवाने के आयोगों का प्रावधान हेग के 1899 और 1907 के दस्तावेजों में किया गया है। इस प्रकार के आयोगों की स्थापना संबद्ध पक्षों के मध्य किए गए विशेष समझौतों के द्वारा की जाती है।

यह आयोग जाँच-पड़ताल करके अपनी सिफारिशें करता है। परंतु ये सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होती हैं। बोगोटा समझौते , 1948 में भी इस प्रकार के आयोग की व्यवस्था है।

जाँच, सुलह करवाने की प्रक्रिया से भिन्न है, क्योंकि इसमें कोई सिफारिशें नहीं की जाती है। परंतु, जाँच के द्वारा विवाद से संबंधि तथ्यों का पता लग जाता है, ताकि संबद्ध पक्ष वार्ताओं के माध्यम से विवाद के समाधान का प्रयास कर सके।

विवादास्पद सीमाओं के प्रश्न पर जाँच आयोग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पंच निर्णय -पंच निर्णय में विवाद कुछ ऐसे व्यक्तियों को सौंपा आता है जो कि पंच कहलाते हैं।

इन व्यक्तियों को दोनों पक्ष स्वेच्छा से चुनते हैं। वे अपमा निर्णय देके में किसी कानूनी बाधा से बँधे नहीं होते हैं। परंतु, कभी-कभी ऐसे विवाद भी पंच निर्णय के लिए सौंपे जाते हैं जिनमें मात्र कानूनी सहे शामिल होते हैं।

विभिन्न देशों द्वारा हस्ताक्षर की गई अनेक संधियों में विवाद समाधान के लिए पंच निर्णय के प्रावधान पाए जाते हैं। पंच निर्णय की परंपरा शताब्दियों पुरानी है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य संपन्न 1794 की जे संधि में आपसी विवादों के समाधान के लिए पंच निर्णय की व्यवस्था, की गई थी। सन् 1872 के, ब्रिटेन और अमेरिका के विवाद संबंधी अलाबामा विवाद में दिए गए निर्णय ने पंच निर्णय के महत्त्व को स्थापित एवं सिद्ध किया था।

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भाग-2

6. आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए क्या तरीके हैं?

उत्तर- आतंकवाद को वर्गीकरण के आधार पर हिंसा के उपयोगी या उपयोगी की चेतावनी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसका चरित्र, उद्देश्य या संचालन प्रक्रिया सटीक ढंग से परिभाषित नहीं है। फिर भी क्षैतिज और उचं दोनों प्रकार के भय-अभिप्रेरण आतंकवाद के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।

निष्ठुरता, मानवीय मूल्यों की अवहेलना, प्रचार की भूख आदि आतंकवाद के कुछ अन्य प्रमुख लक्षण हैं। यद्यपि आतंकवाद कोई नई घटना नहीं है।

इसके प्रभाव में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से तकनीकी विकास और प्रचार तंत्र के प्रति बढ़ती जागरूकता के परिणामस्वरूप वृद्धि हुई है। बंधक बनाना, अपहरण, बमबारी, हत्या, गोलीबारी आदि आतंकवाद के सामान्य लक्षण आतंकवाद राजनीतिक अथवा गुट-संबंधी और राज्य-प्रायोजित हो सकता है।

राज्य-प्रायोजित आतंकवाद अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें अवपीड़क एजेंसियाँ राज्य के अधीन रहती हैं। इतना ही नहीं, यह ‘परिणाम साधन से अधिक महत्त्वपूर्ण है’ के सिद्धांत पर आधारित होता है।

राजनीतिक या गुट-संबंधी आतंकवाद गैर-राज्यीय कर्ताओं के द्वारा प्रयोजित होता है तथा इसका केंद्रबिंदु आंतरिक होता है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

फिर भी, चूँकि किसी स्थायी आतंकवादी अभियान को अस्त्र और धन की आपूर्ति की आवश्यकता रहती है, अधिकांश आतंकवादी संगठनों का अंतर्राष्ट्रीय पक्ष होता है।

आतंकवाद से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लड़ने के लिए अभी तक कोई संगठित प्रयास नहीं हुआ है, यद्यपि राज्य/देश स्तर पर इस दिशा में प्रयास होते रहे हैं।

“आतंकवाद” शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी क्रांति के उपरांत 1793-949 फ्रांस के आतंक के शासन के दौरान हुई। मूलतः क्रांति के नेताओं ने क्रांतिकारी बलों में से “देशद्रोहियों” को बाहर निकालने का प्रयास किया।

