IGNOU MHI 03 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

MHI 03

MHI 03 Free Assignment In Hindi

MHI 03 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

भाग क

प्रश्न 2. कारण-कार्य सम्बन्ध क्या है? किसी ऐतिहासिक घटना की व्याख्या करने के लिए इतिहास कार जिस प्रकार कारण-कार्य सम्बन्ध का उपयोग करते हैं उसकी विवेचना कीजिए।

उत्तर. किसी घटना के घटित होने में जो परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं, उन्हें कारण कहा जाता है। कार्य और कारण को हम एक सिक्के के दो पहलू भी कह सकते हैं, क्योंकि बिना कारण के कोई कार्य या घटना नहीं हो सकती और यदि कोई घटना घटित हुई है,

तो उसका अवश्य ही कोई-न-कोई कारण होगा। ई.एच. कार ने लिखा है कि अतीत की घटनाओं की क्रमबद्धता देना तथा कारण और परिणाम के पारस्परिक संबंधों को क्रम से प्रस्तुत करना ही इतिहास है।

कार लिखते हैं कि इतिहास का अध्ययन कारणों का अध्ययन है। इतिहासकारों द्वारा कारणों की खोज इसलिए की जाती है, क्योंकि वर्तमान का निर्माण अतीत की नींव पर हुआ है। इस प्रकार वर्तमान का कारण अतीत है, कारणों के अभाव में किसी परिणाम की खोज इतिहास के उद्देश्यों की उपेक्षा सम जाएगी।

अत: इतिहासकार का उद्देश्य घटना में छिपे हुए कारणों को ढूंढ निकालना है। अरस्तू ने कार्य-कारण के संबंध में कहा है कि कारणों के अभ. में किसी भी घटना का होना या कार्य करना संभव नहीं है।

इतिहास के प्रणेता हेरोडोटस भी कार्य-कारण संबंध को सहमति देते हैं। उन्होंने अपने एक ऐतिहासिक ग्रंथ में लिखा है कि उनके इतिहास-लेखन का उद्देश्य ग्रीक तथा बर्बर जातियों की उपलब्धियों को सुरक्षित रखना तथा पारस्परिक युद्धों के कारणों की व्याख्या करना है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

यूनानी इतिहासकार थुसीदीदेस पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसे कार्य-कारण संबंधों का पूर्ण ज्ञान नहीं था। कार्य-कारण संबंध की सही रूप में व्याख्या मांटेस्क्यू ने की थी। उसने स्पष्ट किया कि प्रत्येक शासन के उत्थान और पतन के लिए कुछ नैतिक, भौतिक और सामान्य कारण उत्तरदायी होते हैं।

जी. बैरक लाफ कार्य-कारण के विषय में कहते हैं कि इतिहासकार को कारणों की चिंता नहीं करनी चाहिए, उसे मात्र परिणामों पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए,

परन्तु बैरक का यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि कारण के अभाव में खोज करना असंभव है। कार्य-कारण संबंध इतना घनिष्ठ है कि एक-दूसरे को पृथक् करना असंभव है।

कार्य-कारण संबंधी घटना के विषय में उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है कि कारण एक परिस्थिति है, जो किसी निश्चित घटना के होने के लिए अनिवार्य है और इसे अनिवार्य इसलिए कहा जाता है,

क्योंकि यदि कोई कारण नहीं होगा तो न ही कोई घटना होगी और न ही उसका प्रभाव होगा और यदि कोई कारण मौजूद हो तो वह एक निश्चित परिणाम देता है।

वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि विटामिन सी की कमी से स्कर्वी रोग होता है और उन सभी व्यक्तियों को स्कर्वी रोग नहीं होता, जिनमें विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में मौजूद था।

तो हम यह कह सकते हैं कि विटामिन सी की कमी से स्कर्वी रोग होता है। अतः विटामिन सी को हम कारण मान सकते हैं, क्योंकि विटामिन सी की अनुपस्थिति का मतलब है स्कर्वी रोग का होना।

इतिहासकारों द्वारा घटनाओं को सही अनक्रम में व्यवस्थित कर देने से ही घटना की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल जाती। यह पता नहीं चल पाता कि अम घटना क्यों हुई।

इसका पता लगाने के लिए यह आवश्यक होता है कि इतिहासकार इस बात का पता लगाए कि वे कौन-सी परिस्थितियाँ होती हैं, जिसका कारण घटना हुई। इसके साथ ही उस घटना का क्या प्रभाव पड़ा। _

इतिहास में विज्ञान के अनुभववादी सिद्धांतों में व्याख्या और अनुमान एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक को दूसरे का कारण भी माना गया है। कारण किसी घटना के होने के लिए पर्याप्त परिस्थिति है।

इसका अर्थ यह है कि जहाँ कारण मौजूद होगा वहाँ आवश्यक तौर पर कोई घटना अवश्य घटेगी। इतिहासकारों द्वारा किसी घटना के संबंध में सफल अनुमान को किसी व्याख्या की सत्यता का सूचक माना गया है।

इतिहासकार किसी आवश्यक कारण का पता लगाने के लिए किसी घटना की लगभग वैसी ही परिस्थितियों के साथ तुलना करते हैं और वैसी अनेक घटनाओं का मूल्यांकन कर यह पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि आवश्यक असर किसकी वजह से हुआ। MHI 03 Free Assignment In Hindi

इतिहासकार किसी भी घटना से जुड़े तीन प्रश्नों पर विशेष ध्यान देते हैं और उत्तर ढूँढने का प्रयास करते हैं। यह प्रश्न हैं कब, कैसे और क्यों। इन प्रश्नों के उत्तर खोजने और तदुपरांत उनका विश्लेषण करने से इतिहासकार किसी भी जानकारी की सच्चाई तक पहुँच सकते हैं।

इस विषय में दो बातें आवश्यक हैं। किसी घटना को क्रमवार तरीके से रख देने से किसी घटना की व्याख्या नहीं होती और न ही उसके प्रारंभ, मध्य और अन्त से कोई घटना पूर्ण होती है।

इसके लिए आवश्यक है कि किसी भी घटना की बाह्य संरचना की पहचान की जाए, जिससे किसी विशेष गतिविधि का जन्म होता है और विशेष नतीजे भी सामने आते हैं।

साथ ही घटना का विस्तृत रूप में वर्णन कार्य-कारण व्याख्या को नहीं बतला पाता, बल्कि इस समय उन परिस्थितियों का पता लगाया जाना आवश्यक है, जिसके कारण घटना घटी।

ऐतिहासिक घटना और साधारण घटना के बीच बहुत अंतर होता है। ऐतिहासिक घटनाओं में इस बात का पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि कोई विशिष्ट घटना क्यों घटी। यह आवश्यक है कि किसी भी घटना के लिए जिम्मेदार परिस्थिति एक क्षण भी हो सकती है।

इसके अलावा परिस्थितियों का एक जटिल समूह, ऐतिहासिक घटनाओं का, इतिहासकार द्वारा पूरी तरह से समझाया जाता है कि घटना कब, कहाँ और क्यों घटी। लेकिन इतिहासकार कभी भी भविष्यवाणी नहीं करते हैं।

कार्य-कारण संबंध उद्देश्यपरक होता है। इसमें कारण प्रारंभ में और प्रभाव कार्य-कारण के बाद आता है। इतिहासकार कारण का विश्लेषण करते हुए परिस्थितियों की व्याख्या करते हैं,

जिसके द्वारा कोई वांछित प्रभाव उत्पन्न होता है। अतः सामूहिकता के भीतर किसी परिस्थिति की पहचान के प्रभावों का पता लगाया जाता है। व्याख्याएँ हमें यह बताने का प्रयास करती हैं कि कोई भी विशेष घटना विशेष समय में क्यों घटित नहीं हुई?MHI 03 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 4. मुगल काल के दौरान इतिहास-लेखन की इन्डो-फारसी परम्परा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर. मुगलकालीन इतिहास-लेखन की मुख्य विशेषता सरकारी इतिहासकारों द्वारा इतिहास-लेखन है। मुगल शासकों द्वारा इस समय सरकारी इतिहासकार रखने की प्रथा की शुरुआत हो चुकी थी,

जिसे बाबर से लेकर औरंगजेब तक सभी मुगल शासकों ने कायम रखा। मुगलकालीन इतिहास-लेखन की दूसरी विशेषता यह थी कि शासकों द्वारा आत्मकथा का लेखन किया जाता था।

जहीरुद्दीन बाबर भारत में मुगल वंश का संस्थापक था। इसने 1526 ई० में लोदी वंश के शासक इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली का सुल्तान बना। वह एक शासक के साथ-साथ एक लेखक भी था।

उसके द्वारा लिखी गई ‘तुजक-ए-बाबरी’ या ‘बाबरनामा’ तुर्की में लिखी गई एक साहित्यिक कृति है। इस कृति में उसने मध्य एशिया में तैमूर के शासन, भारत के जनजीवन और भारतीय संस्कृति के विषय में लिखा है।

भारतीय शासकों के विषय में उसका जो लेखन है, वह वस्तुपरक नहीं लगता, क्योंकि उसने अपने लेखन में निष्पक्षता का परिचय न देते हुए भारतीय शासकों को विश्वासघाती कहा है, जबकि बाबर ने स्वयं उनको धोखा दिया था।

