IGNOU MPS 02 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

MPS 02

MPS 02 Free Assignment In Hindi

MPS 02 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. आत्मनिर्णय की अवधारणा और उसके अनुप्रयोग में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर. समाज विज्ञान विश्व कोश (Encyclopedia of Social Sciences) ने आत्म-निर्णय की व्याख्या इस प्रकार की है, “एक राष्ट्रीयता के सभी लोगों को अपने स्वयं के राज्य में अपना शासन स्वयं करने के लिए एक साथ रहने का अधिकार है।

इसलिए यह स्पष्ट है कि यह अवधारणा राष्ट्रवाद की अवधारणा पर स्थित है। राष्ट्रवाद में समुदाय की ओर से अपनी अलग पहचान के लिए स्वानुभूतिमूलक भावना और स्व-शासन या स्वतंत्र होने की प्रेरणा या आकांक्षा अन्तर्निहित है।

भाषा, धर्म, वंश या सांझे ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर पहचान हो सकती है और ये विशेषताएँ लोगों में उभय भावनात्मक बंधनों को सुदृढ़ बनाने में सहायक होते हैं।

यह आधार काल्पनिक हो सकता है परन्तु बंधन वास्तविक होते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, राष्ट्रपति, विल्सन के चौदह सूत्रों में समाविष्ट वचन के बावजूद एशिया और अफ्रीका – ब्रिटिश, फ्रेंच, डच और पुर्तगाली के उपनिवेशी साम्राज्यों में लोगों पर आत्मनिर्णय के सिद्धान्त लागू नहीं किए गए।

लींग ऑफ नेशन्स के प्रतिज्ञापन में केवल कहा गया, सदस्य “अपने नियंत्रण के अधीन देशीय निवासियों की न्यायसंगत व्यवहार की सुरक्षा का प्रबंध शुरु करने के लिए सहमत हुए।” वास्तव में, उनके अधिकांश नेताओं ने इसे उनके प्रति विश्वासघात समझा जब उन्होंने युद्ध के दौरान इस आधार पर अपने उपनिवेशी स्वामियों को भरपूर सहयोग दिया था कि युद्ध सफलता के साथ समाप्त होने पर उन्हें पर्याप्त पुरस्कृत किया जाएगा, यदि पूर्ण स्वराज्य नहीं दिया गया तो स्वशासन दिया जाएगा।

इसलिए, विशेषकर भारत में, जन आन्दोलन और शासकों से असहयोग आरंभ हुआ। यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी जारी रहा। MPS 02 Free Assignment In Hindi

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का प्रारूप तैयार करते समय, इसके संस्थापकों की चिन्ता स्पष्टतः आत्म-निर्णय के प्रश्न की अपेक्षा शान्ति और सुरक्षा, राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता की पवित्रता से अधिक थी। इन चिंताआ का उल्लेख चार्टर में पहले किया गया है और आत्म-निर्णय का उसके बाद।

बाद में आत्मनिर्णय का उल्लेख चार्टर में केवल दो स्थानों पर हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के प्रयोजनों में से एक उल्लेख इस प्रकार है “लोगों के समान अधिकारों और आत्म-निर्णय के सिद्धान्त के लिए सम्मान के आधार पर राष्ट्रों के बीच मित्रतापूर्ण संबंध विकसित करना” (अनुच्छेद 1.2)।

इसका उल्लेख सिद्धान्त के रूप में भी मिलता है जो लोगों को सामाजिक और आर्थिक दशाओं तथा अधिकारों के विकास का आधार होना चाहिए।

(अनुच्छेद 55) अब इस बात पर सहमति हुई है कि यहाँ शब्द “लोग” का संबंध उन लोगों से हैं जो अभिशप्त उपनिवेशी शासन के अधीन थे।

व्यापक संदर्भ में चार्टर अध्याय XII, XIII और XI में न्यासी परिषद (ट्रस्टीशिप कॉउन्सिल) और अस्वशासी राज्य क्षेत्रों (नॉन सेल्फ गवर्निंग टैरिटैरीज) के लिए प्रावधान करता है।

