IGNOU MHD 19 Free Solved Assignment 2022- Helpfirst

MHD 19

MHD 19 Free Solved Assignment

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MHD 19 Free Solved Assignment Jan 2022

प्रश्न 1.निम्नलिखित काव्यांशों में से किन्ही दो की लगभग 200 शब्दों में संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।

(क) मेरे और तुम्हारे बीच एक रेतीला ढूह है जो किसी अंधड़ का इंतजार करने से पहले किसी ……………………….की महक में बदलने के लिए।

उत्तर- प्रस्तुत कविता ओमप्रकाश वाल्मीकी की ‘घृणा तुम्हें मार सकती है” से र लिया गया है। कवि जानता है कि ‘वर्ण व्यवस्था रेतीले द्रह से अधिक कुछ नहीं है। बस कुछ लोग हैं जो इसे अभेद्य किला बता रहे हैं।

लेकिन किसी झूठ की उम्र उतनी नहीं होती, जितनी इसकी हो चुकी है, इसलिए यह किला कभी भी भरभरा कर टूट सकता है। और हर हाल में इसे टूट जाना चाहिए।

ज्यों ही ‘वर्ण व्यवस्था और उसकी कोख से जन्मी घृणा का अन्त होगा त्योंही भारतीय समाज की तस्वीर बदल जाएगी। तब एक सर्वण और एक दलित के घर की रोटी के स्वाद में अंतर बताने वाले नहीं रह जाएंगे। सवर्ण और दलित जैसे बंटवारे नहीं रह जाएंगे।

प्रेमचंद जिस रा-ट्रीयता का स्वप्न देख रहे थे, वह रा-ट्रीयता आ जाएगी। प्रेमचंद ने लिखा था, “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें जन्मगत वर्गों की गन्ध न होगी।

वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय, उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन।”

प्रेमचंद के समय में दलित संज्ञा के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग होता रहा है।” प्रेमचंद भेद रहित समाज देखना चाहते थे। वाल्मीकि की यह कविता भी तीखेपन के भीतर इसी आकांक्षा को समेटे है। कविता में आगे आता है:

रोटी की महक
जानती है आग का स्वाद और,
पहुँचती है नासिका रन्ध्र तक
हड्डियों के रस में डूबकर जाहिर है,

ये पंक्तियाँ श्रम की संस्कृति को सामने लाती हैं। दलित और अन्य सर्वहारा वर्ग के लिए रोटी के मायने ही कुछ और होते हैं। वे रोटी का जुगाड़ अपने रक्त का पसीना बनाकर करते हैं। वे जानते हैं कि वर्णवादी और पूँजीवादी शोनकों की निगाह उनकी रोटी पर ही है।MHD 19 Free Solved Assignment

वे किसी भी हालत में अपनी रोटी पर शोनकों का अधिकार नहीं रहने देना चाहते हैं। और इसीलिए लड़ना चाहते हैं। वे अपनी साँसों पर अपना अधिकार चाहते हैं और ‘रोटी के फर्क को मिटाना चाहते हैं।

वे बताना चाहते हैं कि फर्क तो दृटि और चेतना में है। इसे बदल लो फिर हम तक पहुँचने में कहीं कोई बाधा न होगी।

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(ख) यदि वेद – विद्या पढ़ने की करो धृष्टता, तो काट दी जाय तुम्हारी जिह्वा यदि यज्ञ करने का करो दुस्साहस, तो छीन ली जाय तुम्हारी धन सम्पत्ति, या कत्ल कर दिया जाय तुम्हें उसी स्थान पर। तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?

उत्तर- प्रस्तुत कविता कंबल भारती की ‘तब तुम्हारी निठा क्या होती से लिया गया है। इन पंक्तियों में कहा गया है कि यदि तुम (अछूत, दलित) वेद का एक शब्द भी सुन लो, तो तुम्हारे कानों में पिघला हुआ शीसा डाल दिया जाएगा। इसी प्रकार यदि तुम वेदपाठ करने की धृ-टता करो तो तुम्हारी जिह्वा काट दी जाएगी।

इसी प्रकार यदि तुम यज्ञ करने का दुस्साहस करो तो तुम्हारी धन संपत्ति छीन ली जाएगी। तुम्हारा उसी समय, उसी स्थान पर वध कर दिया जाएगा।

इन प्रश्नों की बौछार करते हुए कवि द्विज वर्ग को पूछता है कि इन परिस्थितियों में दण्ड पाने के बाद भी क्या तुम्हारी नि-ठा इसी प्रकार कायम रहेगी?MHD 19 Free Solved Assignment

यहां ज्ञातव्य है कि धर्म सूत्रों के अनुसार यदि कोई शूद्र वेद का एक शब्द भी सुन ले तो उसे धर्म की अवज्ञा करने पर दण्ड देने का कठोर आदेश था। मनुस्मृति के सूत्र 12.4) में कठोरता से यह घोनित किया गया है। इसमें आगे कहा गया है कि यदि धर्मोपदेशं

दर्पण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्रमासे चयेतैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ||

राम द्वारा शंबूक का वध मनुस्मृति के इसी धर्मसूत्रों में दिए गए इसी विधि-विधान के पालन हेतु किया गया था। किसी ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु के लिए शंबूक को दोष दिया गया था।

ज्ञान प्राप्ति हेतु अध्ययनरत शंबूक काय दुस्साहस ब्राह्मणवाद का सीधे-सीधे उल्लंघन था अतः श्रेष्ठी ब्राह्मण वर्ग ने अयोध्या के नरेश राम को राजा के कर्तव्य पालन का आदेश दिया। प्रजारक्षक राम ने धर्म विरोधी आचरण के लिए शंबूक का इसीलिए शिरोच्छेद कर दिया था।

