IGNOU MHD 23 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

MHD 23

MHD 23 Free Solved Assignment

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MHD 23 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

मध्ययुगान कविता-1

निम्नलिखित पाशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए :

(क) राजा गिय के सुनहु निकाई। जन् कुम्हार धरि चाक फिराई।। भोंगत नारि कचो गहि दिख सराहँहि (तैसो) गोबर मार…………………. विधासों, आनों चाँदा नारि.

उत्तर-सूफी कवियों ने स्त्री-सौंदर्य को अलौकिक माना है। उनके यहाँ खूबसूरती खुदा की खोज बन गया । यदि सूफी काव्य परंपरा की नायिकाओं के नाम का जिक्र करें तो उसमें एक प्रकार की केंद्रीयता दिखाई देगी।

नाम की काव्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए कुछ नाम देख सकते हैं चाँदा, पद्मावती. मृगावती, चित्रावली आदि।इस काल की नायिकाओं को यदि चित्रों में देखें तो हुस्न और इश्क से भरी तस्वीर पाते हैं।

ज्यादातर चित्रों में प्रेमिका बाग में प्रेमियों का इंतजार करती हुई. आइने में खुद को निहारती हुई, शराब का प्याला हाथ में लिए हुए. पक्षियों के पिंजड़े को देखती हुई कविता की किताब पढ़ती हुई आदि भंगिमाओं में दिखाई देती है।

चंदायन’ में चाँदा का रूप ऐसा अपूर्व गढ़ा गया है कि जो देखता है, वही बेहोश हो जाता है। बाजिर, रूपचंद, लोरिक, विद्याधर, टूटा सभी उसकी सलोनी मूरत पर घायल है।

बाजिर साधु है लेकिन चाँदा की छवि के सामने उसका चित्त भी बावला हो उठता है। दाऊद जिस समय में रचना कर रहे थे, उस समय बादशाह, राजा. सामंत, सेनानायक और संन्यासी-फकीर सभी मोहिनी मूरत को देखते ही बेसुध हो जाते थे।MHD 23 Free Solved Assignment

हृदय में नेह और स्नेह हो या नहीं, स्थूल सौंदर्य के प्रति ऐसा पार्थिव आकर्षण जिद की हद तक मनुष्य को पहुंचा देता था. यह मध्यकाल की विशेष प्रवृत्ति है।

बाजिर रूपचंद से चाँदा के शिख से लेकर नख तक अंगों, रंगों, रेखाओं और आकृतियों को उत्तेजक रूप में प्रस्तुत करता है। चाँदा के रूप-वर्णन में कवि अत्युक्ति का सहारा लेता है।

चौदा की माँग में सूरज के प्रथम किरण की लाली है। ललाट उसके चाँद के समान है। उसके रंग में कंचन की चमक है। वह सामान्य स्त्री नहीं स्वर्ग की अप्सरा है। मौह धनुष के समान है।

आँख का रंग श्वेत और काला है। क्षण-क्षण में उसके डोरे लाल होते हैं। उसमें मधु भरा हुआ है। ये चंचल हैं। उसमें समुद्र की गहराई है।

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(ख) बन खोजन पिअन मिलहि. बन मैंह प्रीतम नाह।
रैदास पिअ है बसि रह्यो, मानव प्रेमहि माह।।

उत्तर- सखान मूलत-भक्त कवि हैं और सगुण भक्ति परंपरा के अंतर्गत आने वाली कृष्ण भक्ति शाखा के महत्त्वपूर्ण कवि हैं, पर उनकी भक्ति प्रेमपगी भक्ति है जिसमें उनका हृदय प्रेम से स्पंदित होता है। प्रेम इस भक्ति का प्रस्थान है और सिद्धि भी।

अपनी रचनाओं में रसखान प्रेम में डूबे ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं जिसका रोम-रोम पुलकित है और वह विसर्जित नहीं. पल-पल सम्मोहित है। MHD 23 Free Solved Assignment

इस प्रेम में ही भक्ति है. शृंगार में ही श्रद्धा है. मनुहार में ही ब्रह्मानंद है तो संवेदित होने में ही मुक्ति । उन्होंने अपनी समस्त सर्जना को लीला बिहारी कृष्ण के वर्णन में लगाया, जो स्वयं रस की खान हैं।

रसखान कहते भी हैं- ‘त्यों रसखानि वहीं रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी

रसखान की प्रेम भावना में लौकिकता का गहरा पुट है। श्रीकृष्ण का प्रेममय रूप पूरी तरह मानवीय है। इस वजह से यहाँ सौंदर्य के आकर्षण में बिंधा हुआ मन बाहरी मर्यादाओं को त्याग कर एक दूसरे के भीतर समा जाने की तजबीजें सोचता है प्रेम में मिलन की जो उत्कंठा आकुलता व विह्वलता होती है

वह रसखान के काव्य में कितने ही रूपों में आती है। गोपियों के हृदय में कभी अपने बनवारी की मुस्कान चुभ जाती है तो वे अपनी कुलमर्यादा को भूल जाती है।

प्रेम का मार्ग ही ऐसा मार्ग है, जहाँ रूदियों के बंधनों के लिए कोई स्थान नहीं होता। इसी तरह रसखान की गोपियाँ भी कृष्ण साहचर्य पाने के लिए लोकलाज की कोई परवाह नहीं करती। कृष्ण जहाँ भी दिखाई दे जाते हैं

वहीं अपने रूप के आकर्षण में बाँध लेते हैं। वे प्रेम का फंदा डालकर प्रिय को फंसा लेने की कला में इतने माहिर है कि उससे बाहर निकल पान संभव ही नहीं होता।

(ग) बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी तहीं कहूँ ब्रज…………………………. प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी।।

उत्तर-शब्दार्थ-बूझत = पूछते हैं। गोरी = युवती ।खोरी= गली ब्रज-तन-ब्रज की ओर। पोरी बरामद, पौली। सवननि कानों से। नंद ढोटा-नंद के पुत्र (कृष्ण)। दधि-दही। मिलि जोरी = जोड़ी बनाकर, साथ-साथ । रसिक सिरोमनि = रस पूर्ण बातों में बहुत चतुर। बातनि-बातों के द्वारा ।

भुरई = बहका ली.राजी कर ली। भोरी = भोली,सीधी-सादी।
संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत पद कवि सूरदास द्वारा रचित है। यह उनकी अमर कृति सूरसागर में संकलित है। इस पद में कृष्ण भोली राधा को साथ खेलने-चलने को प्रेरित कर रहे हैं।

व्याख्या-एक दिन अचानक ब्रज की गली में कृष्ण की राधा से भेंट हो जाती है। वह उससे उसका परिचय पूछते हैं। हे सुंदरी! तुम कौन हो? तुम कहाँ रहती है? किसकी बेटी हो?

हमने इससे पहले तुम्हें बज की गलियों में नहीं देखा । राधा उत्तर देती है- भला हमें ब्रज में आने की क्या आवश्यकता है? मैं तो अपने द्वारा पर ही खेलती रहती हूँ।

हाँ कानों से यह अवश्य सुनती रहती हूँ कि कोई नंद जी का लड़का मक्खन और दही की चोरी करता फिरता है। कृष्ण ने कहा-हम चोर ही सही, पर हम तुम्हारा क्या चुरा लेंगे। आओ साथ-साथ खेलने चलते हैं।

सूरदास कहते हैं कि उनके प्रभु श्रीकृष्ण बड़े रसिक हैं। उनको मीठी-मीठी बातें बनाना खूब आता है। उन्होंने भोली-भाली राधा को भी अपने बातों से बहका लिया और दोनों साथ-साथ खेलने चल दिए।

विशेष : MHD 23 Free Solved Assignment

(1. पद की भाषा सरस और सरल बजभाषा है।
(2.शैली संवादपरक है।

(3. राधा और कृष्ण के संवादों में उनकी आयु के अनुरूप सहज वार्तालाप के दर्शन होते हैं।
(4.कवि ने कृष्ण को रसिक शिरोमणि बताकर मधुर व्यंग्य किया है।

(घ)नौ लख गाय सुनी हम नन्द के तापर दूध दही न अधाने । माँगत भीख फिरौ बन ही बन झूठि ही बातन के पन पाने ।। …………. सयाने। जाहु भले जु चले घर जाहु चले बस जाउ वृंदावन जाने।।

उत्तर- इसका आशय यह है कि भले ही हम ऊँचे-ऊँचे महलों में रहते हैं किंतु मौत हमें एक पल भी उसमें नहीं रहने देती। यह संसार घास की टट्टी के समान है जो जल जाने पर भस्म हो जाती है। शरीर का अंत होते ही भाई-बंधु उसे शीघ्रातिशीध बाहर निकालने में लगे होते हैं।

यहाँ तक कि जो स्त्री उस देह से प्रेम करती थी वही उसे ‘भूत-भूत’ कहकर भागती है। भला ऐसे जगत और सांसारिक रिश्तों की सार्थकता क्या है रविदास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है।

काल में इस सारे संसार को लूट लिया है। लेकिन रविदास इसलिए बच गए हैं क्योंकि उन्होंने परमात्मा के नाम का सहारा ले रखा है। MHD 23 Free Solved Assignment

रविदास ने जीव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना। उन्होंने उसे माटी का पुतला माना है। इस जीव की सार्थकता इसी में है कि वह राम-नाम की शरण में जाकर उसका आश्रय ले।

उन्होंने संसार के शाश्वत सत्य को बहुत सरलता एवं सहजता से स्पष्ट किया है-जगत की इस अवस्था को देखकर रविदास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाई-बंधु, पति-पत्नी जीते जी जो इस शरीर से प्यार करते हैं वो ही सबसे पहले उसे घर से निकालने को उग्र होते हैं।

अतः इस संसार सागर से केवल राम नाम ही छूटकारा दिला सकता है। और कोई नहीं। उन्होंने अपनी साधना में सिद्धों-नार्थों तथा कबीर आदि निर्गुण संतों द्वारा अपनाई गई पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग अपने काव्य में किया है।

उनके यहाँ सुरति-निरति, सहज, सुन्न, गगन मंडल, गंगा-जमुना, सुषमना, सुरसरि धार, जोति, उल्टा कुआँ, अनाहत नाद आदि निर्गुणवादी शब्द बार-बार आए हैं, जो उनकी साधना पद्धति के विशेष अंग रहे हैं।

