IGNOU MHI 02 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

MHI 02

आधुनिक विशव

MHI 02 Free Assignment In Hindi

MHI 02 Free Assignment In Hindi July 2021 & jan 2022

प्रश्न 2. पूँजीवाद की आलोचना करने वाले प्रमुख दृष्टिकोणों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर:- 1917 से पहले 1917 से पहले के चिंतकों ने सामाजिक संगठनों और कार्यों के द्वारा पूँजीवादी संरचना में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। शुरुआती समाजवादी आलोचकों ने पूँजीवाद के अन्यायपूर्ण चरित्र को उजागर किया और सामाजिक कार्यों द्वारा इसमें परिवर्तन लाने का प्रयास किया।

शुरुआती समाजवादी आलोचकों में प्रमुख वस्त्रोत्पादक रॉबर्ट ओवेन ने गरीबों में होने वाली वृद्धि के लिए पूंजीपतियों के बीच होने वाली होड़ को उत्तरदायी माना उनका मानना है कि इसी होड़ के कारण नयी तकनीकी की खोज होती है और मजदूरों की मांग घटती जाती है।

इससे उपभोग में कमी आती है और उत्पादन भी घट जाता है। अत: ओवेन वस्तु की कीमत तय करते वक्त उसके उत्पादन में लगे श्रम की मात्रा का ध्यान रखने पर बल देता है।

वह ऐसे समुदाय विकसित करने का पक्ष लेता था, जिसमें संतोषी जीवन लोग जीयें और सामाजिक संगठन के लिए आदर्श साबित हो। फ्रांसीसी विद्वान चाल फूरिये ने भी बढ़ते हुए पूँजीवादी शोषण का मुकाबला करने हेतु मजदूरों के सहकारी संगठन का पक्षधर था।

लुई ब्लांक संगठन बनाने के पक्ष में :इन शुरुआती चिंतकों का मानना था कि मजदूरों की परेशानियों का मुख्य कारण पूँजीपतियों द्वारा अधिकाधिक मुनाफा कमाने की इच्छा है।

इस समस्या का समाधान शुरुआती चिंतकों के अनुसार राज्य के हस्तक्षेप में निहित छोटे उत्पादकों को भी लाभ प्राप्त होता है, न कि साम्यवाद में, जहाँ निजी हितों का दमन कर दिया जाता है।

क्रिश्चियन समाजवादी : MHI 02 Free Assignment In Hindi

फ्रांस के क्रिश्चियन समाजवादी भी मजदूरों की परेशानियों को दूर करने के लिए ऐसे ही विचार देते हैं। ये विद्वान ट्रेड यूनियन को सक्रिय करने तथा संपत्ति आंदोलन की शुरुआत पियरे गुइलामे फ्रेडरिक लप्ले ने 1863 में सोसाइटी फॉर सोशल इकोनॉमी की स्थापना करके की इसके सिद्धान्त ईसाई मानवतावादी सेंट साइमन के विचारों के अनुरूप थे।

सेंट साइमन के विचार मध्यम वर्ग में और सामाजिक सेवा-भाव रखने वाले पूँजीपतियों एवं सामाजिक सुधारकों में दिखते हैं।

जर्मन आलोचक : मार्क्स और एंगेल्स:-

जर्मनी में जो शुरुआती आलोचक हुए, वे सेंट साइमन के विचारों को मानने वाले और हीगल के समर्थक थे। जॉन कार्ल रॉबर्ट्स ऐसा ही आलोचक था, जो मजदूरों के हित में राज्य द्वारा प्रावधान करने तथा निजी सम्पत्ति के विनाश का समर्थक था।

फर्डिनेड लासाल मुनाफे में मजदूरों को भागीदारी मिले इसके लिए उसने कई मजदूर सहकारी संस्थाओं की भी स्थापना की। जर्मनी के समाजवादी आलोचकों में सबसे अधिक प्रभावी कार्ल मार्क्स और एंगेल्स सिद्ध हुए। इनके चिंतन ने समाजवादी चिंतन को नयी दिशा दी।

मार्क्स और एंगेल्स निजी सम्पत्ति के घोर विरोधी थे। इनका मानना था कि पूँजीवाद को शोषण का तो हथियार है ही, यह अलगाव का भी यंत्र है।MHI 02 Free Assignment In Hindi

मार्क्स का मानना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में, जिन्हें सर्वाधिक लाभ होता है, उनको भी अलगाव महसूस होता है। इस कारण मार्क्स पूँजीवादी व्यवस्था का विनाश अवश्यंभावी मानता है और भविष्य का मालिक सर्वहारा वर्ग को मानता है, जो पूँजीवादी व्यवस्था में होने वाले शोषण को बंद कर देगा।

मार्क्स इतिहास को आधार बनाते हुए कहता है कि प्रत्येक प्रकार के आर्थिक व्यवस्था के केन्द्र में सामाजिक सम्बन्ध महत्त्वपूर्ण होते हैं।

इसलिए किसी खास सामाजिक सम्बन्ध के लिए बनाई गई आर्थिक व्यवस्था एक निश्चित समय के बाद समाप्त हो जाती है।

मार्क्स मजदूरों के शोषण की बात करते अपना ध्यान कीमत में शामिल अतिरिक्त धन पर केन्द्रित करता है, जो मजदूरी और लागत चुकाने के बाद बचता है, जिसे पूँजीपति हड़प लेते हैं अ. यही पूँजीवादी शोषण है।

बदलती मान्यताएँ:-

मार्क्स के बाद के समाजवादी चिंतन पूँजीवादी शोषण में काफी बदलाव पाया। 19वीं शताब्दी का अंत आते-आते औद्योगिक पूँजीवाद पर वित्तीय पूँजीवाद का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के सहारे साम्राज्यवाद का विस्तार किया जाने लगा। लेनिन जैसे चिंतकों के लेखन में पूँजीवाद एवं साम्राज्यवाद की तीखी आलोचना की गई।

दूसरी ओर बर्नश्टाइन जैसे विद्वान तथा फेबियन समाजवादियों का मानना है कि पूँजीवाद के विकास के साथ-साथ शोषण कम होगा और पूँजीपति एवं सर्वहारा के बीच सहयोग का विकास होगा।

इससे व्यवस्था में एक संतुलन पैदा हो जाएगा। इस प्रकार के विचार से पूँजीवाद को लचीला बनाने की ओर ध्यान दिया गया। अब सामाजिक कल्याण की ओर ध्यान दिया जाने लगा। आर्थिक विनिमय की प्रक्रिया तथा बाजार तंत्र की ओर ध्यान दिया गया।MHI 02 Free Assignment In Hindi