कविता में वर्णित अन्य पक्तियों के अनुसार शूद्र यदि यज्ञ करने का प्रयत्न करे तो संपत्ति छीन लेने का आदेश भी दिया गया है क्योंकि शूद्र को धन संचय करने की धर्म शास्त्रों द्वारा मनाही की गई है।

यदि शूद्र इन आदेशों की अवहेलना करते हुए धन संचय करने का साहस जुटाता है तो उसके लिए कठोर दण्ड मनोनीत किए गए हैं। मनुस्मृति के अनुसार शूद्र द्वारा धन संचय करने से ब्राह्मण को दुःख पहुंचता है।

कवि ब्राह्मणवाद के इस अन्यायपूर्ण आदेश को नकारते हुए प्रश्न करता है कि क्या तुम्हारी नि-ठा तब भी वैसी ही बनी रहती जब तुम्हारी भी संपत्ति छीनने का आदेश धर्म द्वारा दिया गया होता और उसके पश्चात् तुम्हारे वध करने का आदेश दिया जाता।

प्रश्न 2.निम्नलिखित गद्याशों में से किन्हीं दो की लगभग 200 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए:

(क) बालमन की यह खरोंच ग्रंथि बन गई थी जब भी वह पच्चीस की संख्या पढ़ता या लिखता, उसे पच्चीस ……………………………., जिनके उत्तर उसके पास नहीं थे।

उत्तर- प्रस्तुत गद्य ओमप्रकाश वल्मीकि कि पच्चीस चौका डेढ़ सौ से लिया गया है। “पच्चीस चौका डेढ़ सौ इस अर्थ में उल्लेखनीय कहानी है कि यह बेहद मारक ढंग से सवर्ण दुष्चक्र की अमानवीयता और उसके कुत्सित इरादे को बेनकाब करती है।

यह उन दलित कहानियों से अलग है जो घटनाओं और विचारों को फौरी तौर पर कथा विन्यास में शामिल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देती है।MHD 19 Free Solved Assignment

जैसा कि इस इकाई के आरंभ में कहा गया था कि कथा में मितकथन की कलात्मकता मौजूद है, यह भी कहानी की एक उल्लेखनीय विशेषता है। नायक सुदीप नयी पीढ़ी का वह दलित है ‘पच्चीस चौंका डेढ़ सौ. कहानी में पीढ़ियों का द्वंद्व भी प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है।

कथा – विन्यास की सुदंरता इस अर्थ में उल्लेखनीय है कि पीढ़ियों का द्वंद्व तो चित्रित है पर कहीं संबंधों में तनाव नहीं आया है। कथाकार ने असहमति का पहला दृश्य उस समय चित्रित किया है, जब पहाड़ा याद करते समय सुदीप किताब में लिखे के मुताबिक पच्चीस चौका सौ कहता है।

परसुदीप के पिता को बेटे का ऐसा पढ़ना गलत लगता है। इसके पीछे सवर्ण अवसरवाद की वह भूमिका है, जिसके तहत चौधरी ने अपने निहित स्वार्थ के कारण रुपये एंठने के चक्कर में कर्जदार सुदीप के पिता को पच्चीस चौका सौ की जगह पच्चीस चौका डेढ़ सौ बताया। दूसरी तरफ पिता को गिनती नहीं आती थी।

लेकिन वह चौधरी के अहसानों तले खुद को दबा महसूस करते थे। उन्हें यह भी लगता था कि जो मुसीबत के समय काम आया वह भला कैसे गलत हो सकता है।

उन्हें लगता था कि मास्टर मिश्र चौधरी से अधिक भला कैसे जान सकते हैं। पिता सुदीप को पढ़ते समय जब उसके द्वारा यह बोलते हुए सुनते हैं- पच्चीस चौका सौ। तब उनकी त्यौरी चढ़ जाती है। वे बोले, ‘नहीं बेटे.. पच्चीस चौका सौ नहीं पच्चीस चौका डेढ़ सौ ।

सुदीप ने असहमति व्यक्त करते हए अपनी किताब की नजीर दी। लेकिन पिता को चौधरी की बात सही और किताब की बात गलत लगती है, और कहा, ‘तेरी किताब में गलत भी हो सके नहीं तो क्या चौधरी झूठ बोलेंगे? तेरी किताब से कहीं ठाड्डे (बड़े) आदमी हैं चौधरी जी। उनके धोरे (पास) तो ये मोट्टी-मोट्टी किताबे हैं…… वह जो तेरा हेडमास्टर है वो बी पाँव छुए हैं।MHD 19 Free Solved Assignment

चौधरी जी के फेर भला वो गलत बतावेंगे मास्टर से कहणा सही-सही पढ़ाया करे…।’ इतना ही नहीं पिता ने सुदीप को एक थप्पड़ भी रसीद दिया। यह बात कील की तरह सुदीप के मन-मस्तिष्क में टंग गयी। वह सोते-जागते, दिन रात इसी चिंता में रत रहने लगा कि कैसे पिता की गलतफ़हमी को दूर करे ?

