IGNOU MHD 18 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

MHD 18

MHD 18 Free Solved Assignment

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MHD 18 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1 दलित चेतना से क्या अभिप्राय है? इसकी प्रेरणा के स्त्रोत क्या है? सविस्तार उल्लेख करें।

उत्तर- दलित चेतना एक प्रति सांस्कृतिक चेतना है, अपितु यह एक वैकल्पिक चेतना भी है, इसलिए इसमें विद्रोह परिलक्षित होता है। इस चेतना की नींव में भारतीय सामाजिक संरचना है, जो न केवल जाति पर आधारित हैं, अपितु इसे धार्मिक रूप से वैधता प्रदान करती है।

चेतना का संबंध दृष्टि से होता है, जो दलितों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक भूमिका की छवि के मतिभ्रम को तोड़ती है। मानवाधिकारों से वंचित सामाजिक रूप से नकार दिया जाना दलित होना है और उसके अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई अर्थात चेतना ही दलित चेतना है।

भारतीय इतिहास में बुद्ध प्रथम ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने वर्ण व्यवस्था को चुनौती दी और उसे अवैज्ञानिक एवं अमानवीय तक कह डाला।

श्रावस्ती प्रवास के समय सुनित नामक एक हरिजन को अपने संघ में शामिल करके उन्होंने दलितों के उद्धार का वह मार्ग बताया, जो आगे युगों-युगों तक दलित मुक्ति का रास्ता बताता रहा।

भक्तिकाल में दलित संत-कवियों में चेतना की अलख जगाता रहा. जो आधुनिक काल तक आते-आते डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे विशालतम व्यक्तित्व के रूप में और ज्यादा प्रकाशित हुआ।

डॉ. अंबेडकर का युग प्रवर्तक व्यक्तित्व और कृतित्व ही आधुनिक दलित चेतना की प्रबल प्रेरणा है। महाराष्ट्र से प्रारंभ हुए दलित साहित्य आंदोलन पर अंबेडकर के विचार और दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

दलित चेतना और इसकी इसकी मूल प्रेरणा को हिन्दी के प्रसिद्ध दलित लेखक और कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इस प्रकार बताया है कि दलित चेतना एक प्रति-सांस्कृतिक चेतना है, अपितु एक वैकल्पिक चेतना भी है, इसलिए विद्रोही है।MHD 18 Free Solved Assignment

जाति-व्यवस्था सामाजिक दुराव के सिद्धांत पर आधारित है, जो हमारे सामाजिक संबंधों को ही नहीं, अपितु धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक पक्षों को भी प्रभावित करती है।

यह दासता की वह संपूर्ण व्यवस्था है, जो हिन्दू समाज व्यवस्था में शुरू से ही धर्म प्रधान और अर्थ की दृष्टि से गौण रही है ।

संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और सुरक्षा कानूनों के बावजूद दलितों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखने की कोशिश की जाती रही है और इसकी सफलता के लिए हर समय धर्म, परंपरा, संस्कृति का जिक्र करके इसकी निरंतरता के लिए हिंसा, सत्ता और धर्म का सहारा लिया जाता रहा

दलित चेतना का सीधा संबंध ‘मैं कौन हूं’ से व्यापक रूप से जुड़ा हुआ है। चेतना का संबंध दृष्टि से होता है, जो दलितों की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भूमिका की छवि को धूमिल करती है।

अलग-अलग कालखंडों में यह अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। भक्तिकाल के कवियों में इसका रूप अलग है, लेकिन इस चेतना के बीज वहां भी उपस्थित हैं, जो कालांतर में ज्योतिबा फुले के संघर्ष के रूप में एक संघर्षशील, बौद्धिक रूप में दिखाई देता है।

आगे चलकर यह डॉ. अंबेडकर के जीवन संघर्ष में एक नए जुझारू रूप में दिखाई देती है, जो दलितों में एक नई चेतना को जगाता है, जिसे मक्ति संघर्ष की चेतना कहना ज्यादा उचित होगा।

यही चेतना साहित्य की प्रेरणा बनकर दलित साहित्य के रूप में उजागर होती है, जिसमें मुक्ति, आजादी के गंभीर सरोकार निहित हैं।

दलित साहित्य के प्रेरणा स्रोतों के रूपों में महात्मा ज्योतिबा फुले का सुधारवादी दृष्टिकोण और डॉ. अंबेडकर की सामाजिक समानता, हिन्दुत्व का विरोध, आर्थिक विषमता को समाप्त करके समानतापरक दृष्टि तथा सांस्कृतिक समस्या के साथ बौद्ध धर्म, उसका दर्शन और दलित पैंथर्स के रूप में देखा जा सकता है।

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प्रश्न 2 दलित साहित्य आंदोलन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालें।

उत्तर – वैसे तो साहित्य में दलित वर्ग का उदय बौद्ध काल से माना जाता रहा है, लेकिन एक लक्षित मानवाधिकार आंदोलन के रूप में। दलित साहित्य 20वीं शताब्दी की देन माना जाता है।

हिन्दी साहित्य के पुरोधा माने जाने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नामक पुस्तक में साहित्य के सरोकारों को दर्शाने की कोशिश की है।

परन्तु दलित चिंतक ओम प्रकाश बाल्मीकि जब यह कहते हैं कि हिन्दी साहित्य में ढूंढने पर भी हमें अपना चेहरा कहीं दिखाई नहीं देता, तब निश्चित तौर पर कचोटने वाला यह प्रश्न स्थापित साहित्य और समाज को कटघरे में खड़ा करने वाला है।MHD 18 Free Solved Assignment

दलितों की परेशानी, दासता, दु:ख, गरीबी और उपेक्षापूर्ण जीवन का वास्तविक चित्रण करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। कष्ट और आह का उदात्त स्वरूप है दलित साहित्य । अंबेडकर के विचारों से दलितों को अपनी दासता महसूस हुई।

उनकी वेदना को स्वर मिला, क्योंकि मूक समाज को अंबेडकर के रूप में अपना नायक मिल गया। दलितों की यह वेदना ही दलित साहित्य की जन्मदायिनी है।

विमल थोरात के अनुसार दलित साहित्य में विद्रोह और नकार दलितों की वेदना से ही उत्पन्न हुए हैं। ये विद्रोह और नकार अपने ऊपर हिन्दू धर्म द्वारा थोपी गई अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ है।

जिस प्रकार दलित साहित्य में वेदना सामूहिक रूप से व्यक्त होती है, वैसे ही नकार और विद्रोह भी सामाजिक एवं सामूहिक है। जिस विषम व्यवस्था ने दलितों का शोषण किया, उसी व्यवस्था के प्रति यह विद्रोह और नकार है।

इनका स्वर विषम व्यवस्था को नकारते हुए समता और आजादी, न्याय और बंधुत्व की मांग करता है- ‘मैं मनुष्य हूं, मुझे मनुष्य के सभी अधिकार प्राप्त होने चाहिए’ इस बोध से यह विद्रोह उत्पन्न हुआ है।

मराठी लेखक नारायण सुर्वे के अनुसार, दलित साहित्य की अपनी अलग पहचान है। वह पूरी तरह से समाजाभिमुख है। माजिक समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का भाव एवं वर्ण-व्यवस्था का विरोधी स्वर ही उसकी जड़ है तथा उसका प्रमुख लक्ष्य सामाजिक बदलाव है। वर्तमान में दलित साहित्य अखिल भारतीय स्वरूप धारण कर चुका है।

लगभग साहित्य की समस्त विधाओं में दलित साहित्य की अभिव्यक्ति मुखरित हुई है। अस्मिता और आत्मसम्मान के लिए हीनता के भाव को छोड़कर अनेक भाषाओं में दलित आत्मकथाएं अपने वेदनामय जीवन के अनुभवों के आधार पर प्रकट हई हैं।

मराठी में दया पवार की ‘अछत’, शरण कुमार लिंबाले की ‘अक्करमाशा’, मोहनदास नैमिशराय की ‘अपनेअपने पिंजरे’, ओम प्रकाश बाल्मीकि की ‘जूठन’, बेबी कांबले की ‘जीवन हमारा’, सूरजपाल चौहान की ‘तिरस्कृत’ एवं कौसल्या बैसत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ आदि आत्मकथाओं ने हिन्दी क्षेत्र में स्थापित परंपरागत हिन्दी साहित्य के सामने नई चुनौती प्रस्तुत की है। ये आत्मकथाएं हीनता बोध से दलित को बाहर ला रही हैं।

