IGNOU MHI 01 Free Assignment In Hindi 2021-22-Helpfirst

MHI 01

प्राचीन एव मध्यकालीन समाज

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MHI 01 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 3. प्राचीन यूनानी सभ्यता के प्रजातंत्र में रूपान्तरण का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर संभ्रांत वर्ग और किसानों के बीच हुए संघर्ष का समय पुरातन युग 800 से 500 ई.पू. के बीच का है। इस संघर्ष के मूल कारण हमें अन्धकार युग के उत्तरार्द्ध में ही मिलने शुरू हो जाते हैं।

इस समय भूमिपति अभिजात वर्ग की स्थिति मजबूत होती चली गयी। पुरातन युग में इस अभिजात वर्ग ने भूमि और यूनानी राज्यों के राजनैतिक ढांचे पर अपना अधिकार जमा लिया था। इस समय छोटे किसानों के लिए कई समस्याएं खड़ी हुईं, जैसे

छोटे किसान भूख से मरने लगे।
जिन अमीर भूमिपतियों से वो ऋण लेते थे, उसे न चुका ।
पाने की स्थिति में उन्हें गुलाम बना लिया जाता था।
किसानों से उनकी जमीन छीन ली जाती थी।

राजनैतिक सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं थी, आदि। इस प्रकार की अनेक समस्याओं का सामना किसानों को करना पड़ रहा था, जिससे परेशान होकर छोटे किसानों ने अभिजात वर्ग के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया।

यह संघर्ष लम्बा चल रहा था। इससे अभिजात वर्ग के लिए संकट पैदा होना शुरू हो गया और अब वे अपनी समृद्धि बचाने के लिए किसानों को कुछ रियायतें व सुधार देने के लिए राजी हो गये थे।

एथेन्स में हुए कुछ सुधारों के सम्बन्ध में हमें प्रमाण मिलते हैं। जैसे 594 ई.पू. में एथेन्स में सोलोन नामक व्यक्ति को पंच नियुक्त किया गया, जिससे सुधार किये जा सकें और उनके लिए प्रारूप तैयार किया जा सके।

सोलोन को व्यापक अधिकार दिये गये थे। इन सुधारों को बनाने और लागू करने के लिए उसने निम्नलिखित सुधार किये MHI 01 Free Assignment In Hindi

भूमि का पुनर्वितरण और ऋण बंधन से मुक्ति किसानों की सबसे बड़ी मांग थी, क्योंकि ऋण बंधन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी। सोलोन के सुधार किये कि जो किसान ऋण नहीं दे सकते उन्हें बन्दी न माना जाये। किसानों का मौजूदा ऋण भी माफ कर दिया गया।

सोलोन के सुधारों के कुछ दशकों के भीतर ही स्वाभाविक रूप से एथेन्स में नए आन्दोलन शुरू हो गये। दूसरे राज्य भी इस प्रकार के सुधारों को लागू करवाने के लिए आन्दोलन करने लगे या जिन राज्यों में सुधार आधे-अधूरे रूप से हुए थे,

वहां भी इन्हें पूर्ण रूप से कराने के लिए आन्दोलन शुरू हो गये। इस अशांत माहौल में कई राजनीतिक सत्ताओं का तख्ता पलट दिया गया और उसकी जगह तानाशाही शासन ने ले ली।

इन घटनाओं के कारण अधिकांश यूनानी राज्यों के शासन की प्रकृति पूरी तरह से बदल गयी। एथेन्स में पेसीसट्रेटस नामक व्यक्ति ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और अपने आपको सर्वोच्च शासक घोषित कर दिया।

इस प्रकार की सरकार को तानाशाही का नाम दिया गया। इसने कई सुधार किये, जैसे मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था का अन्त किया गया। कुलीनतंत्र संस्थाओं का सफाया किया।

इन यूनानी तानाशाही सरकारों को गरीब किसानों का और ऐसे वर्ग का समर्थन प्राप्त था, जिन्होंने व्यापार से धन तो कमाया था, परन्तु राजनैतिक सत्ता में उनकी भागीदारी नहीं थी।

527 ई.पू. में जब पेसीसट्रेटस की मृत्यु हुई, तो उसकी जगह उसका पुत्र हिप्पियास गद्दी पर बैठा। इस प्रकार एक तानाशाही शासन को राजवंशीय शासन में बदलने का प्रयास किया गया।

इससे लोगों में बड़ा असन्तोष उत्पन्न हुआ और वैसे भी इस समय तक तानाशाही शासन की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। परिणामस्वरूप 510 ई.पू. में हिप्पियास को अपदस्थ कर दिया गया। यह विधि यूनान में क्लासिकी जनतंत्र की शुरुआत मानी जाती है। MHI 01 Free Assignment In Hindi

क्लासिकी युग और उसके बाद भी यूनान में तानाशाही शासन को अच्छी दृष्टि नहीं देखा जाता था। परन्तु इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि इस तानाशाही ने ही कुलीनतंत्र से जनतंत्र की ओर बढ़ने का रास्ता साफ किया

तानाशाहों ने उन समस्याओं को कमजोर कर दिया था, जिसके तहत अभिजात वर्ग राजनैतिक सत्ता हथियाए हुए था। यह घटना 600 ई.पू. के आसपास होनी शुरू हुई और सिर्फ एथेन्स तक सीमित न होकर यह घटना कई जगहों पर हुई।

इस प्रकार हम देखते हैं कि किस तरह किसानों द्वारा शुरू किये गये अभिजात वर्ग के संघर्ष से तानाशाही की स्थापना हुई और उसका स्थान धीरे-धीरे जनतंत्र ने ले लिया।

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प्रश्न 4. दक्षिण अफ्रीका क्षेत्र में अर्थव्यवस्था और सरकार के संगठन का एक संक्षिप्त वर्णन दीजिए।

उत्तर दक्षिणी अफ्रीका मानव सभ्यता के इतिहास की तुलना में नया राज्य था। उसके उत्तर में बोसवाना और नामिबिया है। काफी पहले से ही दक्षिणी अफ्रीकी क्षेत्र में लोग रहा करते थे।

ये लोग मुख्यतः शिकारी-संग्रहकर्ता और जंगली जानवरों को मारकर अपना जीवनयापन करते थे। उस क्षेत्र में रहने वाले आदिम लोगों को बुशमेन कहा जाता है।

ये लोग शिकारी संग्रहकती के बाद पशुपालक बने तथा भेड़-पालन आरम्भ किया तथा उन पशुपालकों को होटेनटोट्स कहा जाता है। समय के साथ इन लोगों ने पशुपालन के साथ ही साथ खेती करना भी आरम्भ कर दिया। MHI 01 Free Assignment In Hindi

जिन लोगों ने कृषि कार्य और किया, उन्हें काफ्फिर कहा जाता है। ये समुदाय, जाति, भाषायी आधार पर बँटे हुए थे सान शिकारी-संग्रहकर्ता थे खोईखोई पशुपालक थे गुनी किसान थे। नगुनी को भाषा के आधार पर जुलु एवं जोसा में विभाजित किया जाता है।

दक्षिणी अफ्रीका की अर्थव्यवस्था मिश्रित खेती अर्थव्यवस्था थी। मिश्रित खेती में कषि और धातकर्म के साथ-साथ पशपालन तथा शिकार और संग्रह भी शामिल था। बन्तु लोग मैगनाइट भी निकाला करते थे। ये लोग तांबे का उपयोग करना भी जानते थे।

यहाँ के लोगों की अर्थव्यवस्था के आधार पशु थे। यहाँ के लोगों का धन पशु था, जो कि अकाल के समय उनके लिए काफी उपयोगी होता था। पत्नी प्राप्त करने के लिए भी पशुधन आवश्यक था।

दुल्हन का मूल्य केवल पशु के रूप में ही होता था। खोईखोई समाज यहाँ का धनी वर्ग था। बन्तु लोग झाड़ियों को साफ कर उसे खेती योग्य बनाते थे, हालांकि उस क्षेत्र में सीसी नामक मक्खी का प्रकोप था।

पशुपालन समाज में स्त्री और पुरुष के बीच काम का स्पष्ट बंटवारा था। पुरुष पशुधन की देखरेख करते थे। बच्चा 10 वर्ष की उम्र से ही काम करना प्रारम्भ कर देता था। दक्षिणी अफ्रीकी गांव पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं थे। धातु से बने सामानों की जनता में काफी मांग थी।

हालांकि यहाँ किसी बड़े बाजार का प्रमाण नहीं मिला है। माल ढोने के लिए बैलों का इस्तेमाल किया जाता था। बुजुर्ग पुरुष चिकित्सा, पुरोहित आदि काम किया करते थे। महिलाएँ भी खेती में साथ देती थीं।

पुरुष जंगल साफ करके खेत बनाने का काम करते थे। उसके बाद खेती का काम महिलाएं किया करती थीं। परंत महिलाएँ परुषों के अधीन होती थीं। MHI 01 Free Assignment In Hindi

दक्षिणी अफ्रीका के बन्तुभाषी समाज में दुल्हन का मूल्य एक अनूठी परंपरा थी। शादी के बाद महिला पीहर जाकर वहाँ का काम संभाला करती थी। परंतु महिला की शादी के लिए ससुराल वालों को दुल्हन का मूल्य देना होता था। दुल्हन का मूल्य पशुधन होता था।

जिन पुरुषों के पास ज्यादा पशुधन होता था, दुल्हन के माता-पिता उसी से अपनी बेटी की शादी करना चाहते थे, ताकि दुल्हन के मूल्य के रूप में उन्हें ज्यादा पशुधन मिल सके।

दक्षिणी अफ्रीका के लोगों की विशिष्ट राजनीतिक संस्थाएँ थीं। अधिकांश समुदायों में राजा या सरदार होता था। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों के राजवंश का आकार अलग-अलग था।

नगुनी राज्य बिखरा हुआ था। दक्षिणी सोथो राज्य भी छोटा था। राज्य के सरदारों से यह अपेक्षा की जाती थी कि अच्छी फसल के लिए वह अच्छी वर्षा करवाएँ। सरदारों के परिवारों में अन्तर्विवाह होने से भी राजनीतिक व्यवस्था छोटी होती थी। सरदार बनने के लिए भी पश संसाधन का होना आवश्यक था।

कुछ राज्यों में उनके समूहों का एक सामूहिक गण चिह्न भी होता था। राजनीतिक इकाइयों का मिलन और अलगाव जैसी घटनाएं भी होती थी। MHI 01 Free Assignment In Hindi

उसका कारण आक्रमण या राजकुमारों की महत्त्वाकांक्षा होती थीं। बढ़ती जनसंख्या के कारण भी संसाधनों पर उसका दबाव पड़ा होगा और लोगों द्वारा उसकी आपूर्ति करने के लिए आक्रमण किये जाते थे।

भाग ख

प्रश्न 8. मध्यकाल में वस्त्र उत्पादन और काँच निर्माण का एक संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर मध्ययुग में भारत का सूती कपड़ा उद्योग सबसे प्राचीन शिल्प रहा था। यहाँ विभिन्न किस्म के कपड़ों का उत्पादन होता था, जिसका निर्यात एशिया और यूरोप के विभिन्न हिस्सों में होता था। कपड़ों को रंगीन बनाने के लिए दो विधियाँ इंडोनेशियाई बाटिक विधि और पटोला विधि का प्रयोग किया जाता था।

