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MPS 03

भारत :लोकतंत्र एवं विकास

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MPS 03 Free Assignment In Hindi July 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. चर्चा कीजिए कि किस प्रकार लोकतंत्र और विकास एक दूसरे से सह-संबंधित हैं।

उत्तर- लोकतंत्र एवं विकास के बीच संबंध विषयक बहस दो सवाल उठाती है-क्या वे एक-दूसरे के प्रति सुसंगत हैं? अथवा वे एक-दूसरे के विरोधी हैं? जीरजा जयाल का दावा है कि भारत में यह बहस कुछ-कुछ गलतफहमी की शिकार” रही है। इसमें मूल रूप से अर्थशास्त्रियों द्वारा उलझाया गया है।

दीपक नय्यर का दावा है कि भारत में आर्थिक विकास तथा राजनीतिक लोकतंत्र के बीच तनाव रहा है। लोग, खासकर गरीब, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में शामिल हैं परन्तु उन्हें पण्यक्षेत्र से बाहर कर दिया गया है।

बाजार में अभिजात्यों का अनन्य प्राबल्य ही देखा गया। राज्य मुख्यतः अभिजात वर्ग के हितों/विवादों के प्रबंधन से ही संबद्ध रहा है।

स्वातंत्र्योत्तर काल में राज्य की भूमिका की तुलना में विवादों का प्रबंधन और लोगों, खासकर गरीब के हितों की दिशा में तीन चरण पूरे हुए-1947, 66, 90, एवं 1990 के उपरान्त।

प्रथम चरण की पहचान थी राज्य की प्रमुख भूमिका जो विभिन्न हितों की सर्वसम्मति प्राप्त करने में समर्थ था। दूसरे चरण में, राज्य की प्रभावकारिता एवं मतैक्य प्रतिमान में कोई कमी नहीं थी।

राज्य ने धनी किसानों को संयोजित करने के राजनीतिक प्रयास किए, और विभिन्न वर्गों के हितों को साधने के लिए लोकप्रियतावाद एवं प्रश्रय का सहारा लिया।MPS 03 Free Assignment In Hindi

इस चरण में भी कुछ हद तक गरीबी में कमी और बाजार की बढ़ती भूमिका। यह उदारवाद की राजनीति के साथ-साथ ही हो रहा है। नय्यर के मतानुसार, भारत में पहली बार उदारीकरण का अर्थशास्त्र तथा सशक्तीकरण की राजनीति विपरीत दिशाओं में जा रहे हैं।

लोगों के पास राजनीतिक अधिकार है परन्तु वे बाजार में भागीदारी नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनके पास हकदारियों एवं क्षमताओं का अभाव है।

विभिन्न हितों के बीच मध्यस्थता करने अथवा मेल-मिलाप कराने के लिए राज्य का कोई प्रयास नहीं है। ऐसी स्थिति में जहाँ राज्य कोई प्रभावी एवं मध्यवर्ती भूमिका नहीं निभा सकता है, उनका सुझाव है कि सभ्य समाज हस्तक्षेप कर सकता है। प्रणव वर्धन है कि लोकतंत्र एवं विकास असंधेय हैं।

भारत में मख्य स्वाम्याधीन वर्ग हैं-औद्योगिक पूँजीपति वर्ग, धनी किसान और निजी क्षेत्र के व्यवसायी। उनके हित विवादग्रस्त हैं और राज्य उनके बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता है।

साथ ही, “नीचे से हलचल’ देखी जाती है-विभिन्न अलाभान्वित समूहों का दावा। उनके हितों तथा धन-सम्पन्न वर्गों के हितों के बीच विवाद है। विभिन्न समूहों के संघटन में एक सुधार-विरोधी प्रवृत्ति भी पायी जाती है।

यह बात आर्थिक सुधारों के लिए माहौल खराब करती है। वे लोग जो लोकतंत्र एवं विकास की असंगतता के विषय में तर्क देते हैं, दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों का संदर्भ देते हैं जहाँ वास्तविक विकास अलोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्थाओं में ही हुआ है। MPS 03 Free Assignment In Hindi