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(ख) ठाकुर ने सुना तो खोपड़ी जल उठी उसकी लगा दिमाग में जितनी भी नसें हैं वे आपस में जुड़ गयी है। ………….? दस-बीस साल पहले तो मुँह में जबान ही जैसे न थी और अब कहते हैं गाँव में कोई ठाकुर-वाकुर नहीं।

उत्तर- प्रस्तुत गद्य मोहनदास नैमिशराय की आवाजें से लिया गया है

दलित चेतना के प्रसार के संबंध में गांव और शहर के आपसी रिश्तों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। प्राप्त अवसरों का लाभ उठाकर दलित समुदाय के जो लोग गांव छोड़कर शहर में जा बसे उनमें से कुछ ने आवाजाही का संबंध बनाए रखा।

इसमें भी मुख्यतः दो वर्ग थे। गांव से संबंध रखने वाले कुछ ऐसे थे जो अब गांव के प्रति हिकारत का भाव रखते थे।

कुछ ऐसे भी थे जो ग्रामीण दलितों की दशा से क्षुब्ध थे, परिस्थितियों को समझते थे और अपने समुदाय को दोन देने, कोसने की बजाए उनमें नई रोशनी, नया जज्बा पैदा करने का प्रयास करते थे।

‘आवाजें में मेहतर समुदाय के जिस इतवारी के यहाँ से बदलाव की आवाज उभरी है उसका श्रेय इतवारी के उस लड़के को दिया गया है जो शहर से गांव पहुंचा है, “रोज-रोज इतवारी के घर पर ही पंचायत होती है।

उसका लड़का शहर से आया है। उसी का काम हो सकता है।” एक कहावत है कि सौ बुझे हुए दीपक मिलकर एक दीपक को नहीं जला सकते जबकि एक जला हुआ दीपक सौ बुझे हुए दीपकों को जला देता है।

इतवारी का लड़का यही दायित्व निभा रहा है। ठाकुरों को इस अप्रत्याशित परिघटना पर अचरज होता है। वे समझ नहीं पाते कि जो मेहतर आज तक उनके सामने मुंह भी नहीं खोलते थे वे काम पर आने से मना कैसे कर सकते हैं। दास को अपनी दासता का एहसास विद्रोह की पहली सीढ़ी है।

मेहतरों के साथ यही हुआ। उन्हें उनके ही परिवार के किसी सदस्य ने एहसास करा दिया। इस एहसास की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। एक उदाहरण देखें। इतवारी को काम पर बुलाने ठाकुर का कारिन्दा आया हुआ है। आपस में बातचीत चल रही है:MHD 19 Free Solved Assignment

“इतवारी तुझे ठाकुर ने बुलाया है……

कारिन्दे के पहली बार कहने को इतवारी ने अनसुना कर दिया था। तब दोबारा कारिन्दे ने उसी लहजे में कहा तो वह उबल सा पड़ा

“कौन ठाकुर….?”

“गांव में कौन ठाकुर है तुझे पता नहीं…..?”

कारिन्दा क्षण भर में ही भड़क उठता है.

“नहीं, हमें कुछ पता नहीं। अब कोई किसी की ठकुराहट नहीं चलती है, सब अपनेअपने घर में आजाद हैं।”

“क्या….?”

“कारिन्दा अब पूर्ण रूप से गर्मा गया था। उसे सपने में भी विश्वास न था कि इतवारी, जिसकी उम्र मैला ढोते-ढोते तथा दूसरों की जूठन खाते-खाते बीत गई वह ऐसा भी कह सकता है। “

प्रश्न 3.निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर लगभग 300 शब्दों में लिखिए

(क) ‘परिवर्तन की बात कहानी के माध्यम कीजिए। वर्चस्ववाद और शोषण की परंपरा दलित कहानी की सोदेश्यता पर विचार कीजिए।

उत्तर-दलित साहित्य की उत्पत्ति का कारण समाज में फैले शोषण, अत्याचार, प्रताड़ना और उनका बहिष्कृत जीवन है दलित रचनाकार ज्यादातर गाँवों से निकले हुए ग्रामीण हैं।

उन्होंने समाज में जातिवाद का घिनौना रूप देखा है और उसी वास्तविकता का चित्रण अपनी कहानियों में दलित रचनाकारों ने किया है।

‘परिवर्तन की बात’ सूरजपाल चौहान की कहानी है। इन्होंने अपनी कहानी में उस नई जागृति को दर्शाया है, जो दलित वर्ग में पैदा हो चुकी है। भारतीय सामाजिक संरचना वर्णवाद पर आधारित रही है, जिसमें प्रत्येक वर्ण के कार्य पहले से ही निर्धारित है।MHD 19 Free Solved Assignment

शुद्ध वर्ण को सबसे निम्न वर्ण माना जाता है और सभी अवांछित कार्य जैसे गंदगी उठाना, मैला साफ करना, खेतों पर काम करना मरे हुए जानवर उठाना उनसे करवाये जाते हैं।

इस वर्ग को किसी के आदेश की अवहेलना करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई दलित किसी सवर्ण जाति के व्यक्ति को कार्य करने से मना करता है, तो उसे उसके लिए दण्ड भोगना पड़ता है।

सूरजपाल जी की कहानी से ठाकुरों के वर्चस्व और शोषण का अंदाजा लगाया जा सकता है, जब वह किसना को बार-बार मरी गाय उठाने को कहते हैं। उसके इंकार करने पर उसकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करवाई जाती है,

किंतु इस बार किसना पक्का इरादा कर चुका है कि वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा किसना की निडरता और साहस के आगे ठाकुर कुछ नहीं कर पाता किसना के स्वर में विद्रोह है।

ठाकुर उससे प्रतिशोध लेने के लिए पूरी बस्ती के चारों तरफ काँटे वाली तार लगवा देता है। उनके पानी लाने के रास्ते बंद करवा देता है।

सवर्ण जाति अपनी श्रेष्ठता पर आँच नहीं आने देती और यदि कोई किसना जैसा सिर उठाकर विद्रोह करता है, तो ये अमानवीयता की हद कर देते हैं। हरियाणा के गोहाना झन्झर महमूदपुर, पलवल और महाराष्ट्र में भी इस प्रकार की अनेको घटनाएँ घटी हैं।

