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MPA 12

प्रशासनिक सिद्धांत

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MPA 12 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. लोक प्रशासन के अर्थ, स्वरूप आर कार्यक्षेत्र की चर्चा कीजिए ।

उत्तर-लोक प्रशासन की परिभाषा एल.डी. वाइट के अनुसार लोक प्रशासन रूप और उद्देश्यों में भिन्न होता है और स।र्वजनिक और निजी कायों के प्रशासन में बहुत बिन्दुओं पर समानता होती त्यादि अभिन्नता नहीं है।

ऐसी सामान्य अवधारणा के अभिन्न पक्ष के रूप में लोक प्रशासन उस प्रकार के प्रशासन से सम्बन्धित है जो विशिष्ट प्ररूप वर्गीकरण के अंतर्गत कार्य करता है। यह राजनीतिक कार्यकलापों द्वारा निर्मित नीति-निर्णयों के निर्वहन का माध्यम है।

स्पष्टतः लोक प्रशासन “एक सार्वजनिक” पक्ष है, जो इसे विशेष स्वरूप और फोकस प्रदान करता है। औपचारिक रूप से इसका अभिप्राय “सरकार” हो सकता है। इस प्रकार लोक प्रशासन निम्नलिखित का संगम है

(i) सरकारी प्रशासन,
(ii) कार्यरत सरकार,
(iii) सामाजिक-आर्थिक और
(iv) राजनीतिक-प्रशासनिक।

लोक प्रशासन विशेष रूप से सरकारी नौकरशाही पर केन्द्रित है। इस प्रकार लोक प्रशासन प्रशासन के उस भाग से सम्बन्धित है जो सरकार के प्रशासनिक कार्यों से सम्बन्ध रखे।

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार, “लोक प्रशासन अपनी सरकार के माध्यम से राज्य की नीति का अनुप्रयोग है।”

परिभाषाएं :- विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी लोक प्रशासन की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं

वुड्रो विल्सन -“लोक प्रशासन कानून का ब्योरेवार और क्रमबद्ध अनुप्रयोग है। कानून का प्रत्येक अनुप्रयोग विशेष प्रशासन का कार्य है।”MPA 12 Free Assignment In Hindi

एल.डी. वाइट :– लोक प्रशासन के अन्तर्गत वे समस्त कार्य सम्मिलित हैं जिनका प्रयोजन सरकारी नीति की पूर्ति या प्रवर्तन में होता है।”

म. रूथनास्वामी :- “जब प्रशासन का राज्य अथवा छोटी राजनीतिक संस्थाओं, नगरपालिका या कंट्री काउंसिल (जिला बोर्ड) के कार्यों से संबंध होता है तो यह लोक प्रशासन कहलाता है।

सरकार के अधिकारियों के सभी कार्य दूर स्थित कार्यालय में चपरासी से लेकर राजधानी में राज्य के प्रमुख तक लोक प्रशासन होता है।”

जे.एम. पिफ्नर :-“प्रशासन लोगों के प्रयासों का समन्वय करके सरकार का काम करवाने की प्रक्रिया है ताकि वे अपने कार्यों की पूरा करने के लिए साथ-साथ कार्य कर सकें।”

लूथर गुलिक :- ” लोक प्रशासन प्रशासन के विज्ञान का वह भाग है जिसे सरकार से संबंध रखना है। यह मुख्यतः अपने आपको कार्यापालिका शाखा से जोड़े रखता है, जहां सरकार का काम किया जाता है। यद्यपि स्पष्ट रूप से विधायी और न्यायपालिका शाखाओं से संबंधित समस्याएं भी होती हैं।”

पर्सी मैकक्वीन :– “लोक प्रशासन सरकार के कार्यों, चाहे वे स्थानीय हों या केन्द्रीय, से सम्बन्धित है।”

वर्तमान स्थिति :- परन्तु वर्तमान में ‘लोक प्रशासन’ शब्द की व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। सरकार के कार्यक्रमों के निर्वहन में सम्मिलित होने के साथ साथ यह नीति निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सरकार की तीनों शाखाओं को सम्मिलित करता है।

एफ.ए. निग्रो और एल.जी. निग्रो के अनुसार लोक प्रशासन इस प्रकार है

1. सार्वजनिक व्यवस्था में सहयोगात्मक सामूहिक प्रयास है।

2. इसमें सभी तीनों शाखाएं सम्मिलित हैंMPA 12 Free Assignment In Hindi

(i) कार्यपालिका, (ii) विधायिका, (iii) न्यायपालिका तथा उनका पारस्परिक संबंध।

3. लोक प्रशासन की प्रबंध नीति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है इस प्रकार यह राजनीतिक प्रक्रिया का भाग है।

4. लोक प्रशासन निजी प्रशासन से भिन्न है।

5. लोक प्रशासन समुदाय को सेवाएं देने वाली सेवाओं में बड़ी संख्या में निजी समूहों से निकटतापूर्वक संबद्ध है। लोक प्रशासन का स्वरूप लोक प्रशासन के स्वरूप के बारे में निम्नलिखित दो मत हैं :-

6. संपूर्ण

7. प्रबंधकीय

इनका विवरण निम्नलिखित प्रकार से है :–

लोक प्रशासन का संपूर्ण मत – इस मत का समर्थन हेनरी फेयॉल और एल. डी. वाइट ने किया है
इस मत के अनुसार प्रशासन समस्त कार्यकलापों-हस्तचालित (मैनुअल), लिपिकीय तथा प्रबंधकीय आदि का कुल योग है।

ये संगठन के उद्देश्य प्राप्त करने के लिए आरम्भ किए जाते हैं। इस दृष्टिकोण से वे सरकार के परिचरों से सचिवों तक सरकार के अधिकारियों और राज्य के प्रमुख कार्य प्रशासन का गठन करते हैं।

लोक प्रशासन का प्रबंधकीय मत इस मत के अनुसार उन लोगों के प्रबंधकीय क्रियाकलाप, जो योजना निर्माण, संगठन, समादेशन, सम्बन्ध और नियंत्रण में सम्मिलित हैं, लोक प्रशासन को गठित करते हैं। इस मत के अनुसार प्रशासन काम करवाने वाला है न कि कार्य करने वाला।

इस मत का समर्थन लूथर गुलिक, हर्बर्ट सीमॉन, स्मिथबर्ग और थाम्पसन ने विभिन्न प्रकर से किया है। प्रबंधकीय मत में गैर-प्रबंधकीय क्रियाकलाप, जैसे-हस्तचालित, लिपिकीय और तकनीकी क्रियाकलाप सम्मिलित नहीं हैं।

अन्तर :-दोनों मत एक-दूसरे से भिन्न हैं MPA 12 Free Assignment In Hindi

1) सम्पूर्ण मत में प्रशासन में लगे हुए सभी व्यक्तियों के क्रियाकलाप सम्मिलित हैं, जबकि प्रबंधकीय मत स्वतः ही शीर्ष पर आसीन केवल कुछ ही व्यक्तियों तक सीमित है।

2) संपूर्ण मत में समस्त प्रकार के कार्यों-मैनुअल से प्रबंधकीय तक गैर-तकनीकी से तकनीकी तक सम्मिलित हैं। इसके विपरीत प्रबंधकीय मत में सामाजिक में केवल प्रबंधकीय कार्यों को दृष्टिगत रखा जाता है।

3) संपूर्ण मत के अनुसार प्रशासन विषय के अनुसार एक क्षेत्र से दूसरे में भिन्न हैं। प्रबंधकीय दृष्टिकोण के अनुसार ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रबंधकीय मत प्रशासन के सभी क्षेत्रों में उभयनिष्ठ प्रबंधकीय तकनीक से पहचाना जाता है।

4) दो मतों के मध्य अंतर प्रबंध और संक्रिया के मध्य अंतर से सम्बन्धित है। यह कार्य करवाना और कार्य करने के मध्य का अन्तर है। प्रशासन शब्द का सही अर्थ उस सन्दर्भ पर निर्भर है, जिसमें यह प्रयुक्त किया जाता है।

डिमॉक. डिमॉक और कोएनिंग के शब्दों में अध्ययन के रूप में लोक प्रशासन कानूनों के पालन करने में सरकार के प्रयासों को कार्यान्वित करता है।

प्रक्रिया के रूप में ये सभी वे कदम हैं जिन्हें प्रवर्तक एजेंसी कार्य आरंभ करने और. पूरा करने के बीच लेती है, परन्तु इसमें वे भी शामिल हैं जिन्हें पहले स्थान में कार्यक्रम बनाने में एजेंसी की सहभागिता, यदि हो तो, लेती है। व्यवसाय के रूप में वह सार्वजनिक एजेंसी में निर्देशित करना है।

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लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र :

क्रियाकलाप के रूप में लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र — सामान्यतया लोक प्रशासन सरकार के समस्त क्रियाकलाप समाहित करता है। अतएव क्रियाकलाप के रूप में लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र राज्य के कार्यक्षेत्र के अनुरूप ही है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

आधुनिक कल्याणकारी राज्य में जनता को राज्य सरकार से अनेक अपेक्षाएं हैं, जैसे- सरकार से विभिन्न प्रकार की सेवाएं और संरक्षण। इस सन्दर्भ में लोक प्रशासन निम्नलिखित प्रकार कार्य करता है

1). अनेक कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा सेवाएं प्रदान करना।

2). सरकार के स्वामित्व के उद्योगों का प्रबंध करना।

3). निजी उद्योगों को विनियमित करना।

4). सार्वजनिक नीति के क्षेत्र के अन्तर्गत प्रत्येक क्षेत्र और क्रियाकलाप में सक्रिय रहना।

लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र आधुनिक राज्य में व्यापक है।

विधा के रूप में लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र -POSDCORB मत लेखकों ने भिन्न-भिन्न शब्दों में लोक प्रशासन के कार्यक्षेत्र को परिभाषित किया है। गलिक ने संक्षेप में शब्द POSDCORB के अक्षरों द्वारा विषय का कार्यक्षेत्र स्पष्ट किया है। ये निम्नलिखित को व्यक्त करते हैं

(i) योजना अर्थात परियोजना से समन्वय करने हेतु किए जाने वाले कार्य, अपनाए जाने वाले तरीकों की व्यापक रूपरेखा तैयार करना।

(ii) संगठन संगठन में उन प्राधिकरणों की औपचारिक रचना की स्थापना समाहित है, जिससे कार्य का विभाजन किया जाता है, व्यवस्था की जाती है, समन्वय आदि कार्य सम्पन्न किए जाते हैं।

(iii) कर्मचारी कर्मचारी के अन्तर्गत कार्मिकों की भर्ती और प्रशिक्षण तथा उनकी कार्य शर्ते समाहित है।

