IGNOU MHD 4 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

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MHD 4 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

1 निम्नलिखित अवतरणों से किन्हीं चार की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।

Table of Contents

() बादलों ने सूरज की हत्या कर दी. सूरजा मर गया में दूर बोझ ढोता हूँ। मेरे रि………….अलग अलग कर देंगे

उत्तर- प्रसंग-यह गद्यांश भुवनेश्वर के एकांकी ‘ताँबे के कीड़े लिया गया है। परदे के पीछे से यह आवाज सुनकर कि अब काँच और सीसे के बीजों की ईजाद हो गयी है और इनकी ईजाद के बाद बार-बार खेतों में बीज नहीं डालने पड़ेंगे। एक बार बीज बोकर हजार बार फसल काटी जाएगी- रिक्शेवाला कहता है कि

व्याख्या – हमारी भौतिकतावादी दृष्टि ने जो संसार में केवल भोग-विलास में केन्द्रित है, अध्यात्मवादी दृष्टि को नष्ट कर दिया है, हमारी विवेक बुद्धि नष्ट हो गयी है, हम अज्ञान में भटक रहे हैं। हमारी सवृत्तियाँ, उदात्त विचार, जीवनी शक्ति सब मटियामेट हो गये हैं।

हम भटक रहे हैं, कुछ नहीं सूझता कि क्या करें। हम सब अपनी और दूसरों की जिन्दगी की लाश ढो रहे हैं। हमारा जीवन निरर्थक बेमाने, बेवजूद हो गया है। सर्वत्र विज्ञान का बोलबाला है। सब केवल अपने-अपने संकुचित संकीर्ण, स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण से देखते हैं।

समष्टि भावना के स्थान पर व्यष्टि भावना का शासन है। सब अपना-अपना ढोल पीट रहे हैं। लगता है अब मनुष्य विज्ञान का दास हो जायेगा, ज्ञान का शासन होगा और सद्वृत्तियों, संवेदनशीलता, भावुकता, कोमल भावनाओं का दम घुट जाने पर मनुष्य कुंठाग्रस्त होगा। MHD 4 Free Solved Assignment

उसका सारा जीवन भय, आंतक, संत्रास में भीगेगा। उसे न शारीरिक सुख मिलेगा, न मानसिक शांति।

जीवन-मूल्यों की कसौटी हृदय और आत्मा न होकर बुद्धि होगी। हर वस्तु का मूल्य विज्ञान निश्चित करेगा।

उपयोगी और अनुपयोगी वस्तुओं का निर्धारण विज्ञान या भौतिकतावादी दृष्टि करेगी अर्थात कौन-सी वस्तु, कौन-सा रिश्ता उपयोगी है या अनुपयोगी है, लाभप्रद है या नहीं, इसका निर्धारण मनुष्य की स्वार्थवृत्ति, भौतिकतावादी दृष्टि करेगी।

विशेष :- (1) प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग है।
(2) आधुनिक जीवन में भौतिकतावादी दृष्टि तथा विज्ञान के अपनाने के दुष्परिणानों की ओर संकेत किया गया है।

(ख) धोखा खाने पाला मूर्ख और चोखा देने वाला ढंग क्यों कहलाता है? जब सब कुछ धोखा ही धोखा है और धोखे से अलग। …………. आप की नाक नौह क्यों सुकुड़ जाती है?

उत्तर- प्रस्तुत गद्य प्रतापनारायण मिश्र के निबंध ‘धोखा’ से लिया गया है। इस निबंध में मिश्र के व्यक्तित्व की विशेषता का भी पता चलता है। उन्होंने धोखा जैसी मामूली सी बात को तार्किक ढंग से जीवन और जगत से जोड़ा।

व्याख्या :- मिश्र जी के अनुसार धोखा खाने वाला मूर्ख और धोखा देने वाला ठग कहलाता है। धोखा देना अगर बुरा माना जाता है, तो किसी से धोखा खाना मूर्खता है। MHD 4 Free Solved Assignment

इस धोखा से बचा नहीं जा सकता है क्योंकि यह हर तरफ विद्यमान है। धोखे के कारण संसार का पिन्न- पिन्न चला जाता है, नहीं तो ढिच्चर-ढिच्चर होने लगता है।

यहाँ चर्खा पहले निरंतरता और सहजतक अभ्यास कराता है, फिर अभ्यास जाहिर हो या है .. मिश्र जी धोखे का वह रूप भी प्रस्तुत करते जहाँ निरे खेत के धोखे यानी खेत में खड़े रहने वाला पुतला जो बोल सकता है, पर पशु-पक्षी उस धोखा खा लेते है। धोखे से अलग रहना ईश्वर के सामर्थ से भी दूर रहना है।

साधारण व्यक्ति के लिए धोखे से बना तो एक कल्पना मात्र है, हम लोग तो अत्यंत साधारण जीव हैं। हमारी यह मजाल नहीं कि हम जीवन में किसी से धोखा न खाएँ अथवा किसी को धोखा देने का प्रयास न करें। मिश्र जी की देश, समाज और संस्कृति के प्रति भावना भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

धोखे को दर्शन और सिद्धांत से जोड़कर तर्कजाल में उलझने वाले लोगों द्वारा उन्होंने सीधा प्रहार उन लोगों पर किया है, जिन्होंने अपने ही । गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों के पदचिह्न का अनुसरण किया हैं

विशेष :- (1) सहज और बोलचाल की भाषा का प्रयोग है।
(2) आत्मीयता के कारण लेखक पाठक से निकट संपर्क स्थापित करने में सफल रहा।
(3) धोखे का मायाजाल के रूप में प्रतीक।

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ग) परिचय प्रेम का प्रवर्तक है। बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। साथाकसा पड़ का छायाकनाच घड़ा आच घड़ा बठ जाआआर समझो कि ये सब हमारे हैं। ………… उसके सब प्राणी सुखी रहे।

उत्तर :- प्रस्तुत गद्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘लोभ और प्रीति’ से लिया गया है। इस गद्य में प्रेम के उदात्त रूप का चित्रण है। इसमें बताया गया है कि सच्चे प्रेम के स्वरूप की चर्चा की गई है।

व्याख्या :- लोभ और प्रीति ऐसे भाव है, जिसका संबंध मनुष्य के जीवन व्यवहार से बहुत गहरा है। हृदयगत भावनाओं की अभिव्यक्ति ही प्रेम है, प्रेमी ही प्रेम करता है। यह प्रेम ऐसा होता है कि प्रेमी ही केवल देना चाहता है बदले में कुछ लेना नहीं चाहता है।MHD 4 Free Solved Assignment

प्रेम का उदात्त रूप है- प्रेमी युगल एक दूसरे से प्रेम करना जानता है या फिर एक ही प्रेम करे दूसरा भी उतना ही प्रेम करे। प्रिय की उदासीनता, उपेक्षा, तिरस्कार को जानते हुए भी प्रेमी से काफी प्रेम करता है।

जब तक ऐसे प्रेम के साथ तुष्टि अंतर्तुष्टि को क्षोभ लगा दिखाई पड़ता है तभी प्रेम का उत्कर्ष रूप प्रकट होता है। यदि प्रेमी प्रिय की उदासीनता और उत्प्रेक्षा को देखकर परेशान होता है तो यह प्रेम का रूप है।

