IGNOU MPA 13 Free Assignment In Hindi 2022- Helpfirst

MPA 13

सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन

MPA 13 Free Assignment In Hindi

MPA 13 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. नौकरशाही व्यवस्था और सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन के बीच भिन्नता को उजागर कीजिए।

त्तर- नौकरशाही व्यवस्था और सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन : भिन्नता

वर्तमान में लोक सेवा की जरूरतों को पूरा करने में पारंपरिक लोक प्रशासन की अक्षमता ने नव-लोक प्रबंधन को जन्म दिया और ये नागरिक केन्द्रित प्रशासनिक सुधारों के रूप में विरात शताब्दी के प्रबं और पवें दशक में विश्व के देशों में प्रकट हुए।

नव-लोक प्रबंधन एक अभिव्यक्ति है, जो 1980 के दशक के प्रारंभ से ही लोक संस्थाओं और उनकी भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं के अध्ययन के लिए प्रयोग होता रहा है और शासन के क्रियाकलापों में व्यापार प्रबंधन के अनुभवों को सम्मिलित करने पर बल देता रहा है।

नव-लोक प्रबंधन का सार सार्वजनिक संगठन के प्रबंधन में प्रतियोगिता और बाजार के रुख को सामने रखना है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने जनसेवा मुहैया कराने में प्रबंधन को प्रस्तुत करने की वकालत की थी, उसका मानना है कि अधिकतर देश सार्वजनिक रूप से प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वस्तुओं को उपलब्ध कराने में दो मार्गों पर चल रहे हैं। पहले मार्ग में निम्नलिखित कार्य हैं

1 मांग और पूर्ति के निर्णयों को एक साथ लाना।

2 सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग।

3 कर्मचारियों को फैसले लेने की प्रक्रिया और प्रबंधन में सम्मिलित करना।

4 कठोर निष्पादन उद्देश्यों को लागू करते समय प्रशासनिक नियंत्रण में लचीलापन।

5 कर्मचारियों के विकास, शिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति. निष्पादन के लिए भुगतान कर मानव संसाधन के प्रबंधन को अच्छा बनाना। MPA 13 Free Assignment In Hindi

इस मार्ग का उद्देश्य संगठन को प्रबंधित करना है। यह मार्ग संगठन की अंदरूनी क्रियाओं पर ध्यान दिलाता है, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाता है, कार्य का आकलन करता है साथ ही ग्राहकों के साथ अच्छे संबंध बनाता है।

दूसरा मार्ग, व्यक्तिगत क्षेत्रों में अच्छे प्रयोग करना है, जिससे एक कुशल, प्रतियोगी और खुले लोक अधिप्राप्ति व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए ताकि सार्वजनिक रूप से प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन कर सके और मोनोपोली को समाप्त कर आपूर्तिकर्ताओं का संरक्षण कर सके।

इन उपायों का ध्यान संगठन प्रक्रियाओं पर है। प्रबंधन की उन्मखता ने पारंपरिक लोक प्रशासन में निम्नलिखित परिवर्तन प्रस्तुत किए

1 खर्च करने की बजाय लागत कम करने पर बल देना।

2 प्रशासकीय व्यवस्था के ढांचे के लिए पिरामिडीय व्यवस्था की बजाय लोगों के समूह का मॉडल।

3 नीति से प्रबंधन पर जोर देना, जिससे प्रशासक प्रत्येक कार्य की लागत के प्रति सावधान हो।

4 सामूहिक उत्पाद सुविधा की बजाय व्यक्तिगत लचीली उत्पाद सुविधा पर बल।

5 पूर्ण आधिपत्य की बजाय मालिकाना हक की आवश्यकता का निपुण प्रबंधन के रूप में होना

6 प्रक्रियोन्मुख प्रशासन से उत्पादोन्मुख प्रशासन की ओर चलना।

7 योजना क्रियान्वित करने और निर्णयों के पदानुक्रम आधारित क्रियान्वयन की बजाय मुख्य नीतिगत कार्यों और अपनाई गई कार्यकारी सेवाओं के मध्य विशिष्टता रखना।

आमतौर पर नव लोक प्रबंधन ने सरकार का ध्यान प्रक्रिया से परिणामों की ओर पिलाने का प्रयास किया है। नव लोक प्रबंधन की सफलता तभी संभव है जब शासन के प्रबंधन में सांस्कृतिक और व्यावहारिक आधार पर नौकरशाही को दूर कर उद्यमशीलता का समावेश किया जाए।

नव-लोक प्रबंधन के उद्देश्यों को सार्वजनिक प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से ही पूर्ण किया जा सकता है। सरकार द्वारा अधिगृहीत क्रियाकलापों में पारंपरिक नौकरशाही व्यवस्था और सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन के मध्य की भिन्नता को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है MPA 13 Free Assignment In Hindi

नौकरशाही व्यवस्था —

1 सार्वजनिक और व्यक्तिगत सहभागिता

2 संरचना की प्रमुखता

3 अनामक नौकरशाही

4 कठोर, अनुबंधित और पदानुक्रम प्रारूप

5 प्रक्रिया के प्रति जिम्मेदार

6 निर्णय लेने की प्रक्रिया में तार्किकता पर बल

7 अधिकारपूर्ण दृष्टिकोण

8 राजनीति और प्रशासन में एकजुटता

9 केन्द्रीकृत रणनीति अपनाना

10 ढांचे और प्रक्रिया पर ध्यान देना

11 लोक सेवा सरकार द्वारा किया जाने वाला विशेष कार्य है।

सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन

1 सार्वजनिक और व्यक्तिगत भिन्नता

2 जनोन्मुख

3 उत्तरदायित्वपूर्ण नौकरशाही

4 संगठन की रूपरेखा और काम के प्रारूप में लोच

5 परिणामों के प्रति जिम्मेदार

6 निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीमित तर्कों पर बल

7 सहभागितापूर्ण रवैया

8 राजनीति और प्रशासनिक में अन्तर

9 विकेन्द्रीकृत रणनीति को अपनाना

10 निष्पादन और परिणामों पर ध्यान देना

11 लोक सेवा गैर-सरकारी संगठन और निजी उद्योगों के द्वारा अपनाया जाता है।

उपर्युक्त सारिणी से स्पष्ट है कि सरकारी कार्यों को करने में सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन पारंपरिक नौकरशाही व्यवस्था से कैसे विशिष्ट है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