1917 के बाद :

1917 की रूसी क्रांति के फलस्वरूप सोवियत संघ द्वारा औद्योगीकरण की वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत की गई। सम्पूर्ण पूँजीवादी विश्व को आर्थिक मंदी ने घेर लिया।

इससे पूँजीवादी व्यवस्था से लोगों का मोहभंग होने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् तो अनेक देशों में बोल्शेविक व्यवस्था के प्रति आकर्षण बढ़ा। बोल्शेविक समाजवाद पूँजीवाद में किसी भी प्रकार के संशोधन, सहकारिताबाद या फिर राज्य द्वारा नियमन को खारिज कर दिया।

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लेनिन जैसे अनेक समाजवादी राज्य को एक ऐसे साधन के रूप में देखते थे, जो समस्त समाज के लिए लाभकारी आर्थिक तंत्र विकसित करता है।

इससे शोषण को पूर्णतः एवं हमेशा के लिए समाप्त करने में मदद मिलती है। इसमें निजी सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण और उन्मूलन को आवश्यक माना गया।

आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध आर्थिक व्यवस्था को अपनाया गया। इससे औद्योगीकरण उत्पादन में वद्धि के साथ-साथ जनकल्याण के कार्य भी सम्भव हुए।

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी और समाजवाद की ओर बढ़ते आकर्षण ने पूँजीवाद में अनेक उदारवादी धारणाओं का विकास हुआ। सीमांत उपयोगिता के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए बाजार की कमियों की और ध्यान दिया गया।MHI 02 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार के सुधारात्मक सिद्धान्तों के आने से पूँजीवाद पर होने वाले समाजवादी हमले का सामना किया जा सका। इस बीच शिकागो स्कूल के मुद्रावादियों का प्रभाव भी बढ़ने लगा तथा कई अर्थशास्त्रियों द्वारा योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में बाजार की कीमतों में पैदा की जाने वाली विकृतियों पर भी हमला किया जाने लगा।

फलत: 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक यूरोप में समाजवादी सिद्धान्त की ओर लोगों की रुचि कम होने लगी। 1970 और 1980 के दशक में समाजवादी देशों में आए आर्थिक संकट ने समाजवादी व्यवस्था के प्रति संदेह को और भी बढ़ाया।

प्रश्न 3. नौकरशाहीकरण से आप क्या समझते हैं? ट्रेड यूनियनों में नौकरशाहीकरण की प्रक्रिया का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर आधुनिक राज्य का महत्त्वपूर्ण घटक नौकरशाहीकरण है। यह शासन करने की प्रणाली है, जो पदानुक्रम, विशेषज्ञता आदि पहलुओं पर आधारित होती है। दूसरे शब्दों में, आधुनिक विश्व में प्रशासन का संचालन करने में नौकरशाही व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

यह शासन व्यवस्था सभी आधुनिक राज्यों और गैर-राजकीय संरचनाओं में समाई हुई है। प्रशासनिक सेवाओं और सेना में इसे प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। राजनीतिक पार्टी, यूनियनों सहित धार्मिक तथा शैक्षिक एवं अन्य सेवाओं का भी यह एक अनिवार्य अंग बन गई है।

नौकरशाही के सदस्य पेशेवर एवं उच्च शिक्षा प्राप्त लोग होते नौकरशाही का अर्थ है निर्णय लेने की प्रक्रिया का केन्द्रीकरण। उल्लेखनीय है कि नौकरशाही हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो चुकी है।

जैसे-जैसे-राज्य के विभिन्न संस्थानों का केन्द्रीकरण होता जा रहा है, वैसे-वैसे-नौकरशाही सुदृढ़ होती जा रही है। अब नौकरशाही व्यवस्था इतनी विस्तारित हो चुकी है कि यह सरकारों के अलावा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों/संगठनों, यहाँ तक कि गैर-सरकारी संगठनों तक में व्याप्त हो चुकी है। MHI 02 Free Assignment In Hindi

नौकरशाह कानून के अनुसार वैध आदेशों को मानते हैं। नौकरशाही व्यवस्था इस तरह होती है, जिसमें अगर किसी सदस्य को हटा दिया जाए, तो पूरी व्यवस्था सुचारु ढंग से संचालित होती रहती है।

बावजूद इसके आधुनिक शासन है व्यवस्था में नौकरशाही शासकों के लिए औजार मात्र है। नौकरशाही शासन को संचालित करने की प्रणाली है, न कि स्वयं शासक ध्यातव्य है कि शासक या शासन के उच्चतर पदों पर बैठे लोग नौकरशाही की प्रक्रिया की बदौलत वहाँ नहीं पहुँचते।

हाँ, यह अवश्य है कि वह प्रशासन को नौकरशाही नामक औजार के माध्यम से संचालित करते हैं।

राज्य का जागरूक नागरिक नौकरशाही के मजबूत तंत्र के जरिए ही लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। लोकतंत्र में जितने भी बड़े और व्यापक संगठन हैं, सभी नौकरशाही व्यवस्था के अंतर्गत ही काम करते हैं।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है राजनीतिक पार्टियां। उल्लेखनीय है कि छोटे संगठन भी नौकरशाही व्यवस्था के माध्यम से कार्य करते हैं।

ट्रेड यूनियनों में नौकरशाही :-

20वीं शताब्दी में सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों का चरित्र पेशेवर हो गया है और उनके संचालन की जिम्मेदारी नौकरशाही व्यवस्था के हाथों में आ गई। नौकरशाही के होने की बात सेनाओं, प्रशासनिक सेवाओं तथा राज्य के मुख्य अंगों में की जाती थी।MHI 02 Free Assignment In Hindi

लेकिन आधुनिक औद्योगिक समाज की जटिलताओं ने ट्रेड यूनियनों में नौकरशाही की व्यवस्था को जन्म दिया। उल्लेखनीय है कि आधुनिक युग में ट्रेड यूनियन एक लोकतांत्रिक संस्था है।

अर्थात् यह आर्थिक और राजनीतिक शोषितों के कल्याण की बात करती है। यह लोकतांत्रिक पद्धति के आधार पर अपना कार्य करती है।

उल्लेखनीय है कि 19वीं सदी में कारखानों और कार्यस्थलों पर मजदूरों की न्यायोचित मांगों के सम्बन्ध में इनका जन्म हो जाता था, लेकिन तब मालिकों से इनका समझौता या वार्ता निहायत ही व्यक्तिगत किस्म का होता था।