उन्होंने इन शब्दों का प्रयोग कर आंतरिक अनुभवों से उन्हें नया अर्थ भी दिया है। उन्होंने अपनी वाणियों में बार-बार मन को स्थिर करते हुए उसे माया से दूर रहने की सलाह दी है।

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

(i) निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख पारिभाषिक शब्दों का विवेचन कीजिए।

त्तर-निर्गुण भक्तिधारा में ईश्वर को निर्गुण-निराकार माना गया। इसकी भी दो उपशाखाएँ थीं-ज्ञानमार्गी (संतकाव्य) काव्यधारा और प्रेममार्गी (सूफी काव्य)। ज्ञानमार्गी काव्यधारा को संतकाव्य भी कहा गया । संत काव्य का अर्थ है-संतों द्वारा रचा गया काव्य । MHD 23 Free Solved Assignment

सामान्यतः ‘संत’ शब्द का अर्थ होता है कोई भी सदाचारी पवित्रात्मा व्यक्ति। इसीलिए संत, साधु, महात्मा आदि शब्दों को पर्यायवाची मान लिया जाता है, लेकिन उनके अर्थ में अंतर है।

विशिष्ट अर्थ में संत उस व्यक्ति को कहते हैं जिसने सत्यरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया हो और जो पवित्र जीवन व्यतीत करते हुए निःस्वार्थ भाव से लोक कल्याण में रत रहता हो ।

संत का यह पारिभाषिक अर्थ कुछ व्यापक है। यह शब्द विकसित होते हुए एक और अर्थ में रूद हो गया है। यह शब्द ज्ञानेश्वर इत्यादि उन निर्गुण भक्तों के लिए ली गया, जिन्होंने दक्षिण में विट्ठल अथवा वारकरी संप्रदाय का प्रचार किया।

इनके साथ अनेक बातों में सभामळ होने के कारण कबीर आदि भक्तं मातियों के लिए भी यह शब्द चल पड़ा। इसलिए हिंदी में जब ‘संतकाव्य’ कहा जाता है तो उसका अर्थ होता है-कबीर आदि निर्गुणोपासक ज्ञानमार्ग कवियों के द्वारा रचित काव्य ।MHD 23 Free Solved Assignment

‘संतकाव्य’ विशेष रूप से निर्गुण काव्य धारा के अर्थ का घोतक है हालाँकि सगुणोपासक कवि भी स्वभाव से संत ही थे।

(1) निर्गुण राम-ईश्वर का स्वरूप भारतीय चितन चारा नै विवाद का केंद्र रहा है। कहीं उसे निति कहा गया तो कहीं सगुण और कहीं उसे विरुद्ध धर्मयुक्त, उभयलिंगी भी कहा गया है ।

वेदांत के अनुसार बड़ा अपने आप में निर्गुण, निराकार, निर्विशेष और निरुपाधि ही है, परंतु अविद्या या गलतफहमी के कारण या उपासना के लिए उसमें उपाधियों या सीमाओं का आरोप करते हैं।

स्वयं कबीरदास के ब्रह्म संबंधी विचार से एकेश्वरवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, अद्वैतवाद, द्वैताद्वैतविलक्षणवाद आदि कई परस्पर विरोध मतों का समर्थन हो सकता है पर इस विरोध का कारण कबीर के विचारों की अस्थिरता नहीं है

बल्कि यह है कि वे भगवान को अनुभवैकगम्य और निखिलातीत तथा समस्त ऐश्वयों और विभूतियों का आधार समझते थे। कबीर के ब्रह्म विकार में एक बात स्पष्ट है कि वे निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक है।

उनके राम, सता, तम और रज के त्रिगुण से परे गुणातीत हैं। ब्रह्म कर्ता इसलिए वह कर्म के हाथ नहीं बिक सकता, तो वह अवतार कैसे हो सकता है। इसलिए कबीर के राम पुराण प्रतिपादित अवतार अथवा दशरथ के पुत्र नहीं हैं।MHD 23 Free Solved Assignment

सगुण मत की केंद्रीय अवधारणा अवतारवाय है जिसके अनुसार ब्रह्म पृथ्वीलोक में अवतार ग्रहण कर नाना प्रकार के कर्म और लीलाएँ संपन्न करते हैं, दुष्टों का संहार करते हैं, दीनों की रक्षा करते है।

पर कबीर के राम इस सब से परे हैं। वे न तो दशरथ के घर उतरे और न लंकेश का नाश करने वाले हैं। कबीर के निर्गुण बहा न तो इतकी की कोख से पैदा हुए,

न अशोदा ने उन्हें गोद में खेलाया: न तो उन्होंने वागन होकर बलि को छला, न वेदोद्धार के लिए वराह रूप धारण कर धरती को अपने दाँतों पर उठाया न वे गंडक के शालिग्राम हैं,

न वराह, मत्स्य, कच्छप आदि वेषधारी विष्णु के अवतार तो वे नरनारायण के रूप में बदरिकाश्रम में ध्यान लगाने बैठे और न परशुराम होकर क्षत्रियों का ध्वंस करने गए, न तो उन्होंने द्वारिका में शरीर छेड़ा और न वे जगन्नाथ धाम में युद्ध रूप में अवतरित हुए।

कबीर का मानना है कि वे सब ऊपरी व्यवहार हैं। जो संसार में व्याप्त हो रहा है वह राम इनकी अपेक्षा कहीं अधिक अगम अपार है। कबीर ने बारंबार ‘दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।

राम नाम का मरम है आना जैसी बातें कहकर पुराण प्रतिपादित सुगण ब्रह्म का प्रत्याख्यान किया है। वे बार-बार याद दिलाते हैं कि यह जो उपासना बताई जा रही है वह सगुण अवतार की नहीं, वरन् ‘निर्गुण राम’ की है।

उसको दूर खोजने की जरूरत नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि केवल सत्य है वह राग जो इस सारे शरीर में रम रहा है इसके अतिरिक्त लहू, झूठ है, धर्म झूठ है।MHD 23 Free Solved Assignment

(2) बीजक-गुप्तधन को बताने वाले सांकेतिक लेख को ‘बीजक’ कहते हैं। कबीर साहब की वाणियों को पुस्तक के रूप में भागोदास ने संकलित किया जो बीजक के नाम से विख्यात है।

बीजक की भाषा ठेठ प्राचीन पूर्वी है। बीजक के सांकेतिक शब्द ‘राम’ का तात्पर्य अवतारी राम से और अधिकतर शुद्ध स्वरूप चैतन्य से है। इसी प्रकार हरि, जादवराम, गोविंद, गोपाल आदि का भी उसी अर्थ में प्रयोग किया गया है।

मन के लिए मच्छ, मांछ, मीत, जुलाहा, साउज, सियार, रोझ, हस्ती, मतंग, निरंजन आदि का प्रयोग किया गया है। पुत्र, पारथ, जुलाहा, सिंह, मूलस, भँवरा, योगी आदि शब्द जीवात्मा को सूचित करते हैं।

माया के बोधक शब्द माता, नारी, छेरी, गैया, बिलैया आदि और संसार के बोधक शब्द सायर, बन, सीकस आदि है।

इसी प्रकार नर-तन के लिए यौवन, दिवस, दिन और इंद्रियों के लिए सखी, सहेलरी आदि सांकेतिक शब्दों का प्रयोग हुआ है।

इसी ग्रंथ में ‘हंस कबीर’ मुक्तात्मा सूचक है, कहहिं कबीर गुरुवचन (कबीर के लिए) कहें कबीर ‘और’ ‘कबीर’ अन्योक्ति का, दास कबीर’ ईश्वर के उपासकों का और ‘कबीरा’ तथा कबिरन’ अज्ञानी तथा वंचक गुरुओं के लिए प्रयुक्त हुआ

(3) उलटवाँसी-‘उलटवाँसी शब्द की व्युत्पत्ति प्रस्तुत करते हुए विभिन्न विद्वानों ने उलटा-अंश, उलटा बाँस, उलटवा-सी के योग से इस शब्द का प्रचलन में आना माना है।

कुछ भी हो यह बात स्पष्ट है कि ‘उलटवाँसी में उल्टी बात कहकर यानी विरोध के द्वारा उक्ति का चमत्कार पैदा किया जाता है। MHD 23 Free Solved Assignment

उलटवाँसी की यह परंपरा बहुत प्राचीन है। वैदिक साहित्य से लेकर इसका प्रयोग होता रहा है। धार्मिक अभिव्यक्तियों से लेकर तांत्रिकों और वजयानी सिद्धों तक पहुँचकर उलटी बात कहने की शैली को बहुत प्रोत्साहन मिलता रहा।

कबीर की उलटवासियाँ प्रतीक परिवार की सहेलियाँ मानी जाती हैं। कबीर ने अनेक विचार उलटयाँसियों में ही व्यक्त किए हैं।

इसलिए कहा जा सकता है कि उलटवासियों में भी कबीर का ज्ञान संचित है। कबीर ने उलटवाँसी को ‘उलटा वेद’ कहकर महत्त्व दिया है। सिद्धों और नाथों की वाणी से कदीर की वाणी का अटूट रिश्ता रहा है।

कबीर ने उन्हीं के गोला बारूद से सिद्धों-नाथों के गढ़ पर चढ़ाई की थी। भाषा की प्रवृत्ति में काफी समानता दिखाई देती है। गोरखनाथ की रहस्यात्मक शैली या उलटवासियों का प्रभाव कबीर आदि संत कवियों के काव्य में दृष्टिगोचर होता है।

(4) शून्यावस्था और सहजावस्था-शून्य और सहज को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भारतीय साहित्य के अत्यधिक मनोरंजक शब्दों में मानते हैं,

क्योंकि इनका ऐतिहासिक विकास भारतीय दर्शन परंपरा में बहुत रोचक रहा है। बौद्ध महायान संप्रदाय के दार्शनिकों की दो शाखाएँ ‘शून्यवाद’ और विज्ञानवाद’ हैं। शून्यवाद’ के अनुसार संसार में सब कुछ शून्य है, किसी की कोई सत्ता नहीं।MHD 23 Free Solved Assignment