कठोर और परेशानी के बाद भी प्रेम का रूप निखरता है। यही प्रेम का अत्यंत निखरा हुआ निर्मल और विशुद्ध रूप दिखाई पड़ता है।

विशेष :– (1) प्रेम का निस्वार्थ रूप ।
(2) मनोविज्ञान का रूप निबंध में।

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(ड) संघ लेखकों के स्वत्व की रक्षा करेगा, लेकिन कैसे? कुछ सज्जनों का विचार है कि लेखक संघ उसी तरह लेखकों के हितों और अधिकारों की रक्षा करे………. …………………..मजदूरी की ज़्यादा उजरत दे सके।

प्रसंग :- यह गद्यांश अमृतराय द्वारा लिखी गयी प्रेमचन्द की जीवनी ‘कलम का सिपाही’ से लिया गया है। प्रेमचन्द को अनेक चिन्ताएं सताती रहती थी देश की आज़ादी की । चिन्ता, गरीब – किसानों-मजदूरों की चिन्ता, हिन्दी साहित्य को समृद्ध-सम्पन्न बनाने की चिन्ता तथा लेखकों के हितों की रक्षा करने की चिन्ता ।

लेखकों के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने एक योजना बनाई – लेखक संघ की स्थापना, इस सम्बन्ध में उन्होंने अपने …मित्रों, सहयोगियों से परामर्श किया। सबकी अपनी-अपनी राय थी। इसी पर उन्होंने अपने पत्र ‘हंस’ में टिप्पणी लिखी। MHD 4 Free Solved Assignment

व्याख्या :– लेखक संघ का उद्देश्य है लेखकों, उदीयमान साहित्यकारों के अधिकारों की रक्षा करना, उनके हितों का ध्यान रखना, उन्हें प्रकाशकों के शोषण से मुक्त कराना उनकी रचनाओं का प्रकाशन कराना, उनके लिए उचित पारिश्रमिक दिलवाना सब कार्य केसे हो, इसके सम्बन्ध में अलग-अलग मत हैं।

कुछ लोगों का मत है कि लेखक-संघ भी छात्र-संघ, मज़दूर संघ, ट्रेड यूनियन की तरह लेखकों के अधिकारों की मांग समय-समय पर रखता रहे।

लेखक संघ लेखकों की ओर से पुस्तक प्रकाशकों, पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों से लेखकों के पारिश्रमिक की दर बढ़ाने के लिए आन्दोलन करे।

उनका तर्क यह है कि लेखक भी मजदूर है, पसीना बहाकर अजीविका कमाता है, अन्तर केवल यह है कि लेखक के हाथ में हथौड़ा, बसूला नहीं होते, कुलम होती है। वह श्रमजीवी होता है।

दूसरी ओर प्रकाशक पूंजीवादी है और लेखकों का इसी का. शोषण करते हैं, जिस प्रकार मिल-मालिक मज़दूरों का शोषण करते हैं। इस शोषण से. उनकी रक्षा करने के लिए लेखक-संघ को आन्दोलन करना चाहिए।

दूसरे वर्ग का विचार था कि लेखक-संघ धन एकत्र करे, उसके पास पर्याप्त धनराशि हो और उस धनराशि से स्वयं प्रकाशन संस्था बनाकर लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन की ज़िम्मेदारी निभाये।

उनका प्रकाशन इसी संस्था के द्वारा हो। लेखकों को दूसरे प्रकाशकों या प्रकाशन संस्थाओं का दरवाजा न खटखटाना पड़े। इससे प्रकाशकों का एकाधिकार समाप्त हो जायेगा। वे मनमानी न कर सकेंगे।

लेखकों का शोषण समाप्त हो जायेगा, उन्हें उनके कार्य का उचित पारिश्रमिक व रॉयल्टी मिल सकेगी।

विशेष :- (1) उस समय के साहित्यकारों के बीच हो रही रस्साकशी की एक झलक दी गई है।
(2) भाषा आम बोलचाल की है। MHD 4 Free Solved Assignment

2 भारतेन्दु नाट्य लेखन को सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बनाना चाहते थे? विवेचन कीजिए।

उत्तर- भारतेंदु ने नाटक लिखकर न सिर्फ साहित्य की सेवा की बल्कि हिन उन्नत करने तथा हिन्दी नाट्य-कला और रंगमंच का विकास करने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने युग की आवश्कताओं को पहचान कर नाटक लिखे।

अपने बहुमुखी व्यक्तित्व के साथ भारतेंदु ने नाट्यरचना के क्षेत्र में अद्भुत सृजनशील और गंभीरता का परिचय दिया है। कविता, निबंध आदि विधाओं में लिखते हुए नाट्य विधा की ओर उनका विशेष झकाव दिखाई देता है।

भारतेंदु के नाटकों के द्वारा जनता नवजागरण की दिशा में संस्कारित करना चाहते थे। वे जनते थे कि दृश्य काव्य होने की वजह से टक जनता को जागृत करने का सशक्त माध्यम हो सकता है। भारतेंदु के निम्नलिखित नाटकों की रचना की

वौदिक हिंसा हिंसा न भवति ( 1873), विषस्य विषमौषधम् (1875), प्रेमजोगिनी । (1875), सत्य हरिश्चद्र ( 1875), चंद्रवली (1876), भारत दुर्दशा ( 1876), भारत जननी 1877), नीलदेवी (1880), अंधेर नगरी (1881), और सती प्रताप ( 1884)।

विद्यासुंदर 1868 में जो बंगला से छायानुवाद हुआ है। इस आलवा कुछ नाटक है जो अनूदित है जैसे रत्नावली (1868), पाखंड विडंबना (1872), धनंजय विजय । 1873), मुद्राराक्षक ( 1875), कर्पूरमंजरी (1876) और दुर्लभबंधू ( 1880) ।MHD 4 Free Solved Assignment

भारतेंदु के नाटकों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता कि उन्होंने नाटकों के कथानक, चरित्र, भाषा, शिल्प और रंगमंच के बारे गहन रूप से विचार किया था।

वह हिन्दी नाटक के स्वरूप को भी विकसित कर रहे थे और अपने समय से भी उसे पुरानी रूढ़ियो, अंधविश्वसों को तोड़ते हुए उनके सभी नाटक प्राचीन प्रचलित रीतिया पा अंधानुकरण का विरोध करते है।

वस्तुतः वह नाटक का जातीय रूप विकसित करना चाहते थे इसलिए नाटकों की विषयवस्तु यथार्थ के नजदीक है।

वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति एक प्रहसन है। इस नाटक का उद्देश्य यथार्थ के उद्घाटन और व्यंग्य द्वारा जीवन में आई विकृतियों के प्रति जनता को सचेत करना है। अपने लघु आकार में भी यह प्रहसन पूर्ण नाटक की विशेषताओं से युक्त है। सभी पात्र प्रतीकात्मक और व्यंग्य चरित्र है । –

विषस्य विषमौषधम् संस्कृत की भाषा शैली में लिखा गया एक पात्रीय नाटक है भारतेंदु अपने समय के राजाओं की व्यभिचार लीला और प्रजा शोषण देख रहे थे।

ये राजा ही देश की परतंत्रता के कारण बने। भारतेंदु ने सामंत वर्ग की स्वार्थ लालुपता और अंग्रेजों की कुटनीति को एक साथ पहचान है और एक-पात्रीय नाटक की एकरसता को कहावतों, मुहावरों, पदों, श्लोकों, व्यंग्य, हास्य से मनोरंजन बनाया है। MHD 4 Free Solved Assignment

प्रेमजोगिनी भी काशी के पाखंड भरे रूप का यथार्थवादी नाटक है। यह काशी के बहाने सांमती संस्कृति के पतन का नाटक है। यह नाटक के क्षेत्र में भारतेंदु का नया प्रयोग है। हर अंक में नया पात्र आते है, एक ही पात्र के कई बार अभिनय करने की संभावनाएं बनती है।

सत्य हरिश्चंद्र नाटक रीति-कालीन श्रृंगार रस के प्रति असंतोष से उपजा है। यह नाटक नवयुवकों में चरित्र और आदर्श स्थापित करने के उद्देश्य से लिखा गया । सत्य हरिश्चंद्र क्षेमेश्वर के चंडकौशिक नाटक के आधार पर लिखा गया है। सत्य हरिश्चंद्र की रचना कर के वह देश का जन-मानस गर्व से भरना चाहते थे,

उसे चारित्रित उत्थान का माध्यम बनाना चाहते थे। इसके शिल्पविन्यास में भी पाश्चात्य शैली के प्रभाव के साथ ही उनकी मौकिलता भी दिखाई देता है। यह नाटक भारतीय जनता के धैर्य और अथाय करूणा का प्रतीक है।

चंद्रावली प्रेम और भक्ति की स्त्री पात्र प्रधान नाटिका है। इसमें सूर, मीरा, रसखान जैसे कवियों के भक्तिकाव्य का सा आनंद मिलता है। चंद्रावली को रासलीला के लोकनाट्य रूप में लिखा गया है।

राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति के उपासक भारतेंदु का अखण्ड परमानंद चंद्रावली के अनन्य प्रेम और भक्ति के द्वारा व्यक्त हुआ है।

भारत दुर्दशा अंग्रेजी राज्य की अप्रत्यक्ष आलोचना है और भारतेंदु की देश भक्ति और निर्भीकता का सहृदयता और वीरता का प्रमाण है। उनकी राजनीतिक सूझबूझ, प्रहसन कला, व्यंग्य और यथार्थ का सजीव चित्रण इसमें मिलता है। MHD 4 Free Solved Assignment

प्रतीकात्मक पात्रों के द्वारा उन्होंने अपनी बात कहने की सफल कोशिश है। लोकधर्मी चेतना और प्रयोगशीलता के कारण भारत दुर्दशा आज भी प्रासंगिक है। यह लचीले ल्प का नाटक है। इसमें पारसी रंगमंच और नौटंकी लोक नाट्य रूप का अद्भुत मिश्रण है।

भारत जननी भी भारतवर्ष की तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर लिख गया काव्यनाटक है। चंद्रावली और भारत जननी में गीतिनाट्य का सूत्रपात देखा जा सकता है : दुर्दशा के तुरंत बाद लिखा गया नीलदेवी नाटक भी स्त्री प्रधान और पहला दुखात नाटक है देश में फैला इस भ्रम को दूर करना चाहते थे कि भारत में स्त्रियों की दशा बहुत खराब रही है।

नीलदेवी के महत्वपूर्ण गुण हैं उसके सरस, मधुर गीत और भारतेंदु के प्रहसन, जिंदादिली और तीव्र अभिनयात्मकता की शैली। नीलदेवी के गीत आधुनिक दृष्टि से नाट्यसंगीत और नाट्यगीत का सुंदर हरण है।

अंधेर नगरी में भारतेंदु हरिश्चंद्र की नाट्यक का चरमोत्कर्ष हुआ है। प्रहसन और व्यंग्य – कला का तना चुटीला और सजीव रूप उनकी सजगता और मानव जीवन में उनकी र गहरी पैठ का परिणम है।

जन-प्रचलित एक छोटी सी लोकोक्ति के आधार पर रचित । यह छोटा नाटक अपने भीतर सम्रग चेतना वर्तमान संदर्भ छिपाये हुए है।

एक लोककथा में नये प्रण फूंकना और लोकजीवन और राजनीतिक चेतना को एक-दूसरे के करीब लाते हुए उनमें निहित यथार्थ को व्यंग्य द्वारा व्यक्त करना भारतेंदु की मौलिकता है। अंधेर नगरी भारतेंदु के समय का ही नही हमारे समय भी यथार्थ है। MHD 4 Free Solved Assignment

सती प्रताप में सती सावित्री के कथानक को लेकर भारतीय नारी की चेतना और आदर्श को प्रस्तुत किया गया है। ताकि पुरुषों में नवीन जागरण उत्पन्न हो सकें भारतेंदु इसके केवल चार दृश्य ही लिख पाये थे।

बाद में राधाकृष्णदास ने इसे पूरा किया। प्रहसन के द्वारा भारतेंदु अपने सभी लक्ष्य पूरा करते हैं। धनंजय विजय वीर रस प्रधान ओजपूर्ण, नाटक है। इसके भरत वाक्य में वह कजरी, ठकुरी आदि की रूढ़िवादी लीक को छोड़कर नये साहित्य और कविता की राह पर चलने को कहते हैं।

मुद्राराक्षस संस्कृत के नाटककार विशाखदत्त का एक राजनीतिक नाटक है। नायकनायिकाओं की श्रंगार लीलाओं से हटकर प्राचीन और परंपराओं के समंवय के द्वारा इस नाटक से भारतेंदु प्रमाणित करना चाहते थे कि श्रृंगार रस की बिना भी विचारोत्तेजक महान नाटक है।

इस नाटक का अनुवाद और भी अधिक जीवंत एवं मौलिक है।

कर्पूर-मंजरी कवि राजशेखर द्वारा प्राकृत भाषा में रचित कर्पूरमंजरी का अनुवाद है। इसमें राजदरबार का संदुर व्यंग्यात्मक चित्र है। श्रंगार प्रधान के लिए मूल गीतों के स्थान पर हिन्दी के रीतिकालीन कवियों के भंगार प्रधान गीतों का प्रयोग उनकी मौलिकता है। MHD 4 Free Solved Assignment

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3 . आधे-अधूरे’ की भाषा और संवाद योजना पर प्रकाश डालिए।

त्तर- आधे-अधूरे के आधार पर कहा जा सकता है कि मोहन राकेश उस नाट्य भाषा को तलाश रहे थे जिसमें बदले हुए और बदल रहे मानवीय संदर्भ को सही रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

: ‘आधे-अधूरे’ की भाषा समकालीन मुहावरे तथा बोलचाल की सृजनात्मक भाषा है जिसमें महानगरीय मध्यवय परिवार के अनुभवों, अधूरी संवदेनाओं, बदलती स्थितियों, असंतुष्ट और अधूरे पात्रों की विस्फोटक मनःस्थिति का यथार्थ एवं तथ्यपरक चित्रण हुआ है।

इस नाटक की भाषा व्यक्ति की पारिवारिक संबंधों से ऊब, अलगाव, झल्लाहट, विद्रूपता, संघर्ष को व्यक्त करती है जिसमें जीने के लिए हर परिवार विवश है। इस नाट्य भाषा को शब्द, ध्वनि, मौन, मुद्रा, क्रिया, मंचसज्जा, संगीत छायालोक आदि द्वारा संश्लिष्ट किया गया है।

