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MPA 14

मानव संसाधन प्रबंधन

MPA 14 Free Assignment In Hindi

MPA 14 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. मानव संसाधन प्रबंधन को परिभाषित कीजिए तथा उसके कठोर और विनम्र पक्षों को विश्लेषण कीजिए।

उत्तर-मानव संसाधन प्रबन्धन की परिभाषा –मानव संसाधन प्रबंधन को विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित तरह से परिभाषित किया है

1. जॉर्ज टी. मिल्कोविच तथा डब्ल्यू जे. बोड्यू ने अपनी पुस्तक Human Resource Management, 1997 में परिभाषित करते हुए लिखा है-“मानव संसाधन प्रबंधन निर्णयों की एक समन्वित श्रृंखला है, जो कर्मचारी और नियोक्ता के संबंध को संचालित करती है।

उनकी कार्यकुशलता संस्था और कर्मचारियों की उद्देश्य पूर्ति में सहायक होती है।”

2. डेविड ए. डिकेन्जो तथा पी. रोबिन्स ने अपनी पुस्तक Personnel/HRM, 1989 में मानव संसाधन प्रबंधन को इस प्रकार परिभाषित किया है-“मानव संसाधन-प्रबंधन लोगों से सम्बन्धित प्रबंधन है,

क्योंकि प्रत्येक संगठन मूलतः लोगों द्वारा निर्मित होता है, अतः उनकी सेवाएं निश्चित करना, कुशलता में वृद्धि करना, उन्हें प्रेरित करना, जिससे उच्च स्तर का निष्पादन सम्भव हो सके एवं वे संगठन के प्रति वचनबद्ध हों और अपने उद्देश्य की ओर उन्मुख हों, यह कार्य मानव संसाधन प्रबंधन का है।

यह सभी संस्थाओं पर समान रूप से लाग होता है, चाहे वह सरकारी संस्था हो या निजी, सामाजिक हो या आर्थिक, शिक्षा से संबंधित हो या स्वास्थ्य से।”MPA 14 Free Assignment In Hindi

3. एडबीन बी. फ्लीप्यो (Personnel Management, 1984) के अनुसार-“मानव संसाधन प्रबंधन मानव संसाधनों की प्राप्ति, विकास, क्षतिपूर्ति, समाकलन व अनुरक्षण के लिए, नियोजन संगठन, निर्देशन, नियंत्रण आदि क्रियाओं से संबंधित है, ताकि व्यक्तिगत, संस्थागत व सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि मानव संसाधन प्रबंधन निर्णय लेने की वह शृंखला है, जिसके द्वारा नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सम्बन्धों में सामंजस्य बैठाया जाता है। कर्मचारियों से संबंधित सभी समस्याओं का निपटारा भी मानव संसाधन प्रबंधन द्वारा किया जाता है।

मानव संसाधन प्रबंधन की विशेषताएं –कीथ सिस्सन ने मानव प्रबंधन की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है-

1. संगठन की सभी विभागीय नीतियों में समन्वयन होना चाहिए तथा यह मानव संसाधन नीतियों के अनुकूल होना चाहिए।

2. संगठन में कर्मचारी प्रबंधन की अधिकतर जिम्मेदारी लाइन प्रबंधकों पर होती है।

3. मानव संसाधन प्रबंधन को कर्मचारियों के स्व-विकास, कौशल में सुधार, उत्तरदायी प्रवृत्ति के विकास पर बल देना चाहिए।

आर्मस्ट्राँग ने मानव संसाधन प्रबंधन के कुछ मौलिक सिद्धांत बताए हैं :

1. संगठन में मानव पूंजी सबसे महत्त्वपूर्ण व आवश्यक सम्पदा है।

2. संगठन की कार्मिक नीतियाँ उद्देश्योन्मुख होनी चाहिए।

3. व्यावसायिक संस्कृति कर्मचारी कल्याण पर केन्द्रित होनी चाहिए।

उपर्युक्त के अलावा भी मानव संसाधन प्रबंधन की कुछ महत्त्वपूर्ण विशेषताएं हैं –

1. मानव संसाधन प्रबंधन एक विस्तृत कार्य प्रक्रिया है।

2. मानव संसाधन प्रबंधन संगठन की प्रत्येक नीति को प्रभावित करता है तथा उससे प्रभावित भी होता है।

3. प्रबंधन इस प्रकार से किया जाए कि मानव पूंजी का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके।

4. मानव संसाधन प्रबंधन कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए प्रेरणादायी नीतियों का निर्माण करता है, ताकि वे अधिकतम उत्पादन की ओर उन्मुख हो सके।MPA 14 Free Assignment In Hindi

5. मानव संसाधन प्रबंधन लोगों द्वारा निर्मित व संचालित होने वाली प्रक्रिया है।

6. कुशल प्रबंधन से संगठन को मात्रात्मक व गुणात्मक लाभ होता है।

7. यह निरंतर चलने वाली अर्थात सतत् प्रक्रिया है।

मानव संसाधन प्रबंधन के पक्ष — मानव संसाधन प्रबंधन के मुख्यतः दो पक्ष हैं-
(1) कठोर पक्ष,
(2) विनम्र पक्षा

कठोर पक्ष –– मानव संसाधन प्रबंधन का कठोर पक्ष पूँजीवादी व्यवस्था की देन है जिसकी मान्यता है कि मानव संगठन में मानव एक संसाधन (पूँजी) की भाँति है जिसका कार्य संगठन को अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना है।

इस विचारधारा के अनुसार संसाधन प्रबंधन का प्रमुख उद्देश्य होता है मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग करना।

इससे यह स्पष्ट होता है कि पूँजीवादी व्यवस्था में इस विचारधारा का विकास कड़ी प्रतिस्पर्धा में अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने हेतु किया गया है।