अपने संस्मरण में बाबर ने भारत के विषय में लिखा है। यह एक विशिष्ट रूप से सुंदर देश है। दूसरे देशों की तुलना में यहाँ की दुनिया निराली है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

यहाँ के पेड़, पहाड़, नदियाँ, वन, मैदानी भाग, जानवर, वनस्पतियाँ, निवासी, उनकी भाषाएँ, वर्षा आदि सभी अलग तरह के हैं। बाबर ने भारत की आर्थिक संपन्नता और देश में सोने-चांदी की अधिकता के विषय में भी लिखा है।

बाबर एक सफल पारखी था। इलियट ने बाबर के संस्मरण को एक सर्वोत्कृष्ट एवं विश्वसनीय आत्मकथा माना है। ‘बाबरनामा’ बाबर के काल का मौलिक स्रोत है।

इस ग्रंथ का फारसी भाषा में अनुवाद पायन्दा खां ने किया था। दूसरा अनुवाद अब्दुल रहीम खानखाना ने अकबर के आदेश पर किर था।

इसका अनुवाद अनेक यूरोपीय भाषाओं में भी हुआ, विशेषकर फ्रेंच और अंग्रेजी में। अंग्रेजी में किए गए अनुवादों में किंग लैडन तथा अरिस्कन का नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है।

अकबर के काल में इतिहास-लेखन में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया। अकबर ने सहस्राब्दी के पूर्ण होने पर इतिहासकारों के सामने इसके लेखन का प्रस्ताव रखा।

जिसमें पैगंबर से लेकर अकबर के समय तक का इतिहास लिखा जाना था, जो कि एक हजार साल तक का था। उसका नाम ‘तारीख-ए-इल्फी’ रखा गया। MHI 03 Free Assignment In Hindi

बाबर और हुमायूँ के काल की सूचनाओं को देने के लिए सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को कहा गया कि वे इन्हें पुस्तकीय रूप प्रदान करें।

अकबर के कहने पर बेगम वाजियात-वियात और जौहर आफ़ताबी ने लेखन कार्य किया। वाजियात ने हुमायूँ के जीवन की घटनाओं को इरान, काबुल और भारत में वर्णित किया।

उसकी रचना ‘तजकीरात-इ-हुमायूँ’ है। जौहर आफताबी ने हुमायूँ के जीवन की घटनाओं को ‘तजकीरात-उल-वाकियात’ में एकत्रित किया है। अकबर के शासनकाल की जानकारी के लिए ‘तारीख-इ-अल्फी’ तथा अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ प्रसिद्ध है।

अकबर ने सात विद्वानों की एक परिषद का गठन ‘तारीख-ए-इल्फी’ के लेखन के लिए किया, जिसमें प्रत्येक सदस्य को कालक्रम के आधार पर इतिहास लिखने को कहा गया।

अकबर ऐसा करके 15वीं शताब्दी के क्षेत्रीय राजाओं के विषय में संकलन करना चाहता था। 1585 ई. में यह कार्य संपूर्ण हो गया और अकबर के समक्ष इसे समर्पित किया गया।

परन्तु अकबर ‘तारीख-ए-इल्फी’ में किए गए संकलन से संतुष्ट न हुआ और उसने अबुल फजल से बाबर तक और बाबर से लेकर अपने शासनकाल तक का इतिहास फिर से लिखने को कहा।

अबुल फजल की सहायता के लिए दस लोगों को नियुक्त किया गया, जिन्होंने लेखन के लिए सामग्री एकत्रित की। अकबर ने इस कार्य के लिए अबुल फजल को इसलिए चुना, क्योंकि अबुल फजल अकबर के धार्मिक कार्यों से अवगत था।MHI 03 Free Assignment In Hindi

जहाँगीर के शासनकाल में इतिहास-लेखन को प्रश्रय दिया गया। उसने भी बाबर की तरह जीवनपयन्त लेखन का निश्चय किया था। अतः उसने अपने शासनकाल का इतिहास लिखने के लिए कई विद्वानों को नियुक्त किया था।

जहाँगीर ने अब्दुलहक को आपने शासनकाल का इतिहास लिखने को कहा, किन्तु वह बहुत वृद्ध था, अत: उसके पुत्र नसलहक न जब्दतत तवारीख में उस समय के इतिहास का सकलन किया जहाँगीर के समय में ‘तारीख-इ-खान-ए-जहानी’ का संकलन नेहमत-अल्लाह-हरबी ने किया था।

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके-जहाँगीरी’ लिखी है, जिसमें जहाँगीर के शासनकाल की विस्तृत जानकारी मिलती है।

शाहजहाँ के शासनकाल में मुतामद खान ने इकबाल नाम-ए-जहाँगीरी’ नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें जहाँगीर और नूरजहाँ के संबंधों तथा शेर अफगान के वध का विस्तृत विवरण है।

किसी अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ में शेर अफगान के वध का विवर उपलब्ध नहीं होता। अत: ‘इकबाल नाम-ए-जहाँगीरी’ ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।

ख्वाजा कामगार हुसैनी मुगल दरबार से संबंध रखता था। उन्होंने शाहजहाँ तथा जहाँगीर दोनों के शासनकाल में काम किया। उसकी रचना ‘मासिर-ए-जहाँगीरी’ थी, जिसके लेखन में हुसैनी ने ‘तुजुके-ए-जहाँगीरी’ की सहायता ली।MHI 03 Free Assignment In Hindi

अकबर के शासनकाल में जिस तरह से अबुल फजल द्वारा ‘अकबरनामा’ की रचना की गई, इससे शाहजहाँ बहुत प्रभावित हुआ और उसने भी अपने शासनकाल के विजय में फारसी गद्य विशेष से लेखन करवाने का सोचा।

औरंगज़ेब के शासनकाल के समय भी इसका लेखन जारी रहा, जिसे सादिक खान और मोहम्मद सलेह कंबोह ने पूरा किया। यह शाहजहाँनामा के नाम से प्रसिद्ध है।

औरंगजेब के शासनकाल में भी इतिहास-लेखन को प्रोत्साहन मिला। औरंगजेब मुहम्मद अमीन काजवानी को इतिहास-लेखन के लिए नियुक्त किया।

औरंगजेब के समय समस्त सरकारी इतिहासकारों को बुलवाया गया और उनसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं और समाचारपत्रों को एकत्रित करने को कहा गया।

इसके बाद लेखन कार्य प्रारंभ हुआ, जो ‘आलमगीरनामा’ के नाम से 1568 ई० में पूर्ण हुआ। इसमें औरंगजेब को ईश्वर का विशिष्ट दैवी कृपापात्र बताया गया है।

औरंगजेब राज्य के खर्चों को कम करना चाहता था। साथ ही इतिहासकारों के अतिशयोक्तिपूर्ण लेखन से वह तंग भी आ चुका था। अत: कुछ दिनों के लिए उसने लेखन पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद औरंगजेब के पुत्र ने साफी मुस्तैद खान को लिखने का आदेश दिया गया।

मुगलकालीन शासकों ने इतिहास-लेखन को महत्त्व दिया। शासकों द्वारा इस शासनकाल में जिस सरकारी इतिहास-लेखन की परंपरा की शुरुआत हुई उसमें इतिहासकारों ने बड़ी मेहनत के साथ शासनकाल की हर घटना का संकलन किया। MHI 03 Free Assignment In Hindi

अत: मुग काल और मुगलकाल में इतिहासकारों को राजकीय संरक्षण प्रदान करने की प्रथा प्रचलित थी। जिसका सबसे अधिक दोष यह है कि शासकों की चापलूसी और चाटुकारिता को ध्यान में रखकर लेखन किया गया।

साथ ही इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस समय के कई लेखक बडे विद्वान और ज्ञानी थे, जिन्होंने उस काल की घटनाओं को बड़ी सूक्ष्मता के साथ अध्ययन करके अपने ग्रंथों का लेखन किया।

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प्रश्न 6. उत्तर-आधुनिकवाद क्या है? इतिहास पर उत्तरआधुनिकतावादी दृष्टिकोणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर. कभी-कभी उत्तर आधुनिकवाद तथा उत्तर आधुनिकता दोनों शब्दावलियों का प्रयोग एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में किया जाता है। जब वास्तवकिता यह है कि दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं।

इतना अवश्य है कि ये अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उत्तर आधुनिकता शब्द का प्रयोग जहाँ समकाल, विकसित समाजों के अस्तित्व की सामाजिक स्थितियों और इन समाजों की अर्थव्यवस्था के चित्रण के लिए किया जाता है, वहीं उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ उस दर्शन से है,

जो आधुनिकता के दर्शन के बाद तथा इसके बीच उत्पन्न हुए हैं। उत्तर आधुनिकतावाद के कुछ प्रमुख दार्शनिकों के नाम तथा विचार निम्नलिखित हैं

मिशेल फूको (1926 1984) फूको एक फ्रांसीसी दार्शनिक था, जिसे एक जटिल विचारक माना जाता था। उसके विचारों के दायरे में विभिन्न विषय तथा विभिन्न प्रकार के विचार शामिल हैं।