(iv) निदेशन अर्थात निर्णय करना और आदेश तथा अनुदेश जारी करना है।

(v) समन्वय अर्थात संगठन के विभिन्न प्रभागों, अनुभागों और अन्य भागों का परस्पर सम्बन्ध की स्थापना।

(vi) रिपोर्टिंग अर्थात एजेंसी के अन्तर्गत वरिष्ठ अधिकारियों को को सूचित करना जिनके प्रति इस सम्बन्ध में कार्यपालक उत्तरदायी है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

(vii) बजट निर्माण अर्थात वित्तीय योजना निर्माण, नियन्त्रण और लेखाकरण।

गुलिक का मत है कि POSDCoRB क्रियाकलाप समस्त संगठनों में है। वे प्रबंधन की सामान्य समस्याएं हैं, जो उन कार्यों के स्वरूप को दृष्टिगत रखकर जिन्हें वे करते हैं। भिन्न भिन्न एजेंसियों में पाए जाते हैं।

POSDCoRB का उद्देश्य एकता, निश्चितता और सुस्पष्टता के अतिरिक्त अध्ययन को अधिक क्रमबद्ध बनाना है।

लोचना -POSDoRB सिद्धांत की आलोचना की गई है। आलोचकों के अनुसार

(i) सीमितता –-POSDCORB क्रियाकलाप न तो सम्पूर्ण प्रशासन के थे, न ही उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग थे।

(ii) एकांगी —POSDCORB ने इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया है कि भिन्न-भिन्न एजेंसियों को भिन्न-भिन्न प्रशासनिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है जो उन सेवाओं के विशिष्ट स्वरूप के कारण उत्पन्न होती हैं और कार्य, जिन्हें वे करते हैं।

(ii) विशिष्टता की उपेक्षा —POSDCoRB मत केवल प्रशासन की आम तकनीक पर विचार करता है।

(iv) महत्त्वपूर्ण पक्ष की उपेक्षा –-POSDCoRB में उस विषय का अध्ययन नहीं किया जाता है जिससे संगठन संबंधित है।

(v) अत्यधिक सीमित कार्यक्षेत्र —POSDCORB मत में नीति के निर्माण और कार्यान्वयन का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार इसके द्वारा प्रस्तुत प्रशासन के कार्य क्षेत्र की परिभाषा सीमित है। इसके कारण हैं

 (क) अंतर्मुखी दृष्टि का बहुत अधिक होना। 
 (ख) शीर्ष प्रबंधन का अत्यधिक सचेत होना।

लेविस मेरियम ने लोक प्रशासन में कार्यक्षेत्र पर विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि “लोक प्रशासन कैंची की तरह दो धारों (ब्लेडों) का साधन है।” MPA 12 Free Assignment In Hindi

(i) पहली धार (ब्लेड) POSDCORB द्वारा सम्मिलित क्षेत्र का ज्ञान हो सकता है।

(ii) दुसरी धार (ब्लेड) उस विषय का ज्ञान है जिनमें यह प्रयुक्त की जाती है। दोनों धार (ब्लेडें) औजार को प्रभावी बनाने हेतु अच्छी होनी चाहिए।

2 “आधुनिक प्रबंधन तकनीके एफ.डब्ल्यू. टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन का विस्तार है।” स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- प्रबंधन के कार्य में गलतियाँ कम से कम हो इसके लिए एफ.डब्ल्यू. टेलर ने प्रबंधन के द्वारा अपनाए जाने वाले चार नए सिद्धांतों या कहें चार नई ड्यूटियाँ सूत्रबद्ध की, इन्हें वैज्ञानिक प्रबंधन का सिद्धांत कहा जाता है। ये सिद्धांत निम्नलिखित हैं :-

(1) वास्तविक कार्य विज्ञान का विकास-टेलर के अनुसार कार्य विज्ञान का विकास करने की आवष्ठयकता है। आगे उसका यह भी विष्ठवास था कि प्रत्येक कार्य को करने का एक ‘सर्वोत्तम तरीका’ है।

इसे किसी भी कार्य के क्रमबद्ध अध्ययन और वैज्ञानिक विधि विकसित कर पुराने कामचलाऊ तरीका बदलकर प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए

(i) परंपरागत ज्ञान का भंडार एकत्र करने,

(ii) उसे रिकॉर्ड करने,

(iii) उसे तालिकाबद्ध करने और

(iv) बहुत से मामलों में अंततः उसे कानून, नियमों और यहाँ तक कि गणित सूत्रों में बदलने की आवष्ठयकता होती है और बाद में इन कानूनों तथा नियमों को संगठन के सभी कामगारों के दैनिक कार्यों पर अनुप्रयुक्त किया जाना चाहिए। MPA 12 Free Assignment In Hindi

कार्य की वैज्ञानिक विधिा कामगारों को मालिक की अनावष्ठयक आलोचना से बचाता है और प्रबंधक कामगारों से अधिकतम काम ले सकता है। इसका परिणाम इज़्टतम दष्ठाओं में योग्यता प्राप्त कामगारों द्वारा किया जाने वाला ‘प्रचुर दैनिक कार्य’ की स्थापना में होता है।

(2) वैज्ञानिक चयन और कामगारों का प्रगामी विकास :– वैज्ञानिक रूप से विकसित कार्य का रूल निज्पादन सुनिष्ठिचत करने के लिए कामगारों का चयन वैज्ञानिक आधार पर करना आवष्ठयक है।