उन्होंने स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आतंक को सर्वोत्तम तरीका माना परंतु ज्यों-ज्यों क्रांति आगे बढ़ती गई इस शब्द को स्वयं क्रांतिकारी राज्य द्वारा राज्य हिंसा और गिलोटीन के साथ जोड़ा जाने लगा।

माधुनिक समय के आतंकवाद का आरंभ 1972 में बर्लिन में इजराइल की ओलम्पिक टीम पर हमले से माना जाता है तब से लेकर आन तक हवाई जहाज अगवा किए गए हैं. विस्फोट किए गए हैं,

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या जैसी हत्याएँ हुई हैं और सबसे अधिक दुस्साहसपूर्ण घटनाओं में से एक आतंकवादियों द्वारा हवाई जहाज से न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन का 11 सितम्बर 2001 का विनाश है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

आज अधिकांश आतंकवादी स्वयं को आतंकवादी कहलवाने की अपेक्षा अनियमित सैनिक बल तथा यहाँ तक कि स्वतंत्रता सेनानी कहलवाना पसंद करते हैं।

पिछली शताब्दियों के आतंकवादियों के सशक्त आदर्शवादी सिद्धांत थे। परंपरागत दृष्टि से आतंकवादी समूह सशक्त धार्मिक, कट्टर तत्त्व होते हैं जोकि संघर्षकर्ताओं का मूल होता है परंतु यहाँ राज्य-प्रायोजित अथवा राज्य आतंकवाद और गैर-राज्य आतंकवाद के मध्य भेद करना अनिवार्य है।

अमेरिका ने लंबे समय से लीबिया और ईरान (खोमेनी के शासन के दौराम) के आतंकी आक्रमणों को राज्य प्रायोजित आतंकवाद माना है।

वे राज्य जो आतंकवादी कार्यकलापों को पनपने का असर प्रदान करते हैं, वे इस श्रेणी में आते हैं। आज अधिकांश आतंकवादी गतिविधियाँ नृजातीय अलगाववादी आंदोलनों के रूप में कार्यरत हैं।

कई मामलों में नृजातीय समूहों को अखिल धार्मिक संपर्कों से सहयोग मिलता है जो आवश्यक नहीं कि देश की सीमा के भीतर हो। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

कई मुस्लिम समूह इस श्रेणी में आते हैं जबकि आइरिश रिपब्लिकन आर्मी , लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम , कुर्दिश उग्रवादी , स्पेन का बास्क होमलैण्ड एण्ड लिबर्टी जातीय आंदोलन की श्रेणी में आते हैं।

(1) वामपंथी आतंकवाद-पूँजीवाद को नष्ट करके साम्यवादी अधवा समाजवादी शासन की स्थापना के लिए छेदी गई हिंसा (जैसे रेड आर्मी फेक्शन, जर्मन रेड ब्रिगेड, प्राइमा लिनिया, द वैदर अंडरग्राउंड/सिम्बियोनीस लिबरेशन आर्मी) को वामपंथी आतंकवाद का नाम दिया जाता है।

(2) दक्षिणपंथी आतंकवाद-उदारवादी लोकतांत्रिक सरकारों के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग।

(3) राज्य प्रायोजित आतंकवाद-इनमें राज्य या तो स्वयं अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आतंकवादी तरीके अपनाता है अथवा आतंकवादी समूहों को शरण अथवा सहायता के माध्यम से कई प्रकार से सहयोग देता है।

(4) राष्ट्रवादी-अलगाववादी आतंकवाद-अपने राष्ट्रीय/नृजातीय समूह के लिए अलग राज्य की स्थापना की इच्छा से हिंसा करने वाले (जैसे-आइरिश रिपब्लिकन आर्मी , लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम , कुर्दिश वर्कर्स पार्टी बास्क होमलैण्ड एण्ड लिबर्टी ऐसे कुछ आतंकवादी संगठन हैं।

(5) धार्मिक आतंकवाद-धार्मिक सिद्धांतों के लिए और उनके अनुसार दैवी इच्छा की प्राप्ति के उद्देश्य से हिंसा का प्रयोग करते हैं। वे आमूल-चूल परिवर्तन लाने के उद्देश्य से “शत्रु” की वृहत् श्रेणी को लक्ष्य बनाते हैं (जैसे ऑम शिन्क्रियो, अलकायदा, हिजबुल, हमास)। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

नृजातीय आंदोलन पर आधारित आतंकवाद सदैव चर्चा का विषय रहा है। यदि नृजातीय आंदोलन का उद्देश्य आत्म-निर्णय है और उसकी प्राप्ति के लिए आतंकवादी तरीके प्रयोग में लाए जा रहे हैं,