लेकिन फिर भी उसे एक उत्तर आधुनिक विचारक माना जाता है, क्योंकि वह प्रबोधन संबंधी विचारों और आधुनिकता का बहुत बड़ा आलोचक था। MHI 03 Free Assignment In Hindi

उसके लेखन से मानव विज्ञान और समाज विज्ञान बहुत ही प्रभावित हुआ जो अभी तक कायम है। उसके कार्यों विभिन्न विषयों के संदर्भ में जैसे कि इतिहास, संस्कृति संबंधी अध्ययन, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, साहित्य, सिद्धान्त और शिक्षा में उल्लेख किया जाता है। उसे इस बात से बहुत प्रसिद्धि मिली थी।

उसने विभिन्न सामाजिक संस्थानों की आलोचना की। मनोचिकित्सा चिकित्साविज्ञान और जेलों जैसी संस्थाओं और क्षेत्रों में उसकी बहुत आलोचना हुई।

इन बातों के अतिरिक्त उसे इस काम के लिए भी बहुत ख्याति मिली कि सत्ता और सत्ता ज्ञान के बीच उसने सामान्य सिद्धान्तों पर काम किया और साथ ही सश्चिमी विचारों के इतिहास के संदर्भ में उसने जो विमर्श प्रस्तुत किया, वह भी बहुत उल्लेखनीय है।

जैक देरिदा (1930 2004 ) देरिदा एक अन्य फ्रांसीसी दार्शनिक है, जो उत्तर-आधुनिक सिद्धान्त के विकास में और विशेष रूप में इसे भाषायी मोड़ प्रदान करने में अत्यन्त महत्त्व के साबित हुए हैं।

उत्तर संरचनात्मक और उत्तर आधुनिक विचारों के विकास में देरिदा का बुनियादी योगदान उनका विखंडन का सिद्धान्त है। इसके अनुसार लिखित पाठ जटिल सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का उत्पाद है।

इसके अतिरिक्त इन पाठों को अन्य पाठों तथा लेखन की परिपाटियों के संदर्भ में ही परिभाषित किया जा सकता है।

देरिदा के अनुसार मनुष्य का ज्ञान पाठों तक सीमित है तथा इन पाठों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। भाषा के माध्यम से यथार्थ का निर्णय होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाषा से बाहर कोई दुनिया नहीं है।

ज्याँ फ्रांसुआ ल्योतार्द ( 1924 1998 ) ल्योतार्द एक प्रमुख विचारक है, जिन्होंने उत्तर-आधुनिक शब्दावली को प्रसारित किया है। उसने अप… पुस्तक को सरलीकृत भाषा में प्रस्तुत किया।

वे इसे आत्मा का द्वन्द्व, अर्थ का व्याख्यात्मक स्वरूप, तर्कसंगतता की मुक्ति या सम्पत्ति की रचना बताते हैं। ल्योतार्द के द्वारा इन सभी चीजों के प्रति शंका व्यक्त की गई।MHI 03 Free Assignment In Hindi

उनके द्वारा आधुनिकतावादी सिद्धान्तों की आलोचना की जो ऐसे विचारों को समग्र और सार्वभौम रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रखते हैं बुनियादी रूप में विचार आधुनिक यूरोप के उत्पाद हैं

उनके द्वारा आधुनिकतावादी सिद्धान्तों की आलोचना की गई, जो ऐसे विचारों को समग्र और सार्वभौम रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृति रखते हैं। बुनियादी रूप में ये विचार आधुनिक यूरोप के उत्पाद हैं।

उनके द्वारा आधारभूत को भी खारिज किया गया है, जिसके अंतर्गत हर प्रकार के ज्ञान को सुरक्षित सैद्धान्तिक बुनियाद पर आधारित ठहरा दिया जाता है।

ज्याँ बौद्रिआ बौद्रिआ भी फ्रांस के विचारक थे, जिनका आधुनिकतावाद से घनिष्ठ संबंध था। बौद्रिआ के अनुसार उत्तर आधुनिक स्थिति को पैदा करने वाली तीन परिघटनाएँ हैं-छद्म रूप, अति यथार्थ और अंतः स्फोट।

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के इस नए युग में मीडिया अथवा टेलीविजन की तस्वीरों ने वास्तविकता का स्थान ले लिया है, ये छद्म रूप दिनोंदिन इतने शक्तिशाली होते जा रहे हैं कि इनसे ही सामाजिक जीवन के आदर्श तय होने लगे हैं।

बौद्रिआ ने उत्तर आधुनिक जगत को एक अंत:स्फोट के रूप में परिभाषित किया है, जहाँ वर्गों समूहों और पुरुषों-महिलाओं की परम्परागत सीमाएँ धराशायी हो रही हैं।

इस उत्तर-आधुनिक दुनिया का न तो कोई अर्थ है, न कोई लय है और न इसका कोई तर्क है, इनमें न कोई केन्द्र है यह नकारवाद की दुनिया है। इसमें न कोई केन्द्र है और न कोई उम्मीद है।

जिस तरह आधुनिकता की उत्तर आधुनिक आलोचना पूर्ण इन्कार से लेकर आंशिक स्वीकार्यता तक है, उसी तरह उत्तर आधुनिकतावाद की आलोचना का क्षेत्र भी जबरदस्त प्रहार तथा पूर्ण रूप में इसे नकारने से लेकर कुछ हद तक इसकी स्वीकार्यता तक फैला हुआ है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

आलोचकों के द्वारा यह बात उठाई गई है कि उत्तर आधुनिकता सापेक्षतावाद के कुछ अतिवादी रूप में निहितार्थ यह हो सकता है कि सब कुछ चलता है लेकिन इस प्रकार की बात यथास्थिति को उचित ठहरा सकती है, जहाँ सब कुछ कायम रहता है।

पूर्ण सापेक्षतावाद और नकारवाद समाज के रूपांतरण से इन्कार करता है और दमनकारी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था को परिवर्तित करने की दिशा में कुछ नहीं करता है।

ज्ञान को अलग-अलग खानों में बांटकर और सामाजिक-सांस्कृतिक चोहद्दियों को अत्यंत लघुस्तरों तक चिन्हित कर यह उत्पीड़ितों के बीच एकता का निर्माण असंभव बना देता है।

इसके अलावा समाज और संस्कृति का उत्तर आधुनिक विश्लेषण असंतुलित है, क्योंकि यह बिखराव की प्रवृत्तियों पर आधारित बल देता है और संश्लेषीकरण तथा व्यापकतर संगठन की दिए में काम कर रहे समान रूप से महत्त्वपूर्ण आन्दोलनों की पूर्ण रूप में अनदेखी करता है।

एक अन्य स्तर पर असंख्य छोटी और बड़ी प्रणालियों, और संगठनों में विपरीत सत्ता की संकल्पना को ठोस रूप प्रदान करते हुए उत्तर आधुनिकतावाद सत्ता के केन्द्रीकरण को धूमिल बनाता है और दमन तथा प्रतिरोध के बुनियादी संबंधों को धूमिल बनाया है।

प्रभुत्व और दमन के अस्त्र के रूप में यह राज्य सत्ता की भूमिका को भी नजरअन्दाज करता है।
कुछ आलोचकों के द्वारा उत्तर आधुनिकतावाद पर यह भी आरोप लगाया कि यह बहुत ही इतिहासवादी है, क्योंकि वह यह वर्तमान तथा वर्तमान के उत्तर आधुनिक चरित्र की अनिवार्यता को स्वीकार करता है।

अगर दुनिया आज उत्तर आधुनिक है तो इसमें रहने के लिए हम अभिशप्त हैं लेकिन पश्चिमी जगत ने जिस तरह की उत्तर आधुनिकता को आज जन्म दिया है। MHI 03 Free Assignment In Hindi

वह पहले की उस सामाजिक संरचना से किसी भी मामले में बेहतर नहीं है, जिसे लांघते हुए उत्तर आधुनिकता के आगमन को माना जाता है।

इसके अतिरिक्त यह भी बहुत निश्चित नहीं है कि क्या आधुनिकता का सचमुच अंत आ गया है। वस्तुतः पूर्व औपनिवेशिक तथा अर्द्ध औपनिवेशिक समाजों और पूर्व यूरोपीय देशों के अधिकांश हिस्से आज खुद के आधुनिकीकरण में समस्या है।

यहाँ तक कि पश्चिम में भी आधुनिकता की मुख्य विशिष्टताएँ अभी भी विद्यमान हैं,

जैसे कि औद्योगिक अर्थव्यवस्था, राजनीतिक पार्टियाँ और राजनीतिक समूह बाजार, यूनियन, राज्य के नियम, कानून, विषय आधारित ज्ञान इत्यादि इसलिए, उत्तर आधुनिकता की अवधारणा अधिकांशत: बौद्धिक और शैक्षणिक स्तर पर ही आधारित है।

आलोचकों का यह भी कहना है कि उत्तर संरचनावाद से निकले अनेक उत्तर आधुनिकतावादी तथ्यों तथा यथार्थ जानने की संभावना से इन्कार करते हैं, इसके परिणामस्वरूप किसी भी घटना को दूसरी घटना की तुलना में महत्त्व नहीं दिया जा सकता है।