लेकिन 1870 के पश्चात् औद्योगीकरण की तीव्र लहर ने दृश्यपटल पर नाटकीय परिवर्तन पैदा किया। कारखानों के भीमकाय आकार और आधुनिक तकनीक के उपयोग ने प्रबंधन को पेशेवर रूप दिया।

ट्रेड यूनियन अधिकारों का भी उदय हुआ। अब प्रबंधकों की तरह ही यूनियन अधिकारियों के लिए दक्षता, प्रशिक्षण सम्बन्धी योग्यता की जरूरत पड़ी।

अब नए यूनियन अधिकारी केवल मजदूर हितार्थ की मांग करने वाले मजदूर नहीं रह गए, बल्कि कार्यवाही की योजना बनाने, कमेटी के कार्यकलापों को संचालित करने वाले तथा समझौता वाता को कुशल से चलाने वाले हो गए।

अब यूनिक अधिकारियों को किसी एक उद्योग की स्थिति के आधार पर नहीं, अपितु सम्पूर्ण आर्थिक तंत्र की आवश्यकता के मद्देनजर योजना बनानी पड़ती थी।

इन यूनियनों के समक्ष यह स्थिति इसलिए पैदा हुई कि अब राजनीतिक पार्टियां भी चुनावों में जन-समर्थन के लिए इन पर आश्रित हो गई थी। MHI 02 Free Assignment In Hindi

उल्लेखनीय है कि राजनीतिक पार्टियों की तरफदारी करने के कारण इन्हें सम्बन्धित राजनीतिक पार्टियों की आशा के अनुरूप अपनी योजनाएँ बनाने और कार्यान्वित करने की जरूरत पड़ने लगी। अब पार्टी के नौकरशाही के अनुरूप इन्हें कार्य करने की जरूरत आ पड़ी।

राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के लिए यूनियनों ने अपने राष्ट्रव्यापी संगठन बनाए। इन विशालकाय संगठनों के संचालन के लिए अब पेशेवर अधिकारियों की आवश्यकता पड़ी।

यूनियनों के ये राष्ट्रीय संघ अब मालिकों के राष्ट्रीय संघ से वार्ता/समझौता करने लगे। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ब्रिटिश पूँजीपतियों का संघ ‘कंफेडेरेशन ऑफ ब्रिटिश इंडस्ट्री’।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् जर्मनी और इंग्लैंड में राजतंत्र के संचालन में यूनियनों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन यूनियनों ने निजी क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण, उच्च स्तर पर रोजगार सृजन, मजदूरों के हितार्थ कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण, नियोजित निवेश तथा रोजगार के अवसरों की गारंटी आदि योजनाओं पर बल दिया।

यूनियनों की यह सारी योजनाएँ राज्यतंत्र की नौकरशाही व्यवस्था के समान तैयार की गई थीं। इस तरह यूनियनों का पेशेवर चरित्र और भी सुदृढ़ होता गया।

लेकिन यह उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश यूनियन की संरचना विकेंद्रित है और ट्रेड यूनियन कांग्रेस का वर्चस्व राष्ट्रीय संघों और बड़ी औद्योगिक यूनियनों पर नगण्य था।MHI 02 Free Assignment In Hindi

ज्यादातर समझौते एक उद्योग की यूनियन और मालिकों के संघ के बीच होते हैं। एक ही उद्योग में कई-कई यूनियनों का जन्म हो जाता है। इस स्थिति को ब्रिटिश औद्योगिक सम्बन्धों के लिए उचित भी माना जाता है।

1949 में म्यूनिख कांग्रेस में जर्मन यूनियनों ने कंपनी के संचालकमंडल में भागीदारी, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने, उद्योगों के सामाजीकरण करने तथा योजना निर्माण आदि की मांगें रखीं। इनमें से कुछ हासिल भी हुआ।

1952 के ‘वर्क्स कंस्टीट्यूशन एक्ट’ ने कंपनी के संचालन में यूनियन को एक-तिहाई संचालकों को नामित करने का अधिकार दिया। जर्मनी की यूनियनों की गतिविधियों की विशेषता है कि वहाँ कानूनी औपचारिकताओं पर ध्यान दिया जाता था।

अर्थात् यूनियनों को कोई भी गतिविधि कानून के दायरे में रहकर करनी पड़ती थी। उल्लेखनीय है कि सामूहिक सौदेबाजी केवल यूनियन ही कर सकती थी, वह भी समझौते की अवधि के दौरान नहीं।

ध्यातव्य है कि यूनियनों का एक उद्देश्य नौकरशाही की प्रवृत्ति से निपटना भी था। नौकरशाही की इस प्रवृत्ति को यूनियन के निचले स्तर से अक्सर चुनौतियाँ मिलती रहती थीं। ब्रिटेन में इन संस्थाओं को शॉप स्टीवार्ट कहा जाता था।

ये यूनियन के सबसे निचले स्तर पर निर्वाचित निकाय होते थे। सदस्यों की तत्कालीन समस्याओं के समाधान की वकालत करने वाले थे।MHI 02 Free Assignment In Hindi

निकाय यूनियन की नौकरशाही की तुलना में ज्यादा क्रांतिकारी विचारों वाले थे। ब्रिटेन में इन निकायों ने हमेशा प्रबंधन तंत्र तथा सरकारों से समझौता करने की हिमायती यूनियन के नौकरशाही की आलोचना की।

लेकिन यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ में स्थिति इससे भिन्न एवं उलट थी। 1917 की रूसी क्रांति के पश्चात् वहाँ जो सरकार गा , हुई, वह घोषित रूप से मजदूरों की सरकार थी। उसका उद्देश्य मजदूरों के कल्याणार्थ कार्य करना था।

इसलिए वहाँ की यूनियनें मजदूरों के अधिक की मांग का दावा नहीं कर सकती थीं। यहाँ भी यूनियन, पार्टी, प्रबंधतंत्र तथा राजतंत्र की नौकरशाही संलग्न थी, लेकिन वे सभी एक ही नौकरशाही के अलग-अलग रूप थे।

कार्यकारी रूप से तो वे मंत्रालयों के समान एक-दूसरे से अलग थे, लेकिन सभी का लक्ष्य एक ही राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व को पोषित करना था। यहाँ यूनियनों का कार्य मजदूरों के हित में पार्टी की नीतियों के कार्यान्वयन का था।

श्रम सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण तो ऊपरी स्तर पर होता था और कारखाने के स्तर पर यूनियनें प्रबंधन के साथ मिलकर उन्हें लागू करती थीं।

इस तरह यह पता चलता है कि पूर्वी और पश्चिमी यूरोप में यूनियनों के कार्य भिन्न थे, लेकिन वे एक ऐसी व्यवस्था के घटक थे, जो एक पदानुक्रमबद्ध अधिकारी तंत्र था।

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प्रश्न 4. विऔपनिवेशिकरण क्या है? विऔपनिवेशिकरण के प्रति विभिन्न दृष्टिकोणों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- विऔपनिवेशीकरण अर्थात् उपनिवेशों का अंत, यानी नए-नए स्वतंत्र राज्यों का विश्वपटल पर उद्भव है। विऔपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता संग्राम एक-दूसरे से गहरे स्तर पर सम्बद्ध हैं।

विऔपनिवेशीकरण जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियों के पीछे हटने की प्रक्रिया की बात करता है, वहीं दूसरी ओर स्वतंत्रता संग्राम उस प्रक्रिया का बखान करता है कि किस प्रकार औपनिवेशिक शक्तियाँ व्यापक जन राष्ट्रवाद के कारण कमजोर हुई। MHI 02 Free Assignment In Hindi

1932 में जर्मन विद्वान मोरिट्ज जूलियस बॉन ने सर्वप्रथम विऔपनिवेशीकरण शब्द का इस्तेमाल समाज विज्ञान के विश्वकोष के साम्राज्यवाद पर लिखे अपने खण्ड के लिए किया था।

स्प्रिंगहॉल ने अपने हाल के अध्ययन में विऔपनिवेशीकरण को गैर-यूरोपीय लोगों पर बाह्य राजनीतिक सम्प्रभुता का समर्पण और जहाँ पहले पश्चिम का राज था, वहाँ स्वतंत्र क्षेत्रों का उदय या साम्राज्य द्वारा राष्ट्र-राज्यों की सत्ता के हस्तान्तरण के तौर पर परिभाषित किया है।

साम्राज्यवाद को सैद्धान्तिक आधार पर समझने के लिए तीन दृष्टिकोणों के तहत देखा जा सकता है :-

1. राष्ट्रवादी दृष्टिकोण

2. अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ दृष्टिकोण

3. साम्राज्यवाद की मजबूरी का दृष्टिकोण –

1. राष्ट्रवादी दृष्टिकोण :- राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का यह दृढ विश्वास है कि औपनिवेशिक सत्ता का अंत उपनिवेश के लोगों के प्रतिरोध की वजह से हुआ। हालाँकि यह प्रतिरोध ऐसा नहीं था कि अंतिम चरण में ही पनपे विरोध की प्रक्रिया शुरू से ही छिट-पुट किसी-न-किसी रूप में विद्यमान थी।

डी.ए. लो ने भी साम्राज्य के अंत तक प्राथमिक कारण साम्राज्य-विरोधी प्रतिरोध को ही माना है। वे यह भी कहते हैं कि औपनिवेशिक ताकतों ने र प्रतिरोध की प्रकृति को प्रभावित किया. परिणाम को नहीं।

जैसे उपनिवेशों के लोगों की जागरूकता बढ़ती गई. उनका प्रतिरोध उत्तरोत्तर उर्द्धव होता ग. उन्हें लगा कि उनके सहयोग से ही इनकी व्यवस्था चल रही है, फलतः उन्होंने असहयोग करना आरम्भ कर दिया।

ब्रितानी साम्राज्यवादियों ने इस अंत को एक सुव्यवस्थित एवं तार्किक रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। लेकिन अंत की यह प्रक्रिया जटिल और पेचीदा थी। MHI 02 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार की प्रक्रिया साम्राज्य की योजनाबद्ध व सुविचारित वापसी नहीं थी, उनकी ताकत कमजोर पड़ रही थी। उन लोगों ने स्थिति सुदृढ़ करने की जीतोड़ कोशिश की, पर एक न चली।

भारतीय संदर्भ पर अगर दृष्टिपात करें, तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 1930 के दशक के बाद से साम्राज्यवादियों का रुझान दमन के समझौते की ओर रहा। लेकिन इस स्थिति के कारण दुविधा उत्पन्न हुई।

जिन अधिकारियों की मदद को लेकर ब्रितानियों ने 1930 से 34 तक के नागरिक अवज्ञा आंदोलनों का दमन किया, उन अधिकारियों के हौंसले आगे चलकर पस्त होने लगे, कारण था कि 1937 में हुए चुनाव तथा प्रांतीय मंत्रिमंडलों के गठन के उपरान्त उन्हें उन्हीं नेताओं के अधीन कार्य करना पड़ा, जिन्हें वे आंदोलन के समय गिरफ्तार करते थे।

यह स्थिति 1942 के आंदोलन तथा 1946 के सरकारों के गठन के बाद और भी मुखर हुई। इस प्रकार हम देखते हैं कि साम्राज्यवाद के अंत का जो भी कारण रहा हो, लेकिन शक्तिशाली राष्ट्रवाद का उद्भव उन सभी में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था।

अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ:- दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ दृष्टिकोण के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त बदले हुए वैश्विक समीकरणों ने विऔपनिवेशीकरण की प्रवृत्ति को तीव्र किया। युद्ध पूर्व की फ्रांस और इंग्लैंड जैसी औपनिवेशिक ताकतें अपनी पूर्व स्थिति खो चुकी थीं, युद्ध ने उन्हें जर्जर बना दिया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त विभिन्न राष्ट्र वैचारिक आधार पर गोलबंद होने लगे थे। अब अमेरिका और सोवियत रूस महाशक्ति के रूप में उभर चके थे। MHI 02 Free Assignment In Hindi

पुरानी साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा स्थापित उपनिवेशों का कायम रहना इन नवोदित राष्ट्रों की हित पूर्ति में बाधक था। इन राष्ट्रों की नजरें एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों के साथ सम्पर्क करने के लिए सजग थीं

उदाहरणार्थ, वियतनाम से फ्रांस के हटते ही अमेरिका ने वहाँ अपनी स्थिति बना ली। सोवियत रूस ने पूर्वी यूरोप, क्यूबा और मोजाम्बिक जैसे प्रदेशों को लगभग उपनिवेश जैसा ही माना।