दलित कथा – साहित्य से दलित संवेदना को व्यापक दृष्टि मिल रही है। दलित कहानियां पारंपरिक कथा साहित्य के धरातल और अवधारणाओं को नकारकर मुक्त संसार की रचनाधर्मिता को निर्मित करके उसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ रही हैं।MHD 18 Free Solved Assignment

दलित आत्मकथा लेखन ने साहित्य और समाज को झकझोर कर रख दिया है। इससे साहित्य जगत में भूकम्प-सा आ गया है।

मराठी तथा अन्य अहिंदीभाषी दलित आत्मकथाओं की हिन्दी में सुलभता ने दलित आंदोलन को तीव्रता प्रदान की है। मराठी से अनूदित दलित आत्मकथाओं ने वर्ण-व्यवस्था का भयानक चित्र प्रस्तुत किया है तथा हिन्दू संस्कृति की महानता पर सवाल खड़े किए हैं।

मूलत: मराठी भाषी कौसल्या बैसत्री ने हिन्दी में अपनी पहली दलित आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ लिखी है। इसमें कौसल्या बैसत्री ने जो भी उनके जीवन में उनके परिवार घटा, बिना किसी लाग-लपेट के साधारण भाषा में समाज के सामने प्रस्तुत कर दिया है, साथ ही यह बताने का प्रयास भी किया है कि शोषण करने वाले सिर्फ बाहर से ही नहीं, अपितु अपने भी होते हैं।

लेखिका ने संदेश दिया है कि मक्ति की इच्छा रखने वाले को यह लड़ाई स्वयं लड़नी होगी तथा इसमें डरकर चुपचाप बैठ जाना नहीं, बल्कि दोगुने साहस से, उत्साह के साथ अपनी मंजिल को प्राप्त करने का स्वप्न साकार करना है, तभी दलित आंदोलन, दलित साहित्य और साहित्यकारों की सार्थकता सिद्ध हो सकती वरना सभी कोशिशें बेकार हो जाएंगी।

इस प्रकार से दलित साहित्य का स्वरूप व्यापक होता जा रहा है। विश्व दलित साहित्य सम्मेलनों का । आयोजन तथा विदेशों में उक्त विषय पर अनुसंधान इस बात के साक्ष्य हैं कि दलित साहित्य की प्रासंगिकता किस प्रकार आगे बढ़ रही है।MHD 18 Free Solved Assignment

प्रश्न 3 “सत्यशोधक समाज के गठन की पृष्ठभूमि बताते हुए उसके सिद्धांतों का मूल्यांकन करें।

उत्तर – भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक संरचना एवं उत्पादन प्रणाली र दीर्घकाल तक अपरिवर्तनशील और बनी रही। कार्ल मार्क्स इसे एशिया की उत्पादन प्रणाली कहते हैं।

इस प्रणाली में जाति के आधार पर जजमानी प्रथा की प्रमुख भूमिका थी। बदलाव न होने के कारण इस काल के रेखीय विकास और इतिहास बोध का रूप धीमा रहा।

ज्योतिबा फुले ने इन अभावों के मध्य कार्य करने का संकल्प लिया। उनका उद्देश्य शूद्रों और अतिशद्रों में चेतना जगाना था।

इसके लिए उन्होंने शिक्षा पर बल दिया। इस चेतना का प्रमुख प्रयोजन उनकी वर्तमान अवस्था – दासता और पतन का परिवर्तन करना था ।

ऐतिहासिक दृष्टि ने उनकी समाज संबंधी सोच को विकसित किया और इस समाज को परिवर्तित करने के संकल्प से सत्यशोधक आंदोलन का उदय हुआ।

ज्योतिबा फुले सिर्फ प्राचीन काल के ब्राह्मण और उनकी जाति प्रथा तक ही सीमित नहीं रहे, अपितु उन्होंने अन्य शक्तियों पर भी अपने सम्यक विचार प्रस्तुत किए।

इनमें बौद्ध और इस्लाम धर्मों का भारत में प्रभाव दिखाई दिया। ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मण धर्म के कर्मकाण्ड की अपेक्षा बौद्ध धर्म की करुणा, प्रेम और सादगी की प्रशंसा की।

इन समस्त गुणों की वजह से यह धर्म सामान्य जनमानस के मध्य अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। ज्योतिबा फुले कहते हैं कि बाद में आर्य ब्राह्मणों की अगुवाई करने वाले शंकराचार्य ने बौद्धधर्मी सज्जन और सदाचारी लोगों का तरह-तरह से दुष्प्रचार करके उन्हें देश में प्रभावहीन करने की कोशिश की।

सामाजिक भेद के मर्म को सहन करने वाले ज्योतिबा फुले को सत्य या ईश्वर के स्तर पर भी कोई भेद स्वीकार नहीं था। वे कथनी नहीं, करनी पर बल देते थे और व्यवहार को महत्त्वपूर्ण मानते थे ।

वेदांत के खिलाफ ज्योतिबा फले एक ऐसे धर्म के आकांक्षी थे, जिसमें समानता का सशक्त आश्वासन हो। सार्वजनिक सत्य धर्म वे सृष्टि के निर्माता ‘निर्मीक’ को मानते हैं। सृष्टिकर्ता को वे निर्मीक अर्थात निर्माणकर्ता नाम से पुकारते हैं। उनका मानना था –MHD 18 Free Solved Assignment

(1. निर्मीक नाम का स्मरण करना, अपने कर्मों का पालन करना और दूसरों के हित के लिए सदैव तैयार रहना ही उसके प्रति सच्ची भक्ति है।

(2. निर्मीक की सष्टि के संसाधनों का सम्यक उपयोग करते हुए जीवन निर्वाह करना तथा अपने सुख और स्वार्थ के लिए दूसरों का अहित न करना ही पुण्य है।

(3. इस सृष्टि का निर्माता निर्मीक है। उसने ही आकाश, तारामंडल, ग्रह, महासागर, दिशाओं और धरती सहित अनेक तत्त्वों को बनाया है।

(4. ब्राह्मण धर्मग्रंथों बताए गए नियम और कर्मकांड निराधार हैं। महत्त्वपूर्ण सिर्फ व्यक्ति का व्यवहार है, न कि पूजा-पाठ और व्रत-उपवास।

(5. अपना कल्याण करने के लिए छुआछूत पैदा रकना, ऊँच-नीच का भेद करना तथा लोगों पर जुल्म करना पाप है।

फुले ने सत्य आचरण के 33 नियमों का प्रतिपादन किया, जिनमें से प्रमुख हैं

(1. निर्माणकर्ता ने सभी जीवों व प्राणियों को उत्पन्न किया है, जिनमें नर व नारी दोनों जन्म से ही स्वतंत्र हैं। ये सभी अधिकारों का उपभोग कर सकते हैं। ऐसा मानने वाला सत्य आचरण करने वाला कहलाएगा।

(2. सत्य आचरण करने वाला नर हो या नारी, वह निर्माणकर्ता के अतिरिक्त किसी अन्य की आराधना न करता हो, उसे सत्य आचरण करने वाला कहना चाहिए।

(3. निर्माता ने नर-नारियों को समान अधिकार दिए हैं। उसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर जोर जबरदस्ती नहीं कर सकता। ऐसा न करने वाला सत्य आचरण करने वाला कहा जाएगा। )

(4. नर हो या नारी, कोई व्यवसाय किए बिना ही व्यर्थ ही धार्मिकता का पाखण्ड न करके अज्ञानी लोगों को नवग्रहों का भय दिखाकर उनको नहीं लूटता, वह सत्य आचरण करने वाला होना चाहिए।

इसी प्रकार से आचरण के कुल 33 नियम हैं, जो सत्य धर्म की नैतिकता का आधार हैं। इनके अतिरिक्त सत्य धर्म में जन्म व मरण के समय के विधानों का प्रावधान किया गया है।

ज्योतिबा फुले ने जाति की दासता को नारी की दासता के समान माना। उन्होंने नारी दासता की प्रखर विरोधी रमाबाई का उस समय समर्थन किया, जब उन्होंने जाति की दासता वाले हिन्दू धर्म की आलोचना की।

ज्योतिबा फुले ने स्त्री को पुरुष के बराबर जन्म से ही प्रतिष्ठा और आजादी की दृष्टि से समान माना। उनकी सोच के अनुसार निर्मीक ने सृष्टि निर्माण किया, तो स्त्री-पुरुष को भी बनाया, लेकिन उनमें अंतर नहीं किया। यह अंतर ब्राह्मणों ने अपने ग्रंथों में लिखकर फैलाया है।MHD 18 Free Solved Assignment

ज्योतिबा फुले ने सार्वजनिक सत्य धर्म में इन ग्रंथों के खिलाफ साफ कहा है कि नारी-पुरुष दोनों समान रूप से मानवाधिकारों का उपभोग करने के अधिकारी हैं, तथापि स्त्री के लिए एक अलग प्रकार का सिद्धांत और अहंकारी व्यक्तियों के लिए दूसरे प्रकार का सिद्धांत,व्यवहार में लाना भेदभाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

उनके अनुसार ये अधिकार शिक्षा से ही प्राप्त हो सकते हैं। शिक्षा से चेतना विकसित होती है और एक सचेत व्यक्ति अपने अधिकार किसी से भीख में नहीं मांगता, अपितु उन्हें प्राप्त करता है। ज्योतिबा फुले ने नारियों की शिक्षा पर बल दिया।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने नारी के लिए सुधार नहीं आजादी की वकालत की और यही बात उनको 19वीं शताब्दी के समस्त समीक्षकों से अलग करती है।

नारी की आजादी कोई नारा नहीं, अपितु ज्योतिबा फुले के चिंतन का एक मूल्य है। उन्होंने ब्राह्मण कर्मकाण्डों से स्वतंत्रता के लिए सत्यशोधक विवाहों की शुरुआत की।

ज्योतिबा फुले ने सामाजिक क्रांति में शिक्षा को अपना प्रमुख साधन माना। सत्यशोधक समाज ने शूदों अतिशूद्रों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया। ज्योतिबा फुले ने लोगों में शिक्षा की चेतना जगाने के लिए स्वयं पढ़ाया, स्कूल खोले, अखबार निकाले और पुस्तकें लिखीं।

यही वह समस्या थी, जिसको ब्राह्मणों ने ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आंदोलन के समक्ष खड़ा कर दिया था, तब उन्होंने सरकार से शूद्रोंअतिशूद्रों को शिक्षा दिलवाने के लिए इन दो आधारों पर बहस की

1) कानून के राज में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार सभी जातियों के लोगों को है।

2) कृषक – श्रमिकों के श्रम से उत्पन्न प्रशासनिक संपत्ति से मात्र ब्राह्मणों को शिक्षा क्यों? सभी जातियों के लोगों को शिक्षा क्यों नहीं? सत्यशोधक आंदोलन ने शिक्षा ही नहीं, खेती और विशेष रूप से किसानों की दशा पर भी अत्यधिक प्रभाव डाला।MHD 18 Free Solved Assignment

1875 में पूना के किसान साहकारों के अत्याचारों से त्रस्त थे। जब किसान ऋण की अदायगी करने में असमर्थ होते, तो साहूकार उनका खेत हड़प जाता था। ऐसे हालात में सत्यशोधक समाज ने ज्योतिबा फुले के नेतृत्व में इस क्षेत्र में संघर्ष किया।

किसानों ने साहूकारों और ब्राह्मणों का बहिष्कार कर दिया। परिणामस्वरूप सरकार ने किसानों को राहत देते हुए 1878 में ‘डक्कन एग्रीकल्चर रिलीफ एक्ट’ पारित किया।

इस दौरान ज्योतिबा फुले ने कृषक जीवन का सूक्षमतापूर्वक मूल्यांकन किया। 1878 में उन्होंने ‘किसानों का कोड़ा’ नामक पुस्तक लिखी |

ज्योतिबा फुले ने शूद्रों-अतिशूद्रों को ब्राह्मणों की दासता से आजाद कराने के लिए जिस सत्यशोधक धर्म को विकसित किया था, उसमें जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी संस्कारों के लिए नियम बनाए गए।

इसकी प्रेरणा पाकर शूद्रों ने सत्यशोधक विवाहों का आयोजन किया। इसमें ब्राह्मणों के बिना साधारण तरीके से ज्योतिबा फुले के विचारों के अनुसार विवाह संपन्न हो जाते थे।

इससे घबराकर ब्राह्मणों ने प्रसिद्ध समाज-सुधारक न्यायमूर्ति रानाडे की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया।

न्यायमूर्ति रानाडे ने फैसला ब्राह्मणों के पक्ष में किया, किन्तु न्याय नहीं किया। इस निर्णय के पश्चात ज्योतिबा फुले ने जो आंदोलन चलाया, उसने महाराष्ट्र में शूद्रों-अतिशूद्रों की सोच को बदलकर रख दिया। इस नई सोच के कारण समाज के प्रत्येक भाग में बदलाव की लहर दौड़ गई।

प्रश्न 4 भारतीय जाति व्यवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए डॉ. आंबेडकर के विचारों का मूल्यांकन करें।

उत्तर- डॉ. आंबेडकर के अनुसार हर समाज का वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे साँचों में फ़िट हो जाता है कि एक-दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं।MHD 18 Free Solved Assignment

यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त्म किए बिना कोई तरक़्क़ी नहीं हो सकती। सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह। हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बँटा हुआ था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ।

यह वर्गीकरण मूल रूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था। एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हज़ारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक-दूसरे वर्ग में आने-जाने की रीति ख़त्म हो गई।

और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा।

अगर आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जाए और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएँ तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा। और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा।

अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योतिराव फुले, डॉ. राममनोहर लोहिया और डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा।

डॉ० भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने समाज में पिछड़ों, मूलनिवास और शोषितों की मूकता को आवाज दी।

बचपन से ही डॉ० अम्बेडकर ने जातिवाद की आड़ में फैलाए जा रहे जहर को महसूस किया और उस जहर को समाज से उखाड़ फेंकने की सोची। MHD 18 Free Solved Assignment

एक ऐसे समय में जब मूलनिवासी को देखते ही लोग अपवित्र हो जाने के भय से रास्ता बदल लेते थे, डॉ अम्बेडकर ने उस दौरान बैरिस्टरी पास कर तमाम आयोगों के सामने मूलनिवासी वर्ग का प्रतिनिधित्व किया।

वे गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि मूलनिवासी की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया।

उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि- “सिर्फ अछत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्गों के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा?

क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाडू नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं,

लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना।

जिस प्रकार कोई राष्ट्र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूंदों से” किसी की प्यास बुझ सकती है।”

वस्तुतः डॉ अम्बेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जाति व्यवस्था ही भारत में सभी कुरीतियों की जड़ है एवं बिना इसके उन्मूलन के देश और समाज का सतत् विकास सम्भव नहीं।

यही कारण था कि जहाँ मूलनिवासी के उद्धार का दम्भ भरने वाले तमाम लोगों का प्रथम एजेण्डा औपनिवेशिक साम्राज्यशाही के खिलाफ युद्ध रहा और उनकी मान्यता थी कि स्वतंत्रता पश्चात कानून बनाकर न केवल छुआछूत को खत्म किया जा सकता है MHD 18 Free Solved Assignment

अपितु मूलनिवासी को कानूनी तौर पर अधिकार देकर उन्हें आगे भी बढ़ाया जा सकता है पर डॉ० अम्बेडकर इन सवर्ण नेताओं की बातों पर विश्वास नहीं करते थे वरन मूलनिवासी का सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में तत्काल समचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे।

उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही वर्ष 1919 के अधिनियम में पहली बार मूलनिवासी जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारते हुये गर्वनर जनरल द्वारा केन्द्रीय धारा सभा के नामित 14 नॉन-ऑफिशियल सदस्यों में एक मूलनिवासी के नाम का भी समावेश किया गया।

इसी प्रकार सेन्ट्रल प्रॉविन्सेंज से प्रान्तीय सभाओं में भी चार मूलनिवासी को प्रतिनिधित्व दिया गया। इसे डॉ० अम्बेडकर की प्रथम जीत माना जा सकता है।

डॉ० अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि व्यापक अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा तभी सम्भव है जब ब्राह्मणवाद का खात्मा कर दिया जाय, क्योंकि ब्राह्मणवाद की आड़ में ही लोकतांत्रिक मूल्यों-समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का गला घोंटा जा रहा है।