वर्तमान समय में लोक प्रशासनिक संरचना में जटिलता आ गई है, सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन को नागरिकों को सुदृढ़ लोक सेवा मुहैया कराने के लिए विस्तृत नेटवर्क के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।

वैसे भी भारत जैसे विकासशील देश में नागरिकों की आवश्यकताओं को समझने के लिए सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन जिम्मेदार है। अधिकतर विकासशील देशों में सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन प्रारंभिक दौर में है।

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प्रश्न 3. सार्वजनिक प्रणाली के प्रभावित करने वाले विभिन्न सामाजिक कारकों का परीक्षण कीजिए।

उत्तर-सार्वजनिक प्रणाली के माध्यम से सम्पूर्ण समाज परस्पर जुड़ा हुआ है और इनका सम्पूर्ण समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।

समाज की संस्कृति ऐतिहासिक रूप से मिल-जुल कर रहने के तरीके से उत्पन्न हुई है, जिसमें सामाजिक जीवन से संबंधित समस्त मुद्दों, धार्मिक अनुष्ठान व कर्मकाण्ड कमा स्थापन काली आदत अभिवत्तियनिहित है नया विविसमा अत्यंत प्रभावी है स्थायी सामाजिक मूल्यों व धारणाओं का समुच्चय, जी सामूहिक जीवनयापन की शैली को प्रभावित और संचरित करता है।

किसी देश का राजनीतिक घटनाक्रम सामाजिक परम्पराओं, संस्कृति व सामाजिक मूल्यों से अधिक प्रभावित होता है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

भारतीय समाज की स्थिति के सन्दर्भ में इसे विशेष रूप से धर्म, जाति और महिलाओं की भूमिका, परिवार और ग्रामीण-शहरी, भाषा, संयुक्त परिवार प्रथा, बढ़ती हिंसा से संबंधित किया जाना चाहिए।

धर्म — भारत अनेकता में एकता की भावना में विश्वास रखता है। यह महाद्वीपीय आयामों का देश है। यह बहुजाति सम्पन्न समाज है। भारतीय समाज का एक महत्त्वपूर्ण पहलू सभी धर्मों के लिए सम्मान की भावना है, लेकिन सांप्रदायिक दलों का उद्भव राष्ट्र की शांति को भग करके तनाव पैदा करता है।

सांप्रदायिक तनावों के दौरान विभिन्न मजहबी समुदायों के मध्य कानून व्यवस्था एवं सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में सार्वजनिक प्रणाली एक मजबूत कड़ी के रूप में कार्य करती है।

जाति — ऐतिहासिक रूप से भारत बहुसमुदायवादी समाज के रूप में विकसित हुआ है। यह असंख्य जातियों और उपजातियों में बँटा है। भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता जाति-प्रथा है। जाति लोगों के सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करती है।

शताब्दियों से यह भारतीय समाज में एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात इसने राजनीतिक कारक का रूप धारण कर लिया।

यह भारतीय समाज में आर्थिक व सामाजिक विकास के लिए प्रतिबद्ध है। अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान में विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है। भारतीय समाज में जातियों का प्रतिशत दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

1990 के बाद से लोकतंत्र के अन्तर्गत जाति संचेतना और जाति गतिशीलता में अभिवृद्धि हुई है। सार्वजनिक प्रणाली के प्रबंधकों को जाति, धर्म, भाषा, समुदाय इत्यादि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि सामन्तवाद् भारतीय समाज में अभी भी अपनी जड़ जमाए हुए है तथा सार्वजनिक प्रणाली के अधिकतर कर्मचारी सामन्तवाद की पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। MPA 13 Free Assignment In Hindi

अधिकतर शोधकर्ता भारत में जाति को एक शक्तिशाली ताकत के रूप में देखते हैं। अब जाति को सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में नहीं, बल्कि राजनीतिक व प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।

भाषा — भारत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है भाषाओं की विविधता। भारत में लगभग 1600 भाषाएं व उपभाषाएं विद्यमान हैं। भारत की लगभग तीन-चौथाई जनसंख्या उन भाषाओं का प्रयोग करती है. जी सस्कृत पर आधारित है।

इनमें राजकीय दर्जा प्राप्त भाषाएं हैं-असमी, बंगाली, गुजराती, हिन्दी, कश्मीरी, मराठी, उड़िया, पंजाबी, सिंधी और उर्दू।

द्रविड़ परिवार की भाषाओं का प्रयोग लगभग एक-चौथाई भारतीय करते हैं, जैसे-कन्नड़, मलयालम, तमिल और तेलुगु आदि। भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची (अनुच्छेद 344(1) और 351) में 22 भाषाएं दी गई हैं।

संयुक्त परिवार प्रथा — समस्त समाजों में परिवार एक प्रमुख इकाई होती है। भारत में संयुक्त परिवार प्रथा के अन्तर्गत परिवार का मुखिया पिता अथवा घर का सबसे बड़ा व्यक्ति होता है। परिवार के सभी सदस्य मखिया की आज्ञा का पालन करते हैं।

