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MHD 2

आधुनिक हिंदी काव्य

MHD 2 Free Solved Assignment

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MHD 2 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. भारतेंदु की राजभक्ति और देशभक्ति की कविताओं की तुलना करते हुए सिद्ध कीजिए कि उनकी कविता का मूल स्वर देशभक्ति है।

उत्तर साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। युग-विशेष का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण साहित्य के निर्माण को स्वरूप प्रदान करता है।

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मुगल शासन वैभव, विलासिता और भोगवाद की दृष्टि से अपने चरमोत्कर्ष पर था। केन्द्रीय शासन की तरह ही हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेश अवध राजस्थान, बुन्देलखण्ड आदि भी विलासिता में डूबे हुए थे।

काळा राजाओं, उनके सामन्तों तथा दरबार तक सीमित था। कवि जनता की भावनाओं और स्थितियों का प्रतिनिधित्व न कर केवल आश्रयदाता का अनुरंजन करने, उनकी चाटुकारिता करते हुए काव्य-रचना करते रहे। अत: रीतिकाल का काव्य जनता से कटा हुआ था।

1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कुचले जाने के बाद ब्रिटिश शासकों के अमानुषिक अत्याचारों और आतंक के परिणामस्वरूप जनता में निराशा, हताशा, अकर्मण्यता, भय का वातावरण व्याप्त था।

एक ओर ईसाई मिशनरी ईसाई धर्म के प्रचार में संलग्न थे तथा दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर महारानी विक्टोरिया के भारत साम्राज्ञी बनने के उपरान्त भी ब्रिटिश उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी शासक भारत का आर्थिक शोषण कर रहे थे। MHD 2 Free Solved Assignment

भारत की धन-सम्पदा ब्रिटेन को मालामाल कर रही थी और भारत निर्धन, दीन, दरिद्र, भूखा-नंगा होता जा रहा था। यह स्थिति बहुत दिन तक छिपी नहीं रह सकती थी।

अतः भारतेन्दु युग के लगभग सभी कवियों ने जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक भी थे, तथा जो जनता को वास्तविकता से परिचित कराना, उनमें नई चेतना जगाना, उनकी आँखें खोलना अपना कर्तव्य मानते थे,

जागरण का शंख फूंका और अपनी रचनाओं निबन्धों, लेखों, नाटकों तथा कविताओं के द्वारा नई चेतना का संचार किया।

भारतेन्दु मंडल के सदस्यों बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, अम्बिकादत्त व्यास, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण गोस्वामी, बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमधन’ सभी की अपनी-अपनी पत्रिकाएं थीं और उन्होंने उनके माध्यम से नवजागरण, समाज-सुधार, राजनैतिक चेतना का पांचजन्य बजाकर तथा धार्मिक अंधविश्वासों, पाखंडों, छुआछूत, ऊँच-नीच की भावना का विरोध कर जनसामान्य में नई जागरूकता उत्पन्न करने का श्लाघनीय कार्य किया और सोई हुई या अर्ध-सुप्त जनता ने अंगड़ाई ली।

पारस्परिक मेल-मिलाप, सौहार्द, देशभक्ति, स्वतंत्रता की भावना का महत्त्व बताकर देशवासियों को सही मार्ग दिखाने का कार्य किया।

कतिपय आलोचकों ने भारतेन्दु युग की कविता में विसंवादी स्वरों की ओर संकेत कर इन कवियों की आलोचना की है।

उन्हें अजीब लगता है कि भारतेन्दु तथा उनके सहयोगी कवियों ने महारानी विक्टोरिया, ब्रिटिश शासनाध्यक्षों लॉर्ड लारेंस, लॉर्ड मेयो, लॉर्ड रिपन के संबध में लेख और कविताएं लिखकर उनकी प्रशंसा की है, अपनी श्रद्धांजलि प्रकट की है।

भारतेन्दु महारानी विक्टोरिया के पुत्रों ड्यू ऑफ एडिनबरा तथा प्रिंस ऑफ वेल्स के प्रति आभार एवं शुभकामनाएं प्रकट करते हैं। उनकी रचनाओं में चाटुकारिता की गंध आती है,

जाके दरस-हित सदा नैन परत पियास
सो मुख-चंद विलोकिहैं पूरी सब मन आस।

इन कवियों ने रानी विक्टोरिया को ‘अर्थ की विक्टोरिया’ तक कहा डाला है, जो रीतिकालीन कवियों की राज-स्तुति से कम नहीं है। MHD 2 Free Solved Assignment

इन कवियों की राजभक्तिपरक तथा ब्रिटिश शासन के प्रति आभार प्रकट करने वाली उक्तियों को ठीक से समझने के लिए महारानी विक्टोरिया के भारत की साम्राज्ञी बनने से पूर्व और उसके बाद की परिस्थितियों को समझना आवश्यक है।

महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में भारत के किसान और सामान्यजन नवाबों, राजाओं, सामंतों, जमींदारों, ताल्लुकदारों के आतंक तथा शोषण से मुक्त हुए, मुसलमानों की धर्म-परिवर्तन की नीति के कारण होने वाली सामाजिक पीड़ा से उन्हें छुटकारा मिला।

रेल, तार, बिजली, मुद्रणयंत्र तथा जीवन की अन्य सुख-सुविधाओं को पहली बार देखकर वे आश्चर्य विमुग्ध हो उठे।

ज्ञान-विज्ञान, नई तकनीक, नया स्वच्छ प्रशासन, धर्म के नाम पर पक्षपात से मुक्ति ने भारतीयों के मानस को लुभा लिया। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए

महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में भारत की किसान आर सामान्यजन नवाबा, राजाओ , सामता, जमादारा, ताल्लुकदारा के आतंक तथा शोषण से मुक्त हुए, मुसलमानों की धर्म-परिवर्तन की नीति के कारण होने वाली सामाजिक पीड़ा से उन्हें छुटकारा मिला।

रेल, तार, बिजली, मुद्रणयंत्र तथा जीवन की अन्य सुख-सुविधाओं को पहली बार देखकर वे आश्चर्य विमुग्ध हो उठे।

ज्ञान-विज्ञान, नई तकनीक, नया स्वच्छ प्रशासन, धर्म के नाम पर पक्षपात से मुक्ति ने भारतीयों के मानस को लुभा लिया। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए पंजाब टेनेन्सी एक्ट और अवध टेनेन्सी एक्ट जैसे कानून बनाए गए। उन्हें लगा कि ब्रिटिश शासन उनके लिये वरदान है।

अंग्रेज राज सुख साज सबै सब भारी| इसीलिए भारतेन्दु ने ब्रिटिश शासनाध्यक्षों की स्तुति के गीत गाये। ‘ रिपनाष्टक’ में लॉर्ड रिपन की प्रशंसा करते हुए वह लिखते हैं,

