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MPA 11

राज्य, समाज और लोक प्रशासन

MPA 11 Free Assignment In Hindi

MPA 11 Free Assignment In Hindi jan 2022

1. राज्य के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों की संक्षिप्त में चर्चा कीजिए।

उत्तर- 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में राज्य के सिद्धांतों को एक प्रामाणिक पहचान मिली और यह सैद्धांतिक रूप से श्रेष्ठ बन गया। राज्य के अध्ययन पर विभिन्न परिप्रेक्ष्यों द्वारा दृष्टि डाली जाती है, जोकि उसे व्यक्तिवाद समकालीनवाद और सार्वभौमिकता के आधार पर इसकी प्रमाणिकता की जाँच करती है।

हालाँकि, राज्य के अध्ययन पर विचारों की अधि कता के कारण इसकी मल विशषताएँ सम्मिश्रित हो गई हैं। हर परिप्रेक्ष्य राज्य को पृथक रूप से परिभाषित करता है, जिसके कारण किसी भी सामान्य निष्कर्ष तक पहुँचना कठिन है, और समकालीन राज्य की एक अमिश्रित तस्वीर अब भी उभरकर नहीं आ सकी।

तीन विचारधाराएँ या परिप्रेक्ष्य जिन्होंने राज्य के स्वरूप को प्रधान रूप से परिभाषित किया है, वे है – उदारवादी, मार्क्सवादी व नव-उदारवादी

(1) उदारवादी परिप्रेक्ष्य- अनेक विद्वानों का मत है कि उदारवादी परिप्रेक्ष्य में ही राज्य का आविर्भाव हुआ। उनके विचार उनके “प्राकृतिक अवस्था” के विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें मनुष्य को एक विशिष्ट दृष्टिकोण से देखा जाता है और वह उन्हें एक सुरक्षात्मक व्यवस्था (चाहे वह व्यक्तियों या फिर व्यक्ति समूह के रूप में हो) के निर्माण हेतु प्रेरित करता है, MPA 11 Free Assignment In Hindi

ताकि व्यक्ति अपने जीवन, सपंत्ति व अपने व्यक्तिगत हितों की रक्षा कर सके । राज्य के आविर्भाव के सभी सिद्धांत यह दर्शाते हैं कि व्यक्ति ने अपनी सुविध गाओं व शक्तियों को राज्य जैसी संस्था के निर्माण हेतु समर्पित कर दिया; ताकि वे अपनी सुरक्षा (जीवन, संपत्ति व स्वतंत्रता के प्रसार की सुरक्षा) कर सके ।

इसके साथ ही सेवाओं व वस्तुओं की उपलब्धता की एक सरल प्रणाली विकसित हो सके। उदारवाद एक विशिष्ट विचारधारा के रूप में विकसित हुआ, जिसने राज्य को केवल तभी स्वीकार किया, जब वह मानव प्रकृति व न्याय के सार्वभौमिक स्तर के प्रति उदार दष्टिकोण रख सका।

उदारवादी विचार ने ‘कानून के शासन’ का समर्थन किया, क्योंकि इसके द्वारा ही नागरिकों को स्वेच्छाचारी शासन से बचाया जा सकता है तथा व्यक्ति को अपने निजी हितों व संपत्ति व समद्धि प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र छोड़ा जा सकता है।

पूर्व उदारवादियों जॉन लॉक, मांटेस्क्यू, डेविड ह्यूम, एडम स्मिथ, जेम्स मिल और जेर्मी बेंथम ने लोकतंत्र का समर्थन किया, क्योंकि यही व्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य की बढ़ती हुई शक्तियों से सुरक्षित करने में सर्वाधिक उत्तम तरीका था।

नव-शास्त्रीय उदारवादियों जैसे वेलफ्रेडो पैरेटो, मैक्स वेबर, एमिल दुरखाईम, लुडविग वान माईसिस एवं फेडरिक वॉन हायेक आदि ने भी श्रम व वस्तुओं के लिए मुक्त बाजार को बनाए रखने के लिए राज्य की भूमिका को कम करने की वकालत की।

हालाँकि, इन विचारकों के उदाहरण के लिए पैरेटो ने पहले के उदारवादी दार्शनिकों द्वारा बाजार-तंत्र के नैतिक फायदों को निर्देशित किया ।