सभी सदस्य परिवार, के रीति-रिवाजों को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संयुक्त परिवार प्रथा को विशेषताएं सामाजिक जीवन में सार्वजनिक प्रणाली को प्रभावित करती हैं।

सार्वजनिक प्रणाली के सदस्य संगठुन की बजाय संयुक्त परिवार के हितों को महत्व देते हैं। संयुक्त परिवार की मिल-जुल कर रहने की यह विशेषता किसी सस्था में सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए अधिक लाभदायक है।

महिलाएँ — महिलाएँ भारतीय समाज में आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। कार्य विभाजन होने के कारण वे घर को बड़ी समझदारी से संभालती हैं तथा आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर रहती है। वर्तमान में महिलाएं आत्मनिर्भर होने के लिए अधिक अवसर प्राप्त करने का प्रयास कर रही हैं।

बाल-विवाह, सती व दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए सरकार द्वारा अनेक कानून बनाए गए हैं, लेकिन इन कानूनों को सही प्रकार से क्रियान्वित नहीं किया गया।

महिलाओं को सार्वजनिक रोजगारों में समान अवसर प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की है। उनके सर्वांगीण विकास की दिशा में प्रेरक पर्यावरण बनाने में राज्य व उसके प्रशासन को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

वर्तमान में शासन व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति कुछ सुदृढ़ हुई है, जिसकी वजह से आज महिलाएं सार्वजनिक प्रणालियों के प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।MPA 13 Free Assignment In Hindi

बढ़ती हिंसा — लगातार बढ़ रही हिंसा ने सामाजिक पर्यावरण व सार्वजनिक प्रणालियों दोनों की गतिविधियों को प्रभावित किया है। इन हिंसाओं में अंत:जातीय, अंत:साम्प्रदायिक एवं अंत:भाषीय हिंसा ही नहीं, बल्कि अलग राज्य की मांग, आतंकवादी घटनाएं और औद्योगिक हड़तालें भी सम्मिलित हैं।

ये घटनाएं सार्वजनिक व्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इन सामाजिक हिंसाओं के प्रमुख कारणों का ठीक प्रकार से समाधान करने की आवश्यकता है। आज चिता का विषय यह है कि हमारी शासकीय प्रणाली में जनता का रुझान लगातार घट रहा है।

ग्रामीण-शहरी संबंध — आज भारत में न केवल ग्रामीण-शहरी विषमताएँ विद्यमान हैं, अपितु ग्रामीण-शहरी भेदभाव उत्पन्न हो रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक विकास के सभी स्तरों पर क्षेत्रीय भेदभाव उभर रहे हैं।

ग्रामीण-शहरी संबंधों के लिए गठित समिति का मानना है कि मुख्य रूप से मनुष्य किसी भी स्थिति का केन्द्र बिन्दु होता है, साथ ही व्यावसायिक भेदभाव उजागर नहीं होने चाहिए।

प्रौद्योगिकी व संचार, साधनों में हुए विकास ने गांवों और शहरों के माय संबंधों को बढ़ावा दिया है। गांवों और शहरों के मध्य आपसी संपर्क बढ़ाने के लिए आवश्यकता है गांवों व शहरों में एक साथ विकास करने की।

सार्वजनिक कोषों की बर्बादी. भष्टाचार, निर्धनता. अत्यधिक बेरोजगारी, तीन गति से जनसंख्या वृद्धि जैसी अनेक भयंकर समस्याएँ हैं, जो भारत की सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।

विश्व की समस्त पृथ्वी का 2.4 प्रतिशत भाग भारत के पास है, लेकिन उस पर समस्त विश्व की लगभग 16.85 प्रतिशत जनसंख्या का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी है।

भारत की जनसंख्या का लगभग 4/5वां भाग गरीब है। भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 50 प्रतिशत भाग समाज के 20 प्रतिशत उच्च वर्ग में विभाजित हो जाता है तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत भाग समाज के 20 प्रतिशत निम्नतम वर्ग के लिए बच जाता है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

देश के अनेक भगों में कानून व्यवस्था की बदहाल स्थिति, राजनीति का अपराधीकरण, प्रशासनिक प्रणाली का राजनीतिकरण तथा समय समय पर होने वाले वित्तीय घोटालों ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है जो सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन में चिंता का विषय बनी हुई है।

भारतीय सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों को तोड़ने-मरोड़ने, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों, जातिवाद को बढ़ावाकृषक समाज के आपसी संघर्षों आदि ने कानून व्यवस्थाओं में समस्याओं को और बढ़ा दिया है,

जिससे अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में आए सुधारों में बाधा उत्पन्न हुई है।

सरकार को अब अन्तर्निहित ऊर्जाओं को व्यक्त करने और विकास प्रक्रिया के अनेक मुद्दों में गैर सरकारी प्रयासों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। विकास अब समस्त व्यक्तियों, गैर-सरकारी संगठनों, निजी क्षेत्रों तथा सार्वजनिक क्षेत्रों के सहयोग से करना होगा। MPA 13 Free Assignment In Hindi

विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक प्रणालियों को सहयोगात्मक वातावरण उत्पन्न करना होगा। उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए सामाजिक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण विकासात्मक भूमिका निभानी होगी।

प्रश्न 4. सार्वजनिक प्रणाली प्रबंधन में नई प्रौद्योगिकियों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर-सूचना प्रौद्योगिकी, वैश्विक दबाव, आंतरिक कुशलता की आवश्यकता एवं अन्दरूनी मामलों में उत्पादकता समस्त राज्यों एवं लोक प्रशासन के ढांचे को परिवर्तित करते हैं।