यह प्रबंधन का कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक कामगार के आचरण, स्वभाव और निज्पादन का अध्ययन उसके विकास के लिए उसकी सीमाओं और संभावनाओं को ज्ञात करने की दष्टष्टि से करें।

टेलर का मत है कि प्रत्येक कामगार में विकास की संभावनाएँ होती हैं। प्रत्येक कर्मचारी को क्रमबद्ध तरीके में और पूरी तरह से प्रष्ठिाक्षित किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक विधि के अंतर्गत सही कार्य के लिए सही व्यक्ति का चुनाव किया जाता है।

यह सुनिष्ठिचत करना भी आवष्ठयक है कि कर्मचारी नए तरीके, औजार और दष्ठाओं को इच्छापूर्वक और उत्साह के साथ स्वीकार करता है। कार्य को अपनी सामान्य क्षमताओं के साथ पूरी अनुभूति से कार्य करने के लिए प्रगति के अवसर होने चाहिए।

(3) कार्य विज्ञान और वैज्ञानिक ढंग से चने गए कामगारों का संयोजन :- वैज्ञानिक प्रबंधन का तीसरा सिद्धांत कार्य विज्ञान और वैज्ञानिक ढंग से चुने गए और प्रष्ठिाक्षित कामगारों को एक साथ लाना है।

टेलर कहता है, एक साथ लाना जानबूझकर है, क्योंकि आप सभी विज्ञान विकसित कर सकते हैं जैसा आप चाहते हैं कामगार चुन सकते हैं और प्रष्ठिाक्षित कर सकते हैं, जब कोई व्यक्ति विज्ञान और कामगार को एक साथ नहीं लाता है, आपका संपूर्ण श्रम समाप्त हो जाएगा।’

टेलर ने अनुभव किया कि यह कार्य करना प्रबंधन का विष्ठिास्ट उत्तरदायित्व है। उसका मत है कि कामगार सदा प्रबंधन से सहयोग करने के इच्छुक रहते हैं परंतु प्रबंधन पक्ष की ओर से अधिक विरोध होता है।

कामगार और प्रबंधन बीच कार्य और उत्तरदायित्व का विभाजन :- परंपरागत रूप से कामगार कार्य का संपूर्ण उत्तरदायित्व वहन करता है और प्रबंधन कम। परंतु टेलर ने कामगार और प्रबंधन के बीच बराबर उत्तरदायित्व पर बल दिया। MPA 12 Free Assignment In Hindi

यह विभाजन उनके बीच समझ और पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न करता है। इसके फलस्वरूप कामगार और प्रबंधन के बीच संघर्ज और अविष्ठवास पैदा होता है।

टेलर सोचता है कि वैज्ञानिक प्रबंधन को ऐसे प्रबंध के रूप में उपयुक्त ढंग से और वास्तविकता से विभेद कर सकता है जिसमें सौहार्द मतभेद के बदले नियम हैं।

प्रश्न 3. प्रशासन के सामान्य सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

उत्तर- प्रशासन के सामान्य सिद्धान्त — प्रशासन के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का विवेचन इस प्रकार है

विभागीकरण का सिद्धान्त — माहाघ्रशासन प्रचन्धन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त स्वयं ही उन आधारों का समाधान करता है जिन पर संगठन में कार्य का विभाजन हो सकता है और विभागों का सृजन किया जाता है।

लूथर गुलिक ने चार आधारों की पहचान की। इन पर भिन्न-भिन्न विभाग बनाये गए हैं। ये आधार निम्न प्रकार हैंउन्हें सामान्यतया गुलिक के 4 P’s के रूप में जाना जाता है।

(1) प्रयोजन — सर्वप्रथम, कार्य के मुख्य प्रयोजन को कार्य के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। कतिपय विभागों का सृजन करने हेतु संगठन के मुख्य प्रकार्य और लक्ष्य पहचाने जाते हैं। प्रत्येक कार्य के लिए विभाग सृजन किए जाते हैं।

जैसे लोगों के कल्याण की देखभाल हेतु ‘प्रयोजन के आधार पर विभाग का सृजन किया गया था। इसी के अनुरूप अन्य प्रयोजनों के आधार पर अन्य विभाग भी सृजित किये जा सकते हैं।

लाभ – इस प्रकार के विभागों के लाभ निम्नलिखित हैं

(i) सर्वप्रथम, वे स्वतः पूर्ण विभाग हैं।

(ii) विभाग के संचालन में कम समन्वय लागत आती है।

(iii) ऐसे विभाग लक्ष्य प्राप्त करने में अधिक निश्चित होते हैं.MPA 12 Free Assignment In Hindi

दोष –प्रयोजन आधारित विभागों को कुछ असुविधाएं भी हैं, जैसे

(i) कार्य विभाजन की संभावना की कमी होना

(ii) अद्यतन प्रौद्योगिक का प्रयोग करने में असफलता और

(iii) विभाग में काम करने वाले विशेषज्ञों के लिए पर्याप्त कार्य का अभाव।

(2) प्रक्रिया या प्रवीणता — कुछ विभाग उनके कार्य में अंतर्निहित प्रक्रिया या निपुणता के आधार पर सृजित किये जाते हैं। जैसे-इंजीनियरिंग विभाग को प्रक्रिया या निपुणता पर आधारित सभी कार्यों को एक साथ समूहीकृत किया जाना चाहिए, क्योंकि उसमें उसी प्रकार के ज्ञान, निपुणता और प्रक्रियाओं का प्रयोग अंतर्निहित है।