बाजार की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि यह लोकतंत्र की अपेक्षा कम से कम भ्रष्ट हो और अधिक से अधिक तटस्थ हो, ताकि व्यक्ति की प्राथमिकताएँ दृष्टिगत हो सके, तथा संतुष्टि के एक उत्तम स्तर को प्राप्त किया जा सके। MPA 11 Free Assignment In Hindi

स्ट्रियन स्कूल (माएसिस व हायेक – ने मेक्रो-इकोनोमिक थ्योरी की विश्लेषणात्मक प्राथमिकताओं पर जोर दिया, और इसके पक्ष को अस्वीकार कर दिया तथा अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप पर प्रश्न उठाया। राज्य पर मैक्स वेबर के विचार आस्ट्रियन स्कूल के समरूप ही थे।

20वीं शताब्दी के अंत में उदारवादियों ने स्वतंत्रता व समानता के उदार मूल्यों को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ा और साथ ही कार्यकुशलता की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा ।

जॉन रॉल्स व रॉबर्ट नोजिक ने इसी विचारधारा के अंतर्गत लिखा। इस प्रस्तावना से ही नव-उदारवाद या फिर नव-अधिकार दर्शनशास्त्र आगे सूत्र बढ़ाते हैं।

जॉन लॉक की प्राकृतिक अवस्था एक ऐसी अवस्था थी, जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता व समानता थी। परंतु उसने भी व्यक्तियों के मध्य विरोधों की संभावना को अस्वीकार नहीं किया, इसलिए एक तर्कयुक्त व सीमित समझौते पर विचार किया गया, जोकि रक्षा व जीवन, स्वतंत्रता व समानता की वृद्धि की गारंटी दे सके ।

वस्तुतः यह संपत्ति का सामाजिक स्वरूप था, जिसने लॉक को एक न्यूनतम राज्य (जिसमें सीमित सरकार व व्यक्तिगत अधिकारों का महत्त्व हो) का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया।

जे मर्मी बेंथम ने अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण की भावना में विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने आधुनिक राज्य के विचार को एक आदर्श माना।

उनके लिए राज्य एक कानूनी सत्ता और व्यक्तिवाद इसका नैतिक आधार था। उन्होंने स्वतंत्रता के स्थान पर कल्याण को राज्य का अंतिम उद्देश्य माना, और एक ऐसी संस्था पर जोर दिया, जो कानूनी व्यवस्था का समर्थन करे, विशेष रूप से सार्वजनिक सेवाओं के नौकरशाहीकरण और वैधानिकीकरण को एक निरंतर व विविधता और परिवर्तनों का अनुसरण करने की प्रक्रिया मानते हुए।MPA 11 Free Assignment In Hindi

(2) मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य मार्क्सवादी सिद्धांत के दृष्टिकोण में, पॉल स्ट्रीटन के अनुसार, सरकार केवल शासक वर्ग की एक कार्यकारी समिति होती है और केवल इसी वर्ग के आर्थिक हितों की पूर्ति करती है। राज्य शासक वर्ग के हितों के अनुरूप कार्य करता है।

यह राज्य का कार्य है कि वह शासक वर्ग के अंतर्गत हितों की विभिन्नताओं के मध्य एकता स्थापित करे, ताकि यह अपनी शक्ति व उत्पादन की पूँजीवादी प्रणाली बनाए रख सके। केवल सामाजिक वर्गों के नाश और अंततः राज्य के अंत द्वारा ही लोकतंत्र की स्थापना की जा सकती है।

राज्य व राज्य की शक्तियों को संपत्ति संबंधों दृग्विषय के रूप में वर्णित किया गया। बाद के मार्क्सवादियों के दृष्टिकोण से राज्य को कुछ संस्थाओं का योग माना गया और इसके वर्ग-व्यवस्था के बारे में कोई सामान्य अवधारणा नहीं बनाई जा सकी।

इस प्रकार वर्ग व राज्य के मध्य संबंधों के बारे में मार्क्स के दो विचारबिंदु हैं। डेविड हेल्ड के अनुसार, पहला विचारबिंदु इस बात पर जोर देता है कि सामान्यतः राज्य और विशेष रूप से नौकरशाही संस्थाएँ.अनेक रूप ले सकती हैं और शक्ति के सोत का निर्माण कर सकती है,