विनम्र पक्ष – मानव संसाधन प्रबंधन का विनम्र पक्ष मुख्यतः मानवीय संबंध विचारधारा से प्रभावित है। इस विचारधारा के अनुसार कर्मचारी को ‘अधीनस्थ’ न मानकर सहयोगी या संगठन के संचालन में सहायक माना जाता है।

जहाँ कठोर विचारधारा पूँजीवादी व्यवस्था की देन थी, वहीं विनम्र पक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था की देन है। जिस प्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति-निर्माण में और संलग्नता पर जोर दिया जाता है उसी प्रकार मानव संसाधन प्रबंधन का विनम्न पक्ष कर्मचारियों की भागीदारी, उनकी सहायता और सहभागिता का पक्षधर है।

यह विचारधारा कर्मचारियों को एक ‘उपयोगी वस्तु’ न मानकर उन्हें एक ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ या संगठन का हिस्सा मानकर चलती है, जिसके कारण संगठन को प्रतियोगिता में लाभ प्राप्त होता है।

यह अवधारणा कर्मचारियों के व्यक्तिगत हितों और संगठन के सामूहिक हितों और लक्ष्यों में विरोधाभास नहीं, बल्कि एकरूपता में विश्वास करती है, MPA 14 Free Assignment In Hindi

जिनकी उपलब्धि तभी सम्भव है जब ये एक ही दिशा में साथ-साथ मिलकर कार्य करें।

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प्रश्न 2. जनशक्ति नियोजन की आवश्यकताओं एवं प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर-मानव शक्ति नियोजन — मानव शक्ति नियोजन से तात्पर्य, संगठन के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था करना. उनकी आवश्यकता का पूर्वानुमान लगाना, उन्हें खोजना, उनका चयन करना तथा उनके प्रशिक्षण एवं विकास में सहयोग करने से है।

सामान्य शब्दों में कहें तो ‘मानव शक्ति नियोजन, किसी संस्था के संदर्भ में कर्मचारियों की मांग और पूर्ति में सामंजस्य स्थापित करना है।’

यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी संस्था में कितनी मानव शक्ति की आवश्यकता होगी, इस बात का अनुमान लगाया जाता है तथा कार्मिकों की व्यवस्था संबंधी नीतियाँ इसी पूर्वानुमान पर आधारित होती हैं।

वर्तमान संदर्भ में मानव संसाधन नियोजन से आशय है कि मानव पूंजी का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि वह उदारवादी बाजार व्यवस्था के अनुरूप कार्य निष्पादित कर सके।

संगठन की लक्ष्य प्राप्ति उपलब्ध मानव पूंजी के द्वारा ही सम्भव हो सके तथा ऐसी कार्य-प्रणाली और नीतियों का चयन किया जाए, जिससे प्रत्येक विभाग पूर्व-निर्धारित व आकस्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हो सकें आदि।MPA 14 Free Assignment In Hindi

इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि मानव पूंजी संगठन की आवश्यकतानुसार उपलब्ध हो, न आवश्यकता से अधिक हो और न कम हो।

बदलती हई परिस्थितियों के साथ मानव संसाधन में भी परिवर्तन करने पडते है अर्थात कार्यरत कर्मचारियों के अलावा नये कर्मचारियों की भर्ती करनी पड़ती है। कई बार पुराने कर्मचारियों को पद से निष्कासित करके नयी भर्तियाँ करनी पड़ती हैं अत: यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

स्ट्रॉस एवं साइल्स मानव संसाधन नियोजन की व्याख्या करते हुए लिखा है। युक्तिसंगत दृष्टि से किसी फर्म के कर्मचारियों संबंधी क्रिया के विकास का प्रथम चरण संगठन के संचालन के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था करना है।

यह केवल प्रथम चरण ही नहीं है, अपितु किसी व्यवसाय की स्थापना एवं विकास का महत्त्वपूर्ण चरण है। योग्य कर्मचारियों की पूर्ति व्यवसाय की सफलता के अन्य साधन जैसे-धन, सामग्री तथा बाजार की भाँति ही प्रभावित करती है।”

मानव शक्ति नियोजन का मुख्य लक्ष्य मानव संसाधन के अपव्यय को रोककर उसका प्रभावशाली उपयोग करना है।

मानव संसाधन नियोजन की आवश्यकता, संगठन की आवश्यकतानुसार कर्मचारियों की संख्या का पूर्वानुमान लगाने के लिए, उनकी भर्ती करने के लिए चयन प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए विभिन्न पदों के लिए कर्मचारियों की योग्यता का निर्धारण करने के लिए उनकी दक्षता के विकास के लिए, प्रशिक्षण का कार्यक्रमों का आयोजन करने आदि के लिए होती है।

मानवीय श्रम या शक्ति की अधिक उपलब्ध जनशक्ति में से संगठन अपनी आवश्यकतानुसार श्रेष्ठ मानव श्रम का चुनाव कर सके और यह तभी संभव है, जब यह कार्य मानव संसाधन नियोजन द्वारा किया जाए।

संगठन के सफल संचालन के लिए यह आवश्यक है कि उसे योग्य कर्मचारी उपयुक्त समय पर उपलब्ध हों। रिक्त स्थानों की पूर्ति योग्य कर्मचारियों द्वारा की जाए तथा संगठन पर अतिरिक्त आर्थिक भार भी न पड़े।

आज की उपभोक्तावादी बाजार व्यवस्था में मानव संसाधन नियोजन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गयी है, क्योंकि कर्मचारी अच्छे वेतनमान और अच्छा कार्य स्थल पाकर शीघ्न ही कम्पनियाँ बदल देते हैं, और वह स्थान रिक्त हो जाता है तथा पुनः भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ करनी पड़ती है, जिससे उसे योग्य व्यक्ति द्वारा भरा जा सके।