अपने एक लेख ‘हिन्दू एण्ड वाण्ट ऑफ पब्लिक कांसस’ में डॉ अमबेडकर लिखते हैं कि दूसरे देशों में जाति की वयवसथा सामाजिक और आर्थिक कसौटियों पर टिकी हुई है।

गुलामी और दमन को धार्मिक आधार नहीं प्रदान किया गया है, किन्तु हिन्दू धर्म में छुआछूत के रूप में उत्पन्न गुलामी को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है।

ऐसे में गुलामी खत्म भी हो जाये तो छुआछूत नहीं खत्म होगा। यह तभी खत्म होगा जब समग्र हिन्द्र सामाजिक व्यवस्था विश्लेषकर जाति व्यवस्था को भस्म कर दिया जाये। प्रत्येक संस्था को कोई-न-कोई धार्मिक स्वीकृति मिली हई है और इस प्रकार वह एक पवित्र व्यवस्था बन जाती है।

यह स्थापित व्यवस्था मात्र इसलिए चल रही है क्योंकि उसे सवर्ण अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है। उनका सिद्धान्त सभी को समान न्याय का वितरण नहीं है अपितु स्थापित ।

मान्यता के अनुसार न्याय वितरण है।” यही कारण था कि 1935 में नासिक में आयोजित एक सम्मलेन में डॉ0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग देने की घोषणा कर दी।

अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का निकट से अध्ययन करने के पश्चात हिन्दू धर्म में उनकी आस्था समाप्त हो गई। MHD 18 Free Solved Assignment

वह धर्म, जो अपने में आस्था रखने वाले दो व्यक्तियों में भेदभाव करे तथा अपने करोड़ों समर्थकों को कुत्ते और अपराधी से बद्तर समझे, अपने ही अनुयायियों को घृणित जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर करे, वह धर्म नहीं है।

धर्म तो आध्यात्मिक शक्ति है जो व्यक्ति और काल से ऊपर उठकर निरन्तर भाव से सभी पर, सभी नस्लों और देशों में शाश्वत रूप से एक जैसा रमा रहे।

धर्म नियमों पर नहीं, वरन् सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिये।” यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि डॉ० अम्बेडकर ने आखिर बौद्ध धर्म ही क्यों चुना? वस्तुतः यह एक विवादित तथ्य भी रहा है कि क्या जीवन के लिए धर्म जरूरी है?

डॉ० अम्बेडकर ने धर्म को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था। उनका मानना था कि धर्म का तात्त्विक आधार जो भी हो, नैतिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार ही उसकी सही नींव होते हैं।

यद्यपि बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म में भी सम्भावनाओं को टटोला पर अन्ततः उन्होंने बौद्ध धर्म को ही अपनाया क्योंकि यह एक ऐसा धर्म है जो मानव को मानव के रूप में देखता है किसी जाति के खाँचे में नहीं।

एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित है न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अन्धविश्वास पर डॉ० अम्बेडकर बौद्ध धर्म के आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और मूलनिवासी व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे।

स्वयं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं०. जवाहरलाल नेहरू ने डॉ० अम्बेडकर के निधन पश्चात उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि -“डॉ0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया।MHD 18 Free Solved Assignment

वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।”

यहाँ पर उपरोक्त सभी बातों को दर्शाने का तात्पर्य मात्र इतना है कि डॉ० अम्बेडकर समाज की रूढ़िवादी विचारधारा एवं ब्राह्मणवाद को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाये और उनके विचार पुंज भी कहीं ब्राह्मणवादी व्यवस्था का समर्थन करते नजर नहीं आते।

यही कारण था कि डॉ० अम्बेडकर के निधन पश्चात ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पक्षधर नेताओं, विचारकों, साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जानबूझकर उन्हें इस कदर भुला दिया कि जैसे वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे।

इसके विपरीत द्विजवादी नेतृत्व को बढ़ा-चढ़ाकर उभारा गया, जैसे वे ईश्वर के अवतार हों। यह द्विजवादियों की मानसिक बेईमानी ही कही जायेगी।

कुछ लोगों ने तो डॉ० अम्बेडकर के साहित्य को न्यायालय में घसीटकर उसे प्रतिबंधित कराने का प्रयास भी किया।

इन सब के पीछे मानसिकता यही रही कि डॉ० अम्बेडकर को भुला दिया जाय। द्विजवादियों की यह पुरानी मानसिकता है कि गाँधीवाद को जरूरत अम्बेडकर को भुला दिया जाय।

द्विजवादियों की यह पुरानी मानसिकता है कि गाँधीवाद को जरूरत से ज्यादा फैलाव मिले जबकि अम्बेडकरवाद को जरूरत से ज्यादा कतर दिया जाए।

मण्डल को दबाने के लिये कमण्डल (मंदिर) मुद्दा जरूरत से ज्यादा उछाल दो, जिससे कि ब्राह्मणवादियों का निहित स्वार्थ सुरक्षित रहे।MHD 18 Free Solved Assignment

यही नहीं स्वतन्त्रता पश्चात तमाम लोगों ने डॉ अम्बेडकर पर किताबें लिखकर, लेख लिखकर और विभिन्न विचार गोष्ठियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि डॉ० अम्बेडकर एक सामान्य व्यक्ति थे और अंग्रेजों ने उनको बरगलाकर गाँधी जी के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया था।

यही नहीं संविधान निर्माण में भी उनकी भूमिका को महत्वहीन घोषित करने का प्रयास किया जाता रहा पर 1990 दशक की राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया।

राजनैतिक क्षितिज पर अपने विचारों के साथ तेजी से उभरती बहुजन समाज पार्टी और भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती की मुख्यमंत्री रूप में ताजपोशी ने मानो मूलनिवासी में चेतना की ज्वाला पैदा कर दी हो।

कल तक बूथों पर मूलनिवासी के नाम पर लाठियों की बदौलत, फर्जी वोट डालने वाले रंगबाजों का जलवा अचानक दरकता नजर आया।

बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों पर नीली झण्डयों के बीच मूलनिवासी पुरुष और महिलायें बूथों तथा बसपा की रैलियों में ऐसे नजर आते मानो किसी त्यौहार में भाग लेने जा रहे हों।

यह एक दिन उत्तर प्रदेश जैसे सामन्तवादी राज्य में ऐसा होता है जिस दिन कोई मूलनिवासी किसी की मजदूरी नहीं करता, किसी के खेत पर नहीं जाता।

प्रतीकात्मक रूप में इस चीज का बहुत महत्व है और इसे समाज के तथाकथित ब्राह्मणवादियों ने भी गहराई से महसूस किया। ऐसा नहीं है कि इसकी काट के लिए प्रयास नहीं किये गए।

अयोध्या में राम मन्दिर की आड़ में लोगों की भावनाएँ भड़काकर भाजपा द्वारा यह दर्शाया गया कि या तो आप हिन्दू हो सकते हैं या मुसलमान पर वे यह भूल जाते हैं कि यह उसी राम की बात हो रही है, जिनके रामराज्य के बारे में तुलसीदास ने लिखा है कि- ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी ॥

प्रश्न 5.अछूतानन्द के सामाजिक सुधार आंदोलन पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- स्वामी अछूतानंद आरंभ से ही अन्तर्मुखी और उन्नतिशील विचारों के व्यक्ति थे। धर्मअध्यात्म में उनकी गहन रुचि थी। उनके इस व्यक्तित्व के निर्माण का श्रेय कबीर पंथ को जाता है, जिसका ज्ञान उन्हें श्री मथुरा प्रसाद से प्राप्त हुआ था।MHD 18 Free Solved Assignment

वे अंग्रेजी सेना में सेवारत थे तथा कबीर पंथ के विचारों से प्रभावित थे। स्वामी अछूतानंद उत्तर भारत में दलित मुक्ति आंदोलन के प्रमुख नेता माने जाते थे। उनका संपूर्ण जीवन दलित एवं अछूतों के उद्धार के लिए समर्पित रहा।