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(ख) दलित कहानी की सोद्देश्यता पर विचार कीजिए।

उत्तर- दलित लोक कथा की विरासत एवं दलित कहानी भारतीय लोक कथाओं का अति प्राचीन एवं समृद्ध इतिहास रहा है।

इस परंपरा का विकास मौखिक तथा वाचिक अभिव्यक्ति से भी हुआ है। लोक कथाओं के प्राकट्य काल के संदर्भ में निश्चित तौर पर अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

यह मनुष्य के जन्म की कहानी से संबद्ध है न केवल भारतीय भाषाओं में अपितु विश्व के हर समाज में ऐसी परंपराएँ विभिन्न भाषाओं में व्याप्त होगी।MHD 19 Free Solved Assignment

घर-परिवार में बड़े बूढ़ों के मुख से कदाचित सभी ने अनेक कहानियाँ सुनी होगी। इसी के प्रकार लोक कथाओं की परंपरा अभी तक जीवत है।

लोक कथाओं के माध्यम से दलित कहानियों की विकास यात्रा तथा उसको। विशिष्टताओं एवं सरोकारों को समझ जाना अति आवश्यक है।

विश्वव्यापी प्रतिरोध को प्रकृति इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने में सहायक रही है। जातक कथाओं की एक विकसित परंपरा बौद्धकालीन भारत में भी देखने को मिलती है।

कल्पना एवं वास्तविकता के आधार पर भविष्य निर्माण के साहित्य की परंपरा अत्यन्त प्राचीन है। जादुई एवं भूतप्रेत की कहानियों ने इस परंपरा को और अधिक सशक्त बना दिया है।

इन कथाओं का मूल उद्देश्य मनोरंजन के अतिरिक्त, लोगों के मध्य दलित समस्याओं को प्रस्तुत करना भी है। धेरिंगाथाएँ ढकाल में महिलाओं द्वारा रचित प्राचीनतम साहित्य है, जिसके माध्यम से महिलाओं के मन में पनप रहे विरोध के स्वरों को सुना जा बौद्धकाल सकता है।

भारतीय सामाजिक सरचना जाति, धर्म, समुदाय आदि अनेक स्तरों पर बटी हुई है। वर्चस्व एवं प्रतिरोध के स्तर विभिन्न प्रकार एवं स्तर पर देखने को मिलते हैं।

कदाचित यह लोगों के विभिन्न स्तरों पर बटे होने का उल्लेख करता है। साहित्य इतिहास लेखन में लोक को लोकधर्म के सूत्र में बांधने की परंपरा रही है। इसको व्याख्य विभिन्न हिंदी लेखकों ने अलग-अलग प्रकार से की है।MHD 19 Free Solved Assignment

आचार्य रामचंद्र शुक्ल आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डॉ. नामवर सिंह ने लाकधर्म का परपरा को एक विचारधारा का रूप दिया है। किसी धर्म में इसे मर्यादा पालन संदर्भ में देखा जाता है,

तो अन्य किसी में लोक विद्रोह के रूप में प्रभुत्वसम्पन्न लोक के लिए लोकधर्म परंपरा, प्रतिष्ठा, नीति-रिवाज तथा अस्पृश्यता का व्यवहार है, जिसके द्वारा वे अपना प्रभुत्व बनाए रख सक।

वहीं दूसरी ओर उत्पीड़न च त्रासद युक्त जीवन को जीने के लिए विवश लोक धर्म, रीति-रिवाज तथा आडंबर की इस परंपरा का विरोध करने के लिए एक प्रतिरोधी संस्कृति के निर्माण के पक्षधर रहे हैं।

लोक कथाओं के माध्यम से ही विभिन्न सामाजिक अधिकारों तथा सुविधाओं जैसे शिक्षा शास्त्र आदि से विपन्न यह समाज अपनी मनोदशा की अभिव्यक्ति करते हुए तथाकथित वरिष्ठ वर्ग को चुनौती देता है।

मुहावरे लोकोक्तियाँ लोक कथाएँ, स्मृतियाँ एवं गोष्ठी इनका पोषण करती हैं। वर्ण व्यवस्था एवं सामाजिक संरचना के द्वारा शोषण-उत्पीड़न की इन मानसिकताओं के विरोध में प्रतिशोध की परंपरा का इतिहास अभी तक नहीं लिखा गया है।

बुद्ध कबीर, जोतिबा फुले तथा डॉ. अंबेडकर जैसे कालजयी समाज सुधारकों एवं संतों ने इस दलित आंदोलन के द्वारा विद्रोह की पृष्ठभूमि रची है।

दलित जनमानस व लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में वर्चस्व के विरुद्ध चेतना का निर्माण करने में सक्षम रहे हैं। समकालीन कहानी से पहले की कहानी का प्रारूप दलित जीवन की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है।

शिक्षा से जागृत प्रेरणा ने दलित साहित्य में कहानी लेखन की शैली का विकास किया है तथा इसे नवीन एवं उच्चतर आयाम प्रदान किए हैं।

अबेडकरवादी विचारधारा ने भूतप्रेत, जादू जैसे आडंबरयुक्त एवं अंधविश्वासपूर्ण कर्मकाडा से दलित लेखन को मुक्त किया है। दलित छवि को धूमिल करती कहावतों, लोकोक्तियों का खंडन दलित विमर्श एवं समतावादी विचारधारा ने किया है।MHD 19 Free Solved Assignment

आधुनिक दलित लेखन की विचारधारा इस विषय में सुस्पष्ट है। इनकी कहानियाँ सवर्ण पुरुषों द्वारा घरा के भीतर अपनी ही स्त्री के शोषण को कथा मुक्तिकामी स्वर में गुंजायमान हैं।