मानव शक्ति नियोजन (चरणबद्ध प्रक्रिया ) :–MPA 14 Free Assignment In Hindi

प्रत्येक संगठन का निर्माण किन्हीं विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति के उद्देश्य के लिए किया जाता है और ये लक्ष्य दूसरे संगठनों के लक्ष्यों से भिन्न हो सकते हैं।

मानव शक्ति नियोजन इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है, क्योंकि इसी आधार पर कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है; जैसे-स्वास्थ्य संगठनों के लिए चिकित्सकों की नियुक्ति, विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति आदि।

मानव संसाधन नियोजन प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों से होकर गुजरती है

(1) कार्यबल स्थिति का आकलन — संसाधन नियोजन का यह प्रथम चरण है। इस चरण में उपलब्ध मानव शक्ति का आकलन किया जाता है; जैसे कर्मचारियों की संख्या, उनकी योग्यता, अनुभव, तकनीकी ज्ञान, आयु आदि।

इसके आधार पर ही अतिरिक्त मानव शक्ति की आवश्यकता का पता चलता है कि संगठन को और कितने कर्मचारियों की सेवाओं की जरूरत पड़ेगी, जिससे उसके निष्पादन में प्रभावशीलता की वृद्धि हो सके।

इसके अलावा इस स्तर पर इन पहलुओं पर भी विचार किया जाता है कि प्रभावशीलता में वृद्धि के लिए कर्मचारियों को किस-किस तकनीकी ज्ञान, प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ेगी।

यहाँ यह भी तय करना पड़ता है कि योग्य व्यक्ति के चुनाव के लिए कौन-सी विधि ठीक रहेगी, जिससे हम विभिन्न लोगों की योग्यता का सही आकलन कर सकें।

(2) मानव संसाधन आवश्यकताओं का अनुमान — मानव शक्ति नियोजन के दो पक्ष होते हैं-

(*) मानव शक्ति मांग योजना (*) मानव शक्ति आपूर्ति योजना ।

नियोजन के पहले चरण में हमें यह पता चलता है कि संगठन में कितनी मानव शक्ति की मांग है अर्थात कितने कर्मचारियों की आवश्यकता है। MPA 14 Free Assignment In Hindi

दूसरे चरण, यानि मानव संसाधन आवश्यकताओं के अनुमान में इस मांग के अनुसार मानव शक्ति की आपूर्ति संबंधी प्रयास किये जाते हैं।

रिक्त स्थान भरने के लिए आन्तरिक स्रोत, यानि पदोन्नति द्वारा भरे जाने वाले पद तथा बाह्य स्रोतों के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।

मानव शक्ति आपूर्ति संबंधी प्रयास करते समय सामयिक आवश्यकताओं , स्थानीय आवश्यकताओं तथा पदसोपनीय क्रम का ध्यान रखना चाहिए।

नियुक्ति प्रक्रिया में कर्मचारियों की योग्यता निर्धारण के लिए आमतौर पर विश्लेषणात्मक पद्धति बहुआयामी दक्षता विश्लेषण पद्धति प्रक्रियात्मक शोध आदि परीक्षात्मक विधियों का सहारा लिया जाता है।

(3) सूचना वर्गीकृत करना व अर्थ समझाना –– इस चरण में विभिन्न विभागों से संबंधित सूचनाओं को एकत्रित किया जाता है। तदुपरांत उनका वर्गीकरण किया जाता है कि किस समस्या का संबंध किससे है और समस्या के समाधान का प्रयास किया जाता है।

जब सब सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं, तब कर्मचारियों को उसके बारे में जानकारी दी जाती है तथा उसके अर्थ को समझाया जाता है।

(4) कार्य निष्पादन मानक स्थापित करना –– कार्य-निष्पादन मानक से तात्पर्य है-‘कर्मचारियों के द्वारा किये जाने वाले कार्य को मापने का एक पैमाना निर्धारित करना’ अर्थात यह तय करना कि एक कर्मचारी द्वारा दिये गये निश्चित समय में कम-से-कम कितना और किस स्तर का काम किया जाना चाहिए।

इसी निर्धारित मानक के आधार पर कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना कार्य निष्पादन मानक कहलाता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

मानक निर्धारित करते समय प्रबंधक को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे मानक
व्यावहारिक हो अर्थात मानकों का निर्धारण मानवीय पक्ष को ध्यान में रखकर करना चाहिए कि एक मनुष्य निर्धारित मानकों को प्राप्त कर भी सकता है या नहीं।

मानक लोचशील होने चाहिए, जिससे उन्हें आवश्यकतानुसार बदला जा सके। मानक गतिशील होने चाहिए, ताकि बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार उनमें बदलाव लाया जा सके।

और सबसे जरूरी यह है कि मानक स्पष्ट रूप से परिभाषित होने चाहिए, ताकि कर्मचारियों को समझ में आ सकें।

किसी संगठन में कार्य निष्पादन मानक स्थापित करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इनके अभाव में कर्मचारियों के कार्य निष्पादन की तर्कसंगत समीक्षा संभव नहीं हो पाती और कार्य निष्पादन का स्तर कम रह जाता है।

(5) जन-संसाधन समस्याओं का अनुमान लगाना — संगठन में उपलब्ध जन-संसाधन तथा भविष्य में संभावित आवश्यकता का अनुमान लगाना और उसकी पूर्ति के लिए प्रयास करना इस चरण के अंतर्गत आता है।

रिक्त स्थानों की पूर्ति अच्छे व योग्य कर्मचारियों द्वारा की जा सके, मानव संसाधन नियोजन इसके लिए प्रयासरत रहता है।