अमर्त्य सेन ने विकास एवं लोकतंत्र विषयक एक असंदिग्ध संदर्श प्रस्तुत किया है। वे असंगत नहीं है जबकि लोकतंत्र एवं विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

लोकतंत्र संभव है यदि समाज में लोगों के पास हकदारियाँ हों और वे ऐसी क्षमताएँ रखते हों जो उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने में मदद करती है।

स्वतंत्रता, जो लोकतंत्र का एक अनिवार्य घटक है जो विकास को लोगों की हकदारियों एवं क्षमताओं के लिहाज से बढ़ावा देती है। विकास लोकतंत्र के विषय में भी प्रासंगिक है।

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प्रश्न 3. भारतीय लोकतंत्र में 73 वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के महत्व की चर्चा कीजिए

उत्तर- 73वाँ संशोधान-73वाँ संशोधान अधिानियम एक त्रि-पंक्ति पंचायती राज व्यवस्था मुहैया कराता है-ग्राम, माधयमिक द्धखण्ड अथवा तालुकाऋ तथा जिला स्तर। बीस लाख से कम आबादी वाले छोटे राज्यों को माधयमिक स्तर पर पंचायत गठित करने या न करने की छूट दी गई है।

इस अधिानियम ने ग्रामीण लोगों के सशक्तीकरण में ग्राम सभा द्धजनसाधारण की सभाऋ की भूमिका को स्वीकारा और पंचायती राज संस्थाओं के सलतापूर्वक कार्य-सम्पादन के लिए ग्राम सभाओं को मजबूत किए जाने की व्यवस्था दी।

इस अधिानियम का अभिप्राय इसे एक सशक्त निकाय बनाना था, ग्राम सभा में एक गाँव के सभी राज्य अधिानियम ग्राम सभा के प्रकार्यों का उल्लेख करते हैं। MPS 03 Free Assignment In Hindi

ग्राम सभा के इन प्रकार्यों में शामिल हैं-वार्षिक लेखा विवरण प्रशासन, सरकारी बयान, दरिद्रता-विरोधी कार्यक्रमों के लाभग्राहियों का चुनाव आदि विजयक चर्चा।

हरियाणा, पंजाब, व तमिलनाडु के राज्य अधिानियम ग्राम सभा को बजट स्वीकृति का अधिकार प्रदान करते हैं। ग्राम सभा द्वारा एक ग्राम प्रधान चुना जाता है। वह ग्राम पंचायत के अन्य सदस्यों को भी चुनती है।

सदस्य-संख्या राज्य-राज्य में भिन्न-भिन्न होती है, और उनकी आबादी के अनुसार उनमें से कुछ स्थान अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किए गए हैं तथा कुल सीटों की एक-तिहाई संख्या महिलाओं के लिए आरक्षित की गई है।

ग्राम पंचायत के अनिवार्य कायामें शामिल होते हैं-स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, सार्वजनिक कुओं, तालाबों ओषधालयों, प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों का रखरखाव आदि।

अब ग्राम पंचायतों को विकासात्मक कार्य भी सौंपे गए हैं, जैसे लघु सिंचाई योजनाएँ, ग्रामीण वैद्युतीकरण, कुटीर व लघु उद्योग तथा दरिद्रता उन्मूलन कार्यक्रम खण्ड स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को देष के विभिन्न भागों में विभिन्न नामों से जाना जाता है।

गुजरात में उन्हें तालुका पंचायत कहा जाता है, उत्तर प्रदेश में क्षेत्र समिति और मध्य प्रदेश में उन्हें जनपद पंचायत कहा जाता है। इनमें शामिल हैं1. पंचायतों के सरपंच 2. उस क्षेत्र के संसद सदस्य, विधायक व पार्षद, 3. जिला परिषद् के निर्वाचित सदस्य तथा 4. उस क्षेत्र की नगरक्षेत्र समिति का अध्यक्ष।