अतीत की सभी घटनाएँ समान महत्त्व की मानी जाती हैं। इस प्रकार सिद्धान्त रूप में महान जन संहार (होलोकॉस्ट) या इस तरह की किसी भी तरह की बर्बरता को चाहे वह दुःख हो या पहचानमुक्त।

इसी तरह की किसी अन्य घटना के बराबर रखा जा सकता है। वह हमारे लिए घटनाओं और इतिहासों का निमाण करती है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 7. भारतीय इतिहास पर औपनिवेशिक इतिहास-लेखन पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर औपनिवेशिक भारत के विषय में लिखे गए इतिहासकारों की सभी कृतियाँ इतिहास-लेखन की उपनिवेशवादी स्कूल को प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं,

क्योंकि 19वीं शताब्दी तथा 20वीं शताब्दी के आरम्भ में उपनिवेशवादी स्कूल के भीतर विभिन्न दृष्टिकोण और व्याख्यात्मक ढाँचे का विकास हुआ था। इन विशिष्टताओं के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को श्रेष्ठ मानना भारत का प्राच्यवादी प्रतिनिधित्व आम बात थी। एडवर्ड सईद तथा अन्य लोगों के द्वारा हाल ही में इस विषय को उजागर किया गया है।

लेकिन भारतीय राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा इसे बहुत पहले समझ लिया गया था तथा जेम्स मिल के समय से बाट में होने वाले ब्रिटिश लेखन में उभरी इस प्रवृत्ति की आलोचना की गई थी।

आमतौर पर यह बात ऐतिहासिक आख्यानों में बलपूर्वक कहा जाता रहा है कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत बहुत सारे खण्डों में विभाजित था, MHI 03 Free Assignment In Hindi

जिसके साथ यह अभिधारणा भी विकसित हुई कि अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत अव्यवस्था तथा बर्बरता के अंधेरे में डूबा हुआ था तथा अठारहवीं शताब्दी भारत में एक अंधेरी शताब्दी थी।

कई ब्रिटिश इतिहासकारों के द्वारा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत के विषय में सामाजिक डार्विनवादी अवधारणा का विकास किया गया था।

इसके अनुसार इतिहास विभिन्न लोगों और संस्कृतियों के बीच होने वाले संघर्ष की गाथा है, जिसमें विभिन्न प्रजातियाँ आपस में लड़ती हैं तथा जीत शक्तिशाली की होती है, जिसमें शासन करने की अच्छी क्षमता होती है वही शासन करता है

तथा ब्रिटेन शिखर पर है तथा वह औरों से उच्चतर है, इसी कारण शासन में सर्वाधिक सक्षम है।

अनेक अंग्रेजों विद्वानों की यह मान्यता थी कि भारत एक ठहरा हुआ समाज था। इसका विकास अवरुद्ध हो गया था। इसी कारण अंग्रेजी शासन द्वारा दिखाए गए प्रगति के पथ पर चलकर ही उन्नति कर सकता है।

भारत को पैक्स ब्रिटानिका की राह अपनानी होगी अर्थात पूर्ण रूप से इंग्लैंड की नकल करनी होगी।

ऐतिहासिक आख्यानों में भारत के अंग्रेजी शासकों और साम्राज्य निर्माताओं की वीरता, नायकत्व और महानता को किंवदंती के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका साम्राज्यवाद के साथ मेल बैठता था।

एरिक स्टोक्स के अनुसार भारत के विषय में अंग्रेजों ने जो कुछ लिखा उसमें नायक के रूप में अंग्रेज हैं जबकि पूरा देश और उसकी जनता की उपेक्षा की गई है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

स्वाभाविक रूप में उपनिवेशवादी इतिहास-लेखन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना हुई है, क्योंकि यह मान किया गया था कि भारत में अंग्रेजों द्वारा किए गए यह अच्छे कार्य को भी समाप्त कर देगी। यह आन्दोलन जैसे-जैसे तेज होता गया दृष्टिकोण भी वैसे-वैसे जटिल होता चला गया।

कु. इतिहासकार सीधी टक्कर की मुद्रा में थे, जबकि कुछ के द्वारा नरमी से काम किया गया था तथा भारतीय राष्ट्रवाद में खामियों को निकाला गया।

उपनिवेशवादी इतिहासकारों के विमर्श में सामान्य रूप में यह कुछ सामान्य विशेषताएँ और दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं।

लेकिन इस बात की अनदेखी करनी मुश्किल है कि 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में इतिहास-लेखन की परम्परा ने इन लक्षणों पर कुछ हद तक विजय प्राप्त कर ली थी या फिर कम से कम ज्यादा परिष्कृत हो गई थी।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि उपनिवेशवादी इतिहास-लेखन भारत पर ब्रिटिश शासन को वैध ठहराने तथा सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए इतिहास को इस साधन के रूप में इस्तेमाल करने के सैद्धान्तिक प्रयास का एक हिस्सा था।

उपनिवेशवादी इतिहास-लेखन की परम्परा में एक आधारभूत विचार यह भी समादूत था कि भारत जैसा पिछड़ा साम्राज्यी छत्रछाया में आधुनिक यूरोपीय और नागरिक समाज की तर्ज पर प्रगति कर सकता है।

अंग्रेज प्रशासकों के निर्देशन में ही यह संभव है। शिक्षा धीरे-धीरे समाज के निचले तबकों में भी रिसेगी। भारतीयों को अंग्रेजों द्वारा बनाई संस्था और कानून का पालन करना चाहिए तथा राष्ट्रवाद द्वारा फैलाई जा रही गड़बड़ियों का विरोध करते हुए ब्रिटेन के प्रति पूरी तरह निष्ठावान होना चाहिए।

ऐसा नहीं होने पर भारत की प्रगति धीमी हो जाएगी। कई बार इसे ब्रिटेन के सिविलाइजेशन के मिशन रूप में पेश किया गया।MHI 03 Free Assignment In Hindi

प्रश्न यह उठता है कि इस इतिहास-लेखन में उपनिवेशवादी स्कूल के बौद्धिक तत्त्व क्या थे। बेंथमवादी या उपयोगितावादी राजनीतिक दर्शन के अनुसार ब्रिटेन की भूमिका एक ऐसे अभिभावक की होनी चाहिए, जिसके संरक्षण में एक पिछड़े हुए शिष्य की परवरिश संभव हो।

यह भी कहा जाता है कि यूरोपीय या गैर यूरोपीय सभी लोगों को जेरेमी बेंथम की दृष्टि से देखा करता था। यह बात आंशिक रूप में सही भी है।

लेकिन भारत जैसे देश में इस दृष्टिकोण को स्पष्ट अभिव्यक्ति प्राप्त हुई थी तथा इसकी कार्यवाही भी साफ नजर आ रही थी। सामाजिक डार्विनवाद उपनिवेशवादी इतिहासकारों की प्रेरणा का एक अन्य स्रोत था। इससे इस धारणा को वैज्ञानिक आधार प्राप्त करने का एहसास कराया गया कि भारत के लोग उनसे बहुत नीचे हैं।

उनका यह भी कहना था कि वह एक ठहरी हुई सभ्यता के शिकार हैं और डार्विन के नियतिवाद का यह अवश्यंभावी परिणाम है

तथा इसका कुछ भी नहीं किया जा सकर इन लेखकों पर हरबर्ट स्पेन्सर का भी प्रभाव पड़ा। उनके द्वारा यूरोपीय उत्कर्ष की एक विकासात्मक योजना प्रस्तुत की गई तथा अपनी तुलनात्मक के माध्यम से उसने उच्च यूरोपीय स्तर का मानदण्ड स्थापित करते हुए विभिन्न देशों और संस्कृतियों के विकास में अन्तर स्पष्ट किया।

यूरोपियों के बीच में यह एक आम धारणा थी कि गैर-यूरोपीय समाज इसी विकासपथ को अपनाएँ तथा इसमें यूरोपीय साम्राज्य शक्तियों की मदद की भी आवश्यकता होगी।

इस प्रकार की सोच मात्र ब्रिटिश भारतीय इतिहासकारों की नहीं थी। जब मध्य विक्टोरियन साम्राज्यवाद अपने उत्कर्ष पर था तो उस समय अंग्रेजों ने खुलकर यह विचार व्यक्त किया था।

बाद में यह विचार छिपे रूप में व्यक्त होने लगे। 1870 के दशक में फिटजेम्स स्टीफेन ने जंगलीपन और बर्बरता बनाम ब्रिटिश युद्धकारी सभ्यता की चर्चा की। MHI 03 Free Assignment In Hindi

1920 के दशक में डेविड डॉडवेल की आवाज थोड़ी कम हो गई थी तथा उनका स्वर निराशा भरा था जब उन्होंने कहा कि भारत में अंग्रेज एक अविराम प्रयास में लगे थे,

जिसमें मानवता के विशाल जन समूह को ऊँचे स्तर पर उठाना था तथा यह जन समूह बार-बार अपने पुराने रूप में लौट जाता था। वैसे ही जैसे एक पत्थर को सरियों की मदद से आप हटाना चाहते हों फिर वह अपने स्थान पर वापस लुढ़ककर आ जाता हो।