(6) भौतिक संसाधन मूल्यांकन — मानव संसाधन नियोजन के अंतर्गत भौतिक संसाधनों की आवश्यकता और उसकी पूर्ति करना भी शामिल है। MPA 14 Free Assignment In Hindi

संस्था में कितने उपलब्ध संसाधन हैं तथा कितने संसाधनों के आवश्यकता भविष्य में पड़ सकती है, यह सब तय करना भी जन-संसाधन नियोजन के कार्यक्षेत्र में शामिल है।

(7) कर्मचारियों की उपलब्धता :– मानव संसाधन नियोजन का मुख्य ध्येय है संस्था को आवश्यक कर्मचारी, कम लागत में और समय पर उपलब्ध हों।

इसके लिए आवश्यक है कि संगठन कर्मचारियों की आपूर्ति के लिए निरन्तर शैक्षणिक संस्थानों और प्रशिक्षण केन्द्रों के सम्पर्क में रहे तथा उन्हें अपनी आवश्यकता के बारे में अवगत भी कराता रहे, जिससे कर्मचारी आसानी से उपलब्ध हो सकें।

आजकल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा कर्मचारी चयन के लिए इस प्रक्रिया का प्रयोग खूब किया जा रहा है।

(8) शोध अध्ययन :- जब योजना क्रियान्वित हो जाए, तो उसका मूल्यांकन करना चाहिए, जिससे उसकी अच्छाई और कमियों पर प्रकाश डाला जा सके और भविष्य में गलतियों को सुधारा जा सके।

नीतियों को तर्कसंगत बनाने के लिए व उसमें वस्तुपरकता लाने के लिए शोध करना आवश्यक है। शोध प्रासंगिक हो, इसके लिए आवश्यक है कि वह तथ्यों और अनुभवों पर आधारित हों, पूर्वाग्रहों व अनुमानों पर नहीं।

जन-संसाधन योजना व बजट –– मानव संसाधन योजना उपलब्ध आर्थिक संसाधनों के अनुरूप होनी चाहिए। प्रत्येक संगठन का एक निर्धारित बजट होता है, जिसमें एक वित्त वर्ष के दौरान होने वाली आय और व्यय का संभावित विवरण होता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

इस ब्यौरे के द्वारा आय और व्यय के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, जिससे संगठन को घाटे का सामना न करना पड़े।

मानव संसाधन योजना पर भी व्यय किया जाता है अत: यह जानना आवश्यक है कि जितना व्यय इस संसाधन पर किया जा रहा है, उससे वाँछित लाभ और उद्देश्य की प्राप्ति हो रही है या नहीं।

बजट एक आधुनिक व्यवस्था है, जिसमें व्यय का सीधा संबंध लाभ से होता है। अतः बजट और मानव शक्ति योजना अन्तः निर्भर प्रक्रियाएं हैं और ये एक-दूसरे के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हई हैं।

यदि दोनों के बीच समन्वय ठीक तरह से न किया जाए, तो निम्नलिखित समस्याएं पैदा हो सकती हैं

1. योजना का क्रियान्वयन बीच में रोकना पड़ सकता है। क्योंकि आवश्यक आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं

2. मानव शक्ति संसाधन पर अधिक व्यय करना पड़ा, क्योंकि अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता थी अतः परियोजना के लिए पर्याप्त संसाधनों के अभाव से इससे रोकना पड़ा विकासशील देशों में मानव-शक्ति नियोजन और बजट के बीच समन्वय स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है,

क्योंकि इन देशों में अधिकतर मानव शक्ति योजना का निर्धारण क्रियान्वयन स्तर पर होता है। मानव शक्ति प्रबंधन की अनिश्चतता के कारण योजनाएं अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाती।

बजट बनाते समय मानव शक्ति योजना से संबंधित निम्नलिखित विषयों पर ध्यान देना चाहिए

• मानव शक्ति संसाधन पर होने वाले व्यय तथा अन्य सम्भावित व्ययों के अंतर्संबंध को ध्यान में रखकर बजट निर्माण किया जाए।MPA 14 Free Assignment In Hindi
• बजट बनाते समय महत्त्वपूर्ण संसाधनों के व्यय को ध्यान में रखा जाए।
• आकस्मिक व्यय का भी एक निश्चत आर्थिक भाग निर्धारित किया जाए। ।
• यदि वाँछित संसाधन उपलब्ध न हों, तो परियोजना में परिवर्तन किया जाए। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर लक्ष्य निर्धारित किये जाएं, जिससे उनकी प्राप्ति सम्भव हो सके।

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प्रश्न 4. भर्ती के विभिन्न चरणों को उजागर कीजिए।

उत्तर- भर्ती प्रक्रिया के अंतर्गत निम्नलिखित चरण शामिल होते हैं

कार्य माँग – भर्ती प्रक्रिया का प्रथम चरण कार्यकर्ता की मांग है। इस चरण में कार्य से संबंधित सभी सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। उनका विश्लेषण किया जाता है।

कार्य के अनिवार्य तत्त्वों, उस पर प्रभाव डालने वाले कारकों (सामाजिक, भौतिक, आर्थिक) आदि का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

कार्य हेतु अनिवार्य योग्यताओं, शैक्षणिक योग्यताओं, तकनीकी ज्ञान, कार्य से संबंधित पूर्व अनुभव, कार्मिकों की आयु, शारीरिक क्षमता आदि पहलुओं की विस्तृत समीक्षा की जाती है।

आवदेनपत्र की अभिकल्पना – कार्य की समीक्षा करने के बाद उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप आवेदनपत्र की रूपरेखा तैयार की जाती है। इस आवेदनपत्र द्वारा उम्मीदवारों के संबंध में सभी आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।MPA 14 Free Assignment In Hindi

