IGNOU MPS 04 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

MPS 04

MPS 04 Free Assignment In Hindi

MPS 04 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. तुलनात्मक पद्धति क्या है? राजनीति के अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति के महत्व और सीमाओं का परीक्षण कीजिए।

उत्तर- अनेक विद्वान तुलनात्मक प्रणाली के तरीके और दायरे पर सहमत नहीं हैं। ए.एन. आइसेनसद्दात जैसे कुछ विद्वानों ने तर्क दिया है कि तुलनात्मक प्रणाली शब्द में किसी खास तरीके का उचित रूप से बोध नहीं होता, अपितु समाजों के विशाल सामाजिक पहलुओं अथवा संस्थागत पहलुओं और समाज के विभिन्न वर्गों पर विशेष ध्यान देने एवं सामाजिक विश्लेषण पर विशेष जोर दिया जाता है।

अरेन्ड लिजहोड जैसे अनेक विद्वानों का विचार है कि निश्चित रूप से यह एक तरीका है। यह मात्र सुविधाजनक शब्द नहीं है जिसमें किसी के शोध हितों पर अस्पष्ट रूप से संकेत किया गया है।

परंतु इसे बुनियादी तरीकों में से एक तरीके के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। अन्य तरीकों में प्रायोगिक, सांख्यायिकी तथा मामलों के अध्ययन के तरीके-सामान्य सिद्धांत स्थापित करने जैसे शामिल हैं।

दूसरी ओर हैराल्ड लासवैल का तर्क है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो राजनीतिक विशेषताओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है, उसके लिए स्वतंत्र तुलनात्मक तरीके का विचार दकियानुसी विचार जैसा लगता है क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण में तुलना अपरिहार्य होता है।

गैबरियल अलमंड ने भी वैज्ञानिक तरीके के साथ तुलनात्मक विधि की समानता दिखाई है। परंतु यह रेखांकित करना आवश्यक है कि विद्वान तुलनात्मक तरीके को माप का तरीका नहीं बल्कि विभिन्नताओं में साम्राज्यवादी संबंधों का पता लगाने का एक तरीका मानते हैं।

विभिन्नताओं को माफ करने का तरीका उनमें संबंधों को तलाश करने के प्रारंभिक चरण की तार्किक परिणति है, यह उन चरणों का दूसरा चरण जिसका उल्लेख तुलनात्मक तरीके में किया जाता है।

अंततः तरीके और तकनीक के बीच अंतर किया जाना चाहिए। तुलनात्मक तरीका सामान्य तरीका या व्यापक मापक (ब्राडगेज़) है न कि संकीर्ण विशेष तकनीक। MPS 04 Free Assignment In Hindi

यही कारण है कि विद्वान तुलनात्मक तरीके का उल्लेख करते हैं या कुछ तुलनात्मक दृष्टिकोण शब्द को बेहतर मानते हैं क्योंकि इसे तरीका कहकर पुकारने में संक्षिप्तता का अभाव रहता है।

तुलनात्मक तरीका केवल मात्र अनुसंधान में सहायक तकनीक नहीं है, बल्कि इसे एक बुनियादी शोध नीति भी कहा जा सकता है।

तुलनात्मक तरीके को उस समय सर्वोत्तम रूप में समझा जाता है जबकि इसे प्रायोगिक तरीके को नियंत्रित स्थिति में दो भिन्नताओं के बीच संबंध के रूप में समझा जाता है।

राजनीति शास्त्र में ऐसे प्रयोग संभव नहीं हैं, इसलिए इसका वैकल्पिक तरीका है। सांख्यिकी प्रणाली जिसमें अनेक भिन्नताओं के बीच निपेक्षित संबंधों का पता लगाने के उद्देश्य से साम्राज्यीय आँकडों का अवधारणात्मक उपयोग किया। जाता है।

यह नमूने को विभिन्न रूपों में विभाजित करके (उदाहरण के लिए आयु, आमदनी और शिक्षा आदि) आंशिक या संबंधों या विभिन्न गणितीय तरीकों के द्वारा तथा चयन किए गए दो विभिन्न रूपों में सह संबंधों को ध्यान में रखते हुए समस्या को नियंत्रित करता है।

यह एक मानक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जा चुका है तथा लगभग सभी साम्राज्यवादी शोध कार्यों में अनुप्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार सांख्यिकी प्रणाली प्रायोगिक विधि का एक प्रकार से निकट का संबंध है क्योंकि यह भी उसी तर्क का प्रयोग करता है। इसलिए तुलनात्मक विधि एक प्रकार से सांख्यिकी प्रणाली से साम्य रखता है।