तो उन्हें आतंकवादी कहा जाएगा अथवा स्वतंत्रता सेनानी? आत्म-निर्णय के अधिकार की संकल्पना पर शैक्षिक साहित्य में कई सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं जो संबंध विच्छेद की नैतिकता को समझते हैं।

“उचित कारण” सिद्धांतों में निरंकुशता का विरोध करने और आत्म-निर्णय के अधिकार के मध्य सशक्त संबंध हैं और ऐसा करने से मानवाधिकार के ढाँचे में आत्म-निर्णय के अधिकार को सुदृढ़ता मिलती है।

आतंकवाद से किस प्रकार बचाव किया जाए? लंबे समय से स्थापित लोकतांत्रिक देशों को आज इस वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है कि लोगों को आतंकवाद के प्रभाव से बचाने का मार्ग चुनने पर कुछ सीमा तक नागरिक स्वतंत्रता की कमी होना अनिवार्य

7. प्रक्रर्यात्मकतावाद और नव-प्रकार्यवाद के बीच अंतरों को उजागर कीजिए।

उत्तर- डेविड मिट्रानी सिद्धांत के रूप में कार्यात्मकता के मुख्य रचनाकार माने जाते हैं। उनका निबंध ‘ए वर्किंग पीस सिस्टम’ कार्यात्मकवादियों के मुख्य तर्कों का सार प्रस्तुत करता है और निबंध के शीर्षक के अनुसार ही उनके मुख्य दावे की ओर ध्यान आकर्षित करता है, कार्यात्मकता स्थायी शांति का मार्ग है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अवधि के दौरान लिखते हुए मिट्रानी ने अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्षेत्र में कल्याणकारी राज्यवाद के प्रति बढ़ती हुई घरेलू (आंतरिक) प्रवृत्ति का प्रेक्षण किया था और तर्क दिया था कि ये सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्था के परिणाम थे। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

जबकि हमारे सामान्य समाज का वास्तविक कार्य गरीबी, अज्ञानता और बीमारी पर विजय प्राप्त करना है। संप्रभुता पर आधारित वर्तमान राज्य प्रणाली न केवल अपर्याप्त है अपितु भूमंडलीय समस्याओं का समाधान ढूँढने के लिए बाधक भी है।

तकनीकी और गैर-राजनीतिक समस्याओं की बढ़ती हुई संख्या, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न हुई हैं. के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का ढाँचा बनाना आवश्यक है।

यहाँ कार्यात्मकवादियों (कार्यवादियों) ने राजनीतिक अभिजात वर्ग के बदले तकनीशियनों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का सुझाव दिया।

मिट्रानी ने तर्क दिया कि सामाजिक क्रियाकलाप को राजनीतिक और गैर-राजनीविक (तकनीकी) श्रेणियों में पृथक् किया जाए और यह कि ऐसे गैर-राजनीतिक या कार्यात्मक क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ स्थापित करना संभव है

क्योंकि इन संस्थाओं के कल्याणकारी लाभों के कारण राज्य से प्रतिरोध का होने की संभावना है सरकारी और गैर-सरकारी दोनों क्षेत्रों में 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही बहुत से अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को आविर्भाव हुआ।

वे प्रमुख रूप से संचार, परिवहन, वाणिज्य, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में की इनमें से कई ने दो महायुद्धों को झेला और अभी भी संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञ एजेंसियों के रूप में और अन्य स्वतंत्र संगठनों के रूप में कार्य कर रहे हैं। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

अंतर्राष्ट्रीय कार्यात्मक संगठन, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन , खाद्य और कृषि संगम , अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण शांति को कैसे प्रोत्साहित कर सकते हैं? कार्यात्मकवाद इस किस्म के कार्य को भिन्न-भिन्न तरीकों में शाति संवर्धन के रूप में देखते हैं। जो कि इस प्रकार हैं-

(1) यह उन बुनियादी मानवीय समस्याओं का समाधान करते हैं जो युद्ध के मूल कारण होते हैं। कार्यात्मक संगठन, जैसे ‘खाद्य और कृषि संगठन’ गेहूँ और चावल की नई किस्म विकसित कर देशों को उनकी भूखी जनता को भोजन दे सकते हैं। यह राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता को सीमित करता है।

उदाहरण के लिए राष्ट्र के नामरिक (जो अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से सहायता प्राप्त कर रहे हैं या अन्य देशों या अंतर्राष्ट्रीय संगठन उसी प्रकार की वहाँ सहायता देने के इच्छुक है जहाँ उसकी आवश्यकता है।

