IGNOU MHD 17 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

MHD 17

MHD 17 Free Solved Assignment

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MHD 17 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. निम्नलिखित काव्यांशों की लगभग 200 शब्दों में संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए:

(क) “सत्येशु दुःखादिषु दृष्टरार्या सम्यग्वितर्कश्च पराक्रमश्च । इदं त्रयं ज्ञानविधौ प्रवृतं प्रज्ञाश्रय क्लेशपरिक्षयाय ||”

उत्तर- प्रसंग प्रस्तुत काव्य पंक्तियां अश्वघाष द्वारा बुद्धचरित’ नामक महाकाव्य से ली गई हैं। इस महाकाव्य की रचना मानव के सुखों तथा कल्याण के लिए तथा बुद्ध के प्रति अपने श्रद्धाभाव की व्यक्त रकने के लिए कवि ने की थी।

इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन, उपदेश तथा सिद्धांतों का काव्यात्मक वर्णन है। भगवान बुद्ध के जीवन तथा कार्यों पर लिखा गया, यह संस्कृत का प्रथम महाकाव्य है। कवि का कहना है

व्याख्या :- सुख-दुःख में समान दृष्टि, तर्क तथा पराक्रम इन तीनों को ज्ञान विधियों में प्रवृत्त करने से ही बुद्धि को क्लेश के आश्रय से मुक्त या दूर रखा जा सकता है अर्थात अश्वघोष मानव के कल्याण तथा मुख के लिए तर्क, पराक्रम तथा सुख-दु:ख में अपनी ज्ञान बुद्धि से सामंजस्य करके क्लेश से दूर रहने का उपदेश देते हैं।

किसी भी परिस्थिति में बुद्धि को विचलित नहीं होने देना चाहिए और सम-विषम परिस्थितियों में सदैव सामंजस्य या समानता स्थापित करने का प्रयत्न करते हुए क्लेश या चिंता दुःख आदि का निवारण करना चाहिए।

विशेष :

(1) भाषा सरल, सुगम संस्कृत है।
(2)कवि का तार्किक चिंतन सामाजिक जीवन के अनुभव पर आधारित है।
(3) मानव कल्याण तथा सुख की भावना की कामना परिलक्षित होती है।

(ख) यः प्रतीत्यसमुत्पादः शून्यतां तां प्रचक्ष्महे ।
स प्रज्ञप्तिरूपमादाय प्रतिपत्सव मध्यमा ||

उत्तर- प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ आर्य नागार्जुन द्वारा रचित संस्कृत भाषा के सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘माध्यमिक कारिका’ ली गई हैं। MHD 17 Free Solved Assignment

इन पंक्तियों के माध्यम से कविता ने शून्यता के सिद्धांत को अनित्यता तथा प्रतीत्य समुत्पाद नामक सिद्धांत को तार्किक निष्कर्षों के आधार पर व्याख्यायित करके समझाने का प्रयत्न किया है।

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत का शून्यता के साथ संबंध का उल्लेख बौद्ध त्रिपिटक में मिलता है, जिसमें बुद्ध के उपदेशों तथा वचनों का संग्रह है।

नागार्जुन प्रतीत्यसमुत्पाद को ‘शून्य’ के सिद्धांत के साथ उसको विस्तृत व्याख्या करके समझाते हुए कहते हैं

व्याख्या : प्रतीत्य समुत्पाद को हो हम शून्यता कहते हैं। संसार की सभी वस्तुओं का अस्तित्व अन्य वस्तुओं पर निर्भर करता अर्थात संसार की सभी वस्तुओं का अस्तित्व सापेक्ष है।

इनकी उत्पत्ति के कारण अन्य वस्तुओं पर अवलम्बित है। अतः संसार की सभी वस्तुएँ परतंत्र हैं, उनका स्वयं का कोई भी अस्तित्व नहीं है, इसलिए ये शून्य हैं।

कवि नागार्जुन शून्य तथा प्रतीत्यसमुत्पाद को एक समान मानते हुए कहते हैं कि इसके होने पर यह होता है, प्रत्येक वस्तु के उत्पन्न होने का कोई-न-कोई कारण होता है, एक वस्तु के नष्ट हो जाने पर ही दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है।