अंतर केवल इतना है कि जितने मामलों की संख्या को यह अपने इस्तेमाल के लिए लेता है सांख्यिकी प्रणाली की तुलना में यह बहुत कम होते हैं परंतु यह समझना आवश्यक है कि तुलनात्मक प्रणाली प्रायोगिक विधि के लिए उस तरह का पर्याप्त विकल्प नहीं है जैसा कि प्राकृतिक विज्ञानों में है।

परंतु यह खामियाँ कई प्रकार से अत्यधिक कम की जा सकती हैं। जहाँ समूचे राजनीतिक प्रणालियों के मामले की तुलना की जा रही हो। जहाँ तक संभव हो सांख्यिकी प्रणाली की तुलना सर्वोत्तम है।

उसके पश्चात् तुलनात्मक प्रणाली का उपयोग करना होगा। दोनों ही विधियों का उपयोग एक साथ तालमेल करते हुए भी किया जा सकता है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

इसमें तुलनात्मक विश्लेषण प्रथम चरण है जिसमें सावधानीपूर्वक बड़ी-बड़ी परिकल्पनाएँ की जाती हैं जिनमें कुछ प्रणालियों के संरचनात्मक तत्वों को शामिल किया जाता है और सांख्यिकी चरण दूसरे स्थान पर है, जिसमें सूक्ष्म निरीक्षणों को अधिक से अधिक नमूनों के रूप में शामिल किया जाता है।

दूसरी बात यह है कि नकारात्मक जानकारियों को बहुत अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, उदाहरण के लिए किसी परिकल्पना के लिए जब नमूना छोटा हो तो किसी एक आधार के न मिलने पर उसे अस्वीकृत कर देना।

इसकी अपेक्षा शोध का लक्ष्य संभावनाजन्य होना चाहिए न कि सार्वभौम साधारणीकरण। तीसरा, जहाँ तक संभव हो, मामलों की संख्या बढ़ाई जाए क्योंकि यदि बहुत कम नमूने होंगे तो वह अधिक उपयोगी नहीं होगा।

तुलनात्मक राजनीति ने प्रगति की है क्योंकि अनेक देशों में या उनमें राजनीतिक घटनाओं की तुलना के आधार पर सार्वभौम रूप से उपयोग में लाए जाने वाले सिद्धांतों या बड़े सिद्धांतों को तैयार करने के कारण उनकी प्रगति हुई है, उदाहरण के लिए संरचनात्मक कार्य विश्लेषण सिद्धांत ने तुलनात्मक शोध की एक ऐसी दुनिया ला दी है जिसके बारे में पहले ज्ञान ही नहीं था।

चौथा, यदि मामलों की संख्या अधिक न हो तो विभिन्नताओं की संख्या बढ़ा दें। हालाँकि इसका और अधिक साधारणीकरण संभव है।

पाँचवा, तुलनीय मामलों पर विशेष प्रकाश, जैसे जिनमें तुलनीय विशेषताओं या भिन्नताओं की संख्या बहुत अधिक हो जो लगातार हो लेकिन उन विभिन्नताओं से अधिक से अधिक भिन्न हो, जो एक दूसरे से संबंध होना चाहते हों। इस प्रकार हम विशिष्टताओं का संचालनात्मक अध्ययन करते हैं।

वह अध्ययन चाहे सांख्यिकी प्रणाली से या तुलनात्मक विधि से। यहाँ दायरा या क्षेत्रीय दृष्टिकोण उपयोगी होता है। उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका अथवा स्कैडिनेविया के देशों का तुलनात्मक अध्ययन परंतु अनेक विद्वानों ने यह संकेत दिया है कि यह मात्र प्रबंधकीय तर्क है जो विचारों को बंधन में बांधने वाला तक नहीं होना चाहिए।

दूसरा विकल्प है, देशों के अंदर क्षेत्रों का अध्ययन अथवा भिन्न-भिन्न समय पर उनका अध्ययन करना क्योंकि समस्या का नियंत्रण अपेक्षाकृत सामान्य रहता है क्योंकि एक प्रकार के संघीय ढाँचे के भीतर होते हैं।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संघ के अंदर स्थित राज्यों का अध्ययन तुलनात्मक शोध के लिए एक अच्छी प्रयोगशाला उपलब्ध कराता है। हालाँकि अभी तक इसका उपयोग नहीं किया गया है।