दलित कहानियों को कथावस्तु असमानता र तथा अन्याय की समाप्ति एवं उसके विद्रोह के इर्द-गिर्द घूमत है। दलित कहानियाँ समतापरक समाज का निर्माण करने के उद्देश्य से परिपूर्ण हैं, जिसके लिए इनमें यदा कदा मिथकों को रूपातरित करके चेतना फूंकने का प्रयास भी किया जाता है।

(ग) दलित कहानी के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों को निर्दिष्ट कर सोदाहरण विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- दलित कहानी के सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार दलित साहित्य में पाचना व निरोहता का कोई स्थान नहीं है। यह वेदना को आक्रोश में परिवर्तित करता है।

दलित कहानियाँ धर्म एवं संस्कृति की परंपराओं द्वारा निर्धारित नैतिक मूल्या व मानदंडों को अस्वीकार करती हैं। इन कहानियों में घृणा तथा हिंसा के कृत्यों की अवहेलना की गई है तथा करुणा एवं बंधुत्व के भाव पर बल दिया गया है।

यही आधार दलित कहानी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकार भी है तथा वैचारिक प्रतिबद्धता भी वर्ण व्यवस्था एवं जातिवाद की समाप्ति तथा ईश्वर-भाग्य एवं पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक बातों की अस्वीकृति ही दलित कहानी का मुख्य उद्देश्य है भाग्यवाद से जोड़कर व्यवस्था के नृशस स्वरूप का अनावरण करना दलित कहानियों का दायित्व समझा गया है।

दलित कहानियों से संपूर्ण परिवर्तन की अभिलाषा झलकती है। ये कहानियाँ उम्बल भविष्य दृष्टि का विकल्प प्रस्तुत करती है। बाबासाहेब चेतनामय आंदोलनों में नारा दिया है शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित हो।

यह उद्देश्य दलित कहानियों में सार्थक होता दिखाई देता है। दलित कहानियों का मुख्य उद्देश्य दलितों में चेतना का प्रसार और परिवर्तन की ओर अग्रसर करना “यह अंत नहीं” ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की प्रामाणिक कहानी है। यदृष्टि रखने वाले पर साहित्य के माध्यम से आक्रमण करतो है ।

दुश्मन की बेशर्मा को उसके डर का रूप देती है। रचनाकार ने पंचायती राज व्यवस्था को नाकामी तथा उसके अनुचित कार्यों तथा का आरीको से विश्लेषण किया है।

कहानी में वर्णन किया गया है कि गाँव का विसन दलित है, लेकिन वह अगड़ों और सामंतों का मोहरा बनकर रह गया है।MHD 19 Free Solved Assignment

इस स्थिति में उसकी पत्नी विरमा को न्याय की आशा नहीं है, परन्तु उसकी बाककुशलता ने उम्मीद की रोशनी का प्रसार किया।

सभी ने मिलकर कहा, ‘ना बिरमा यह अंत नहीं है, तुमने हमें ताकत दी है। हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि फिर कोई बिसन मोहरा न बने।’

दलित आत्मकथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने समाज को व्यवस्था के प्रति अपनी सजगता का परिचय देते हुए संरचना तंत्र को हर घड़ी को यथार्थता को समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। डॉ. अंबेडकर ने गाँवों को भारतीय संविधान एवं गणतांत्रिक प्रणाली के विकास में अवरोधक माना था।

उनके विचार में गाँवों में ही पूँजीवादी तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की उत्पत्ति होती है। डॉ. अंबेडकर के शब्दों में, “भारतीय गाँव हिंदू-व्यवस्था के कारखाने हैं।

उनमें ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और पूँजीवाद की साक्षात अवस्थाएँ देखी जा सकती हैं, उनमें स्वतंत्रता समता और बंधु लिए कोई स्थान नहीं है। दलित कहानियाँ जातियांध के परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालती है।

दलित साहित्य का यह विशिष्ट रूप लेखकों का उत्तरदायित्व निश्चित करता है तथा दलित कहानियों के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों को दृढ़ बनाता है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी शवयात्रा से उनकी वैचारिक परिपक्वता का बोध होता है। उन्होंने दलितों के मानस में उठ रहे अन्तर्विरोध तथा अंबेडकरवादी संगठनों के आडंबर का बेबाकी से वर्णन किया है।

दलित कहानी की वैचारिको अतुलनीय है दलित रचनाकारों का वैचारिक कौशल और दलित चेतना का प्रसार दलित साहित्य की अमूल्य निधि है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘मुंबई कांड’ में वैचारिकी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। कहानी का सजग रूप दलितों में विरोध की ।MHD 19 Free Solved Assignment

भावनाओं को उद्धृत करता है। कहानी का पात्र सुमेर मुंबई कांड के विरोध में जूते की माला लेकर उठ खड़ा होता है, परन्तु कदम बढ़ाते ही उसके दिमाग में विचार आता है, ‘अरे मैं बह क्या कर रहा हूँ।

मुंबई में किसी ने मेरे विश्वास पर चोट को और मैं यहाँ किसी की आस्था पर चोट करने जा रहा है।

कुछ गांधी को बापू कहते हैं और अंबेडकर को ‘बाबा’? वहाँ ‘बाबा’ कहने वाले मारे गए, यहाँ बापू वाले मारे जा सकते हैं। ‘बाबा’ कहने वालों भी गाज गिर सकती है। जो भी हो मारे तो निर्दोष हो जाएंगे नहीं यह रास्ता न बुद्ध का है और न ही अबेडकर का।’