बाटिक विधि में कपड़ों को रंग में डुबोने से पहले डिजाइन को मोम से ढक दिया जाता था और पटोला विधि में कपड़ा बुनने से पहले धागों को रंग दिया जाता था।

अरबों द्वारा धनुषाकार धुनकी से रुई धुनी जाती थी और उसे बुना जाता था और बुनाई के लिए करघे का इस्तेमाल किया जाता था। मध्य एशिया और इस्लामी देशों में कालीन निर्माण एक प्रमुख उद्योग था। इसमें करघे को खड़ा करके रखा जाता था।

मिस्र और न्यूबिया में भी लंबे समय से बुनाई उद्योग मौजूद था। सेनेगल के बाढ़ वाले मैदान में कपड़े का उपयोग के पुरातात्त्विक प्रमाण मिले हैं। कपड़ों को बुनने के लिए पतले सींकचों का इस्तेमाल होता था। इथोपिया में बड़े पैमाने पर कपड़ा बनाया जाता था। MHI 01 Free Assignment In Hindi

चीन में महिलाएँ घरों में कताई और बुनाई का काम करती थीं। रेशम उत्पादन का काम शिल्पी किया करते थे। ईरान के सम्पर्क में आने के पश्चात् बुनाई के तरीकों में परिवर्तन आया।

सासनिद पद्धति के मोतियों के काम में चित्र भी बनाये जाने लगे। रेशम पर सोने से जरी का काम किया जाता था। चीनी लाख के रोगन की पुरानी तकनीक अपनाते थे।

मध्यकाल में यूरोप में ऊन, फ्लक्स एक प्रकार के पौध के रेशे, सन, रेशम और सूत से कपड़े बनाये जाते थे। इटली, झलैंड और बेल्जिका में ऊनी वस्तुओं का निर्माण किया जाता था।

दक्षिणी इटली के ऊनी उद्योग में कुशल और अकुशल मजदूर काम पर लगाये जाते थे। इन इलाकों में भेड़ पालन किया जाता था तथा तटवर्ती क्षेत्र का प्रयोग कच्ची ऊन को धुनने सुखाने और कपड़े बनाने के लिए किया जाता था। । उत्तरी इटली में ऊन का विकास हुआ।

पैटवियम में गैन्सेपे नाम से विख्यात मजबूत चित्रवल्ली बनायी जाती थी। वेरोना अच्छे किस्म के कम्बलों उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था।

8वीं शताब्दी के अंत तक इंग्लैंड की विभिन्न राजशाहियों और कैरोलिंजी साम्राज के उत्तर-पूर्वी हिस्से में ऊनी उद्योग विकसित हुआ। उत्तम कोटि की पोशाकें ऊन के प्रकारों और रंगों की वजह से काफी मूल्यवान थीं।

दक्षिणी फ्रांस में आरटोइस (Artois) में सेंट ओमीर (Saint-Omer), दोउई लिल्ली (Douai Lillie) और तौरनाई (Tournai) प्रमुख कपड़ा उत्पादक क्षेत्र थे। शिल्पी कपड़ों का उत्पादन विशेषज्ञता और कौशल से युक्त लोग करते थे। कपड़ों की रंगाई किसी चरण में भी की जा सकती थी।

ऊन निकालने से लेकर तैयार माल बनाने के लिए ऊन बुनने की प्रकिया को कई चरणों से गुजरना पड़ता था। महिलाएँ ऊन में तेल लगाकर कताई करती थीं। MHI 01 Free Assignment In Hindi

13वीं शताब्दी में चरखे के आविष्कार ने कताई की प्रकिया में काफी सुधार किया। बाद में धागा बनाकर बुनकरों के पास भेजा जाता था। अब दो बुनकर एक साथ बैठकर काम करने लगे और चौड़े-चौड़े कपड़ों का उत्पादन करने लगे। कपड़ों को धोने का काम बड़े-बड़े कड़ाहों में किया जाता था।

13वीं शताब्दी के दौरान कपड़ा निर्माण की लघु एवं कुटीर इकाइयाँ खोली गयी। इतालवी व्यापारी दूसरे क्षेत्रों से ऊन और तैयार कपड़ों का आयात करके उनको रंगकर दूसरे क्षेत्रों में निर्यात कर देते थे।

जेनोआ में स्पीयरमैन द्वारा कपड़ों को अंतिम रूप दिया जाता था। पाइरस में कपड़ों की रंगाई कर उन्हें अंतिम रूप दिया जाता था। अब कई धुलाई मिलों की स्थापना की गयी, जहाँ पर जल का इस्तेमाल किया जाता था।

13वीं शताब्दी के दौरान नॉरफोल्क उच्च कोटि के हल्के कपड़े बनाने के लिए प्रसिद्ध था। इसमें लम्बी ऊन का इस्तेमाल किया जाता था। ऊन की केवल कंघी की जाती थी और घिसाई की जरूरत कम पड़ती थी।

कपड़ों को लाल रंग से रंगने के लिए कर्स का उपयोग किया जाता था, जो एशिया माइनर, स्पेन और पुर्तगाल से तथा नीले रंग के लिए नील भारत से यूरोप में आयात किया जाता था।

सर्वप्रथम चीन ने पोर्सेलिन और सेरामिक के बर्तनों का उत्पादन शुरू किया। पोर्सेलिन एक प्रकार की एक मिट्टी होती थी, जो एक निश्चित तापमा पर गर्म करने पर वह अर्धपारदर्शी और चमकीला रूप ले लेती है।