अंत में, अनेक विद्वान महसूस करते हैं कि प्रमुख अथवा संदर्भ की भिन्नताओं की ओर मुख्य ध्यान देना चाहिए क्योंकि बहुत ज्यादा भिन्नताओं से समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। यह न केवल प्रबंधनीयता की सुविधा प्रदान करता है अपितु मध्यम स्तर की सैद्धांतिक तथा राजनीतिक प्रणालियों की आंशिक तुलना उपलब्ध कराता है।

यह तरीका नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों में सफलतापूर्वक लाया गया है क्योंकि जनजातीय प्रणालियाँ अधिक मुश्किल नहीं हैं। राजनीतिक शास्त्र भी भिन्नताओं की संख्या को कम करके इसे कर सकते हैं।

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प्रश्न 2. तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में राजनीतिक अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण क्या है? व्याख्या । कीजिए कि किस प्रकार इसे राजनीतिक विश्लेषण में लागू किया जाता है।

उत्तर. सिद्धान्त, तरीका और अवधारणा की जाँच करने से बूर्जुआ और माक्र्सवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बीच द्विभागीकरण का सुझाव प्राप्त होता है। पूँजीवादी संग्रहण की ओर ध्यान देने से राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही प्रकार के मुद्दों की अनुमति मिल जातो है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

पूँजीवादी संग्रह के अध्ययन के साथ-साथ उत्पादन के पूर्व पूँजीवादी तथा पूँजीवादी तरीकों पर जोन देने से उस जाँच का एकीकरण हो सकता है जो अभी तक राजनीतिक और सैद्धान्तिक अधिरचना के मुद्दों के अध्ययन के लिए राजनीतिक वैज्ञानिकों तथा समाज के सामग्री आधार के बारे में प्रश्नों की खोज-बीन करने के लिए अभी तक अर्थशास्त्रियों का नेतृत्व करती रही है।

कुछ लोग कह सकते हैं कि अर्थशास्त्रियों को साम्राज्यवाद के सिद्धान्तों से और राजनीतिक वैज्ञानिकों को राज्य तथा वर्ग सिद्धान्तों से निपटने की चिंता करनी चाहिए।

इन सभी चिन्ताओं को राजनीतिक अर्थशास्त्रियों द्वारा समेकित करना चाहिए। समाधान है अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्गठन तथा राजनीतिशास्त्र का राजनीतिक अर्थव्यवस्था के साथ फिर से गठन करना।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था, बुनियादी तौर पर पूँजीवाद के व्यापक ऐतिहासिक विस्तार विशेषकर पिछले सौ वर्षों की अवधि का ध्यान रखना चाहिए। मार्क्स ने दास कैपिटल में इस प्रकार के अध्ययन के लिए हमें आधार दिया है।

पॉल स्वीजी ने द थ्योरी ऑफ कैपटीलिस्ट डेवलेपमेंट और अर्नेस्ट मानडेल ने मार्क्सस्ट इकोनामिक्स थ्योरी में मार्क्स – के तथ्यों की व्याख्या की है और आर्थिक पेंचदगियों के बारे में विशेष जानकारी दी है।

स्टेनली डब्ल्यू मूर ने द क्रिटिक ऑफ कैपटीलिस्ट डेमोक्रेसी में राजनीतिक शाखा विस्तारों की ओर ध्यान केन्द्रित किया है। मानडेल के पूँजीवाद में मार्क्स, की परम्परा में सिद्धान्त और इतिहास को समेकित करने का प्रयास किया गया है।

इसमें द्वंद्वात्मक रूप से आमूर्त से मूर्त की और इसके विपरीत हिस्सों से समग्र की ओर पुनः अतीत की ओर, विरोधाभास से समग्रता की ओर पुनः विरोधाभाव की ओर जाने का सिलसिला मौजूद है सामीर अमीन ने एक्यूमूले सन ऑन ए वर्ल्ड स्केल में सिद्धान्त को इतिहास के साथ सयोजित किया है।

उसने एक बात पर जोर दिया है कि सामयिक विश्व के सभी विधियों और संरचनाओं में विश्व स्तर पर एक संग्रहित रूप प्रतिबिम्बित होता है। MPS 04 Free Assignment In Hindi