प्रतीकात्मकता-‘आधे-अधूरे’ की भाषा में रोजमर्रा की जिंदगी में प्रयोग होने वाली चीjo को गहरी तथा नई अर्थ- छाया देकर प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। घर की टूटी फूटी और घिसी-पिटी चीजों द्वारा घर की गिरती आर्थिक स्थिति और विघटित होते संबंधों को वाणी दी गई है।

तीन दरवाजे तीन तरफ से कमरे में झाँकते हैं। जैसे कथनों द्वारा ‘कमरे’ को घर के जीवन और ‘दरवाजों को घर से झाँकने वाले सिंघानिया,, जुनेजा, जगमोहन आदि के प्रतीक रूप में प्रयोग किया है।

आंतरिक लयपूर्ण संवाद-कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त अन्य शब्दों के संबंध और संदर्भ से अर्थवान बनता है अतः नाटक में शब्दों या वाक्यांशों के निर्माण की अपेक्षा उनके संदर्भो की लय तथा नाटक के चरित्रों की आंतरिकता द्वारा जीवंत संवाद लेखन तथा भाषा सृजन है। MHD 4 Free Solved Assignment

तनावपूर्ण, स्वतः स्फूर्त, बिबोत्मक भाषा तथा आंतरिक लयपूर्ण संवाद ‘आधेअधूरे’ के संवादों को विशेष बनाते हैं। पात्र के संवादों की ध्वनि और उच्चारणा रसती विशेषता को प्रकट करने में सक्षम हैं।

नाटक के संवाद छोटे, विश्वसनीय, सच्चे परिसद एवं पात्रों की मनःस्थिति को उघाड़ने वाले हैं। प्रारंभ में काले सूट वाले आदमी के लंबे एकालाप तथा अंत में सावित्री और जुनेजा के लंबे संवाद अपवाद कहे जा सकते हैं।

सहज, आत्मीय, अंतरंग तथा रचनात्मक बोलचाल की भाषा में प्रभावशाली ‘आधे-अधुरे’ को विशिष्ट नाट्य रचना बनाते हैं।

शाब्दिक संवाद :– ‘आधे-अधूरे’ के संवाद साधारण एवं अभिधात्मक लगते हैं, लेकिन उनका व्यंग्य गहरा है। अपनी विवशता के कारण सावित्री से दबने वाला महेंद्रनाथ उस पर साधारण शब्दों में तीखा व्यंग्य करता है।

उदाहरणतः पुरुष एक का आँख बचाते हुए स्त्री से कहना कि ‘आ गईं दफ्तर से लगता है आज बस जल्दी मिल गई?’ सुनने में साधारण बात है, परंतु इसके साथ महेंद्रनाथ सावित्री के प्रति अपने अविश्वास, दब्बूपन और उसके दफ्तरी जीवन पर व्यंग्य करता है।

वह कहना चाहता है कि वह घर केवल लड़ने और कुढ़ने के लिए आती है। सावित्री भी इसे समझती है और जवाब न देकर उससे ही प्रश्न करती है। MHD 4 Free Solved Assignment

महेंद्रनाथ के सिंघानिया और जगमोहन को लेकर जुनेजा के सामने तेज-तर्रार, कटु और आक्रामक सावित्री का विनम्र बनना आदि उनके संवाद पात्रों की मनःस्थिति, संघर्ष एवं अंतद्वंद्व का चित्रण करते हैं।

महेंद्रनाथ का बिन्नी से यह कहना है कि “आदमी जो जवाब दे, वह उसके चेहरे से भी तो झलकना चाहिए।” बिन्नी के अंतर्द्वद्व तनाव और विभाजित मानसिकता एवं विषमता को दिखाने में सक्षम है।

सावित्री द्वारा ‘ओह, होह, होह’ जैसे निरर्थक शब्दों का प्रयोग और किन्नी-बिन्नी द्वारा उन्हें दोहराना उनके मन की खीझ, आक्रोश, झुंझलाहट आदि को अभिव्यक्ति देता है। दृश्य बिंबों की संवादात्मकता- पात्रों की मुख-मुद्रा, भंगिमा और रंगचर्चा से बिंब भी संवादों का कार्य करते हैं।

एक व्यक्ति द्वारा पाँच भूमिका निभाने के संदर्भ म एक ही रंग-संवाद कि “बिल्कुल एक से हैं आप लोग। अलग-अलग मुखौटे, पर चेहरा?चेहरा सबका एक ही!” शाब्दिक संवाद को दृश्य संवाद में बदल देता है। सावित्री का थका-हारा होना स्त्री के अंतद्वंद्व, संघर्ष और व्यक्तित्व को झलकाता है।

सावित्री घर” दफ्तर और व्यक्तिगत जीवन तीनों में तालमेल नहीं बिठा पाती और यही उसकी उलझन का कारण है। जुनेजा का यह कथन कि “तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है |

कितना कुछ एक साथ होकर, कितना कुछ एक साथ पाकर और कितना कुछ एक साथ ओढ़कर जीना।” उसकी सारी स्थिति को मूर्त रूप दे देता है जिसमें शुरू में विवश लगने वाली स्त्री. अंत में महत्त्वाकांक्षिणी और स्वार्थी दिखती है तथा दर्शक के मन में वितृष्णा पैदा करती है। MHD 4 Free Solved Assignment

चरित्र के इन दो बिंदुओं के बीच पल रही मानसिकता ने ही सावित्री का चरित्र चुनौतीपूर्ण बना दिया है जिसे परत-दर-परत दिखानाकी … है। सावित्री के अपने प्रथम संवाद में किन्नी की पढ़ाई, घर पर पड़ते आर्थिक दबाव …. बेरोजगार अशोक के बोझ और महेंद्रनाथ की अकर्मण्यता का परिचय मिल जाता है।

सावित्री का महेंद्रनाथ के पायजामे को मरे जानवर की तरह उठा देना और कोने में फेंकते-फेंकते तह लगाने लगना उसकी महेंद्रनाथ के प्रति सोच और उससे अलग होने, फिर उसी के साथ जिंदगी जीने की मजबूरी दिखाता है।

जगमोहन के प्रवेश के पूर्व सावित्री की माला टूटना और उसका दूसरी माला पहनना प्रतीकात्मक रूप में उसकी जिंदगी को दिखाता है।

‘माला’ यहाँ एक परिवार के साथ रहने की परंपरा को दिखाती है तो माला का टूटना रिश्तों की टूटन को दिखाता है तथा सावित्री का नई माला पहनना नई जिंदगी जीने के प्रयास का प्रतीक है।

एक चप्पल न मिलने पर सब जूते-चप्पलों को ठोकर मारना भी उसकी पारिवारिक और मानसिक स्थिति के प्रतीक हैं। पानों का- बार दराज खोलना व बंद करना, महेंद्रनाथ का कुर्सी झुलाना; चीज के डिब्बे का न खुलना आदि सभी पात्रों की घुटनभरी जिंदगी जीने की मजबूरी को दिखाते हैं।

4 . ललित निबंध के रूप में ‘कुटज’ का परीक्षण कीजिए।

उत्तर- ललित निबंध भाव प्रधान होते हैं, लेकिन इनमें वैचारिकता भी होती है। कुछ निबंधों में भाव और विचार की धारा साथ-साथ बहती है और कुछ निबंध पूरी तरह भाव प्रधान होते हैं। द्विवेदी जी के ललित निबंधों में भाव और विचार बराबर-बराबर निहित हैं। MHD 4 Free Solved Assignment