एक सुवर्णित आवेदनपत्र भर्ती प्रक्रिया की सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। उम्मीदवार के विषय में जानकारी प्राप्त करने का यह एक सरल और कम खर्चीला माध्यम है।

परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि आवेदनपत्र पर अधिक निर्भरता, उन कर्मचारियों की उपलब्धता में बाधक होती है, जो आवेदन की प्राथमिक योग्यताओं को पूरा नहीं कर पाते, लेकिन उनमें उत्कृष्ट सृजनात्मक कार्यकुशलता विद्यमान होती है।

औपचारिक योग्यताओं और मानदण्डों के अभाव में ये उम्मीदवार साक्षात्कार तक नहीं पहुँच पाते। इस कारण संगठन इनकी सेवाओं से वंचित रह जाता है।

अतः प्रबंधकों को चाहिए कि वे आवेदनपत्र की रूपरेखा तैयार करते समय इस बात पर भली-भाँति विचार कर लें कि निर्धारित न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और कार्य विशिष्ट अनुभव वास्तव में पद विशेष के लिए अनिवार्य है या नहीं।

विज्ञापन-अभ्यर्थियों को संगठन के रिक्त स्थानों का पता, उनके (संगठनों) द्वारा दिए जाने वाले विज्ञापनों से चलता है।

यह काफी कुछ विज्ञापन के ऊपर निर्भर करता है कि वह कितने कुशल अभ्यर्थियों को आवेदन करने के लिए आकर्षित कर पाता है।

अत: विज्ञापन का प्रारूप तैयार करते समय भी भर्ती संस्थाओं को अनेक बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि यह वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।

दया राम बनाम हरियाणा राज्य 1974 केस में उच्च न्यायालय ते निर्णय दिया कि विज्ञापन इस बात की गारण्टी नहीं लेता कि सभी वर्णित पदों को भरा जायेगा।’ अर्थात विज्ञापन में वर्णित पदों को संगठन द्वारा भरा ही जायेगा, इस बात की कोई निश्चितता नहीं होती है।

आवेदन आमंत्रित करने के स्रोत-आवेदन कई माध्यमों द्वारा आमंत्रित किये जा सकते हैं

  1. समाचार-पत्र (दैनिक, साप्ताहिक),
  2. व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाएं (साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक),
  3. कार्यस्थल पर सूचनापट
  4. रोजगार समाचार-पत्र आदि। MPA 14 Free Assignment In Hindi

विज्ञापन की तकनीक :- विज्ञापन देना भी एक कला है। विज्ञापन प्रभावशाली हो, इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। विज्ञापन की भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। उसमें अत्यधिक आरेखीकरण न हो।

सभी आवश्यक सूचना संबंधी कॉलम हो। विज्ञापन की श्रेष्ठता का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा सकता है कि किसी पद विशेष के लिए विज्ञापन कितने उम्मीदवारों को आकर्षित कर पाया है।

यदि किसी पद के लिए बहुत कम उम्मीदवार हों या बहुत ज्यादा उम्मीदवार हों, जिनके पास आवश्यक योग्यता और कौशल भी न हो, तो समझना चाहिए कि विज्ञापन प्रारूप की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता है।

आवेदनों की जाँच-भर्ती का अगला चरण उम्मीदवारों द्वारा भेजे गये आवेदनों की जाँच करना होता है। इस प्रक्रिया में उन आवेदनों को अलग किया जाता है, जो अनिवार्य अर्हताएं पूरी नहीं करते हैं।

इसके साथ ही अधूरे भरे गये आवेदनपत्रों या अधूरी जानकारी वाले आवेदनपत्रों को भी अलग कर दिया जाता है। यदि संगठन को प्राप्त आवेदनपत्रों की संख्या बहुत अधिक होती है, तो उसके द्वारा कुछ मानदण्ड भी निर्धारित किये जा सकते हैं,

जैसे प्रतिभा सूची तैयार करना। इस आधार पर उन उम्मीदवारों की छंटनी कर दी जाती है, जो इस सूची में सबसे नीचे स्थान पर रहते हैं।

प्रतिभा सूची के अलावा भी नियोक्ता अन्य तरीकों द्वारा छंटनी कर सकता है। नियोक्ता इस बात के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है कि वह उम्मीदवारों की संख्या को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से प्रावधान तय करता है।

चयन :- योग्य कर्मचारियों के चयन के लिए किसी भी भर्ती प्रक्रिया या परीक्षा (लिखित परीक्षा या साक्षात्कार) का सहारा लिया जा सकता है। MPA 14 Free Assignment In Hindi

इन प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन के आधार पर जो उम्मीदवार अधिक अंक प्राप्त करते हैं या अच्छा प्रदर्शन करते हैं, उनकी एक क्रमांक सूची तैयार कर ली जाती है।

सामान्यतः इस सूची में रिक्त पदों से अधिक उम्मीदवारों के नाम होते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे किसी योग्य कर्मचारी के द्वारा यदि अपना पद छोड़ दिया जाए, तो उसके स्थान पर दूसरे कर्मचारी को नियुक्त किया जा सके।

इस सूची में उम्मीदवारों को अपना-अपना पद ग्रहण करने की एक समय-सीमा निर्धारित कर दी जाती है तथा यह सूची उस समय-सीमा तक वैध रहती है और कार्मिक नियुक्तियाँ इसी सूची के आधार पर होती रहती हैं।

पत्र-व्यवहार (संवाद) :- उम्मीदवारों के चयन के पश्चात उन्हें उनके चयन की सूचना देने का कार्य किया किया जाता है। असफल म्मीदवारों को उनके चयनित न होने की सूचना देना या त देना संगठन के मानकों पर निर्भर करता है।