दलित कहानियों में हिंदू व्यवस्था का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया गया है। दलित कहानियों की भाषा-शैली तथा स्तर को अनुपयुक्त बताने वालों को अपनी संकीर्ण सोच में परिवर्तन लाने के लिए आत्मावलोकन एवं पुनर्मथन की आवश्यकता है।

दलित कहानों के इतिहास, सरोकार तथा मानवीय पक्षों को समझे बिना दलित कहानी के संवाद भाषाशैली एवं उद्देश्यों को समझना अनुपयुक्त है।

दलित कहानियाँ पाठक के अंतर्मन तक पहुंचने में सक्षम एवं समर्थ हैं। इनमें अस्मिता गौरव व अधिकारों के लिए संघर्ष का विवरण विस्तृत रूप में दिया गया है, जो मानवता के आयामों का बांध कराने में सफल सिद्ध हुआ है। वर्ण आधारित व्यवस्था के चलते मानवता का लोप हो गया था।

दलित कहानियाँ यथास्थितिवाद को अस्वीकार करते हुए अंबेडकरवादी विचारधारा के आधार पर समतापरक समाज निर्माण करके नवीन अखंड भारत का निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस प्रकार दलित कहानियाँ अपनी विशिष्टताओं और सरोकारों के द्वारा परंपरागत साहित्य से अलग दिखाई देती हैं।MHD 19 Free Solved Assignment

इनमें कथावस्तु और विशिष्टता का परिमाप अन्य कहानियों से विस्तृत है। दलित कहानियाँ समाज विभिन्न आक्षेपों को समेटे हुए हैं।

न सिर्फ दलितों के जीवनानुभव, अपितु हाशिए पर जीवन व्यतीत करने के लिए विवश अन्य सामाजिक वर्गों की व्यथा कथा का चित्रण दलित कहानियों में किया गया है।

दलित कहानियों की कथावस्तु में वर्ण व्यवस्था तथा साम्प्रदायिकता के अंतसंबंध, शिक्षण संस्थानों में दलितों के साथ हो रहा भेदभाव, ब्राह्मणवादियों एवं यथास्थितिवादियों का नकार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्रियों के अधिकार ग्रामीण एवं शहरी जीवन में अंतर अन्तर्जातीय द्वन्द्र, संस्कृति एवं इतिहास की पड़ताल तथा ईश्वर-धर्म एवं भाग्यवाद का नकार मुख्य रूप से सामान्यतः हर कहानी में पाए जाते हैं।

दलित कहानियों का मुख्य पहलू परस्पर घृणा एवं हिंसा का भाव छोड़कर प्रेम एवं सहिष्णुता का प्रसार करना है।

दलित कहानियों के सरोकारों को जानने-समझने के लिए आंदोलनकर्ताओं को जीवन समय के यथार्थ को जानना आवश्यक है, इसका विशिष्टता असमानता से परिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को एक समतापरक सामाजिक व्यवस्था में रूपान्तरित करने हेतु निहित है।

(ड) अपने-अपने पिंजरे के संरचनागत वैशिष्ट्य का उद्घाटन कीजिए। दलित आत्मकथनों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? सोदाहरण समझाइए।

उत्तर- आत्मकथन लेखक ने परंपरागत आत्मकथनों से अलग अपने-अपने पिंजरे में खुरदरे और बेलॉस यथार्थ को रोमानी शैली की जगह यथार्थवादी शैली में प्रस्तुत किया है।

अपने जीवन को महान और दूसरे जीवन को क्षुद्र घोनित करेन का यहाँ उद्देश्य नहीं है। भूमिका में विस्तार से परंपरागत आत्मकथनों से अपने-अपने पिंजरे के अलगाव बिन्दुओं को रेखांकित किया गया है।

जहाँ परंपरागत आत्मकथनों प्रायः जीवन के अंतिम दौर में लिखी जाती हैं, वहीं दलित आत्मकथन लेखकों ने अपने जीवन की युवावस्था में आत्मकथन लिखे। MHD 19 Free Solved Assignment

महीप सिंह की टिप्पणी गौरतलब है, आत्मकथन युवा लेखकों द्वारा लिखे गये हैं, जिन्होंने वृत्तों के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया है कि हम आखिर कौन हैं

मोहनदास नैमिशराय की यह कृति इस अर्थ में आत्मकथन है। उन्होंने अपने जीवन की उन तल्ख और निर्मम सच्चाइयों को इसमें उकेरा है, कहना न होगा इनमें मानवीय पीड़ा अपनी पूरी सघनता से व्यक्त हुई है।

विमल थोरात (दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर) प्रायः दलित आत्मकथनों पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें दलित जीवन की पीड़ा के आख्यान की एकरसता है।

इससे अलग ‘अपने-अपने पिंजरे में दलित जीवन के विभिन्न विरोधाभासों को भी रचना संयोजन में समाहित किया गया है।

दलितों के अंतर्विरोध, मसलन अस्पृश्यता, अवसरवाद, स्त्री-उत्पीड़न, सांप्रदायिक-कट्टरता इत्यादि प्रसंगों को समावि-ट करना आत्मकथन लेखक की विस्तृत दृन्टि का प्रमाण है।

माना और शिल्प में सौन्दर्य मानक क्या होंगे इस सवाल पर अपने-अपने पिंजरे’ यथार्थवादी दृष्टि का पक्षधर है। यदि जीवन में कुरूपता है तो रचना कहती है कि कुरूप और भदेस के उद्घाटन में ईमानदारी से कोताही की कोई जरूरत नहीं, ताकि जनतांत्रिक समाज की दिशा में कोई पहल रूपाकार ग्रहण कर सके।

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प्रश्न 4 निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर लगभग 200 शब्दों में लिखिए