इनमें द्विवेदी जी की विद्वत्ता भी बराबर दिखती है। उनके निबंधों में स्वच्छंदता, सरलता, आडंबरहीनता, घनिष्ठता और आत्मीयता के साथ-साथ उनका वैयक्तिक दृष्टिकोण भी है। निबंध लेखक के विचारों का मूर्त रूप है, अतः उसमें लेखक के व्यक्तित्व की आत्मीयता, विचारों की गंभीरता सहजता आदि भी झलकनी चाहिए।

ललित निबंधों में चिंतन की प्रधानता होती है और लेखक अपने स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार भावों को शामिल करते हैं।

इस प्रकार भावना और विचार का सहज समन्वय ललित निबंध की विशेषता है, जो पाठक को द्रवीभूत करने के साथ उसकी बुद्धि को भी प्रेरित करती है।

‘कुटज’ निबंध में भी द्विवेदी जी ने शास्त्र और भाव के मिश्रण से ललित शैली में कुटज का वर्णन करके मानवीय आदर्शों को प्रस्तुत किया है।

जीवन की वास्तविकता, कहानी की संवदेना, नाटक की नाटकीयता, उपन्यास की कल्पनाशीलता, गद्य काव्य की भावुकता, महाकाव्य की गरिमा, विचारों की उत्कृष्टता भी ललित निबंध की विशेषताएं हैं।

द्विवेदी जी ने कुटज के वर्णन में उसके जन्म स्थान के वर्णने में भावों और आत्मीयता का परिचय भी दिया है। कुटज की भाषाशास्त्रीय व्याख्या में सिद्धांतों के साथ ही भावों का समन्वय भी किया है।

उन्होंने कुट मानवीय चेतना का रूप वकर उससे आत्मीय संबंध भी स्थापित किया है। कुटज को विशिष्ट बनाने के लिए कालिदास के ‘मेघदूत’ का वर्णन करते हैं, जिसमें उन्होंने कुटज के फूल प्रयोग किए थे।

कुटज को वे कठिन समय का साथी कहते हैं। कुटज के बहाने… उन्होंने रहीम की चर्चा भी की है, जिन्हें उनके अनरूप स्थान नहीं मिला और यही हालत कुटज की भी है जिसे अपनी विशिष्टताओं और जिजीविषा के अनुरूप सम्मान नहीं मिला। MHD 4 Free Solved Assignment

भाषाशास्त्री होने के नाते द्विवेदी जी ने कुटज की ऐतिहासिकता, प्राचीनता, उत्पत्ति एवं नामकरण पर चर्चा है। कुटज को आदर्श चिंतन का प्रवक्ता मानने के साथ ही जिजीविषा का प्रतीक भी माना है।

कुटज की जीवनी शक्ति की चर्चा के द्वारा के अपनी सामाजिक चेतना संबंधी विचारधारा को अभिव्यक्त करते हैं।

ललित निबंध में सहजता-सरलता के साथ विचार और भाव के समन्वय के साश लेख की आत्मीयता जुड़ी होने से इनकी व्यंजना रागाश्रित होती है। ‘कुटज’ भी व्यंजना वाला निबंध है जो पाठक, लेखक और निबंधकार तीनों को एक साथ जोड़े रखता है।

कुटज के उत्पत्ति के स्थान और जीने की इच्छा को कहानी के रूप में प्रस्तुत करने में द्विवेदी जी की आत्मीयता भी साफ दिखाई देती है।

उन्होंने कुटज को सखा, मनस्वी, मित्र, गाढ़े का साथी कहा है, जिससे उनकी कुटज की विषय-वस्तु के साथ स्थापित एकात्मकता स्पष्ट होती है अन्यथा यह निबंध कुटज के स्थूल विवरण देकर भी पूरा किया जा सकता था।

यह अंतरंगता लेखक के चिंतन प्रवाह के साथ भाषा को भी | गतिमान बनाती है। और रचना के शिल्प को निखारती है।

‘कुटज’ में द्विवेदी जी कुटज के वर्णन में रमे दिखाई दिए हैं। उनकी दृष्टि भाव, उपदेश, जीवनादर्श आदि के रूपों को वर्णित करती है। द्विवेदी का यह कहना कि ‘कुटज मुझे अनादिकाल से जानता है, मैं भी कुटज को पहचानता हूँ।’ ‘यह चिर-परिचित दास्त उनकी एकात्मकता को स्पष्ट करते हैं।

कुटज के माध्यम से वे यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि जीना है तो अपनी सारी ताकत से कठिन परिस्थितियों में भी खड़े रहो और कर्म तथा साहस से अपना अस्तित्व कायम कर लो। यह संपूर्ण वर्णन द्विवेदी जी की दृष्टि
चेतना को परिलक्षित करता है। MHD 4 Free Solved Assignment

यह निबंध जीवन को जीवनी शक्ति देने के साथ निःस्वार्थ भाव से समाज के लिए जीने का संदेश देता है। भाव और चिंतन के सामंजस्य भाषा के लालित्य, विषय-वस्तु की गहनता सभी पक्षों से ‘कटज’ एक उत्कृष्ट ललित निबंध है।

5 . हिंदी संस्मरण लेखन की परंपरा में वसत का अग्रदूत की विशिष्टता प्रतिपादित कीजिए।

उत्तर- प्रेमचंद युग में ही संस्मरण साहित्य का भी प्रादुर्भाव हुआ। इससे पूर्व संस्मरण प्रचलित नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सर्वप्रथम संस्मरणात्मक निबंध प्रस्तुत किया। वर्णन के विषय बालकृष्ण भट्ट थे। कुछ विद्वान हिन्दी का पहला संस्मरण लेखक पद्मसिंह शर्मा को मानते हैं।

उन्होंने अकबर इलाहाबादी तथा कवि-रत्न सत्यनारायण पर संस्मरण प्रस्तुत किए। गोखले पर महात्मा गांधी ने संस्मरण लिखे। प्रेमनारायण टण्डन, गोपालराम गहमरी, श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, सियारामशरण गुप्त रघुवीर सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामनाथ ‘सुमन’, रामनरेश त्रिपाठी, अनुग्रहनारायण सिंह, शन्तिप्रिय द्विवेदी, मोहनलाल महतो ‘वियोगी आदि इस युग के प्रमुख संस्मरण लेखक हैं।

‘प्रेमचन्दः घर में इस युग की सर्वश्रेष्ठ कृति है। प्रस्तुत कृति में ‘प्रेमचंद को आजीवन भाँति-भाँति के संघर्षों से जूझने का, उससे उत्पन्न सफलता-असफलता का, हर्ष-विषाद का तथा सुख-दुख का वर्णन श्रीमती शिवरानी ने किया है।

स्वातंत्र्योत्तर काल में संस्मरण की बाढ़ आ जाने पर अनेक साहित्यिकों ने अपनी कलम चलाई। विनोदशंकर व्यास (उनकी स्मृतियाँ), बनारसीदास चतुर्वेदी (संस्मरण), जैनेन्द्र कुमार (ये और वे), उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ (मण्टो : मेरा दुश्मन), कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, माखलनलाल चातुर्वेदी (समय के पाँव), डॉ. नगेन्द्र (चेतना के विम्ब), जगदीशचन्द्र माथुर (दस तस्वीरें), महादेवी वर्मा (पथ के साथी), अमृतलाल नागर (जिनके साथ जिया) तथा बलराज साहनी (यादों के झरोखे) आदि युग प्रसिद्ध संस्मरण लेखक हैं।