स्वामी अछूतानंद प्रारंभ से ही साधु-सत्संगों में भाग लेने लगे थे। उस समय आर्य समाज का प्रचार बड़ी । तीव्रता से हो रहा था, तब वे आर्य समाज के सम्पर्क में आए तथा मूर्ति पूजा, देवी-देवताओं में आस्था, अंधविश्वास और अस्पृश्यता विरोधी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने आर्य समाज अपना लिया।

उनमें एक अच्छे वक्ता के गुण देखते हुए आर्य समाज ने उन्हें दलित वर्गों का प्रचारक बना दिया। अब अछूतानंद को हरिहरानंद के नाम से जाना जाने लगा।

परंतु कुछ दिन बाद उनकी आर्य समाज के प्रति रुचि समाप्त हो गई, उन्हें एहसास हुआ कि आर्य समाज के कार्यकर्ताओं की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है।

आर्य समाजी स्कूलों में सभी जातियों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है, लेकिन इन स्कूलों में सवर्ण जातियों के बच्चों को टाट की पट्टियों पर और दलित बच्चों को जमीन पर बैठाया जाता

स्वामी अछूतानंद ने 1892 में आर्य समाज छोड़ दिया और ‘अछूत महासभा’ का गठन करके दलितों में 10 चेतना जगानी शुरू की। उन्होंने शद्रों एवं दलितों में चेतना जगाते समय आर्य समाजियों के विचारों का खण्डन किया।

स्वामी अछूतानंद ने कहा कि अनार्य लोग ही भारत के मूल निवासी हैं, जिन्हें आर्य हिन्दुओं ने पराजित करके अछूत घोषित किया है। इसलिए अछूत एवं शूद्रों को अपनी दासता से मुक होना होगा। दासता से मुक्ति के लिए सामाजिक चेतना एवं मानसिक परिवर्तन आवश्यक है।

इस महासभा के माध्यम से स्वामी अछूतानंद ने अछूतों के उद्धार के लिए आंदोलन चलाया। उन्होंने ब्रिटिश शासन से अछूतों के राजनैतिक एवं सामाजिक अधिकारों की मांग की।

1991 में जब ‘मांटेग्यूचेम्सफोर्ड एक्ट’ बना था, उस समय स्वामी अछतानंद ने यह अधिनियम बनने से पूर्व ही अछतों के विषय में एक मेमोरेण्डम प्रस्तुत किया था। इसमें अछुतों के लिए अलग शिक्षा, निर्वाचन और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की गई थी।MHD 18 Free Solved Assignment

1922 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत दौरे पर आए, तब दिल्ली में अखिल भारतीय अछूत महासभा’ द्वारा ‘अखिल भारतीय अछूत सम्मेलन’ आयोजित किया गया, जिसमें प्रिंस ऑफ वेल्स को मुख्य अतिथि बनाया गया।

प्रिंस ऑफ वेल्स के समक्ष स्वामी अछूतानंद ने एक ज्ञापन प्रस्तुत करके कुछ मांगें रखीं, जो सामाजिक मक्ति का आधार थीं।

1922 में स्वामी अछूतानंद ने ‘आदि हिन्दू सभा’ की स्थापना की तथा विद्यालय एवं पुस्तकालय खोलकर इसी सभा के माध्यम से ‘आदि हिन्दू आंदोलन’ चलाया, जिसने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई।

प्रमुख रूप से यह आंदोलन समतामूलक समाज की संकल्पना पर आधारित था और अछूतों के मध्य राजनैतिक व सामाजिक जागृति के रूप में प्रकट हुआ।

स्वामी अछूतानंद ने 1924 में आदि हिन्दू आंदोलन का प्रधान कार्यालय कानपुर में स्थापित किया। 1925 में ‘आदि हिन्दू मासिक पत्र का प्रकाशन व संपादन शुरू हुआ।

उन्होंने इस पत्र के माध्यम से अछतों पर हो रहे अत्याचारों को प्रकाशित किया और ब्राह्मणवाद एवं सामंतवाद के विरुद्ध आवाज उठाई। 1927 में स्वामी अछूतानंद ने ‘आदि हिन्दू सम्मेलन’ के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से अछूतों के लिए स्वराज की मांग की।

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प्रश्न 6.हीरा डोम की अछूत की शिकायत कविता में अभिव्यक्त दलित चेतना के पहलुओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-कवि ने ‘अछूत की शिकायत’ कविता में दलित चेतना के मुद्दों को बड़ी ही निर्भयता से प्रस्तुत किया है। कवि डोम ने इस संपूर्ण कविता में समाज व्यवस्था, जाति संरचना, धार्मिक प्रभुत्व, सामंती अन्याय व दलितों को अस्पृश्य मानकर बहिष्कृत प्रकट किए जाने की मानसिकता को उजागर किया है।

वे ईश्वर अर्थात भगवान को कटघरे में खड़ा करते हैं। लगभग 100 वर्ष पूर्व इस प्रकार के मुद्दे ‘अछूत की शिकायत’ कविता में 20वीं शताब्दी के शुरुआती समय की समाज व्यवस्था का वर्णन किया गया है।

कवि कविता के प्रारंभिक के बंध में ‘हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी, हमनी के सहेबे से मिनती सुनाइबि’ इसको वर्तमान न्यायिक भाषा में कह सकते हैं कि दलित समूह सरकार के समक्ष अपनी याचिका प्रस्तुत कर रहा है।MHD 18 Free Solved Assignment

कवि ने ‘सहेबे’ के साथ ‘अपना’ शब्द नहीं जोड़ा है, इसलिए ‘सहेबे’ को ईश्वर के अर्थ में प्रयोग नहीं कर सकते।

कवि ‘सहेबे’ से तात्पर्य अंग्रेजी सरकार से है। कवि अंग्रेजी सरकार को यह बताना चाह रहा है कि इस देश के अछूत रात-दिन कैसे-कैसे दुख भोगते हैं, परंतु यह दुख ईश्वर नहीं देख रहा है। आगे की पंक्तियों में कवि ने भाग्यवाद और नियतिवाद को पर प्रहार किया है।

समाज में सवर्ण दबंग लोग दलितों के नाम बिगाड़कर संबोधित करते हैं, इसकी प्रतिक्रिया में कलि डोम ने भी भगवान को ‘भगवनओं’ कहकर उसके प्रति नफरत और उपेक्षा व्यक्त की है। कवि डोम करना जाता है कि तालीम वर्ग का है तो लिनों का शो करते हैं।

पादरी साहब की कचहरी में जाते हैं, तो वहां उन्हें धर्मान्तरण के लिए कहा जाता है। कचहरी के इस प्रसंग से दलित व्यथित हो जाता है। कवि ने इन अवस्थाओं में उत्पन्न सामाजिक अंतर्विरोध और संघर्ष की दशाओं का वर्णन किया है।

कवि को इस प्रकार के लोभ-लालच अर्थात पादरी की कचहरी में धर्मान्तरण के प्रसंग से कष्ट होता है। कवि एक ओर दलितों की मुक्ति की कामना करता है, वहीं दूसरी ओर पादरी के कचहरी में जाने पर धर्म भ्रष्ट होने से व्यथित होता है।

यहां स्पष्ट है कि कवि की चेतना में एक तरफ दलित मुक्ति की इच्छा है और दूसरी तरफ अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का लालच भी। इस अंतद्वंद्व को कवि ने बड़े ही स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है।

कविता की आगे की पंक्तियों में कवि ने इस सामाजिक वास्तविकता से परिचय कराया है कि सवर्ण हिन्दू दलितों को अछूत मानते हैं व उनका शोषण करते हैं, जबकि हिन्दुओं के ईश्वर के लिए सवर्ण हो या दलित- सभी समान होने चाहिए।

अतः आगे के बंध में कवि ने ईश्वर को ही कटघरे में खड़ा करते हुए प्रश्न किया है कि जिन्हें रक्षक और दयालु माना जाता है, उस भगवान ने खंभा फाड़कर प्रहलाद को बचाया। गजराज की पुकार सुनकर उसे मगरमच्छ के मुंह से बचाया।

दुर्योधन जब द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था, तब प्रकट होकर उन्होंने द्रौपदी के लिए वस्त्र को बढ़ा दिया। राम ने विभीषण को शरण दी और रावण का वध किया। MHD 18 Free Solved Assignment

कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अब वह भगवान कहां सो गया और हमारी पुकार क्यों नहीं सुनता? क्या मुझे ‘डोम’ समझकर छने से भयभीत हो रहे हो?