इन घटनाओं के अतिरिक्त 20वीं सदी के आरम्भ से ही यूरोपीय अजेयता का भ्रम खत्म होने लगा था। 1902 के आंग्ल-जापान संधि, 1905 रूस-जापान युद्ध में रूस की पराजय तथा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानियों की सफलता ने विऔपनिवेशीकरण की प्रवृत्ति को तीव्र करने में मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वहन किया।

अटलांटिक घोषणापत्र, 1960 का संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र भी साम्राज्यवाद के प्रति बदले हुए वैश्विक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।

अब औपनिवेशिक शासन की तीखी आलोचना की जाने लगी। इसे संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र में बुनियादी मानवाधिकारों की अस्वीकृति और उल्लघंन के रूप में देखा जाने लगा।

साम्राज्यवाद की मजबूरी का दृष्टिकोण :- विऔपनिवेशीकरण के पीछे साम्राज्यवाद की अपनी दुविधाएँ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में हुए बदलाव भी कार्य कर रहे थे। हॉलैंड ने कहा है कि एक समय ऐसा उपस्थित हो जाता है, जब उपनिवेश जनक देशों के लिए सिरदर्द बन जाता है।

वैसी स्थिति में उस पर धन और संसाधन व्यय करना भी बद्धिमानी प्रतीत नहीं होती। इस प्रकार जैसे-जैसे यह स्थिति गंभीर होती जाती है, वैसे-वैसे औपनिवेशिक राष्ट्रों की उपनिवेश के प्रति चाहत समाप्त होती जाती है।

इतिहासकार जॉन गालाघर ने भारत का हवाला देते हुए कहा है कि भारत अब ब्रिटिश साम्राज्य के सामरिक, वाणिज्यिक और वित्तीय हितों का संरक्षण नहीं कर पा रहा था।

आनल सील ने यहाँ तक कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की सुरक्षा आवश्यकता के लिए ब्रिटेन को धन जुटाना पड़ा। आदित्य मुखर्जी ने इस बात का विरोध करते हुए कहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत का आर्थिक दोहन और भी बढ़ गया था। MHI 02 Free Assignment In Hindi

बी.आर. टामलिसन ने विऔपनिवेशीकरण को साम्राज्यवादी और विश्व अर्थव्यवस्थाओं में परिवर्तन के अतिरिक्त भारतीय पहलू को भी माना है।

लेकिन उनके अनुसार यह पहलू राष्ट्रवादी दबाव नहीं था, बल्कि साम्राज्यवादी सरकारों द्वारा अपने नागरिकों पर लादे जा रहे वित्तीय बोझ से पैदा असंतोष था।

आर.जे. मूर ने अपनी रचना एस्केप फ्रॉम एम्पायर में द्वितीय विश्व युद्ध के अन में ब्रिटेन की अपार आर्थिक हानि की ओर ध्यान खींचा है। एक अन्य कारण युद्धोत्तर काल में कल्याणकारी राज्य का विस्तार तथा वैचारिक बदलाव भी था।

यही कारण युद्ध में विजयी होने के बावजूद भी कंजर्वी पार्टी युद्ध में विजयी होने के बाद भी सत्ता से दूर रही और 1945 में लेबर पार्टी की सरकार बनी। उस समय ब्रिटेन में ऐसी स्थिति बन गई थी कि जा भी नेता विऔपनिवेशीकरण की बात करता, वह शीघ्र ही लोकप्रिय हो जाता था।

1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत पर पकड़ बनाए रखने के विरुद्ध कई तर्क दिए, जिसमें संसाधनों की अपर्याप्तता, जनमत का अभाव, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में अलग-थलग पड़ने का भय, सैनिकों पर अविश्वास अथवा सैनिक संगठन का अभाव जैसी प्रमुख बातें शामिल थीं।

इतिहासकार डेविड एक भिन्न मत प्रस्तुत करते हैं। उनका मानना है कि विऔपनिवेशीकरण के कारणों की तालाश मेट्रोपोलिस में न करके उपनिवेशों में करनी चाहिए।

लेकिन यह सोच पूरी तरह यूरोप-केन्द्रित है। यह विचारधारा विऔपनिवेशीकरण के कारण मेट्रोपोलिस के आंतरिक, राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन को मानता है। वह उपनिवेशों के राजनीतिक दलों की पहल को अहमियत नहीं देता है। MHI 02 Free Assignment In Hindi

निष्कर्षत: विऔपनिवेशीकरण के सैद्धांतिक आधार को स्पष्टतया समझने के लिए राष्ट्रवादी दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ दृष्टिकोण तथा साम्राज्य …की मजबूरी का दृष्टिकोण आदि बिन्दुओं का अध्ययन सहायक साबित होगा।

भाग ख

प्रश्न 7. उपनिवेशीकरण क्या है? उपनिवेशीकरण के विभिन्न चरणों की चर्चा कीजिए।

त्तर उपनिवेशवाद पूँजीवाद के विकास की एक ऐसी विशिष्ट अवस्था है, जिसमें पारंपरिक अर्थव्यवस्था में आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था द्वारा हस्तक्षेप किया जाता है। इसके अंतर्गत समाज और अर्थव्यवस्था का नियंत्रण विदेशी पूँजीवादी वर्ग के हाथ में रहता है।

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था न तो पूँजीवादी बन पाती है और न ही पूँजीवाद से पूर्व की अवस्था में रह पाती है। उपनिवेशवाद ने सामाजिक तथा उत्पादक शक्तियों को विकसित करने की जगह उसे अविकसित बनाया।

पूँजीवाद में जहाँ पूँजीपतियों को लाभ होता है, वहीं उपनिवेशवाद में देश पर नियंत्रण करने वाली विदेशी शक्ति को लाभ प्राप्त होता है।

इस कारण उपनिवेशों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष प्रारंभ हुआ, न कि वर्ग-संघर्ष। उपनिवेशवाद में औपनिवेशिक देश एवं उपनिवेश के बीच असमान विनिमय इसकी एक मुख्य विशेषता है।

दूसरी विशेषता असमान श्रम-विभाजन, निम्न प्रौद्योगिकी, विदेशी राजनीतिक प्रभुत्व, बाहरी एकीकरण और भीतरी विघटन एवं सम्पत्ति की निकासी मुख्य विशेषताएँ हैं।

उपनिवेशवाद की तीन विशिष्ट अवस्थाएँ थीं। ये अवस्थाएँ 200 सालों तक रहीं। कोई उपनिवेश इन तीनों अवस्थाओं से गुजरे, इसकी कोई प्रत्याभूति नहीं थी। MHI 02 Free Assignment In Hindi