जय-जय रिपन उदार जयति भारत-हितकारी।
जयति सत्य-पथ-पथिक जयति जन-शोक विदारी।

राजभक्त परिवार के सदस्य होते हुए भी उनकी कविता मात्र चाटुकारिता नहीं है, शासकों का स्तुति-गान नहीं है, उसमें अपनी परंप पर गर्व भी है। राष्ट्रीय अस्मिता को पाने की ललक भी है, प्रगति के नए मार्ग पर देशवासियों को ले जाने की आकांक्षा भी है, MHD 2 Free Solved Assignment

पराधीनता विशेषतः आर्थिक शोषण से मुक्ति पाने का आग्रह भी है। हाँ, उनकी राजभक्ति के पीछे उनका यह भोला विश्वास है कि ब्रिटिश शासन की नीयत ठीक है।

उनके दिए गए आश्वासन सच्चे हैं और वे अपने वचन का निर्वाह करेंगे। उनका यह भोला विश्वास यदि गलत सिद्ध हुआ तो उससे उनकी देशभक्ति या भारतवासियों के हित की भावना पर सन्देह करना अनुचित ही होगा।

समय के साथ-साथ जब ब्रिटिश उपनिवेशवादी-साम्राज्यवाद की पोल खुलती गई, असलियत का, उनकी बदनीयती का पर्दाफाश होता गया, सुधारवादी नीति की कलई उतरने लगी और भारतेन्दु युग के साहित्यकारों की समझ में आने लगा कि ब्रिटिश शासकों ने जो कुछ सुधार के नाम पर किया है

रेल-तार, बिजली की सुविधाएं प्रदान की हैं, उनके पीछे भारत की जनता का हित नहीं, अपितु अपने साम्राज्यवादी कदमों को मजबूत करना है।

भारतेन्दु के इस मोहभंग का, समझ का, असलियत को पहचानने का पता सर्वप्रथम उनकी 1881 में लिखी गई कविता ‘विजय दरबारी’ तथा 1884 में लिखी गई ‘विजयनी विजय वैजयंती’ में मिलता है।

इन कविताओं में अफगान विजय और मिस्र पर ब्रिटिश विजय का स्तुतिगान तो है, पर साथ ही भारतवासियों के कष्टों, दु:खों, दैन्य, दारिद्रय का वर्णन तो विस्तार से है पर कहीं भी महारानी तक इन दु:खों को पहुंचाने का आह्वान नहीं है, क्योंकि वह समझ गए थे कि अंधे के आगे रोने से कोई लाभ नहीं है।

इन कविताओं में प्रधान स्वर राजभक्ति का नहीं; राजभक्ति को औजार बनाकर अंग्रेजों के शोषण और अत्याचारों को उजागर करना है और अप्रत्यक्ष रूप से भारतवासियों को चेताना तथा उन्हें वास्तविकता से परिचित कर उन्हें उद्बोधन देना है, देशभक्ति के मार्ग पर चलने के लिए ललकारना है।

ये दोनों कविताएं मोहभंग | की कविताएं हैं। उनकी अन्य कविताओं में भी विदेशी शासन की हृदयहीनता और शोषण-नीति पर क्षोभ प्रकट किया गया है, MHD 2 Free Solved Assignment

पै धन विदेश चलि जात यहै अति ख्वारी
अथवा
रोवहु जब मिलि आवहु भारत भाई
हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई

भारतेन्दु की बदली हुई दृष्टि और नई सोच का पता उनकी नए जमाने की मुकरियों में भी दिखाई देता है,

भीतर भीतर सब रस चूसै
हंसि हंसि में तन मन धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज
क्यों सखि साजन, नहीं अंग्रेज।

यहां वह अंग्रजों की धर्तता और कटिलता पर प्रहार करते हैं और बताते हैं कि अंग्रेज अब लड़ाई-झगड़े से नहीं. हंस कर चालबाजियां करके, कूटनीति अपनाकर भारत को लूटने-खसोटने में लगे हैं।

उनके दो ही लक्ष्य हैं साम्राज्य विस्तार करके भारत को अपना गुलाम बनाना तथा देश का आर्थिक शोषण करना, यहां का कच्च माल ढोकर अपने देश में ले जाना और उस माल से बनी वस्तुओं को सौगुने दाम पर बेचकर अपना कोष भरना, मालामाल हो जाना।

नवजागरण और राष्ट्रीय चेतना जगाने का एक अंग है अपने देश, अपनी मातृभूमि की वन्दना करना, अपनी गौरवपूर्ण संस्कृति स्मरण दिलाकर देशवासियों के हृदय से हीनता को ग्रथि समाप्त करना, पूर्वजों का गौरवगान कर उनके आत्मविश्वास को सुदृढ़ करना, वर्तमान दुर्दशा के कारणों की जानकारी देकर उनको दूर करने के उपाय बताना।

सारांश यह है कि भारतेन्दु ने अपने भोले विश्वास के कारण ब्रिटिश शासन के वचनों, वायदों और आश्वासनों पर विश्वास करके राजभक्ति की कविताएं लिखीं, पर कुछ समय बाद मोह भंग होने पर, असलियत पहचान जाने पर उनकी राजनीतिक समझ में बदलाव आया और उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसकी कूटनीति को नंगा कर देशवासियों में नई चेतना जगाने का प्रयास किया।

भारतेन्दु ने अपने जीवन के आरंभ में जगन्नाथपुरी तथा बंगाल की यात्रा की थी और इस यात्रा के दौरान वह बंगाल के इन मनस्वियों के विचारों से प्रभावित हुए थे। MHD 2 Free Solved Assignment

उन्होंने इनके प्रगतिशील विचारों से पहचान प्रकट की। खुलेपन से उन्हें स्वीकार किया और उन्हीं के कारण हिन्दी भाषी प्रदेश में नवजागरण की ज्योति प्रदीप्त हुई और उसका प्रकाश धीरे-धीरे सर्वत्र फैला।

उधर आर्यसमाज के विचारों तथा धार्मिक एवं सामाजिक सुधार सम्बन्धी आन्दोलन से भी नवजागरण की इस धारा को बल मिला।

भारतेन्दु और उनके सहयोगियों के पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेख, उनकी स्वतंत्र कविताएं तथा उनके नाटकों के लिए लिखी गई कविताओं से उनके क्रान्तिकारी, सुधारवादी विचारों की अभिव्यक्ति हुई है।

जिस स्वदेशी आन्दोलन का प्रारंभ गांधीजी से माना जाता है, वस्तुतः उसका प्रारंभ भारतेन्दु और उनके सहयोगियों की काव्य-रचनाओं में ही हो गया था।