तीसरे विश्व के देशों ने वैश्विक दबाव एवं अन्दरूनी दबावों के प्रति सार्वजनिक व्यवस्था में विस्तृत सुधार किए हैं। ये सुधार निम्नलिखित बातों पर ध्यान आकर्षित करते हैं

1. प्रशासकीय क्षमता एवं प्रशासकीय व्यवस्था में सुचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग द्वारा सांगठनिक कुशलता को बढ़ावा देना।

2. लोगों के कार्य निष्पादन में सुधार करना।

3. सरकार एवं व्यापारिक कार्यों के लेन-देन में पारदर्शिता को बढ़ावा देना।

4. सूचना प्रसार द्वारा लोगों को मजबूत बनाना। MPA 13 Free Assignment In Hindi

उपर्युक्त सुधार के उपाय सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग नव-लोक प्रबंधन द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं। नव-लोक प्रबंधन एवं मुशासन परस्पर अत्यधिक कुशल सार्वजनिक व्यवस्था के कार्यों में सहयोग प्रदान करते हैं।

सूचना एवं प्रसारण प्रौद्योगिकी का लक्ष्य सरकार में कुशलता, खुलापन, अनुक्रियाशीलता एवं सहयोग प्रदान करना है। सूचना एवं संचार तकनीक के प्रयोग का प्रमुख लक्ष्य शासन में तीव्रता लाना है। कुछ प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार हैं

1. सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के प्रति मानव संसाधन का निरन्तर विकास करना।

2. विकास में स्थानीय समूहों और संघों को सम्मिलित करना।

3. नागरिक प्रशासन अंतरापृष्ठ और लोक सेवा निष्पादन को विकसित करना।

4. विकास कार्यक्रमों के नियोजन, क्रियान्वयन और निगरानी के लिए प्रशासन को निर्णय निवेश प्रदान करना।

5. विकास के पहलुओं पर सार्वजनिक बहस को प्राथमिकता देना।

6. नागरिकों को सूचना एवं ज्ञान के लिए सशक्त बनाना।

7. परियोजना, बहु सेवा केन्द्र, सूचना एवं संचार तकनीक के प्रयोग के नियोजन एवं क्रियान्वयन में लगातार प्रशिक्षण।

भारत में अनेक क्षेत्रों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास के लिए अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। सूचना तकनीक अधिनियम 2000, साइबर स्पेस को संचालित करने और विभिन्न साइबर अपराध के विरुद्ध दंडों और अपराधों की परिभाषा के लिए हर संभव प्रयास कर चुका है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

भारत सरकार द्वारा सूचना तकनीक और सॉफ्टवेयर विकास समिति पर सरकारी कुशलता बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का निर्माण किया गया है।

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और ई-सरकार के केन्द्र सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं। भारत सरकार और राज्य सरकारों ने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी में निर्माणात्मक भूमिका निभाई है।

इलेक्ट्रॉनिक शासन — विगत दशकों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी ने सरकारी सेवाओं को धीमी गति से विकसित किया है। यहाँ शासन का एक प्रकार है जो जनता को इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं को मुहैया कराने में सम्मिलित प्रक्रियाओं से मिलकर बनता है।

अन्त में उद्देश्यों की कार्यशैली को सरल बनाना, लोक सहभागिता को योग्य बनाना, डाक संचार एवं संजाल द्वारा शासन में सुधार लाना लक्ष्य रहा है। ई-शासन के महत्त्वपूर्ण प्रयासों के कारण सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न उपकरणों के रूप में प्रयोग हो रहे हैं,
जैसे-1. ई-मेल,

2. संजाल वेबसाइट प्रकाशन,

3. ऑनलाइन प्रक्रियात्मक लेन देन.
4. वायरलेस सप्लीकेशन प्रोगकॉल का प्रयोग एवं प्रकाशन,

5. लघु संदेश सेवा,MPA 13 Free Assignment In Hindi

6. संजाल का विकास एवं प्रयोग,

7. नागरिकों की पहुंच को प्रोत्साहना

ई-शासन सार्वजनिक व्यवस्था में प्रौद्योगिकी का प्रयोग विशेषतः वेब आधारित संजाल प्रयोगों की पहुंच और नागरिकों, कर्मचारियों को सार्वजनिक सेवाओं का निष्पादन करने के लिए किया जाता है।

सूचना एवं संचार तकनीक के प्रयोग के साथ, ई-शासन की परियोजनाओं ने सरकारी उपकरणों के बहु संचार नेटवर्क को बढ़ावा दिया है।

नागरिकों एवं व्यापारियों के लिए कुशल प्रशासनिक वातावरण का निर्माण किया है। सरकारी सेवाओं की निष्पादन प्रक्रिया को सुधारा है। सार्वजनिक व्यवस्था में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के संभावित परिणाम निम्नलिखित हैं

1. सरकार के विभिन्न अंगों के मध्य देश की राज्य या स्थानीय सरकारों और देशों के बीच वेबयुक्त शासन द्वारा बेहतर अंत:क्रियाएं और संबंध

2. लोकसेवकों के निष्पादन सहित सरकार के कार्यकारी कार्यों की कुशलता और प्रभाव में वृद्धि।

3. नागरिकों एवं राज्य के बीच संबंधों में मौलिक परिवर्तन एवं विकास ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाना।

4. नागरिकों एवं व्यापार में शासन की पारदर्शिता, शासन द्वारा एकत्र और उत्पन्न सूचनाओं की पहुंच में वृद्धि करना। MPA 13 Free Assignment In Hindi