पूँजीवादी तथा गैर पूँजीवादी विश्व बाज़ार अलग नहीं है क्योंकि एक विश्व बाज़ार था जिसमें पूर्व समाजवादी देशों में आशिंक रूप से । हिस्सा लिया था। इतना ही नहीं पूँजीवाद एक विश्व प्रणाली है, राष्ट्रीय पूँजीवादियों का मिश्रण नहीं।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था का समग्र रूप उपलब्ध कराने के लिए किए गए अन्य प्रयासों में पैरी अंडरसन का पैसेज फ्रॉम एन्टीक्वीटी टू फ्यूडलिज्म तथा लिनिमेज ऑफ द एबसोल्यूट स्टेट शामिल है।

उन्होंने यूरोपीय सामन्तवाद तथा पूँजीवाद की . राजनीतिक अर्थव्यवस्थाओं का अध्ययन किया। इमैन्युअल वालरस्टीन ने द माडर्न वर्ल्ड सिस्टम में पूँजीवादी विकास तथा कम विकास के आन्द्रे गुन्देर फ्रैंक के सिद्धान्त का विस्तार किया तथा बाजार संबंधों पर जोर दिया।

अन्य विचारकों में से चार विचारकों – मानडेल, आमीन, एन्डरसन और वैलटस्टीन ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था के इतिहास में दिलचस्पी को पुनर्जीवित किया। इसने अधिकांश सामयिक अर्थशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों द्वारा उपेक्षित पुराने मुद्दों का अनवीकरण करके नए मुद्दों को उभारा। इन चारों ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था की मार्क्सवादी परम्परा से विचार ग्रहण किए और अपने बहुमूल्य योगदानों से उसे समृद्ध किया।

मानडेल ने स्पष्ट किया समूची पूँजीवादी प्रणाली उत्पादकता के विभिन्न स्तरों की क्रम परम्परा की संरचना है तथा राज्यों के असमान तथा सम्मिलित विकास, धर्मों, उद्योगों तथा फर्मों की शाखाओं का प्रतिफल है जो अत्यधिक लाभ प्राप्त करने की तलाश से परिलक्षित हुआ है।

इस व्यवस्था में एकता को एकरूपता के अभाव में रहना; विकास को कम विकास के साथ अत्यधिक मुनाफे को गरीबी के साथ-साथ रहना पड़ता है।

इन विभिन्नताओं की स्थिति में निरंतर चरणों की विशेषताएँ उच्चतर चरणों के साथ सम्मिलित होकर परस्पर विरोधी स्वरूप को जन्म देती है और पिछड़े वर्ग के लोगों के सामाजिक विकास में गुणात्मक उछाल लाने में सहायक होती है। MPS 04 Free Assignment In Hindi

ब्रेनेर ने इस दृष्टिकोण की आलोचना की है क्योंकि उसके विचार में उसने उत्पादन और वर्ग संघर्ष के संबंधों की उपेक्षा की है। उसने इस पर संदेह व्यक्त किया है कि क्या विश्व व्यापी संग्रह की समस्याओं के संदर्भ में राष्ट्रीय समाधाच अपनी प्रमुख भूमिका निभा पाएगी।

प्रश्न 5. क) नागरिक समाज और उसका महत्व ।

उत्तर. इन दो संकल्पनाओं, राज्य व नागरिक समाज, का आपस में कोई विवाद नहीं है। लोकतंत्र दोनों को एकीकृत करता है। राज्य के दावे नागरिक समाज द्वारा मज़बूत होते हैं और नागरिक समाज राज्य के माध्यम से अधिक स्थिर बनाया जाता है।

दोनों को ही एक लोकतांत्रिक ढाँचे : लोकतांत्रिक नागरिक समाज के ढाँचे के भीतर लोकतांत्रिक राज्य, में काम करना होता है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, राज्य व नागरिक समाज प्रत्येक के प्रभावी कार्यसंचालन हेतु मिलकर काम कर सकते हैं।

राज्य को लोकतांत्रिक रूप से संघटित किया जाना होता है, जहाँ उसकी शक्तियाँ विकेन्द्रीकृत होती हैं और उसके कार्य पूर्व-निर्धारित नियमों व प्रक्रियाओं के भीतर ही संपादित किए जाते हैं।

इस प्रकार के राज्य को नागरिक समाज की सदा-वर्धमान माँगों का जवाब देना पड़ता है। उसकी भूमिका, कमोबेश, समन्वय करने की होनी चाहिए, उसको कम से कम लोगों के सामाजिक व आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप करना पड़ता है: उसको स्वभावतः नियामक होना पड़ता है।