शत्रु राष्ट्रों के राज्य क्षेत्रों उपनिवेशों के साथ राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशन्स) के अधीन अधिदेशों को न्यास के रूप में शामिल किया गया और इसे प्रशासन का प्रभार दिया गया और इस का पर्यवेक्षण न्यासी परिषद को सौंपा गया।

इसका उद्देश्य निवासियों की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक प्रगति तथा स्वशासन और स्वतंत्रता के लिए प्रगामी विकास को बढ़ावा देना था।

न्यासी परिषद को निवासियों से याचिकाएँ प्राप्त करने, प्रशासन प्राधिकारियों से रिपोर्ट लेने, जाँच करने और महासभा (जनरल असेम्बली) को रिपोर्ट करने की शक्तियाँ दी गई।

1950 में दय न्यास राज्य क्षेत्रों में से दो को छोड़कर 1970 तक सभी स्वतंत्र हो गए थे। चार्टर का अध्याय XI उपनिवेशों पर घोषणा थी। इन उपनिवेशों को अस्वशासी राज्यक्षेत्र कहा गया।

इसके अधीन सदस्य देश जो इन उपनिवेशों के प्रति उत्तरदायी थे, (पुर्तगाल को छोड़कर) “निवासियों के कल्याण के भरसक प्रयास की बाध्यता को पवित्र विश्वास के रूप में स्वीकृत करने और स्वशासन तथा स्वतंत्र राजनीतिक संस्थाओं का विकास करने” तथा यू. एन .को आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक दशाओं के बारे में सूचना देने के लिए वचनबद्ध थे। संयुक्त राष्ट्र ने 1946 में ऐसे राज्य क्षेत्रों की संख्या 74 बताई गई थी।

स्वशासन की दिशा में प्रगति मॉनीटर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने स्वशासी राज्य क्षेत्रों पर समिति के रूप में शासन प्रणाली तैयार की। MPS 02 Free Assignment In Hindi

यूरोप में साम्राज्यिक शक्ति, विशेषकर फ्रांस और पुर्तगाल ने अपने बाहरी उपनिवेशों (जैसे अल्जीरिया और गोवा) को अपने राष्ट्रों के अभिन्न अंग मानने की रणनीति का अनुसरण किया।

उन्होंने अपने राष्ट्रिकों को उन राज्य क्षेत्रों में बसाया जो वहाँ के मूल निवासियों के साथ अपने विधानमंडलों में प्रतिनिधि थे। इस प्रकार तकनीकी दृष्टि से मूल निवासी ‘प्रजा’ नहीं थी बल्कि उन मेट्रोपोलिटन राज्यों के “स्वतंत्र” राष्ट्रिक थे।

इन राज्य क्षेत्रों के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा विचार करने के किसी भी प्रयास का इस आधार पर विरोध किया जाता था कि यह चार्टर के अनुच्छेद 2(7) का उल्लंघन करता है।

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प्रश्न 2. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के अर्थ की व्याख्या कीजिए। यह सीमा सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?

उत्तर. Terrorism शब्द लेटिन के शब्दों ‘terrere’ और ‘deterre’ से उत्पन्न हुआ है। शब्द ‘terrere’ का अर्थ है ‘tremble’ (भय से कांपना, थरथराना, भयभीत होना) और शब्द ‘deterre’ का निहितार्थ है भयभीत होना।

इस प्रकार terrorism का अर्थ है, लोगों को हानि पहुँचाना, ताकि वे इतने भयभीत व आंतकित हो जाए कि वे कांपना शुरु कर दें। यह सरकार या राज्य के विधिसम्मत प्राधिकार को दुर्बल कर प्रणालीबद्ध हिन्सा द्वारा स्पष्ट उद्देश्य प्राप्त करने की रणनीति है। MPS 02 Free Assignment In Hindi

विगत में हिंसा का सहारा तब लिया जाता था, जब शासक लोगों की तकलीफों को दूर करने में विफल होते थे और वे लोगों के अधिकारों का दमन और अतिक्रमण का सहारा लेते थे।

आतंकवाद की राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है और हिन्सा एक मात्र तरीका होता है जिसका वे सहारा लेते हैं।

आतंकवादी शब्द से निन्दात्मक अर्थ उत्पन्न होता है। कूलोम्बिस और वाल्फ के अनुसार “आतंकवादी संगठनों की अधिक तटस्थ, मूल्य मुक्त परिभाषा में उन्हें राज्येत्तर अभिकर्ता कहा जा सकता है