जो पेट्यून्टस (Petuntse) नाम के खनिज से प्राप्त किया जाता है। इन दोनों के सम्मिः से बर्तन कठोर और मजबूत बनता है। _एशिया में मिट्टी के बर्तनों का काफी उपयोग होता था। कुम्हार चाक को घुमाकर मिट्टी के बर्तनों को विभिन्न रूप देते थे। कच्चे बर्तनों को आग पर पकाया जाता था।

रंगीन शीशा अल्यूमिना मिले लौहमय रेत से बनाया जाता था। इन्हें रंगीन बनाने के लिए धात्विक ऑक्साइड का उपयोग होता था। धौकनी की प्रक्रिया से असमतल प्लेटों का निर्माण होता था। शीशे के टुकड़ों को जरूरत के मुताबिक जोड़ा जाता था। ग्रिसाइल नामक भूरे पेस्ट से रंग दिया जाता था।

13वीं शताब्दी में खिड़की के लिए बड़े आकार के शीशों की माँग बढ़ी। चार्टर्स और पेरिस में बड़े पैमाने पर इन शीशों का उत्पादन होने लगा। खिड़की के शीशे बनाने तथा रंगने की प्रक्रिया आसान हो गयी।

वेनिस तथा यूरोप के अन्य हिस्सों में शीशे के बर्तन बनाये जाने लगे। बेल्जियम और बोहेमिया में बने शीशे के बर्तन काफी प्रसिद्ध थे। MHI 01 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 9. मध्यकालीन यूरोप में जनसांख्यिकी परिवर्तन के उत्तरदायी विभिन्न कारकों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर एशिया और यूरोप की जनसंख्या के सीमित मात्रा में आँकड़े उपलब्ध होने के कारण जनसंख्या में ठीक-ठीक उतार-चढ़ाव का पता लगाना मुश्किल है।

फिर भी जो उपलब्ध आँकड़े हैं, उनके आधार पर एक मोटी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। दरअसल इसके आकलन के लिए भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग विधियों का प्रयोग किया गया है।

चूंकि विद्वानों ने यूरोप की जनसंख्या के आकलन में अधिक कार्य किया है. इसलिए यूरोप की जनसंख्या के उतार-चढ़ाव को अधिक विश्वसनीय माना जा सकता है।

एशिया के विषय में काम कम होने के कारण इसकी सही तस्वीर नहीं प्राप्त की जा सकती, किन्तु एक सामान्य जानकारी प्राप्त की जा सकती है।।

मध्य यूरोप की तुलना चीन में प्रौद्योगिकी; जैसे मुद्रण कला, नौकायन, कम्पास और बारूद का विकास पहले हुआ था। इसलिए चीन की जनसंख 600 ई. के आसपास 50-60 मिलियन थी, जो 1500 ई. में बढ़कर 110-120 मिलियन हो गई। MHI 01 Free Assignment In Hindi

किन्तु चीन की जनसंख्या के वितरण में प्रादेशिक भिन देखने को मिलती है। जैसे यांग्त्जे घाटी के दक्षिण में कृषि क्षेत्र के प्रसार के कारण जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई, जबकि उत्तरी क्षेत्र बारहवीं शताब्दी में घुमंतू लोगों के आक्रमण और फिर तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमण के कारण जनसंख्या में तीव्रता से कमी आई।

भारत में 600 ई. में जनसंख्या लगभग 50-55 मिलियन थी, जो 1500 ई. में बढ़कर 100-110 मिलियन हो गई। यहाँ भी हम जनसंख्या में प्रादेशिक भिन्नता देखते हैं।

चूँकि गंगा नदी क्षेत्र में उपजाऊ कृषि भूमि अधिक मात्रा में उपलब्ध होने के कारण मुख्य आबादी गंगा नदी के आसपास ही बसी हुई थी। मोरलैण्ड जिन्होंने भारत की जनसंख्या का पहली बार अनुमान लगाया था।

इनके अनुसार 1600 ई. में भारत की जनसंख्या 100 मिलियन थी। बाद में शीरिम मूसवी ने कृषि भूमि के क्षेत्रफल और भू-राजस्व के आँकड़ों के आधार पर इसमें सुधार किया और बताया कि 1600 ई. में भारत की जनसंख्या लगभग 145 मिलियन के बराबर थी।

विद्वानों द्वारा यूरोप की जनसंख्या पर अधिक कार्य करने के कारण यहाँ की जनसंख्या के उतार-चढ़ाव का अनुमान लगाना आसान है। निम्न तालिका की मदद से छठी शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी तक जनसंख्या में होने वाले विकास को समझा जा सकता है। MHI 01 Free Assignment In Hindi

ऊपर दिए गए आँकड़ों से पता चलता है कि 500 ई. से पश्चिमी यूरोप की जनसंख्या में धीरे-धीरे वृद्धि शुरू होती है, किन्तु छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में महामारी फैलने से जनसंख्या में कमी आने लगती है।

खासतौर पर इटली की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि होती है। यहाँ तक कि 650 और 1000 के बीच यह दुगनी हुई और पुनः फिर 1000 से 1340 के बीच भी दोगुनी हो जाती है।

तैरहवीं शताब्दी के अंतिम 25 वर्षों में इस वृद्धि दर में कमी आने लगती है। चूँकि चौदहवीं शताब्दी के मध्य में प्लेग के प्रकोप के कारण जनसंख्या में तीव्र गति से कमी आने लगती है और आगे 1450 आते-आते यूरोप की जनसंख्या घटकर लगभग 50 मिलियन रह जाती है, जो 1000 ई. में 73.5 मिलियन थी।

पुनः एक बार फिर 1500 ई. के लगभग वृद्धि शुरू होती है। आगे 1700 ई. के आसपास जनसंख्या 115 मिलियन तक हो जाती है।

विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या अनुमान का आधार अलग-अलग है। जैसे डूम्सडे बुक के आधार पर 1085 ई. के लगभग इंग्लैण्ड की जनसंख्या 1.3 मिलि. मानी गई, जबकि फ्रांस और इटली में राजकोषीय सर्वेक्षणों के आधार पर फ्रांस में 12 से 16 मिलियन और इटली में 8 से 10 मिलियन मानी गई है।

ऐसा अनुमान व्यक्त किया जाता है कि 1050 से 1250 ई. के बीच कृषि भूमि का विस्तार, उत्पादकता में वृद्धि, प्रौद्योगिकी के प्रसार और शहरों के उदय से अच्छी जीवन-शैली और अच्छे भोजन और जन्म दर में वृद्धि के कारण जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होती है, MHI 01 Free Assignment In Hindi

जो पहले अकाल के कारण कम हो गई थी। पुनः बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में अकाल की बर्बरता एवं तीव्रता में वृद्धि होने लगती है,

किन्तु इसका प्रभाव सीमित क्षेत्रों में रहने के कारण औसत जनसंख्या पर प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी तरह, तेरहवीं शताब्दी में शिशु मृत्यु, गर्भपात और युद्धों में कमी आने से जनसंख्या पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

यूरोप की जनसंख्या वृद्धि चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में उच्चतम बिन्दु पर थी। जैसे मध्य इटली में औसतन प्रति वर्ग कि.मी. 13 से 14 घर-परिवार और कहीं-कहीं प्रति वर्ग कि.मी. में 30 परिवार तक बसे हुए थे।

आँकड़ों से पता चलता है कि जनसंख्या वृद्धि और ह्रास में कोई समानता नहीं है। जहाँ कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या में वृद्धि होती है, तो दूसरे क्षेत्र में कमी होती है।

साथ ही साथ जहाँ महामारी के प्रकोप के कारण जनसंख्या में कमी आती है, वहीं अकाल और महामारी खत्म होने पर एवं यूरोप में तीव्र गति से विकास के कारण जनसंख्या में वृद्धि होती है।

इस तरह हम उपर्युक्त विश्लेषणों से यूरोप की जनसंख्या में उतार-चढ़ाव और इसके उत्तरदायी कारकों को समझ सकते हैं। MHI 01 Free Assignment In Hindi

जैसा कि हम जानते हैं कि मध्ययगीन यरोप की जनसंख्या लगभग 440 मिलियन हो गई थी। यह वृद्धि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न थी।

800 ई. से मध्य काल तक कृषि, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था में शहरी विकास और व्यापार के प्रसार ने जनसंख्या वृद्धि मुख्य रूप से योगदान दिया किन्तु प्लेग और अन्य बीमारियों से जनसंख्या को बहुत क्षति पहुँची।

यहाँ तक कि जनसंख्या में एक ठहराव-सा आ गया। प्लेग जैसी बीमारियों के निम्न कारण थे।

अर्थव्यवस्था के विकास के कारण शहरी क्षेत्रों का विकास हुआ। इन शहरी केन्द्रों में जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण लोग गंदे माहौल या गंदी बस्तियों में रहने के लिए अभिशप्त थे, साथ ही वहाँ पर्याप्त चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी।

इसलिए जब भी प्लेग जैसी बीमारियों का आगमन हुआ, तो इसका फैलाव वृहत् क्षेत्रों में हो गया। इसके साथ ही व्यापारिक मार्गों से इसका प्रसार अन्य क्षेत्रों में हो गया। MHI 01 Free Assignment In Hindi

धीरे-धीरे इन बीमारियों ने पूरे यूरोप को अपनी चपेट में ले लिया। चौदहवीं शताब्दी में प्लेग नामक महामारी का आगमन हुआ, जिसने लगभग सम्पूर्ण विश्व को हिला कर रख दिया।

यह बीमारी चूहों के द्वारा फैलती है। यह एक अति संक्रामक रोग था, जिससे मनुष्य की ग्रंथियाँ बेकार हो जाती थीं। प्लेग के होने से शरीर पर गहरे नीले और काले चकते निकल आते थे, इसलिए इसे काली मौत भी कहा जाता था। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति की मौत तीन दिन में हो जाती थी।

जैसा कि माना जाता है कि इस रोग का आगमन सबसे पहले 1331-32 में मंगोलिया में हुआ था। वहाँ से व्यापारिक मार्गों से होते हुए 1339 ई. में क्रीमिया, 1347 में इटली, 13 में पेरिस और दिसम्बर तक चैनल, निचले देशों और दक्षिण इंग्लैण्ड तक पहुँच गया।

इस बीमारी से लगभग सभी यूरोपीय देश प्रभावित हुए, यहाँ तक कि इन देशों को तबाह कर दिया। दूसरी बार प्लेग का आगमन 1360 ई. में हुआ किन्तु अब प्लेग के साथ-साथ एक और बीमारी एन्फ्लूएंजा होने के कारण स्थिति पहले से भी खराब हो गई।

प्लेग 1510 ई. तक कुछ वर्षों के अन्तराल पर आता रहा और इसके प्रकोप से लोग मरते रहे, किन्तु 1410 ई. में ही इसके आतंक एवं तीव्रता में कमी आने लगी थी। MHI 01 Free Assignment In Hindi

प्लेग से मरने वालों की संख्या को लेकर इतिहासकारों में एकमत नहीं रहा है। फिर भी इतना तो जरूर है कि इससे यूरोप की पाँचवें हिस्से से लेकर