इसमें सबसे अधिक सूझ-बूझ, उच्च कोटि की संवेदनशीलता तथा अभूतपूर्व प्रभविष्णुता उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के ‘मण्टो: मेरा दुश्मन’ में किया गया है। इस विषय में डॉ. भगवानशरण भारद्वाज ने लिखा है-“इन संस्मरणों को पढ़कर अभिभूत रह जाता है। MHD 4 Free Solved Assignment

एक रस्साकशी की बिम्ब, संस्मरण के दौरान, पा० . दिमाग पर छाया रहता है। उतना ही गहरा, उत्सुक, झुंझलाहटपूर्ण तनाव जिनमें हारजीत का कोई फैसला नहीं आता है और अन्त में जो एक झटके में मुँह के बल गिर पड़ता है, वह पाठक के साथ विजेता की भी सारी करुणा का अधिकारी बन जाता है।

इस प्रकार संस्मरण अल्पायु का होते हुए भी पर्याप्त मात्रा में विकास प्राप्त कर चुका है। उसमें विषय-वैविध्य तथा शैली-वैविध्य भी है। उसमें रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे कलाकार तथा प्रभाववादी महादेवी वर्मा भी हैं।

‘वसंत का अग्रदूत’ की विशिष्टता

‘वसंत का अग्रदूत’ अज्ञेय जी के ‘स्मृति लेखा’ संग्रह में संकलित हैं। इसके सभी संस्मरण अज्ञेय की रचना -दृष्टि, परंपरा-बोध एवं सांस्कृतिक चेतना को उद्घाटित करते हैं।

अतः ‘वसंत का अग्रदूत’ को समझने के लिए इन पर नजर डालना जरूरी हो जाता है। ‘स्मृति-लेखा’ का पहला संस्मरण भारत कोकिला सरोजनी नायडू से संबंधित है।

इसमें उन्होंने सरोजनी नायडू के प्रखर वक्ता राजनेता तथा अंग्रेजी की कवयित्री के रूप को उभारा है। उनकी अंग्रेजी कविता की प्रतिभा ने उन्हें विशिष्ट बना दिया।MHD 4 Free Solved Assignment

मैथिलीशरण गुप्त को अज्ञेय अपना ददा तथा स्थानीय गुरु मानते हैं। अज्ञेय बताते हैं कि गुप्त जी ने खड़ी बोली में कविता करने के साथ कविता के परंपरागत संस्कारों को बदलकर युग की आकांक्षा से जोड़ा।

उन्होंने अपनी रचनाओं में वर्तमान की चिंता का अपनी रचना में समावेश किया किंतु भारतीयता तथा पौराणिकता की मौलिकता को रहने दिया। इससे हिंदी कविता में नई संभावनाएं पैदा हुईं। उन्होंने गुप्त जी के सहज किसानी संस्कारों के साथ आधुनिकता के आकर्षण को भी दिखाया है।

प्रेमचंद से संबद्ध संस्मरण में अज्ञेय जी ने उनके साथ व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा कम ही की है। उन्होंने प्रेमचंद की औपन्यासिक चेतना तथा हिंदी कहानी में योगदान पर गहन विश्लेषण किया है।

अज्ञेय के अनुसार प्रेमचंद के लिए साहित्य एक साधना है और साहित्यकार समाज के प्रति जवाबदेह है। उपन्यासों के संदर्भ में उन्होंने प्रेमचंद के प्रगतिवादी निष्कर्षों के विरोध के महत्त्व को उभारा है। उनके साहित्य में मूल्य-संघर्ष, संवेदना और करुणा में है।MHD 4 Free Solved Assignment

सुमित्रानंदन पंत पर लिखे गए संस्मरण में अज्ञेय ने पंत के व्यक्तित्व, मानसिक अवसादों तथा रचना-प्रवृत्ति पर विचार किया है। पंत छायावाद के प्रथम प्रतिष्ठित कविता थे, किंतु साहित्यिक आलोचना एवं बीमारी ने उन्हें अकेलेपन से भर दिया, जिससे वे तुनकमिजाज भी हो गए।

हालांकि उनका स्वभाव संकोची एवं संवेदनशील था। इसी अंतर्विरोध के कारण अज्ञेय पंत को हिंदी का कालिदास कहते हैं।

माखनलाल चतुर्वेदी पर लिखे संस्मरण में उन्होंने चतुर्वेदी को भारतीय अस्मिता को रूपायित करने वाला रचनाकार माना है जिसने स्वाधीनता के आह्वान को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था।

‘फणीश्वरनाथ रेणु” से अज्ञेय का रिश्ता काफी खुला था। अतः संस्मरण में रेणु के व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को स्मृति खंडों द्वारा उद्घाटित किया गया है।

इस संस्मरण में रेणु जी की मौत की पीड़ा भी है। अज्ञेय ने ‘मैला आँचल के विश्लेषण से रेणु के व्यक्तित्व के ग्रामीण जुड़ाव को दिखाया है। उन्होंने अपने उपन्यास में स्वतंत्र भारत के समस्त ग्रामीण जीवन को चित्रित कर दिया है।MHD 4 Free Solved Assignment

हजारीप्रसाद द्विवेदी से जुड़े संस्मरण में अज्ञेय ने उन्हें बीसवीं शताब्दी का बाणभट्ट कहा है।

द्विवेदी जी के व्यक्तित्व में आचार्य के गुण के साथ सहजता भी थी और निर्णय लेने की संकल्प शक्ति का अभाव भी गहन विद्वत्ता भी उनके जीवन के बुनियादी स्तर को नहीं बदल पाया था, जिसका लाभ उनके शिष्यों ने अपने हितों की पूर्ति के लिए उठाया

अज्ञेय की बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के साथ बहुत साझेदारी थी, जिससे नवीन की बेचैन बौद्धिकता ने अज्ञेय को भी प्रभावित किया। अज्ञेय को नवीन के चरित्र में महाकाव्यात्मक नायक के गुण दिखते हैं।

‘वसंत का अग्रदूत’ में अज्ञेय के मन में निराला के प्रति गहरा प्रायश्चित बोध है। वे नई रचनाशीलता एवं प्रेरणा के कवि हैं। । विपरीत परिस्थितियों ने उनकी रचनाशीलता पर प्रभाव नहीं डाला।

अज्ञेय निराला को अपने प्रतिमान से देखते हैं तथा उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को उभारा है। अपनी संपूर्णता में यह संस्मरण करुणा जगाने वाला है। अज्ञेय ने उस घटना का भी जिक्र किया है जिसमें उन्होंने कहा था ‘निराला इज डेड’।

इस घटना की जानकारी । निराला को नहीं थी, परंतु निराला ने कई बार कहा कि ‘निराला इज डेड’ जिससे अज्ञेय उनके आहत होने का पछतावा हुआ, लेकिन इससे उन्हें निराला के आहत मन तथा अवसाद की जानकारी भी मिली। MHD 4 Free Solved Assignment

निराला की मानवीयता और कविता में अद्वैत है। उनकी रचनाओं में निर्बंधता है। निराला में प्रयोगधर्मी सृजन चेतना भी थी। इस संस्मरण में निराला के व्यक्तित्व के साथ अज्ञेय के व्यक्तित्व के पहलू भी सामने आते हैं।

6 निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणिया लिखिए.