यहां कवि यह कहना चाहता है कि भगवान भी अस्पृश्यता का व्यवहार करता है, क्योंकि भगवान जिन लोगों की पुकार सुनकर दौड़े-दौड़े आए, उनमें से कोई भी अस्पृश्य नहीं था, फिर भगवान किसी अस्पृश्य की पुकार क्यों नहीं सुनता ? कवि कहता है कि डोम केवल अछूत ही नहीं, शोषित भी हैं।

वे केवल अछूत होते, तो कोई बात नहीं थी, पर दुर्भाग्य यह है कि उनका आर्थिक रूप से शोषण भी होता है। कवि न भाग्यवादी है और न ही नियतिवादी । वह दलित समूह के दुःखों के लिए भगवान की सत्ता तक को चुनौती देते हैं।

उनका रचनाकार बहुत ज्यादा भावुक है, लेकिन उसका बौद्धिक विमर्श अत्यंत तार्किक है। उनके इस कथन के प्रयुत्तर में कोई तर्क ही नहीं है कि प्रहलाद और द्रौपदी की रक्षा करने वाला भगवान दलितों की पुकार क्यों नहीं सुनता?

कवि कहना चाहता है कि जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हैं व उच्च श्रेणी में आते हैं, नैतिकता के स्तर पर उनके कार्य एवं व्यवहार गलत हैं।

पैसे के बल पर जिनका सामाजिक स्थान दलितों से श्रेष्ठ माना जाता है, वे ईमानदारी से मेहनत नहीं करते। यह लोग दलित मजदूरों को झूठे आरोपों एवं मुकदमों में फंसाकर जेल भिजवाने में दक्ष रहे हैं।

कवि ने मनुष्य की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए श्रम को प्रमुखता दी है। हम समाज में भाईचारा एवं साहचर्य होने की आकांक्षा रखते हैं, जबकि यहां का सामाजिक वास्तविकता पूर्णतः इसके विपरीत है।

यहां कवि कविता की अंतिम पंक्तियों में सामाजिक विषमता से युक्त वर्तमान व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न अंकित करते हुए कहता है कि जो हाड़-मांस का शरीर हम मेहनती मजदूरों का है,

वही शरीर ब्राह्मणों का भी है, किंत सामाजिक जीवन में ब्राह्मणों को ही श्रेष्ठ माना जाता है। ब्राह्मणों की तो घर-घर पूजा होती है तथा संपूर्ण क्षेत्र में उनकी जजमानी चलती है।

किंतु दलितों को सार्वजनिक कुएं से पानी लेने की इजाजत भी नहीं है, उन्हें कीचड वाले गंदे तालाब का पानी पीना पड़ता है। इन सबके बावजूद भी सवर्ण लोग दलितों को मारते-पीटते हैं। अन्ततः दलितों को ही इतना कष्ट क्यों दिया जाता है?MHD 18 Free Solved Assignment

कवि सामाजिक जीवन के अंतर्विरोध व दलितों के साथ होने वाले छुआछूत के व्यवहार को बड़ी ही स्पष्टता से प्रस्तुत करता है। कवि समझ ही नहीं पाता कि यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है, जिसकी आर्थिक विषमताएं तो ज्ञात होती हैं,

लेकिन समाज ऊँच-नीच की क्रूर असमानता पर क्यों प्रतिष्ठित है। कवि अपने अनुभवों के आधार पर समाज जीवन के यथार्थ से परिचित कराता हैं। वह तुलनात्मक एवं तार्किक पद्धति से मानवता का वर्णन करता है।

यदि कोई दलित सार्वजनिक कुएं या तालाब से पानी लेने का प्रयास करता है, तो उस पर सवर्ण जातियों एवं प्रभुत्वशाली वर्गों द्वारा प्रहार किए जाते हैं। सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं को वैज्ञानिक आधार पर निरस्त करने के बावजूद भी उनको दोषी माना जाता है।

सामाजिक विधान बताकर उन्हें मार दिया जाता है। इस प्रकार कवि ने सामाजिक जीवन में श्रमिक दलितों पर होने वाले अत्याचार, भेदभाव और शोषण के मुद्दों को प्रकट किया है।

प्रश्न 8 हिंदू कोड बिल’ वास्तविक रूप में भारतीय हिंदू स्त्री के लिए प्रगत भविष्य लाने वाला संवैधानिक कानून है। इस तथ्य की विवेचना कीजिए।

उत्तर- डॉ. अंबेडकर ने हिन्दू कानून व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अनेक प्रयास किए। इन्हीं प्रयासों में एक क्रान्तिकारी प्रयास हिन्दू कोड बिल की रचना करना था। संवैधानिक रूप से स्त्रियों के लिए आर्थिक अधिकारों की निश्चितता सुनिश्चित हो।

यह पहली बार था, जब किसी बिल में स्त्रियों के आर्थिक अधिकारों को सुनिश्चित किया गया था। इस बिल में निम्नलिखित प्रावधान किए गये थे।

बाल विवाह पर प्रतिबंध, स्त्रियों को जीवनसाथी के चुनाव में स्वतंत्रता स्त्रियों को अन्तरजातीय विवाह का अधिकार, तलाक लेने का अधिकार, स्त्रियों का सम्पत्ति पर अधिकार तथा गोद लेने का अधिकार हिन्दू नारियों द्वारा सदियों से झेली जा रही वंचनाओं को समाप्त करने का यह संवैधानिक प्रयास था।

परन्तु संसद में तथा ससंद के बाहर हिन्दू कोड बिल का प्रबल विरोध किया गया। इसके विरोध के अनेक कारण थे, परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण कारण था- हिन्दू परिवारों के टूटने का भय ।

बिल के विरोध में अभिव्यक्त प्रतिक्रियाएँ- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय संविधान समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। इस अवसर पर मद्रास भारतीय महिला एसोसिएशन संस्था द्वारा 26 अप्रैल, 1949 को उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर उनका सम्मान किया गया था।MHD 18 Free Solved Assignment

महिला संस्था ने एक प्रस्ताव भी रखा, जिसमें यह कहा गया था कि राष्ट्र के सभी नेता लोकसभा में ‘हिन्दू कोड बिल’ को प्रस्तुत करने का प्रयास करें, ताकि जल्दी से जल्दी यह बिल एक कानून का रूप ले सके।

डॉ. पट्टाभिसीतारमय्या ने भी इस बिल का विरोध किया। हिन्द कोड बिल के विरोध में अनेक अवरोध खडे हो गए।

इस बिल का विरोध करने वाले लोगों ने स्त्रियों के अधिकारों का विरोध इसलिए भी किया, क्योंकि उनका धर्म एवं परम्परायें स्त्री को निम्न दर्जा देते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का तो सम्पूर्ण परिवार ही इस बिल के विरोध में खड़ा हो गया था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माँ ने कुछ अन्य महिलाओं को साथ लेकर संसद के बाहर इस बिल के विरन्ध में प्रदर्शन किया। वहीं मुखर्जी संसद के अन्दर बिल का विरोध कर रहे थे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जग संघ की स्थापना की थी तथा वे चार वर्ष तक नेहरू मंत्रिमण्डल में मंत्रिपद पर कार्यरत भी रहे । हिन्दू कोड बिल का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि इस बिल में सांस्कृतिक विवाह को धार्मिक विवाह बना दिया गया है।

हिन्दू समाज अनेक प्रकार की कठिनाईयों तथा विषमताओं के बावजद हजारों वर्षों से जीवित है। हिन्दू कोड बिल भारतीय हिन्दू स्त्री के लिए एक प्रगतिशील कदम तथा संवैधानिक कानून बनने जा रहा था। यह बिल हिन्दू स्त्रियों की दासत्व एवं निर्भरता से मुक्त कर उन्हें प्रगति की ओर ले जाने वाला कदम था।

हिन्दू कोड बिल के विरोधियों में अन्य नाम थे- सांसद नजरूद्दीन अहमद, बाबूराम नारायण सिंह तथा श्यामनंदन सहाय ।MHD 18 Free Solved Assignment

नजीरूद्दीन अहमद यह मानते थे कि हिन्दू कोड बिल संयुक्त परिवार प्रथा को समाप्त कर देगा। यह भी कहा गया कि यह वैदिक साहित्य के विरुद्ध है तथा हिन्दुओं की धार्मिक संरचना को बर्बाद कर देगा।