लाभ — गुलिक ने प्रक्रिया आधारित विभाग का लाभ बताते हुए कहा है कि यह प्रत्येक प्रक्रिया प्रकार के कार्य की विपुल मात्रा को एक ही कार्यालय में एक साथ लाता है। अतएव सर्वाधिक प्रभावकारी कार्य और विशेषज्ञता का विभाजन करना संभव है।

दोष — इस आधार की मुख्य असुविधा यह है कि इसमें विभाग का प्रयोजनहीन विभाजन और वृद्धि होती है।

(3) व्यक्ति या ग्राहक — तीसरा आधार सेवा प्राप्त (सेवित) ग्राहक के अनुसार कार्य की विशेषता विभागीय संगठनों का है। जैसे-वृद्धावस्था कल्याण विभाग विशेष रूप से उस प्रकार के व्यक्तियों की सेवा करता है, जिन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता है।

गुण – इस विभाग में काम करने वाले लोग कालान्तर में उन विशिष्ट ग्राहकों की सेवा करने की विशेषज्ञता व प्रवीणता अर्जित कर लेते है।

दोष – इस विभाग की असुविधा यह है कि द्वैधवृत्ति और परस्परव्यापी होने के कारण ऐसे संगठनों के मध्य समन्वय कठिन होता है।

(4) स्थान या राज्य क्षेत्र – कुछ संगठनों के लिए स्थान आधार होता है। जिला प्रशासन या जनजाति विकास क्षेत्र इसके उदाहरण हैं। यहां निर्दिष्ट स्थान में निष्पादित समस्त कार्य एक साथ सम्मिलित किए जाते हैं और विभाग का सृजन किया जाता है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

गुण – यह किसी भी क्षेत्र के गहन विकास के लिए उपयोगी है।

दोष – ऐसे विभागों के सदस्य प्रकार्यात्मक विशेषज्ञता और संवृद्धि के अभाव से ग्रस्त होते हैं।

एकल शीर्ष कार्यपालक या निर्देश की एकता का सिद्धांत — इस सिद्धान्त का आधार यह है कि एक ही निदेशक या कार्यपालक संगठनों का प्रमुख होना चाहिए।

यूर्विक ने प्रशासन के प्रयोजनों के लिए समितियों के प्रयोग के विरुद्ध चेतावनी दी है। उसका विचार है कि ‘बोर्ड और आयोग’ विफल सिद्ध हुए हैं। इसमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(1) वे धीमे, बोझिल, अपव्ययी और निष्प्रभावी हैं।

(2) ये अन्य एजेंसियों से सहयोग नहीं करते हैं।

सरकार में सुव्यवस्थित प्रशासनिक इकाई का प्रमुख एक ही प्रशासक होता है। गुलिक की इस विचारधारा का कारण यह है कि उसने प्रशासन प्रबन्धन पर राष्ट्रपति समिति के सदस्य के रूप में संयुक्त राज्य संघ सरकार में अनेक बोर्डों और आयोगों की संरचना के स्थान पर एक व्यक्ति प्रशासनिक दायित्व के सिद्धान्त के प्रयत्न में ऐसा अनुभव किया।

आदेश की एकता का सिद्धान्त – “आदेश की एकता” के लिए संगठन में अधीनस्थों को केवल एक ही उच्च अधिकारी से आदेश प्राप्त करने चाहिए। गलिक ने इस सम्बन्ध में फेयॉल से सहमति प्रकट की है, जिसने कहा “एक व्यक्ति दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकता है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

स्टाफ का सिद्धान्त — स्टाफ के सिद्धान्त के बात पर बल दिया जाता है कि संगठनात्मक कार्यकलाप के निष्पादन में कार्यपालक को बड़ी संख्या में अधिकारियों की सहायता की आवश्यकता होती है। कार्यपालक इस स्टाफ सहायता का पात्र होता है। स्टाफ दो श्रेणियों के होते हैं

(1) सामान्य स्टाफ-सामान्य स्टाफ जानने, सोचने और योजना निर्माण कार्यों में कार्यपालक की सहायता करता है।

(2) विशेष स्टाफ-संगठन के मूलभूत प्रकार्यों के निर्वहन में कार्यपालक की सहायता करता है।

यूर्विक का मत है कि सभ्य समाज में जो सहायक शीर्ष कार्यपालक की ओर से कार्य करता है। उसे वरिष्ठ अधिकारियों के प्राधि कार पर अतिक्रमण के रूप में माना जाता है। इस समस्या के समाधान हेत गलिक का सुझाव है कि सहायक व्यक्ति “अनामत्व का मनोभाव वाला” होना चाहिए।

प्रत्यायोजन का सिद्धान्त — प्रत्यायोजन के सिद्धान्त में प्रशासक निम्न प्रकार कार्य करता है

(1) अपना कार्य करने के लिए आवश्यक प्राधिकार अपने पास रखता है।
(2) शेष कार्य अपने अधीनस्थों को प्रत्यायोजन करने की आवश्यकता पर बल देता है।

ऐसे प्रत्यायोजन के अभाव में अधीनस्थ अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकते हैं। यूर्विक के अनुसार, “उचित ढंग से प्रत्यायोजित करने के साहस के अभाव और इसे कैसे किया जाना है, इसके ज्ञान के अभाव संगठन में विफलता के सामान्य कारणों में से एक है।”