ई-शासन सरकारी संचालन में तेजी से बदलाव लाता है और कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधानपालिका के दायित्वों को एक नया रूप प्रदान करता है।

सूचना प्रौद्योगिकी में विकास की दृष्टि से सरकारी विभागों की वेबसाइर गतिशील सूचनाओं और निर्धारित लेन-देन जैसी अत्यधिक उन्नतशील सेवाओं को मुहैया कराने का प्रयास करती है।

भारत में ई-शासन का प्रयोग केन्द्र और राज्य सरकारों दोनों द्वारा किया जा रहा है। ई-शासन की परियोजनाओं के आगमन और लोगों को बेहतर सेवा निष्पादन के लिए सरकार द्वारा सूचना और संचार प्रौद्योगिकी को जोर-शोर से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है।

यह शासन को पुनर्निर्मित करता है। डाटा संचार की लागत में कमी, इलेक्ट्रॉनिक संचार के साथ-साथ अंतर संचालन का विस्तृत क्षेत्र, स्तरीय नेटवर्किंग प्रोटोकॉल द्वारा एकीकृत सरकार को लाभ पहुंचाता है।

डिजिटल शासन — डिजिटल शासन ई-शासन के मॉडलों का एक प्रकार है। डिजिटल शासन व्यवस्था संजाल का प्रयोग जनता और सरकार को जोड़ने के लिए एक साधन के रूप में करती है। प्रभु (2004) विकासशील देशों में ई-शासन के छः प्रारूपों को प्रस्तुत करते हैं। जो इस प्रकार हैं

प्रसारण/वृहत् प्रसार प्रारूप — यह प्रारूप सूचनाओं पर आधारित है। इस प्रारूप के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि यह सूचित नागरिक शासन प्रणाली को अच्छी प्रकार से समझ सकता है और उसको सचित इच्छाओं को मजबूत बनाने के लिए अपने अधिकारों और दायित्वों का प्रयोग कर सकता है।

सरकारी विभाग सार्वजनिक रूप से जनता को सूचना देने के लिए इस प्रारूप को अपना रहे हैं।

हत्त्वपूर्ण प्रवाह प्रारूप — यह प्रारूप प्रमुख निर्धारित ऑडिएन्स के मूल्यों के सूचना प्रसारण पर आधारित है। यह परिवर्तित मीडिया और सूचना एवं संचार तकनीक के माध्यम से जनता के विस्तृत अधिकार क्षेत्रों को प्रसारित करता है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

इस प्रारूप की शक्ति सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की आधुनिक विशेषताओं में है, जो दूरी एवं समय को कम करती है।

तुलनात्मक विश्लेषण प्रारूप — यहां प्रास्य सार्वजनिक अथवा निजी अधिकार क्षेत्र एवं इसकी तुलना में वास्तविक सूचनाओं की उपस्थिति को दर्शाता है और यह सामरिक ज्ञान एवं तर्कों को भी संचालित करता है।

इस प्रारूप की वास्तविक शक्ति सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की क्षमता में विद्यमान रहती है। जो सूचना की पुताप्ति के तरीकों एवं भेजने की पद्धति को सभी भौगोलिक बाधाओं से बचाता है।

विकासशील देश इस प्रारूप का प्रयोग कुशलतापूर्वक अपने हित लाभ के लिए करते हैं।

संग्रह एवं लॉबीइंग प्रारूप –– यह अधिकार डिजिटल शाला का प्रारूप है और यह विकासशील देशों में नागरिकों के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय निर्माण प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।

यह प्रारूप विश्व भर में वास्तविक सहयोगियों की मजबूतीकरण की क्रियाओं को सशक्त बनाने के लिए नियोजित प्रवाहों पर आधारित है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

यह प्रारूप सामूहिक सहयोग द्वारा भौगोलिक, सांस्थानिक और प्रशासनिक समस्याओं का समाधान करता है। यह प्रारूप नीतिगत मुद्दों एवं चर्चा में व्यक्तिगत और साम्प्रदायिक सहभागिता के क्षेत्र को बढ़ावा देता है।

पारस्परिक सेवा प्रारूप –– यह प्रारूप सूचना एव संचार तकनीक की विस्तृत सहभागिता, सरकार में पारदर्शिता के साथ-साथ निर्णय निर्माण में समय और लागत में बचत को प्रयोग में लाता है।

यह प्रारूप नागरिकों को प्रत्यक्ष रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाओं को सुलभ बनाता है। यह प्रारूप पारस्परिक लक्ष्यों के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाता है

(क) राजस्व संग्रह, करों की अदायगी, सरकारी कार्यविधि, अदायगी इत्यादि जैसे शासन कार्यों को ऑनलाइन करना।

(ख) नीति-निर्माताओं के साथ पारस्परिक माध्यमों को स्थापित करना, जैसे-वीडियो कांफ्रेंसिंग और ऑनलाइन संवाद।

(ग) संबंधित शासन प्रारूप के साथ नागरिकों द्वारा शिकायतों के आवेदन, प्रतिपुष्टि और रिपोर्ट को भरना।

(घ) नीतियों एवं कानूनी ढांचे को बनाने से पूर्व चर्चा/विचार मत को गंभीर विषयों पर संचालित करना।

ई-शासन परिपक्वता प्रारूप — यह प्रारूप सूचना और संचार प्रौद्योगिकी व्यवस्था में अनुक्रियाशीलता एवं उत्तरदायित्व को एक तरफ तथा दूसरी ओर व्यवस्था में आम नागरिक को सही समय पर सही सूचना मुहैया कराने के लिए सशक्त प्रयास करता है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