पंचायत समिति की शक्तियों में शामिल हैं-बीजों व उर्वरकों की उन्नत किस्मों का प्रावधान, स्कूलों, अस्पतालों का रखरखाव, दरिद्रता-विरोधी कार्यक्रम लागू करना और ग्राम पंचायतों के कार्यप्रणाली करी देखरेख करना।

जिला परिषद ही पंचायती राज संस्थाओं का षीर्श निकाय है। यह पंचायत समितियों की गतिविधियों का समन्वय करती है। MPS 03 Free Assignment In Hindi

इसमें होते हैं-जिले की पंचायत समितियों के प्रधान, जिले से निर्वाचित सांसद व विधायकगण, जिले की प्रत्येक सहकारी समिति से एक-एक प्रतिनिधि, और जिले की नगरपालिकाओं का अध्यक्ष भी। जिला परिषद् पंचायत समितियों के बजट स्वीकृत करती है।

वह शैक्षणिक संस्थानों, सिंचाई परियोजनाओं का रखरखाव करती है, और कमजोर तबकों के लिए कार्यक्रम चलाती है।

74वाँ संशोधन-74वाँ संशोधन अधिनियम शहरी क्षेत्रों में तीन प्रकार की स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के गठन हेतु व्यवस्था देता है। यह दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, इलाहाबाद, लखनऊ, पटना आदि जैसे प्रमुख शहरों के लिए नगर निगमों की व्यवस्था करता है।

मध्यम श्रेणी के शहर नगर परिशदें तथा अपेक्षाकृत छोटे कस्बे नगर पंचायतें रखते हैं। प्रत्येक नगर निगम में एक महापरिषद् होती है। इसमें शहर के वयस्क नागरिकों द्वारा निर्वाचित सदस्य होते हैं।

इन सदस्यों को पार्षद कहा जाता है। निर्वाचित सदस्यों के अलावा, परिषद् में निर्वाचित पार्षदों द्वारा चुने गए वयोवृद्ध जन भी होते हैं। सांसद व विधायक भी इसके सदस्य होते हैं।

महापौर सदस्यों द्वारा स्वयं के बीच से ही चुना जाता है। कुछ राज्य महापौर के सीधे चुनाव की व्यवस्था करते हैं। उसे शहर के प्रथम नागरिक के रूप में जाना जाता है।

नगर-निगम आयुक्त निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है। महापौर निगम आयुक्त को किसी भी विषय पर रिपोर्ट तैयार करने व प्रस्तुत करने को कह सकता है।

एक नगर निगम के अनिवार्य कार्यों में शामिल हैं-अस्पतालों का रखरखाव, स्वच्छ पेयजल आपूर्ति, बिजली, स्कूल चलाना और जन्मों व मौतों का लेखा-जोखा रखना। नगर निगम के विकासात्मक प्रकार्यों में कमजोर वर्गों के लिए दरिद्रता उन्मूलन कार्यक्रम शुरू करना शामिल है। MPS 03 Free Assignment In Hindi

नगर पालिका स्थानीय जनता द्वारा निर्वाचित पार्षदों से मिलकर बनती है। अनसचित जातियों व जनजातियों के लिए शहर में आबादी से उनके अनपात के अनसार सीटों का आरक्षण होता है और सीटों का एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होता है।

नगर-निगम बोर्ड का पीठासीन अधिकारी अध्यक्ष कहलाता है। जो शहर के मतदाताओं द्वारा चुना जाता है। कुछ राज्यों में नगर-निगम बोर्ड का अध्यक्ष प्राथमिक स्कूल अध्यापकों और निचले स्तर के कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार भी रखता है।

एक कार्यकारी अधिकारी नगरपालिका के दिन-प्रति-दिन के प्रशासन को देखता है। अनिवार्य कार्यों में आते हैं-बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाएँ, विद्यालय आदि मुहैया कराना और सड़कों का रखरखाव करना तथा समाज के कमजोर वर्गों का हिसाब रखना, छोटे शहर पंचायतें रखतें हैं।

इसके सदस्य शहर के वयस्क नागरिकों द्वारा चुने जाते हैं। जैसा कि अन्य स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में है, अनुसूचित जातियों व जनजातियों तथा महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं।