भारतेन्दु की कविता ‘प्रबोधिनी’ प्रेमधन की रचना ‘भार्याचिनन्दन’ तथा प्रतापनारायण मिश्र की कविता ‘होली’ इसका प्रमाण है।

भारतेन्दु की नई चेतना एवं प्रगतिशील दृष्टि का संकेत इन बातों से भी मिलता है कि वह अंग्रेजी की शिक्षा, अंग्रेजी के प्रगतिशील विचारों वाली पुस्तकों के अध्ययन-अनुशीलन पर बल देते हैं और साथ ही अपने देश की भाषाओं के महत्त्व को भी स्वीकार करते हैं

वह चाहते थे कि भारतवासी अंग्रेजी भाषा सीखकर विश्व के ज्ञान-विज्ञान से परिचित हों।

लखहुं न अंगरेजन करी उन्नति भाषा माहिं।
सब विद्या के ग्रन्थ अंगरेजिन माँह लखहिं।

भारतेन्दु अच्छी तरह समझ गए थे कि भारत की दुर्दशा के तीन कारण हैं :

(1) साम्राज्यवादी-शोषक ब्रिटिश शासन,

(2) जनता की रूढ़िवादिता, धार्मिक अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियाँ,

(3) देशवासियों का अज्ञान, अशिक्षा, झूठी शान-शौकत, आलस्य, अकर्मण्यता, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, कायरता। MHD 2 Free Solved Assignment

उन्होंने अपनी कविताओं द्वारा वास्तविकता को उजागर कर नई चेतना फूंकने का प्रयास किया है।

इस प्रकार उन्होंने जनहित में एक व्यापक आन्दोलन चलाया और सामान्य जन तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए नाटकों, पहेली-मुकरियों, लोक गीतों कजली, विरहा, चांचर, चैनी, खेमटा, विदेशिया आदि की शैली का प्रयोग किया।

उनका साहित्य का सन्देश देता है। अतः उन्हें नवजागरण का अग्रदूत कहना उचित ही है।

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प्रश्न 2. छायावादी कविता में जयशंकर प्रसाद के महत्व को रेखांकित कीजिए।

उत्तर जयशंकर प्रसाद हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।

उन्होंने हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कम माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और ‘कामायन।

तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नई कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी।

इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा खड़ी बोली बन गयी।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे, जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं।

कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं।

जयशंकर प्रसाद ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई।

वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं अपितु छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के लिखनेवाले श्रेष्ठ कवि भी बने। काव्यक्षेत्र में प्रसाद की कीर्ति का मूलाधार ‘कामायनी’ है। MHD 2 Free Solved Assignment

खड़ी बोली का यह अद्वितीय महाकाव्य मनु और श्रद्धा को आधार बनाकर रचित मानवता को विजयिनी बनाने का संदेश देता है। यह रूपक कथाकाव्य भी है, जिसमें मन, श्रद्धा और इड़ा (बुद्धि) के योग से अखंड आनंद की उपलब्धि का रूपक प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर संयोजित किया गया है।

उनकी यह कृति छायावाद ओर खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण है। शिल्पविधि, भाषासौष्ठव एवं भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से इसकी तुलना खड़ी बोली के किसी भी काव्य से नहीं की जा सकती है।

जयशंकर प्रसाद ने अपने दौर के पारसी रंगमंच की परंपरा को अस्वीकारते हुए भारत के गौरवमय अतीत के अनमोल चरित्रों को सामने लाते हुए अविस्मरनीय नाटकों की रचना की।

उनके नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त आदि में स्वर्णिम अतीत को सामने रखकर मानों एक सोये हुए देश को जागने की प्रेरणा दी जा रही थी।

उनके नाटकों में देशप्रेम का स्वर अत्यंत दर्शनीय है और इन नाटकों में कई अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध गीत मिलते हैं। ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’, ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ जैसे उनके नाटकों के गीत सुप्रसिद्ध रहे हैं।

‘कामायनी’ का कथानक पौराणिक, वैदिक आख्यान पर आधारित है, परन्तु उसमें कवि के निजी भावबोध ने, नारी के प्रति दृार ने, मानवजाति की कल्याण-कामना ने, विश्व का मंगल किस पथ पर चल कर हो सकता है व नए प्रकार की सौन्दर्य चेतना ने उसे आधुनिक जीवन बोध का महाकाव्य बना दिया है।

आइये, अब उन तत्त्वों की पहचान करें जिनके कारण ‘कामायनी’ आधुनिक बोध और नई संवेदना की कालजयी कृति बन गई है।

सर्वप्रथम हमारी दृष्टि ‘कामायनी’ के कथानक पर जाती है, तो स्पष्ट हो जाता है कि वह परम्परागत संस्कृत तथा हिन्दी के महाकाव्यों से भिन्न रचना है।

उसका कथानक लम्बा-चौड़ा नहीं है, नायक धीरोदात्त न होकर अनेक दुर्बलताओं का पुंज सामान्य पुरुष है, उसमें कोई कथा नहीं कही गई है, वह मानवता के विकास का रूपक है, मानव मन की विभिन्न वृत्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने वाली कृति है। MHD 2 Free Solved Assignment

दूसरी नवीनता यह है कि ‘कामायनी’ में पात्र मनु, श्रद्धा, लज्जा, मानव, आकृति-मिलान आदि मनुष्य न होकर मानव मन की वृत्तियां हैं।

सर्गों के नाम तथा उनका क्रम मानव की जीवन-यात्रा का मनोवैज्ञानिक इतिहास प्रस्तुत करता है। देवसृष्टि के अतियोगवाद का परिणाम प्रलय, इस बात का संकेत है कि सामंती सभ्यता का अंत होने के बाद पूंजीवादी युग आरंभ होगा और विश्व का इतिहास इसी तथ्य को रेखांकित कर रहा है।

‘कामायनी’ के पात्रों और चरित्र-चित्रण में भी कवि की दृष्टि नए भावबोध की परिचायक है। उसके पात्र मनुष्य नहीं, मानव-मन की वृत्तियां हैं।

मनु और श्रद्धा को छोड़कर सभी पात्र मानव मनोवृत्तियों के प्रतीक हैं। मनु वैवस्वत मनु नहीं है, वह आज के पुरुष-प्रधान समाज के पुरुष हैं और उनमें वे सभी दुर्गुण एवं दुर्बलताएं पाई जाती हैं जो सामंती-पूंजीवादी समाज के पुरुषों में प्रायः होती हैं।

वह वैः भोगने के बाद विपन्न होने वाले पुरुष की तरह चिन्तामग्न, शोकाकुल, अकर्मण्य, निराश तथा किंकर्तव्यविमूढ़ है। MHD 2 Free Solved Assignment