नागरिक समाज को अधिक मुखर और असदृश होना पड़ता है। उसे राज्य के साथ और उसका निर्माण करने वाले सभी संघटकों के भीतर निरन्तर व सतत बातचीत जारी रखनी पड़ती है।

उसका क्षेत्र स्वतंत्र रूप से और मुक्त रूप से निर्दिष्ट करना पड़ता है, जहाँ युक्तियाँ जनमत और सार्वजनिक संलाप को राज्य–मुक्त बनाती रहती हैं।MPS 04 Free Assignment In Hindi

उदारवादी-लोकतांत्रिक राज्यों में, राज्य व नागरिक समाज से संबंध रखने वाली शक्तियों की एक सतत अन्तीड़ा होती रहती है, हर एक द्वारा दूसरे पर अपनी छाप छोड़े जाते हुए तानाशाह राज्य व्यवस्थाओं में, राज्य सत्ता को नागरिक समाज के नियंत्रण हेतु प्रयोग किया जाता है और नागरिक समाज राज्य में एकीकृत हो जाता है : राज्य नागरिक समाज की ही बात करता है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

लोकतंत्र अकेले ही राज्य को नागरिक समाज से मिलाता है। राज्य ज़्यादा देर कायम नहीं रह सकता, यदि वह । लोकतंत्र से भाराक्रांत न हो; नागरिक समाज का अस्तित्व बना नहीं रह सकता, जब तक कि वह + लोकतांत्रिक रूप से संरचित न हो और लोकतांत्रिक रूप से काम न करता हो।

कोई लोकतांत्रिक राज्य बना नहीं रह सकता यदि वह अवरोधक, अवपीड़क, निषेधक, और थोपा हुआ हो; वह नहीं अस्तित्व रख सकता, यदि वह नागरिक समाज को परिपूर्ण व्यवस्था में प्रस्तुत न करे; वह नहीं बना रह सकता, यदि वह लोगों को अधिकारों व स्वतंत्रताओं की गारण्टी न दे।

इसी प्रकार, एक लोकतांत्रिक नागरिक समाज कायम नहीं रह सकता यदि वह सार्वजनिक क्षेत्र में हरेक व्यक्ति को काम करने की इजाज़त न दे; वह नहीं बना रह सकता यदि एक-एक नागरिक राज्य पर समान दावा न रखे, यदि हरेक नागरिक को मनुष्य के रूप में सम्मान न मिले।

ख) संविधानवाद।

उत्तर. ‘संविधान’ का शाब्दिक अर्थ होता है कि किसी निकाय का गठन और संरचना कैसे होती है। राजनीति शास्त्र में इसका अर्थ होता है कि एक राज्य और उसके अधिकरण का किस प्रकार गठन होता है।

जब अरस्तू ने यूनानी जगत के लगभग 150 नगर राज्यों का अध्ययन करने के बाद ‘पॉलिटिक्स’ की रचना की, और संविधानों का वर्गीकरण किया, तो वह ‘संविधान’ के इसी शाब्दिक अर्थ का प्रयोग कर रहा था।

बाद में, इसमें एक महत्व जुड़ गया। एक संविधान में विश्वस्त तौर पर इस सीमा तक स्थिरता और । सम्माननीयता का गुण होता है कि लोग यह अपेक्षा करते हैं कि सरकार के सदस्य और अंग इसका पालन करेंगे।

जब सरकार संविधान का पालन करती है तो इस स्थिति को ही ‘संविधानवाद’ कहा जाता है। इसका यह अर्थ होता है कि सरकार को किसी व्यक्ति की सनक से नहीं चलाया जा सकता।

बहरहाल, जैसा कि ‘संवैधानिक राजतंत्र’ के नाम से आभास होता है, संविधानवाद तो गणराज्यवाद नहीं है। आज भी यूरोप में ऐसे चंशगत सम्राट हैं जिन्होंने अपने पूर्ण अधिकार निर्वाचित विधायिका को दे दिए हैं।

दूसरी ओर, एक निर्वाचित राष्ट्रपति के नेतृत्व वाली व्यवस्था अर्थात् गणराज्यवाद का संवैधानिक शासन होना आवश्यक नहीं है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