बौद्ध विचारक नागार्जुन ने शून्य की व्याख्या में कहा है कि इसे शून्य भी नहीं कह सकते, अशून्य भी नहीं कह सकते और दोनों अर्थात् शून्याशून्य भी नहीं कह सकते ।

यह भी नहीं कह सकते कि शून्य भी नहीं है और अशून्य भी नहीं है। इसी भाव की प्राप्ति के लिए शून्य का व्यवहार होता है। इस प्रकार यह सिद्धांत बहुत कुछ अनिर्वचीनयता का रूप ग्रहण कर लेता है।

दूसरी ओर हम यह देख चुके हैं कि नाथपंथी लोग अपने सबसे ऊपरी सहसार चक्र को शून्य चक्र कहते हैं। उनके मतानुसार जब जीवात्मा नाना-प्रकार की यौगिक क्रियाओं द्वारा इस चक्र में पहुँचती है तो वह समस्त रहों से ऊपर उठकर केवल रूप में विराजमान हो जाती

(5) सुरति-निरति-सुरति-निरति शब्दों के संबंध में अलग-अलग विद्वानों ने अपने भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किए हैं। डॉ. संपूर्णानंद के शब्दों में सुरति को ‘स्रोत’ का बिगड़ा हुआ रूप कहा गया है और वे उसका अर्थ ‘चित्तवृत्तियों का प्रवाह मानते हैं।

डॉ. बड़थ्वाल ‘सुरति’ को ‘स्मृति’ से निकला हुआ मानते हैं। परशुराम चतुर्वेदी ने सुरति का अर्थ जीवन का वह निर्मल रूप बताया है जिसमें मूल सत्य का रूप बराबर झलकता है।

पं. गोपीनाथ कविराज आध्यात्मिक दृश्य दर्शनरत असाधारण दृष्टि को सुरति और निर्विकल्प ध्यान को निरति मानते हैं। MHD 23 Free Solved Assignment

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साधन-साध्य रूपा रति को सुरति और विरति को निरति बहाते हैं। गोरखनाथ ‘सुरति’ के भावनात्मक अर्थ-प्रसंग को लेकर सुरति का साधक रूप में उल्लेख करते हैं-‘अवधू सुरति सो साधक संघद सो सिधि।

आजकल अधिकतर विद्वान और मुस्लिम अलिम आदि अंतिम मत ऊन पहनने वाले सूफी संत को ही स्वीकार करते हैं। सूफी काव्यधारा के प्रमुख पारिभाषिक शब्द निम्नलिखित हैं

(1) मसनवी-शाब्दिक दृष्टि से मसनवी’ शब्द का अर्थ ही होता है। यह काव्य का ऐसा रूप है. जिसके हर शेर के दोनों मिसरे एक ही रदीफ और काफिए में होते हैं। हर शेर का रदीफ और काफिया आपस में अलग-अलग भी हो सकता है।

इसलिए मसनवी में शायर को क्रमबद्ध विषय-वर्णन में बड़ी आसानी होती है। _

सनवी के लिए सात बहरें नियम हैं। इन्हीं सात बहरों में मसनवी लिखी जा सकती है। मसनवी में शेरों की संख्या की कोई सीमा नहीं है।

छोटी मसनवियाँ हजारों तक पाई जाती हैं। मसनवी में विषय की भी कोई सीमा नहीं है। कवि जिस विषय पर चाहे, मसनवी लिख सकता है।MHD 23 Free Solved Assignment

उर्दू मसनवी लिखने वालों ने मसनवियों में आख्यान भी लिखे हैं, भगवान की प्रशंसा भी की है तथा साहित्यिक तत्वों और प्राकृतिक दृश्यों को भी चित्रित किया है।

मसनवी की खूबी यह है कि जिस घटना या वृत्त का वर्णन किया जाए उसे सरलता व विस्तार के साथ इस प्रकार चित्रित किया जाए कि वह घटना आँखों के सामने फिरने लगे और पूरा वातावरण चलचित्र की तरह सामने आ जाए।
उर्दू में मीर, मीर हसन, दयाशंकर, नसीम, मिर्जा शौक आदि ने मसनवियाँ लिखी हैं। हिंदी सूफीकाव्य परंपरा में इसी काव्य रूप को अपनाया गया है।

जायसी का ‘पद्मावत’ मसनवी ही है। उस दृष्टि से मसनवी को भी एक ऐसा कथा काव्य का रूप कह सकते हैं जिसकी स्थिति महाकाव्य के नामक काव्य रूप के निकट ठहरती है।

(2) शरीअत-इस्लाम धर्म के अनुयायी कुरान के वचनों और हदीसों द्वारा अनुमोदित नियम-कानून का पालन करना आवश्यक मानते हैं। इन नियमों के द्वारा सांसारित जीवन और उपासना, दोनों का मार्गनिर्धारण होता है।

(3) तरीकत-तरीकत का अर्थ है आध्यालिक मार्ग। लेकिन ईसा की नवीं-दसवीं शताब्दी तक इसका अर्थ कुछ और ही था । MHD 23 Free Solved Assignment

उस काल में साधकों को साधना के पथ पर अग्रसर होने का व्यवहारिक ज्ञान कराने की एक पद्धति का बोध होता था ।

सन् ईसवी की ग्यारहवीं शताब्दी के बाद जब नाना सूफी संप्रदाय का आविर्भाव होने लगा, तब इसका अर्थ विभिन्न संप्रदायों में प्रचलित धार्मिक क्रिया और अनुष्ठान हो गया, जिनका सहारा लेकर उस संप्रदाय के साधन साधना के पथ पर आगे बढ़ते रहे।

(4) हकीकत-हकीकत से तात्पर्य सूफी मार्ग की इस मंजिल से है, जिसमें साधक को परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है और उसके साथ वह एकमेक’ हो जाता है।

(5) मारिफत-मारिफत का अर्थ है ईश्वरीय अर्थात् आध्यात्मिक ज्ञान । सूफी साधक मानते हैं कि यही मारिफ (आध्यात्मिक सच्चा ज्ञान) परमात्मा के ‘एकत्व’ का बोध है।

इसके द्वारा मनुष्य समझ पाता है कि ‘भिन्न’ की प्रतीति होना मिथ्या है। इस ज्ञान के सहारे मनुष्य अपने-आपको जान पाता है और अपने आपको जानना परमात्मा को जानना है।

इस प्रकार परमात्मा-विषयक सूफियों के रहस्यमय ज्ञान को मारिफ कहते हैं। सूफी इसे प्रकाश मानते हैं, जिससे हृदय आलोकित हो उठता है।

मारिफत ज्योतिस्वरूप परमात्मा के प्रकाश से ही प्रकाशवान होता है तथा इसी के सहारे साधक परमात्मा के “एकत्व’ को देखने में सक्षम हो पाता है।

(ii) भक्तिकालीन प्रमुख कृष्ण भक्त कवियों का परिचय दीजिए।

उत्तर- हिंदी में कृष्ण-काव्य का बहुत कुछ श्रेय श्री वल्लभाचार्य को है क्योंकि इन्हीं के चलाए हुए पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर सूरदास आदि अष्टछाप के कवियों ने अत्यंत मूल्यवान कृष्ण-साहित्य की रचना की।

वल्लभ-संप्रदाय के अंतर्गत अष्टछाप के सूरदास आदि आठ कवियों की मंडली अष्टसखा के नाम से भी अभिहित की जाती है।MHD 23 Free Solved Assignment

संप्रदाय की दृष्टि से ये आठों कवि भगवान् कृष्ण के सखा हैं। गुसाई विट्ठलनाथ ने सं. 1602 के लगभग अपने पिता वल्लम के 84 शिष्यों में से चार तथा अपने 252 शिष्यों में चार को लेकर संप्रदाय के इन आठ प्रसिद्ध भक्त कवि तथा संगीतशों की मंडली की स्थापना की।

अष्टछाप में महाप्रभू वल्लभ के चार प्रसिद्ध शिष्य थे-कुम्भनदास, परमानन्ददास. सूरदास तथा कृष्णदास अधिकारी और गुसाई विट्ठलनाथ के प्रसिद्ध शिष्य थेगोविंद स्वामी, छीत स्वामी, चतुर्भुजदास तथा नन्ददास।

इन अष्टछाप के कवियों में सबसे ज्येष्ठ कुम्भनदास थे तथा सबसे कनिष्ठ नन्दवास क) काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से इनमें सर्वप्रथम स्थान सूरदास का है तथा द्वितीय स्थान नन्ददास कापल-रचना की दृष्टि से परमानन्द-दाम का है। गोविंद स्वामी प्रसिद्ध संगीत-मर्मज्ञ है।

कृष्णदास अधिकारी का साहित्यिक दृष्टि से तो कोई महत्व नहीं है पर ऐतिहासिक महत्त्व अवश्य है। कृष्ण-भक्तों में सांप्रदायिकता, लीलाओं में आध्यात्मिकता के स्थान पर ऐहलौकिकता, श्रीनाथ के मंदिर में विलास-प्रधान ऐश्वर्य, कृष्ण-भक्ति साहित्य में नख-शिख तथा नायिका-भेद के वर्णन का बहुत कुछ दायित्व इन्हीं पर है।

इस बात के सम्यक् ज्ञान के लिए दौ-सौ बावन वैष्णवन की वार्ता का अध्ययन उपयोगी रहेगा। अष्टछाप के शेष कवियों की प्रतिभा साधारण कोटि की है। _ अष्टछाप के ये आठों भक्त समकालीन थे।

ये पुष्टि संप्रदाय के श्रेष्ठ कलाकार, संगीतज्ञ और कीर्तनकार थे। ये सभी भक्त अपनी-अपनी पारी पर श्रीनाथ के मंदिर में कीर्तन, सेवा तथा प्रभुलीला संबंधी पद रचना करते थे ।

गुसाई विट्ठलनाथ ने इन अष्ट सखाओं पर अपने आर्शीवाद की छाप लगाई अतः इनका नाम अष्टछाप पड़ा । अष्टछाप के इन कवियों में सूरदास, परमानंददास तथा नंददास का नाम सबसे प्रमुख है।