जोकि आवश्यक नहीं कि प्रत्यक्ष रूप से शासक वर्ग के हितों से संबंधित हो अथवा शासक वर्ग के नयंत्रण में हो। इस आ गार पर राज्य वर्गों से स्वतंत्र होकर शक्ति के एक स्तर को धारण करता है; इसका संस्थागत रूप और संचालक तत्त्व प्रत्यक्ष रूप से वर्ग-शक्ति द्वारा निर्धारित नहीं होते, वे स्वतंत्र होते हैं।

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3 चिल्का आंदोलन के विशेष संदर्भ में लोगों के संघर्ष के महत्व की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- भारत में आजीविका के संसाधनों के व्यावसायीकरण के विरुद्ध समाज के निर्धन एवं कमजोर वर्गों द्वारा विरोध किया जा रहा है, 1990 के आरंभ में, मछुआरों द्वारा ‘चिल्का बचाओ’ नाम से एक आंदोलन चलाया गया, जिन्होंने अपने क्षेत्र में समन्वित श्रिम्प कृषि परियोजना को लागू करने का विरोध किया।

इसे झील के आस-पास निवास करने वाले मछुआरों की जीविका के लिए एक खतरा माना गया । इस आंदोलन को छात्रों, बुद्धिजीवियों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा सक्रिय समर्थन मिला।

मछुआरे क्षेत्र को 5 भागों में विभाजित किया गया था : (1) जानो’, (ii) खारी’, (iii) बहान’, (iv) ‘दियान’ और (v) ‘उथापनी’। मछआरों का मछली पकड़ने का कार्य उनकी जाति पर आधारित था। ‘केऊता’ जाति में 68 प्रतिशत मछआरे थे जोकि जाल द्वारा मछली पकड़ते थे। MPA 11 Free Assignment In Hindi

ब्रिटिश काल के दौरान, चिल्का झील ‘परीकुडा’ व ‘खालीकारा’ के राजाओं के हाथों में थी। 1920 के दशक में मछुआरों को झील में जाने के लिए राजा को शुल्क देना पड़ता था।

पुरी जिले में अतिक्रमण करने वाले लोगों को बलूगाँव से बाहर रखने तथा मछुआरों के हितों की रक्षा करने के लिए 24 सदस्यों वाली पहली कोऑपरेटिव सोसाइटी बालूगाँव मछुआरा कोऑपरेटिव स्टोर के नाम से स्थापित की गई।

1953 में रियासती राज्यों के उन्मूलन के बाद, यह जिला उड़ीसा सरकार के नियंत्रण में आ गया। उनके शासन के अंतर्गत, खुली नीलामी द्वारा, आँचल अधिकारी (सर्कल अधिकारी) द्वारा, मछली क्षेत्र को मछुआरों को पट्टे पर दे दिया गया।

यह प्रक्रिया 1959 तक चलती रही, जब तक कि केन्द्रीय सहकारी बाजार सोसाइटी स्थापित हुई। यह सरकार से मछली-क्षेत्र को पट्टे पर लेने की तथा प्राथमिक मछुआरा सहकारी समूह को उप-पट्टे पर देने की सर्वोच्च संस्था थी। इस प्रकार, यह व्यवस्था मछुआरों के अधिकारों की सुरक्षा देने वाली व्यवस्था थी।

तहसीलदार (एक खंड स्तर का अधिकारी) उन संसाधनों की नीलामी करता था, जिन्हें केन्द्रीय सोसाइटी पट्टे पर नहीं लेती थी। चिल्का पुनर्गठन स्कीम ने मछुआरों व गैर-मछुआरों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया।

1991 में, उड़ीसा सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसने चिल्का के मत्स्य क्षेत्र में मछुआरों को दो वर्गों में विभाजित कर दिया, ये थे ‘केप्चर’ (मछली पकड़ने वाले मछुआरे) और क्लचर’ (मछली का संपोषण और व्यापार करने वाले गैर मछुआरे)। MPA 11 Free Assignment In Hindi

केप्चर अधिकार मछुआरों से संबंधित थे, जबकि कलचरिंग गैर-मछुआरों व ग्रामीणों से संबंधित थे, जो प्राथमिक सहकारी सोसाइटी के सदस्य नहीं थे।

क्योंकि सरकार के आदेश ने केप्चर व कल्चर – के कार्य संचालन के लिए निर्देश नहीं दिए थे, इसलिए स्वविवेकी शक्तियाँ कलेक्टर द्वारा उपयोग की जाती थी।