कुछ संगठन सभी उम्मीदवारों को अंक तालिका सहित उनकी नियुक्ति और उनकी असफलता दोनों की जानकारी देते हैं,

जबकि कुछ संगठन केवल चयनित उम्मीदवारों को ही सूचना देने का कार्य करते हैं। चयनित उम्मीदवारों को भेजे जाने वाले सूचना पत्र में कार्य से संबंधित सभी दिशा-निर्देशों, शर्तों और तथ्यों से अवगत कराया जाता है।

उम्मीदवार को नियुक्ति-पत्र का वितरण चयन के बाद किया जाता है। नियुक्ति-पत्र में कार्य की शर्ते और नियम स्पष्ट रूप से अंकित होने चाहिए, ताकि भविष्य में वैधानिक समस्याओं से निपटा जा सके।

पद-नियोजन – चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद तथा उम्मीदवार को नियुक्ति-पत्र सौंपने के बाद, उसे अस्थायी तौर पर पर कुछ समय के लिए नियुक्त किया जाता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

इस अवधि के दौरान कर्मचारी के कार्य-व्यवहार, कार्य-कौशल आदि की परख की जाती है। जब वह अपनी कार्यकुशलता से नियोक्ता को प्रसन्न कर देता है, तब उसे स्थायी तौर पर नियुक्त कर लिया जाता है।

भर्ती प्रक्रिया के इन सभी चरणों को इस रेखांकन के द्वारा और आसानी से समझा जा सकता है

लोक सेवा में नियुक्ति – सिविल सेवा या लोक सेवा से तात्पर्य सरकारी सेवाओं से है. जिसमें सैनिक और असैनिक दोनों प्रकार के सेवाकर्मी होते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 द्वारा रक्षाकर्मी नागरिक (सिविल) पदाधिकारी नहीं होते।

स्थायी या अस्थायी पद-पद शब्द का अर्थ सेवा में स्थान से होता है। लोक सेवा में नियुक्ति स्थायी पद पर भी हो सकती है और अस्थायी पद पर भी। स्थायी पद से तात्पर्य उस सेवा से होता है, जो एक निश्चित समय-सीमा, आयु-सीमा और वेतन दर द्वारा तय की जाती है।

एक बार कर्मचारी द्वारा पद ग्रहण करने के बाद वह अपने सेवा-निवृत्ति काल के बाद ही उसे छोड़ता है। इससे पहले वह स्वयं पद त्याग कर सकता है और उसे निष्कासित भी किया जा सकता है,

परन्तु उसे किसी अनुशासनात्मक कार्यवाही के द्वारा या किसी व्यक्तिगत कारण द्वारा अन्यथा उसे उसके पद से वंचित नहीं किया जा सकता।

स्थायी पद पर नियुक्ति से पहले प्रत्येक कर्मचारी को परख अवधि से गुजरना पड़ता है। इस अवधि की सफलता पर ही स्थायी पद पर नियुक्ति निर्भर करती है।

अस्थायी पदों पर नियुक्ति कुछ समय-सीमा के लिए होती है और इसको स्थायी करने का कोई प्रावधान नियोक्ता द्वारा नहीं किया जाता।MPA 14 Free Assignment In Hindi

अर्द्ध-अस्थायी सेवा -अर्द्ध-अस्थायी सेवा उसे कहा जाता है, जिसमें किसी उम्मीदवार का चयन अस्थायी पद पर हुआ हो और उसे कार्य करते हुए तीन या इससे अधिक वर्ष लगातार कार्य करते हुए हो गये हों या उसकी नियुक्ति ही संगठन द्वारा अर्द्ध-स्थायी पद के अंतर्गत की गयी हो।

इस तरह के पद के लिए पद पर कार्य करने का उसे अधिकार तो होगा, परन्तु वह स्थायित्व का दावा नहीं कर सकता।

जब तक कोई कर्मचारी कार्य करते हुए अर्द्ध-स्थायी स्तर पर प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह भारतीय सविधान के अनुच्छेद 311 के अंतर्गत सेवा में सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।

भाग – ii

प्रश्न 6. अधिगम तथा विकास को परिभाषित कीजिए तथा अधिगम की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण तत्वों की चर्चा कीजिए।

उत्तर-अधिगम और विकास का अर्थ-अधिगम और विकास दोनों ही संगठन के प्रमुख अंग हैं। अधिगम और विकास के बिना संगठन की क्रियाओं का संचालन और विकास सम्भव नहीं है। आगे बढ़ने से पहले अधिगम और विकास के अर्थ को समझ लेना सार्थक होगा।

अधिगम को परिभाषित करते हुए बुरमोइन एवं होजसन ने कहा है, “अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति ने अपने पूर्व-जीवन काल में जो भी ज्ञान ग्रहण किया होता है, उसकी गुणवत्ता में परिवर्तन ला सकता है।”

अर्थात अधिगम द्वारा व्यक्ति के प्राप्त ज्ञान में और अधिगम में गुणात्मक वृद्धि की जा सकती है। इसी तरह अधिगम को परिभाषित करते हुऐ रिबॉक्स एवं पॉपलेटन ने कहा है, “जीव में ग्रहण करना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य बदलते परिवेश के अनुसार सामंजस्य बैठाने की क्षमता उत्पन्न करता है, जो अनुभव से संबंधित होती है. न कि परिपक्वता से।”

यानि अधिगम द्वारा व्यक्ति अपने बदलते हुए परिवेश के साथ सामंजस्य बैठाता है, जो उसके विकास के लिए एक अनिवार्य शर्त है।

मनोविज्ञान के एक और प्रमुख विद्वान बिन्सटेड का मानना है कि अधिगम केवल एक मानसिक क्रिया या मस्तिष्क से संबंधित क्रिया नहीं है, बल्कि यह शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करती है। अधिगम से मनुष्य की भावनाओं और संवेदनाओं का भी विकास होता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