जो कतिपय राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए गैरपरम्परागत और हिन्सा की रुढ़िगत तकनीकें प्रयोग करते हैं।

वास्तव में, आतंकवाद राजनीतिक उद्देश्यों के लिए, हिन्सा का संगठित प्रयोग है और मुख्यतया यह निर्दोष लोगों या आसान लक्ष्यों पर किया जाता है।

युद्ध के समान आतंकवाद में राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संगठित बल का प्रयोग अंतर्निहित है। राजनीतिक हथियार के रूप में अत्याचारी और पीड़ित दोनों ने आतंक अपनाया है।

सामान्यतया एक के मित्र या सहयोगी “स्वतंत्रता सेनानी” कहलाते हैं तो दूसरे के शत्रुओं या विरोधियों को आतंकवादी वर्णित किया जाता

सीमा पार आतंकवाद और अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद में केवल तकनीकी अंतर है। सीमा पार आतंकवादियों को केवल किसी दूसरे देश में कार्रवाई करने के लिए एक देश में प्रशिक्षित किया जाता है तो अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के शिकार कई देशों में होते हैं। MPS 02 Free Assignment In Hindi

उदाहरण के लिए, अल कायदा अपने शिकार के लिए किसी एक देश या क्षेत्र में सीमित नहीं हैं। इसके “शत्रु” विश्व भर में पाए जाते हैं, यद्यपि इसके मुख्य निशाने पर कुछ ही देश हैं।

अल कायदा इस्लामी सिद्धान्त की प्रधानता चाहता है और जो भी इसके मार्ग. में आते हैं, सभी इस निशाने पर होने चाहिए। इसलिए आज संयुक्त राज्य और यूनाइटेड किंगडम अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के आम शिकार हैं।

भारत, रूस, श्रीलंका, नेपाल और बहुत ‘से अन्य देश भी आतंकवाद के शिकार हैं। सीमा पार आतंकवाद और अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के बीच अंतर कुछ अस्पष्ट है। दो या अधिक देशों में सक्रिय सभी आतंकवाद को मोटे तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय आतंक कहा जा सकता है।

जैसे नेपाल में माउवादी और भारत में पीपल्स वार ग्रुप (पी डब्ल्यू जी). यू.के. में आइरिस रिपब्लिकन आर्मी (आई आर ए) उस आतंकवाद से भिन्न हैं जिनकी जड़ एक देश में हैं और ये अपनी उत्पत्ति के देश की सहायता से कार्रवाई करता है परन्तु यह दूसरे देश में आतंक पैदा करने के लिए हिन्सा का प्रयोग करता है।

इस दूसरे किस्म के आतंकवाद को सीमा पार के आतंकवाद के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके सक्रिय कार्यकर्ताओं को उनके अपने देश से भिन्न दूसरे देश द्वारा प्रायोजित और प्रशिक्षित किया जाता है,

जिस आतंकवाद का भारत 1980 के दशक से सामना कर रहा है, उसकी उत्पत्ति, प्रशिक्षण और पूरी सहायता पाकिस्तान में भारत की सीमापार से या पाक-अधिकृत

..जैसे नेपाल में माउवादी और भारत में पीपल्स वार ग्रुप (पी डब्ल्यू जी), यू.के. में आइरिस रिपब्लिकन आर्मी (आई आर ए) उस आतंकवाद से भिन्न हैं जिनकी जड़ एक देश में हैं और ये अपनी उत्पत्ति के देश की सहायता से कार्रवाई करता है परन्तु यह दूसरे देश में आतंक पैदा करने के लिए हिन्सा का प्रयोग करता है।

इस दूसरे किस्म के आतंकवाद को सीमा पार के आतंकवाद के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके सक्रिय कार्यकर्ताओं को उनके अपने देश से भिन्न दूसरे देश द्वारा प्रायोजित और प्रशिक्षित किया जाता है,

जिस आतंकवाद का भारत 1980 के दशक से सामना कर रहा है, उसकी उत्पत्ति, प्रशिक्षण और पूरी सहायता पाकिस्ताना में भारत की सीमापार से या पाक अधिकृत कश्मीर से है।