अपनी ही सरकार की उन नीतियों का समर्थन कम कर सकते हैं। जो उन देशों के विरोधी थे जो सहायता करने में योगदान कर रहे हैं।

इसके अलावा, कार्यात्मक गतिविधि याँ देश के अंदर, यहाँ तक कि सरकार और समूह के अंदर भी उत्पन्न होती हैं जिनके हित अंतर्राष्ट्रीय हितों से अधिक घनिष्ठता से जुड़े होते हैं।

उदाहरण के लिए हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की तकनीकी सहायता का प्रयोग कर रहा है और विश्व सहयोग का पक्षधर हो सकता है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

गाँव का डॉक्टर, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आपूर्ति की गई वैक्सीन (इंजैक्शन) पर निर्भर है, यह देखने के लिए निहित स्वार्थ पैदा कर सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन देश के अंदर काम करना जारी रखे।

(2) देश के अंदर कुछेक लोगों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय क्रियाकलाप कार्यमूलक कार्यों से काफी अधिक लोगों में अंतर्राष्ट्रीय वफादारी को बल मिल सकता है और हानिकारक राष्ट्रवादी कार्यों का विरोध कर सकता है।

नागरिक प्रायः सरकार का समर्थन करते हैं, क्योंकि सरकार उनके लिए उपयोगी कार्य करती है। यदि अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी ऐसे ही उपयोगी कार्य करते हैं तो नागरिक सरकार का समर्थन अब आँख बंद करके नहीं कर सकते हैं क्योंकि अब सरकार ही केवल लाभों का स्रोत नहीं रह गई है।

तीसरा तरीका (जिसमें कार्यात्मक गतिविधियाँ शांति का समर्थन करती है), भिन्न-भिन्न देशों के लोगों को आमने-सामने संपर्क में लाना है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

विदेशी “बाहरी” कम और मानवीय गुण युक्त अधिक प्रतीत होते हैं जबकि वे ठीक आपके बीच में रहते हैं और अन्य राष्ट्रीय समूहों के बारे में सामान्यीकरण स्वीकार करना कठिन होता है,

विशेषकर जब इस प्रकार के समूह अपने ही गाँव या कस्बे में रह रहे हों या कार्य कर रहे हों। कार्यात्मकवादियों को यह विश्वास हो गया था कि अंतर्राष्ट्रीय कार्यात्मक एजेंसियों के विद्यमान नेटवर्क का प्रसार जो 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से प्रकट हुआ था, न केवल विश्वव्यापी समस्याओं का समाधान करेगा अपितु राष्ट्र-राज्यों की कठोर संस्थागत संरचनाओं को भी निष्क्रिय करेगा।

इसलिए कार्यात्मकवाद केवल कार्यों का ही कार्यक्रम है। यह वास्तव में प्रस्तावक और नीतिमूलक है। यह वर्णनात्मक और रोग की पहचान करने वाला भी है क्योंकि यह मानवीय स्वरूप के महत्त्वपूर्ण पहलुओं तथा संस्थागत अंत:क्रिया में विकास की धारणा से जुड़ा हुआ है।

कार्यात्मकता के आलोचक-मिट्रानी के कार्यात्मक एकीकरण के सिद्धांत को स्वतः इन्हीं विचारों के पक्षधर कुछ उन सदस्यों द्वारा चुनौती दी गई जिन्होंने राजनीतिक एकीकरण के लिए वैकल्पिक मार्ग का सुझाव दिया।

वे नव-कार्यात्मकवादी थे, उनकी तुलना में जिन्होंने ऐसी नई विश्व व्यवस्था का सृजन करने का प्रयास किया था जिसमें प्रभुत्तासंपन्न राज्य गौण स्थान लेते थे, नव-कार्यात्मकवादी विद्यमान राज्यों के एकीकरण से नए राज्य बनाने का प्रयास करते हैं। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

नव-कार्यात्मकता का सिद्धांत-1960 के दशक में अर्नस्ट हास (Emst Hass) द्वारा विकसित किया गया था, जिसकी प्रेरणा पश्चिमी यूरोप के देशों के बीच सहयोग तीव्र होने से मिली थी। यह 1950 के दशक में प्रारंभ हुआ था। मिट्रानी के सिद्धांत का हास आगे विकास करते हैं।

परंतु वह इस धारणा को अस्वीकार करता है कि “तकनीकी” मामलों को राजनीति से अलग किया जा सकता है। समाकलन (एकीकरण) ऐसी प्रक्रिया है जिससे “राजनीतिक अभिकारकों को उन नए केंद्रों के प्रति अपनी निष्ठा बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है