अनेक देशों में सैनिक शासकों ने अपने आपको राष्ट्रपति ही घोषित नहीं किया बल्कि जनमत संग्रह जैसे छलपूर्ण तरीकों से जनता का ‘समर्थन’ भी हासिल कर लिया है। उन्होंने अपने देश के संविधान से छेड़छाड़ की है और, अक्सर, तो उसे उठाकर खिड़की से बाहर फेंक दिया है।

सिद्धान्त के स्तर पर, संविधानवाद और लोकतंत्र में भी अंतर है, जिसका सटीक उदाहरण फ्रांसीसी क्रान्ति के दार्शनिक रूसो के सामाजिक अनुबंध के सिद्धान्त में मिलता है।

रूसों ने प्रत्यक्ष लोकतंत्र की हिमायत की थी और सरकार को कोई विशेष प्रस्थिति देने और जनता की इच्छा को किसी भी प्रकार की सीमा में बांधने को अस्वीकार कर दिया था जिसे वह संप्रभु मानता था।

वैसे आज के जन राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र असंभव ही है। इसलिए, हर जगह प्रतिनिधि सरकार के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया गया है।

प्रतिनिधियों ने क्योंकि भविष्य में राज्य करने का अधिकार दूसरों के हाथ में दे दिया है, इसलिए उनके अधिकारों की सीमा तय करने हेतु एक संविधान जरूरी हो जाता हैं – इन्हें ‘खेल के नियम’ कहा जा सकता है।

यह माना जाता है कि संविधान के निर्माता कोरे कागज से शुरु करते हैं और उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। वे पूर्वाग्रह से भी मुक्त होते हैं। बाद में आने वाले राजनेताओं को इन नियमों का पालन करना होता है।

यही कारण है कि विश्व के अधिकांश संविधान निर्माता संविधान को ‘कठोर’ बनाते। हैं, अर्थात् उन्हें साधारण विधायी प्रक्रिया से बदला नहीं जा सकता। MPS 04 Free Assignment In Hindi

जहाँ ऐसे लिखित और कठोर संविधान वजूद में नहीं होते, वहाँ कुछ परम्पराओं और प्रथाओं को राष्ट्रीय आम सहमति से अनुल्लंघनीय मान लिया जाता है।

इनमें से पहली तरह के संविधान का उदाहरण संयुक्त राज्य संविधान है, जबकि दूसरी तरह के संविधान का उदाहरण ब्रिटिश संविधान है।

इसलिए मानवीय क्षमता की अवधारणा उनपर बहुत व्यापक रूप से लागू होती है। विकसित, विकासशील एवं अविकसित राष्ट्रों में देश को वर्गीकृत करते हुए राष्ट्रीय आय को ध्यान में रखा जाता है। राष्ट्रीय आय के अंतर्गत कई कारण होते हैं और उसके माप के लिए जी.एन.पी/जी.टी.पी अवधारणाओं का प्रयोग होता है।

जी एन पी का अर्थ है, देश में निजी एवं लोक खर्च के लिए प्राप्त पूर्ण आय, जबकि जी डी पी अर्थव्यवस्था के आकार को मापता है।

फिर भी, दोनों की परिभाषा, तकनीकी रूप में उत्पादन के संदर्भ में होती है। जी.डी.पी, स्पष्टत:और सामान्यतः एक उत्पाद मात्र है, जिसकी परिभाषा है, अर्थव्यवस्था द्वारा प्रस्तुत सामग्री एवं सेवाओं का पूर्ण रूप से अंतिम उत्पादन।MPS 04 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 7. राजनीतिक दल को परिभाषित कीजिए। एक लोकतांत्रिक राज्यव्यवस्था में राजनीतिक दल किस उद्देश्य की पूर्ति करते है?

उत्तर- राजनीतिक दल व्यक्तियों का वह संगठित रूप है, जिसके सदस्य राजनीतिक इकाई के रूप मे राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक साथ प्रयत्नशील रहते है।

जिस प्रकार सामाजिक या आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दल संगठित होते है, इसी प्रकार व्यक्ति अपने राजनीतिक उद्देश्यों को भी संगठन के माध्यम से प्राप्त कर सकता है। जब किसी संगठन का उद्देश्य राजनीतिक होता है तो उसे राजनीतिक दल कहा जाता है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

(1) संगठन–दल को मजबूत एवं स्थायी बनाने के लिए उसमे संगठन का होना अत्यंत आवश्यक है। संगठन से तात्पर्य है कि दल के कुछ अपने लिखित एवं अलिखित नियम, उपनियम, कार्यलय, पदाधिकारी होने चाहिए। ये दल के सदस्यों को अनुशासित रखते है।