इन कवियों के अतिरिक्त भक्तिकाल में और भी महत्त्वपूर्ण कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण के विविध रूपों को लेकर काव्य रचना की। इन विशिष्ट कवियों का संक्षिप्त परिचय नीचे प्रस्तुत है–

(1) सूरदास-‘सूरदास’ कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। सूरदास जी के जीवन वत्त को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद हैं। सूरदास का जन्म 1478 ई. माना जाता है। सूरदासू बड़े गायक थे। वे गऊघाट पर निवास करते थे और विनयपद गाते थे। MHD 23 Free Solved Assignment

महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया और कृष्ण लीला गाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कृष्ण लीला के ‘सहस्त्रावधि’ पद लिखे, जिनकी प्रसिद्धि सुनकर देशाधिपति (अकबर) उनसे मिले ।

सूरदास अंधे थे। वे ईश्वर और गुरु में कोई अंतर नहीं मानते थे। उन्होंने परासोली में प्राण त्याग दिए। सूर के मृत्यु काल के संदर्भ में भी विद्वानों में मतभेद हैं।

लेकिन अधिकांश सूर विद्वान सूर का मृत्यु सन् 1583 स्वीकार करते हैं। उनके देहावसान समय पर विट्ठलनाथ ने शोकार्त होकर कहा था–

         'पुष्टिमारग को जहाज जात है सो जाको कछ लेना होय सो लेड 

सूरदास की शिक्षा के संबंध में कोई उल्लेख नहीं मिलता; वे गाँव से चार कोस दूर रहकर पद रचना में लीन रहते थे और गान-विद्या में प्रवीण थे।

सूरदास वल्लभाचार्य के संपर्क में आने पर सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव की पद-रचना करने लगे। सूरदास ने श्रीमद्भागवत के आधार पर कृष्ण संबंधी रचित पदों की संख्या सवा लाख बताई है।

‘डॉ. दीनदयालु गुप्त’ ने उनके द्वारा रचित पच्चीस पुस्तकों की सूचना दी है, जिनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, सूरपचीसी, सूररामायण, सूरसाठी और राधारसकेलि प्रकाशित हो चुकी है।

‘सूरसागर’ और ‘साहित्य लहरी’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। ‘सूरसागर’ का आधार श्रीमद्भागवत है। भागवत के समान इनमें भी बारह स्कंद हैं।MHD 23 Free Solved Assignment

सूर की भक्ति पद्धति पुष्टिमार्गीय भक्त्ति है और इस भक्ति को अपनाने के बाद प्रभु स्वयं अपने भक्त का ध्यान रखते हैं। भगवान का अनुग्रह ही भक्त का कल्याण करके उसे इस लोक से मुक्त करने में सफल होता है

           जा पर दीनानाथ दरै। 
           सोई कुलीन बडौ सुंदर सोइ जा पर कृपा करे।
           सूर पतित तरि जाय तनक में जो प्रभु नेक दरै।। 

सूर की रचनाओं का तत्कालीन समाज जीवन से कतई संबंध नहीं था। वे पहले भक्त और बाद में कवि थे। तुलसी के समान सूर में लोक संग्रह की भावना नहीं मिलती है। वे वस्तुतः कृष्ण में ही लीन हो चुके थे।

सूरदास ने प्रेम और विरह के द्वारा सगुण मार्ग से कृष्ण को साध्य माना है। उनके कृष्ण सखा रूप में भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। विष्णु, हरि, राम आदि सब कृष्ण के ही नाम हैं।

निर्गुण ब्रह्म के ये सगुण नाम हैं। वात्सल्य वर्णन के प्रथम कवि सूरदास है। सूरदास ने वात्सल्य का कोना-कोना झाँका है।

सूरदास ने अपनी रचनाओं में कृष्ण-जन्म, उनकी बाल क्रीड़ाओं, गोचारण, राधा और गोपियों के साथ प्रेम-क्रीड़ा, अनेक असुरों को वध, गोवर्धन धारण, मथुरा-गमन, कंस वध, द्वारिका गमन और कुरुक्षेत्र में राधा और गोप-गोपियों से पुनर्मिलन का प्रभावी चित्रण किया है।MHD 23 Free Solved Assignment

सूरदास के कृष्ण पूर्णब्रह्म हैं। उनकी भक्ति सख्य भाव की है। उनके साहित्य में विनय और दास्य भाव के पद कम हैं, किंतु कृष्ण काव्य में इन पदों का विशेष महत्त्व है।

उनके भगवान भक्तों की पुकार पर दौड़ पड़ते हैं। सूरदास के कृष्ण की घोषणा है

           हम भक्तन के भक्त हमारे। 
           भक्तै काज लाज हिय धरिकै पांय पयोद धाऊँ। 
           जहँ-जहँ पीर पड़े भक्तन पै तहँ-तहँ जाय छुड़ाऊँ। 

सूरदास का प्रमुख ग्रंथ ‘सूरसागर’ है। इस ग्रंथ में वात्सल्य श्रृंगार और भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित हुई है। सूर ने श्रीकृष्ण को परब्रह्म माना है।

उनके अनुसार संपूर्ण बझांड में श्रीकृष्ण की व्याप्त हैं. कोई दूसरा नहीं, ब्रह्म के इसी रूप का चित्रण करते हुए सूरदास ने लिखा है।

         सकल तत्त्व ब्रह्मांड देव पूनि, माया सब विधि काल। 
         प्रकृति पुरुष श्रीपति नारायन, सब है अंश सुपाल

यही ब्रह्म भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए अवतार लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भक्तों को आनंद प्रदान करने के उद्देश्य से ही अपनी समस्त शक्तियों सहित वृंदावन में अवतार लिया है। सूरदास ने श्रीकृष्ण की लीला तथा विस्तार के संबंध में लिखा है MHD 23 Free Solved Assignment

         खेलत-खेलत चित्त में आई सृष्टि करन विस्तार। 
        अपने आप हरि प्रगट कियो हैं हरि पुरुष अवतार ।।

सूरदास पूर्णतया पुष्टिमार्ग के अनुयायी थे । ब्रह्म की कृपा प्राप्ति के पश्चात् ही जीव सर्व समर्थ होता है। वह कुछ भी कर सकने में सक्षम हो जाता है । सूरदास कहते हैं

              चरन कमल वंदी हरिराई। 
              जाकी कृपा पंगु गिरि लंपैं, अंधे को सब कुछ बरसाई। 
              बहिरौ सुनै, गूंग पुनि बोले, रंक चलै सिर छत्र धराई। 
              सूरदास स्वामी करुणामय, बार-बार बंदौ तिहि पाई।

भक्ति नौ प्रकार की मानी जाती है-अषण, कीर्तन, स्मरण, पाद सूचन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन । इसे नवधा भक्ति’ कहते हैं।

बल्लभाचार्य ने नवधाभक्ति में प्रेम लक्षणा भक्ति जोड़कर दक्षधा भक्ति’ का विधान बनाया । सूरदास ‘दशधा भक्ति’ का पूर्णतया पालन करते हैं

           श्रवण कीर्तन स्मरण-पाद रत अरचन वंदन दास । 
           सख्य और आत्मनिवेदन प्रेमलक्षणा जास।। 

सूरदास के साहित्य में भक्ति के सभी भावों का वर्णन मिल जाता है पर सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव की भक्ति पर उन्होंने विशेष जोर दिया है। वे श्रीकृष्ण को सखा मानते हैं।

उनके बालरूप को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं और गोपियों के माध्यम से माधुर्यभाव की भक्ति प्रवाहित करते हैं। सूर के काव्य में राधा स्वकीया हैं और गोपियाँ परकीया। गोपियों का प्रेम अत्यधिक तीव्र और मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला है।MHD 23 Free Solved Assignment

(2) नंददास-अष्टछाप कवियों में सूर के बाद का स्थान नंददास का था। वे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि थे। ‘नंददास’ का जन्म 1533 ई. में हुआ था।

इनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या पंद्रह बताई जाती है। इन ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं-अनेकार्थ मंजरी, मानमंजरी, रसमंजरी, रूपमंजरी, विरहमंजरी, प्रेम बारहखड़ी, श्याम सगाई, सुदामा चरित्र, रुक्मिणी मंगल, भंवरगीत, रास पंचाध्यायी, सिद्धांत पंचाध्यायी, दशमस्कंदभाषा, गोवर्धनदासलीला, नंददास-पदावली आदि।

यद्यपि नंददास की रचनाओं में कुछ अन्य वर्णन भी मिल जाते हैं पर उनकी अधिकांश रचनाओं के आधार कृष्ण हैं। कवि की इन रचनाओं में पदावली और भंवरगीत को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है।

पदावली’ में मुख्यतया कृष्ण की बाल और किशोर लीला वर्णित है। काव्य के माध्यम से बल्लभमत को प्रस्तुत करने में सूरदास और नंददास का योगदान सर्वाधिक है।

नंददास की पदावली के मंगलाचरण में राम और कृष्ण की स्तुति एक साथ की गई है। इसके पश्चात् गुरु विट्ठलनाथ का स्तवन किया गया है फिर यमुना, बज, श्रीकृष्ण जन्म, बाल क्रीड़ा, राधा जन्म, पूर्वानुराग, विवाह, प्रेमलीला, ब्रज बाला, अनिसार, दधि लीला, रास आदि से संबद्ध पद हैं।

नंददास श्रीकृष्ण को रस सागर मानते हैं।MHD 23 Free Solved Assignment

नंददास की रचनाओं में भंवरगीत’ का विशिष्ट स्थान है। सूरदास के भ्रमर गीत के पश्चात् उसे ही महत्व दिया जाता है। नंददास को ‘भंवरगीत’ संक्षिप्त है।

इसका प्रारंभ उद्धव की ब्रज यात्रा से होता है। वे अज पहुँचकर गोपियों से श्रीकृष्ण का संदेश कहते हैं और अपना उपदेश प्रारंभ करते हैं

      उधौ को उपदेश सुनौ ब्रज नागरी। 

उधौ से कृष्ण का नाम सुनकर गोपियाँ भाव-विह्वल हो उठती हैं। उनकी स्थिति दृष्टव्य हैसुनत स्याम को नाम वाम गृह की सुधि मूली। भरि आनंद रस हवय प्रेम बेली दुम फूली।।

इसके पश्चात् गोपियों और उद्भव का लंबा संवाद चलता है। नंददास ने कथोपकथन के माध्यम से सारे संवाद और वातावरण की सृष्टि की है। गोपियाँ उद्धव को कृष्ण के सखा’ संबोधन से संबोधित करते हुए अपनी बात आगे बढ़ाती हैं

           सखा सुनु स्याम के

नंददास ने उद्धव और गोपियों के वार्तालाप में संवाद शैली और नाटकीयता का सहारा लिया है। उनकी गोपियाँ सूर की गोपियों की तरह भावाकुल नहीं हैं।MHD 23 Free Solved Assignment

वे अपने तर्कों द्वारा उदव के निर्गुण ब्रह्म का खंडन करती है। वे झनमार्गी उद्धव से पूछती हैं कि कौन ब्रहा और कैसा ज्ञानमार्ग

        हमरे सुंदर स्याम प्रेम को मारग सूधौ।

गोपियाँ नहीं समझ पार्ती कि यदि कृष्ण निराकार हैं तो माखन खाने वाला और गोचारण करने वाला कौन है? नंददास के भंवरगीत में भी उद्धव और गोपियों के वातलिाप के बीच एक भ्रमर उपस्थित होता है और उसी को संबोधित कर गोपियाँ अनेक उपालंभ देती हैं। उपालंभ देते-देते वे आँसुओं में डूब जाती है

        भीजत अंबुज नीर कंचकी भूषन हारन। 

‘भवरगीत’ में गोपियों की पीड़ा उपालंभ और व्यंग्य के बीच प्रकट हुई है। गोपियों के दुख को देखकर उद्धव भी ज्ञानमार्ग भूल जाते हैं और सोचते हैं

      हाँ तो कृत कृत वै गयौ इनके वरसन मात्र ।

उद्धव गोपियों के प्रेम की सराहना करते हैं। भंवरगीत में नंददास तार्किकता से अपनी यात्रा का प्रारंभ करते हुए क्रमशः गोपियों की भावभूमि को ऊँचाई प्रदान करते हैं। गोपियों की वैशा देखकर मथुरा लौटने पर उद्धव का हृदय पूर्णतया परिवर्तित हो चुका था MHD 23 Free Solved Assignment

       गोपी गुन गावन लाग्यो, मोहन गुन गयो मूलि 

उद्धव कृष्ण को उनकी निर्ममता के लिए धिक्कारते हैं और उन्हें मथुस छोड़कर वृंदावन में ही रहने के लिए सलाह देते हैं

   हे स्याम जाय वृंदावन रहिये 

उद्धव के मुख से गोपियों की स्थिति सुनकर कृष्ण भी प्रेम की पीड़ा में डूबने-उतारने लगते हैं

      सुनत सखा के बैन नैन आए भरि दोऊ। 
      बिवस प्रेम आवेस रही नाहिंन सुधि कोऊ।।

नंददास का भंवरगीत’ संक्षिप्त किंतु महत्वपूर्ण है। तुलसीदास ने भी ‘कृष्णगीतावली’ में ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग से जुड़े हुए कुछ पदों की रचना की है। इन पदो में गोपियों की विरह दशा का वर्णन हुआ है।

यह अवश्य है कि तुलसी ने गोपियों की विरह वेदना के वर्णन में सूर की अपेक्षा काफी संयम रखा। ऐसा लगता है कि तुलसी की मर्यादावादी दृष्टि यहाँ भी सक्रिय है।MHD 23 Free Solved Assignment

(3) परमानंद दास (1493-1553 ई.)-परमानंद दास का जन्म कन्नौज के निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वल्लभाचार्य से दीक्षा लेकर ये बाल लीला के पदों की रचना करते रहे।

इनकी रचनाएँ परमानंद सागर’ के नाम से प्रकाशित हैं। बाल लीला के सुंदर पद इन्होंने लिखे हैं किंतु उनमें सूरदास जैसी मार्मिकता नहीं है। ये अष्टछाप के प्रमुख कवि थे।

परमानंद दास की मुख्य रचना परमानंदसागर’ है। दानलीला’. ‘उद्धवलीला’, ‘धुवचरित्र’, ‘दधिलीला’ आदि उनके अन्य ग्रंथों का भी उल्लेख मिलता है पर परमानंदसागर’ ही उनकी मुख्य कृति है इस कृति में 930 पद संकलित हैं।

मंगलाचरण, श्री जन्माष्टमी, नंद महोत्सव, माखनचोरी, गोचारण, राधा, मुरली, रास, अभिसार, मथुरा प्रसंग आदि इस ग्रंथ के मुख्य विष हैं।

परमानंद दास की रचनाओं के कथ्य के संदर्भ में डॉ. हरवंशलाल शर्मा ने लिखा है- “कृष्ण की संपूर्ण लीलाओं की कथा कहना परमानंद दास का उद्देश्य नहीं प्रतीत होता, यद्यपि उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का संकेत यहाँ प्राप्त हो जाता है।

परमानंदसागर से ज्ञात होता है कि बालक कृष्ण के जन्म से लेकर माखनलीला आदि तक डेढ़ सौ पद रचे गए हैं। मुरली तथा राधा की चर्चा भी किंचित विस्तार से है और कृष्ण के रसिकेश्वर रूप को प्रमुखता मिली है, जिसमें राधा की आसक्ति, मानापनोदन, अभिसार का विस्तृत वर्णन है।

भ्रमर गीत परंपरा कृष्णकाव्य का मुख्य कथावस्तु है और परमानंदसागर में भी इससे संबद्ध पद मिलते हैं। परिशिष्ट के रूप में नित्य सेवा, कीर्तन तथा शरणागति आदि की भावनाएँ व्यंजित हैं।

रूप सूरसागर और परमानंददास के कुछ पदों में अद्भुत समानता मिलती है। बालकृष्ण के चित्रण में दोनों कवियों को विशेष स्थान दिया जाता है। सूरदास को एक पद है

      कहन लगे मोहन मैया-मैया। 
      इस पद से मिलता-जुलता परमानंददास का पद पदिएकहन लगे मोहन मैया-मैया । 
      बाबा-बाबा नंदराय सों और हल घर सों मैया मैया। 
      छगन-मगन मधुसूदन माधौ सब बज लेत बलैया ।

इन दोनों पदों में पहली पंक्ति समान है। अन्य पंक्तियों में भाव-साम्य है। परमानंददास के यहाँ ऐसे अनेक पद मिलते हैं। MHD 23 Free Solved Assignment

सूरदास के यहाँ कृष्ण और राधा का प्रथम साक्षात्कार ब्रज की गलियों में खेलने के क्रम में होता है। परमानंददास के यहाँ राधा और कृष्ण के मिलन का आरंभ इस तरह से हुआ है

गोरस राधिका लै निकरी
नंद को लाल अमोलो गाहक बज से निकसल पकरी।।

‘परमानंद सागर में राधा और कृष्ण के मिलन-चित्रों की भरमार है। कमीचे बार की गलियों में मिलते हैं तो कभी कुंज-कछारन में। दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते–

गोपियों की प्रेमानुभूति, रासलीला, अभिसार आदि का वर्णन भी कवि ने पूरी तन्मयता से किया है। परमानंद सागर में भ्रमरगीत प्रसंग संक्षिप्त है।

इनकी गोपियाँ सूर की गोपियों की तरह साकार और निराकर के वंद्व में नहीं उलझी है। वे अपनी वियोग दशा में ही डूबती उतराती हैं। अन्य चीजों की उन्हें सुध ही नहीं है। उद्धव से अपनी व्यथा-कथा कहने में भी वे असमर्थ हैं

ऊधौ नाहिन परत कही। जब ते हरि मधुपुरी सिधारे बौहोतहि बिधा सही। वे कृष्ण की पाती भी नहीं बाँच पातीपतियाँ बाँचेहू न आवै देखत अंक नैन जल पूरे पूरे गदगद प्रेम जनावै।

कृष्ण के वियोग में ब्रज की जिस करुणदशा का चित्रण सूरदास ने किया है उसे परमानंद दास के यहाँ भी देखा जा सकता हैब्रज के विरही लोग विचारे । बिन गोपाल ठगे से ठादे अति दुर्बल तत् हारे ।

मात जसोवा पंथ निहारत निरखत सांझ सकारे जो कोउ कान्ह कान्ह कहि बोलत अंखियन बहत पनारे यह मथुरा काजर की रेखा जो निकसे सो कारे॥ MHD 23 Free Solved Assignment

(4) कुंभनदास (1468-1583 ई.)-ब्रज में गोवर्धन पर्वत से दूर एक गाँव में रहने वाले कुंभनदास गृहस्थ होते हुए भी ये अनासक्त भाव से कृष्णभक्ति में लीन रहते थे। MHD 23 Free Solved Assignment

ये कीर्तन गायन में बड़े प्रसिद्ध थे और व्यक्तित्ववान भी थे। किंवदंती है कि कुंभनदास एक बार अकबर के निमंत्रण पर फतेहपुर सीकरी गए थे। वहाँ बादशाह के आग्रह पर उन्होंने पद सुनाया था

भक्तन को कहा सीकरी सों काम आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम । जाको देखे दुःख लागै ताकौ करन परी परनाम। कुंभनदास लाल गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।।

इनके पदों में साहित्यिकता से ज्यादा संगीत और लय का सौंदर्य है। इनकी स्वतंत्र रचनाओं का उल्लेख नहीं मिला, किंतु उनके कुछ पद ‘राग कल्पदुम’, ‘राग रत्नाकर’, ‘वसंत धमार कीर्तन’ आदि में संकलित है।

(5) कृष्णदास (1495-1575 ई.)-ये दलित समुदाय से थे और गुजरात के राजनगर राज्य में जन्मे थे। प्रबंध पटुता के कारण ये ब्रज में आकर श्रीनाथ जी के मंदिर का प्रबंध देखने लगे।

संगीत के मर्मज्ञ और गायक थे। बाल लीला और राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग में इनका मन रसता था । इनकी मातृभाषा गुजराती थी लेकिन ब्रजभाषा पर इनका इच्छा अधिकार था। ये कृष्णदास अधिकारी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

(iii) रविदास का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए निर्गुण काव्य में रविदास के योगदान की चर्चा कीजिए।

उत्तर- रैदास रामानंद की शिष्य परंपरा और कबीर के समकालीन कवि थे। रैदास का जन्म सन् 1299 ई. में काशी में हुआ। रैदास विवाहित थे, उनकी पत्नी का नाम लोना था।

इन्होंने स्वयं अपनी जाति का उल्लेख किया है-‘कह रैदास खलास चमारा | संत रैदास पढ़े-लिखे नहीं थे। इन्होंने प्रयाग, मथुरा, वृंदावन, भरतपुर, चित्तौड़ आदि स्थानों का भ्रमण कर निर्गुण ब्रह्म का जनसाधारण की भाषा में प्रचार-प्रसार किया। चित्तौड़ की रानी और मीराबाई इनकी शिष्या थीं।

रैदास में संतों की सहजता, निस्पृहता, उदारता, विश्वप्रेम, दृढ विश्वास और सात्विक जीवन के भाव इनकी रचनाओं में मिलते हैं। इनकी रचनाएँ संतमन की, विभिन्न संग्रहों में संकलित मिलती हैं।

इनके फुटकर पद ‘बानी’ के नाम से “संतबानी सीरीज में संग्रहित मिलते हैं। इनके “आदि गुरु ग्रंथ साहिब” में लगभग चालीस पद मिलते हैं। इन्होंने संत कबीर के समान मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा आदि बाहा आडम्बरों का विरोध किया है। कुछ पद नीचे उद्भुत हैं MHD 23 Free Solved Assignment

        "तीरथ बरत न करौ अंदेशा । तुम्हारे चरण कमल भरोसा ।।
         जहँ तहँ जाओ तुम्हरी पूजा । तुमसा देव और नहीं दूजा ।।

संत रैदास ने जाति-प्रथा पर भी प्रहार किया है अपने अपमान और ओछेपन को लेकर उन्होंने लिखा है

   जानी ओछा पाती ओछा, ओछा जनम हमारा।
   राम राज की सेवा कीन्हीं, कहि रविदास चमारा।। 

निर्गुण उपासना पद्धति में ईश्वर के निर्गुण रूप की उपासना की जाती है।

हिंदू ग्रंथ में ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूप और उनके उपासकों के बारे में बताया गया है। निर्गुण ब्रह्म थे माकता है कि ईश्वर अनादि, अमम्त है. वह न जन्म लेता है न मरता है, इस विचारधारा को मान्यता दी गई है।

निर्गुण’ शब्द का व्याकरण की दृष्टि से व्युत्पन्नार्थ है निर्गुतोगुणोभ्यः अथति गुणों से विहीन या शून्य कोश के अनुसार, ‘निर्गुण’ शब्द का अर्थ गुणों से रहित है।MHD 23 Free Solved Assignment

साहित्य में निर्गुण शब्द का प्रयोग प्रभाव, शील, धर्म, प्रत्यंचा, सगुण, सद्गुण आदि के अर्थ में मिलता है। दार्शनिक अर्थ में गुण का अर्थ प्रकृति के तीन गुणों सत्, रज, व तम से माना जाता है।

इस प्रकार निर्गुण’ का सामान्य अर्थ हुआ जो प्रकृति के सत्, रज एवं ‘तम’ तीनों गुणों से परे हो । वेदों से लेकर अन्य भारतीय आस्तिक दर्शनों में तीनों गुणों से इतर ब्रह्म को ही माना गया है जिसे ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहा गया है। निर्गुण ब्रह्मा के संबंध में ‘श्वेताश्वतरोपनिषद् में कहा गया है

          एको देवा सर्व भूतेषु गूदः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा।
          कर्माध्यक्षः सर्व भूतादिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।

इसका अर्थ है कि समस्त प्राणियों में एक ही देव शक्ति या ब्रह्म की स्थिति है वह बह्म सर्व व्यापक, समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ सबका साक्षी सबैको चेतना का वरदान देने वाला शुद्ध एवं निर्गुण है। MHD 23 Free Solved Assignment

वह परमपुरुष मूर्त, व्यक्त, साकार, रूप से परे व इंद्रिय ग्राह्य नहीं है। वस्तुतः निर्गुण भारतीय दर्शन का पारिभाषिक शब्द है। MHD 23 Free Solved Assignment

तत्वचिंतकों ने ब्रह्म-निरूपण के प्रसंग में निर्गुण को सूक्ष्मता से परिभाषित करते हुए कहा है कि निर्गुण वह है जिसका किसी प्रकार के विशेषण या लक्षण द्वारा इदमित्थं निरूपण नहीं किया जा सकता।

निर्गुण भक्ति के संबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है “निर्गुण भक्ति मार्ग की आरंभिक अवस्था ज्ञान की कथनी वाले मार्गों की परंपरा का ही अंतिम रूप रही होगी।

वस्तुतः इनकी साखियाँ आठ योगांगों के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करने के उद्देश्य से ही लिखी गई हैं। इन उपदेशों में ज्ञान-प्रवण नैतिक स्वर ही प्रधान है, योग संबंधी स्वर गौण ।

इसी ज्ञान-प्रवण नैतिकता प्रधान योग-मार्ग के खेत में भक्ति का बीज पड़ने से जो मनोहर लता उत्पन्न हुई. उसी का नाम ‘निर्गुण’ भक्ति-मार्ग है MH D 23 Free Solved Assignment

स्थान-स्थान पर कबीर आदि निर्गुण संतों ने अपने पदों में “त्रिगुणातीत, द्वैताद्वैत विलक्षण, भावाभावविनिर्मुक्त, अलख, अगोचर, अगम्य, प्रेमपारावर भगवान को निर्गुण राम कहकर संबोधन किया है।

वह समस्त ज्ञान तत्त्वों से भिन्न है फिर भी सर्वमय है। उस सर्वव्यापक, अनुभवजन्य, अगम, अगोचर परमात्मा को कबीर ने गूंगे का गुड़ बताकर जिस तरह से अभिव्यक्त किया है वह निम्न पद में देखा जा सकता है

        बाबा अगम अगोचर कैसा, ताते कहि सुझावौ ऐसा। 
        जो वीसै सो तो नाहीं, है सो कहा न जाई।। 
        सैना-बैना कहि समुझाओं, गूंगे का गुड़ मई। 
        दृष्टि न दीसै मुष्टि न आवै, विनसै नाहि नियारा ।।

वस्तुतः निर्गुण ब्रहा को निर्गुण संतों ने तार्कित बहस से परे व विभिन्न दार्शनिक वाद-विवादों से ऊपर माना है जो तर्क से अगम्य है, अनुभूति का विषय है और सहज भाव व प्रेम से प्राप्त किया जा सकता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण संतों के संबंध में लिखा है कि ‘ईश्वर पूजा की उन भिन्न भिन्न बाह्य विधियों पर से ध्यान हटाकर जिनके कारण धर्म में भेदभाव फैल हुआ था, ये शुद्ध ईश्वर प्रेम और सात्विक जीवन का प्रचार करना चाहते थे। MHD 23 Free Solved Assignment

भारतीय शास्त्रों में जिस दुर्लभ निर्गुण ब्रह्म का वर्णन मिलता है, निर्गुण संतों ने उसे ज्यों का त्यों नहीं स्वीकार किया है। अद्वैत वेदांत का वह ब्रह्म निर्गुण होने के कारण निर्मम और निष्ठुर है।

संतों का निर्गुण ब्रह्म उनसे परे चींटी और कुंजर की खबर रखता है। वह प्रेम की पीड़ा देता है और उसे हरता भी है। वह कण-कण में व्याप्त है। इसलिए सबका दुलारा है।

निर्गुण संतों ने उसे परम पुरुष, अलख, अनामी, राम, गोविंद, बितुला, अल्लाह, करीम, केशव, खुदा, रहीम आदि नाम दिया है, जिसकी प्राप्ति केवल प्रेम द्वारा ही संभव है।

रविदास ज्ञानमार्गी शाखा के निर्गुण कवि हैं। ये कबीर के समकालीन थे।

निर्गुण शाखा के होते हुए भी रविदास ने अपने वचनों में सगुण भक्ति के पौराणिक प्रसंगों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है-विशेष रूप से भगवान के कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख किया है। प्रहलाद चरित’ पर तो उन्होंने स्वयं कविता भी लिखी है। MHD 23 Free Solved Assignment

इसी तरह ईश्वर से प्रार्थना करते हुए वे ईश्वर के उन कार्यों का स्मरण करते हैं, जो ईश्वर के सगुण रूप को स्थापित करते हैं। उस सगुण ब्रह्म को उन्होंने इंद्रियातीत, सृष्टि का नियंता एवं स्वामी माना है उस प्रियतम के दर्शन घट के भीतर ही किए जा सकते हैं MHD 23 Free Solved Assignment

         बाहर खोजन का फिरह, घट भीतर ही खोज।
         'रविदास' उनमनि साधिकर, देखहु पिक कू ओजी ।।

रविदास ने स्पष्ट कहा कि ईश्वर हमारे अंदर उसे तीर्थ, मंदिर-मस्जिद, काबा, कैलास में टूटने की आवश्यकता नहीं। उस परम प्यारे को आंतरिक अभ्यास और सुमिरन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

रविदास की दृष्टि में सारी बहिर्मुखी साधनाएँ, कर्मकांड, धार्मिक वेश-भूषा सब छलावा और निरर्थक है। उन्होंने कबीर की तरह पंडितों को फटकार लगाते हुए कहा

                पांडे हरि विचि अंतर डादा। 
                मुंड मुड़ावै सेवा पूजा, भ्रम का बंधण गादा। 
                माला तिलक मनोहर बामो, लगो जम की पासी।
                जे हरि सेती जोड्या चाहो. तो जग सौ रहो उदासी।। 

उन्होंने स्पष्ट कहा कि माया-मोह प्राणी को बाँधता है। अतः यदि परमात्मा से सच्चा हित जोड़ना है तो सांसारिक विषय वासनाओं से ध्यान हटाकर रूहानी मंडलों में ध्यान को लगाना होगा।