(क) ‘तीसरे दर्जे का श्रद्धेय का प्रतिपाद्य

उत्तर-‘तीसरे दर्जे का श्रद्धेय’ निबंध का नायक बुद्धिजीवी लेखक है। वह दीनभावना से पीड़ित है। मिथ्या आदर्श और ढोंग के कारण उसमें आत्म-विश्वास की कमी है। ये बुद्धिजीवी-लेखक देश और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं कर पाए हैं।

‘सादाचार का ताबीज’ निबंध में भी उन्होंने बुद्धिजीवियों की अकर्मण्यता पर व्यंग्य किया है। तीसरे दर्जे का श्रद्धेय’ में ‘आजादी के पच्चीस वर्ष वाले भाषण में आज के जीवन की कड़वी सच्चाई को दिखाया गया है।

आज हर चीज में स्वार्थ ढूंढ़ा जा रहा है। सिद्धांत कोरे नारे बनकर रह गए हैं। परसाई जी ने व्यंग्य द्वारा बुद्धिजीवियों को जगाने का प्रयास किया है।MHD 4 Free Solved Assignment

निबन्ध में बताया गया है कि बुद्धिजीवी थोड़े में सन्तोष कर लेता है, पहले दर्जे का। किराया पाकर तीसरे दर्जे में यात्रा करके जो पैसे बचते हैं, उन्हीं से सन्तुष्ट हो जाता है।

विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम समिति का सदस्य बनकर प्रकाशनों से मोल-तोल कर कुछ रुपये पाकर ही फूलकर कुप्पा हो उठता है। “पाठ्यक्रम में आ गया हूँ। कोर्स का लेखक हो गया हूं। कोर्स का लेखक वह पक्षी है, जिसके पांवों में धुंघरू बांध दिये गये हैं। उसे ठुमककर चलना पड़ता है।

ये आभूषण भी हैं, और बेड़ियां भी।” किसी सभा में वक्ता की हैसियत से गले में फूलों की माला डलवाकर, थोड़े से श्रोताओं की करतल-६ पनि सुनकर और भाषण के बाद थोड़ी-सी तारीफ सुनकर ही अपने को अहोभाग्य समझता है।

बुद्धिजीवी का दूसरा अवगुण हे अहंकार और ढोंग! वह स्वयं को । सामान्यजन से अधिक बुद्धिमान, विवेकशील मानता है अतः उसकी गर्दन ऐंठी रहती है। MHD 4 Free Solved Assignment

तीसरे दर्जे में यात्रा करता है, पर शर्म न उठानी पड़े, चोरी न पकड़ी जाये, इसलिए कभी गंतव्य स्टेशन पर पहुंचने से कुछ स्टेशन पहले पहले दर्जे में पहुंच जाता है, कभी तीसरे दर्जे के डिब्बे से भागकर पहले दर्जे के डिब्बे के सामने खड़ा हो जाता है, ताकि स्वागतार्थ आये लोग समझें कि उसने पहले दर्जे से ही यात्रा की है।

(ख) यात्रा वृतात की परंपरा और राहुल सांकृत्यायन

उत्तर-यात्रवृत्त अथवा यात्रा-वृत्तांत का तात्पर्य है, किसी देश, प्रदेश,भू-भाग अथवा स्थान आदि की यात्रा का वृत्तांत । यो ‘यात्रा’ शब्द का कभी अर्थ था- “जीतने की इच्छा से राजाओं का जाना, धावा बोलना या देवता के उद्देश्य से एक प्रकार का उत्सव।” (पदमचंद्र कोश) इसी तरह के अर्थ नगेन्द्र नाथ बसु ने दिए हैं- “विजय की इच्छा से कहीं जाना, चढ़ाई, पर्याय, प्रस्थान, गमन, गम, प्रस्थिति।

दर्शनार्थ देवस्थानों को जाना, तीर्थाटन एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने की क्रिया आदि।

” (हिंदी विश्वकोश) वास्तव में आज “यात्रा” का सामान्य अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना ज्ञानार्जन, व्यापार, मनोरंजन, धर्मसाधना एवं युद्ध आदि की भावना से प्रेरित होकर यह क्रिया (यात्रा) की जाती है। संचरणशीलता यात्रा का प्रमुख लक्षण है। MHD 4 Free Solved Assignment

हिन्दी के सुप्रसिद्ध यात्रा-साहित्य लिखने वालों ने भी यात्रा के संबंध में कुछ न कुछ कहा है। राहुल सांकृत्यायन कहते हैं “जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उस पेंशन कहां उसे विश्राम कहां?

आखिर में हड्डियां कटते ही बिखर जायेंगी।” देवेन्द्र सत्यार्थी के अनुसार, “मेरा पथ मेरे सामने है। मैं जीवित मानव का पक्ष लेता हूं… जीवन आज उसी यात्रा के लिए आह्वान कर रहा

भारतेन्दु पूर्व से लेकर भारतेन्दु युग तक की परम्परा, द्विवेदी युग के अंतिम चरण से लेकर आज तक की परंपरा आदि के द्वारा यात्रा वर्णन को दो भागों में बाँटा गया है।

यात्रोपयोगी होने के कारण भारतेन्दु युग के वर्णनों में साहित्यिकता कम होती थी तथा धार्मिकता या भौगोलिकता के कारण यायावरी भी उनमें नहीं मिलती। यात्रा साहित्य का उद्भव और विकास शोध प्रबंध विवरण के आधार पर डॉ. सुरेन्द्रकुमार के प्रमुख ग्रंथ हैं |

“बिट्ठलजी की वन यात्रा, जीमनजी की माँ की वन यात्रा, किसी अज्ञात व्यक्ति सेठ पद्मसिंह की यात्रा किसी अज्ञान व्यक्ति की बात, दूर देश की श्रीमती बख्तावर सिंह की बद्री यात्रा कथा, रामसहाय की यात्रा परिक्रमा, भारतेन्दु बाबू के पाँच यात्रा-विषयक निबंध, प्रतापनारायण मिश्र तथा बालकृष्ण भट्ट के यात्रा संबंधी निबंध, भगवतीचरण वर्मा, दामोदर शास्त्री, तोताराम वर्मा, स्वामी सत्यदेव परिव्राजक (मेरी जर्मन यात्रा, यूरोप की सुखद स्मृतियाँ ज्ञान के उद्यान में नई दुनिया के मेरे अद्भुत संस्मरण, शिवप्रसाद गुप्त (पृथ्वी प्रदक्षिणा) तथा गोपालराम गहमरी की यात्रा-विषयक रचनाएँ आदि हैं। MHD 4 Free Solved Assignment

सच्चे अर्थों में यात्रा साहित्य के अंतर्गत वर्तमान काल में द्विवेदी युग की रचनाएँ आती हैं। उनमें किसी दृश्य, स्थान अथवा •व्यक्ति के आकर्षण को उभारने की प्रवृत्ति उनमें मिलती है।