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(ग) जहाँ देखता हूँ, वहाँ, तुम हो,
सब में तुम्हारा विस्तार है। विश्व के बाहु तुम हो,
विश्व के नयन तुम हो, विश्व के मुख तुम हो,
विश्व के पैर तुम हो,
हे कूडल संगम देव।

उत्तर-प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियां आचार्य धर्मकीर्ति की महत्त्वपूर्ण रचना ‘प्रमाण वार्तिक’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से रचनाकार ने परमार्थ सत् (परम तत्त्व) की व्याख्या करने का प्रयास किया है,

वही परमतत्व सभी चेतनजगत में व्याप्त होकर विस्तार प्राप्त करता है और प्रत्यक्ष के प्रमाण के आधार पर धर्मकीर्ति ने यहां उसका संकेत किया है MHD 17 Free Solved Assignment

व्याख्या :- मैं प्रत्येक स्थान पर परमतत्त्व की उपस्थिति की उसके विस्तार के साथ देखता हूँ। यही । परमतत्त्व विश्व की भुजा या बांहें है, यही विश्व का नयन, मुख तथा पैर भी है। इस परमतत्व को साकार स्वरूप प्रदान करते हुए धर्मकीर्ति ‘कूडल संगम देव’ नाम से पुकारते हैं,

अर्थात निराकार परमतत्त्व की सत्ता प्रत्येक कण में व्याप्त मानते हुए साकार रूप में उसे विश्व को भुजा, नेत्र, मुख, और पैर मानकर कूडल संगम देव का आकार तथा नाम प्रदान करते हैं।


(1) भाषा सरल आम बोलचाल की भावानुकूल तथा प्रवाहमयी है।
(2) ‘अनुपलब्धि हेतु’ का प्रयोग करके निराकार ईश्वर को संबोधित किया गया है।

(घ) गुरु षोजी गुरुदेव गुरु बोज, बदंत गोरा ऐसा।
मुक्ते हौइ तुम्हें बंधनि पड़िया, ये जोग है कैसा
चाम की चाम धसंता गुरुदेव दिन-दिन छीजै काया।
होठ कंठ तालुका सोषी, कादि मिजालू पाया।

उत्तर- प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियाँ नाथ पंथ के आधारस्तंभ गुरु गोरखनाथ की ‘गोरखबानी’ से उद्धृत हैं। नाथ पंथ में गुरु को सर्वोपरि माना गया है तथा ‘गोरखबानी’ के माध्यम से इन पंक्तियों में भी गुरु की महिमा का मंडन किया गया है

व्याख्या : गोरखनाथ गुरु को शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गुरु मेरा पोषण (कृपा) करें, गुरुदेव मुझपर कृपा दृष्टि बनाए रखें। गुरु की कृपा या उनका पोषण पाकर मेरा शरीर कार्तियुक्त होकर चमक गया है या गोरा हो गया है। MHD 17 Free Solved Assignment

कवि कहता है कि है गुरुदेव आप ही मुझे सांसारिक बंधनों के जाल से मुक्ति दिला सकते हो। मैं इन बंधनों की बेड़ियों में जकड़कर मुक्ति/मोक्ष के मार्ग से भटक गया हूँ।

सांसारिक बंधनों की बेड़ियों में जकड़कर मेरे शरीर का चर्म (मास) धंसता ही जा रहा है और इसमें धंसते-धंसते मेरी काया दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है।

गुरुदेव आपका नाम जपते जपते मेरे होंठ, कंठ तथा तालु सूखते जा रहे हैं। अब मेरा साया (आत्मा/परछाई) शरीर से निकलने के लिए उत्सुक हो गया है।

अतः आप मुझे शीघ्र ही दर्शन देकर मेरी पीड़ा को हर लें तथा मेरी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करके मुझे सांसारिक बंधनों की बेड़ियों से स्वतंत्र कर दें।