हमारी सीमाओं के पार बड़ी संख्या में प्रशिक्षण शिविर हैं, जहाँ युवकों को बहकाकर ले जाया जाता है और वहाँ उन्हें भारत में हिन्सात्मक कार्रवाइयाँ करने के लिए भड़काया जाता है, प्रशिक्षित किया जाता है, नकदी दी जाती है और अस्त्र-शस्त्रों से लैंस किया जाता है। MPS 02 Free Assignment In Hindi

इस सीमापर आतंकवाद के परिणामस्वरूप भारत में हज़ारों निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। इसी प्रकार इजरायल के विरुद्ध आतंकवादी कार्रवाइयाँ उसकी सीमाओं के पार से की जाती हैं।

इसी प्रकार रूस में चेचेन्या आतंकवाद देश के अंदर से ही है, भारत के विरुद्ध आतंकवाद निश्चित रूप से सीमा पार किस्म का

प्रश्न 8. क) हथियारों की होड़ और महाशक्ति

उत्तर- हथियारों की दौड़ तब होती है जब दो या दो से अधिक समूह सैन्य कर्मियों और सामग्री में वृद्धि में प्रतिस्पर्धा करते हैं। सत्यापित करने के लिए उद्धरण की आवश्यकता होती है]

बेहतर सशस्त्र बलों के लिए दो या दो से अधिक राज्यों के बीच एक प्रतियोगिता के रूप में परिभाषित [किसके द्वारा?]; हथियारों के उत्पादन, एक सेना के विकास और बेहतर सैन्य प्रौद्योगिकी के उद्देश्य से संबंधित एक प्रतियोगिता,

इस शब्द का उपयोग किसी भी दीर्घकालिक बढ़ती प्रतिस्पर्धी स्थिति का वर्णन करने के लिए भी किया जाता है जहां प्रत्येक प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी समूह दूसरों से बाहर निकलने पर ध्यान केंद्रित करता है।

एक खेल दौड़ के विपरीत, जो एक विलक्षण परियोजना के परिणाम के रूप में व्याख्यात्मक जीत के साथ एक विशिष्ट घटना का गठन करता है, MPS 02 Free Assignment In Hindi

हथियारों की दौड़ चालू और संभावित रूप से खुले अंत व्यवहार की सर्पिलिंग प्रणाली का गठन करती है। मौजूदा विद्वानों के साहित्य को विभाजित किया गया है कि क्या हथियारों की दौड़ युद्ध से संबंधित है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विद्वान हथियारों की दौड़ को सुरक्षा दुविधा, तर्कवादी सर्पिल मॉडल, संशोधनवादी लक्ष्य वाले राज्यों और प्रतिरोध मॉडल के रूप में समझाते हैं।

) परमाणु अप्रसार संधि

उत्तर. परमाणु क्लब में चीन का प्रवेश चर्चा का विषय, पूर्व-पश्चिम शीत युद्ध मुद्दे से परमाणु मुद्दा बन गया, पहले मुख्यतः भूमंडलीय परिप्रेक्ष्य में विकसित देशों द्वारा सोचा जाता था।

शस्त्र प्रणालियों, रणनीतिक समानता और तदनुसार भौगोलिक रणनीति संबंधी महत्व पर ध्यान केन्द्रित किया जाता था।

परन्तु अब सामग्री के शान्तिपूर्ण उपयोगों के बदले शस्त्रों के लिए प्रयोग करने की समस्या पर ध्यान दिया जाने लगा है। यद्यपि एन पी टी पर चर्चा में यह चिन्ता व्यक्त की गई थी परन्तु यह केवल 1974 के भारत के परीक्षण के बाद हुआ कि इस प्रकार सीधा संबंध वास्तविकता के रूप में सामने आया।

अंततः प्रसार पर नियंत्रण और संभव सुरक्षा उपायों के लिए गंभीर चिंता के फलस्वरूप परमाणु अप्रसार संधि तैयार की गई।

इसके प्रायोजकों, संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन और सोवियत संघ का मुख्य उद्देश्य परमाणु शस्त्रों के प्रसार को रोकना था।