यायावरी को उभारने का भी किसी लेखक ने प्रयत्न किया है। रामनारायण मिश्र (यूरोप छः मास), कन्हैयालाल मिश्र (हमारी जापान यात्रा), प्रो. मनोरंजन (उत्तराखण्ड के पथ पर), जवाहरलाल नेहरू (आँखों देखा रूस), सेठ गोविन्ददास (सुदूर दक्षिण पूर्व, पृथ्वी परिक्रमा), सूर्यनारायण व्यास (सागर प्रवास), रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (देश- विदेश मेरी यात्राएँ), यशपाल जैन (जय अमरनाथ उत्तराखण्ड के पथ पर), भुवनेश्वर प्रसाद ‘भुवन’

(आँखों देखा यूरोप), विष्णु प्रभाकर (हँसते निर्झर), राहुल सांकृत्यायन (घुमक्कड़ शास्त्र, मेरी लद्दाख यात्रा, लंका-तिब्बत में सवा वर्ष, मेरी तिब्बत यात्रा, मेरी यूरोप यात्रा, जापान, ईरान, रूस में पच्चीस वर्ष, यात्रा के पन्ने, यात्रावली तथा एशिया के दुर्गम खण्डों में) भगवतशरण उपाध्याय

( वो दुनियाँ, लाल चीन, कलकत्ते से पीकिंग, सागर की लहरों पर तथा गंगा गोदावरी), अमृतराय (सुबह के रंग), रांगेय राघव (तूफानों के बीच), अज्ञेय (अरे यायावर रहेगा याद तथा एक बूंद सहसा उछली), यशपाल (लोहे की दीवार के दोनों ओर तथा राह बीती), रामवृक्ष बेनीपुरी (पैरों में पंख बाँधकर, हवा पर तथा पेरिस नहीं भूलती), मोहन राकेश (आखिरी चट्टान तक), देवेश दास (यूरोप तथा रजवाड़े) आदि प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ हैं।

सत्यनारायण (आवारे की यूरोप यात्रा, युद्ध यात्रा) शिवनन्दन । सहाय, गोपाल नेवटिया, जगदीशचंद्र जैन, काका कालेकर तथा हंस कुमार के वरिष्ठ साहित्यकार तंत्र लोक से यंत्र लोक तक और अप्रवासी की यात्राएँ, दो यात्रा संग्रह आदि प्रकाशित हुए।

उपर्युक्त प्रमुख यात्रा-वृत्तों के अतिरिक्त राहुल सांकृत्यायन का वृत्त जीवंत, हृदयाकर्षक एवं रोचक है। इनकी यात्राएं अधिकांशतः चीन-तिब्बत आदि से संबद्ध हैं। MHD 4 Free Solved Assignment

(ग) रिपोर्ताज तूफानों के बीच

उत्तर-‘तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ताज संकलन है तथा हिंदी में रिपोर्ताज विधा का पहला सशक्त प्रयास माना जाता है।

इसमें राघव जी ने 1942 में बंगाल में पड़े अकाल के कारण हुई तबाही का ज्वलंत वर्णन किया है। वे बंगाल के इस अकाल को प्राकृतिक विपदा नहीं, अपितु अंग्रेजों की शेषणकारी नीति का परिणाम मानते हैं।

रांगेय राघव जनचेतना के रचनाकार होने के कारण उनके चिंतन का केंद्र है मनुष्य और उसका मनुष्यत्व। समाज के प्रति उत्तरदायी लेखक को ही वे सार्थक मानते हैं। ‘तूफानों के बीच ‘ राघव जी की यही चिंतनधारा दिखती है।

लेखक ने बंगाल के अकाल की विभीषिका के संत्रास की पीड़ा को झेला। वह द्रष्टा और भोक्ता दोनों है। ‘तूफानों के बीच’ की अनुभूति बंगाल के लोगों की भूख, रोग और मृत्यु की पीड़ा और करुणा को पाठक के सामने यथार्थ कर देती है। MHD 4 Free Solved Assignment

अकाल की स्थिति में मनुष्य मात्र मुट्ठी भर अनाज के लिए हर मूल्य चुकाने को तैयार होता है। वह मूल्य चाहे नैतिक हो, आर्थिक हो या शारीरिक संघर्ष और अपनी अपराजेय शक्ति द्वारा कठिनाइयों से लड़ता है।

‘तूफानों के बीच’ इस सारे यथार्थ का प्रामाणित दस्तावेज है। राघव जी बंगाल के अकाल को देश की स्वाधीनता से भी जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि भुखमरी की समस्या आजादी के बाद ही समाप्त हो सकती है।

राघव जी मानते हैं कि पराधीनता और जनशक्ति युग की दो बड़ी सच्चाई हैं। वे अंग्रेजी शासन तथा उन पूंजीपतियों के प्रति अपना आक्रोश जाहिर करते हैं, जिन्हें अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त है।

शासक और पूंजीपति व्यापारी दोनों मिलकर चोरबाजारी और मुनाफाखोरी कर रहे हैं, जिसका परिणाम यह भयंकर अकाल है। राघव जी ने शोषकों के साथ उन लोगों को भी प्रस्तुत किया है, जो इन पीड़ित लोगों के लिए दिन-रात एक कर रहे थे।

उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि द्वारा इतिहास, परंपरा, समाज, व्यक्ति तथा मानवता सबको एक सूत्र में पिरोकर अकाल विभीषिका के खिलाफ मानव की क्षमता को प्रस्तुत किया है। उनकी पूरी रचना युग के यथार्थ तथा जनता की अपराजेय शक्ति को सामने लाती है। MHD 4 Free Solved Assignment

(घ) हिंदी में साक्षात्कार की परंपरा

उत्तर- हिंदी में साक्षात्कार की परंपरा- हिंदी साहित्य में साक्षात्कार का प्रारंभ बनारसी दास चतुर्वेदी द्वारा ‘रत्नाकर जी से बातचीत’ (1931) तथा ‘प्रेमचंद जी के साथ दो दिन’ (1932) से हुआ। बेनीमाधव शर्मा की पुस्तक ‘कवि दर्शन’ साक्षात्कार विधा की प्रथम स्वतंत्र कृति मानी जाती है।

इसमें रामचंद्र शुक्ल, हरिऔध, श्यामसुंदर दास, मैथिलीशरण गुप्त आदि के साक्षात्कार संकलित हैं। डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ कृत ‘मैं इनसे मिला’ (1952) एक प्रमुख साक्षात्कार रचना है।

इसके दो भाग हैं। इस पुस्तक के साक्षात्कारों से संगृहीत साहित्यकारों के कृतित्व और जीवन दर्शन को समझने में मदद मिलती है।

कुछ काल्पनिक सोक्षात्कार भी हिंदी में लिखे गए हैं। राजेन्द्र यादव का ‘एंटन चेखव : एक इंटरव्यू’ इसी प्रकार की रचना है जिसे चेखव की रचनाओं, पात्रों, संस्मरणों, आलोचनाओं आदि पर लिखा गया है।

इसमें चेखव के जीवन, कृतित्व, देश, पात्र, कला की समस्याओं, साहित्यिक आलोचनाओं आदि का प्रामाणिक आधार पर सर्वेक्षण हुआ है। MHD 4 Free Solved Assignment

लक्ष्मीचंद जैन, शरद देवड़ा आदि ने साक्षात्कार संबंधी पुस्तकें लिखी हैं।

साहित्यकारों के व्यक्तित्व को केंद्र रखकर स्वतंत्र साक्षात्कार पुस्तकों के प्रकाशन के साथ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यकार-कलाकार चिंतकों के साथ सीधा विचार-विमर्श भी किया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी में साक्षात्कार विधा प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

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