संगठन के अभाव मे दलीय अनुयायी एक बिखरी हई भीड़ मात्र होंगे और वे अपने उद्देश्यों को पूरा नही कर पाएंगे। वस्तुतः संगठन ही राजनीतिक दल की शक्ति का रहस्य है।

2. मूलभूत सिद्धांतों की एकता दल व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जिसके सदस्य सार्वजनिक प्रश्नों पर एक से विचार रखते है। इन प्रश्नों की बारीकियों पर उनमे मतभेद हो सकता है, लेकिन वे सब मौलिक सिद्धांतों पर एकमत होते है।

सिद्धांतों की एकता ही दल को ठोस आधार प्रदान करती है। सैद्धांतिक एकता के अभाव मे दल की जड़ें हिल जाएंगी और उसका विघटन हो जाएगा।

3. संवैधानिक उपायों का प्रयोग राजनीतिक दलों को अपने लक्ष्य (सत्ता प्राप्ति) की प्राप्ति के लिए सदा संवैधानिक उपायों का सहारा लेना चाहिए। जो असंवैधानिक उपायों का अनुसरण करते है अथवा हिंसात्मक साधनों को अपनाते है, उन्हें राजनीतिक दल नही कहा जा सकता।MPS 04 Free Assignment In Hindi

4. राष्ट्रीय हित की वृद्धि–राजनीतिक दल एक ऐसा समुदाय है जो उच्च आदर्शों से अनुप्राणित होता है और जिसके कार्यक्रमों और नीतियों का देशव्यापी आधार होता है क्षेत्रीय अथवा साम्प्रदायिक नही।

उसे किसी विशेष जाति, धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग के हित की अपेक्षा राष्ट्रीय हित की अभिवृद्धि हेतु चेष्टा करनी चाहिए। यदि कोई संगठन वर्ग, जाति या सम्प्रदाय विशेष का हित साधन करते है तो यथार्थ मे उन्हें राजनीतिक दल नही कहा जा सकता।

प्रश्न 8. पर्यावरणीय बहस में प्रमुख मुद्दों पर विकासशील देशों की स्थिति का वर्णन और मूल्यांकन कीजिए

उत्तर. आज पर्यावरण का अध्ययन उन महत्त्वपूर्ण विषयों के बारे में हैं जो राष्ट्रों को जीवमंडल, उनके संसाधन, लोकतंत्र और राष्ट्र राज्य व्यवस्था की रक्षा के लिए होगा।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति ने जिस प्रकार कार्य किया तथा राष्ट्रीय संसाधन नीति और दूसरे देशों को राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया, इसका अब रूपांतरण हो रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद के हटने से लेकर अमेरिका के द्वितीय विकास शताब्दी के आरंभ में प्रकाशित ‘द लिमिट्स टू ग्रोथ’ रिपोर्ट तक राष्ट्रीय नीतियों ने दो धारणाएँ संस्थापित की जो औद्योगिक क्रांति के साथ ही वितरण में हैं।

पहला, यह कि प्रकृति का अस्तित्व मानव के लिए है और दूसरा कि पर्यावरण संरक्षण विकास-विरोधी, प्रगति-विरोधी तथा प्रौद्योगिकी-विरोधी है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

1972 के स्टॉकहोम के अधिवेशन, जिसके बाद ‘दि लिमिट्स ट ग्रोथ’ के प्रकाशन ने तेजी से बढ़ते हुए प्रौद्योगिकीकरण को आश्चर्यचकित कर दिया।

साथ ही, राचैल कार्सान की पुस्तक ‘द साइलेन्ट स्प्रिंग’ के प्रकाशन ने उन लोगों की उदासीनता और चुपी को हिला कर रख दिया, जिन्होंने खड़े होकर जंगल और वन्य जीवों के विनाश को प्रकृति और खाद्य-शृखंला का गैर जिम्मेदार रसायन विस्तार तथा समुदायिक संसाधन व्यवस्थाओं के धीरे-धीरे विलोप होते हुए विनाश को देखा।

बैरी कौमनर लिखते हैं: “मानव-जाति जीवन-चक्र से टूट कर निकल गया है, यह जैविक आवश्यकता के कारण नहीं है, बल्कि यह वैसे सामाजिक संस्थानों द्वारा हुआ है, जिसे उन्होंने प्रकृति को जीतने के लिए बनाया है : ये सम्पत्ति प्राप्त करने के साधन हैं, जिनका विरोध उनसे है जो प्रकृति पर शासन करते हैं।”