संधि हस्ताक्षरकर्ताओं को दो श्रेणियों में विभाजित करता है, ये देशः जिनके पास परमाणु बम हैं, (जिनके पास 1 जनवरी 1967 से पहले थे) और वे देश जिनके पास नहीं थे। MPS 02 Free Assignment In Hindi

इससे गैर-परमाणु शस्त्र देश परमाणु सामग्री के अपने भंडार का निरीक्षण कराने के लिए वचनबद्ध हो गए। एन.पी.टी, उन्हें आई. ए. ई. ए. से सुरक्षा उपाय संधियों पर वार्ता करने का वचन देता है।

परन्तु ये सुरक्षा उपाय शस्त्र राज्यों पर बंधनकारी नहीं है। गैर शस्त्र राज्यों द्वारा परमाणु शस्त्र उत्पादन न करने या अर्जित न करने के बदले शस्त्र धारक राज्य निम्नलिखित परं सहमत हुए:

(i) परमाणु शस्त्रों या अन्य परमाणु शस्त्र उपकरणों का हस्तान्तरण न करना,

(ii) 1953 में आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि के उपसिद्धान्त के रूप में सभी (भूमिगत सहित) परमाणु परीक्षणों की समाप्ति की माँग करना,

(iii) संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुपालन में धमकी या बल प्रयोग को रोकना,

(iv) अनुसंधान उत्पादन और शान्तिपूर्ण प्रयोजनों के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग विकसित करना तथा इस संबंध में विकासशील देशों की सहायता करना, परमाणु विस्फोटों के शान्तिपूर्ण प्रयोग से संभावित लाभ सभी राज्यों को उपलब्ध करना, और

(vi) परमाणु शस्त्रों की दौड़ समाप्त करना तथा परमाणु निरस्त्रीकरण अपनाने के लिए संधिवार्ता करना।

परमाणु शस्त्रों का प्रसार रोकने के लिए तैयार किया गया प्रभावकारी अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण व्यवस्था का निर्माण करने के लिए पहला सोपान एन पी टी बना।

अमेरिका और सोवियत संघ की ओर से इस बात पर सहमति थी कि परमाणु शस्त्रों को मुक्त प्रसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर कर सकता है। इस पर फ्रान्स और चीन ने भी सकारात्मक रुख नहीं दिखाया।

वे इस बात से आंशकित थे कि परमाणु शस्त्रों पर संयुक्त राज्य और सोवियत संघ का ही नियंत्रण रहेगा। दोनों देशों ने एन पी टी पर उसके निर्माण के समय, हस्ताक्षर नहीं किए थे।

गैर परमाणु शस्त्र राज्य संधि के आलोचक भी थे। उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण संधि महसूस किया। उनकी आलोचना के मुख्य बिन्दु थे: MPS 02 Free Assignment In Hindi

(i) संधि के प्रावधानों का असमान स्वरूप, जो सुरक्षा उपाय केवल गैरपरमाणु देशों पर थोपे गए हैं;

(ii) शस्त्र सम्पन्न राज्यों को शान्तिपूर्ण प्रयोग कार्यक्रम का अनुसंधान करने का अधिकार प्रदान कर उनके वाणिज्यिक हितों को संरक्षण दिया गया है;

(iii) शस्त्र सम्पन्न राज्यों की ओर से अस्पष्ट वचनबद्धता; और

(iv) और परमाणु राज्यों की वैध सुरक्षा चिन्ताओं को दूर करने में विफलता।

एन पी टी पर जब तक हस्ताक्षर नहीं हुए, सुरक्षा उपायों के बारे में चर्चा प्रौद्योगिकीय पैरामीटरों और ढाँचे के अंतर्गत बनी रहीं।

एन पी टी के अधीन संधि के असंतुलित स्वरूप और उसके दृष्टिकोण की व्यापकता के फलस्वरूप चर्चा तकनीकी क्षेत्र से हटकर राजनीति क्षेत्र में आ गयी।

जैसा कि पहले नहीं था, सुरक्षा उपायों की एन पी टी प्रणाली को राज्य की राजनीतिक प्रभुसत्ता पर अतिक्रमण के रूप में समझा जाने लगा।