यूर्विक का अनुभव है कि यदि कार्यपालक अपने अधीनस्थों को कार्यों का प्रत्यायोजन नहीं करते हैं तो वे संगठन दक्षतापूर्वक कार्य नहीं करते हैं। कार्यपालकों में उत्तरदायित्व में प्रत्यायोजन की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है, जिन्हें प्राधिकार सौंपे गए हैं। उनमें निम्नलिखित गुण हैं

(i) वे पूर्ण हो MPA 12 Free Assignment In Hindi
(ii) वे अपने अधीनस्थों की कार्यवाहियों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी हो।

प्राधिकार से तुल्य उत्तरदायित्व का सिद्धान्त –– इस सिद्धान्त की मान्यता है कि प्राधिकार और उत्तरदायित्व कोटर्मिनस, सहसमान और सुस्पष्ट होने चाहिए। फेयॉल ने उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

तथापि यूर्विक ने प्राधिकार उत्तरदायित्व संबंध के दोनों पक्षों पर विचार किया है। कुछ कार्यों के लिए लोगों को उत्तरदायी मानना पर्याप्त नहीं है

(1) आवश्यक यह है कि उन्हें उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए आवश्यक प्राधिकार प्रत्यायोजित हों।

(2) प्राधिकार का प्रयोग करने वाले सभी व्यक्तियों के उत्तरदायित्व उस प्राधिकार के अन्तर्गत पूर्णतः परिभाषित हों।

(3) प्राधिकार प्रयोगकर्ता व्यक्ति अधीनस्थों द्वारा की गई सभी कार्यवाहियों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी हो।

नियन्त्रण विस्तार का सिद्धान्त — नियन्त्रण विस्तार सिद्धान्त के अनुसार पर्यवेक्षक अधीनस्थों की कुछ संख्या से अधिक को नियन्त्रित नहीं कर सकता है।

यूर्विक के अनुसार.”कोई भी पर्यवेक्षक पांच से अधिक के कार्य का पर्यवेक्षण प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकता है या अधिक से अधिक अधीनस्थों के कार्य का पर्यवेक्षण तब कर सकता है, यदि उनका कार्य आपस में जुड़ा हुआ हो। इस सिद्धान्त का आधार मनोवैज्ञानिक अवधारणा “ध्यान का विस्तार” है।

कार्य विभाजन का सिद्धान्त — कार्य विभाजन के सिद्धान्त के अनुसार संगठन में दक्षता और प्रभाविकता लाने के लिए कार्य को विभाजित कर उन लोगों को सौंपा जाना चाहिए, जो उसमें विशेषज्ञ हैं।

गुलिक का अनुभव है कि कार्य विभाजन संगठन का आधारभूत सिद्धान्त है और यह संगठन के अस्तित्व का लक्ष्य है।

आधार :– MPA 12 Free Assignment In Hindi

1) गुलिक के अनुसार प्रत्येक विशाल मात्रा या जटिल उद्योग को उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुत से व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार जब कभी बहुत से व्यक्ति एक साथ काम करते हैं तो उस समय सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त किये जाते हैं जब इन व्यक्तियों में कार्य का विभाजन हो।

(2) मनुष्य ने संगठन का आविष्कार इस कारण किया, क्योंकि वह अकेले ही कार्य निष्पादन में सफल न हो सका। परिणामत: उसे कार्य का विभाजन करना पड़ा। वह कार्य विभाजन संगठन की उत्पत्ति का मूल कारण है।

(3) प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रवीणता, दक्षता और अभिरुचि में भिन्न-भिन्न होता है।

(4) एक ही व्यक्ति एक ही समय में दो स्थानों पर काम नहीं कर सकता। न ही वह एक ही समय में दो ड्यूटियां ही कर सकता है।

(5) भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में बढ़ते हुए ज्ञान के सन्दर्भ में भी कार्य विभाजन और भिन्न-भिन्न प्रकार का कार्य भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सौंपना अपरिहार्य है।

(6) कार्य विभाजन से संगठन में उत्पादन और दक्षता में वृद्धि होती है।

सीमाएं –– कार्य विभाजन की अपनी सीगाएं हैं। गुलिक ने निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण सीगाएं गिनाई हैं

(i) कार्य की मात्रा,

(ii) प्रौद्योगिकी,

(iii) रीति-रिवाज,

(iv) भौतिक सीमाएं, MPA 12 Free Assignment In Hindi

(v) जैविक सीमाएं,

(vi) काम बहुत कम होने पर उसका विभाजन नहीं हो सकता है,

(vii) कार्य के विभाजन हेतु उसे करने के लिए निपुणता सम्पन्न व्यक्ति उपलब्ध होने चाहिए,

(viii) विभाजित भागों के एकीकरण के बाद कार्य विभाजन होता है।

गुलिक के अनुसार कार्य विभाजन और एकीकरण अपने प्रयासों से अपनी स्थिति में सुधार करता है, जिससे मनुष्य जाति सभ्यता प्रक्रिया में स्वयं को अग्रसर करती है।

समन्वय का सिद्धान्त — इस सिद्धान्त के अनुसार कार्य के विभाजित किये जाने और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सौंपे जाने के पश्चात संगठन के नियत कार्यों को प्राप्त करने के लिए उस कार्य का समन्वय किया जाए। समन्वय मूलतः संगठन में विभिन्न व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य को एक साथ लाना है।