इस प्रकार इस नीति ने मछआरों के बीच भ्रमपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी राजस्व विभाग तथा प्राथमिक सोसाइटी के बीच झूलती केन्द्रीय सोसाइटी के पास सीमित शक्तियाँ थीं। अधिकतर प्राथमिक सोसाइटी ने केन्द्रीय सोसाइटी को पीछे छोड़कर सीधे रूप से कमीशन एजेंटों के द्वारा बेचने का कार्य शुरू कर दिया।

इस प्रकार, दोहरी सरकारी संरचना का उद्देश्य लगभग दोषपूर्ण था। 1980 के दशक से ही चिल्का झील में केन्द्रीय व प्राथमिक सोसाइटी द्वारा पट्टे पर लिए गए मछुआरे क्षेत्र को अन्य लोगों को किराये पर देने तथा बाहरी लोगों द्वारा इस पर अवैध अतिक्रमण देखे गए। मत्स्य-संस्कृति के बड़े स्तर पर व्यवसाय ने परंपरागत मछुआरों के जीविकोपार्जन पर खतरा उत्पन्न कर दिया तथा साथ ही साथ झील की जैविक-व्यवस्था पर भी खतरा पैदा किया।

हजारों की संख्या में मछुआरों व गैर-मछुआरों को अपने जीविका से हाथ धोना पड़ा। इस पृष्ठभूमि के तहत्, उड़ीसा सरकार ने टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी से एक संयुक्त सेमी-इन्टेन्सिव प्रॉन कल्चर प्रॉजेक्ट अनुबंध किया, जिसने चिल्का क्षेत्र की 400 हेक्टेयर भूमि पर अधिकार कर लिया। लोगों ने इस प्रस्ताव का स्वागत नहीं किया। MPA 11 Free Assignment In Hindi

5 लोक प्रशासन व विकास की ओर जेन्डर संवेदनशीलता के दृष्टिकोणों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर– लोक प्रशासन व विकास की और जो संवेदनशीलता है, उसमें जेन्डर के मुद्दे को सम्मिलित किया गया है तथा 1980 में लोक प्रशासन में महिलाओं के मुद्दे को एक प्रमुख सैद्धांतिक मुद्दे के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस समय महिलाओं के सशक्तीकरण की प्रक्रिया चल रही थी।

ब्यूविनिक और ग्रीवे के अनुसार महिलाओं के प्रति नीतियों में बदलाव आते रहें, ‘कल्याण’ से ‘समानता’ और ‘समानता’ से ‘निर्भरता विरोधी’ ।

निर्धन देशों की विकास नीतियों ने दो अन्य विचारधाराओं को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया-‘कार्यकुशलता’ और सशक्तीकरण ।

ओस्टरगार्ड के शब्दों में, “सामाजिक समता की विचारधारा के अनुरूप विकास प्रक्रिया में महिलाएँ सक्रिय सहभागी हैं। बस विचारधारा ने रणनीतिक दृष्टि से जेन्डर की आवश्यकताओं को पहचाना तथा विकास को न्याय एवं समता के साथ जोड़ा।”MPA 11 Free Assignment In Hindi

वस्तुतः सशक्तीकरण की विचारधारा ने ‘नीचे से ऊपर’ की विचारधारा के उपयोग पर बल दिया, ताकि महिलाओं को ज्यादा-से-ज्यादा जागरूक बनाया जा सके। इस बात का भी प्रयास किया गया कि केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों द्वारा क्रियान्वित किए जाने वाले कार्यक्रमों में महिलाओं की अधिकाधिक सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाए।

73वें एवं 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 द्वारा पंचायती राज संस्थाओं और नगर पालिकाओं में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित किया गया।

(1. आर्थिक सशक्तीकरण – विश्व की कुल महिला जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत निर्धनता रेखा से नीचे है। इनमें से अधिकांश अत्यंत गरीबी की स्थिति में रह रही हैं। इन्हें गरीबी की स्थिति से उबारने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए :–