अंततः यह 1974 का भारत का परमाणु विस्फोट था जिसने शान्तिपूर्ण उपयोग और शस्त्र निर्माण के बीच संबंध की ओर अन्तर्राष्ट्रीय ध्यान पुनः आकर्षित किया।MPS 02 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 9. क) अर्न्तराष्ट्रीय संबंधों के प्रति मार्क्सवादी दृष्टिकोण

उत्तर- पश्चात्य देशों के अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्वान काफी समय से यह कहते रहे हैं कि मार्क्सवादी सिद्वान्त में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, या अंतराष्ट्रीय संबंध के साथ संगत हो।

अंतराष्ट्रीय संबंधों के सैद्धान्तिक विश्लेषण में, उनके अनुसार मार्क्स का कोई भी योगदान नहीं है। इस प्रकार के दावे पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो सकते, क्योंकि मार्क्स का ध्यान मूल रूप से राष्ट्रीय पूँजीवाद की संरचना के अध्ययन पर केन्द्रित था।

परन्तु यह कहना भी गलत होगा कि मार्क्स ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर कभी कोई विचार किया ही नहीं।

यद्यपि मार्क्स मुख्य रूप से पूँजीवाद की राष्ट्रीय संरचना के विश्लेषण में विशेषकर पँजीपतियों और श्रमिकों के संबंधों की समीक्षा में व्यस्त था, फिर भी उस कृतियों में अंतराष्ट्रीय परिवेश अवश्य निहित था।

इसका संकेत मार्क्स के इस विचार में मिलता है कि वर्ग के प्रति निष्ठा देश की सीमाओं तक सीमित नहीं होती। इसी के आधार पर उसने अपनी 1848 की रचना “Communtst Manifesto” में आह्वान किया था कि “संसार के श्रमिक, एक हो जाओ।MPS 02 Free Assignment In Hindi

जहाँ यथार्थवादी तथा उदारवादी विचारों के अनुसार शक्ति का संगठन लम्बित (vertical) रूप में किया गया है, वहीं मार्क्सवाद अंतर्राष्ट्रीय वर्ग का संगठन क्षैतिज (horizonal) रूप में अंकित करता है।

परन्तु अंतराष्ट्रीय व्यवस्था में पूँजीवाद की स्थिति की विस्तृत समीक्षा मार्क्स ने नहीं, उसके अनुयायी लेनिन ने 1917 में प्रकाशित अपनी पुस्तक साम्राज्यवाद (Imperialism: The Highest Stage of Capitalism) में की।

लेनिन ने तर्क दिया कि साम्राज्यवादी विस्तार यह प्रदर्शित करता है कि घरेलू पूँजीवाद अतिरिक्त पूँजी का निर्यात करके लाभ के स्तर को बढ़ाने की कामना व्यक्त करता रहता है इसके फलस्वरूप विभिन्न पूँजीवादी देशों के एक दूसरे से संघर्ष होते रहते हैं,

जिसका परिणाम हुआ युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध)। यह युद्ध मूलतः साम्राज्यवादी युद्ध था क्योंकि यह अफ्रीका, एशिया इत्यादि के उपनिवेशों पर नियंत्रण स्थापित रखने के लिए लड़ा गया।

मार्क्सवादी उपागम के केन्द्रीय (अंतरतम) तत्त्व-सभी मार्क्सवादी मानते हैं कि पूरे सामाजिक विश्व की सम्पूर्णता (totality) में समीक्षा करनी चाहिए।

अतः वे शैक्षणिक विभाजन-इतिहास, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, अंतर्राष्ट्रीय संबंध-को मनमाना और असहायक मानते है।

उनका कहना है कि किसी एक विषय का अध्ययन, अन्य विषयों के ज्ञान के अभाव में, संभव नहीं है, क्योंकि सामाजिक विश्व का अध्ययन एक इकाई के रूप में किया जाना चाहिए।

स्वयं मार्क्स ने अपनी पुस्तक “पूँजी” (The Capital) में लिखा था कि विभिन्न सामाजिक विषयों का अंतर्विषयक अध्ययन किया जाना चाहिए।