अविकसित तथा विकासशील देशों द्वारा पश्चिम को पकड़ बराबरी पर आकर आर्थिक चमत्कार की आवृत्ति करने के प्रयास ने उन्हें गरीबी, कर्जदार और आवश्यक सामानों की आपूर्ति में धीमी गिरावट की ओर अग्रसर किया।

कर्ज के संचय ने विकासशील देशों को विकासहीनता के जाल में जकड़ दिया। ऐसे देश अपने परिसमापन की संभावना को खत्म करने के लिए पर्यावरण का अतिमात्रा में प्रयोग करने को विवश हो गए।

प्रकृति की कोई दीवार नहीं होती है इसलिए नदी, जंगल, खनिज सम्पदा, वन्य जीव, समृद्ध कच्छ वनस्पति तथा आदिवासी समुदाय एक देश से दूसरे तक फैले हुए हैं और उनका पारिस्थितिकी अनुबंध उनकी राजनीतिक दीवार से बढ़कर हो गया है। MPS 04 Free Assignment In Hindi

अतः एक राज्य के किसी भी कार्यकलाप से दूसरे पड़ोसियों के यहाँ अशांति की लहर चली जाती है। उदाहरणत: भारत और पाकिस्तान के बीच सिन्धु नदी क्षेत्र कुछ दुर्लभ प्रजातियों की मछली और कच्छ स्थिति का घर बना हुआ है और यह समुद्री लहरों के लिए प्राकृतिक दीवार का कार्य भी करता है।

प्रदूषण अत्यधिक बहाव अथवा कच्छ वनस्पति के विनाश का कोई भी कार्य दूसरे देश के संसाधन-प्रवाह और उनके समुद्री तट के क्षेत्र की प्राकृतिक सुरक्षा को प्रभावित करता है। सम्पूर्ण हिन्द महासागर तटीय क्षेत्र पर 1985-86 में विश्वस्तर पर मूंगा के विरंजल फ्रांस और चीन के समुद्री अणु परीक्षण के कारण हुआ।

अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ, जैसे यूरोप में राइन अथवा भारत और पाकिस्तान के बीच रावी हमेशा विकास की उन नीतियों जिन्हें इन राष्ट्रों ने इनके जलग्रहण-क्षेत्र में आरंभ किया है, के कारण विवाद का मुद्दा रही हैं।

साइबेरिया या कुवैत के तेल क्षेत्र जो भूमिगत रूप में दूसरो राज्यों में फैल गए हैं, वे अब इन राज्यों को इनके अत्याधिक उपयोग के विरोध में कार्रवाई करने तथा नदीतटीय राज्यों पर संरक्षण कार्य की सहायता करने पर जोर दे रहे हैं।

ओजोन छिद्र इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं कि विकसित राज्य औद्योगिक क्रिया-कलाप द्वारा विश्व मानवजाति के स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाने के लिए क्या कर सकते हैं। MPS 04 Free Assignment In Hindi

एक राज्य के विकास के कुछ कार्य दूसरे राज्यों में भूकंप, समुद्री आंधी, तूफान यहाँ तक कि सूखा भी भेज सकते हैं।

पृथ्वी के भूगर्भ से जुड़े समताप मंडल, क्षोभ मंडल, जलमंडल तथा दूरवर्ती संवेदी तकनीक से खुलासा के साथ स्थान के अध्ययन ने यह प्रमाणित कर दिया है कि किसी भी राज्य को बेरोकटोक और अनियंत्रित औद्योगिक कार्य का अधिकार नहीं दिया जा सकता। लोग पर्यावरण संकट से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि यह उन्हें घरबार छोड़कर पर्यावरण शरणार्थी बनने जैसे असैनिक युद्ध की ओर जाने को मजबूर करता है।

शरणार्थियों के यू. एन. हाई कमिश्नर तथा अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसाइटी विश्वभर में पारिस्थितिक शरणार्थी की बढ़ती संख्या देखकर भयभीत हैं। राज्य की सार्वभौमिकता पृथ्वी के इन निवासियों के प्राकृतिक अधिकार जो अलंघ्य और अटल हैं, से बाधित होती है।MPS 04 Free Assignment In Hindi

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