विशेष :-

(1) भाषा अपभ्रंश मिश्रित संस्कृत का पुट लिए हुए है।
(2) रचनाकार द्वारा गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए अपनी सद्गति मुक्ति के लिए प्रार्थना की गई है। ।
(3) ‘गुरु, गुरुदेव, गुरु, गोरा’, ‘चांम की चाम’, ‘दिन-दिन’ में अनुप्रास की छटा दर्शनीय है।

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प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 500 शब्दों में दीजिए

ईसा पर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत की स्थिति पर प्रकाश डालिए।

उत्तर. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत की स्थिति इस काल में उत्तर भारत के मध्य गंगा घाटी में अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का उदय हुआ, जिनमें सबसे प्रमुख बौद्ध एवं जैन धर्म थे। इन धार्मिक सम्प्रदायों के उदय के अनेक कारण थे। MHD 17 Free Solved Assignment

इन धार्मिक सम्प्रदायों ने वैदिक ब्राह्मण धर्म के दोषों पर प्रहार किया। इन आंदोलनों को सुधारवादी आंदोलन भी कहा गया है। रोमिला थापर ने इस शताब्दी को विश्वव्यापी प्रश्नों की शताब्दी माना है।

यह व्यापक विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद का युग था, जिसमें प्रत्येक सिद्धांत को तर्क की कसौटी पर परखा गया था।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत स्थिति :

इस काल में उत्तर भारत के मध्य गंगा घाटों में अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का उदय हुआ, जिसमें सबसे प्रमुख बौद्ध एवं जैन धर्म थे। इन धार्मिक सम्प्रदायों के उदय के अनेक कारण थे। इन धार्मिक सम्प्रदायों ने वैदिक ब्राह्मण धर्म के दोषों पर प्रहार किया।

इन आंदोलनों को सुधारवादी आंदोलन भी कहा गया है। रोमिला थापर ने इस शताब्दी को विश्वव्यापी प्रश्नों की शताब्दी माना है। यह व्यापक विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद का युग था, जिसमें प्रत्येक सिद्धांत को तर्क की कसौटी पर परखा गया था।

सामाजिक स्थिति :-

ई.पू. छठी शताब्दी में समाज में जाति प्रथा विद्यमान थी। समाज चार वर्गों में विभक्त था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियों का सामाजिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। इस काल में निम्न वर्ग एवं शूद्रों की स्थिति काफी खराब थी। MHD 17 Free Solved Assignment

चाण्डाल को सर्वाधिक घृणित जाति माना जाता था। यह जाति नगर के बाहर निवास करती थी। पुक्कसों का कार्य फूल तोड़ना, निषादी का कार्य शिकार करना तथा नाईयों का कार्य बाल काटना था।

इस काल में दास प्रथा भी विद्यमान थी। निम्न जातियों को अधिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।

ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों को वे सब कर नहीं देने पड़ते थे, जो निम्न वर्णों को देने पड़ते थे। यज्ञों के समय राजा ब्राह्मणों का सहयोग लेता था। शासक वर्ग के प्रतिनिधि क्षत्रिय थे।

क्षत्रिय रक्त की शुद्धता पर अत्यधिक बल देते थे। इस काल में क्षत्रिय वैश्य ब्राह्मणों से घृणा करने लगे थे। लोहे के उपयोग के कारण सैनिक साजो सामान तथा अस्त्र-शस्त्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया।

अजात शत्रु के पास महाशिलाकण्टक तथा रथमूसल जैसे भयंकर अस्त्र थे, जो अत्यधिक नरसंहार करते थे। इस काल में क्षत्रिय लोग ब्राह्मणों के विरुद्ध अपनो सामाजिक एवं राजनीतिक महत्ता के प्रति सचेत हुए।

समाज में अव्यवस्था को समाप्त करना, झगड़ों को निपटाना तथा कृषि भूमि की सुरक्षा करना आदि क्षत्रियों के प्रमुख कर्त्तव्य थे।

ब्राह्मणों ने राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित करके स्वयं को धरती का देवता कहा। बुद्ध ने जाति प्रथा को अस्वीकार कर दिया। बौद्ध धर्म में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं था बौद्ध धर्म में सभी जातियों के लोग शामिल हो सकते थे।