आचार्य कृपलानी हिन्दू कोड बिल के समर्थक थे। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मंत्रिमण्डल की बैठक में हिन्दू कोड बिल के बारे में कुछ भी नहीं कहा, परन्तु जब बिल को संसद में प्रस्तुत किया गया, तो उन्होंने इस बिल को पास न करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी।

जवाहरलाल नेहरू भी हिन्दू कोड बिल के विरोध से पीछे हट गये। वे यह चाहते थे कि बिल के विवाह एवं तलाक के हिस्सों को अलग करके पेश करना चाहिए। आखिरकार हिन्दू कोड बिल विरोधियों के निशाने का शिकार हो गया।

भारतीय नारी को उन्नति के अवसर देने वाले भारतीय नारी को सक्षम बनाने वाले तथा तलाक का अधिकार देने वाले इस बिल को दफन कर दिया गया।

इस बात से नाराज होकर अंबेडकर ने 100 अक्टूबर, 1951 को नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। बाद में 1955-56 में हिन्दू कोड बिल को चार भागों में बाँटकर टुकड़ों में पारित किया गया। ये चार भाग इस प्रकार हैं

1. हिन्दू उत्तराधिकार कानून- 1956,

2.हिन्दू विवाह विषय विधि – 1955,

3.हिन्दू दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण कानून- 1956,

4.हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता कानून-1956

इन सभी कानूनों के पास होने से स्त्रियों को अत्यधिक लाभ हुआ। इन कानूनों के कारण ही स्त्रियों को पिता तथा पति की सम्पत्ति में अधिकार मिला, दत्तक पुत्र गोद लेने का अधिकार मिला, भरण-पोषण का अधिकार मिला तथा अपनी जाति से बाहर विवाह करने का अधिकार मिला।

हिन्दू कोड बिल जैसा प्रगतिशील कानून तैयार करने तथा क्रान्तिकारी दृष्टिकोण के कारण डॉ. अंबेडकर को स्त्री मुक्ति संघर्ष का योद्धा कहा गया।

प्रश्न 9 पेरीयार ई. वी. रामास्वामी नायकर के आत्मसम्मान आंदोलन की क्रांतिकारी भूमिका स्पष्ट करें।

उत्तर – आत्मसम्मान आन्दोलन की क्रान्तिकारी भूमिका – पेरियार का उदय कोई आकस्मिक घटना , नहीं थी। अंग्रेजी शासन में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के कारण शूद्रों को पहली बार कानूनी समानता का अधिकार प्राप्त हआ।MHD 18 Free Solved Assignment

इसके कारण शद्रों को अपनी आर्थिक स्थिति को मजबत करने का अवसर भी प्राप्त हआ। परन्तु आर्थिक स्थिति सुधरने के बावजूद भी इनकी सामाजिक स्थिति वैसी ही बनी रही।

इस विरोधाभास ने ही पिछड़ी जातियों में परिवर्तन की चेतना को जन्म दिया। पिछड़ी जातियों में अब एक ऐसा समूह उभर चुका था, जो कृषि के अलावा अन्य कार्यों से भी अपनी आजीविका चला सकता था।

यह वर्ग अब समाज एवं राजनीति में अपनी आर्थिक स्थिति के समान एक बेहतर सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का आकांक्षी था।

इसी आकांक्षा के कारण दक्षिण में जस्टिस पार्टी का उदय हुआ। यह पिछडे लोगों की पार्टी थी तथा इसका मुख्य उद्देश्य ब्राह्मणों के वर्चस्व का विरोध करना था।

ब्राह्मण वर्ग ब्रिटिश संस्कृति को भी अपनाने का प्रयास कर रहा था तथा अपनी हिन्दू पहचान की भी कसकर पकड़े हुए था। जस्टिस पार्टी के लोग निरन्तर ब्राह्मण वर्चस्व के साथ संघर्ष करते रहे, परन्तु ये किसी महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाए।

इनके पास ऐसा कोई भी चिन्तन नहीं था, जिससे ब्राह्मणों को चुनौती दी जा सके तथा न ही उनके पास कोई जन-समर्थन था।

परन्तु 1925 में पेरियार के आगमन से परिस्थिति बदल गयी। पेरियार के पास लोगों के बीच कार्य करने का अनुभव तथा ब्राह्मणों को चुनौती देने वाला चिन्तन भी था।

शूद्रों की समस्या यह थी कि धार्मिक तथा सामाजिक परम्पराएँ उन्हें मनुष्य का दर्जा नहीं देती थी। पेरियार ने ऐसे हिन्दू धर्म को ही नकार दिया।

पेरियार के अनुसार मानव होने का बोध ही आत्मसम्मान से जीने का दूसरा नाम है। तिलक ने नारा दिया था कि स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।

पेरियार के अनुसार इसमें दलित एवं पिछड़े लोग शामिल ही नहीं थे। पेरियार ने कहा कि आत्मसम्मान ही व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।MHD 18 Free Solved Assignment

हिन्दू धर्म दर्शन मनुष्य के अस्तित्व और अस्मिता को नकारता है। पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य सभी, प्रकार के शोषण से मुक्ति था।

शोषण के अभाव में ही व्यक्ति का आत्मसम्मान पनप सकता है। 1925 में पेरियार ने ‘कुदी आरसु’ नामक पत्रिका निकाली तथा इसके माध्यम से ही आत्मसम्मान आंदोलन के विचारों को लोगों के सामने रखा। ये उद्देश्य थे

(1. कुछ जातियों को अन्य जातियों के ऊपर श्रेष्ठता कायम करने की सामाजिक व्यवस्था समाप्त हो ।

(2. सभी जातियों को समान अवसर प्रदान कराना।

(3. सभी जातियों को विकास एवं उन्नति के पर्याप्त अवसर प्रदान करना, अस्पृश्यता को समाप्त करना तथा मानव के बीच सहज सम्बन्धों को बढ़ावा देना।

(4. सार्वजनिक सम्पत्ति से मठ, मन्दिर आदि का निर्माण न करना तथा सम्पत्ति का प्रयोग शिक्षा प्रदान करने तथा रोजगार देने में करना ।

17 फरवरी, 1929 में चिंगल पेटू में पहला आत्मसम्मान सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें छः हजार से भी अधिक लोगों ने भाग लिया। दूसरा सम्मेलन 10 मई, 1930 को इरोड में हुआ।

इस सम्मेलन में मूर्ति पूजा का विरोध किया गया। तीसरा सम्मेलन 1931 में आयोजित किया गया। यह सम्मेलन आंदोलन का महत्त्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इस सम्मेलन में अस्पृश्यता का कड़े शब्दों में विरोध किया गया।

आत्मसम्मान आंदोलन का प्रसार तीव्र गति तीसरे सम्मेलन के बाद प्रारंभ हुआ। जाति के आधार पर भेदभाव की सामाजिक मान्यता अब धीरे-धीरे समाप्त होने लगी थी।

जाति की दीवारें टूटी तो नहीं, पर उनमें गहरी दरारें अवश्य पड़ गईं। विभिन्न आडम्बरों एवं पाखण्डों में जकड़ा तमिल समाज भी अब आधुनिकता की राह पर चल पड़ा।

प्रश्न 13 दलित आंदोलन में दलित साहित्य की भूमिका स्पष्ट कीजिए?