विकास :- विकास एक ऐसी अवधारणा है. जो सबके लिए महत्त्व रखती है, क्योंकि सभी व्यक्तियों में जीवन को आगे बढ़ाने या विकसित करने की आकांक्षा होती है।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि ‘परिवर्तन प्रकृति का नियम है’. उसी तरह यह भी सत्य है कि इस परिवर्तन के साथ मनुष्य को भी बदलना पड़ता है। इस बदलाव में यदि वह सफल होता है,

तो वह विकसित कहलाएगा और यदि असफल हुआ तो पिछड़ा हुआ कहलाएगा। परिवर्तन चिर सत्य है, उसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यदि सही प्रयास किए जाएं तो, उसे विकास की दिशा में मोड़ा जरूर जा सकता है|

बदलती हुई परिस्थितियों के साथ संगठन में भी जटिलाएं बढ़ती हैं और इन जटिलताओं को दूर करने के लिए नयी-नयी विधाओं को सीखना आवश्यक हो जाता है।

इससे कार्मिकों को अधिगम के नये अवसर प्राप्त होते हैं। अधिगम प्रक्रिया ही संगठन के विकास की दिशा तय करती है। बिना अधिगम के विकास करना सम्भव नहीं है. अतः कहा जा सकता है कि अधिगम विकास का पथ-प्रर्दशक है।

अधिगम और विकास की आवश्यकता :

डालोज के अनुसार. “अधिगम और विकास एक यात्रा है, जो एक जानी-पहचानी दुनिया से प्रारंभ होती है और भ्रम. संकटयुक्त, उतार चढ़ाव, संघर्ष और अनिश्चितता के रास्ते से होती हुई एक ऐसी नयी दुनिया में पहुँचती है जहाँ वास्तविकता में कुछ भी बदला नहीं परन्तु फिर भी सब-कुछ रूपान्तरित हो गया होता है व जीवन का अर्थ बदला हुआ प्रतीत होता है।”

यहाँ डालोज कहना चाहते हैं कि अधिगम एक ऐसी प्रकिया है जो व्यक्ति की मान्यताओं दृष्टिकोणों, विचारों, विश्वासों आदि को नया अर्थ प्रदान करती है। संगठन विशेष में अधिगम और विकास की आवश्यकता को हम निम्नांकित आधारों पर स्पष्ट कर सकते हैंMPA 14 Free Assignment In Hindi

1. कर्मचारियों को योग्य और कुशल बनाने के लिए अधिगम और विकास की आवश्यकता होती है।

2. अधिकारियों के निर्देशन को अधिक प्रभावी और सक्रिय बनाने के लिए।

3. भावी चुनौतियों और समस्याओं का सामना करने के लिए।

4. संगठन को गतिशील बनाये रखने के लिए।

5. कर्मचारियों के प्रदर्शन में गुणात्मक सुधार के लिए।

6. संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति को सलभ बनाने के लिए।

7. नयी विधाओं. पद्धतियों और तकनीकों को सीखने के लिए।

अधिगम और विकास की ओर उन्मुख होने के लिए संगठन में दो तत्त्वों का होना आवश्यक है-
(1) गुणवत्ता, (2) लोचशीलता।

गुणवत्ता :- इस प्रतिस्पर्धा के दौर में संगठन को बनाए रखने की एक आवश्यक शर्त है-उत्पादन की गुणवत्ता को बनाए रखना। यह बात सभी पर समान रूप से लागू होती है, चाहे वह सार्वजनिक संस्थान हो या फिर व्यक्तिगत या निजी संस्थान।

उत्पादन की गुणवत्ता स्थिति कैसी है, प्रतिस्पर्धा का स्तर क्या है आदि। इसके साथ ही उत्पादन की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कर्मचारी की सुविधाओं और सेवाओं में निरंतर सुधार होना भी आवश्यक है।

संगठन में सुधार प्रक्रिया संपूर्णता में होनी चाहिए। यदि एक भी पक्ष छूट गया, तो वह गुणवत्ता और विकास दोनों को प्रभावित करेगा। MPA 14 Free Assignment In Hindi

‘सकल गुणवत्ता प्रबंधन’ में प्रबंधन द्वारा पूरा प्रयास रहता है कि वह उपभोक्ता संतुष्टि पर पूरा ध्यान दे। उपभोक्ता संतुष्टि ही वस्तु की गुणवत्ता के मूल्यांकन का आधार होती है, इसी पर संगठन का विकास और स्थायित्व भी निर्भर करता है।

लोचशीलता :- संगठन में लक्ष्यों की प्राप्ति कठोर कार्य-प्रणाली और अपरिवर्तनीय नीतियों द्वारा सम्भव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि संगठन लोचशील कार्य-प्रणाली व्यवस्था को अपनाए, जिससे बदलती हुई परिस्थितियों और परिवेश के साथ सामंजस्य आवश्यक है,

परिवर्तन के साथ चलने के लिए गतिशील होना जरूरी है और गतिशीलता के लिए लोचशीलता होना आवश्यक है। अत: ये सब प्रक्रियाएं सम्बन्धित और परस्परनिर्भर हैं।

प्रश्न 9. प्रबंधन में कार्यकत्ता की भागीदारी की संक्षिप्त में चर्चा कीजिए

उत्तर-‘भागीदारी’ शब्द से तात्पर्य है-‘किसी गतिविधि या क्रियाकलाप में हिस्सा लेना या शामिल होना’। प्रबंधन में कार्यकर्ता की भागीदारी से आशय है-प्रबंधकीय कार्यों व गतिविधियों में कर्मचारियों का भाग लेना।