(ख) बुद्ध दर्शन में अनात्मवाद के सिद्धांत के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।

उत्तर भारतीय दर्शनों में चार्वाक एवं बौद्ध दर्शन हो ऐसे दर्शन हैं, जो आत्मा की सत्ता को नहीं मानते। बाकी सभी दर्शन आत्मा की सत्ता को स्वीकार करते हैं।MHD 17 Free Solved Assignment

अन्य सभी दर्शन आत्मा को नित्य एवं चेतन पदार्थ मानते हैं। बौद्ध दर्शन आत्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता, इसलिए बौद्ध दर्शन को अनात्मवादी दर्शन भी कहा जाता है।

विज्ञानवाद की कल्पना भी इसलिए की गयी थी कि आत्मा के कार्यों को पूरा किया जा सके। विज्ञानवाद की कल्पना में यह माना गया है कि यह प्रवाह के समान एक से दूसरे से जुड़ता चला जाता है।

जो दार्शनिक आत्मा की सत्ता को स्वीकार करते हैं, उनका एक सबल पक्ष है- पुनर्जन्म यदि आत्मा का अस्तित्व न हो, MHD 17 Free Solved Assignment

तो वह नित्य भी नहीं हो सकती, जिसके कारण जन्म-मरण में पड़कर दुख भोगना तथा मोक्ष प्राप्त करके सब बन्धनों से छुटकारा पाना भी संभव नहीं होगा।

इस प्रकार के प्रश्नों की उत्पत्ति होने पर आचार्य धर्मकीर्ति कहते हैं “दुख के उत्पन्न होने का कारण है कर्म-रूपी बंधन।

जो नित्य है, वह निष्क्रिय भी है। जो अनित्य है, उसे क्षणिक नहीं कहा जा सकता, इसलिए वह किसी चीज का कारण नहीं हो सकता। नित्य वह है, जो कभी नष्ट नहीं होता।

(ग) ‘चार्वाक दर्शन’ का स्वर मानवतावादी है, इस संबंध में अपना मत प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- चार्वाक दर्शन को लोकायत मत या दर्शन भी कहा जाता है। भारतीय दर्शन में चार्वाक दर्शन को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और लोकायत दर्शन का सामान्य जन पर काफी महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

समाज की जो ताकतें, समाज की प्रतिगामी शक्तियों तथा रूढ़िवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, उन्हें चावक दर्शन ने एक हथियार उपलब्ध कराया है।

रूढ़िवादी लोगों ने तथा धर्माचार्यों ने लोकायत मत की आलोचना करने में कोई कमी नहीं रखी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लोकायत दर्शन के वस्तुपरक चिन्तन को गलत रूप में प्रस्तुत किया गया है।

चार्वाक दर्शन का कोई भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि रूढ़िवादियों इस दर्शन के साहित्य को नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया।

परन्तु इसके बावजूद चार्वाक दर्शन का भारतीय सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। के. दामोदरन ने भी चार्वाक दर्शन के साहित्य के नष्ट हो जाने पर अपने विचार प्रस्तुत किये है।

उनके अनुसार ” चार्वाक दर्शन के ग्रंथों के नष्ट हो जाने से भारतीय दर्शन के इतिहास की अत्यधिक क्षति हुई है।”

सबसे रोचक बात यह है कि चावक दर्शन के बारे में हमें जितनी भी जानकारी उपलब्ध है, वह सब चार्वाक दर्शन की आलोचनाएं करने वाले विद्वानों की व्याख्याओं से ही मिली है। चावक दर्शन की आलोचना करने वाले विद्वानों ने इसे एक नकारात्मक दर्शन बताया है।MHD 17 Free Solved Assignment

इन विद्वानों के अनुसार, “चावक दर्शन नैतिक संहिताओं का विरोधी दर्शन है, यह भ्रष्ट भौतिकवाद से ओत-प्रोत है, तथा यह मानता है कि जीवन के सुखों को प्राप्त करने के लिए ