IGNOU MPSE 1 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

MPSE 1

भारत एव विशव

MPSE 1 Free Assignment In Hindi

MPSE 1 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 2. भारतीय विदेशनीति के उद्देश्य क्या है विभिन्न दृष्टिकोणों की व्याख्या कीजिए

त्तर-मानव जाति की कोई भी क्रिया उत्पादन से संबंधित होती है। मनुष्य जब कोई भी काम करता है तो उसके पीछे कुछ निश्चित उद्देश्य होते हैं। वह उद्देश्य के माध्यम से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करता है। ऐसा ही तत्व भारत की वैदेशिक नीति के साथ संलग्न है।

बिना किसी उद्देश्य के किसी भी नीति का अवलम्बन करना और उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करना उद्देश्य रहित क्रिया नहीं कही जा सकती है।

भारत के संदर्भ में भी यह बात सटीक लगती है। स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही भारतीय नेताओं ने भारत की वैदेशिक नीति का सिद्धांत और उद्देश्य निश्चित कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के बाद वैदेशिक नीति के अंतर्गत उसी सिद्धांत के द्वारा उद्देश्य की प्राप्ति का प्रयत्न किया गया।

विभिन्न विद्वानों, समालोचकों तथा विश्लेषकों ने भारत की वैदेशिक नीति का समय-समय पर विश्लेषण किया और इसका मूल्यांकन करके उपयोगी तथ्यों को स्पष्ट किया।

भारत की वैदेशिक नीति का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और बाह्य सुरक्षा की वृद्धि करना था। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

भारत लंबे समय से पराधीनता का जीवन जीने और औपनिवेशिक शासन के द्वारा शोषित होने के बाद 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ।

इसलिए उसके समक्ष यह महत्त्वपूर्ण समस्या थी कि भविष्य में अपनी स्वतंत्रता को कायम कैसे रखे अथवा किसी विदेशी के साथ अपने अस्तित्व के संबंध में समझौता न करे या किसी भी राष्ट्र को यह अवसर प्रदान
नहीं करे कि वह राष्ट्र उसके आंतरिक और बाह्य व्यवहारों को नियंत्रित एवं निर्देशित करे।

भारत की वैदेशिक नीति एक सफल वैदेशिक नीति के रूप में प्रदर्शित हुई, जिसके सहयोग से भारत किसी भी विदेशी आक्रमण को रोकने में सक्षम हो सकता है अथवा उसका प्रतिरोध भी कर सकता है।

भारत की वैदेशिक नीति राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाये रखने के साथ-साथ विश्व स्तर पर संयुक्त रूप से दूसरे राष्ट्रों के साथ मिलकर अन्य राष्ट्रों की सुरक्षा को भी अपने-आप में समेट लेता है,

अर्थात् यह कहा जा सकता है कि भारत की वैदेशिक नीति का मूल तत्त्व यह नहीं रहा है कि यह केवल अपने ही राष्ट्र की सुरक्षा करे और दूसरे राष्ट्रों को असुरक्षित रहने के लिए बाध्य करे।

भारत की हमेशा से यह नीति रही है कि यह विश्व के सभी राष्ट्रों के साथ सहयोगात्मक भावना के आधार पर मित्रतापूर्ण संबंध की स्थापना करे और खासकर पड़ोसी राज्यों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध, सहयोगात्मक भावना और प्रेमपूर्ण आचरण को महत्त्व दे। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि भारत की वैदेशिक नीति का मूल तत्त्व जहाँ एक तरफ सहयोग, मित्रता एवं प्रेम के बंधन पर टिका है, वहीं दूसरी तरफ वैदेशिक नीति के अंतर्गत यह विश्व शांति को भी स्थापित करने का प्रयल करता रहा है।

आधुनिक युग में भारत ने दो विश्व-युद्धों को देखा और उसकी विभीषिका में विश्व के विभिन्न देशों को जलते हुए भी देखा।

इसलिए उसका मुख्य उद्देश्य है युद्ध की विभीषिका से मानव जाति को बचाना और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं और मतभेदों के बावजूद भी सभी राष्ट्रों के साथ सहयोग स्थापित करते हुए विश्व में शांति के परिवेश को स्थापित करना।

इसी उद्देश्य को लेकर भारत स्वतंत्रता के बाद से अब तक विश्व राजनीति में प्रयत्नशील रहा है।

भारत लंबे समय तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एक अंग रहा है और साम्राज्यवादी शोषण से इसको विस्तृत अनुभव एवं ज्ञान प्राप्त हुआ तथा महात्मा गाँधी के नेतृत्व में लंबे समय के अहिंसात्मक संघर्ष के बाद 1947 में स्वतंत्र हुआ।

इसलिए भारत स्वतंत्रता के पूर्व से ही साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद रूपी कलंक को इस पृथ्वी से हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहा है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

इसलिए भारतीय वैदेशिक नीति के मूल तत्त्व के रूप में रंगवाद, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की समाप्ति का लक्ष्य निर्धारित रहा है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने अपने इसी विचार का अवलम्बन करते हुए अफ्रीका और एशिया के विभिन्न देशों में स्वतंत्रता के लिए चल रहे राष्ट्रीय संघर्षों का तहेदिल से समर्थन किया है।

भारत की बैदेशिक नीति के अंतर्गत या तत्व ची निहित रहा है कि वह सचीवानों की सम्प्रभुता, स्वतंत्रता एवं अखण्डता का सम्मान करे और सभी राष्ट्रों को समान अधिकार की प्राप्ति में सहयोग दे तथा बिना किसी भेदभाव के सभी राष्ट्रों को समान अधिकार की श्रेणी में प्रतिष्ठित करे।

इसी नीति के कारण भारत समय-समय पर दक्षिण अफ्रीका में चल रही रंगभेद नीति का व्यापक रूप से विरोध करता रहा है और भारत स्वतंत्रता के समय से ही यह प्रयत्न करता रहा है कि भारतीय मूल के नागरिक जिस किसी भी देश में रहें,

उन्हें समानता के आधिकार से संपन्न किया जाय और उनकी रक्षा कानून के शासन के अंतर्गत की जाय। भारत ने अपनी वैदेशिक नीति के इन उद्देश्यों का पालन स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही प्रारंभ कर दिया था।

हिटलर ने जब चेकोस्लोवाकिया और मुसोलिनी ने जब इथियोपिया पर आक्रमण किया तब भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की तथा स्वतंत्रता के बाद भी जब सोवियत रूस ने चेकोस्लोवाकिया, हंगरी आदि देशों में बलपूर्वक साम्यवादी शासन की स्थापना की, तो भारत ने इसका विरोध किया।

अमेरिका ने जब वियतनाम और कोरिया में युद्ध का ताण्डव प्रारंभ किया, तब भी भारत ने विश्व स्तर पर विरोध के स्वर को उजागर किया।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

भारतीय वैदेशिक नीति का मूल उद्देश्य यह रहा है कि पराधीन और शोषित राष्ट्रों को स्वतंत्र किया जाय तथा आर्थिक क्षेत्र में उन्हें पर्याप्त सहयोग देकर विकास के लिए प्रोत्साहित किया जाय।

इसीलिए भारतीय वैदेशिक नीति औद्योगिक क्षेत्र में विकसित विभिन्न राष्ट्रों के साथ मधुर संबंध स्थापित करती रही है। इसके पीछे भारतीय वैदेशिक नीति का यह लक्ष्य रहा है कि औद्योगिक रूप से विकसित राष्ट्रों से भारत को उद्योगों के विस्तार में पर्याप्त सहयोग मिल सके।

भारत की वैदेशिक नीति का मूल उद्देश्य और लक्ष्य विदेशी सहयोग के द्वारा केवल अपने ही राष्ट्र की उन्नति एवं संपन्नता प्राप्त करना नहीं है, वरन् यह नव-स्वतंत्र और नवोदित राष्ट्रों के आर्थिक विकास और गरीबी से मुक्ति तथा न्याय संगत आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था की स्थापना भी रहा है।

भारत हमेशा से इस कार्य में प्रयत्नशील रहा है कि नवोदित स्वतंत्र राष्ट्रों को दरिद्रता, भुखमरी, अशिक्षा, बीमारी आदि से त्राण मिल सके और वे राष्ट्र स्वतंत्र रूप से आत्मनिर्भर होकर वैदेशिक क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र वैदेशिक नीति का संचालन कर सकें।

भारतीय वैदेशिक नीति अंतर्राष्ट्रीय जगत में स्वस्थ और समानता के आधार पर नयी परंपरा को विकसित करने में समर्थ हुई है। इसी कारण से विश्व के विभिन्न देश भारतीय वैदेशिक नीति के प्रशंसक रहे हैं और इसी नीति का अनुसरण भी करते रहे हैं। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

भारत वैदेशिक क्षेत्र में विभिन्न राष्ट्रों के साथ बल प्रयोग के सिद्धांत का विरोधी रहा है तथा राष्ट्रों के बीच उत्पन्न हुए मतभेदों को समाप्त करने और वैश्विक समस्याओं का समाधान करने के लिए विचार-विमर्श के द्वारा शांतिपूर्ण साधनों के प्रयोग का अटल समर्थक रहा है।

भारत विश्व राजनीति में राष्ट्रों के बीच मतभेदों को मिटाने और सभी राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण परिवेश की स्थापना का प्रबल समर्थक रहा है।

विश्व की विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए भारत ने हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति निष्ठा प्रदर्शित की है और सक्रिय सहयोग देकर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन पर विशेष रूप से बल दिया है।

भारत स्वतंत्रता के बाद से ही विश्व संगठन का समर्थक रहा है। भारत इस बात को जानता है कि विश्व संगठन अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सहयोग की स्थापना का एक महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

इसीलिए इसके सहयोग के द्वारा विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है और अविकसित राष्ट्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।

विश्व संगठन अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में नि:शस्त्रीकरण के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। इसलिए स्वतंत्रता के बाद शीघ्र ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्राप्त की। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

1954 में भारत ने चीन के साथ समझौता करके पंचशील के सिद्धांतों को विश्व स्तर पर प्रचारित तथा प्रसारित किया। पंचशील के अंतर्गत अनाक्रमण, अहस्तक्षेप, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व आदि की भावना को वैदेशिक नीति के रूप में स्पष्ट किया गया है।

ऊपर वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारत हमेशा से विश्व राजनीति में शांति का समर्थक राष्ट्रों के साथ मित्रता, सहयोग, सहअस्तित्व और अनाक्रमण एवं अहस्तक्षेप की नीति का पालन करता रहा है तथा इसी परिवेश में यह लोकतांत्रिक शासन पद्धति को प्रश्रय देता रहा है।

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प्रश्न 3. भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाली मुख्य संस्थाएँ कौन-सी हैं? वे एकसाथ किस प्रकार कार्य करती हैं?

उत्तर-भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाली संस्थाएँ हैं-विदेश मंत्रालय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद एवं संसदीय समितियां।

विदेश मंत्रालय-वैदेशिक नीति के निर्धारण में विदेश मंत्रालय की भूमिका बहुत ही विस्तृत और व्यापक होती है। भारत की आंतरिक नीति के निर्धारण में अथवा आंतरिक समस्याओं के निदान में विशेष कठिनाई नहीं होती, परंतु किसी भी देश के साथ संबंध स्थापित करने और किसी भी समस्या पर उससे बातचीत करने की समस्या बहुत ही कठिन और जटिल होती है, MPSE 1 Free Assignment In Hindi

क्योंकि कोई भी देश पूर्णरूप से स्वतंत्र होता है, उसकी मानसिकता और व्यवहार भी अलग होते हैं। इसलिए किसी भी समस्या पर उस देश से बात करने के लिए अच्छे परिवेश और व्यवहार की प्रतीक्षा की जाती है।

जब अच्छा परिवेश और परिस्थितियां नजर आती हैं, तभी बातचीत करना आवश्यक होता है। कोई भी देश किसी भी देश से बातचीत करने के क्रम में अधिकतम राष्ट्रीय हित की अपेक्षा करता है।

इसलिए वह इस बात की प्रतीक्षा करता रहता है कि वर्तमान सरकार की अपेक्षा चुनाव के बाद दूसरी सरकार के आने पर उसे अधिक राष्ट्रीय हित मिल सकता है।

इन सभी बातों की जानकारी विदेश मंत्रालय के पदाधिकारियों को विस्तृत रूप से रहती है। विदेश मंत्रालय का अध्यक्ष विदेश मंत्री होता है। वह कैबिनेट स्तर का मंत्री होता है और उसके अंतर्गत वैदेशिक मामलों के विशेषज्ञ आई.एफ.एस. अधिकारी होते हैं।

मंत्री सामान्यतया वैदेशिक मामलों में अनभिज्ञ होते हैं। इसलिए वे अपने विभाग में कार्य कर रहे विशेषज्ञ पदाधिकारियों से विचार-विमर्श करते हैं।

सामान्यतया देखा जाता है कि साधारण विषयों पर विशेषज्ञों की मंत्रणा के आधार पर कोई भी निर्णय लिया जाता है और विदेश मंत्री से परामर्श करके उसको अंतिम रूप दिया जाता है।

विदेश मंत्री यदि किसी विषय की गंभीरता को देखता है, तो कैबिनेट की सभा में वह उस संबंध में विचार-विमर्श करता है और कैबिनेट की स्वीकृति लेता है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

विदेश विभाग के अंतर्गत संघ लोकसेवा आयोग द्वारा चयनित पदाधिकारी होते हैं। विदेश विभाग का एक सचिव होता है, जो वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी होता है।

वह वैदेशिक मामलों का विशेष ज्ञान रखता है। विदेश सचिव अपने कार्यालय का स्थायी अध्यक्ष होता है और वैदेशिक मामलों में विदेश मंत्री को महत्त्वपूर्ण सलाह देता है।

विदेश सचिव की सहायता के लिए दो वरिष्ठ आई.एफ.एस. अधिकारी होते हैं, जिन्हें विदेश सचिव पूर्व और विदेश सचिव पश्चिम के नाम से पुकारा जाता है। विदेश मंत्रालयों में अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी होते हैं।

विदेश सचिव की सहायता के लिए सामान्य रूप से तीन अतिरिक्त सचिव भी कार्यरत रहते हैं। विदेश मंत्रालय के अंतर्गत 24 प्रभाग होते हैं और प्रत्येक प्रभाग का प्रमुख एक संयुक्त सचिव रहता है।

विदेश मंत्रालय में विश्व को क्षेत्रीयता के आधार पर 12 भागों में बाँटा गया है। इसलिए इसके 12 प्रादेशिक विभाग निश्चित किए गए हैं। इन प्रभागों के अंतर्गत कनाडा, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन देश, खाड़ी के देश, पूर्वी एशिया, दक्षिणी अमेरिका के समूहों को रखा गया है।

इसके लिए अलग-अलग प्रभाग बनाए गए हैं। ये सभी प्रभाग अपने-अपने क्षेत्र में कार्यों का संपादन करते हैं।

इनके अतिरिक्त नवाचार, विदेश प्रचार, ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन, नीति निर्माण और संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधों की स्थापना के लिए 11 क्रियात्मक प्रभाग भी हैं और सारे प्रभागों पर आंतरिक नियंत्रण और प्रशासनिक कार्यों के संपादन के लिए एक प्रशासनिक प्रभाग भी स्थापित है।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

इन प्रभागों के अंतर्गत सारे तथ्यों का अनुसंधान एवं विचार-विमर्श होता है। प्रारंभ में केवल ऐतिहासिक प्रभाग ही था, परंतु चीनी आक्रमण के बाद योजना और अनुसंधान प्रभाग भी स्थापित किया गया।

1963 में पूर्वी एशिया अनुसंधान समन्वय प्रभाग स्थापित किया गया। 1965 में सामयिक अनुसंथाल प्रभार स्थापित किया गयाविर्तमान समय में विदेश मंत्रालय के अंतर्गत एक नीति नियोजन और अनुसंधान प्रभाग भी है।

विदेश विभाग के द्वारा विभिन्न देशों में दूतावासों की स्थापना की गई है। इन दूतावासों में आई.एफ.एस. अधिकारी कार्यरत रहते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित सूचनाओं को एकत्र करते हैं और इसकी सूचना सरकार को देते हैं।

दूतावास के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के अटैची होते हैं जो कृषि, सैनिक, उद्योग व्यवसाय, शिक्षा, विज्ञान आदि के संबंध में विशेष जानकारी दूतावासों को देते हैं।

दूतावासों के अंतर्गत इंटेलिजेंस विभाग भी होता है, जो समस्त सूचनाओं को एकत्रित करके सारी सामग्रियाँ दूतावासों को सौंपता है।

इंटेलिजेंस विभाग का संबंध एक तरफ दूतावास एवं दूसरी तरफ विदेश विभाग से भी होता है। कैबिनेट सचिवालय में एक विभाग रॉ भी है, MPSE 1 Free Assignment In Hindi

जो विभिन्न प्रकार की सूचनाएं आवश्यकता पड़ने पर एकत्रित करता है। इंटेलिजेंस ब्यूरो का संबंध आंतरिक सूचना से होता है और रॉ का संबंध बाह्य सूचना से।

इससे स्पष्ट होता है कि विदेश मंत्रालय विभिन्न प्रभागों और संगठनों के माध्यम से वैदेशिक नीति के निर्माण एवं कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद- प्रारंभ से ही राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण एवं इस प्रणाली को व्यवस्थित करने के संबंध में यह आवाज उठती रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का गठन किया जाए।

इस संबंध में प्रो. के.पी. मिश्रा और के. सुब्रह्मण्यम ने इस संस्था की स्थापना पर विशेष बल दिया। अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी संगठन है।

इसलिए भारत में भी इसी प्रकार का संगठन स्थापित करने पर विशेष बल दिया गया, ताकि वह समय-समय पर अपनी सभाओं के द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में सरकार को परामर्श दे।

इसके लिए नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् अधिनियम संसद के द्वारा बनाया गया। विद्वानों, विशेषज्ञों और नेताओं की बार-बार मांग के बाद वाजपेयी सरकार ने 1998 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की स्थापना की। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

प्रधानमंत्री परिषद् के अध्यक्ष होते हैं। विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष इस परिषद् के सदस्य होते हैं

तथा सलाहकार के रूप में वैज्ञानिक, रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ, विदेश सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद्, सेवानिवृत्त नौकरशाही के वरिष्ठ अधिकारी तथा सेना के अवकाश प्राप्त प्रमुख अधिकारी होते हैं।

इसके अंतर्गत तीनों सेनाओं के प्रमुख, इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख तथा रॉ के प्रमुख सम्मिलित रहते हैं। इसका कार्यालय संयुक्त इंटेलिजेंस कमिटी के सचिवालय में ही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की सफलता के लिए और प्रधानमंत्री को परामर्श देने के लिए पर्याप्त पदाधिकारियों की कमी है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की अध्यक्षता तो प्रधानमंत्री को करनी चाहिए, परंतु प्रधानमंत्री द्वारा इसकी उपेक्षा हमेशा इस बात को लेकर की जाती है कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड है ही, तब इसकी क्या उपयोगिता है।

इसीलिए प्रधानमंत्रीगण न तो इसकी अध्यक्षता करते हैं और न इसकी मीटिंग ही बुलाते हैं। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की अध्यक्षता का भार अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र को सौंप दिया, यह उचित बात दिखाई नहीं पड़ती है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

1998 में जब राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की स्थापना की गई, तो प्रधानमंत्री की अनिच्छा सर्वविदित रूप से जानी गई। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् को परमाणु सिद्धांत के संबंध में मसौदा तैयार करने का काम सौंपा गया और इसने कुशलतापूर्वक इस कार्य का संपादन किया।

प्रश्न यह उठता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का उचित रूप से उपयोग नहीं किया जा रहा है, क्योंकि सरकार इसके प्रति उदासीन है।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् व्यापक रूप में अपने कार्यों का संपादन कर सकती थी, परंतु इसे न तो कोई विशेष कार्य सौंपे जाते हैं और न इसकी समान रूप से सभा बुलाई जाती है जिसके कारण इसकी उपयोगिता सर्वव्यापक नहीं हो पा रही है।

प्रधानमंत्री कार्यालय – भारत में स्वतंत्रता के बाद संसदात्मक लोकतांत्रिक प्रणाली क्षानाई गई है। इस प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमंत्री की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि एक तरफ वह संसद के बहुमत दल का नेता होता है, MPSE 1 Free Assignment In Hindi

तो दूसरी तरफ वह कार्यपालिका को वास्तविक प्रधान भी होता है। इसी कारण से प्रधानमंत्री का कार्यालय वैदेशिक नीति का निर्माण, निर्णय और संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह बात भी निश्चित है कि इन सारे कार्यों का संपादन प्रधानमंत्री का कार्यालय स्वयं अकेला ही नहीं कर लेता। सामान्यतया वैसे ही मामले प्रधानमंत्री के कार्यालय में महत्त्वपूर्ण रूप से निपटाये जाते हैं।

जिनका संबंध भारत की सुरक्षा, वैदेशिक नीति के लक्ष्यों, भारत के आर्थिक विकास आदि से होता है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू वैदेशिक मामले में बहुत ही दक्ष एवं वैदेशिक व्यवहारों से पूर्णरूप से परिचित थे।

इसीलिए विदेश विभाग को वे अपने ही अधीन रखते थे और अपने कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों से परामर्श लेकर अपनी वैदेशिक नीति का संचालन स्वयं करते थे,

जिसके कारण उनके काल में प्रधानमंत्री का कार्यालय वैदेशिक नीतियों के निर्माण, निर्धारण एवं संचालन का केन्द्र बिन्दु बन गया। तब से प्रधानमंत्री का कार्यालय वैदेशिक नीति के संबंध में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।

संसद – भारतीय संविधान के अंतर्गत वैदेशिक नीति, युद्ध और शांति, संयुक्त राष्ट्र संघ, दौत्य संबंध, अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और व्यापार, नागरिकता तथा नागरिकता का देशीयकरण आदि केन्द्रीय सूची के विषय हैं।

केन्द्रीय सूची का विषय होने के कारण इन सभी विषयों पर विधायन का अधिकार संसद को पूर्णरूपेण प्राप्त है। इसलिए संसद वैदेशिक नीति के निर्धारण एवं संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है और वैदेशिक नीति को प्रभावित भी करती है।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

संसद का वित्त पर पूरा अधिकार होता है। इसलिए वित्त पर नियंत्रण करके भी वैदेशिक नीति को प्रभावित करने में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वैदेशिक नीतियों पर संसदीय समितियों का प्रभाव

(i) भारत के संसद में एक परामर्शदात्री समिति होती है, जो वैदेशिक संबंधों की स्थापना एवं संचालन के संबंध में व्यापक रूप से विचार-विमर्श करके सरकार को सहयोग देती है।

(ii) 1971 में जब भारत-रूस के बीच मैत्री संधि हुई, तो संसद की परामर्शदात्री समिति ने विशेष रूप से चर्चा नहीं की और इसे बिना किसी हिचक के स्वीकार कर लिया।

(iii) 2 जुलाई, 1972 को जब शिमला समझौता हुआ तो संसदीय परामर्शदात्री समिति के अंतर्गत इसे नहीं रखा गया, फिर भी संसदीय समितियों की भावना इसके अनुकूल थी।

(iv) 1976-77 में भारत के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आकलन समिति ने विदेशों में स्थित दूतावासों की कार्यप्रणालियों की जाँच की।

(v) 1970-80 के दशक में विभिन्न विद्वानों ने भारतीय वैदेशिक नीति एवं रक्षा संबंधी मामलों पर विचार करने के लिए स्थायी समिति के निर्माण पर बल दिया।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

(vi) वैदेशिक नीति की समीक्षा करने और उससे संबंधित खामियों को उजागर करने का काम संसद की विभिन्न समितियाँ करती हैं।

(vii) 1995 में संसद की रक्षा संबंधी समिति ने चीन के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के संदर्भ में कहा था कि लंबे समय के बावजूद भी चीन को भारत की महत्त्वपूर्ण चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

भारत की संसद में विभिन्न समितियों के अंतर्गत सेना, रक्षा, और वैदेशिक नीति संबंधी विशेषज्ञ होते हैं, जो संसद और सरकार को वैदेशिक संबंधों के निर्माण एवं संचालन से संबंधित सरकार की रिपोर्टों की जांच करके सरकार को व्यापक रूप से परामर्श देते हैं और वैदेशिक नीति को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं।

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प्रश्न 4. शीतयुद्ध काल के पश्चात भारत अमेरिका संबंधों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद तथा रूस के बिखराव के कारण भारत और अमेरिका के बीच मधुर संबंधों का दौर शुरू तो हुआ, फिर भी कुछ प्रश्नों पर अमेरिका और भारत के बीच मतभेदारहे हैं, जो निम्नलिखित हैं

(i) कश्मीर मसला-शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद जब 1998 में कारगिल पर पाकिस्तान + आक्रमण कर दिया, तो भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ गया, MPSE 1 Free Assignment In Hindi

जिसमें पाकिस्तान ने अमेरिकी अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग किया, परंतु अमेरिका ने पाकिस्तान पर इस संबंध में कुछ भी प्रतिबंध नहीं लगाया, जिसके कारण भारत पाकिस्तान में व्यापक मतभेद है।

(ii) पाकिस्तान को अमेरिकी सुरक्षा सहायता-अमेरिका को यह पूर्णरूपेण मालूम है कि उसके द्वारा दिये गये हथियारों का उपयोग पाकिस्तान हमेशा भारत के विरोध में करता रहा है। इस प्रश्न को लेकर भारत और अमेरिका के बीच गहरे मतभेद हैं।

(iii) कारगिल युद्ध-कश्मीर की समस्या को लेकर पाकिस्तान हमेशा भारत के साथ सौतेला व्यवहार करता आया है।

बिल क्लिंटन से बार-बार मुशर्रफ ने कश्मीर के मामले में मध्यस्थता करने का निवेदन किया और पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में समस्या उत्पन्न करने के बावजूद क्लिटन ने कोई कदम नहीं उठाया।

अमेरिकी हथियारों का उपयोग पाकिस्तान कश्मीर में कर रहा है, लेकिन अमेरिका पाकिस्तान की इस संबंध में न तो निंदा ही करता है और न ही अस्त्र-शस्त्रों की सहायता ही बंद करता है। इसलिए इस समस्या को लेकर भारत और अमेरिका के बीच मतभेद हैं।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

(iv) आतंकवाद-अमेरिका पर जब आतंकवादी हमला हुआ, तो अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में आतंकवादियों का सफाया किया।

परंतु 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर जब आतंकवादियों ने हमला किया, तब अमेरिका ने भारत से संयम से काम लेने का आग्रह किया।

अमेरिका के इस कथन से भारत को बहुत तकलीफ हुई। इस समस्या को लेकर भारत-अमेरिका का मतभेद बना हुआ है।

(v) परमाणु मुद्दा-अमेरिका के पास परमाणु तकनीक और बम विद्यमान हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और रूस परमाणु शक्ति से पूर्णरूपेण संपन्न हैं, परंतु भारत ने जब परमाणु विस्फोट किया, तब अमेरिका को बहुत तकलीफ हुई।

अमेरिका बार-बार भारत पर परमाणु अप्रसार संधि तथा परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाल रहा है। इसके कारण भारत-अमेरिका के बीच मतभेद हैं।

21वीं शताब्दी में भारत-अमेरिकी संबंध-21वीं शताब्दी के प्रारंभ में शीतयुद्ध जैसी परिस्थिति नहीं रही और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटन ने इस बात को महसूस किया कि भारतीय उपमहादेश में वैसी स्थिति नहीं रखी जा सकती है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

विश्व स्तर पर आर्थिक मंदी के बावजूद भी भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है। नये परिवेश (सन् 2000) में भारत की यात्रा कर बिल क्लिटन ने वाजपेयी के शासनकाल में भारत-अमेरिकी संबंध का श्रीगणेश किया और भारत के साथ मधुर संबंध बनाने पर बल दिया।

क्लिंटन ने पाँच दिनों की भारत यात्रा की उनका व्यापक स्वागत किया गया। भारत से लौटते हुए वे चार घंटे के लिए पाकिस्तान में रुके और मुशर्रफ को प्रजातंत्र की बहाली, आतंकवाद पर नियंत्रण आदि के संबंध में डांट भरे सुझाव देते हुए लौटे।

कारगिल युद्ध के समय भारत के आचरण और संयम की उन्होंने सराहना भी की। क्लिंटन अपने शासन के अंतिम चरण में भारत आये थे और यह महसूस किया जाने लगा कि उनके बाद जो भी राष्ट्रपति होगा, उसका संबंध भारत के साथ अच्छा रहेगा।

परंतु बुश की विजय ने भारत को एक नयी आशा प्रदान की। बुश भारत के प्रति विशेष रूप से मुखातिब हुए। उन्होंने चीन को सामरिक प्रतिद्वंद्वी और भारत को लोकतांत्रिक तथा सामरिक सहयोगी माना।

11 सितंबर के बाद का भारत-अमेरिकी संबंध-अमेरिका पर 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमले ने संपूर्ण विश्व को चौंका दिया।

बुश प्रशासन ने जब आतंकवाद के सफाये का आह्वान किया, तो भारत ने उन्हें व्यापक समर्थन दिया। फिर भारत और अमेरिका के बीच बहुत नजदीकी आयी, परंतु जब 2001 अक्तूबर में कश्मीर विधान सभा और 18 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर आतंकवादियों के हमले हुए तो भारत-अमेरिकी संबंध में थोड़ी कडुवाहट पैदा हुई।

भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंध तोड़ा और सीमा पर सेना की तैनाती की, तो अमेरिका भारत को संयम बरतने का निर्देश दिया उस समय भारतीय जनमानसा में यह भावना फैलागाईकि अमेरिका आतंकवादी हमले पर दोहरे मानदंड अपना रहा है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

जब कारगिल युद्ध चल रहा था, तब अमेरिका को इस बात की चिंता थी, कि कहीं यह आणविक युद्ध में न बदल जाये, परंतु संयोगवश ऐसा नहीं हुआ और अमेरिका की चिंता दूर हुई।

इराक में जब अमेरिका ने संयुक्त रूप में सैनिक कार्यवाही की तो भारत को यह अच्छा नहीं लगा। इससे भारत अमेरिकी संबंधों में थोड़ी कडुवाहट आयो।

युद्ध के बाद इराक में अमेरिकी सैनिकों के अंतर्गत रहकर भारतीय सैनिकों को जब शांति स्थापित करने का परामर्श दिया गया, तो भारत ने इसे नहीं माना।

इससे अमेरिका को बहुत दुःख हुआ। इस तरह भारत-अमेरिकी संबंध समुद्री तरंगों के समान ऊपर-नीचे उठता-गिरता हुआ चल रहा है।

भाग – II

प्रश्न 7. (क) सार्क (SAARC) और इसकी भूमिका

उत्तर-1971 में जब बंगलादेश स्वतंत्र हुआ, तब मुजीबुर्रहमान ने सभी दक्षिण एशियायी देशों को संगठित करने का प्रयास प्रारंभ किया, परंतु 1975 में उनकी हत्या कर दी गई।

उनकी हत्या के बाद भी यह चिंतन विचारणीय रहा। श्रीमती गाँधी ने इस विचार को साकार करने का प्रयत्न किया। फलतः 1983 में दिल्ली में दक्षिण एशियायी देशों के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हुई और सार्क संगठन के प्रारूप को निर्मित किया गया।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

1985 में ढाका में सार्क का प्रथम सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में इस संगठन का नाम दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) रखा गया और इसके लक्ष्य एवं उद्देश्य निर्धारित किए गए। इसके संविधान के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों की निम्नलिखित विशेषता है:

(i) सार्क ने दक्षिण एशियाई देशों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयत्न किया है। इस संगठन के माध्यम से दक्षिण एशियाई देश संगठित होकर अपनी समस्याओं का निदान आसानी से कर सकेंगे।

(ii) सार्क शांतिपूर्ण प्रक्रिया के द्वारा दक्षिण एशियाई देशों का विकास करना चाहता है।

(iii) सार्क दक्षिण एशियाई देशों के बीच मुक्त व्यापार की अनुमति प्रदान करता है, ताकि गरीब राष्ट्रों को भी आवश्यकता की वस्तुओं को प्राप्त करने का अवसर मिल सके।

(iv) सार्क उदारतापूर्ण आर्थिक नीति का अवलंबन कर गरीब राष्ट्रों को आर्थिक क्षेत्र में छूट प्रदान करता है।

(v) सार्क शिक्षा, तकनीकी, विज्ञान आदि के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई देशों को सहयोगात्मक नीति के आधार पर विकास का अवसर प्रदान करता है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

(vi) सार्क की महत्त्वपूर्ण विशेषता है दक्षिण एशिया में शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, लोकतंत्र की मजबूती और आर्थिक विकास का रास्ता साफ करना है।

(vii) सार्क की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता अथवा अखण्डता में हस्तक्षेप नहीं करता है।

(viii) सार्क समानता के सिद्धांत को मान्यता देता है।

(ix) यह सहअस्तित्व की भावना को उजागर करता है।

सार्क का भविष्य-दक्षिण एशिया में सार्क का भविष्य उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। 1985 से सार्क के सातों सदस्य देश उत्साहपूर्वक इसमें अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

इसका पहला सम्मेलन ढाका में हुआ और भूटान, मालदीव श्रीलंका, भारत और पाकिस्तान आदि देशों में अनेकों बार शिखर सम्मेलन आयोजित किए गए।

इन सम्मेलनों में विभिन्न समस्याओं के निदान जैसे-शिक्षा का विकास, तकनीकी सहयोग, व्यापार का विकास आदि विषयों पर विस्तृत रूप से विचार-विमर्श हुआ और सभी देशों को इस संगठन के द्वारा सहयोग मिलना भी प्रारंभ हुआ। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

यह संगठन दक्षिण एशिया में आर्थिक विकास के लिए मुक्त द्वार को नीति अपना रहा है। सार्क के माध्यम से जिससे सभी देशों के बीच वाणिज्य-व्यवसाय की समस्या सहयोगात्मक रूप से सुलझाई जा रही है।

दस शिखर सम्मेलनों से यह स्पष्ट हुआ है कि भविष्य में सार्क एक सफल संगठन सिद्ध होगा।

यदि सभी राष्ट्र हृदय की पवित्रता से इस संगठन को बनाये रखने का प्रयत्न करेंगे तथा सहयोगात्मक नीति का अवलंबन करते रहेंगे, तो भविष्य में निश्चित रूप से यह संगठन दक्षिण एशियायी देशों के लिए लाभप्रद और उपयोगी रहेगा।

(ख) भारत और आसियान (ASEAN)

उत्तर-दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संघ (आसियान) का निर्माण 1967 में हुआ। इस संगठन का उद्देश्य था विभिन्न एशियाई देशों के साथ क्षेत्रीय व्यापार एवं सहयोगात्मक नीति के द्वारा वाणिज्य, व्यवसाय और उद्योग का विकास करना।

इसी परिप्रेक्ष्य में भारत ने वियतनाम की ओर देखा। वियतनाम अपनी वैदेशिक नीति के अंतर्गत निजीकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण को विशेष महत्त्व देने लगा।

सोवियत रूस के टूटने और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व में गुट व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका का एकाधिकार कायम हो गया एवं विश्व के लगभग सभी देशों ने आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण की नीति अपनायी, जिसके परिणाम स्वरूप आसियान देश भी इस ओर आकर्षित हुए और भारत ने भी पूरब की ओर देखो सिद्धांत के अंतर्गत आसियान देशों की ओर देखना शुरू किया, MPSE 1 Free Assignment In Hindi

क्योंकि भारत ने भी 1991 में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के नेतृत्व में, उदारीकरण की नीति अपनायी थी। इस नीति के अंतर्गत आर्थिक क्षेत्र में पूंजी निवेश करने के लिए मुक्त आर्थिक नीति का समर्थन किया गया।

इस नीति के परिणामस्वरूप आसियान देशों को भारत में पूँजी निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिला। फलतः वे भारत की ओर आकर्षित हुए। आसियान ने 1992 में भारत को क्षेत्रीय वार्ता सहभागिता की पेशकश की।

इसके तहत व्यापार, निवेश, पर्यटन तथा विज्ञान-प्रौद्योगिकी के इन चार आधारभूत सहयोग के क्षेत्रों की पहचान की गई। यह सहभागिता भारत और आसियान के बीच संबंध स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुई।

यह सहभागिता इतनी सार्थक रही कि आसियान ने दो वर्षों के भीतर इस वार्ता को पूर्ण वार्ता का दर्जा दे दिया। आसियान ने भारत को आसियान के मंत्री स्तर के बाद के सम्मेलनों में और आसियान क्षेत्रीय मंच में तथा आसियान के सुरक्षा मंच में आमंत्रित किया।

फलतः आसियान और भारत के साथ वार्ता शुरू हुई और आसियान-भारत सहयोग समिति की स्थापना की गई। व्यापार, मानव संसाधन आदि के क्षेत्र में सहयोग स्थापित करने के लिए भारत-आसियान कार्य समूह की स्थापना की गई। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

कार्य दल की वार्ता के बाद विज्ञान एवं तकनीकी, सूचना तकनीकी के अतिरिक्त स्वास्थ्य, कृषि, संचार, रक्षा आदि के क्षेत्र में आसियान के साथ सहयोगात्मक नीति का का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।

जिसके परिणामस्वरूप भारत-आसियान सहयोग समिति अपनी विभिन्न बैठकों में सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, सौर ऊर्जा, व्यापार, वाणिज्य, पर्यावरण सुरक्षा, पर्यटन आदि के क्षेत्र में पूंजी निवेशात्मक सहयोग बढ़ाने पर सहमत हो गई और भारत-आसियान निधि की स्थापना की गई।

इस निधि को आसियान सचिवालय के अधिकार में रखा गया। यह कार्य आसियान की संयुक्त समिति के द्वारा किया जाता था।

इसलिए इस समिति ने आसियान-नई दिल्ली समिति गठित करने का निर्णय लिया जिसमें आसियान देशों के राजनयिक मिशनों के अध्यक्षों को शामिल करने का प्रस्ताव था।

इससे एक कदम आगे बढ़कर भारत के विदेश सचिव जे.एन. दीक्षित ने एक छात्रवृत्ति योजना घोषित करते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक देश विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में छ: माह की छ: डॉक्टर डिग्री के बाद का फैलोशिप के प्रस्ताव भेज सकता है।

इसके अलावा भारत एवं आसियान देशों के प्रतिष्ठित विद्वानों की भाषण मालाओं का आयोजन भी शुरू किया गया। इसके अंतर्गत भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने आसियान देश में जाकर भाषण दिया और आसिवाय देशों के भी विद्वानों ने भारत में अपनी भाषण मालाएं प्रस्तुत की।

इससे आसियान और भारत के बीच लम्बे समय के बाद आपसी विश्वास और सहयोग का आधार मजबूत हुआ। यह कार्य भारत और आसियान के बीच सहयोग स्थापित करने में भी सहायक रहा

प्रश्न 9. (क) भारत-चीन सीमा विवाद

उत्तर-भारत-चीन के बीच तिब्बत समझौते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि 1955 के बाद चीन ने भारत-चीन सीमा विवाद की समस्या उत्पन्न कर दी।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

उसने मैकमोहन रेखा को सीमा रेखा मानने से इंकार कर दिया और यह कहना शुरू किया कि अक्साई चीन का क्षेत्र चीन के सिकियांग प्रांत का भाग है।

चीन इस बात को समझने लगा था कि एशिया का नेतृत्व भारत को नहीं, वरन् चीन को करना चाहिए। इसलिए उसने भारत की छवि को धूमिल करने के लिए सीमा-विवाद की समस्या को उछालने का प्रयत्न किया।

चीन ने नया मानचित्र निकाला, जिसमें भारत के बहुत-से भूभाग को चीन का भाग बताया गया था। चीन ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए कश्मीर को विवादित क्षेत्र माना और भारतीय सैनिक चौकियों पर गोलीबारी करता रहा और भारत के साथ दोस्ती का ढोंग भी दिखाता रहा।

अंत में 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। यह दोस्त की पीठ में छुरा भोंकने की नीति साबित हुई। चीन के आक्रमण से भारत की छवि को धक्का लगा और विकासशील देशों के नेता के रूप में भारत की भूमिका कमजोर हो गयी। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

युद्ध में हार के कारण भारतीय सैनिकों का मनोबल कमजोर पड़ गया। चीन ने भारत के पूर्वोत्तर भाग में 35000 वर्ग कि.मी. और पश्चिम भाग में 3000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और पूर्वी क्षेत्र में 95000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर चीन ने अपना दावा करना शुरू किया।

1962 के युद्ध के कारण भारत-चीन संबंध समाप्त हो गया। 1963 में चीन ने पाकिस्तान से अक्साई चीन के क्षेत्र पर समझौता कर लिया और 1964 में चीन ने अणु बम का विस्फोट करके पाकिस्तान को भारत के विरोध में उकसाना शुरू किया।

फलतः पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर आक्रमण कर दिया और चीन भारत के विरोध में दुष्प्रचार करने लगा। 1965 के भारत-पाक युद्ध में चीन पाकिस्तान की सहायता के लिए उतरता, परंतु रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंध बिगड़ने के भय के कारण चीन ने ऐसा नहीं किया।

(ख) भारत-नेपाल संबंध

उत्तर-भारत के उत्तर में नेपाल हिमालय की तराई में स्थित एक देश है। इसका कुछ भाग भारत के समतलीय मैदानों से सटा है। भारत से सटे होने के कारण नेपाल और भारत की सभ्यता-संस्कृति समान है।

इसकी सुरक्षा का दायित्व भारत पर है। नेपाल का लुम्बिनी नामक स्थान गौतम बुद्ध के जन्म से जुड़ा हुआ है। भारत और नेपाल के बीच बहुत पुराना संबंध है।MPSE 1 Free Assignment In Hindi

आधुनिक युग में भारत के स्वतंत्र होने के बाद महाराजा त्रिभुवन के समय में भारत और नेपाल के बीच 1950 में दो संधियां हुईं। पहली संधि नेपाल की सुरक्षा से संबंधित थी।

इस सौंध के द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि नेपाल चीन के प्रभाव में न आ पाये। दूसरी संधि व्यापार व वाणिज्य की उन्नति से संबंधित थी, जिसके अंतर्गत नेपाल को व्यापार व पारगमन की सुविधा दी गई।

ये संधियां दस वर्षीय थीं। 1971 में संधि के द्वारा पारगमन की स्वतंत्रता के बदले पारगमन के अधिकार को स्वीकृत किया गया। 1970 के दशक में भारत और नेपाल के बीच एक नया आयाम आया, जिसके कारण 1975 में नेपाल को शांति क्षेत्र के रूप में स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया।

भारत की भाँति नेपाल भी विश्व शांति, गुटनिरपेक्षता एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करता है। इसकी प्रभुसत्ता की रक्षा भारत करता है। इसकी वैदेशिक नीति में भारत हस्तक्षेप नहीं करता है,

परंतु इसकी सुरक्षा का दायित्व भारत पर है। 1980 के दशक में यहाँ संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई और इंग्लैण्ड की भाँति यहाँ पर प्रजातान्त्रिक शासन शुरू हुआ।

नेपाल के साभारत का विशेष संबंध है। यहाँ की आबादी लगभग एक करोड़ है। चीन से इस देश को भय है। भारत इसकी सुरक्षा करता है। MPSE 1 Free Assignment In Hindi

नेपाल में पाकिस्तानी आतंकवाद या चीनी आतंकवाद न फैले, इसके लिए भारत चिंतित है। भारत नेपाल को प्रतिवर्ष लगभग 60 करोड़ रुपये की मदद करता है। भारत और नेपाल के बीच खुले रूप में आयात और निर्यात होता है।

भारत-नेपाल के बीच हवाई सेवा भी चल रही है। भारत और नेपाल का सांस्कृतिक संबंध बहुत पुराना है। नेपाल न चीन से भी कुछ संधि की है और चीन से भी वह सहयोग लेता है।

नेपाल कभी-कभी भारत विरोधी काम करके भारत को रुष्ट कर देता है। नेपाल का मुख्य व्यापार भारत के साथ ही होता है। नेपाल ने चीन से संधि करके उत्तरी भाग के बदले दक्षिणी भाग पर भी निर्माणात्मक कार्य करने की अनुमति दी है। यह भारत के साथ की गई संधि का उल्लंघन है।

MPSE 6 SOLVED ASSIGNMENT IN HINDI 2021-22

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