ब्रिटिश भारत सरकार के कुछ अंग्रेज अधिकारी जैसे थॉमस मुनरो और चार्ल्स ट्रवेलियन को भारतीय जनता के प्रति सहानुभूति थी जबकि वह भी विदेशी और शासक सत्ता के अंग थे,

इससे प्रतीत होता है कि सभी इतिहासकारों तथा लेखकों को भारत विरोधी नहीं माना जा सकता है।

कुछ ब्रिटिश अधिकारी और मिशनरी जैसे रेनेसां इन इंडिया, (1925) के लेखक सी.एफ. एन्ड्रज तथा भारतीय सिविल सेवा तथा बाद में इंगलैंड में लेबर पार्टी के सदस्य गैरेट तथा भारतीय पुलिस सेवा के जॉर्ज आरवेल साम्राज्य के प्रखर आलोचक थे।

कई इतिहासकारों के द्वारा भी साम्राज्य की आलोचना की गई, लेकिन ब्रिटिश राज्य के पदाधिकारयों की सामान्य सोच में कुछ व्यक्तियों की सोच फीकी पड़ गई। MHI 03 Free Assignment In Hindi

साम्राज्यी शक्ति को मजबूत बनाने वाले विचारों को सरकार का समर्थन और सहायता मिलती थी तथा औपचारिक या अनौपचारिक रूप में इसके विपरीत खड़े व्यक्ति को अपने साथी और समूह की आलोचना सहनी पड़ती थी।

हमने उपनिवेशवादी इतिहास-लेखन की चर्चा तो की है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि यह सभी इतिहासकारों पर समान रूप से लागू हो।

इस प्रकार की योग्यता इतिहास-लेखन के संदर्भ में आवश्यक होती है, क्योंकि यहाँ पर इतिहास के विद्यार्थी को सामान्यीकरण की सीमा का निर्धारण करते हुए खुद फैसला लेना होता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि ब्रिटिश भारत में इतिहास-लेखन में उपनिवेशवादी स्कूल के वर्चस्व के बावजूद भारत के आरम्भिक ब्रिटिश इतिहासकारों के कुछ सरकारात्मक योगदान भी रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि उपनिवेशवादी इतिहासकारों के द्वारा आधुनिक यूरोप में इतिहास-लेखन की प्रवृत्ति के आधार पर भारत में इतिहास-लेखन की परम्परा की शुरुआत हुई।

इसके अतिरिक्त एशियाटिक सोसाइटी एड आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं का निर्माण कर भारतीय इतिहासकारों को एक नया रास्ता दिखाया तथा शैक्षिक अनुसंधान का मार्ग प्रशस्त किया।

जातीय और राज्यवादी पूर्वाग्रह के बावजूद ब्रिटिश उपनिवेशवादी इतिहासकारों द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े और दस्तावेजों को संगृहीत करने का प्रचलन एक प्रमुख स्रोत के रूप में एकत्रित होता चला गया।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कलकत्ता, बम्बई, मद्रास (1857 1858) में तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना के परिणामस्वरूप इतिहास के अध्ययन की शुरुआत हुई, इसका प्रभाव दूरगामी हुआ।

जो इतिहास औपनिवेशिक युग में पढ़ाया गया उसमें साम्राज्यी पूर्वाग्रह स्पष्ट था। जो पाठ्य पुस्तकें लिखी गईं वह औपनिवेशिक इतिहास-लेखन से जुड़े स्कूल के अनुसार थीं।MHI 03 Free Assignment In Hindi

लेकिन इसके बाद भी इसके कुछ सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले। पहला यह कि जेम्स मिल या एलफिन्सटन के भारत के इतिहास के साथ-साथ भारतीय विद्यार्थियों ने यूरोप और इंग्लैंड का इतिहास भी पढ़ा तथा इस प्रकार शिक्षित भारतीयों के दिमाग में स्वतंत्रता, आजादी, प्रजातंत्र तथा सफलता जैसे विचारों का बीजारोपण हुआ, जिसका जिक्र यूरोपीय इतिहास में देखने को मिलता है।

मैगनाकार्टा, ग्लोरियस रिवॉल्यूशन, अमेरिकी आजादी की लड़ाई, मेजनी और गैरिबाल्डी के संघर्ष आदि प्रमाण के रूप में उपस्थित थे।

भारत में राष्ट्रवाद के विकास के आरम्भिक उदारवाद के चरण से परिचित विद्यार्थी को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जाएगी कि इतिहास के इन पथों से गुजरते हुए किस प्रकार के विचार ग्रहण किए गए होंगे।

इसका दूसरा परिणाम यह था कि पूरी तरह से प्रवीण और प्रशिक्षित भारतीय इतिहासकारों के द्वारा इतिहास-लेखन की शुरुआत हुई। आधुनिक तर्ज पर दस्तावेजी अनुसंधान के आधार पर इतिहास-लेखन और विद्वतापूर्ण कर्म पर पेशेवर ब्रिटिश इतिहासकारों का ही एकाधिकार नहीं रहा।

पेशेवर रूप में प्रशिक्षित भारतीयों के द्वारा अनुसंधान की शुरुआत की गई। इसकी शुरुआत एशियाटिक सोसाएटी जैसे विद्वत संगठनों से और बाद में कालेज और विश्वविद्यालयों तथा सरकारी शिक्षा सेवाओं तथा विशेष रूप में भारतीय शिक्षा में उनके प्रवेश से होने लगी।

भारतीय विद्यार्थियों को 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश पदाधिकारी इतिहासकारों की लिखी पुस्तकें पढ़नी पड़ी, जिससे उनमें इस तरह के इतिहास-लेखन के प्रति एक आलोचनात्मक भावना उत्पन्न होना, तीसरी महत्त्वपूर्ण बात थी।

बंकिम चन्द्र चटर्जी जो भारतीय विश्वविद्यालय के पहले स्नातक थे, ने लगातार ब्रिटिश व्याख्या का विरोध करते हुए यह प्रश्न खड़ा किया कि कब हमारे द्वारा अपना इतिहास लिखा जाएगा। यह बात रविन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा और भी स्पष्टता के साथ कही गई। MHI 03 Free Assignment In Hindi

उनके द्वारा लिखा गया कि दूसरे देशों में इतिहास अपने देश की जनता को अपने देश के विषय में बताता है जबकि भारत का इतिहास अंग्रेज लिख रहे हैं तथा उनकी दृष्टि से हम भारत को देख रहे हैं।

अपने इतिहास में हम भारत माता का दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। भारत में बुद्धिजीवियों की यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी तथा परिणामस्वरूप कुछ महत्त्वपूर्ण राष्ट्रवादियों द्वारा भारत का नया इतिहास लिखा गया।

इस तरह भारतीय इतिहास की राष्ट्रवादी व्याख्या उभरकर सामने आई और ब्रिटिश इतिहास-लेखन का वर्चस्व समाप्त हुआ। इतिहास-लेखन राष्ट्रीय अस्मिता की चेतना के निर्णय का एक प्रमुख साधन बन गया।

बीसवीं शताब्दी के पहले दो या तीन दशकों में इतिहास-लेखन की दिशा में नई प्रवृत्ति का विकास हुआ तथा आर्थिक विकास की दिशा में नई खोजों की शुरुआत हुई।

इसके पहले भी कई ब्रिटिश पदाधिकारियों के द्वारा आर्थिक दस्तावेजों की जाँच की गई थी और कृषि सम्बन्धों और कृषि इतिहास के सम्बन्ध में कुछ सामान्य निष्कर्ष प्रस्तुत किए थे।

जिलाधिकारी या समाहर्ता के रूप में लगान के बन्दोबस्त अर्थात कृषि आय पर कर का निर्धारण करते समय, जिससे कि सरकार द्वारा लगान वसूल किया जा सके, उनके द्वारा ये दस्तावेज जुटाए गए।

बाद के आर्थिक इतिहासकारों के द्वारा इन्हीं दस्तावेजों तथा आंकड़ों को आकलन का आधार बनाया गया। इन पदाधिकारियों में कुछ इतिहासकार के रूप में भी उभरकर सामने आए।

इनके द्वारा जो भी इतिहास लिखा गया उसमें भारतीय आर्थिक और सामाजिक दशा की कोई चर्चा नहीं की गई है तथा न ही भारत के लोग इसमें कहीं नजर आते हैं। यह इतिहास भारत में अंग्रेज सैनिकों और प्रशासनिक अधिकारियों के योगदान का लेखा-जोखा है।।MHI 03 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 8. ‘सबाल्टर्न’ शब्द से आप क्या समझते हैं? भारत में सबाल्टर्न अध्ययन के दो चरणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर निम्नवर्गीय प्रसंग के प्रणेताओं के द्वारा इसे भारतीय इतिहास-लेखन के क्षेत्र में एक नई विचारधारा के रूप में स्थापित किया गया। इससे सम्बन्धित कुछ इतिहासकारों ने इसे भारतीय इतिहास-लेखन की परम्परा में एक नई शुरुआत की संज्ञा प्रदान की।

भारतीय इतिहास-लेखन की परम्परा से असंतुष्ट लेखकों ने सामूहिक रूप से कुछ खंडों का प्रकाशन किया। हालांकि इसमें कुछ निम्नवर्गीय प्रसंग से सामूहिक रूप में और औपचारिक रूप से नहीं जुड़े रहने के बाद भी कुछ इतिहासकारों और अन्य सामाजिक विज्ञानियों ने भी अपना योगदान दिया।