प्रश्न 8. भारत में क्षेत्रवाद के फैलाव के कारकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- हम जानते हैं कि भाषा, नृजातीय, संस्कृति तथा धर्म ही थे जो स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में प्रांतीय पहचान निर्माण का आधार बन गए। प्रांतवाद के प्रारंभिक रूपों से पचास के दशक में संयुक्त महाराष्ट्र, विशाल आन्ध्र अथवा महा गुजरात हेतु माँगों में अभिव्यक्ति मिली।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई, राज्यों के पुनर्गठन से तात्पर्य, देखें 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम, इसी प्रकार की माँगों को स्वीकार कर लेने से ही था। MPS 03 Free Assignment In Hindi

एक वर्ग संदर्श में साठ व सत्तर के दशकों में भारतीय राजतंत्र के प्रांतीयकरण को हरित क्रांति के चलते प्रांतीय दलों के साथ साठ-गाँठ में धनी भूमि-संपन्न कृषिवर्ग के उदय का श्रेय दिया जा सकता है।

संख्यात्मक रूप से सशक्त मध्य जातीय प्रबल कृषिवर्ग के नेतृत्व वाले अधिकांश ग्रामीण परिधीय सामाजिक समूहों की बढ़ती भागादारी के लिहाज से चुनावी लोकतंत्र के विस्तार ने इस वर्ग के सत्ता आधार को और अधिक संपीड़ित कर दिया।

कृषिक मध्यवर्ग के साथ-साथ शहरी निम्न मध्यवर्ग भी जाहिर तौर पर वित्तीय व प्रशासनिक मामलों में सत्ताओं के संघीय हस्तांतरण से लाभान्वित होना था।

केंद्र-राज्य संघर्षों को अनुमत्य बनाए जाने के अलावा, इस नए वर्ग बल ने अन्तरप्रांतीय तनावों में वृद्धि की ओर प्रवृत्त किया, क्योंकि परिधीय उप-प्रांत आर्थिक रूप के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी उपेक्षित महसूस करते थे।

यह अशतः कच्छ, सौराष्ट्र, मराठवाडा, विदर्भ, तेलंगाना तथा झारखंड के मामले की भाँति आर्थिक भेदभाव की धारणा अथवा तीव्रतर आर्थिक विकास हेतु आग्रह के आधार पर वर्धमान प्रांतीय पहचान के निर्माण को स्पष्ट करता है।

अपनी भाषायी, सांस्कृतिक तथा जनजातीय सर्वमान्यता पर पहुँचते विभिन्न उप-राष्ट्रीय पहचान समूहों की लामबंदी अल्पविकासाभाव-विरुद्ध शिकायत से सहसंबद्ध थी।

इसके अतिरिक्त, भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम वर्षों में राष्ट्रवादी विकासात्मक कार्यसूची जिसका झुकाव राज्य नियंत्रणवादी था, का महत्त्व भी स्पष्ट करता है कि क्यों इन प्रांतीय समूहों ने विशेष विकास उपसायों हेतु आवश्यकता समेत माँगों की अभिव्यक्ति के अपने मौलिक नृजातिवादी आधार को परिष्कृत किया, यथा झारखंड। MPS 03 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार कच्छ, सौराष्ट्र मराठवाड़ा तथा विदर्भ के लिए विकास बोडे गठित करने पड़े ताकि इन प्रांतों की शिकायतों को सुना जा सके जिन्होंने पचास व साठ के दशकों से ही अपने प्रांतों को राजनीतिक रूप से अधिक प्रबल प्रांतों को लाभ पहुँचाने हेतु अपने ही राज्यों में आंतरिक उपनिवेशों की भाँति व्यवहार किए जाते हुए देखा था।

तथापि, प्रबल भाषायी अभिजात्य वर्ग जो तब लघुतर, कम विकसित उप-प्रांतों को बृहत्तर भाषायी प्रांतों में सहयोजित करने में सक्षम था, उप-प्रांतों के कुसंतुलित आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप भाषायी अथवा सांस्कृतिक संसक्ति के नाम पर ऐसा करने में बहुत जल्द सक्षम नहीं था।