उत्तर – दलित आन्दोलन में दलित साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दलित साहित्य का विरोध मानव-निर्मित भेदभावमूलक विचारधारा से था तथा उस धर्म से था, जो इसे अपरिवर्तनीय मानता था, जिसने सदियों तक मानव के एक समूह को ज्ञान की रोशनी से वंचित रखा ।

दलितों की इसी पीड़ा को प्रचारित करने के लिए दलित रचनाकार मुखर होकर लिख रहे हैं। दलित रचनाकार शोषकपूर्ण संस्कृति अस्वीकार करते हैं।

दलित साहित्य ने धर्मग्रंथों द्वारा स्थापित सामाजिक संरचना को अस्वीकार कर दिया है। दलित साहित्य ने सार्वजनिक तौर पर पुरोहितवाद का विरोध दर्ज कराया है।

दलित साहित्य के अनुसार मनुष्यों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटने के लिए ही मनुस्मति की रचना की गयी थी। दलित वर्ग इस तथ्य से अच्छी तरह परिचित हो चुका है।

इसलिए दलित लेखक ऐसे ग्रंथों को नकारते हैं तथा उनके अस्तित्व को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।

दलित लेखन ने परिवर्तन की राह पर अकेले ही चलना स्वीकार किया है, क्योंकि वह जानता है कि दलित जीवन को उपहास बनाने वाली विचारधारा पर अन्य लोगों का विश्वास है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि कस्बों-गाँवों में दलित बस्तियाँ अलग-अलग हैं तथा इन बस्तियों के साथ गाँव के लोगों का व्यवहार बहुत कम है।

गाँवों-कस्बों से रोजगार की तलाश में शहर आने वाला दलित वर्ग शहरों लोगों का व्यवहा में जगह न मिलने के कारण झग्गी बस्तियों में ही जीवन जीने को मजबूर हो जाता है। इस बदहाल जिन्दगी को जीने वाले अधिकतर दलित लोग शहरों में भी छुआछूत के शिकार होकर निम्न कार्यों में ही अपनी जिन्दगी गुजार लेते हैं।

मानवता को अपने पैरों तले कुचलने वाली परंपरावादी यथास्थितिवादी प्रवृतियों से निर्मित होने वाली संस्कृति को दलित साहित्य ने स्वीकार नहीं किया। अमानवीय एवं रूढ़िवादी मान्यताओं के विरोध में दलित साहित्य मुक्ति की चेतना द्वारा नए समाजशास्त्र को विकसित करने की प्रेरणा दे रहा है।

दलित साहित्य घिनौने जीवन की तस्वीर प्रस्तुत करके मानवीय संवेदनाओं को विकसित करने का प्रयास करता है।MHD 18 Free Solved Assignment

दलित रचनाकारों की भूमिका दोहरी है, क्योंकि जाति – उन्मूलन द्वारा नए समतावादी समाज की रचना करने की प्रेरणा देना तो दलित रचनाकारों का कार्य है ही, साथ ही साथ दलित वर्ग को जागृत करने की जिम्मेदारी भी दलित रचनाकारों की ही है।

दलित साहित्य मानवीय मूल्य बोध के प्रसार द्वारा आत्मविश्वास का जगाकर भविष्य के प्रति आशान्वित करता है। दलित साहित्य पोथी-पुराणों द्वारा रची गयी संस्कृति के प्रभाव को स्वीकार नहीं करता।

इसके बजाय दलित साहित्य क्रान्ति की ओर कदम बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जिसके कारण यह दलित आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पाया।

दलित साहित्य में प्रश्न उठाये गए हैं कि क्या वह संस्कृति महान हो सकती है, जो गर्भवती सीता को घर से बेघर करने वाली हो, शूद्रों को शिक्षा से वंचित करने वाली हो या ग्रंथों को स्पर्श न करने देने वाली हो ?

दलित साहित्य सामाजिक सरोकारों से करीब से जुड़कर दलितों की पीड़ा तथा वेदना को अभिव्यक्त करता है। दलित साहित्य अधिकार, स्वाधीनता, बंधता तथा न्याय के मूल्यों की अनदेखी को उजागर करके लोकतंत्र में प्राप्त स्वाधीनता के अधिकार को परिभाषित कर रहा है।

दलित साहित्य का उद्देश्य है दलित समुदाय में जागति उत्पन्न करना, दलितों में स्वाभिमान की भावना भरना तथा अन्याय का विरोध करना। दलित साहित्य में पीड़ा एवं वेदना के शमन के उपाय भी बताये गये हैं।

दलित साहित्य का एक उद्देश्य यह भी है कि सदियों पुरानी संस्कृति को बदलकर एक समतावादी समाज की स्थापना के लिए समाज को प्रेरणा देना ।

साहित्य से आने वाले बदलाव का प्रभाव काफी दीर्घजीवी होता है। दलित साहित्य यह मानता है कि कलाकृति या रचना का सृजन पहले होता है, जबकि सौन्दर्यात्मक मूल्यों की जाँच-पड़ताल बाद में होती है। साहित्य सृजन दलित जीवन के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करने का एक साधन है।

प्रश्न 14 दलित साहित्य में आक्रोश एवं विद्रोह का स्वर क्यों है?

उत्तर – असहमति विवाद को जन्म देती है तथा विवाद संवाद की अनिवार्यता को बल प्रदान करता है। असहमति विकास का प्रमुख माध्यम है। दलित लेखक अंबेडकर तथा ज्योतिबा फुले के विचारों से प्रभावित हुए। दलित चेतना का सम्बन्ध अंबेडकर एवं ज्योतिबा फुले के दर्शन से है।

डॉ. सी. बी. भारती के अनुसार, “दलित साहित्य का सौन्दर्य विधान प्रतिबद्धता है, शोषण से मुक्ति ही दलित साहित्य का स्वर है तथा जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की परिकल्पना ही दलित साहित्य का मूल प्रतिपाद्य है । “

परंपरावादी साहित्य में सभी मानक दलित जीवन की वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं करते। ओमप्रकाश बाल्मीकि यह मानते हैं कि हिन्दी साहित्यकार अपनी रचनाओं में प्रगतिशील, माक्र्सवादी तथा जनवादी तो हैं,

परन्तु वे वर्ण-व्यवस्था, जातिभेद का उतना कडा विरोध नहीं कर पाते। इनमें से कोई भी धर्म के विरुद्ध कड़ा रुख नहीं अपनाता। ये साहित्यकार एक तरफ तो दलितों के प्रति सहानुभूति का भाव रखते हैं,

तो दूसरी तरफ उन संस्थाओं तथा शास्त्रों का समर्थन करते हैं, जो दलितों के प्रति निर्मम हैं। इसलिए ऐसे साहित्य को स्वीकार नहीं किया जा सकता।MHD 18 Free Solved Assignment

दलित चिन्तन की असहमतियाँ पूर्व स्थापित मानकों के प्रति विवेकसम्पन्न हैं। साहित्य मानकों में कमियाँ भले ही न हों, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि इनका इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति अपनी वर्गीय चेतना तथा जातिवादी आग्रह से पूर्णतः मुक्त हो ।

प्रतिरोध का स्वर प्रतिरोध असहमति से उत्पन्न होता है। प्रतिरोध का साहस विरोध का सृजन करता है। सृजन सकारात्मक होता है। दलित साहित्य की सृजन प्रक्रिया तर्कपूर्ण है।

ओम प्रकाश बाल्मीकि मानते हैं कि दलित साहित्य नकार का साहित्य है, जो संघर्ष से उत्पन्न हुआ है तथा इसमें जातिवाद का विरोध भी है। साहित्य का विरोध असमानताओं से है।

वर्ण-व्यवस्था को अस्वीकार करना तथा समतामूलक समाज की अवधारणा दलित साहित्य की पूँजी है। बाबुराम बागूल के अनुसार, ‘मनुष्य को मुक्ति देने वाला उसे महान बनाने वाला, वंश- जाति का प्रबल विरोध करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है।

सामाजिक नियमों तथा शोषण करने के सांमती अधिकारों के प्रति दलित चेतना का स्वर कठोर है।’ दलित चेतना शोषण की व्यवस्था को पूर्णतः नष्ट करने में विश्वास करती है।

दलित चेतना के प्रतिरोधी स्वर को हम निम्नलिखित बिन्दुओं के रूप में समझ सकते हैं

(1. वर्ण-व्यवस्था, जातिगत भेदभाव तथा साम्प्रदायिकता का विरोध।

(2. स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय का पक्ष-पोषण।

(3. पूँजीवाद, सामंतवाद तथा ब्राह्मणवाद का विरोध

(4. अधिनायकवाद तथा अलगाववाद का विरोध तथा बंधुत्व का समर्थन ।

(5. पाखण्डों का विरोध करना तथा बुद्ध के अनीश्वरवाद, अनात्मवाद तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समर्थन

(6. मुक्ति एवं स्वतंत्रता के सन्दर्भ में अंबेडकर के चिन्तन का समर्थन ।

(7. सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्धता ।

(8. पारंपरिक सौन्दर्यशास्त्र का विरोध |

(9. भाषावाद तथा लिंगवाद का विरोध।

(10. मानवता का समर्थन।MHD 18 Free Solved Assignment

(11. दलित चेतना में मौजूद असहमति का स्वर दलित आलोचना में भी दिखाई पड़ता है।

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