उन्होंने साधक के आंतरिक केंदों को क्रमशः पार करने की विधि बताते हुए परमात्मा से साक्षात्कार कर भवसागर से पार होने की बात कही है MHD 23 Free Solved Assignment

         ऐसा ध्यान धरौ बनवारी मन पवन दृद सुषमन नारी। 
         से जप जपूँ जो बहुरि न जपना । 
         सो तप त' जो बहुरि म तपना। सुन्न में बास. ताते मैं रहूँ। 
         कह रैदास निरंजन ध्याऊँ, जिस पर जाय बहुरि नहि आऊँ।।

रविदास ने जीव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना। उन्होंने उसे माटी का पुतला माना है। इस जीव की सार्थकता इसी में है कि वह राम-नाम की शरण में जाकर उसका आश्रय ले। उन्होंने संसार के शाश्वत सत्य को बहुत सरलता एवं सहजता से स्पष्ट किया है

         ऊँचे मंदिर थाल रसोई. एक धरी पुनि रहति न होई। 
         यह तन ऐसा जैसे घास की टाटी, जल गई घास, रलि गई माटी।

जगत की इस अवस्था को देखकर रविदास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाई-बंधु, पति-पत्नी जीते जी जो इस शरीर से प्यार करते हैं वो ही सबसे पहले उसे घर से निकालने को उग्र होते हैं।

अतः इस संसार सागर से केवल राम नाम ही छुटकारा दिला सकता है और कोई नहीं। उन्होंने अपनी साधना में सिद्धों-नाथों तथा कबीर आदि निर्गुण संतों द्वारा अपनाई गई पारिभाषित शब्दावली का उपयोग अपने काव्य में किया है। MHD 23 Free Solved Assignment

उनके यहाँ सुरति-निरति, सहज, सुन्न, गगन मंडल, गंगा-जमुना, सुषमना, सुरसरि धार, जोति उल्टा कुआँ, अनाहत नाद आदि निर्गुणवादी शब्द बार-बार आए हैं, जो उनकी साधना पद्धति के विशेष अंग रहे हैं।

उन्होंने इन शब्दों का प्रयोग कर आंतरिक अनुभवों से उन्हें नया अर्थ भी दिया है। उन्होंने अपनी वाणियों में बार-बार मन को स्थिर करते हुए उसे माया से दूर रहने की सलाह दी है।

रविदास ने सदैव ईश्वर की कृतज्ञता को अनुभव किया । भगवत कृपा से ही वे हीनता की ग्रंथि से उबर सके हैं। उन्होंने अपने को निम्न बताते हुए प्रभु के उपकार का बहुत ही विनयपूर्ण एवं प्रेमभाव से वर्णन किया है

         तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगी तुमारे बासा। 
         नीच रूख ते ऊँच भए है गंध सुगंध निवासा।।
          माधव सतसंगति सरनि तुम्हारी। हम अनुगन तुम्ह उपकारी।

इस तरह उन्होंने अपने आपको भगवान के सामने पूरी तरह समर्पित कर दिया तथा कथित नीची जाति में जन्म लेकर भी अपने उच्चतम संस्कारों के कारण अपने युग के महामानव बन गए।

रविदास कबीर की भाँति उग्र रूप में सगुण का खंडन नहीं करते। वे अपने मत को प्रतिष्ठित करते हैं लेकिन मूर्ति पूजा अवतारवाद और अन्य पौराणिक गतिविधियों की कठोर निंदा करते हैं।

निर्गुण भक्ति धारा के कवि सगुण मत की इन मान्यताओं का विरोध करते हैं। सगुण भक्त मानते हैं कि वेद प्रमाण है और ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अर्थात् समाज में सभी मनुष्य समान नहीं है।

इस तरह वर्णाश्रम श्रेष्ठ है। रविदास ने भी इन मान्यताओं का खंडन किया । वे कहते हैं कि वेद प्रमाण नहीं है, वरन् अनुभव प्रमाण है, जिसे कबीर ने ‘आँखिन देखी’ कहा है।

इसी तरह वे मानते हैं कि कोई मनुष्य श्रेष्ठ या अधम नहीं है। वे मानते हैं कि ऊँच-नीच की भावना का समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. सभी मनुष्य ईश्वर की संतान है. इसलिए सभी मनुष्य समान हैं।

अर्थात् वर्णाश्रम कर्म सही नहीं है। इसके स्थान पर रविदास ‘बेगमपुरा की धारणा सामने रखते हैं, जहाँ मनुष्य को दैहिक, भौतिक और दैविक किसी प्रकार का ताप सहन करना नहीं पड़ता।

डॉ. धर्मपाल मैनी लिखते हैं कि रैदास ने बारंबार अपनी जाति की घोषणा करके अपने युग के धर्म के ठेकेदारों को यह समझा दिया था कि मात्र जन्म से कोई भी व्यक्ति उच्च या नीच नहीं हो सकता।

उनका यह स्वर सत्य की अनुभूति पर आधारित होने के कारण ब्राह्मणों के अंतर्मन में घर कर गया था। इसलिए उन्हें रैदास की वाणी को विवश होकर सुनना पड़ा।

          जन्म जात मत पूछिए, का जात अरु पात 
          रविदास पूत सभ प्रभ के, कोई नहीं जान कुजाव।। 
          जात-पात के फेर मंहि. उरझि रहद सभ लो। 
          मानुषता कू खात हइ 'रविदास जात कर रोग...

इस तथ्य को रविदास ने कहा है कि सब लोग उसी एक ही परमात्मा की ज्योति से उपजे हैं, चाहे वह ब्राह्मण हो या शूद, मुल्ला हो या शेख । MHD 23 Free Solved Assignment

मनुष्य को उनका कार्य ही ऊँचा या नीया बनाता जिनसी निर्गुण कालीन समय में हिंदू मुस्लिम का झगड़ा भी जोरों पर था उस झगड़े को खत्म करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा

        मंदिर मस्जिद दोउ एक है. इन मँह अंतर नांहि।
        रैदास राम रहमान का, झगड़उ कोई नांहि।। 

इसलिए उस राम-रहमान को रविदास दिल की अनंत गहराइयों में खोजने का उपदेश देते हुए कहते हैं

        तुरुक मसीति अल्लाह ढूँढइ, देहरे हिंदू राम मुसांई।
        रविदास दूंदिया राम-रहीम कं, जंह मसीत देहरा नाही।।

कबीर की तरह रविदास को समाज में जहाँ कहीं भी आडंबर व पाखंड दिखे उन्होंने जमकर प्रहार किया तथा तीर्थाटन, मूर्तिपूजा, व्रत-उपवास, वेश धारणा करना आदि सबकी निंदा की।

लेकिन उनका स्वर अत्यधिक आक्रामक ज होकर प्रबोधात्मक होता था ।बाह्याडंबरों और मानवीय दुर्गुणों को वे विनय और सहज भाव से प्रकट करते या रविदास ने चाहचायार के साथ सामाजिक बुराइयों माँस-मंदिरा के सेवन को भी बुरा बताया तथा आचरण की पवित्रता पर बल दिया एवं प्रेम-नहारस पीने की सलाह दी और शूरवीर, छत्रपति, राजा से भी बड़ा भगवान के भगत को बताया

         पंडित सूर छत्रपति राजा, भगत बराबरि अउरू न कोई
         जैसे पुरैन पात रहे जल समीप भनि रविदास जन में जगि ओई॥ 

निम्नलिखित प्रत्येक विषय पर लगभग 150 शब्दों में टिप्पणी लिखिए :

(i) चंदायन’ में परिवार और रीति रिवाज़

उत्तर- ‘चंदायन’ में मध्यकालीन परिवार में सास, ननद और बहू के रिश्ते की झलक देखने को मिलती है। सास बहू को हमेशा सीख देती थी। परिवार में बहू की कठिनाई को सास दूर करती थी।

बावन चाँदा से दूर है तो उस समय सास ही उसे समझाने जाती है। मैना की सास खोलिन भी अपनी बहू को समझाती है। सास का काम घर में लगी आग को पानी देने का था।

ननद, सास और बहू के बीच सूत्रधार का काम करती थी। चाँदा अपने मन की बात सास और ननद को बताती है पर उल्टे उसे ही ताना मिलता है।

परिवार में नवविवाहिता वधू का किसी प्रकार के अत्याचार के खिलाफ बोलना सम्मान के योग्य नहीं माना जाता था। चाँदा अपने ससुराल से रूठ कर नैहर चली आती है। नारी के सामने तीन ही विकल्प थे ससुराल, नैहर अथवा वैश्यालय । MHD 23 Free Solved Assignment

लड़की अपने मन की बात से परिवार में किसी की सहानुभूति नहीं प्राप्त कर सकती थी। उसे अपनी सहेलियों का सहारा होता था। परिवार में सौत के बीच भयकर लड़ाई होती थी।

जब लोरिक को मैना की खबर मिलती है तो वह गोवर लौटने की तैयार करने लगता है, तब उस समय चाँदा का मुंह लटक जाता है जिसका वर्णन निम्न पद में देखा जा सकता है

          मैना बात जो सिरजन कही। सुनत चाँवा राहु जनु गही।। 
          पूने जइस मुख दीपत अहा । गयी सो जोति खीन होइ रहा।।

किसी पुरुष का परस्त्री से संबंध बनते ही वह समाज में चर्चा का विषय हो जाता था। कितना भी छिपाने का प्रयल हो लेकिन घर से बात बाहर निकल ही जाती थी।

फिर प्रेमिका और पली के बीच कैसा द्वंद्व छिड़ता है इसका उदाहरण ‘चंदायन’ में मैना और चाँदा के विवाद के प्रसंग में अनुभूत किया जा सकता है।

मैना और चाँदा की लड़ाई में एकदम ग्रामीण जीवन की अनगढ़ता को दाऊद ने उसी रूप में रख दिया है। यहाँ मर्यादा, संयम और अनुशासन नहीं है।

गाली गलौज वाले प्रसंग में गाँव के सामान्य नारी के लड़ाई के दृश्य को ज्यों का त्यों रख दिया गया है। दोनों अपने गरूर को बखानती है।MHD 23 Free Solved Assignment

मैना को अपने पति के पराक्रम का अभिमान है और चाँदा को अपने सामंती वैभव की शान का अभिमान है। चाँदा अपनी शान का वर्णन निम्नानुसार करती है