यह प्रारूप एक सेवा दृष्टिकोण पर आधारित है। यह प्रारूप इच्छित परिपक्वता के लिए उन विषयों की जानकारी देता है, जिनके माध्यम से निर्धारित स्तरों को प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 6. बजट के महत्वपूर्ण उपागमों की संक्षिप्त में चर्चा कीजिए।

उत्तर-बजट आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि आगामी वित्तीय वर्ष की कार्य-योजना है, जो वार्षिक विवरण को प्रदर्शित करती है। इसके अन्तर्गत योजना एवं कार्यक्रम बजर, प्रदर्शन बजर, शुन्य आधारित बजट और निष्कर्ष आधारित बजर सम्मिलित होते हैं।

योजना कार्यक्रम और बजटीय व्यवस्था — योजना कार्यक्रम और बजटीय प्रणाली प्रारम्भ से ही निर्णय निर्माताओं को संसाधन मुहैया कराने में एक सहयोगी की भूमिका निभाती है। कार्यक्रम का अर्थ योजना और बजट के मध्य संबंधों से है।

बजट का यह उपागम यह बताता है कि योजना, कार्यक्रम और बजट तीनों एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं और तीनों के सहयोग से एक व्यवस्था का निर्माण होता है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

प्रदर्शन-बजट विधि निर्गत के विषय में प्रत्येक कार्यक्रमों की महत्ता को समीक्षा करने की कोशिश करता है। इसके अन्तर्गत कार्यों की समीक्षा, प्रदर्शन स्तर और इकाई लागत जैसी तकनीकें सम्मिलित होती हैं।

निष्पादन बजट — निष्पादन बजट वार्षिक बजट का वह मूल तत्त्व है, जो वित्तीय वर्ष के दौरान समितियों के उद्देश्यों की उपलब्धियों के कार्यों को उजागर करता है।

यह खर्च किए जाने वाले धन के मध्य बेहतर सबंधों का निर्माण कर कार्यक्रम और क्रियाकलापों को भौतिक और वित्तीय पक्षों से जोड़ता है। निष्पादन बजट के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. बजट और विकास योजनाओं को एकीकृत करना।
  2. निष्पादन लेखा परीक्षण को महत्वपूर्ण बनाना।
  3. प्रत्येक कार्यक्रम और क्रियाकलापों के भौतिक और वित्तीय पक्षों को जोड़ना।
  4. उत्तम मूल्यांकन और विधायन की समीक्षा को सरल बनाना।
  5. योजना में विचारार्थ दीर्घावधि वाले लक्ष्यों की उपलब्धियों का मापना करना।

भारत में निष्पादन बजट का विकास –– भारत में संसदीय अनुमान समिति ने अमरीका में प्रदर्शन बजट की सफलता के आधार पर सर्वप्रथम 1954 में निष्पादन बजट की मांग की थी।

प्रशासनिक सुधार आयोग ने सरकार से सिफारिश की कि 1969-70 के बजट से प्रारम्भ होकर दो वर्ष के भीतर सरकार के सभी संगठनों और विभागों में निष्पादन बजट लागू किया जाए, जो विभाग अथवा संगठन विकास कार्यक्रमों पर सीधा नियंत्रण रख सके।

तभी से अधिकांश विभागों के लिए निष्पादन बजट तैयार किए जाते रहे हैं।

निष्पादन बजट के तत्त्व — निष्पादन बजट के तत्त्व निम्नलिखित हैं

उद्देश्यों का सूत्रीकरण-निष्पादन बजट की वार्षिक कार्य-योजना होने के कारण इसके प्रमुख उद्देश्यों को स्पष्ट करना आवश्यक है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

कार्यक्रम/कार्यकलाप वर्गीकरण-निष्पादन बजट के तहत बजट के कार्यों का वर्गीकरण करना आवश्यक है।

मानक-निष्पादन बजट के प्रत्येक कार्यक्रम अथवा क्रिया के भौतिक तथा वित्तीय पक्षों को परस्पर संबंधित करना। उचित मानक और स्तर को पर्याप्त आंकड़ों से सहमत होते हैं, बजट आकलन का निर्माण करने में विषयनिष्ठता की बजाय वस्तुनिष्ठता को बढ़ावा देते हैं।

लेखा-संरचना-निष्पादन बजट के अन्तर्गत कार्य, कार्यक्रम, क्रियाकलापों में बजट वर्गीकरण समस्त लेखा वर्गीकरण से सहमत होना चाहिए।

विकेन्द्रित जिम्मेदारी ढांचा-निष्पादन बजट के निर्माण के लिए उच्च स्तरों पर दिशा-निर्देशों का गठन आवश्यक है।

निष्पादन का पुनरावलोकन या समीक्षा-निष्पादन बजट के अन्तर्गत अनेक जिम्मेदारियों में भौतिक कुशलता और वित्त को एक साथ रखा जाता है।

निष्पादन बजट एक प्रबंधकीय तकनीक है। सरकार के तहत इसका सफल प्रयोग संचालन के समस्त स्तरों पर मानकों के विकास पर संभव है।

शून्य आधारित बजट — शून्य आधारित बजटीय प्रणाली का अर्थ सही कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना है। विकल्पों और कार्यक्रम उपलब्धि के नल्यांकन पर कभी-कभी हमें पुनः विचार करना होता है और एक कार्यक्रम को फिर से निर्देशित करना होता है।

शून्य आधारित बजट के चरण — शून्य आधारित बजट में अपनाई गई विधि निम्नलिखित है

निर्णय इकाइयों की पहचान-इस विधि के अन्तर्गत निर्णय करने वाली इकाइयों की पहचान की जाती है।