निम्नवर्गीय प्रसंग की पुस्तकों में लेखों के प्रकाशन के साथ-साथ इन लेखकों ने कई अन्य पत्रिकाओं और संपादित पुस्तकों में भी अपने आलेख लिखे और पुस्तिकाएँ प्रकाशित की, जिसे आज निम्नवर्गीय प्रसंग के विषयों और प्रविधियों से जोड़कर देखा जाता है।

रंजीत गुहा का कहना है कि इसे हाशिए के शिक्षाविदों की मदद से शुरू किए गए निम्नवर्गीय प्रसंग ने जल्द ही भारत के भीतर और बाहर ख्याति अर्जित की और निम्नवर्गीय प्रसंग के विषयों पर गहन अनुसंधान शरू किया।

आरंभ में तीन खंड निकालने की योजना थी, अब इसके तहत बतौर परियोजना ग्यारह खंड प्रकाशित हो चुके हैं। इन खंडों के अतिरिक्त रंजीत गुहा ने अन्तर्राष्ट्रीय पाठकों के लिए पूर्व-प्रकाशित खंडों से छांटकर एक पुस्तक का भी संघटन किया है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

निम्नवर्गीय प्रसंग के हाल में प्रकाशित खंडों में गैर-भारतीय तीसरी दुनिया के देशों को भी शामिल किया गया है।

निम्नवर्गीय प्रसंग की अवधारणा का परिवेश ग्राशी के विचारों से निर्मित हुआ था। एरिक हॉब्समैन रेमन्ड, विलियम्स और स्टुअर्ट हॉल अपने लेखन में ग्राशी के विचारों को सम्मिलित कर रहे थे।

दूसरी तरफ पेरी एन्डर्सन और टॉम नैनं ग्रामशी को समालोचना प्रस्तुत कर रहे थे।

जॉर्ज लेफेबव्र, क्रिस्टोफर हिल, ई.पी. थॉम्पसन, यूजीन जेनोवेज तथा अन्य पश्चिमी मार्क्सवादी इतिहासकार जिन्होंने नया सामाजिक इतिहास लिखा था और जिन्होंने जनता के नजरिए पर विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया था का भी प्रभाव सबाल्टर्न इतिहास पर देखने को मिलता है।

इस प्रकार निम्नवर्गीय प्रसंग का उद्देश्य दक्षिण एशिया के अध्ययन क्षेत्रों में निम्नवर्गीय विषयों पर व्यवस्थित और सूचना से परिपूर्ण युक्त विचार विमर्श को आगे बढ़ाया और इस प्रकार विशेष क्षेत्र में हो रहे अनुसंधान और शैक्षिक कार्यों के संभ्रांतीय पूर्वाग्रहों को दूर करने में मदद पहुँचाना था।

गुहा के द्वारा तीसरे खंड की प्रस्तावना में यह लिखा गया है कि सबाल्टर्न इतिहाकारों ने आलोचना के लिए साझा प्रतीकों का इस्तेमाल किया, जिसमें दक्षिण एशियाई अध्ययन क्षेत्र में व्याप्त संभ्रांतता की सचेतन और व्यवस्थित रूप से आलोचना की गई। MHI 03 Free Assignment In Hindi

उनके द्वारा पुन: इस बात पर बल दिया गया है कि संभ्रांतीय मानसिकता का विरोध निम्नवर्गीय परियोजना की एकता का आधार है।

इतिहास-लेखन और समाज विज्ञान में मौजूदा व्यवस्था का हम विरोध करते हैं, जिसमें इस बात पर विचार नहीं किया गया और इस बात को स्वीकार भी नहीं किया गया कि सबाल्टर्न अपनी नियति खुद निर्धारित कर सकते हैं।

यह आलोचना हमारी परियोजना का छठा स्थान है। दक्षिण एशिया के अध्ययन क्षेत्रों में संभ्रांतवाद की जड़ें इतनी गहरी थीं कि इसका दूसरा रूप हो ही नहीं सकता था। इस प्रकार निषेधात्मकता हमारी परियोजना का आधारभूत आधार है।

राजनीतिक दृष्टि से 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक के आरंभ में अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर अनेक तरह के परिवर्तन हुए और स्थापि तथा परम्परागत विचारों पर प्रश्न खड़े किए गए।

वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी परम्परागत राजनीतिक पार्टियों के द्वारा इसकी आलोचना की गई: गैर-परम्परावाद राजनीतिक संघटनों और कार्यकलापों पर बल दिया गया।

कांग्रेस राष्ट्रवाद और भारतीय राज्य में इसके कार्यान्वयन से क्षुब्ध सबाल्टर्न इतिहासकारों ने इस अभिधारणा को खारिज कर दिया कि जनता की लामबंदी या तो आर्थिक परिस्थितियों अथवा ऊपर से किए गए प्रयासों का प्रतिफलन होती है। उन्होंने एक लोकक्षेत्र खोज निकालने की बात की, जिसका अस्तित्व स्वायत्तापूर्ण होता है।

यह स्वायत्ता शोषण की परिस्थितियों में निहित होती है। सबाल्टर्न इतिहासकारों ने कबीलों, किसानों, सर्वहारा जैसे समूहों और कभी-कभी मध्यवर्ग पर भी काम किया।MHI 03 Free Assignment In Hindi

उनकी यह मान्यता थी कि क्षेत्र संभ्रांत राजनीति से अप्रभावित थे और इनका स्वतंत्र अस्तित्व था तथा इनकी शक्ति स्वतः स्फूर्त थी।

अब किसी भी आन्दोलन के पीछे किसी करिश्माई नेतृत्व का हाथ होने की बात से इन्कार किया जाने लगा। अब किसी भी आन्दोलन का विद्रोह के विश्लेषण में इस प्रकार के करिश्मे के प्रति लोगों द्वारा की गई व्याख्या को महत्त्व प्रदान किया गया।

शाहीद अमीन द्वारा महात्मा गांधी के विषय में जनता के दृष्टिकोण का अध्ययन किया गया है, जो इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है।

उन्होंने अपने एक लेख महात्मा के रूप में गांधी में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से प्रमाण एकत्रित करके यह स्पष्ट किया है कि कांग्रेस जिस दृष्टि से महात्मा को देखती थी उसमें बहुत अन्तर था।

हालांकि महात्मा का संदेश अफवाह के रूप में चारों तरफ फैल जाता था लेकिन इसके पीछे आर्थिक दर्शन और राजनीति काम करती थी।MHI 03 Free Assignment In Hindi

अच्छा आदमी बनाने की आवश्यकता, शराब, जुआ और हिंसा का त्याग, कताई करना और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखना। जनता के बीच में महात्मा की जादुई शक्ति के किस्से प्रचलित थे।

जनता के बीच यह बात फैली हुई थी कि अपनी इस शक्ति से वे आज्ञापालकों को ईनाम और आज्ञा नहीं मानने वालों को दंड भी दे सकते हैं दूसरी ओर महात्मा के नाम और उनकी तथाकथित जादुई शक्ति का उपयोग जाति कार्यक्रम को मजबूत बनाने और स्थापित करने, कर्जदार को कर्ज का भुगतान करने और गो रक्षा आंदोलन तेज करने के लिए भी किया गया।

महात्मा जनता के बीच आकर किंवदंती के रूप में फैल जाते थे। 1922 में चौरी-चौरा कांड के दौरान यह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया जब पुलिस चौवि. जलाने, पुलिसकर्मियों को मारने और बाजार लूटने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल किया गया।

इस बात के लिए इतिहासकारों की आलोचना की गई कि उन्होंने न केवल लोकचेतना और मानस की अवहेलना की, बल्कि बगावत और विद्रोह के विषय में जारी की गई घोषणाओं को बड़ी गंभीरता से स्वीकार कर लिया।

रंजीत गुहा ने अपने एक लेख ‘द प्रोग ऑफ काउन्टर इनसरजेंसी’ में भारत के किसानों और कबीलों के मौजूदा इतिहासकारों की आलोचना की है, जिसमें किसान आंदोलनों को आकस्मिक और अनियोजित बताया गया है और विद्रोह की चेतनाओं को नकारा गया है।

उनके मतानुसार “इस इतिहास-लेखन में कृषक विद्रोहों की चर्चा सिर्फ एक ठोस व्यक्ति या वर्ग के सदस्य के रूप में की गई। एक अस्मिता के रूप में नहीं। MHI 03 Free Assignment In Hindi

जिसकी इच्छा शक्ति और तर्कशक्ति विद्रोह का माहौल बनाती है। कृषक आंदोलन के विषय में जो भी किंवदंती और आख्यान मौजूद हैं उनका एक स्वाभाविक प्राकृतिक घटना के रूप में चित्रण किया गया है। वैसे ही जैसे बवंडर या भूचाल आ जाता है, दावाग्नि या महामारी फैल जाती है।

उन्होंने सरकारी रिपोर्ट से लेकर वामपंथी इतिहास लेखकों द्वारा लिखे गए बगावत के ब्यौरों की आलोचना की है। गुहा के अनुसार उन्होंने प्रति-विद्रोह का पाठ लिखा है और विद्रोही को अपने इतिहास का नायक मानने से इन्कार किया है।