उनमें अहंकार है, वह ईर्ष्यालु है, पत्नी के साथ विश्वासघात करने वाले हैं, सत्ता के भूखे, एकाधिपत्य स्थापित करने वाले हैं, लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पशुबलि तक करने को उद्यत हो जाते हैं; राक्षसी वृत्तियां उन पर हावी हो जाती हैं।

हिन्दी साहित्य के मध्यकाल में समाज तथा काव्य जगत् दोनों में नारी को भोग्या, दासी, पुरुष की अनुगामिनी माना जाता था।

आधुनिक काल का आरंभ होते ही ब्रह्मसमाज, आर्य समाज के समाज-सुधार सम्बन्धी आन्दोलनों के परिणामस्वरूप नारी के प्रति दृष्टिकोण बदला।प्रसाद श्रद्धा के विषय में कहते हैं,

नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत भी बहा करो।

आधुनिक युग मनोविज्ञान का युग है। मनोविज्ञान ज्ञानवृक्ष की सबसे लहलहाती शाखा है, जिसकी सहायता से जीवन की समझ बढ़ी है, मानव की समस्याओं का समाधान खोजा गया है।

मानव मनोभावों के विश्लेषण का जो कार्य आचार्य शुक्ल ने अपने मनोविकार संबंधी निबन्धों द्वारा किया था, वही प्रसादजी ने अपनी काव्यमयी भाषा में ‘कामायनी’ में किया है।

चिन्ता तथा लज्जा जैसे मनोभावों का विश्लेषण तथा उनके कारण मानव की मानसिक दशा एवं शारीरिक मुद्राओं में होने वाले परिवर्तन के चित्र पाठक को विस्मय-विमुग्ध कर देते हैं।

उनको प्रस्तुत और अंकित करने वाली भाषा-शैली भी लक्षणा-व्यंजना के कारण अत्यन्त मोहक बन गई है,

ओ चिन्ता की पहली रेखा
अरी विश्व वन की व्याली
ज्वालमुखी स्फोट से भीषण
प्रलय कंप की मतवाली

छायावाद के प्रवर्तक तथा प्रथम कवि प्रसादजी ने रीतिकालीन कवियों की सौन्दर्य चेतना के विपरीत नारी के सौन्दर्य वर्णन में भिन्न प्रणालियों का उपयोग किया है।MHD 2 Free Solved Assignment

वह नारी के अंग-प्रत्यंग का वर्णन नख-शिख प्रणाली के सहारे नहीं करते, उसके सामूहिक सौन्दर्य का चित्रण करते है; नए उपमानों का आश्रय लेते हैं, मन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण करने पर उनका आग्रह है। ‘श्रद्धा’ सर्ग में श्रद्धा का सौन्दर्य-चित्रण इसका प्रमाण है।

किये मुख नीचा कमल समान
प्रथम कवि का ज्यों सुन्दर छन्द

प्रश्न 3. पंत के काव्य में अंतर्निहित प्रगतिवादी जीवनबोध पर प्रकाश डालिए।

उत्तर पंत का प्रगतिवादी जीवन ‘युगान्त’ से प्रारम्भ होता है और ‘युगवाणी’ से होता हुआ ‘ग्राम्या’ में जाकर समाप्त हो जाता है।

साधारणतः ‘प्रगति का अर्थ बढ़ना है, किन्तु हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद’ एक रूढ़ि शब्द बन गया है, जिसका अर्थ है मार्क्स-दर्शन का साहित्यिक रूप दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि दर्शन में जो द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद है, राजनीति में जो साम्यवाद है, वही साहित्य में प्रगतिवाद है।

पंतजी प्रगतिवाद को छायावाद की ही एक धारा मानते हैं। ‘रश्मिबन्ध’ के ‘परिदर्शन’ में वे लिखते हैं ” प्रगतिशील कविता वास्तव छायावाद की ही एक धरा है।

दोनों के स्वरों में जागरण का उदात्त सन्देश मिलता है एक में मानवीय जागरण का, दूसरे में लोक-जागरण का दोनों की जीवन-दृष्टि में व्यापकता रही है एक में सत्य के अन्वेषण या जिज्ञासा की, दूसरे में यथार्थ के बोध की।”

‘रूपाभ’ पत्रिका के पहले अंक (1938) में उन्होंने लिखा है, “कविता के स्वप्न-भवन को छोड़कर हम इस खुरदुरे पथ पर क्यों उतर आए, इस संबंध में दो शब्द लिखना आवश्यक हो जाता है।

इस युग में जीवन की वास्तविकता ने जैसा उग्र आकार धारण कर लिया है, उससे प्राचीन विश्वासों में प्रतिष्ठित हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गए हैं…… अतएव इस युग की कविता स्वप्नों में नहीं पल सकती।

उसकी जड़ों को अपनी पोषण-सामग्री ग्रहण करने के लिए कठोर धरती का आश्रय लेना पड़ रहा है।… यदि हमें सत्य के प्रति वास्तविक उत्साह है,MHD 2 Free Solved Assignment

तो हम अपने महान् उत्तरदायित्व की अवहेलना नहीं कर सकते…. हमारा निश्चित ध्येय प्रगति की शक्तियों को सक्रिय योग देना होगा।” इस कथन से स्पष्ट है कि पंत एक कवि के रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वाह की भावना से प्रेरित होकर प्रगतिवादी साहित्यांदोलन से जुड़े।

प्रगतिवाद एकदम यथार्थवादी है। जो यथार्थ है, वही उसके लिए सत्य है, अन्यथा सब असत्य और निस्सार है। प्रगतिवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. धर्म, ईश्वर एवं परलोक में अविश्वास
  2. पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा
  3. शोषित वर्ग के प्रति उदारता और उसका चित्रण
  4. नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण
  5. परिवर्तनशीलता के प्रति मोह
  6. भाषा की सरलता।

अब देखें पंत-काव्य में यह प्रवृत्तियाँ कहां तक उपलब्ध होती हैं।

1 धर्म, ईश्वर एवं परलोक में अविश्वास आध्यात्मिकता केवल कल्पनाजन्य है, उसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रगतिवादी कवि न तो धर्म में आस्था रखता है, न ईश्वर में और न परलोक में उसके समक्ष मानव और मानव-समाज के अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं है।

पंतजी की ये पंक्तियाँ देखिए, “मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें मानव ईश्वर! और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुम्हें धरा पर!"