आधी जनसंख्या समाप्त हो गई थी। इंग्लैण्ड के टैक्स रिकॉर्ड के अनुसार 1388 ई. और 1415 ई. में वहाँ की जनसंख्या महामारी के पूर्व 3,125,000 थी, जबकि 1358 ई. में यह 2,750,000 हो गई। एक आकलन के अनुसार यूरोप में तेरहवीं शताब्दी की तुलना में वयस्क पुरुषों की संख्या आधी रह गई थी।

चूँकि प्लेग के प्रकोप की सही-सही संख्या का पता नहीं लगाया जा सकता, परन्तु बदलती जलवायु और बढ़ती शहरी भीड़ के कारण निश्चित रूप से अधिक लोगों की मृत्यु हुई होगी।

कामकाजी पुरुष जनसंख्या में कमी आने से मूल्य, मजदूरी कृषि, मजदूर और मालिक सम्बन्ध प्रभावित हुए। कारखानों के मालिकों ने अपनी स्थिति सुरक्षित रखने के लिए कई मजदूर अधिनियम बनाए, जिससे मजदूरी स्थिर रहे।

दरअसल वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो गई थी, इसलिए मजदूरों ने अधिक वेतन की माँग की, जिसके न मिलने के कारण धीरे-धीरे विद्रोह का रूप धारण कर लिया। MHI 01 Free Assignment In Hindi

चौदहवीं शताब्दी में यूरोप के कई देशों में वर्षा अधिक होने और शीत ऋतु में ठंड ज्यादा पड़ने से खाद्यान्न का उत्पादन अच्छा नहीं हो सका।

ऐसा माना जाता है कि जलवायु में इस परिवर्तन के कारण लोगों की संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो गई। साथ ही साथ मध्ययुगीन जीवन-शैली, खान-पान इत्यादि ने भी रोगों को अपनी ओर आकर्षित किया।

इन्हीं कारणों से शहरों और गाँवों में टायफाइड, मधुमेह, टी.बी., मलेरिया, चेचक, इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों से मनुष्य ग्रसित होने लगे।

अत: ऊपर के अध्ययन से पता चलता है कि इन मध्यकालीन बीमारियों ने यूरोप को विविध प्रकार से प्रभावित किया। जैसा कि हम जानते हैं कि बीमा ने जहाँ एक ओर जनसंख्या को कम किया, वहीं दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक असमानता को भी बढ़ाया।

जनसंख्या कम होने के कारण उत्पादन में कमी आयी। फिर भी इन रुकावटों के बावजूद यूरोप अपने वाणिज्य और व्यापार के बल पर आगे बढ़ता रहा। MHI 01 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 10. (i)मध्ययुगीन यूरोप में प्रमुख वैज्ञानिक प्रगतियाँ

उत्तर पुनर्जागरण के साथ ही आधुनिक विज्ञान का प्रारंभ माना जाता है। मध्ययुगीन यूरोप के बौद्धिक जीवन पर चर्च का अधिकार था।

किसी भी विचार को तब तक सत्य नहीं माना नहीं जाता था, जब तक चर्च द्वारा स्वीकृत प्राचीन दार्शनिकों के विचारों से समर्थित न हो।

पुनर्जागरण काल के विचारकों ने ऐसे अंधविश्वासों पर विश्वास करने से इंकार कर दिया। बेकन ने कहा कि अवलोकन और परीक्षण के द्वारा ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

बेकन ने ज्ञान के तीन आधार-अनुभव, तर्क एवं प्रमाण बताए और इन तीनों में उसने प्रमाण को सबसे प्रमुख माना। यह नवीन दर्शन पूर्व के रूढ़िवादी दर्शन से अलग था, जिसने सभी चीजों को तर्कपूर्ण एवं संदेहपूर्ण दृष्टि से देखने की दृष्टिकोण दिया।

आरंभिक वैज्ञानिक खोज खगोलविज्ञान के क्षेत्र में हुई। कोपरनिकस ने प्रतिपादित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है और सूर्य की परिक्रमा करती है। MHI 01 Free Assignment In Hindi

यह पुराने परंपरागत विचार से बिल्कुल भिन्न था। प्राचीन काल से यह मान्यता चली आ रही थी कि पृथ्वी विश्व के केन्द्र में स्थित है। इसलिए इस विचार को धर्म-विरोधी करार दिया गया।

कोपरनिकस के सिद्धांत की पुष्टि बाद में गेलिलियो ने की। गैलिलियो का जन्म कोपरनिकस की मृत्यु के ग्यारह साल बाद हुआ था।

गैलिलियो ने अपनी दूरबीन से कोपरनिकस के सिद्धांत की पुष्टि की बुढ़ापे में गैलिलियो पर मुकदमा चलाया गया। उसे धर्मविरोधी घोषित किया गया और उसे अपने विचार वापस लेने के लिए विवश किया गया।

जर्मनी के वैज्ञानिक केपलर ने गणित की सहायता से स्पष्ट किया कि ग्रह किस प्रकार सूर्य की परिक्रमा करते हैं। उसने ग्रहों की गतियों और कक्षाके बारे में नियम प्रस्तुत किया।

न्यूटन ने केपलर के कार्य को आगे बढ़ाया। गणित की ही सहायता से न्यूटन ने सिद्ध किया कि सभी खगोलीय पिंड गुरुत्वाकर्षण के अन्तर्गत यात्रा करते हैं। साथ ही न्यूटन ने गति के तीन सिद्धांत भी प्रतिपादित किये।

इन वैज्ञानिकों के साथ विज्ञान के जिस आधुनिक युग का आरंभ हुआ, उसने न केवल मानव के ज्ञान में वृद्धि की, बल्कि अन्वेषण की एक ऐसी विधि भी प्रस्तुत की, जिसका दूसरे विषयों के अध्ययन में उपयोग किया जा सकता था।