उसका सुझाव था कि सामाजिक संबंधों का सरल (simplest) से आरंभ करके क्रमशः पेचीदा चित्रण करना चाहिए। अतः मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार, विभिन्न विषयों की सीमाओं से बाहर निकल कर ही विश्व राजनीति का गतिशील अध्ययन किया जा सकता है।MPS 02 Free Assignment In Hindi

मार्क्सवादी उपागम का एक अन्य तत्त्व है इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या। उसका केन्द्रीय तर्क यह है कि किसी समाज का आर्थिक विकास ही उसकी समस्त ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रक्रिया का निर्धारण करता है। इसका मल अर्थ यह है कि आर्थिक विकास प्रभावी रूप से इतिहास के चालक का कार्य करता है।

मार्क्स का केन्द्रीय आधार इस बात की पहचान है कि उत्पादन के साधनों (भूमि, श्रम एवं पूँजी), तथा उत्पादन के संबंधों (किसी समाज में उत्पादन के साधनों का नियमन किस प्रकार होता है) के मध्य तनाव ही किसी भी समाज का आर्थिक आधार होता है।

आर्थिकआधार में विकास, सम्पूर्ण समाज के आमूल परिवर्तन का अग्रणी होता है। यह इसलिए है कि भौतिक जीवन में उत्पादन का प्रकार सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक होता है।

यह इसलिए है कि भौतिक जीवन में उत्पादन का प्रकार सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ एवं प्रथाएँ, अर्थव्यवस्था की शक्ति और उसके नियंत्रण के प्रतिमान को प्रतिबिम्बित करती है।

अतः यह स्वाभाविक है कि आर्थिक आधार में परिवर्तन से अंततः कानूनी और राजनीतिक संरचना में भी परिवर्तन होता है। मार्क्स के समाज के विश्लेषण में वर्ग (class) का अत्यंत प्रमुख स्थान है।

उदारवादियों के विपरीत, जो यह मानते हैं कि विविध सामाजिक समूहों में प्रायः सद्भावना रहती है, मार्क्सवादियों का विचार है कि समाज में निरंतर वर्ग-संघर्ष होते रहते हैं।

उदाहरण के लिए, एंजिल्स के साथ रचित Communist Manifesto में मार्क्स ने तर्क दिया था कि, “अभी तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” पूँजीवाद समाज में संघर्ष का मुख्य आधार पूँजीवादियों और श्रमिकों के मध्य होता है।

ख) रचनावादी दृष्टिकोण

उत्तर. यह सिद्धान्त मुख्य रूप से पश्चिमी यूरोप में प्रचलित है। यह एकीकरण प्रक्रिया के भौतिक तत्त्वों की अपेक्षा, विचारों, मानकों तथा पहचान की भूमिका पर अधिक बल देता है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की व्याख्या में मानव विचारों, चिंतन तथा अभिकर्ता-कार्यालय (agency) की निर्णायक भूमिका मानी जाती है। MPS 02 Free Assignment In Hindi

रचनावादियों (constructivists) का कहना है कि मानक (norms) मात्र अवरोधक होते हैं, परन्तु वे अभिकर्ता के रचनाकार का रूप ले लेते हैं।

एक प्रकार से रचनावाद विचारात्मक, भौतिक और संस्थागत क्षेत्रों के मध्य सेतु का कार्य करता है। यह इस तथ्य की उत्तम व्याख्या करता है कि एकीकरण की प्रक्रिया “कैसे” और “क्यों” चलती हैं।

इस प्रकार यह तार्किक विश्लेषणों के साथ अभिबिन्दुता (convergence) प्रस्तुत करता है। रचनावादी उपागम की सबसे बड़ी कमी यह है कि यथार्थवाद तथा अन्तर सरकारवाद के विपरीत, यह अभी तक शोध की रणनीति तक नहीं पहुंच पाया है।

प्रश्न 10. क) मध्य एशिया के राज्य

उत्तर- मध्य एशिया एशिया महाद्वीप का मध्य या केन्द्रीय भाग है। यह पूर्व में चीन से पश्चिम में कैस्पियन सागर तक और उत्तर में रूस से दक्षिण में अफ़ग़ानिस्तान तक विस्तृत है।

भूवैज्ञानिकों द्वारा मध्य एशिया की हर परिभाषा में भूतपूर्व सोवियत संघ के पाँच देश हमेशा गिने जाते हैं – काज़ाख़स्तान, किरगिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान।

इसके अलावा मंगोलिया, अफ़गानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, भारत के लद्दाख़ प्रदेश, चीन के शिनजियांग और तिब्बत क्षेत्रों और रूस के साइबेरिया क्षेत्र के दक्षिणी भाग को भी अक्सर मध्य एशिया का हिस्सा समझा जाता है।

मध्यकाल में इसे तुरकेस्तान, और तातारिस्तान भी कहते थे, क्योंकि यहाँ की भाषा तुर्क भाषा से संबंधित है । सांस्कृतिक रूप से इस क्षेत्र पर ईरान का प्रभाव रहा है,MPS 02 Free Assignment In Hindi

यद्यपि मुख्य आबादी सुन्नी है, इतिहास में मध्य एशिया रेशम मार्ग के व्यापारिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है।

चीन, भारतीय उपमहाद्वीप, ईरान, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच लोग, माल, सेनाएँ और विचार मध्य एशिया से गुज़रकर ही आते-जाते थे।

इस इलाके का बड़ा भाग एक स्टेपीज वाला घास से ढका मैदान है हालाँकि तियान शान जैसी पर्वत शृंखलाएँ, काराकुम जैसे रेगिस्तान और अरल सागर जैसी बड़ी झीलें भी इस भूभाग में आती हैं।

ऐतिहासिक रूप मध्य एशिया में खानाबदोश जातियों का ज़ोर रहा है। पहले इसपर पूर्वी ईरानी भाषाएँ बोलने वाली स्किथी, बैक्ट्रियाई और सोगदाई लोगों का बोलबाला था लेकिन समय के साथ-साथ काज़ाख़, उज़बेक, किरगिज़ और उईगुर जैसी तुर्की जातियाँ अधिक शक्तिशाली बन गई।

इसलिए इसे कभी-कभी ‘तुर्किस्तान’ भी बुलाया जाता है। 21वीं सदी के बाद मध्य एशिया के बड़े हिस्से पर पहले रूसी साम्राज्य और फिर सोवियत संघ का राज रहा, जो दोनों स्लावी-बहुसंख्यक थे।

इस से बहुत से रूसी और यूक्रेनी लोग भी यहाँ पर आ बसे। 1990 के दशक में सोवियत संघ के टूटने पर यहाँ के देश आज़ाद राष्ट्रों के रूप में उभरे।

ख) स्वदेशी आंदोलन

उत्तर- भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण आन्दोलन, सफल रणनीति व दर्शन का था। ‘स्वदेशी’ का अर्थ है – ‘अपने देश का’। MPS 02 Free Assignment In Hindi

इस रणनीति के लक्ष्य ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना तथा भारत में बने माल का अधिकाधिक प्रयोग करके साम्राज्यवादी ब्रिटेन को आर्थिक हानि पहुँचाना व भारत के लोगों के लिये रोजगार सृजन करना था।

यह ब्रितानी शासन को उखाड़ फेंकने और भारत की समग्र आर्थिक व्यवस्था के विकास के लिए अपनाया गया साधन था।

स्वदेशी आन्दोलन विशेषकर उस आन्दोलन को कहते हैं जो बंग-भंग के विरोध में न केवल बंगाल अपितु पूरे ब्रिटिश भारत में चला।

इसका मुख्य उद्देश्य अपने देश की वस्तु अपनाना और दूसरे देश की वस्तु का बहिष्कार करना था। यद्यपि स्वदेशी का यह विचार बंग-भंग से बहुत पुराना है।

भारत में स्वदेशी का पहले-पहल नारा बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वंगदर्शन” के 1279 की भाद्र संख्या यानी 1872 ई. में ही विज्ञानसभा का प्रस्ताव रखते हए दिया था।

उन्होंने कहा था-“जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठा है, हम लोग दिन ब दिन साधनहीन होते जा रहे हैं।

अतिथिशाला में आजीवन रहनेवाले अतिथि की तरह हम लोग प्रभु के आश्रम में पड़े हैं, यह भारतभूमि भारतीयों के लिए भी एक विराट अतिथिशाला बन गई है।” MPS 02 Free Assignment In Hindi

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