2 पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा साम्यवादियों का यह मत है कि इस धरा पर दु:ख और क्लेशों के मूल कारण सामाजिक एवं आर्थिक विषमताएँ हैं और इन विषमताओं के जनक हैं पूँजीपति।

यदि समाज में पूँजीपति न हों, तो न ये विषमताएँ रहेंगी और न तज्जन्य दुःख-क्लेश आदि। पूँजीपति समाज के लिए भीषण अभिशाप हैं। MHD 2 Free Solved Assignment

प्रत्येक प्रगतिवादी कवि ने इनके प्रति घृणा का रुख अपनाया है, वे नृशंस हैं वे जन के श्रमबल से पोषित दुहरे धनी, जोंक जग के, भू जिनसे शोषित।

3 शोषित वर्ग के प्रति उदारता और उसका चित्रण पूँजीपतियों के प्रति प्रगतिवादियों की प्रतिक्रिया है शोषित वर्ग के प्रति उदार की अभिव्यक्ति। उन्होंने जितनी पूँजीपतियों को निन्दा की है, उतना ही शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन भी किया है।

उनकी दयन. स्थिति का चित्रण करने में ही इन कवियों ने अपनी कविता की सार्थकता मानी है। दिनभर के भारी श्रम से थके हुए श्रमिक जब सन्ध्या -समय अपने घर को लौटते हैं,

तो कवि पंत का हृदय उन्हें देखकर करुणा से भर जाता है और वे कह उठते हैं, "ये नाप रहे निज घर का मग कुछ श्रमजीवी घर डगमग डग, भारी है जीवन! भारी पग!"

किसान की दशा पर दु:ख प्रकट करते हुए लिखते हैं,

युग-युग का यह भारवाह, आकटि नत मस्तक
वज्र मूढ़ जड़ मूल हठी, वृष-बांधव कर्षक।

पंत ने अपनी ‘ग्राम्या’ में रूढ़ियों, अंधविश्वासों, वर्णव्यवस्था, जातीय ऊँच-नीच की भावना, कर्मफल और भाग्यवाद को कृषक जीवन का अभिशाप बताते हुए किसानों के सहज और छल-कपट-रहित जीवन के प्रति गहरी सहानुभूति जगाने का उल्लेखनीय प्रयास किया है।MHD 2 Free Solved Assignment

4 नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिवाद साम्यवाद से प्रभावित है और प्रेम-विषयक दृष्टिकोण में फ्रायडवाद से इसलिए वह प्रेम-वासना-तृप्ति को भी जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता मानता है।

पंतजी इसी भाव को निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त करते हैं, “धिक् रे मनुष्य, तुम स्वच्छ, स्वस्थ, निश्छल चुम्बन अंकित कर सकते नहीं प्रिया के अधरों पर? मन में लज्जित, जन से शंकित, चुपके गोपन तुम प्रेम प्रकट करते हो नारी से कायर!"

प्रगतिवादी समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण स्थान मानता है। उसका मत है कि नर-नारी के समुचित संबंध में ही समाज का वास्तविक विकास निहित है।

अतः नारी को भी समाज में उसके यथोचित अधिकार मिलने चाहिए। वह ‘काम-पुत्तलिका’ मात्र न होकर ‘मानद रूप में प्रतिष्ठित हो। पंत ने इन भावों को इस प्रकार प्रकट किया है,

उसका जीवन-मान, मान पर नर के हैं अवलम्बित।
योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित,
उसे पूर्ण स्वाधीन करो, वह रहे न नर पर अवसित!

नारी का नारीत्व उसके सहज स्वभाव में है, बनाव-ठनाव में नहीं। जो नारी केवल शृंगार-प्रसाधनों से अपने रूप को संवारना चाहती है, वह समाज का कोई हित नहीं कर सकती।

वह ‘फूल, लहर, तितली, विहगी, मार्जारी’ आदि सभी कुछ हो सकती है, किन्तु वास्तविक अर्थ में नारी नहीं हो सकती। पंतजी ने ‘आधुनिका नामक कविता में इन्हीं भावों को वाणी दी है।

5 परिवर्तनशीलता के प्रति मोह प्रगतिवादी कवि प्राचीन परम्पराओं और रूढ़ियों के कट्टर विरोधी हैं। उनका दृढ विश्वास है कि जग का वास्तविक विकास लकीर का फोर” होने में नहीं, वरन् निरन्तर परिवर्तनशीलता में है

इसलिए पतजी भी पुरातनता का निर्मोक दूर फेंककर नवीनता का आह्वान करते हैं। उनकी द्रुत झरो’ कविता इसी भाव का व्यंजक है। MHD 2 Free Solved Assignment

"दूत झरो जगत के जीर्ण पत्र हे त्रस्त-ध्वस्त. हे शष्क-शीर्ण हिम-ताप-पीत, मधु वात-भीत, तुम वीतराग, जड़ पुराचीन। गा कोकिल वरसा पावन कण, नष्ट-भ्रष्ट हो जीण पुरातन"

6 भाषा की सरलता प्रगतिवादी कवि जिस प्रकार जीवन के आडम्बरों में विश्वास नहीं करता, उसी प्रकार भाषा का आडम्बर भी उसे स्वीकार्य नहीं है।

उसका मत है कि भाषा केवल विचाराभिव्यक्ति का माध्यम है। अलंकृत करने से भाषा में कृत्रिमता आ जाती और विचाराभिव्यक्ति सफल नहीं हो पाती।

अत: वह भाषा के सारल्य पर अधिक बल देता है ” वाणी मेरी चाहिए तुम्हें क्या अलंकार उसका भाषाविषयक मूल सिद्धांत है।

यही कारण है कि छायावादी पंत में जहाँ भाषा पूर्णतया अलंकृत होकर नव-यौवना की भाँति रुनझुन करके हृदय में स्पन्दन करती चलती है, वहाँ प्रगतिवादी पंत की भाषा निरलंकृत और सरल है।

यथा "हाँका करती दिनभर बन्दर, अब मालिन की लड़की तुलसा।"

अलंकारों की भांति छंदों का बंधन भी प्रगतिवादी स्वीकार नहीं करते। उनका विश्वास है कि छंदों के बन्धनों से मुक्त होकर ही ‘वाणी अयास’ बहती है।MHD 2 Free Solved Assignment

खुल गए छन्द के बन्ध
प्राण के रजत पाश

पंतजी की विशेषता यह है कि उन्होंने साम्यवाद और भौतिकवाद को अपनी भारतीय सांस्कृतिक चेतना और अध्यात्मवादी बोध की परिधि में ही स्वीकार किया।

उसे सम्पूर्ण मानव सत्ता की प्रतिष्ठा या मानव के सम्पूर्ण उत्थान की एकमात्र विचारधारा नहीं माना। अपनी अंतिम परिणति में पंत भौतिकवाद के साथ गांधीवाद और अध्यात्मवाद के समन्वय पर बल देते हैं।

प्रश्न 4. अज्ञेय की काव्य भाषा का वैशिष्टय बताइए।

उत्तर ओवेन वारफील्ड ने अपनी पुस्तक ‘Poetic Diction’ में लिखा है कि जब शब्दों का चयन और संयोजन इस प्रकार होता है कि उनका अर्थ सौंदर्य-बोध पैदा कर सके तो उसका प्रतिफल ‘पोएटिक डिक्शन’ होता है।

‘अज्ञेय’ ने भाषा का संस्कार बचपन में ही पाया था। इलियट के समान ‘अज्ञेय’ भी महान् कवि के लिए मस्तिष्क की प्रौढ़ता के साथ-साथ भाषागत प्रौढ़ता आवश्यक मानते हैं और भाषा में अर्थवत्ता को महत्त्व देते हैं।

उनके अनुसार शब्द का महत्त्व अर्थ से कम नहीं है, क्योंकि सत्य शब्दों के सहारे स्वयं बोलने लगता है। _

‘अज्ञेय’ मानते हैं कि निरंतर प्रयोग से शब्द अपनी अर्थवत्ता खोते चलते हैं, नये सत्य को पुरानी भाषा व्यक्त नहीं कर सकती “व्यंजना के पुराने साधन पर्याप्त नहीं है। कवि नयी सूझ, नयी उपमाएं, नया चमत्कार भाषा में लाता है।” MHD 2 Free Solved Assignment

अतः शब्द का निरंतर संस्कार होना चाहिए, भाषा को रूढ़िमुक्त होना चाहिए। वे गढ़ी हुई, कृत्रिम भाषा के खिलाफ हैं, क्योंकि उनका मत है कि काव्य की सफलता की कसौटी है उसमें निहित सत्य की अभिव्यक्ति अधिकाधिक पाठकों पर होना और इसके लिए सरल, सहज और सामान्य भाषा आवश्यक है।

‘अज्ञेय’ की काव्य-भाषा में सतत् विकास होता रहा है प्रारंभ में द्विवेदी-युगीन वर्णनात्मक और फिर छायावादी भाषा (तीक्ष्ण अपांग, उच्छ्वसित हृदय) और अंत में खुली हुई संदर्भ युक्त भाषा का प्रयोग दिखाई देता है।

‘इन्द्रधनु रौंदे हुए ये’ में जनता की संवादी भाषा है, तो ‘बावरा अहेरी’ में भाषा लोकभाषा के निकट है और ‘आंगन के पार-द्वार’ की भाषा में रहस्यवादी पुट है। विकसनशील होने के कारण भाषा में वैविध्य और लचीलापन है।

‘अज्ञेय’ की काव्य-भाषा को तीन कोटियों में रखा जा सकता है तत्समप्रधान, सामान्य बोलचाल की तथा मिश्रित भाषा :

1 तत्समप्रधान भाषा कवि गंभीर भाव या विचार व्यक्त करते हुए तत्सम शब्दावली का प्रयोग करता है। संस्कृत शब्दावली का प्रयोग करते हुए वह चुने हुए छोटे-छोटे शब्द रखते हैं, अभ्र लख भ्रूचाप-सा नीचे प्रतीक्षा में स्तम्भित निःशब्द उनके विशेषण भी तत्सम हैं,

सामान्य भाषा का प्रयोग करते समय उन्होंने आम बोलचाल की शब्दावली अपनाई है। अजेय’ लोक-सम्पक्ति के कवि हैं अतः उन्होंने लोक-भाषा और ग्रामीण शब्दावली (बांगर, ढिग, डांगर भंसाते, पगुराती भैंस) का प्रयोग निस्संकोच किया है।

‘अज्ञेय’ ने अंग्रेजी (रेल, पार्क, बैंच, थियेटर, मोटर) और उर्दू (इलाज, जुदा, जोखिम, सलीब, शौक, फबती, गरेबां) के उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया है, जो लोक-प्रचलित हैं।

ब्रजभाषा के शब्द उनके काव्य में अर्थ-सौंदर्य, लयात्मक प्रवाह और संगीत तत्त्व का समावेश कर देते हैं। ब्रजभाषा की क्रियाओं, विशेषणों और संज्ञाओं के प्रयोग से काव्य-भाषा कोमल और मृदुल हो गई है।

इनके प्रयोग ने बौद्धिकता से आक्रांत कविताओं को भी दुरूह से बचा लिया है।

वर्णागम, वर्णलोप, स्वरागम, स्वरलोप कर (फोला, नांध, झोर, कांक्षा, मेघाली, थिर) उन्होंने शब्दों को नई अर्थवत्ता प्रदान की है।MHD 2 Free Solved Assignment

नया अर्थ भरने के लिए उन्होंने नये रूप भी गढ़े हैं, जैसे उन्नित, लाज से ललाकर, झोंप अंधियारा, घटियल, भंसाना, फींचना, झौंसी आदि।

व्याकरण की दृष्टि से भी नए प्रयोग किए हैं, जैसे सरस को क्रियारूप दिया है,
प्यार की कोंपल एक सरस ही जाय। अथवा क्रिया में संज्ञा बना ली है, एक विकसन जो मन को रंजित कर जाय।

कहीं विशेषण को संज्ञा (लालिमा से लालियां) तो कहीं मुख्य क्रिया का लोप करके नया शब्द गढ़ा गया है, जैसे ‘पोसता है’, ‘अनुकूलो’ आदि।

इन प्रयोगों ने निश्चय ही भाषा को नई अर्थवत्ता प्रदान की है और इससे अनुभूति के मूर्तीकरण की क्षमता बढ़ गई है।

ध्वनि के आधार पर शब्दों का निर्माण उनकी काव्य-भाषा की एक अन्य विशेषता है लुढ़क-पुढक, गड्डमड्ड, पिसना, रिरियाहट, हहर, हरहराते, तिप-तिप, काय-काय, अड़ड़ाना आदि। ‘अज्ञेय’ की मिश्रित भाषा-शैली में विभिन्न भाषाओं के शब्द मिल-जुल कर आए हैं,

दया कीजिए, झटिलमैन
और लगेगा झूठा जिसके स्वर का दर्द।

मुहावरे के प्रयोग ने उनके कथ्य को अधिक सशक्त और व्यंजक बना दिया है। हिन्दी मुहावरों के अतिरिक्त उर्दू मुहावरों का प्रव.. तो हुआ है, कहीं-कहीं मुहावरों को थोड़ा परिवर्तित भी कर दिया गया है, जैसे कर धुनना, नैन पकना, विष वमन करना, वक्ष पर गोलियां झेलना। MHD 2 Free Solved Assignment

इन प्रयोगों से लाक्षणिकता में वृद्धि हुई है। संदर्भ-विशेष में नए मुहावरे का प्रयोग अर्थ को और अधिक प्रभावपूर्ण बना देता है, जैसे भाषा में साबुन की चिकनाई’ कहकर कवि नागरिकों के चरित्र पर अधिक प्रकाश डाल सका है।