(1) संपत्ति पर महिलाओं के स्वामित्व एवं नियंत्रण को बढ़ाया जाए।

(2) सामुदायिक प्रबंध में महिलाओं की सहभागिता में वृद्धि की जाए।

(3) निर्धनों एवं निराश्रितों की क्षमता में विस्तार किया जाए।

(4) पूँजी संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाए।

(5) नए कौशल, नई तकनीक एवं दक्षता के स्थानीय स्तर पर सही प्रयोग किया जाए।

(6) आर्थिक अवसरों एवं आधारभूत सामाजिक सेवाओं का निर्माण किया जाए।

(7) स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना एवं स्वयंसिद्ध जैसे सरकारी कार्यक्रमों को इस प्रकार लागू किया जाए कि अधिक-से-अधिक महिलाओं को इसका अधिकतम लाभ मिल सके।

महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए यह जरूरी है कि उन्हें विभिन्न निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के अंतर्गत स्व-सहायता समूहों में प्रबंधित किया जाए। MPA 11 Free Assignment In Hindi

इन कार्यक्रमों में स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना’, ‘राष्ट्रीय महिला कोष’, ‘प्रशिक्षण एवं रोजगार के लिए समर्थन’, महिलाओं के लिए प्रशिक्षण उत्पादन केन्द्र’ आदि प्रमुख हैं। महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी क्षमताओं एवं आय संबंधी समर्थता को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है।

अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएँ पूरे कार्य के 90 प्रतिशत से भी अधिक भाग में अपना योगदान देती हैं। इन महिलाओं को अच्छी कार्य दशाएँ, न्यनूतम मजदूरी, अवकाश आदि के संबंध में विशेष संरक्षण दिए जाने की जरूरत है।

राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके कर्मचारी महिलाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को निभाएँगे, बल्कि सुरक्षा सुविधाओं का विस्तार करेंगे, व्यावसायिक खतरों से उनकी सुरक्षा करेंगे तथा मातृत्व लाभ एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएँगे।

राज्य द्वारा महिलाओं को खादी एवं ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम कीट का पालन एवं लघु-उद्योग के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

( 2. स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति :-– महिलाओं, विशेष रूप से निर्धन महिलाओं और बच्चों की स्थिति में सुधार लाने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। प्रसवकाल के दौरान अच्छी तरह से देखभाल की जरूरत होती है।

इसके लिए गर्भावस्था के पहले पंजीकरण करा लेना चाहिए। समय-समय पर गर्भवती महिलाओं की जाँच होनी चाहिए। अभिक्रिया और उच्च रक्तचाप की स्थिति से बचने के लिए समुचित जाँच कराना जरूरी है।

सुरक्षित मातृत्व के लिए आवश्यक देखभाल संयुक्त राष्ट्रसंघ के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों का एक अंग है, जिसे भारत में भी लागू किया गया है।MPA 11 Free Assignment In Hindi

स्त्री और पुरुष के बीच पोषण के संदर्भ में भेदभावपूर्ण व्यवहार अपनाने के कारण महिलाओं और किशोरियों के पोषण तत्त्व की कमी देखी गई है।

यही कारण है कि ये विभिन्न स्तरों पर नवजात, पूर्व-बाल्यकाल, किशोरावस्था और मातृत्त्व के काल में अनेक प्रकार की बीमारियों का शिकार होती हैं।

अतः महिलाओं में विशेष तौर पर गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं में कुपोषण को दूर करने के लिए विशेष प्रचार की जरूरत है

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भाग-॥

7 लोक प्रशासन पर वैश्विकरण के प्रभाव पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- वैष्ठवीकरण के कारण नई सामाजिक अपेक्षाओं का उदय हुआ है मूल्यों में परिवर्तन आए हैं, और राज्य एवं ष्टासन-व्यवस्था के स्वरूप बदल रहे हैं। इसका सीधा प्रस्ताव लोक-प्रष्ठासन पर पड़ा है और उस पर परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए दबाव डाला जा रहा है।

सचना प्रौद्योगिकी में आई क्रांति ने प्रष्ठासनिक प्रक्रियाओं के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। व्यापार के मार्ग में आने वाली रुकावटों को हटाने में कॉरपोरेट जगत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

पी.सर्नी के अनुसार ‘बदलते वैष्ठवीकृत, अंतर्राफ्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय परिवेष्ठा में राज्य अपने खुद के परिवर्तन का अभिकर्ता मात्र ही नहीं, वरन् वैष्ठवीकरण के विकास का मुख्य स्रोत भी है।’