विद्वानों का मानना है (जिसमें ऑपरत काम्टे व ऑवन प्रमुख हैं) कि यदि कर्मचारियों को प्रबंधन में भागीदार बनाया जाए. तो इसका उनकी मानसिकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तथा इससे सामाजिक न्याय का आदर्श भी पूरा किया जा सकता है।

समाजशास्त्र के प्रमुख विद्वान, जिनमें मुख्य हैं-ब्लेक, मेयो, लेविन तथा लाइकार्ट का मानना है कि यदि कर्मचारियों को निर्णयन प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाता है,

तो इसका सकारात्मक प्रभाव संगठन की प्रभाविकता, कर्मचारियों की मानसिकता व उनके नैतिक मूल्यों पर पड़ता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

प्रबंधन में कार्यकर्ता की भागीदारी के आधारभूत विचार :–

उपर्युक्त रेखाचित्र में प्रबंधन में कर्मचारी की भागीदारी के विभिन्न आयामों को दर्शाया गया है। रेखाचित्र के अनुसार कार्यकर्ता, प्रबंधन में सामूहिक सौदेबाजी, संघ-समूह संगठन, कर्मचारी पर्यवेक्षक, कार्य परिषदें व सलाह योजना में भाग लेकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है।

औद्योगिक क्षेत्र में आए तेज बदलावों ने पूरे आर्थिक परिदृश्य में परिवर्तन किये हैं। इसका प्रभाव कार्य-संस्कृति की मूल्य-व्यवस्था पर भी पड़ा है।

संगठन में कर्मचारियों की स्थिति में बदलाव आया है। पहले संगठन कठोर पदसोपानीय व्यवस्था व संस्कृति में अधिक विश्वास करते थे तथा अधिकारी-अधीनस्थ के बीच औपचारिक सम्बन्धों पर बल दिया जाता था।

परंतु आज कर्मचारी को ‘सहयोगी’ के रूप में देखा जाता है तथा यदि आवश्यक होता है, तो उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ से सलाह-मशविरा करने में भी नहीं हिचकिचाते।

संगठन की कार्यप्रणाली पहले से लोचशील और अधिक लोकतांत्रिक हो गया है, जिसमें कर्मचारियों को अपनी योग्यतानुसार कार्य करने की पूरी छूट दी जाती है।

कर्मचारी की मनः स्थिति का प्रभाव उसकी उत्पादकता पर पड़ता है। किये गये अनुसंधानों से यह तथ्य प्राप्त हुए हैं कि यदि कर्मचारियों को प्रबंधन में संलग्न किया जाए तो उनकी उत्पादकता पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।MPA 14 Free Assignment In Hindi

भारत में द्वितीय पंचवर्षीय योजना में मजदूर प्रबंधन सहभागिला के संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धातों पर बल दिया गया

  1. प्रबंधकों व कर्मचारियों के बीच मधुर, विश्वासपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए जाएं।
  2. उत्पादन को राष्ट्रहित के अनुकूल किया जाए।
  3. कार्मिक को उत्पादन के लिए अनुकूल सुविधाएं प्रदान की जाएं।
  4. कर्मचारियों को आवश्यक व उचित प्रशिक्षण प्रदान किया जाएं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :-

प्रबंधन में कर्मचारियों की भागीदारी का विचार फेबियन समाजवादी विचारधारा से प्रभावित है। इस विचारधारा के अग्रणी विचारक सिडनी बेव थे।

यह विचारधारा इस सिद्धान्त में विश्वास करती है कि राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना सही मायने में तभी संभव है, जब आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना की जा सके। MPA 14 Free Assignment In Hindi

इस विचारधारा ने अनेक देशों को प्रभावित किया, जिनमें इंग्लैण्ड, जर्मनी, फ्रांस आदि देश प्रमुख हैं। इंग्लैण्ड में इस विचारधारा पर अमल करने के लिए एक समिति का गठन किया गया, जिसे ह्वीटली समिति कहा जाता है। इसने अनेक सिफारिशें प्रस्तुत की।

भारत में गांधीवादी विचारधारा भी इसी आदर्श का समर्थन करती है कि नियोक्ता व कर्मचारी के बीच सम्बन्ध समन्वय पर आधारित हो न कि विवाद पर, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

गाँधीजी व्यावसायिकों को समाज के न्यासधारी के रूप में देखना चाहते थे।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी भी इस विचारधारा का समर्थन किया तथा 1950, 1960 व 1976 में अनेक सिफारिशों को स्वीकार किया। MPA 14 Free Assignment In Hindi

प्रबंधन में कर्मचारी सहभागिता के उद्देश्य में 42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 43A जोड़ा गया, जिसके द्वारा ‘राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों’ का विस्तार किया गया।

राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व राज्य को ऐसी नीतियाँ बनाने की सिफारिश करते हैं, जो कर्मचारियों की भागीदारी को सुनिश्चित कर सकें। ‘राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व’ भारतीय संविधान के भाग IV’ में वर्णित हैं (अनुच्छेद 36-51 तक)।

ये तत्त्व राज्य को नीति-निर्माण में दिशा-निर्देश का कार्य करते हैं। इन तत्त्वों की सबसे बड़ी कमी है कि ये न्याय योग्य नहीं है अर्थात यदि सरकार नीति-निर्माण करते समय इन तत्त्वों का ध्यान न रखें,

तो इसके विरुद्ध कोई व्यक्ति न्यायालय की शरण नहीं ले सकता और न ही सरकार पर इस सम्बन्ध में कोई नियंत्रण लगाया जा सकता है। फिर भी ये तत्त्व सरकार के नीति-निर्धारण में दिशा-निर्देशक की भूमिका का निर्वाह करते हैं। MPA 14 Free Assignment In Hindi

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