अपने लेख ‘पीजेंट रिवोल्ट एंड इंडियन नेशनलिज्म, 1919-1922’ में ज्ञान पांडे ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि असहयोग आंदोलन से पहले अवध में उठा किसान आंदोलन अपने आप में स्वायत्त था और किसान शहरी नेताओं और यहाँ तक कि कांग्रेस नेताओं की अपेक्षा भी स्थानीय सत्ता संरचना के औपनिवेशिक शासन के साथ गठजोड को बेहतर ढंग से समझते थे।

इसके अतिरिक्त जब-जब कांग्रेस का संगठन मजबूत हुआ. तब-तब किसान की उग्रता में कमी आई।

स्टीफेन हेन्नींघम ने ‘क्वीट इंडिया इन बिहार एंड ईस्टर्न यूनाइटेड प्रोविन्सेज’ में यह लिखा है कि निम्नवर्गीय और संभ्रांत क्षेत्र स्पष्ट परिभाषित और एक-दसरे से अलग थे।

अत: 1942 की महान क्रान्ति संभ्रांतीय राष्टवादी आन्दोलन के साथ-साथ एक निम्नवर्गीय विद्रोह भी था। उनके उद्देश्य और माँग अलग-अलग थीं। MHI 03 Free Assignment In Hindi

संभ्रांतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में शामिल आंदोलनकारियों ने सरकार द्वारा कांग्रेस के दमन का विरोध किया और भारत को आजादी देने की माँग की दूसरी ओर निम्नवर्गीय विद्रोह में शामिल लोगों ने दासता और उत्पीड़न से मुक्ति की बात की जिसमें वे जकड़े हुए थे।

अपनी बात को आगे बढाते हए वे कहते हैं कि, क्रान्ति के इस दोहरे चरित्र के कारण ही इसे दबाया जा सका है।

डेविड हार्डीमैन ने अपने बहुत सारे लेखों में निम्नवर्गीय विषय पर प्रकाश डाला है और यह कहा है कि चाहे वह दक्षिण गुजरात का कबीलाई आंदार.. हो या पूर्वी गुजरात का भील आंदोलन हो या फिर नागरिक अवज्ञा आन्दोलन में कृषि मजदूरों की विद्रोही भावना हो, यह संभ्रांतों के विरुद्ध निम्नवर्ग की एक स्वतंत्र राजनीति थी।

इसी प्रकार सुमित सरकार ने अपने लेख ‘कंडिशन एंड नेचर ऑफ सबाल्टर्न मिलिटैन्सी’ में यह कहा है कि बंगाल में असहयोग के समय जनता ने नेताओं की अवहेलना की।

उन्होंने बताया कि सबाल्टर्न पर ये मूल रूप में तीन सामाजिक समूह शामिल हैं-कबीलाई और निम्नजाति के कृषीय मजदूर और बटाईदार, जमीन वाले किसान, आम रूप में बंगाल में मध्यवर्ती जाति के लोग जिसमें मुसलमान भी शामिल थे और बागानों, खानों और उद्योगों में काम करने वाले मजदूर, शहरी मजदूरों के साथ-साथ इन समूहों के बीच में आपसी विभाजन था और इसमें शोषक और शोषित दोनों शामिल थे।

इसके बाद भी उनका मानना था कि “परिभाषित निम्नवर्गीय समूह का अपेक्षाकृत स्वायत्त राजनीतिक क्षेत्र था, जिसकी खास विशेषताएँ और साझा मानसिकता थी जिनका पता लगाया जाना जरूरी है और यह संभ्रांत राजनीतिज्ञों के क्षेत्र से बिल्कुल पृथक् दुनिया थी।MHI 03 Free Assignment In Hindi

बीसवीं शताब्दी के दौरान बंगाल के संभ्रांत राजनीतिज्ञ उच्च जाति, व शिक्षित पेशेवर समूह से आए थे, जिनका संबंध जमींदारी या बिचौलिए काश्तकारी से था।

इस प्रकार हम पाते हैं कि अलग-अलग खंडों में लिखे गए अलग-अलग लेखों में संभ्रांत और निम्नवर्गीय क्षेत्रों को अलग-अलग करने और निम्नवर्गीय चेतना और कार्रवाई को स्वायत्तता मानने का प्रयास किया गया।

हालांकि इसमें पार्थ चटर्जी जैसे लेखक अपवाद रूप में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन इस चरम में आमतौर पर निम्नवर्गीय विषय और स्वायत्त निम्नवर्गीय चेतना पर बल दिया गया।

भारतीय इतिहास के प्रसंग में हुए निम्नवर्गीय संदर्भ ने इतिहास-लेखन को एक नया आयाम प्रदान किया। शुरू में इसके तीन खंड तैयार करने की योजना थी, जिसका संपादन के रंजीत गुहा के द्वारा होना था, जो इसके प्रणेता माने जाते हैं।

ऐसा लगता है कि यह विचार ग्रामशी के चिंतन से प्रभावित था। इसमें विशेष रूप से मार्क्सवाद के आर्थिक पक्ष पर बल दिए जाने वाले सिद्धान्त के साथ-साथ बुर्जुआ राष्ट्रवादी संभ्रांत व्याख्या और उपनिवेशवादी विवेचन से अलग हटकर एक नई व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।

भारतीय इतिहास-लेखन की परम्परा से असंतुष्ट एक लेखक समूह ने सामूहिक रूप से इन पुस्तकों के लिए लेख लिखे। इतना ही नहीं इसमें ऐसे भी इतिहासकार तथा समाजविज्ञानी सम्मिलित हुए जो औपचारिक रूप में सबाल्टर्न समूह में सम्मिलित नहीं थे।MHI 03 Free Assignment In Hindi

निम्नवर्गीय प्रसंग का संबंध वैसे तो मूल रूप में भारत से था, लेकिन यह विचार इंग्लैंड में कुछ भारतीय इतिहासकारों के द्वारा भी अपनाया गया, जिनप. अगुआ और प्रणेता शक्ति रंजीत गुहा थे।

शुरू से ही भारतीय इतिहास-लेखन की सभी मौजूदा परम्पराओं से इसने अलग रास्ता बनाया। इस परियोजना के घोषणापत्र में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो की शुरुआती पंक्तियों की झलक मिलती है ‘अभी तक सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है’।

रंजीत गुहा ने निम्नवर्गीय प्रसंग के पहले खंड में यह घोषणा की कि भारतीय राष्ट्रवाद का इतिहास-लेखन अभी संभ्रांतवाद-उपनिवेशवादी संभ्रांतवाद और बुर्जुआ राष्ट्रवाद संभ्रांतवाद से ग्रसित रहा।

यह कहा गया कि दोनों ही प्रकार के इतिहास-लेखन भारत में ब्रिटिश शासन के वैचारिक विमर्श से प्रभावित थे। अनेक मतभेदों के बाद भी कई मामलों में दोनों एकाही तरह से सोचते थे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके इतिहास में जनता की राजनीति पूर्ण रूप से गायब थी।

उनके विचार से अब समझ आ चुका था कि निम्नवर्गों की दृष्टि से इतिहास देखा जाए और लिखा जाए। यह दृष्टि तथा जनता की राजनीति बहुत ही महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि इसका अपना एक स्वायत्त क्षेत्र था. जिसका संबंध न तो संभ्रांत राजनीति से था और न उसका अस्तित्व उस पर आधारित था।

जनता संभ्रांतों की राजनीति से कई निर्माणात्मक विषयों में अलग होती है। सर्वप्रथम यह कि इसकी जड़ जाति और संबंधों के फैलाव, जनजातीय बंधुत्व, क्षेत्रीयता आदि जैसे परम्परागत जनसंगठनों में होती है। दूसरे, संभ्रांत लामबंदी की प्रकृति ऊर्ध्व होती है अर्थात ऊपर से नीचे की ओर जाती है

जबकि जनता की लामबंदी क्षैतिज होती है। तीसरे जहाँ संभ्रांत लामबंदी काननी दायरे में बंधी और शांत होती है. वहीं निम्नवर्गीय लाभबंदी अपेक्षाकत उग्र होती है। चौथा संभ्रांत लामबंदी अधिक सतर्क तथा नियंत्रित होती है जबकि निम्नवर्गीय लामबंदी अचानक उभर आती है अर्थात स्वतः स्फूर्त होती है।

निम्नवर्गीय प्रसंग जल्द ही जनता के नए इतिहास के रूप में परिवर्तित हो गया, जिसमें सरकारी राष्ट्रवाद के साथ जनता के इतिहास का तालमेल नहीं किया गया। इस प्रकार इसने उन विद्वानों का ध्यान आकृष्ट किया जिनका उत्तर औपनिवेशिक राष्ट्र-राज्य द्वारा किए गए राष्ट्रवादी दावों से मोहभंग हो चुका था।

शुरू में ग्रामशी के सिद्धान्त से प्रभावित होकर इसमें प्रताड़ित समूहों की परिवर्तनगामी चेतना को खोजने का प्रयास किया गया। MHI 03 Free Assignment In Hindi

इसे भारतीय इतिहास-लेखन की तीन प्रमुख प्रवृत्तियों के विरोध में खड़ा किया गया उपनिवेशवादी,