नव-उदारवाद की अवधारणा निजीकरण, आर्थिक उन्मुखीकरण और सार्वजनिक वस्तुओं पर सरकारी व्यय में कमी आदि का समर्थन करती है।MPA 11 Free Assignment In Hindi

ये सभी तत्त्व वैष्ठवीकरण की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने में सहायक हैं। वैष्ठवीकरण के कारण व्यापार, वित्त और निवेष्ठा में व्यापक विस्तार हुआ है। तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति आई है और उच्च-स्तरीय उपभोक्ता की माँग में गणनात्मक एवं गुणात्मक दोनों ही रूपों में वष्टद्धि हुई है।

राज्यकीबदलतीभमिका – वैष्ठवीकरण के कारण राज्य की पारंपरिक भूमिका में महत्त्वपूर्ण बदलाव आए है, राज्य हमेष्ठा से सामाजिक-ठासन का केंद्र बिंदु रहा है। पारंपरिक तौर पर, कई राज्ट्रों ने लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को अपनाया, जोकि एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है,

जिसमें जन कल्याण के प्रति उच्च स्तर की जिम्मेदारी का बोध होता है। लोक प्रष्ठासन का बाजारोन्मुखी अभिगम एक ‘प्रतिस्पर्धी राज्य’ की ओर अग्रसर हो रहा है, जो स्थानीय, राजनीतिक तथा प्रष्ठासनिक संस्कष्टतियों से अलग, लोक-चयन, विनियमीकरण तथा निजीकरण को प्रोत्साहित करता है।

पी. सर्नी (1997) प्रतिस्पर्धी-राज्य को एक मुख्य रूप से पदानुक्रमिक व गैर-वस्तुतीकरण अभिकर्ता से, प्रमुखतः एक बाजार-आधारित वस्तुतीकरण अभिकर्ता के रूप में परिवर्तन के तदत परिभाजित करते हैं।

राज्यसंस्थानोंकीजवाबदेही- वैष्ठवीकष्टत राज्य के बारे में यह आष्ठांका व्यक्त की जाती है कि यह अपने कुलीन तंत्रीय नीतियों के द्वारा आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाला है, लेकिन राज्य संस्थान लोगों की जरूरतों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सुनिष्ठिचत कर इस आष्ठांका को खत्म कर सकता है।

‘गरीबी पर आक्रमण’ टीज़ंक से प्रकाष्ठिात विष्ठव विकास रिपोर्ट – में यह रेखांकित किया गया है कि लोक प्रष्ठासन को नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करना चाहिए, MPA 11 Free Assignment In Hindi

लोगों की जरूरतों के प्रति जिम्मेदार व जवाबदेह होना चाहिए तथा वंचित व जरूरतमंद लोगों के बीच संसाधनों का पुनर्वितरण करने का प्रयास करना चाहिए।

‘बाजार के लिए संस्थानों का निर्माण’ नाम से प्रकाष्ठिात विष्ठव विकास रिपोर्ट (2002) ने विचार व्यक्त किया है कि कमजोर संस्थान, विकष्टत कानून, भ्रज़्ट न्यायालय, पूर्वाग्रहों से ग्रसित उधार-व्यवस्था तथा लालफीताष्ठाही आदि ऐसे कारक हैं, जो गरीब लोगों को चोट पहुंचाते हैं तथा विकास को बाधित करते हैं।

इन समस्याओं से प्रभावित देष्ठों ने इन समस्याओं के हल हेतु सूक्ष्म आवष्ठयकता पूर्ति हेतु संस्थानों को स्थापित कर लिया, जो आय में बढ़ोतरी करते हैं तथा गरीबी को कम करते हैं।

9 राज्य, बाजार और नागरिक समाज के बीच संबंध की चर्चा कीजिए।

उत्तर- राज्य, बाजार और नागरिक समाज एक-दूसरे को परिभाषित एवं सीमित करते हैं और एक-दूसरे के पूरक है। राज्य व नागरिक समाज के मध्य समकालीन संबंध परंपरागत उदारवाद की देन है। उदारवादी विचारधारा नागरिक समाज को लोकतांत्रिक राज्यों की एक आवश्यकता बताती है।

उदारवाद को ध्यान में रखते हुए, यह देखा गया कि उसके साथ सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच का भेद भी है। लोक या सरकारी क्षेत्र प्रतिनिधि सरकार और विधि के शासन पर आधारित है।