इ. में बल्जियमवासी वैज्ञानिक वसलिए न अपना सचित्र ग्रंथ ‘द ह्यूमनी कापोरिस फाब्रिका’ प्रकाशित किया। यह ग्रंथ मानव शरीर के उसके विच्छेदन-कार्या पर आधारित था।

इस ग्रंथ में पहली बार मानव शरीर को रचना क्रिया के बारे पूर्ण जानकारी प्रस्तुत की गई थी। ट्रिनिटी में चर्च के विश्वास को चुनौती देने के अपराध में उसे मौत की सजा दी गई। MHI 01 Free Assignment In Hindi

इंग्लैंडवासी वैज्ञानिक हार्वे ने रक्त परिसंचरण की सतत क्रिया अर्थात् रक्त का हदय से शरीर के सभी अंगों में पहुंचना और फिर हृदय में वापस लौटने का विवरण प्रस्तुत किया।

इस ज्ञान से अतीत की अनेक गलतियों को सही करना संभव हुआ। स्वास्थ्य तथा रोगों की समस्याओं के अध्ययन का एक नया रास्ता खुला।

नये आविष्कारों से जो नया ज्ञान प्राप्त हुआ, उसका तत्काल व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। हालांकि मुद्रण की व्यवस्था ने नए प्रचारों को फैलाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

किन्तु आविष्कारों के प्रचार में और आम जीवन में शामिल करने में लंबा समय लगा। जैसाकि हम जानते हैं कि अरबों के द्वारा भारतीय अंक यूरोप में 13वीं सदी में पहुंचा।

शून्य सहित दस गणनाओं के लिए बहुत ही सुविधाजनक थे, फिर भी रोमन अंकों का प्रचलन जारी रहा। मानवीय अंक पद्धति ने यूरोप के गणित के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपर्युक्त चर्चा से पता चलता है कि पुनर्जागरण का सर्वाधिक प्रभाव विज्ञान पर पड़ा। मध्ययुग में चर्च के प्रति आस्था में कमी से लोग संकीर्ण विचारों को त्यागकर आधुनिक विचारों के संपर्क में आए, जिससे विज्ञान का विकास हुआ।

केपलर, कोपरनिकस, न्यूटन, हार्वे आदि ने विज्ञान की विभिन्न विधाओं में एक नया आयाम प्रदान किया। उस काल में वैज्ञानिकों ने न सिर्फ नवीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, बल्कि पूर्व ज्ञान को अपने में समेटकर नवीन कल्पनाओं का सृजन किया। MHI 01 Free Assignment In Hindi

(iv)सामंतवाद का पतन

उत्तर 1920 और 30 के दशक में बेल्जियन इतिहासकार हेनरी पिरेन ने अपनी पुस्तकों मेडिवल स्टिोज : देयर ऑरिजिन एण्ड द रिवाइवल ऑफ ट्रेड’, ‘इकोनोमिक एण्ड सोशल हिस्ट्री ऑफ मेडिवल यूरोप’ तथा ‘ मोमहम्मद एण्ड शार्लमान्य’ में सामंतवाद के उत्थान और पतन में व्यापार की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी

पिरेन के अनुसार लम्बी दूरी का व्यापार, जिसे वे ‘ग्रैंड ट्रेड’ कहते थे, सभ्यताओं के फलने-फूलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है और किसी कारण से यदि इसमें बाधा पहुँचती है, तो सभ्यता की प्रगति रुक जाती है।

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में होने वाले व्यापार ने यूरोपीय सभ्यता को शिखर पर पहुंचा दिया, क्योंकि यह न केवल समाज की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया, बल्कि सभ्यता और संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ। अरबों द्वारा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में आक्रमण के कारण व्यापार-वाणिज्य बाधित हुआ।

पूर्व (एलेक्जेंड्रिया), पश्चिम (जिब्राल्टर) और मध्य स्थित सारडीनिया पर मुसलमानों ने कब्जा जमा लिया। यूरोपीय अर्थव्यवस्था अंतर्मुखी हो गयी। व्यापार-वाणिज्य सीमित रूपों में होता था।

लम्बे व्यापार के समाप्त होने से विचारों का आदान-प्रदान भी समाप्त हो गया। 11वीं शताब्दी में धर्मयुद्धों के द्वारा अरबों को उनके घर मध्यपूर्व तक धकेल दिया गया। पूनः लम्बी दूरी के व्यापार शुरू हुये।

शहरी केन्द्र पुनः जी उठे। यह सामंतवाद के अंत का आरम्भ था। उन्होंने इस रूपांतरण का महत्त्व दिखाने के लिये ‘शहरी जीवन व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है’ जैसी कहावत को उद्धृत किया।

इस प्रकार, पिरेन ने सामंतवाद और व्यापार के बीच आधारभूत विभाजन सम्बन्ध स्थापित किया है, जिसका चोली-दामन का साथ है। MHI 01 Free Assignment In Hindi

यूरोपीय सामंतवाद को समझाने और उसे एक अवधारणा के रूप में ढालने में इसका एक महत्त्वपूर्ण योगदान है और काफी लम्बे समय तक यह इतिहासकारों के बीच बहस और विचार-विमर्श का केन्द्र बना रहा।

प्रख्यात इतिहासकार जॉर्जेस ड्यूबी ने हेनरी पिरेन और अन्य इतिहासकारों द्वारा दी गयी दलीलों से अलग हटकर अपनी बात कही।

ड्यूबी ने अपनी पुस्तकों ‘रूरल इकोनॉमी एण्ड कन्ट्री लाइफ इन द मेडिवल वेस्ट’ और ‘अर्ली ग्रोथ ऑफ यूरोपियन इकोनॉमी से बहस की धारा ही बदल दी।