जिनकी संस्थाओं का अधिकार पहले से विद्यमान राष्ट्र-राज्यों पर रहा है या जो अधिकार क्षेत्र की माँग करते हैं। कार्यात्मकवाद के सिद्धांत को परस्पर विरोधी और अस्पष्ट माना गया है।

इसकी सबसे अधिक बार-बार की गई आलोचना यह रही है कि यह स्पष्ट नहीं है, कार्यात्मक संस्थाओं के कार्य का समन्वय किस तरीके से किया जाएगा। कार्यात्मकवादियों के सूत्र अव्यावहारिक किस्म के हैं।

कुछ आलोचकों ने वर्क दिए कि कार्यात्मकता राजनीति के कार्य का अधिक ध्यान नहीं रखती है। यह कहा जाता है कि कार्यात्मकवाद मानना है कि लोगों और सन्यों में साथ-साथ काम करने की स्वाभाविक इच्छा विद्यमान है।

यह इस कल्पना पर आधारित है कि मानव स्वभाव में अनिवार्यतः अच्छाई होती है। इसका अभिप्राय है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से अच्छा और तर्कसंगत है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

आलोचकों के अनुसार ग्रह मानव स्वभाव का एकपक्षीय अवलोकन है। वास्तव में, मनुष्य भलाई और बुराई का मिश्रण है। वह अच्छा और बुद्धिसंपन्न हो सकता और अमान 6 4 अविवेकी तथा स्वर्थी भी हो सकता है।

दूसरा कारण, कार्यात्मकवाद प्रहार के लिए क्यों खुला है, यह क्या नहीं है और क्या कभी भी प्रणालीबद्ध विवरणात्मक विश्लेषण करने की मंशा नहीं थी।

इनकी रचनाएँ छोटी पुस्तिकाओं, लेखां और पुस्तकों में यत्र-तत्र विखरे हुए हैं जिन्हें विरले ही सुसंबद्ध सैद्धांतिक ढाँचे में एक-साथ लाया गया है।

कार्यात्मकवादियों और नव-कार्यात्मकवादियों के उपागम में आधुनिक राज्य के अंतर्गत समाज की प्रमुख विशेषताओं के बारे में अंतर है। ऐसा प्रतीत होता है कि कार्यात्मकवादी समाज में सर्वसम्मति पर समझौते के तत्त्व को संकेत देते हैं। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

दूसरी ओर, नव-कार्यवादी तर्क देते हैं कि सामाजिक जीवन पर हितों के बीच प्रतिस्पर्धा द्वारा प्रभुत्व किया हुआ है।

अतः यढ़ तर्कसंगत है कि हित लाभ समूहों को कार्यात्मक एकीकरण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण स्थान आटित किया गया है।

अमीद हास एकीकरण को “ऐसी प्रक्रिया के रूप में उल्लेख करता है जिसमें कई पृथक् राष्ट्रीय व्यवस्थाओं में राजनीतिक अभिकर्ताओं द्वारा नई और अधिक बड़ी व्यवस्था के प्रति अपनी निष्ठाएँ, आशाएँ और राजनीतिक क्रियाकलाप बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।”

वह आगे कहता है कि “विद्यमान अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के अंतर्गत संचालित हितलाभ राजनीति के सस्थानीकृत प्रतिमान के रूप में” एकीकरण की अवधारणा द्वारा निध ििरत की गई है।

नवकार्यवादी या एकीकरण सिद्धांत प्रक्रिया संबंधी आम सहमति को आवश्यकता पर केंद्रित हैं, समूहों को सम्मत ढाँचे के माध्यम से अपने हितों का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जो एकीकरण प्रक्रिया का अंतिम स्थिति में आवश्यक तत्त्व है।

नवकार्यवादी एकीकरण प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की मनोवृत्ति पर बल देता है जो आदर्श रूप से नई राजनीतिक प्रणाली के उद्भव में चरम बिंदु है। MPSE 6 Free Assignment In Hindi

जबकि कार्यवादियों ने सार्वदेशिक सामाजिक मनोवृत्ति के समाज के लिए प्रचलित मनोवृत्ति पर बल दिया, नवकार्यवादी औपचारिक संस्थानिक ढाँचे में अधिक इच्छुक है।

दूसरी ओर कार्यवादी प्रभावकारी एकीकरण के परीक्षण के रूप में प्रचलित मनोदशा में परिवर्तन से अधिक संबंधित हैं।

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