            गाय चरावइ करै दुहावा । सिंह से तै यहें अगरग लावा। 
            जिंह धौराहर मोर बासेरा। सीस टूटि जे ऊपर हेरा।।

भारतीय जीवन में रीति-रिवाज का भी विशेष नहत्त्व रहा है। सूफियों ने रीति-रिवाज को भी नजरअंदाज नहीं किया । ऋतु के साथ पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं।

उसकी एक-एक विशेषता को दाऊद ने रेखांकित किया है। कार्तिक में दीवाली के त्योहार का उल्लेख है। मकर संक्रांति के पर्व से दिन बड़ा होने की बात की गई है। फागुन में होरी के हुड़दंग का वर्णन है ।

किस ऋतु में क्या भोजन होता था, किस तरह से त्योहार के उल्लास लोगों के मन में उमंग भर देते थे, उससे कैसे शृंगार और सौंदर्य का रूप बदलता था इन सबका वर्णन ‘चंदायन’ में किया गया है। जैसा कि निम्न पंक्ति में देखा जा सकता MHD 23 Free Solved Assignment

            मुंख तँ बोल चख काजर पूरहि। अंग माँग सिर चीर सिंदूरहि।।
           नाचहि फागु होइ मनकारा। तिह रस भई नई सय सारा ।।

इस प्रकार हमें ‘चंदायन’ में लोक जीवन के व्यापक दर्शन होते हैं।

(ii) मध्ययुगीन काव्य परंपरा में रसखान

उत्तर- काल की दृष्टि से रसखान विक्रम की सत्रहवीं शती के कवि थे जो कि निश्चित ही भक्तिकाव्य धारा के अवसान व रीतिकाव्य धारा के उदय का काल था। हिंदी साहित्य का भक्तिकाल साहित्य रचना और कलात्मक अभिव्यक्ति की दृष्टि से स्वर्ण युग माना जाता है।

कृष्ण काव्य परंपरा का प्रसार आदिकालीन अपभ्रंश काव्य से लेकर रीतिकाल तक है। रसखान की गणना कृष्ण भक्ति शाखा के अंतर्गत की जाती है किंतु इन्होंने स्वच्छंद प्रकृति से ही काव्य रचना की ।

घनानंद ठाकर, आलम, बोधा आदि स्वच्छंद काव्य धारा के कवियों की प्रवृत्तियाँ रसखान के काव्य में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। MHD 23 Free Solved Assignment

उन्होंने रण भक्त कवियों की तरह गीत रचना की प्रणाली को बहुत कम महत्त्व दिया तथा अपने हृदय के भावों को सवैया तथा दोहों में व्यक्त किया। उन्होंने अपनी काव्य प्रवृत्ति का एक ऐसा मार्ग बनाया जो स्वयं निर्मित था।

रसखान, बिहारी तथा घनानंद ब्रजभाषा के तीन ही कवि ऐसे हैं जिनकी कविता परिमार्जित तथा सुव्यवस्थित है। यह जानकर आश्चर्य किया जा सकता है कि इनमें ब्रजभाषा के कवि सूरदास जी का नाम नहीं आया, किंतु ध्यान देने की बात है कि सूरदास जी ने जितनी शक्ति भाव-द्योतन की ओर लगाई है,

उतनी काव्य सौष्ठव की ओर नहीं लगाई। निस्संदेह अंतर्वृत्तियों को पहचानने की जो सूक्ष्म दृष्टि सूरदास जी के पास थी,

वह किसी को नहीं प्राप्त हो सकी किंतु यहाँ भाव-पक्ष का विचार न होकर भाषा-पक्ष का विचार हो रहा है और यह सुगमतापूर्वक देखा जा सकता है कि उनकी भाषा में जितना सौंदर्य है उससे कहीं अधिक सौंदर्य उनके बाद के इन कवियों की भाषा में है।

ब्रजभाषा के अंतिम महाकवि जगन्नाथदास ‘रलाकर’ ने एक स्थान पर कहा है कि यदि ब्रजभाषा का व्याकरण बनाना हो तो रसखान, बिहारी और घनानंद का अध्ययन करना चाहिए।

इन तीनों महाकवियों की भाषा-विशेषता भी पृथक-पृथक है। बिहारी की भाषा परमार्जित एवं साहित्यिक है। घनानंद में लाक्षणिक प्रयोग ही अधिक हैं। MHD 23 Free Solved Assignment

इन दोनों कवियों ने भाषा को कुछ सँवारने का प्रयास किया है, किंतु रसखान ने ठीक उसका स्वाभाविक रूप लिया है और इसी कारण वे ब्रजभाषा के तीन प्रमुख कवियों में स्थान पा सके।

(iii) सूरदास के काव्य में वात्सल्य

त्तर- सूरदास का काव्य प्रारंभिक स्तर पर अधिकांशतः उपास्य की बाल सुलभ चेष्टाओं का मौलिक काव्यात्मक उदाहरण कहा जा सकता है। वात्सल्य के अंतर्गत दो काव्य रूप हमारे सामने हैं

(1) संयोग वात्सल्य-संयोग वात्सल्य के अंतर्गत कृष्ण के जन्म से लेकर बाल्यकाल की संपूर्ण चेष्टाएँ अत्यंत काव्यात्मक एवं मौलिक रूप से सूरदास की कविता में समाविष्ट है।

कृष्ण जन्म, गोकुल प्रवेश, जन्मोत्सव से होते हुए संपूर्ण बाल्यकाल, कृष्ण का बाल रूप में वर्णन, बाल-चेष्टाएँ, पारंपरिक बाल केलियाँ, माँ एवं शिशु का मनोवैज्ञानिक संबंध, शिशु की उत्तरोत्तर बढ़ती चेष्टाएँ, बाल-लीला, माखन चोरी एवं शिशुत्व का अद्भुत समागम, सूर के काव्य को स्वयं में एक प्रतिमान बना देते हैं।

सूरदास का वात्सल्य वर्णन इसलिए मूल्यवान है कि वहाँ रूपवर्णन ही नहीं बल्कि बाल मनोविज्ञान की गहरी परख भी मौजूद है। MHD 23 Free Solved Assignment

कान्हा की बाल चेष्टाओं का सहज वर्णन सूरदास की कविता में प्राणतत्व भर देता है। यशोदा कान्हा को पालने में झुला रही हैं और उनको हिला-हिला कर दुलराती हुई कुछ गुनगुनाती भी जा रही हैं जिससे कि कृष्ण सो जाएँ

            जसोदा हरि पालने झुलावै
            हलरावै, दुलराई मल्हावै, जोई-सोई कछु गावै 
           मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै न आनि सुवावै
           तू काहँ नहिं बेगहीं आवै, तोको कान्ह बुलावें । 

माँ की लोरी सुनकर कृष्ण अपनी कभी पलक बंद कर लेते हैं, कभी होंठ फड़काते हैं। उन्हें सोता जान यशोदा भी गुनगुनाना बंद कर देती हैं और नंद जी को इशारे से बताती हैं कि कान्हा सो गए हैं।

इस अंतराल में कृष्ण अकुला कर फिर जाग पड़ते हैं, तो यशोदा फिर लोरी गाने लगती है

              कबहूँ पलक हरि मूंद लेत है, कबहूँ अधर फरकावै । 
              सोक्त जानि मौन ह्वै रहि रहि, करि करि सैन बतावे।
              इहि अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुर गावें । 

इस पद में सूर ने अपने अबोध शिशु को सुलाती माता का बड़ा ही सहज. सुंदर और मार्मिक चित्रण किया है। माँ के मन की लालसा व सपनों को भी सूर ने बड़े जीवंत ढंग से अपने पदों में उतारा है।

बड़े होते शिशु की दुनिया माँ के लिए अनमोल है। सूर ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इसे देखा और कविता की भव्य दुनिया माँ के लिए अनमोल है। सूर ने अपनी सक्ष्म दलित

             जसुमति मन अभिलाष करै। 
             कब मेरो लाल घुटुरुवनि रँगे, कब धरनी पग द्वेक धरै।
             कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोते मुख वचन झरें।
             कब नंदहि बागा कहि बोले, कब जननी कहिं मोहिं ररै। 

कान्हा चाहते हैं उनकी चोटी बलराम भैया जितनी लंबी और मोटी हो जाए। माँ यशोदा को उन्हें दूध पिलाने का अच्छा मौका मिल जाता है और वे कहती हैं MHD 23 Free Solved Assignment

यदि तुम दूध पी लोगे तो तुम्हारी चोटी बलराम जितनी लंबी और मोटी जो जाएगी । बालकृष्ण दो-तीन बार तो माँ की बातों में आ जाते हैं फिर माँ को उलाहने देतें हैं कि तू मुझे बहाने बना कर दूध पिलाती रही देख मेरी चोटी तो वैसी है

            मैया का बदेगी चोटी। 
            किती बेर मोहि दूध पियत भई यह अजहूँ छोटी।
            तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, है लांबी मोटी।। 
            कादत-गुहत न्हवावत जैहैं नागिनी-सी भुई लोटी। 
            काचो दूध पियावत पचि-पचि, देति ना माखन रोटी।
            सूरज चिरजीवी दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी। 

सूरदास के वात्सल्य रस की खासियत यह है कि माँ का भी मनोविज्ञान उनसे अछूता नहीं रहा । वह माँ जो स्वयं लाख डाँट ले पर दूसरों द्वारा की गई अपने बालक की शिकायत या डाँट वह सह नहीं सकती।

यही हाल सूर की जसुमति मैया का है। जब कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया जाता है, तो उनके अनिष्ट की आशंका से उनका मन कातर हो उठता है। माता को पश्चाताप है कि जब कृष्ण ब्रज छोड़ मथुरा जा रहे थे तब ही उनका हृदृय फट क्यों न गया

         छाँडि सनेह चले मथुरा कत दौरि न चीर गह्यो।
         फटि गई न बज की धरती, कत यह सूल सह्यो। 

इस पर नंद का दुःख यशोदा को याद दिलाने में गुरेज नहीं करता कि तू बात-बात पर कान्हा की पिटाई कर देती थी सो रूठ कर दो MHD 23 Free Solved Assignment

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