मनी ने इस सिद्धान्त के महत्त्व पर बल देते हुए स्वीकार किया कि समन्वय ही किसी भी मानव संगठन का आधारभूत सिद्धान्त हैं।

– उसके अनुसार शब्द संगठन और सिद्धान्त जो इसे नियंत्रित करते हैं, प्रत्येक प्रकार के सामूहिक मानव प्रयास में अन्योन्यक्रिया करते हैं, उस समय भी जब इसमें दो से अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते हैं।

उसने पत्थर हटाने के लिए दो व्यक्तियों के प्रयास का उदाहरण देकर कहा है कि यहां हमारे पास समन्वय है, यह संगठन का प्रथम सिद्धान्त है।”

पदानुक्रम का सिद्धान्त –– पदानुक्रम का निम्न स्तर के कार्मिकों पर उच्च स्तर के अधिकारियों का नियंत्रण निर्दिष्ट करता है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

प्रशासनिक संरचना में पदानुक्रम का तात्पर्य अनेक अनुक्रमिक स्तरों या सोपानों का ग्रेडयुक्त संगठन है। पदानुक्रम को स्केलर सिद्धान्त भी कहते हैं। पदानुक्रम के कार्य निम्नलिखित प्रकार हैं

(i) संगठन में व्यक्तियों को क्रम में रखता है।
(ii) यह संगठन में कार्य सरल प्रवाह को सुगम भी बनाता है।
(iii) आसान समन्वय नियंत्रण को सुगम बनाता है।

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भाग -॥

6 . फ्रेडेरिक हर्जबर्ग के अभिप्रेरण स्वच्छता सिद्धांत का परीक्षण कीजिए।

उत्तर– फ्रेडेरिक हर्जबर्ग अमेरिकी मनोवैज्ञानिक है। उसने निम्न प्रकार से विचार स्पष्ट किए हैं

(1) उसने प्रबंधकीय सिद्धांत और पद्धति के परंपरागत विवेक पर प्रश्न उठाया है।

(2) उसने कार्यस्थल पर मनुष्य के अभिप्रेरण की समस्या का अध्ययन किया। वस्तुतः हर्जबर्ग के कार्य का केंद्रीय क्रोड द्वितीय विश्व युद्ध से निकलता है जहाँ उसने यह अनुभव किया कि समाज उस समय उन्मादी हो जाता है जब उन्माद से स्वस्थचित्त संचालित होते हैं। MPA 12 Free Assignment In Hindi

(3) उसके अनुसार स्वस्थचित्तता को चरित्र और नैतिकता के मानवीय संतोष का पोषण करने के लिए उतना ही अधिक व्यावसायिक ध्यान आवश्यक है जितना व्यक्तित्व में अंतरों के लिए त्रुटिपूर्ण दिखाने के लिए होता है।

(4) हर्जबर्ग का उल्लेख है, “उन्मादी को भी देखभाल और क्षतिपूर्ति की आवश्यकता होती है परंतु उनकी उन्मादी क्रियाओं को कभी भी नैतिक रूप से उदासीन रणनीति से सुदृढ़ नहीं किया जाना चाहिए । मेरे सिद्धांतों का बल स्वस्थ चित्त रखने की रणनीतियों पर है।”

प्रमख रचनाएँ (Main Works)-फ्रेडेरिक हर्जबर्ग के मुख्य कार्य निम्न प्रकार हैं

(1) दी मोटिवेशन टू दी वर्क (1959). (सहलेखक)
(2) वर्क एंड दी नेचर ऑफ मैन (1966),
(3) दी मैनेजरियल च्वाइस : टू दी एफिसिएंट एंड टू बी ह्यूमैन (1976)।

अपने अभिप्रेरण सिद्धांत के विकास में, हर्जबर्ग पर अब्राहम मैस्लो, डगलॉस मैकग्रेगॉर और क्रिस आर्गिरिस के लेखों का प्रभाव पड़ा।

उसने कार्य पर सार्थक अनुभव और मानसिक स्वास्थ्य के मध्य संबंध का विश्लेषण किया। उसके अनुसार समस्त व्यक्तियों की आवश्यकताओं के निम्नलिखित दो सेट होते हैं

(1) पीड़ा का परिहार करना,
(2) मनोवैज्ञानिक रीति से प्रगति करना।

अभिप्रेरण स्वच्छता सिद्धांत — हर्जबर्ग ने संयुक्त राज्य अमेरिका के पिट्सबर्ग क्षेत्र में लगभग नौ कंपनियों से दो सौ इंजीनियरों और लेखाकारों के कार्य अनुभव के आधार पर अभिप्रेरण सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

इन लोगों को उस समय अनेक बार सोचने के लिए कहा गया था, जब उन्होंने अपने कार्यों के संबंध में अपवाद स्वरूप अच्छा या खराब अनुभव किया। MPA 12 Free Assignment In Hindi

उनकी प्रतिक्रियाएँ शीर्षक के अनुसार यह निर्धारित करने के लिए वर्गीकृत की गयीं कि किस प्रकार की घटनाओं से कार्य में संतुष्टि और कार्य में असंतुष्टि होती है।

अनुसंधान में निम्नलिखित का संयोजन प्रयुक्त किया गया है

(1) क्रांतिक घटना तकनीक,
(2) पूर्व प्रभावी पैटर्न साक्षात्कार और
(3) संतोष विश्लेषण।