सारभाग-केंद्रों का निर्माण करते प्रबल उप-प्रांतों कसाथ उपांतिकों जैसा व्यवहार किए जाने के अहासास पर उस तथ्य से बल दिया गया कि इनमें से अधिकांश उप-प्रांत खनिजों व प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से संपन्न थे, यथा झारखंड।

इसके अतिरिक्त इस तथ्य ने कि इन बड़े राज्यों में से कुछ, जैसे बिहार, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश आर्थिक क्षेत्र में अकर्मण्यता के लिए जाने जाते थे, इन राज्यों के विशिष्ट उप-प्रांतों को केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा हरियाणा कि भाँति तीव्रतर आर्थिक में सक्षम हुए छोटे राज्यों के विचार से सोचने की ओर प्रवृत्त किया।

हाल ही में गोरखालैंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ हेतु अलग राज्य के लिए क्षेत्रीय आंदोलनों का जिक्र इस प्रसंग में किया जा सकता है।

तब हम हिंदी हृदय-प्रदेश, यथा उत्तर प्रदेश में बुंदेलखण्ड, पूर्वांचल एवं हरित प्रदेश तथा बिहार में मिथिलांचल, जैसे राज्यों में विभिन्न उपभाषायी संप्रदायों के अभिकथन का भी संदर्भ ले सकते हैं।

तत्पश्चात् उनके अनूठे संकतार्थों वाले इन प्रांतों में राजनीतिक पहचान के उपर्युक्त रूप की यथार्थ प्रक्रिया को उन सार्वजनिक नीतियों के कार्यान्वयन से सहसंबद्ध किया जा सकता है जो तथाकथित रूप से प्रांतीय संतुलन पैदा करने पर अभिलक्षित थीं। MPS 03 Free Assignment In Hindi

नई-नई व्यक्त हुई राजनीतिक पहचानों से उठी राजनीतिक माँगों का समुचित उत्तर देने में, नेहरूवियन भरत में अंगीकृत, प्रशासन के बुद्धिवादी-पूर्णवादी नैकरशाही मॉडल की विफलता सांस्कृतिक कारकों पर आधार-वाक्य के रूप में कही गई तथा असमान एवं अक्षम विकास के अपराध-कर्म ने नृजातीय स्वायत्ततावादी आंदोलनों की विकास-अभाव-परिभाषा को तर्कसंगति प्रदान की, जैसे झारखंड में।

निष्कर्षतः ऐतिहासिक रूप से उपांतिक प्रांतीय समूहों को स्वयं को आत्म-सचेत नृजातीय पहचानों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु संघटित किया गया है ताकि वे अपने राजनीतिक संसाधन बढ़ा सकें और अपने निजी हित में नीति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकें।

सभी हाल में, इनमें से गोरखालैंड, बोडोलैंड, लद्दाख जैसे कुछ उप-प्रांतों को जिला परिषद् अथवा स्वायत्त प्रांत का दर्जा दिए जाने से स्थानीय लोगों की विकासात्मक आकांक्षाएं मुश्किल से पूरी हुई है।

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प्रश्न 9. भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका की व्याख्या कीजिए।

उत्तर यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि संचार माध्यम काफी हद तक जनमत तैयार करते हैं। ऐसे कई अध्ययन हुए हैं जो दर्शाते हैं कि संचार माध्यम ही लोगों की राय बनाने के एकमात्र साधन नहीं है।

1940 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान पॉल इ लाज़ारफेल्ड और अन्य विद्वानों ने जो शोध किया इससे पाया कि लोगों के निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संचार माध्यमों का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।

अपनी पुस्तक ‘द पीपुल्स चॉइस’ में उन्होंने अंतर्वैक्तिक संप्रेषण, हमजोली समूहों और ओपिनियन लीडरों को भी जनमत निर्माण के प्रमुख घटक माना।

फिर भी दो पायदानों वाले सूचना माडल में भी जनसंचार माध्यमों की भूमिका को पूरी तरह से नकारा नहीं गया बल्कि उसे जनता और ओपीनियन लीडर तक सूचनाएं प्रेषित करने की अहम भूमिका में दर्शाया गया।