निर्णय पैकेज का एकत्रीकरण और विकास-निर्णय-समूह में प्रत्येक निर्णय इकाई का विश्लेषण करना होता है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

वरीयता क्रम में निर्णय पैकेज का मूल्यांकन और स्तर निर्धारण-समस्त निर्णय समूहों का मूल्यांकन तथा श्रेणीकरण करना, ताकि खर्चे के लिए मांग की जा सके। विस्तृत परिचालन बजट तैयार करना, जिनमें वह निर्णय समूह प्रतिबिम्बित हो, जिनको बजट के खर्चे में स्वीकृति दे दी है।

कार्यकलापों के संसाधन के निर्धारण द्वारा बजट की तैयारी या सोपानक्रम में रोधी स्तरों की राशि के उपयोग का निर्णय

पैकेज — संगठन में प्रत्येक बजट इकाई को विभिन्न स्तरों के वित्तीय बंटवारे के लिए आकस्मिकताओं का विकास करना होगा।

वित्तीय बंटवारे का वह न्यूनतम स्तर जो संगठन के जीवित रहने के लिए और अपनी मौलिक सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए चाहिए, संगठन की इकाइयों से यह भी पूछा जा सकता है कि उनके बजटों में कुछ कटौती कर दी जाए तो वे क्या करेंगे और अपनी सेवाओं के वर्तमान स्तरों को बनाए रखने के लिए उन्हें कितनी आवश्यकता है।

शून्य आधारित बजट के क्रियान्वयन में समस्याएँ – शून्य आधारित बजट की समस्याएं निम्नलिखित हैं

1. संगठन यह नहीं चाहते कि बाहर वाले यह जान पाएं कि उनको जीवित रहने के लिए कितना न्यूनतम खर्च आवश्यक है।

2. बजट की असफलता में एक प्रमुख कारण विस्तृत कागजी कार्यों का अत्यधिक प्रयोग है।

3. संसाधनों की पुनर्नियुक्ति, श्रम शक्ति का पुनर्नियोजन एक अत्यधिक कठिन और नाजुक मुद्दा है।

परिणाम आधारित बजट-– देश के नेतृत्व ने निर्णय-निर्माण के अधिकार पर बल दिया है, ताकि नागरिकों की मांगों की पूर्ति की जा सके। भारतीय वित्तीय प्रणाली में सर्वप्रथम बजटीय प्रयोग में क्रियान्वयन की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए वित्तमंत्री ने एक परिणाम आधारित बजट प्रस्तुत किया।

यह 44 मंत्रालयों और उनसे संबंधित विभाग/उपविभागों के सहयोग और उनकी इच्छाओं के परिणामों का संग्रह है, जो वर्तमान वित्तीय वार्षिक विवरण में किए गए विनियोजन प्राप्ति के लिए गठित किए गए हैं।

प्रश्न 7. प्रबंधन सूचना प्रणाली के उद्भव का पता लगाइए तथा उसकी संरचना का परीक्षण कीजिए।

उत्तर-प्रबंधन सूचना प्रणाली : विकास और ढांचा-आमतौर पर संगठन में कम्प्यूटरों के प्रयोग में प्रारूपण और विश्लेषण दो सशक्त माध्यम थे। 1965 से पूर्व विस्तृत स्तर पर सूचना प्रणाली बहुत खर्चीली थी। 1960 के अंत में एक नई प्रकार की सूचना प्रणाली मॉडल आधारित निर्णय समर्थन प्रणाली प्रयोग में आई।

1966-67 में स्कॉट मोर्टान के अध्ययन से पता चलता है कि कम्प्यूटर, और विश्लेषणात्मक प्रारूपण प्रबंधकों के लिए निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।MPA 13 Free Assignment In Hindi

1974 में जॉईन डेविस ने प्रबंधन सूचना प्रणाली को एक एकीकृत मानवीय प्रणाली बताया, जो संगठन के निर्णय-निर्माण कार्यों, संचालन, प्रबंधन में सहयोग करने के लिए सूचनाएं प्रदान करती है।

1980 के दशक के पारंभ में, शैक्षिक शोधार्थियों ने सॉफ्टवेयर की एक नई कड़ी को विकसित किया, जो समूह निर्णय का समर्थन करती है। प्रबंधन सूचना प्रणाली का विकास-इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

प्रथम पीढ़ी की प्रबंधन सूचना प्रणाली — इस प्रणाली ने सूचना एवं अनुभव पर कब्जा जगाया, ताकि यह सरलता से प्राप्त की जा सके। इसका दूसरा नाम ज्ञान-अधिकार था। इस प्रणाली ने विश्लेषण और प्रबंध सिद्धांत से उत्पन्न विचार का प्रयोग किया।

इसमें संगठन की तकनीकी स्थिरता पर विशेष बल दिया न कि उन मार्गों पर, जिससे ज्ञान का प्रयोग होता है। इसका प्रमुख कार्य स्पष्ट रणनीतिक ज्ञान का निर्माण करना था।

यह किसी सैद्धांतिक ज्ञान को प्रदान करने में विफल रहा कि किस प्रकार कोई संगठन नई वस्तुओं को ग्रहण करता है और किस प्रकार यह इन सूचनाओं के माध्यम से कार्य करता है।

द्वितीय पीढ़ी की प्रबंधन सूचना प्रणाली — प्रथम पीढ़ी की तकनीक की सैद्धांतिक और व्यवहारिक विफलता के पश्चात सिद्धांतकार इस निष्कर्ष पर पहुचे कि ज्ञान को किस प्रकार निर्मित और वितरित किया जाए।