इस प्रकार ‘अज्ञेय’ की भाषा ने नवीन बोध जगाने के लिए एक नया वातावरण तैयार किया है। प्राचीन भाषा को भावों की अभिव्यक्तिMHD 2 Free Solved Assignment

2 सामान्य बोलचाल की भाषा ‘अज्ञेय’ की काव्य-भाषा में सामान्य बोलचाल की भाषा की शब्दावली का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग मिलता है “घने कुहासे में

झिपते
चेहरे पहचान
खम्भों पर बत्तियां
खड़ी है सीढ़ी
ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन।”

3 मिश्रित भाषा इस प्रकार की भाषा में उर्दू-फारसी, अंग्रेजी आदि सभी भाषाओं की शब्दावली का प्रयोग किया गया है, “खोजते हैं जाने क्या? बिछोर सिफर के अंधेरे में बिला-बत्ती सफर भी खूब है। “सृजन के घर में

तुम
मनोहर शक्तिशाली
विश्वात्मक शक्तिशाली
दुर्जनों के भवन में।

4 कहावतों और मुहावरों का प्रयोग जहाँ गद्य-भाषा की सरसता और प्रवाह उपयुक्त कहावतों और मुहावरों के प्रयोग से निखर उठते हैं,

वहाँ काव्य-भाषा के संदर्भ में तो उनका प्रयोग और भी अधिक लाक्षणिकता, सरलता और प्रवाह की सृष्टि करता है।MHD 2 Free Solved Assignment

काव्य की वार्णिक और मात्रिक सीमा में बंधी हुई अथवा कहिए मुक्त-छंद में भी अर्थ लय के बंधन में जकड़ी हुई काव्यात्मक पंक्तियों में इनका उपयोग निस्संदेह एक सशक्त लेखनी की अपेक्षा रखता है।

अज्ञेय की काव्य-भाषा में इनका यथावसर पर्याप्त प्रयोग मिलता है। जैसे मुंह चुराना, अंगूठा दिखाना, खिलकर मिलना, आंखों से चूमना, सांचे में ढलना, तनकर रहना, आंखें फूटना, आंचल बचाना, अंटी टटोलना, कमर झुकना, पल्ला छुड़ाना, दामन पाक रखना, फबतियां कसना, मुलम्मा छूटना, आकाश ताकना, उमर के दाग धोना, जमीन कुरेदना कहीं-कहीं उन्होंने एक ही कविता में अनेक मुहावरों का भी प्रयोग किया है,

जैसे "कवि तुभ ( नभचारी) मिट्टी की ओर मत देखना गहरे न जाना कहीं, आंचल बचाना सदा दामन हमेशा पाक रखना पंकज-सा पंक में धाक रखना लाज रखना, नाम रखना

‘अज्ञेय’ की भाषा-शिल्प नया तो है ही, उसमें कहीं कृत्रिमता भी नहीं है। जैसा भाव है, भाषा उसी के अनुरूप अपना रूप धारण कर लेती हूँ

सांप
तुम सभ्य तो हुए नहीं

गर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
तक कैसे सीखा डसना
विष कहां पाया?

भाषागत प्रौढ़ता और वैविध्य के कारण कोई कवि कालजयी बनता है। इस दृष्टि से ‘अज्ञेय’ का कृतित्व कालजयी है।

डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है, “ भाषा का अधिक से अधिक सतर्क और सर्जनात्मक प्रयोग करके ही अज्ञेय ने अपनी रचना को निखारा है।” । MHD 2 Free Solved Assignment

‘अज्ञेय’ कविता के लिए छंद, तुक-ताल का बंधन आत्यन्तिक नहीं मानते, फिर भी छन्द को काव्यभाषा की आँख और लय को कविता का प्राण कहते हैं। छंद-प्रयोग की दृष्टि से वह परम्परावादी भी हैं और प्रयोगवादी भी।

‘भग्नदूत’, ‘चिंता’, ‘इत्यलम्’ में उन्होंने परम्परागत छंदों को स्वीकार किया है। पर आगे चलकर कुछ नए छंदों का आविष्कार भी किया है। मुक्त-छंद के क्षेत्र में उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं।

उन्होंने लोक-गीत, संस्कृत कविता, जापानी कविता (हाइकू) आदि से लय का अन्वेषण कर अपने भाव के अनुरूप छंद की सृष्टि की है। लोकगीत की लय का उदाहरण देखिए,

बांगर में
राजाजी का बाग है
चारों ओर दीवार है
जिसमें एक द्वार है
बीच-बाग कुंआ है
बहुत-बहुत गहरा।

अज्ञेय का भाषा-शिल्प पर्याप्त नवीनता लिए हुए है। अज्ञेय ने भाषा को नया संस्कार, नई राह और नई दिशा प्रदान की है। MHD 2 Free Solved Assignment

उनके काव्य की भाषा सहज और सार्थक शब्दों से युक्त है। उनमें कहीं बनावट या प्रयत्नसिद्ध गठन नहीं है। जैसा भाव है भाषा उसी के अनुरूप अपना रूप धारण कर लेती है।

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प्रश्न 5. निम्नलिखित प्रत्येक काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

(क) यह नियम है, उद्यान में पककर गिरे पत्ते जहाँ,
प्रकटित हुए पीछे उन्हीं के लहलहे पल्लव वहाँ
पर हाय! इस उद्यान का कुछ दूसरा ही हाल है,
पतझड कहें या सूखना, कायापलट या काल है?

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत काव्यांश ‘भारत भारती’ नामक कविता से अवतरित है। इस कविता के रचयिता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तियों में कवि ने भारत के उत्थानमय अतीत एवं पतनमय वर्तमान का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि प्रकृति का यह नियम है कि उद्यान में जहां पुराने पत्ते झड़ कर गिर पड़ते हैं उनके स्थान पर नए-नए कोमल पत्ते लहलहाने लगते हैं अर्थात पुराने पत्तों का स्थान नए पत्ते ले लेते हैं परंतु अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि इस भारतवर्ष रूपी उद्यान की दशा इससे भिन्न है।

इसकी वर्तमान दशा को पतझड़ कहें या फिर इसका सूख जाना? काया पलट जाना कहें या फिर इसकी मृत्यु होना कहें? अब इस भारतवर्ष रूपी उद्यान के शोभा और सुगंधित फूल कुम्हला गये हैं

अर्थात भारतवर्ष को शोभा प्रदान करने वाले तत्व अब नहीं रहे। इस उद्यान में रस से युक्त फल उत्पन्न नहीं होते अर्थात अब भारतवर्ष रूपी उद्यान में आनंददायक संकल्पनाओं, भावों या विचारों का जन्म नहीं होता।