अधीनता के समय के तरीके के साथ ये अवस्थाएँ उसी तरह बदले, जैसे औपनिवेशिक नीति, शासन और उसकी संस्थाएँ, सांस्कृतिक विचार तथा विचाराधाराएँ बदलीं। एक अवस्था के लक्षण दूसरी अवस्था में भी दृष्टिगोचर होते थे।

यह अवस्थाएँ चार घटकों का परिणाम थीं :-

  1. विश्व-व्यवस्था के रूप में पूँजीवाद का ऐतिहासिक विकास।
  2. मेट्रोपोलिस के समाज, अर्थव्यवस्था और राज-व्यवस्था में परिवर्तन।
  3. विश्व-अर्थव्यवस्था में उसकी स्थिति में बदलाव और
  4. उपनिवेश का स्वयं ऐतिहासिक विकास।

पहली अवस्था : एकाधिकार व्यापार तथा लूटपाट

उस अवस्था के दो आधरभूत उदेश्य थे पहला व्यापार एकाधिकार बनाए रखना। इसके तहत देशी उत्पादों को सस्ते दामों पर खरीदना, स्थानीय या यूरोपीय व्यापारियों को प्रतिस्पर्धा से दूर रखना इत्यादि की कोशिश की जाती थी। स्थानीय व्यापारियों को लाभप्रद व्यापार से क्षेत्रीय विजय में भी दूर रखना।

दूसरा, उपनिवेश की राजनीतिक विजय के कारण लूटपाट का अवसर मिला। के.एम. पन्निकर ने इसी समय के भारत स्थित ब्रिटिश सरकार को ‘डाकू राज्य’ की संज्ञा दी है।

उसी समय भारतीय धन का बड़े पैमाने पर ब्रिटेन की ओर पलायन हुआ। यह रकम उस समय ब्रिटेन की राष्ट्रीय आय का दो या तीन प्रतिशत थी। उस अवस्था में सिर्फ पारम्परिक अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था पर औपनिवेशिक व्यवस्था लाद दी गयी। इस अवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं किए गए।

द्वितीय अवस्था : मुक्त व्यापार का युग :- MHI 02 Free Assignment In Hindi

यह अवस्था पहली अवस्था से बिल्कुल भिन्न थी। औपनिवेशिक राष्ट्रों को निर्मित मालों की बिक्री के लिए बाजार की जरूरत थी। इसके लिए यह आवश्यक था कि उपनिवेशों के निर्यात में वृद्धि करके उसकी क्रय शक्ति को बढ़ाया जाए।

इस अवस्था में औपनिवेशिक बुर्जुआ वर्ग ने उपनिवेशों, अनियंत्रित लूट-पाट का विरोध किया। इसका कारण उपनिवेशवासियों के प्रति सद्भाव नहीं था, बल्कि उनके अपने स्वार्थ थे, जिनके तहत वे उपनिवेशों से दीर्घकालिक लाभ लेने की आकांक्षा रखते थे।

उनकी नजर में उपनिवेश ऐसी मुर्गी थी, जो सोने का अंडा देने वाली थी। अत: इसे बचाकर रखने में ही भलाई थी।

इस अवस्था में उपनिवेश का आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक ढाँचा नए तरीके से शोषण करने के लिए रूपान्तरित किया गया।

निर्यात के लिए भारी मात्रा में कच्चा माल बन्दरगाहों पर ले जाने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए यातायात, संचार व्यवस्थाएँ विकसित की गईं।

इस अवस्था का नारा था विकास और आधुनिकीकरण। उदारवादी साम्राज्यवाद अब नई राजनीतिक विचारधारा थी। शासकों ने उपनिवेशवाद का लक्ष्य लोगों को स्वशासन में प्रशिक्षित करना बताया।

तीसरी अवस्था : वित्तीय पूँजीवाद का युग :- MHI 02 Free Assignment In Hindi

इस अवस्था में उपनिवेशों पर नियंत्रण का शिकंजा और भी सख्त हुआ। कारण यह था कि औपनिवेशिक राष्ट्रों के पास पूँजी का संचय काफी हो गया था।

फलतः उसका निवेश वहीं करना ज्यादा उचित था, जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियों के अपने उपनिवेश थे। इस अवस्था में कच्चे माल के स्रोतों एवं अनाज के लिए भी संघर्ष देखे गए।

विचारधारा के क्षेत्र में उदारवाद का स्थान प्रतिक्रियावाद ने ले लिया। अब स्वशासन की चर्चा भी नहीं की जाने वाली थी। अब नई प्रबुद्ध तानाशाही के तहत औपनिवेशिक जनता को उन बच्चों की तरह देखा जाता था, जिन्हें हमेशा अभिभावकों की जरूरत पड़ने वाली थी।

इस अवस्था में उपनिवेशवाद का अपना अंतर्विरोध स्पष्ट रूप से सामने आया। उपनिवेशवाद की एक जरूरत यह थी कि उपनिवेशों का विकास और आधुनिकीकरण हो।

उनमें विदेशी माल को खरीद सकने की क्रय क्षमता बढ़े, साथ विदेशी पूँजी को जब्त करने की क्षमता भी। सीमित आधुनिकीकरण की एक योजना भी अमल में लाने की कोशिश की गई, ताकि स्थिति सुधर सके।

लेकिन उपनिवेशवाद की प्रक्रिया ने ही उपनिवेशों का इस प्रकार दोहन किया था कि विकास और आधुनिकीकरण की संभावना सीमित हो गयी थी। MHI 02 Free Assignment In Hindi

इस स्थिति में उपनिवेशों के पास शोषण करने लायक कुछ संचित भी नहीं था। इस काल में स्थिति इतनी भयावह हो गयी थी कि उपनिवेश कच्चे माल तक की आपूर्ति में भी वृद्धि करने की स्थिति में नहीं रह गए थे।

तीसरी अवस्था सामान्यता आरम्भ नहीं हो पायी। कई उपनिवेशों में शोषण के पुराने तरीके जारी रहे। उदाहरणार्थ, भारत में तीसरी अवस्था में भी पहली दोन। अवस्थाओं के लक्षण मुख्य रूप से जारी रहे।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर उपनिवेशवाद का प्रभाव

भारतीय अर्थव्यवस्था को उपनिवेशवाद ने क्रमिक रूप से तीन चरणों में प्रभावित किया। पहली अवस्था में बंगाल और दक्षिण इस अवस्था में भारतीय समाज में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हुए।