(घ) दलित स्त्री आत्मकथा के वैशिष्ट पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- दलित स्त्री आत्मकथा का वैशिष्ट्य दलित आत्मकथनों की चर्चा करते हुए दलित स्त्री आत्मकथना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ये आत्मकचन दलित लेखन एवं चिंतन का एक नया स्वरूप है। ये आत्मकथन दलित साहित्य में हो रहे सतत विकास को इंगित करते हैं। इन आत्मकथनों पर निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से विचार किया जाएगा

(क) दलित स्त्री की जिन्दगी का सच MHD 19 Free Solved Assignment
(ख) दलित स्त्री का प्रतिशोध दलित स्त्री की जिंदगी का सच

सत्यशोधक समाज (IST) के संस्थापक महात्मा ज्योतिबा फुले ने सर्वप्रथम स्त्री शिक्षा का समर्थन किया स्त्रियों की दशा को दर्शाते हुए उन्होंने कहा राख ही जलने का दर्द जानती है। यह कथन दलित स्त्री आत्मकथनों के मूल्यों को सही मायने में समझाता है।

इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए डॉ. अम्बेडकर ने स्त्रियों को सामाजिक परिवर्तन के अभियान से जोड़ा दलित स्त्रियों में भी इस आंदोलन के प्रति जागृति तथा संघर्ष की भावना का प्रसार हुआ। इसी पीढ़ी ने आत्मकथन लिखना आरंभ किया।

मुख्य दलित स्त्री आत्मकथना में राजनंदिन आमा’ (1990) शांताबाई धनजोदानी (19192001), “मिटलेली कवाड’ (1983) मुक्ता गोड (1922-2004). “मान्या जल्माची चित्तर कथा’ (199) शांताबाई कृष्ण काबल-(1928) हिंदी अनुवाद ‘नाजा’ (2009), ‘अतः स्फोट (1989) कुमुद पाई (1988), ‘आययाने’ (2003, कमिला प्रचार (1945) आदि है। हिन्दी में अब तक दोहोआत्मकपन पूर्ण है अभिशाप (1999, कौशल्या मंत्री) तथा ‘शिकर्ज का दर्द (सुशीला टाकभर)।

दलित स्त्री आत्मकथन दलित साहित्य जगत में एक बड़े अभाव को पूरा करते हैं। इन आत्मकथनों के द्वारा दलित आंदोलन का स्तर बढ़ाया जा सकता है। जीवन की वास्तविकताओं को शब्दों डालकर उन्होंने आंदोलन को अधिक सघन बनाया है।

दलित स्त्रियों के जीवन एवं उनकी समस्याएँ अम्बेडकरवादी आंदोलन से दृढ़ता से संबद्ध हैं। भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढाँचे की परंपरा विद्यमान है।

दलित स्त्री आत्मकथनों के प्रकाशन से इस प्रथा के ‘दलित संस्करण पर विमर्श अपेक्षाकृत अधिक जुझारू हुआ है। दलित स्त्रियाँ तीन संतापों से ग्रस्त है-स्त्री होने का दलित होने का तथा गरीब होने का।

गैर-दलित सवर्ण समुदाय के लिए वे तिरस्कृत अथवा उपभोग की सामग्री मात्र हैं। यहाँ तक कि दलित समुदाय भी उन्हें निकृष्ट ही समझता है। दलित स्त्रियों साथ बहुधा अमानवीय व्यवहार देखा जा सकता है।

दलित समुदाय में अनेक घोर स्त्री विरोधी कुरीतियाँ देखो जाती हैं। बेबी काबले ने ‘जीवन हमारा’ में इसी प्रकार की एक छोड़ो प्रथा का उल्लेख किया है, जिसमें आदमी अपना ।

प्रभुत्व साबित करने के लिए स्त्री (बर) को पौटता है। यदि बहू अत्याचारों से तंग आकर अपने मायक चली जाती है, तो उसे पुनः ससुराल लाकर प्रताड़ित किया जाता था।

पाँच किलो वजन की लकड़ी को गोल आकार में कटवाया जाता था तथा उसके बीचोबीच पाँव घुसने जितना छेद बनाया जाता व एक सरिया लगा दिया जाता था।

यह खोड़ा बहू को सौधे पाँव में पहनकर घर का सारा काम करना पड़ता। उसके पाँव जख्मी होत एवं उसमें से खून भी निकलता था।MHD 19 Free Solved Assignment

यूँ तो दलित स्त्रियों को स्वतंत्र करवाने के लिए अनेक राग अलापे गए है परन्तु, दलित स्त्री आत्मकथन इनकी वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

कौशल्या बैसत्री के दोहरा अभिशाप तथा शांताबाई कामले के ‘नाजा में यह वर्णित है कि दलित स्त्री अत्यधिक पीड़ाग्रस्त है एवं उनको अनेक कार्यों में वर्जित रखा जाता है।

कौशल्या बैमंत्री ने अपने आत्मकथन में लिखा है कि उनके पति उच्च शिक्षा प्राप्त लेखक तथा भारत सरकार में उच्च पद पर कार्यरत थे।

वे स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन भी पाते थे। फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी पत्नी का सम्मान नहीं किया तथा प्रतिदिन होने वाले विवाद एवं अपशब्दों के कारण लेखिका को मजबूरी में घर छोड़ना पड़ा।

शांता कांबले तथा सुशीला टाक मौरे आदि अन्य लेखिकाओं को भी इसी प्रकार प्रताड़नाएँ सहन करनी पड़ीं। प्रायः हर उच्च शिक्षित दलित परिवार की वास्तविकता रही है।

दलित स्त्रियों को सुधा (भूख) का भी सामना करना पड़ता है। इसका जीवंत उदाहरण लालू महारिन की आत्मकथा मिलता है।