ड्यूबी ने पश्चिमी यूरोप में मध्यकाल के दौरान श्रम और भूमि के क्षेत्र में आंतरिक विकास की ओर ध्यान दिलाया और इस युग में हो रहे परिवर्तनों पर प्रकाश डाला।

श्रम की प्रक्रिया में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों ने ग्रामीण परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। परिवर्तन के कारण कृषक वर्ग के भीतर आपसी अन्तर बढ़ता जा रहा था। दूसरी ओर अधिपतियों के वर्ग में भी विभेद पैदा हो रहा था।

अधिपति अपनी भू-सम्पदाओं की खेती, अनाज के भण्डारण और बिक्री के लिये पूरी तरह से कारिन्दों (bailiffs) और छोटे अधिकारियों (provosts) पर निर्भर थे, जो थोड़ी ऊँची हैसियत वाले किसान थे।

सामाजिक नैतिकताओं के कारण अधिपति वर्ग यह कार्य नहीं कर रहे थे। किसानों से वसूल वि गया सारा अनाज बेचकर प्राप्त हुआ सारा धन अधिपतियों को नहीं देते थे और बीच में ही हड़प जाते थे।

ये किसान धीरे-धीरे धनी होते चले गये। धीरे-धार ये कारिन्दे एक लम्बे समय के लिये भू-सम्पदाओं का हिस्सा अधिपति से ठेके पर लेने लगे। वे खुद खेती करवाते थे और तय की उपज या धन अधिपति को दे दिया करते थे। ठेके का मुनाफा-नुकसान कारिन्दों को सहना पड़ता था। MHI 01 Free Assignment In Hindi

धीरे-धीरे ये कारिन्दे ठेकेदार बन गये। अधिपति का कर और भू-राजस्व वसूल करने का अधिपति अधिकार भी ठेक पर लिया जाने लगा कारिन्दे खेतों में मजदूरों की नियुक्ति करते थे।

इसके लिये उन्हें मजदूरी दी जाती थी, क्योंकि उन्हें अधिपतियों के समान उनसे बेगार लेने की अनुमति नहीं थी। वे खेती सिर्फ मुनाफे के लिये करते थे। सामंती अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का प्रवेश होने लगा।

अब गाँव पूँजीवादी कृषक या नव धनाढ्य वर्ग पैदा होने लगा, जो ठेठ सामती संस्कृति से मेल नहीं खाता था। वह अपनी पूँजी लगाकर लाभ कमाना चाहता था और पूरी अर्थव्यवस्था पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता था।

सामंती व्यवस्था में एलौड बिल्कुल अलग थे। ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र के बाजारों का प्रभाव एलौड के कृषि कार्य पर पड़ा। उनकी फसलों के प्रकार का निर्धारण अब बाजार करने लगे।

अब वे उन फसलों को उपजाने लगे, जिनसे ज्यादा मुनाफा होता था। इस तरह कुछ एलौड पूर्व पूँजीपति उत्पादक के रूप में उभरकर सामने आये।

उच्च स्तर के अधिपति को किसानों से मुफ्त सामान व सेवा लेने का अधिकार था, वहीं छोटे अधिपतियों को ये विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे। उनकी जमीनों पर उनका अधिकार था, परन्तु उनसे तरह-तरह की सेवाएं लेने का उन्हें अधिकार प्राप्त नहीं था। MHI 01 Free Assignment In Hindi

मजदूर बाहर जाने लगे। मजदूरी बढ़ने से छोटे अधिपति आर्थिक तंगी के शिकार हो गये। ऐसी स्थिति में नये विकासों के दबाव में वे मजदूर रखकर बाजार के लिये खेती करने लगे।

अब श्रम को भुगतान में बदलने की छूट मिल गयी अर्थात् अब कोई श्रमिक अपने अधिपति को एकमुश्त राशि अदा कर मुक्त हो सकता था।

अब कई किसान बेहतर स्थिति में थे और मेहनत के बल पर अपनी स्थिति में सुधार कर सकते थे। छोटे किसान अपना श्रम कहीं भी बेच सकते थे। श्रम बाजार का विस्तार हो रहा था।

सतत और प्रबल परिवर्तन ने सामान्य परिदृश्य को बदल दिया। धीमे विकास ने लगभग सभी लोगों को प्रभावित किया। कुछ दूसरों की अपेक्षा तेजी से उठ गये।

परिणामस्वरूप समाज में एक तीखा विभाजन हुआ और समाज के सभी वर्ग इससे प्रभावित हुये। इस पूर्व परिदृश्य में एक नई अर्थव्यवस्था और एक नये वर्ग का उदय हुआ।

सबसे ज्यादा नुकसान सामंतवाद को हुआ, क्योंकि सामंतवादी व्यवस्था की जड़ पर प्रहार किया गया था। सामंतवाद का पतन सामंती व्यवस्था की आंतरिक प्रक्रिया के कारण हुआ। आंतरिक विकासक्रम और बदलाव के एक अंग के रूप में शहरी केन्द्रों और व्यापार का उदय हुआ।

जॉर्ज ड्यूबी और अन्य इतिहासकारों के इतिहास लेखन का एक नया रूप सामने आया। सामाजिक भेद एक ऐसी प्रक्रिया है, जो एक दिन या एक साल या एक दशक में नहीं पैदा होती है,

बल्कि इसमें सदियाँ लग जाती हैं। परन्तु इसने निश्चित रूप से मध्ययुगीन पश्चिमी यूरोप के जीवन को भी पूरी तरह बदल दिया। MHI 01 Free Assignment In Hindi

MHI 01 FREE SOLVED ASSIGNMENT 2021-22 (ENG)

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