निजी क्षेत्र व्यक्तिगत कार्यों, अनुबंध और बाजार के आदान-प्रदान का वह क्षेत्र है, जोकि राज्य के सुरक्षा दायित्वों की परिधि में आते हुए भी उससे स्वतंत्र होते हैं।MPA 11 Free Assignment In Hindi

जोएल मिगदल के अनुसार, राज्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों से घिरा हुआ है व इनके द्वारा परिवर्तित होता है। उनके अनुसार, समाज भी राज्य के प्रभाव के कारण बदल गया है।

सामाजिक संगठन और समाज का संपूर्ण ढाँचा, राज्य द्वारा दिए गए अवसर और बाधाओं द्वारा परिवर्तित हुआ है, बिल्कुल वैसे ही जैसे राज्य अन्य सामाजिक संगठनों से प्रभावित है, या विश्व की अर्थव्यवस्था द्वारा दी गई छूट या सीमा से प्रभावित है नीरा चन्दोक (1995) के विचारों में, वह क्षेत्र, जिसमें समाज राज्य से परस्पर संबंध रखता है,

उसे नागरिक समाज की संज्ञा दी जा सकती है। इसके साथ ही यह एक ऐसे आम क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जिसमें आम जनता स्वयं द्वारा परिभाषित ध्येयों की संयुक्त क्षेत्र और एक जैसे मुद्दों के आधार पर पूर्ति करती है।

(1) ऐसा क्षेत्र, जोकि अपने में निवास करने वालों और उनके संबंधों को चर्चाओं द्वारा, ना कि नियंत्रण द्वारा संपोषित करता है।MPA 11 Free Assignment In Hindi

(2) यह माना जाता है कि चर्चाएँ आम होंगी, ताकि वे सभी के लिए उपगम्य हो सके।

(3) यह क्षेत्र नियमानुसार स्थापित राज्य के दूरसंचार माध्यमों से बाहर रहकर कार्य करेगा, जिसमें स्वतंत्र व निष्पक्ष चर्चाएँ हो पाएँगी। इस क्षेत्र के निवासी नए पहलुओं और नई संस्थाओं द्वारा स्थापित सामाजिक रिश्तों से जुड़े रहेंगे।

समकालीन नागरिक समाज, राज्य के साथ ज्यादा व व्यापक रूप से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। साथ ही, नए सामाजिक आंदोलनों द्वारा दिया गया नागरिक समाज का नया रूप भी, जैसा कि विश्लेषित किया गया है, आधुनिक राज्य उपकरण की मान्यता को गलत या कम नहीं ठहराता है।

नागरिक समाज की एक अन्य आवश्यक विशेषता के अनुसार, इन्हें गैर-सरकारी संगठनों से बदला जाता है। हालाँकि, गैर-सरकारी संगठन, नागरिक समाज का एक बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है, पर इसके उपरांत वे नागरिक समाज के संगठनों का संपूर्ण सप्तक नहीं है।

गैर-सरकारी संगठन, नागरिक समाज का एक मुख्य एवं वृहद् अंग है और इसी कारण इनका भी अध्ययन किया जाना चाहिए। सार्वभौमिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए हमें इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए कि ये गैर-सरकारी संस्थाएँ स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह काम करती है।

जूली फिशर ने दो प्रकार के गैर-सरकारी संगठन बताए हैं-

(1) स्थानीय स्तर पर स्थापित संस्थाएँ ) MPA 11 Free Assignment In Hindi

(2) राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर स्थापित विकास संबंधी सहयोग प्रदान करने वाली संस्थाएँ आमतौर पर व्यावसायिक कर्मचारियों की भर्ती करती है, जोकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा को स्थानीय स्तर तक पहुँचाते हैं और इसमें स्वयं का विकास सम्मिलित नहीं होता है।

दो मुख्य प्रकार की स्थानीय संस्थाएँ हैं-स्थानीय विकास से संबंधित संस्थाएँ और लाभकारी संस्थाएँ,जोकि समाज के एक समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं। तीसरे प्रकार के में कर्ज लेने वाले समूह, सहयोगी संस्थाएँ आदि शामिल हैं, जोकि कभी-कभी लाभ के लिए कार्य कर सकते हैं।

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