1970 के दौरान संचार सिद्धांतकारों ने जनमत निर्माण में पुनः संचार माध्यमों की भूमिका को रेखांकित किया। जॉर्ज गार्बनर (1967) ने कल्टीवेशन सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसमें संचार माध्यमों को समाज का निर्माता घोषित किया। MPS 03 Free Assignment In Hindi

उनका मत था कि संचार माध्यमों का लोगों के नजरिए पर व्यंजनात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि उन्होंने दर्शाया कि अपने बार-बार और लम्बे प्रसार की वजह से वह प्रभावी प्रतीकों का निर्माण करता है।

उनके शोध समय के अनकल थे क्योंकि उस समय विज्ञापन समाज को प्रभावित कर रहे थे। बाद में संचार माध्यमों और राजनीति के संबंधों की पड़ताल भी की गयी और मेक्सवैल मकोम्ब और डोनाल्ड शॉ (1972) ने चुनावों के दौरान माध्यमों द्वारा एजेंडा तय करने की जांच की।

एजेंडा तय करने वाले सिद्धांत के प्रणोताओं का मानना है कि संचा माध्यम लोगों को क्या सोचना है की तुलना में सोचने के लिए क्या-क्या है बताने में सफल होते हैं।

इस अध्ययन में संचार माध्यमों द्वारा तय किए गए मुद्दों की तुलना लोगों और राजनेताओं द्वारा तय किए गए मुद्दों से की गई। इस अध्ययन में बताया गया है कि समय के साथ माध्यमों द्वारा तय किए गए मुद्दे जनता के मुद्दे बन जाते हैं।

संचार के दूसरे विद्वानों ने हमें जनसंचार के कई वैकल्पिक सिद्धांत बताए हैं पर हम यहां दो अन्य सिद्धांतों की चर्चा करेंगे।

मेल्विन द फ्लर और सैंड्रा बॉल राकीक ने निर्भरता का सिद्धांत सामने रखा जिसमें कुछ सामरिक तथा मनोवैज्ञानिक घटक संचार माध्यमों का उनके पाठकों और दर्शकों पर नियंत्रण रखने से बचाव करते हैं।

वह कहते हैं- जनसंचार माध्यमों में न केवल याद्वैच्छिक प्रभाव सत्ता की कमी होती है बल्कि वह याद्वैच्छिक संप्रेषण कर पाने में भी सक्षम नहीं होते।

माध्यम और उसके श्रोता या दर्शक समाज के अभिन्न अंग हैं अतः आस-पास का सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भ न केवल उनके संदेशों पर नियंत्र रखते हैं बल्कि उन संदेशों के दर्शकों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी नियंत्रित करते हैं। MPS 03 Free Assignment In Hindi

दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धांत विकास संचार का सिद्धांत कहलाता है जिसे विकासशील देशों के संचार समस्याओं के अध्ययन के लिए मैक्ब्राइड आयोग ने प्रतिपादित किया।

संचार की अंतर संरचना के अभाव, यंत्रों और सामग्री के लिए विकसित देशों पर निर्भरता आदि वह समस्याएं थी जिनका अध्ययन किया गया।

अपने-अपने समाजों के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता वाला काम मानने की उनकी प्रतिबद्धता और समान हितों वाले देशों की पहचान करना इन देशों के लक्ष्य थे।

विकास संचार सिद्धांतकारों की प्रमुख चिंता गरीबी उन्मूलन, जनसंख्या नियंत्रण, साक्षरता, रोजगार, आदि के विकास कार्यक्रमों में संचार माध्यमों का इस्तेमाल करने के तरीके ढूंढ़ना था।

इस सिद्धांत की सफलता सरकारों पर निर्भर करती है क्योंकि वही विधाई नीतियों की मदद से संचार माध्यमों की स्वतंत्रता या उन पर नियंत्रण लगा सकती हैं।