द्देश्य — अनुसंधान के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे

(1) उन कारकों की पहचान करना, जिनसे कार्य के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक मनोवृत्ति हो सकती है।
(2) कार्य निष्पादन, उत्पाद, मानसिक स्वास्थ्य आदि पर इन मनोवृत्तियों के प्रभावों का अध्ययन करना।

अध्ययन इस बात पर केंद्रित किया गया था कि क्या कार्य संतुष्टि प्रकट करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कारक उत्तरदायी थे। यह अध्ययन इस अवधारणा को प्रमाणित करता है।

स्पष्टतः हर्जबर्ग का अनुसंधान अभिप्रेरण के पीछे कारकों अर्थात् कार्य संतुष्टि और कार्य असंतुष्टि के निर्धारकों को स्पष्ट करने का दावा करता है। उसके सिद्धांत में कार्य असंतुष्टि दोनों के लिए निम्न प्रकार पाँच सुदृढ़ निर्धारकों की पहचान की गयी है

8 . लोक चयन उपागम की अवधारण और विशेषताओं की चर्चा कीजिए।

उत्तर- राज्य और राजनीति के लोक चयन उपागम के बुनियादी तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है

राज्य का स्वरूप और उत्पत्ति — वर्तमान में लोक चयन यह जानकारी देने के अतिरिक्त सार्वजनिक निर्णयन सामूहिक निर्णयन प्रक्रिया का मार्गदर्शन करते हैं। ये संवैधानिक नियम हैं जो राजनीतिक क्रियाकलाप आरंभ करने से पहले निर्मित किये जाते हैं।MPA 12 Free Assignment In Hindi

लोक चयन सिद्धांतवादी राज्य और समाज के व्यवस्थित दृष्टिकोण के विरुद्ध तर्क देते हैं। उनके अनुसार समाज व्यक्तियों का समूह है जो इसे बनाते हैं।

इसी प्रकार, राज्य एक सजातीय व्यवस्थित पहचान न होकर राजनेताओं, प्रशासकों और अन्य अधिकारियों तथा कार्मिकों का समूह है।

समाज विज्ञानियों को चाहिए कि उस संरचना का अवलोकन करें जिसके अंतर्गत राजनीतिक निर्णय लिये जाते हैं। निश्चित नियमों के अंतर्गत वैकल्पिक आर्थिक नीतियों के प्रभाव पर दृष्टिपात करने से पूर्व समाज विज्ञानियों को राज्य और राजनीतिक उपकरणों की संरचना का विश्लेषण करना चाहिए।

सर्वप्रथम व्यक्ति और राज्य के मध्य संबंध का अन्वेषण करें और देखें कि लोग सहयोग किस कारण करते हैं तथा समाज में विनिमय (आदान-प्रदान) में क्यों संलग्न होते हैं।

आर्थिक नीति के ‘संविधान का अवलोकन करें। लोक चयन सिद्धांतवादी राजनीति के विनिमय मॉडल पर बल देते हैं परंतु विनिमय में परिणाम की अपेक्षा प्रक्रिया पर बल दिया जाना चाहिए।

इस प्रकार का कोई बाह्य प्राधिकार नहीं है जो परिणाम को देखें कि यह सक्षम है। इससे समाज के संविदात्मकवादी दृष्टिकोण की उत्पत्ति होती है।MPA 12 Free Assignment In Hindi

लोक चयन सिद्धांतवादियों ने सामूहिक चयन पर विचार व्यक्त करते हुए बताया कि समाजों में सामूहिक निर्णय किस प्रकार लिए जाते हैं

(1) लोग प्रायः अपनी रणनीतियों को कुछ संभावित लाभ प्राप्त करने अथवा इस पर बल देते हैं।
(2) कुछ उद्देश्यों को पूरा करने हेतु समन्वित करने की आवश्यकता अनुभव करते हैं।

मेक्कर ओल्सनने सर्वप्रथम यह जानकारी देने का प्रयास किया कि सामूहिक अथवा कार्रवाई अत्यंत सफल न होने की संभावना उस समय अधिक होती है जब समूह का आकार बड़ा हो ।

सार्वजनिक हित एक सार्वजनिक वस्तु है जिसका लोग निःशुल्क प्रयोग करेंगे अर्थात् बिना कोई कीमत दिए लाभ प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। समूह जितना बड़ा होगा, व्यक्ति को उतना ही कम लाभ मिलेगा।

अतः उद्देश्य की विशेष पूर्ति के लिए अपेक्षित किसी व्यक्ति की समूह कार्यकलाप में भाग लेने की संभावना कम होती है। समूह जितना छोटा होता है, उतना ही समूह कार्यकलाप सफल होने की अधिक संभावना होती है।

लोक चयन सिद्धांतवादी विचारकों का मत है कि अनेक क्षेत्रों में सार्वजनिक हित पर विशेष समूहों का खतरा रहता है। MPA 12 Free Assignment In Hindi

अनेक मामलों में लॉबियाँ और दबाव समूह संगठित होकर आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया का प्रयोग करते हैं जो सामाजिक दृष्टिकोण से कार्यकुशल नहीं होती और जिसकी कीमत असंगठित लोगों को चुकानी पड़ती है।

सार्वजनिक हित समूह और लॉबियाँ होने पर परिणाम अनुचित होने के साथ-साथ अनुकूल नहीं होता । सार्वजनिक हित सार्वजनिक कल्याण (वस्तु) है और यह स्वाभाविक है कि निजी रूप से उत्पादित वस्तु की कम आपूर्ति होगी।

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