अब इस उद्यान में केवल झाड़ और झंखाड़ है अर्थात भारतवर्ष में अब केवल बुरे विचार, बुरी संकल्पनायें
और बुरे रीति-रिवाज ही पनप रहे हैं। MHD 2 Free Solved Assignment

ऐसा लगता है कि जैसे अब इस भारतवर्ष रूपी उद्यान का शरीर पूरी तरह से सूख चुका है और हार्ड मात्र ही शेष रह गया है।MHD 2 Free Solved Assignment

विशेष 1. निरंतर पतन की ओर अग्रसर भारतवर्ष की दशा पर चिंता व्यक्त की गई।

  1. तत्सम शब्दावली की प्रधानता है।
  2. अनुप्रास, अन्त्यानुप्रास, रूपक और संदेह अलंकार है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है।

(ख) मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग, बुनती दुकुल
छाया में मलय-बयार पली !
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली! ।

उत्तर: संदर्भ इन पक्तियों में भी अपनी तुलना बदली से करती हुई कवयित्री अपने दुःखी हृदय के उदात्त भावों, बिंब के प्रति अपनी सहृदयता और मंगल-कामना व्यक्त करती है।

व्याख्या: मेघ क्षण-क्षण पर मंद स्वर में गरजता है, उसका गर्जना वर्षा का सूचक है। अत: उसे सुन सब हर्ष-विभोर होते हैं। महादेवी वर्मा या विरहिणी नारी भी अपने मधुर वचनों से सबको हर्षित करती है, अपने कार्यों से मानव के उज्ज्वल भविष्य का घोष करती है।

मेघ की आर्द्रता लेकर पवन शीतल हो उठता है, विरहिणी कवयित्री की कामनाएँ भी विश्व-मंगल से संबद्ध हैं, उनके भविष्य के सपने ” कोमल तथा मधुर हैं। MHD 2 Free Solved Assignment

वर्षा ऋतु में जब इंद्रधनुषी रंगों का रेशमी दुपट्टा धारण किया हुआ है। विरहिणी के हृदय में भी रंग-बिरंगी काम तरह-तरह के सपने उसके हृदय को इंद्रधनुषी भाव-तरंगों से भर देते हैं।

बदली की छाया में, शीतल मंद पवन के झोंकों का स्पर्श पा ग्रीष्माताप से संतप्त प्राणियों को राहत मिलती है, विरहिणी के कोमल, संवेदनशील हृदय के भाव भी संतप्त प्राणियों को शीतलता प्रदान करते हैं, उनकी पीड़ा को हरते हैं।MHD 2 Free Solved Assignment

वर्षा ऋतु में क्षितिज पर बदली धीरे-धीरे ऊपर उठती है. घिरती है और उसका रंग श्यामल होता है। सघन होने पर पृथ्वी की ओर झुकती है, फिर बरसती है, उसका जल शुष्क धरती पर पड़ता है,

उसे शीतल बनाता है और फिर उसके संस्पर्श से साए पड़े बीज अंकुरित हो उठते है, अंकुर के रूप में लहलहा उठते हैं। विरहिणी की भौंहें भी चिंता व्यथा व्याकुलता के भार से निरंतर नीचे की ओर झुकी रहती हैं,

उन झुकी भौंहों से उसके हृदय की व्यथा का स्पष्ट संकेत मिलता है। वह अपनी संवेदनशीलता, करुणा, विश्व-मंगल की भावनाओं सं स्वयं दु:खी होते हुए भी संसार के अन्य प्राणियों के हृदय में नई आशा, नया उल्लास भरती है,

उनके शुष्क, मृतप्राय प्राणों में नवजीवन का संचार करती है। स्वयं को मिटाकर भी, सर्वस्व त्याग कर भी वह दूसरों को सुखी बनाना चाहती है।

विशेष 1. एक साथ तीन अर्थ भरना कवि-कौशल का परिचायक है। ये तीन पक्ष हैं बदली, विरहिणी, कवयित्री तथा भारतीय नारीMHD 2 Free Solved Assignment

2 रूपक तथा पुनरुक्ति अलंकार।MHD 2 Free Solved Assignment

3 प्रकृति के साथ हृदय की रागात्मक स्थितियों का सामंजस्य।

4 भाव साम्य करुणा की नव अंगड़ाई-सी, मलयानिल की परछाई-सी।।

(ग) यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा।
जिज्ञासु प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इस को भक्ति को दे दोः
यह दीप, अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इस को भी पंक्ति को दे दो।

उत्तर: संदर्भ कविता की उपर्युक्त पंक्तियाँ हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ प्रयोगवादी कवि अज्ञेय द्वारा लिखित कविता ‘यह दीप अकेला’ में से ली गई हैं। कवि ने व्यक्ति की सत्ता को समाज से जोड़कर श्रेयस्कर माना है।

व्याख्या: दीप के बहाने कवि कहता है कि वह अकेला होकर भी काफी कुछ है। व्यक्ति भी अकेला होकर सब कुछ है, परन्तु दोनों की सार्थकता समष्टि में विलय से है।

जिस तरह से दीप अकेला होकर भी कठिनाइयों का मुकाबला करता है। ठीक उसी तरह व्यक्ति भी संघर्षों का अकेला सामना करने में सक्षम है।

दोनों लघुता में कांपते नहीं। व्यक्ति अपनी पीड़ा को गहराई से अच्छी तरह जानता है। वह स्वयं उसे नापता है। वह घृणा, अवज्ञा के कड़वे सच्च को झेलता है।

वह सदैव द्रवित होकर जागरूक रहकर प्रेम भरे नेत्रों, अपनी र बाँहों से अपनेपन की भावना में अनुरक्त रहता है। यह व्यक्ति जानने की इच्छा रखता है, यह बुद्धिमान है।

यह श्रद्धा की भावना रखता इसको भक्ति की आवश्यकता है। इसे भक्ति से जोड़ना चाहिए। भक्ति भाव के समूह से जुड़कर ही इसके जीवन की सार्थकता है। MHD 2 Free Solved Assignment

यह दीप अकेला है। इसमें स्नेह है, गर्व भी। अगर इसे पंक्ति को दे दें तो इसका जीवन सार्थक हो जाएगा। यह दीप का विलय पंक्ति के बहाने व्यक्ति का समाज से विलय का प्रतीक है।

विशेष 1. कवि ने व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सत्ता से जोड़ने का अनुरोध किया है।

  1. व्यक्ति का भक्ति-भाव में लीन होना भी उसके जीवन की सार्थकता है।
  2. पद्य में तत्सम राज्यावली की प्रधानता है.
  3. पद्यमे
  4. प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता का प्रयोग भी द्रष्टव्य है।

MHD 01 FREE SOLVED ASSIGNMENT 2021-22

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