प्रश्न 10 क) पलायन के आर्थिक परिणाम

उत्तरअर्थव्यवस्था में एक गतिशील श्रम बल बेहतर दक्षतापूर्ण उत्पादन के लिए एक महत्त्वपूर्ण संघटक हो सकता है। जहाँ उच्च वेतन अच्छा उत्पादकता का संकेत देते हैं वहाँ वेतन लाभ के लिए प्रवास से उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है।

तथापि, सामान्यीकरण के लिए उत्पादक गुणवत्ता के प्रति आन्तरिक प्रवास के कुल अंशदान पर कुछ अध्ययन हुए हैं।

प्रवास अर्थव्यवस्था में बचत की दर और संचयन को भी प्रभावित कर सकता है और इस प्रकार शायद विकास को भी।

विशेषत: आमतौर पर माना जाता है कि अस्थायी प्रवासी अपने उपार्जन का अधिकांश बचत करते हैं क्योंकि जोखिम विमुख प्रवासी कम और निश्चित आय के कारण अपने घर वापसी के लिए बचत करते हैं और इसीलिए कि परिवार से अलग रहकर व्यय की सीमांतक उपयोगिता कम हो जाती है।

तथापि, अस्थायी आन्तरिक प्रवास के संदर्भ में समर्थक प्रमाण नहीं है। फिर भी, अस्थायी प्रवास से अस्थायी रूप से बचत करने के रुझान में वृद्धि हो सकती है।MPS 03 Free Assignment In Hindi

प्रवास से केवल उत्पादन की गुणवत्ता पर ही अन्तर नहीं पड़ता अपितु यह विभिन्न माध्यमों से गंभीरतापूर्वक आय के वितरण को भी प्रभावित करती है।

प्रवासी काल्पनिक तौर पर प्रवास से उस समय तक लाभ उठाते हैं जब तक वे निर्णय में कोई गलती न करें अथवा प्रवास के संदर्भ में सट्टेबाजी से कुछ भी हासिल नहीं होता है अथवा प्रवास प्रवासी की निजी स्वतंत्र इच्छा नहीं है। तथापि, प्रवास से जुड़ी सामाजिक गतिशीलता में परिवर्तन होता रहता है।

भारत से प्रमाण संकेत देता है कि शहरी प्रवासी गृहस्थों का एक छोटा ग्रुप अत्यधिक दयनीय हालत में समय गुजारता है

जबकि एक औसतन प्रवासी गृहस्थ विशेषतः शहर में कुछ समय के उपरान्त गैर-प्रवासियों की तुलना बेहतर जीवनयापन करता है कि जैसे ही प्रवासी श्रमिक स्थानान्तरण करते हैं, गैर प्रवासियों का उपार्जन का तरीका बदल जाता है।

यह स्पष्ट नहीं है कि क्या मूल स्थान पर मज़दूरी में वृद्धि होती है अथवा यह गन्तव्य स्थान पर घट जाती है। आगे चलकर, कुशल प्रवासियों के प्रस्थान से उनके बीच छूट गए लोगों की शिक्षा और प्रशिक्षण में वृद्धि हो सकती है परिणामस्वरूप मानव पूँजी में अधिक निवेश होता है तथा आय में वृद्धि होती है।

इसके प्रतिकूल कम से कम दो बल कार्य करते हैं। प्रथम, सुशिक्षित कार्यकत्ताओं के पूल द्वारा संचालित सामूहिक अर्थव्यवस्थाओं का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला है।

इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि कुशल कारीगरों के जाने से शिक्षा में वस्तुत: कमी आ सकती है। .