केवल सैन्य संगठन, प्रौद्योगिकी और राजस्व प्रशासन के शीर्ष पर ही परिवर्तन किए गए। ग्रामीण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ किए बगैर ही राजस्व प्राप्त करने की तरकीब निकाल ली गयी। विचारधारा के क्षेत्र में पारम्परिक व्यवस्थाओं एवं मूल्यों के साथ भी छेड़छाड़ नहीं की गयी।

दूसरे चरण में भारत खाद्यान्न और कच्चे माल के संभरक और निर्मित माल के बाजार के रूप में मुख्यतया बना रहा। मैनचेस्टर में निर्मित सस्ते माल के साथ प्रतिस्पर्धा ने भारतीय जुलाहों का सर्वनाश कर दिया।

औद्योगीकरण के बजाय उद्योगों की अवनति की प्रक्रिया का आरम्भ हुआ। कृषि जनसंख्या का भरण-पोषण के लिए अधिकाधिक दबाव पड़ना शुरू हुआ। MHI 02 Free Assignment In Hindi

रेलवे का विस्तार किया गया और एका आधुनिक डाक और तार व्यवस्था चालू की गई। प्रशासन को अधिक व्यापक बनाया गया।

नए प्रशासन को चलाने के लिए ‘बाबू तैयार’ करने के उद्देश्य से आधुनिक शिक्षा व्यवस्था लागू की गई। पाश्चात्य प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया जाने लगा, ताकि ब्रितानी सामान की माँग में वृद्धि हो सके।

अब तत्कालीन संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन के लिए पारम्परिक संस्कृति की भर्त्सना की जाने लगी। प्राच्यवाद जो कि भारतीय संस्कृति का प्रशंसक था, ने भारतीयों की वर्तमान को समझने की इच्छा को हतोत्साहित ही किया।

इसके विपरीत नई विचारधारा, जिसके समर्थकों में मैकाले का नाम सर्वविदित है, विकास पर आधारित थी। भारत का अविकसित रहना नई विचार, की इच्छा का परिणाम नहीं, बल्कि उपनिवेश के क्रियाकलापों का अवश्यंभावी परिणाम था।

तीसरी अवस्था को वित्तीय पूँजी के युग के रूप में जाना जाता है। पूँजी का एक बड़ा हिस्सा रेलवे में लगाया गया, व्यापार एवं भारत सरकार को कृण के तौर पर दिया गया और खेत-बागानों, कोयला खनन, जूट की मिलों, जहाजरानी तथा भारत में बैंकिंग पूँजी में लगाई गई।

इस अवस्था में ब्रिटेन की स्थिति को नए साम्राज्यवादी देशों की प्रतिस्पर्धा से लगातार चुनौतियाँ मिल रही थीं। फलतः भारत पर नियंत्रण मजबूत किया गया। MHI 02 Free Assignment In Hindi

प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी नीतियों ने लिटन और कर्जन के वायसराय होने को विशिष्ट ठहराया। स्वशासन की सब बातें समाप्त हो गई और भारत के नादान लोगों पर ब्रिटेन का स्थायी अधिदेश शासन घोषित कर दिया गया।

भारत में औद्योगिक विकास को बल तब मिला, जब विश्व अर्थव्यस्था से भारत का जुड़ाव कमजोर हुआ। खासकर विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने का मौका मिला।

दो विश्व युद्धों के दौरान विदेशी व्यापार और विदेशी पूँजी का आयात कम होने से स्वतंत्र आर्थिक विकास का सुअवसर मिला।

चूंकि औपनिवेशिक सम्बन्ध टूटे नहीं थे, बल्कि सिर्फ शिथिल पड़े थे, इसलिए इस दौरान जो कुछ भी हुआ, वह केवल औद्योगिक विकास था, औद्योगिक क्रांति नहीं।

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प्रश्न 9. बीसवीं सदी में हुए वुछ प्रमुख तकनीकी नवाचारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर 1750 से 1770 के बीच इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का प्रारम्भ हुआ। लगभग पूरी 18वीं सदी तक परम्परागत तकनीकी ज्ञान जरूरत के अतिरिक्त और भी बड़ा आविष्कार नहीं हो सका।

इस सदी में एक उल्लेखनीय कार्य 1769 में जेम्सवाट द्वारा कन्डेन्सर का आविष्कार है, जिसने न्यूकोमेन द्वारा बनाए गए वाष्प इंजन को अधिक कारगर बनाया। MHI 02 Free Assignment In Hindi

1802 में रिचर्ड ट्रेविथिक ने उच्चतर वाष्प दाब की खोज की। ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में विद्युत ऊर्जा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण आविष्कार 1884 में चार्ल्स पार्सन्स ने किया। इसके आविष्कार डायनेमों को तेज गति से नाचने के लिए सक्षम बनाया।

जॉर्ज स्टीफेनसन और उसके बेटे रॉबर्ट ने रेल का इंजन बनाया। यह पूर्णतः वाष्प इंजन था। इसने यातायात व माल ढुलाई के क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

वाष्प-शक्ति ने समुद्री यातायात को बदल कर रख दिया। अमेरिका के रॉबर्ट फुल्टान ने क्लेरमोंट नामक स्टीम बोट में वाष्प इंजन का प्रयोग करके पहली बार प्रयोग किया। 1843 में ब्रिटेन में दुनिया का पहला लोहे का जहाज निर्मित हुआ।

बिजली के आविष्कार में कई वैज्ञानिकों का योगदान रहा है जिसमें अमेरिका के बेंजामिन फ्रेंकलिन, इटली के एलेस्साट्रो वोल्टा और ब्रिटेन के | माइकेल फैराडे प्रमुख हैं। फैराडे ने 1831 में विद्युत-धारा और चुम्बकत्व के बीच के सम्बन्ध की प्रकृति को स्पष्ट किया।

19वीं सदी में छपाई के क्षेत्र उच्च गति वाले रोटरी प्रेस व लाइनोटाइप मशीन के प्रयोग ने छपाई में क्रांतिकारी बदलाव प्रस्तुत किए। MHI 02 Free Assignment In Hindi

संचार के क्षेत्र में इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ का आविष्कार ब्रिटेन के सर विलियम कुक और सर चार्ल्स ह्वीटस्टोन ने किया। पहली टेलीग्राफ लाइन अमेरिका में बाल्टिमोर और वाशिंगटन के बीच चली।

19वीं सदी में क्रीमिया के युद्ध में भारत में 1857 के विद्रोह के दमन में इसका कारगर इस्तेमाल किया गया। टेलीग्राफ के बाद 1876 में अलेक्जेन्डर ग्राहमबेल ने टेलीफोन का आविष्कार किया। वायरलेस टेलीग्राफी का आविष्कार 19वीं सदी के अंत में मारकोनी ने किया।

चिकित्सा के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए। विलियम हार्वे द्वारा रक्त संचार की जानकारी, एडवर्ड जेनर द्वारा टीके की खोज प्रमुख हैं।

टीके की खोज ने रोगों से बड़े पैमाने पर लोगों को मरने से बचाया। लुई पाश्चर ने टीकाकरण को और कारगर बनाते हुए कई रोगों से रोकथाम के टीके बनाए। पाश्चर को ही जीवाणुशास्त्र की स्थापना का श्रेय दिया जाता है।

एनेस्थेसिया के रूप में अमेरिका का योगदान महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए नाइट्रस ऑक्साइड, ईथर और क्लोरोफार्म का इस्तेमाल किया जाता है।

1898 में रूटजेन द्वारा एक्स-रे की खोज ने रोगों की पहचान और उपचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सिग्मंड फ्रायड ने साइक्रियाटी को विकसित किया। चिकित्सा के क्षेत्र में इन आविष्कारों ने चिकित्सा कार्य के स्वरूप को ही बदल दिया।

20वीं सदी में इन आविष्कारों को और विकसित होने का मौका मिला तथा नये-नये आविष्कार भी हुए। जैसे वायुयान एंटीबायोटिक्स, रॉकेट, दूसरे ग्रहों पर यान भेजना, इलेक्ट्रॉनिक्स, परमाणु ऊर्जा कीटनाशक इत्यादि। इन सभी ने एक अकल्पनीय सामाजिक संरचना को जन्म दिया, जो संभावनाओं व खतरों से भरी हुई है।

20वीं सदी में लोहे के साथ अन्य धातुओं को मिलाकर मिश्र धातु बनाई गई। इसमें टंग्सटन इस्पात, मैंगनीज इस्पात, स्टेनलेस इस्पात का व्यापक पैमाने पर उपयोग हो रहा है।

दवा के क्षेत्र में भी 20वीं सदी में काफी आविष्कार हुए। एस्पीरिन की खोज हुई। इसी सदी में सल्फोनल टिपनोटिक्स और बार्बिच्यूरेट दवाइयों पर भी काम हुए। एंटीबायोटिक के रूप में पेनसिलन की खोज अलेक्जेन्डर फ्लेमिंग द्वारा की गई। MHI 02 Free Assignment In Hindi

अमेरिका द्वारा 1990 से 2003 के बीच जीनोम प्रोजेक्ट पर कार्य हुए। विश्व के अन्य देशों में इस पर कार्य जारी है।

20वीं सदी में पहले से चली आ रही अनुसंधानात्मक प्रक्रिया और भी परिपक्व हुई। इन सभी को एक साथ अभिव्यक्त करना आसान नहीं है।

फिर कुछ आधारभूत और अत्यंत महत्त्वपूर्ण खोजों की चर्चा करना अनिवार्य है। इसी सदी में वायुयान, रॉकेट, अन्य ग्रहों पर यान भेजना, इलेक्ट्रॉनिक्स, परमाणु ऊर्जा, एंटीबायोटिक्स, कीटनाशक जैसी चीजें आविष्कृत हुईं, जिन्होंने सुविधा के साथ-साथ संकट भी उत्पन्न किया है।

इस सदी की एक खास बात है कि यद्यपि लोहा आज भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, लोहे के वर्चस्व को चुनौती मिल रही है।

यह चुनौती मिश्र धातुओं द्वारा, मकानों में शीशे व कंक्रीट का अधिक मात्रा में उपयोग के कारण तथा प्लास्टिक जैसे नए पदार्थों के उत्पादन व व्यापक फैलाव के कारण है।

इस सदी में स्वयं लोहे के साथ अन्य धातुओं को मिलाकर क्रमश: टंगस्टन इस्पात, मैगनीज इस्पात, स्टेनलेस इस्पात आदि मिश्र धातुएं बनाई गई हैं। MHI 02 Free Assignment In Hindi

दवा के क्षेत्र में 1856 में कुनैन के संश्लेषण की प्रक्रिया में कोलतार से प्रथम एनीलाइन डाई की खोज हुई। 1899 में एस्पीरिन की खोज हुई।

इसी के साथ सल्फोनल हिपनोटिक्स और बार्बिच्यूरेट दवाइयों में भी उन्नति हुई। जर्मनी के पाल एहलिक ने सिफलिस रोग की दवा का पता लगाया।

1935 में एक जर्मन सिन्थेटिक डाइस्टफ कम्पनी ने प्रोन्टोसिल का आविष्कार किया, जो ब्लड प्वाइजनिंग रोकने की कारगर दवा सिद्ध हुई। अलेक्जेन्डर फ्लेमिंग ने पेनसिलिन का आविष्कार किया। एन्टीबायोटिक हानिकारक सूक्ष्मजीवियों से शरीर की रक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में संक्रामक रोगों को नियंत्रित करने ने सफलता मिली। बायोकेमिस्ट्री और फिजियोलॉजी में हुई नई खोजों में सूक्ष्म परीक्षणों एवं उपचारों को दिशा दी।

बायोमेडिकल, इंजीनियरिंग क्षेत्र में मिली सफलताओं ने फिजिशियनों एवं सर्जनों को अल्ट्रासाउन्ड, कम्पयूटराइज्ड एक्सीएल टोमोग्राफी (कैट स्कैन), न्यूक्लीयर मैग्नेटिक एजोनेंस के द्वारा अन्दरूनी शरीर की रचना एवं कार्यविधि की जाँच कर सकने में सक्षम बनाया।

ह्यूमन जेनोम प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका में मनुष्यों के डीएनए और अन्य दूसरे अंगों के परीक्षण पर वैज्ञानिक शोध हुआ है, लेकिन अभी इसके आँकड़े प्रकाश में आने में समय लगेगा। विश्व के अन्य देशों में भी इस पर कार्य चल रहा है। MHI 02 Free Assignment In Hindi

MHI 01 Free Assignment In Hindi July 2021 & Jan 2022

MHI 02 Free Assignment July 2021 & Jan 2022

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