जिन्होंने देश की अज्ञानी जनता को ज्ञान-प्रदान करने के लिए औपनिवेशिक शासन को जरूरी माना, राष्ट्रवादी, जिन्होंने जन आन्दोलनों को राष्ट्र-राज्य के निर्माण की प्रक्रिया का अंग माना और मार्क्सवादी जो जनता के संघर्ष को क्रांति और समाजवादी राज्य की स्थापना के इतिहास में समाहित कर देते थे।

इस परियोजना के निम्नलिखित उद्देश्य थे :

(1) कांग्रेस राष्ट्रवाद का बुर्जुआ और संभ्रांत चरित्र दिखाना जिसने लोकहितवादी और परिवर्तनगामी आंदोलनों पर अंकुश लगाया।

(ii) भारतीय कांग्रेस राष्ट्रवाद के महा आख्यान में जनता के संघर्ष को शामिल किए जाने के कई इतिहासकारों के दावों को चुनौती दी गई और

(iii) निम्नवर्गीय चेतना का निर्माण और इसकी स्वायत्ता पर बल दिया गया। निम्नवर्गीय स्रोतों से प्रमाणों की अनुपलब्धता को देखते हुए यह काम बहुत मुश्किल था। इस अभाव को दूर करने के लिए सबाल्टर्न इतिहासकारों ने सरकारी स्रोतों से ही अपने लिए सामग्री निकाली और इसके लिए उन्हें भूसे से अनाज को अलग करना पड़ा।

कुछ समय के पश्चात निम्नवर्गीय प्रसंग के दृष्टिकोण में परिवर्तन आने लगा। इस पर उत्तर आधुनिकता और उत्तर उपनिवेशवादी विचारधाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप में देखने में आया। हालांकि गुहा, पांडे, अमीन, हार्डीमैन, हेन्नींघम, सरकार और कुछ विद्वानों ने आम जनता की दृष्टि से अध्ययन करने पर बल दिया।

पर पार्थ चटर्जी के लेखन में शुरू से ही उत्तर उपनिवेशवादी प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘नेशनलिस्ट थॉट एंड, कोलोनियल वर्ल्ड’ (1986) में उन्होंने एडवर्ड सईद की उत्तर औपनिवेशिक संरचना का इस्तेमाल किया है, जिसके अनुसार औपनिवशिक शक्ति ज्ञान का संसार असीम और दुर्गम है।

पहले भी निम्नवर्गीय प्रसंग की संकल्पना में शामिल चटर्जी के लेखों में इस प्रकार का विश्लेषण स्पष्ट रूप में पाया जाता है। इसके बाद की उनकी पुस्तक ‘द नेशन एंड इट्स फ्रैगमेंटस’ (1995) में उन्होंने इसी विश्लेषण को आगे बढ़ाया है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

निम्नवर्गीय प्रसंग के कई अन्य लेखकों ने भी धीरे-धीरे मार्क्सवाद का दामन छोड़ दिया। इस प्रकार इस विचारधारा में बौद्धिक मत विभाजन जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।

एक तरफ कुछ ऐसे सबाल्टर्न इतिहाकार हैं, जो आज भी निम्नवर्गीय विषयों से जुड़े हुए हैं जबकि अधिकांश लेखक उत्तर उपनिवेशवादी ढंग से लेखन करते हैं।

अब स्पष्ट रूप से आर्थिक और सामाजिक मुद्दों की बजाए सांस्कृतिक मसलों विशेष रूप में उपनिवेशवादी विमर्श विश्लेषण और अनुसंधान पर बल दिया जाने लगा।

एक अवधारणा के रूप में सबाल्टर्नेटी यानी निम्नवर्गीयता को पुनः परिभाषित किया गया। शुरू में यह भीतर और बाहर दोनों ही स्थितियों में प्रभुत्वशा॥ वर्गों के खिलाफ और शोषित वर्ग के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है।

बाद में इसको उपनिवेशवाद, आधुनिकता और प्रबोधन की अवधारणा के खिलाफ खडा किया गया। बाद के खंडों में सबाल्टर्न समूह से जुड़े विषयों पर अनुसंधानात्मक लेखों की संख्या में कमी आई।

इसी कारण जहाँ पहले चार खंडों में किसानों और मजदूरों जैसे निम्नवर्गों पर 20 लेख थे वहीं बाद के छ: खंडों में इस प्रकार के सिर्फ पाँच ही लेख मिलते हैं। MHI 03 Free Assignment In Hindi

औपनिवेशिक विमर्श के पाठगत विश्लेषण पर अब अधिक बल दिया जाने लगा। इस प्रकार निम्नवर्गीय विषयों पर अनुसंधान करने के बदले विमर्श विश्लेषण हावी होने लगा।

सबाल्टर्न पर बल कम हो गया तथा समुदाय पर बल दिया जाने लगा। पहले कहा जाता था कि संभ्रांत राष्ट्रवाद ने जनता को पंगु बना दिया अब राष्ट्रवाद की पूरी परियोजना को उपनिवेशवादी विमर्श का एक संस्करण घोषित किया गया, जिसमें आन्दोलन का केन्द्रीकरण और बाद में राज्य पर बल दिया गया।

धर्मनिरपेक्षतावाद और बौद्धिक तर्कवाद की आलोचना की गई और अब टुकड़ों तथा घटनाओं पर बल दिया जाने लगा।

शुरू के परियोजना से हुए इस बदलाव को सही ठहराने की कोशिश की गई और यह भी प्रयास किया गया कि इन्हें आपस में जोड़कर देखा जाए।

इसीलिए निम्नवर्गीय प्रसंग के खंड 10 के संपादकों (गौतम भद्र, ज्ञान प्रकाश और सूजी भारन) द्वारा यह दावा किया गया कि निम्नवर्गीयता के प्रभाव से कुछ भी बाकी नहीं है न तो संभ्रांत व्यवहार, न ही राजनीतियाँ, शैक्षिक अनुशासन, साहित्यिक पाठ, संचित स्रोत या भाषा। इसी कारण निम्नवर्गीय प्रसंग के वैध विषय के रूप में सभी संभ्रांतीय क्षेत्रों की छानबीन आवश्यक है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

ज्ञान प्रकाश का यह तर्क था कि भारतीय निम्नवर्गीय समूह अपने दस्तावेज और आंकड़े छोड़कर नहीं जाते। इसी कारण जनोन्मुखी इतिहास दृष्टि का पश्चिमी प्रारूप की नकल करना संभव नहीं था।

इसी कारण निम्नवर्गीय प्रसंग को निम्नवर्ग की अवधारणा को अलग ढंग से ग्रहण और विकसित कर अलग इतिहास लिखने की कोशिश थी। उनके अनुसार निम्नवर्गीयता को एक विमर्श प्रभाव के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप निम्नवर्गीय अवधारणा का पुनर्निधारण हो सके।

अत: दक्षिण एशियाई इतिहास के इस प्रकार के पुनपरीक्षण से इस विमर्श के पहले वास्तविक सबाल्टर्न पैदा नहीं हुए थे और उनकी एक आलोचनात्मक दृष्टि विकसित नहीं हुई थी।

सबाल्टर्न को विमर्श की भूलभुलैया में डालने से वास्तविकता इसमें कहीं गुम हो जाएगी। वास्तविक निम्नवर्गीय प्रसंग और निम्नवर्गीयता विमर्शों के बीच जन्म लेती है।MHI 03 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार सबाल्टर्न को कर्त्ता के रूप में देखना मुश्किल है, क्योंकि वे सत्ता के दाँव-पेंच से निर्मित और निरूपित हुए हैं। दीपेश चक्रवर्ती एक कदम और आगे बढ़कर न सिर्फ इतिहास के पृथक् क्षेत्र से इन्कार करते हैं बल्कि तीसरी दुनिया के इतिहास की अलग अस्मिता पर भी सवाल खड़ा करते हैं।

जहाँ तक इतिहास के शैक्षिक विमर्श का प्रश्न है और जहाँ तक किसी विश्वविद्यालय के अंतर्गत इतिहास को एक विमर्श के रूप में प्रस्तुत करने का प्रश्न है, यूरोप इन सभी इतिहासों का मुख्य विषय है और उसने इंडियन, चाइनीज, केनियाई तथा सभी प्रकार के इतिहासों को सैद्धान्तिक आधार प्रदान किया है।

इन सभी इतिहासों को एक महाआख्यान का ही रूप माना जा सकता है जिसे यूरोप का इतिहास कहा गया है। भारतीय इतिहास अपने आप में इस प्रकार निम्नवर्गीयता या सबाल्टर्नेटी की स्थिति में है।

इस इतिहास के नाम पर कोई मात्र निम्नवर्गीय विषयों और स्थितियों को पेश कर सकता है।

इस प्रकार निम्नवर्गीय प्रसंग के दूसरे चरण में न सिर्फ निम्नवर्गीय चेतना की खोजबीन पर बल दिया जाने लगा, बल्कि इस प्रकार की ऐतिहासिक कृतियों पर प्रश्न भी उठाया गया और इसमें पश्चिम की उत्तर आधुनिक सोच का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा।MHI 03 Free Assignment In Hindi

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