ख) भारत में पहचान की राजनीति

उत्तर- पहचान की राजनीति ऐसी राजनैतिक विचारधाराएँ और तर्क होते हैं जो किसी देश, राज्य या अन्य राजनैतिक इकाई के पूर्ण हित को छोड़कर उन समूहों के हितों और परिप्रेक्ष्यों को बढ़ावा देने पर बल दें जिसके लोग सदस्य हों।

यह समूह जाति, धर्म, लिंग, विचारधारा, राष्ट्रीयता, संस्कृति, भाषा, इतिहास, व्यवसाय या अन्य किसी लक्षण पर आधारित हो सकते हैं।MPS 03 Free Assignment In Hindi

यह आवश्यक नहीं है कि जिस समूह के सन्दर्भ में पहचान की राजनीति की जा रही है उस समूह के सभी सदस्य ऐसी राजनैतिक गतिविधियों में भागीदार हों या उसका समर्थन करें।

सामान्यतः नृजातीयता को उन लोगों के एक समूह का संघटन माना जाता है जो संस्कृति, भाषा, धर्म, इतिहास आदि के लिहाज से सर्वमान्य सहज गण रखते हैं और जो ऐसे किसी अन्य समह से भिन्न होते हैं जो अपने अलग सर्वमान्य सहज गुण रखते हैं।

यह संघटन एकल अथवा अधिक सहज गुणों पर हो सकता है। उदाहरण के लिए, भाषा धर्म (भारतीय संदर्भ में संप्रदायवाद के रूप में प्रसिद्ध) जाति अथवा जनजाति के आधार पर लामबंदी को नृजातीय लामबंदी माना जाता है।

ऐसे उदाहरणों में से एक हैं-पॉल आर.एस. ब्रास, जो जृजातीय लामबंदी तथा सांप्रदायिक लामबन्दी को अदल-बदल कर प्रयोग करते हैं।

दीपांकर गुप्ता नृजातीय तथा संप्रदायवाद के बीच भेद करते हैं। उनका तर्क है कि नृजातीय अनिवार्य रूप से राष्ट्र-राज्य-राज्यक्षेत्र व संप्रभुता, के संदर्भ में किसी समूह के संघटन को किसी अन्य के साथ संबंध में इंगित करती हैं।

एक नृजातीय समूह स्वयं को किसी राष्ट्र के राज्यक्षेत्र में आस्था का सच्चा अनुयायी होने की घोषणा करता है अथवा एक संप्रभु राज्य स्थापित करना चाहता है अथवा किन्हीं अन्य समूहों की निष्ठादारी पर संदेह करता है।

ऐसे राष्ट्र-राज्य के सहज गुणों का उल्लेख प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष हो सकता है। उनके विचार से वह सामूहिक संघटन नहीं है। यह मात्र सांप्रदायिक लामबंदी है. राष्ट्र-राज्य के प्रति किसी समह की निष्ठा पर संदेह अथवा उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। MPS 03 Free Assignment In Hindi

सांप्रदायवाद में यह सरकार ही है जो संदर्भ बिंदु होती है; सरकार पर ही सांप्रदायिक समूहों के प्रति भेदभाव बरतने अथवा उनका समर्थन करने का दोष लगता है।

देश व काल के बदलते प्रसंग में सांप्रदायवाद नृजातीयता में अथवा नृजातीयता सांप्रदायवाद में परिवर्तित हो सकती है।MPS 03 Free Assignment In Hindi

कोई भी राष्ट्र-राज्य एक संप्रभु भौगोलिक सत्ता होता है जिसके आधार-स्तंभ होते हैं-इतिहास, संस्कृति, भाषा, धर्म अथवा सभ्यता पर आधारित एक समुदाय के सहभागिता मनोभाव।

परंतु कुछ विद्वजन भारत को एक राष्ट्र-राज्य की नींव का आधार एकल राष्ट्र अथवा राष्ट्रीयता होता है। इस प्रकार के समाज में लोग एक ही सर्वमान्य भाषा, संस्कृति अथवा धर्म भी अपनाते हैं।

चूँकि भारत में बड़ी संख्या में ऐसी राष्ट्रीयताएँ हैं जो भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलती हैं, भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक सहज गुण, इतिहास, धर्म आदि रखती हैं; वह एक बहुराष्ट्रीय राज्य होता है न कि राष्ट्र-राज्य ।

बहरहाल, सामान्यतः भारतीय संदर्भ में राष्ट्र-राज्य, राष्ट्र अथवा बहुराष्ट्रीय राज्य जैसे शब्दों का प्रयोग अदल-बदलकर किया जाता है।MPS 03 Free Assignment In Hindi

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