लालू महारिन को सुधा शांत करने के लिए भुट्टे के खेत में चोरी करके अपना पेट भरना पड़ा. जबकि उसके पास नवजात बारह दिन का बच्चा भी था।

इसी प्रकार का अनुभव रावलीबाई का भी था। अपने आत्मकथन ‘मेरी संस्कृत कथा में कुमुद पावड़े लिखती हैं कि सवर्ण समाज के लोगों ने उनकी पढ़ाई पर बहुधा व्यंग्य कसे है,

साथ ही बहुजन समाज के तथाकथित सुधारक खुद को ब्राह्मण विरोधी कहकर इठलाने वाले महाभागों ने भी उनका मजाक उड़ाया है।’ MHD 19 Free Solved Assignment

(ड)प्रेमचंद तथा दलित कहानिकारों की कहानियों में मुख्य अंतर क्या है। स्पष्ट कीजिए

उत्तर- प्रेमचन्द की पहली और आखिरी कहानी दलित जीवन व चरित्र से संबंधित है। प्रेमचन्द ने ‘मेरी पहली कहानी के रूप में जिस कहानी का वर्णन किया है, वह छात्र जीवन में लिखी गयी एक संस्मरणात्मक कहानी है।

इस कहानी में उनके मामा का चित्रण है, जिनका संबंध एक दलित स्त्री से है। इस कहानी में मामा के पकड़े जाने पर दलित जमकर उनकी पिटाई करते हैं। ‘कफन’ में प्रेमचन्द ने । दलित जीवन की कटु वास्तविकताओं को उजागर करने का प्रयास किया है।

दलित साहित्य मूल रूप यथार्थ और संवेदना का साहित्य है, जिसके माध्यम से लेखकों ने अपनी कहानियों में दलित जीवन के अनुभवों को वास्तविक अर्थों में अभिव्यक्ति प्रदान की है।

दलित कहानियों में शब्दों तथा भाषा का जो चयन किया जाता है, वह दलितों की वास्तविक पीड़ा तथा अनुभव करती । हुई निर्भीकता तथा स्पष्टता के साथ शोषण तथा उत्पीड़न के यथार्थ रूप को उजागर को बयान करने में सक्षम होती है।

प्रेमचन्द की कहानियों में दलित जीवन की त्रासदी तथा पोडा को अभिव्यक्ति तो मिलती है. लेकिन उनमें दलित कहानियों के जैसी मार्मिकता तथा सजीवता के चित्रण का अभाव है,

क्योंकि दलित कहानियों में शब्दों का जो चुनाव होता है, वह भाषा यथार्थवादी तथा बेबसी व छटपटाह को उजागर करने वाली होती है।

प्रेमचन्द की कहानियों में दलित पात्रों को नायक के रूप में प्रस्तुत करके उन्हें व्यवस्था से संघर्ष करते हुए दिखाया जाता है,

जबकि दलित में कहानियों में किसी को नायकत्व प्रदान नहीं किया जाता और इन कहानियों के पात्र वास्तविक जीवन के अनुभवों से जुड़ते हुए अपने आक्रोश तथा संघर्ष को उजागर करते हैं।

दलित कहानिया में ब्राह्मणवादी परंपरा, मनु व्यवस्था जातिगत भेदभाव के प्रति सवर्णों के लिए जो विरोध तथा विद्रोह सामने आता है,MHD 19 Free Solved Assignment

प्रेमचन्द की कहानियों में इसके स्थान पर लेखक पात्रों को आदर्शवाद के व्यूह में फंसाकर उनके विरुद्ध आचरण करने वाले लोगों के हृदय परिवर्तन को विषयवस्तु को दिखाकर आदर्शवाद तथा लोक कल्याणकारी समाज का स्वप्न देखने का प्रयास करने लगता है।

प्रेमचन्द की कहानियों में विषयवस्तु महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद दलित जीवन और उनके अनुभवा को वैसा प्रस्तुत नहीं कर पाई है, जैसा दलित-कहानियों में दलित रचनाकारों ने प्रस्तुत किया है,

क्योंकि सवर्ण लोगों के जिन अत्याचारों तथा पीड़ा को दलित कहानियों में भागे हुए यथार्थ के रूप में दिखाया गया है, वैसा भोगा हुआ अनुभव प्रेमचन्द की कहानियों की विषयवस्तु नहीं बन वाक्य-विन्यास का प्रयोग जैसा दलित कहानियों में किया गया है.

वैसा प्रयोग प्रेमचन्द की कहानियों में नहीं मिलता, क्योंकि इनमें मूलभूत अंतर यह है कि दलित रचनाकार स्वयं दलित होने के नाते जैसे खान-पान, रहन-सहन, आचरण तथा दर्द का अनुभव करते हुए उसे कहानियों में उजागर करता है, वैसी मानसिकता तथा वास्तविकता प्रेमचन्द की कहानियों के वाक्य विन्यासों में नहीं मिल पाती।

परिवेश तथा वातावरण को सृष्टि को लें तो दलित कहानियों में जो परिवेश तथा वातावरण रचनाकारों दर्शाया है उसमें परतंत्रता तथा जीवन को प्रताड़ना तथा पौड़ा का स्वर मुखरित होता है। ऐसी पौड़ा की मुखरता के दर्शन प्रेमचन्द की कहानियों में यदा कदा हो होते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि दलित कहानियों में जीवन के पथार्थ अनुभवों, पौड़ा, प्रताड़ना तथा उत्पीड़न का जैसा वर्णन मिलता है. वैसा वर्णन प्रेमचन्द की कहानियों में नहीं मिल पाता

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