द्वितीय पीढ़ी का ज्ञान-प्रबंध लोगों द्वारा निर्मित और ज्ञान के मार्ग को प्राथमिकता देता है। यह इस बात पर बल देता है कि ज्ञान और कार्य किसी संगठन की सफलता के लिए प्रचार-प्रसार एवं कल्पना से अधिक प्रभावी हैं।

प्रबंधन सूचना प्रणाली की विशेषताएं-इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं :–

1. प्रबंधन सूचना प्रणाली को सावधानीपूर्वक नियोजित किया जाना चाहिए और यह उचित समय पर विकसित होती है।MPA 13 Free Assignment In Hindi

2. प्रबंधन स्थायी रूप से प्रणाली विकास के प्रयासों को निर्देशित, पुनरीक्षित एवं सम्मिलित करने के लिए करता है, ताकि कियान्वित सूचना प्रणाली संगठन की आवश्यकताओं को पूरा कर सके।

3. प्रणाली द्वारा स्वीकृत सांगठनिक जरूरतों में भावी बदलाव के लिए प्रबंधन सूचना प्रणाली में लोचशीलता विकसित होनी चाहिए।

4. प्रबंधन सूचना प्रणाली के एकीकृत स्वरूप के कारण घटनाओं से संबंधित आंकड़ों को नियंत्रित करना और इसके कार्यक्षेत्रों के चारों तरफ प्रयोग करना चाहिए।

5. एक एकीकृत प्रणाली और प्रबंधन सूचना प्रणाली समान नहीं हैं, फिर भी एकीकृत अर्थ प्रबंधन, सूचना प्रणाली की प्रमुख विशेषता है।

6. यह प्रणाली प्रबंधन पर आधारित है, जहां प्रबंधन संगठन के समस्त कर्मचारियों से परस्पर संबंधित है। इस प्रणाली का विकास संगठन की आवश्यकताओं और उसके लक्ष्यों के मूल्यांकन से उत्पन्न होता है।

प्रबंधन सूचना प्रणाली का ढांचा :- MPA 13 Free Assignment In Hindi

प्रबंधन सूचना प्रणाली की संरचना एक संगठन के माध्यम से कार्यक्रमों में सूचना की प्राप्ति एवं रिपोर्ट के लिए की जाती है, जो प्रबंधकों को समस्त कार्यक्रमों के संचालन और प्रदर्शन की योजना निर्माण और समीक्षा करने में प्रयुक्त की जाती है।

प्रबंधन सूचना प्रणाली ज्ञान परिसंपत्ति को, संगठन और उसके कार्यकर्ताओं को प्राप्त और वितरित करता है। प्रबंधन सूचना प्रणाली के निम्नलिखित भाग इस प्रकार हैं

(i) हार्डवेयर-डाटा की गणना में इस उपकरण का प्रयोग किया जाता है।

(ii) सॉफ्टवेयर-इसके तहत हार्डवेयर के नियंत्रण में सम्मिलित निर्देशों का समूह आता है।

(iii) जनता-कम्प्यूटर के प्रचलन के प्रारम्भ से प्रबंधन सूचना प्रणाली में जनता सम्मिलित थी, जो प्रोग्रामर, डिजाइन समीक्षक और कुछ बाह्य प्रयोगकर्ताओं के लिए अधिप्रेरित थी।

(iv) डाटाबेस-यह संबंधित आंकड़ों का संग्रह है, जो सरलतापूर्वक पुनाप्ति और कम्प्यूटर द्वारा संचालित किया जाता है। डाटा फ्लो डायनाम सूचना प्रणाली को प्रतिनिधित्व करने में सहयोग करते हैं।

वे यह दिखाने के लिए निर्मित किए जाते हैं कि प्रणाली किस प्रकार छोटे भागों में बंटी हुई है और इन भागों में आंकड़ों के प्रवाह को दिखाया जाता है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

डाटा फ्लो डायग्राम के प्रमुख मूलाधार निम्नलिखित हैं

1, बाह्य अस्तित्व – यह वातावरण के प्रमुख अंग हैं, जो प्रणाली के साथ संचार करते हैं।

  1. प्रक्रिया – डाटा फ्लो डायग्राम में प्रक्रिया एक कार्यविधि है जो आकड़ों को सम्मिलित करती है। इसके प्रमुख दो नियम हैं-

(i) प्रत्येक प्रक्रिया में कम-से-कम डाटा प्रवेश का प्रवाह अवश्य होना चाहिए।

(ii) प्रत्येक प्रक्रिया के आंकड़ों को कहीं दूसरी जगह भी हस्तांतरित करना चाहिए।

डाटा संचय – इस फाइल का प्रयोग दीर्घकाल तक आंकड़ों को रखने के लिए किया जाता है।

आंकड़ा प्रवाह – यह प्रत्येक प्रक्रिया के निवेश और निर्यात का प्रतिनिधित्व करता है।

एक प्रबंधन सूचना प्रणाली का तीन अलग, लेकिन संबंधित वर्गों में विचार किया जा सकता है

1. संचालन तत्त्व व तत्त्व जरूरत के आधार पर संबंधित सूचनाओं की मुहैया कराते हैं। इसमें लेन-दन प्रक्रिया, मुख्य फाइल, रिपोर्ट निर्माण, अंतर्संवाद अभिप्रयोग प्रक्रिया सम्मिलित हैं।

2. निर्णय-निर्माण में प्रबंधन सूचना प्रणाली की सहायता निर्णय निर्माण पर प्रबंधन सूचना प्रणाली आधारित है।

3. संगठन की कार्यविधियों पर आधारित प्रबंध सूचना प्रणाली-यह संरचना संगठन की समस्त कार्यविधियों के साथ संबंधित होती है। MPA 13 Free Assignment In Hindi

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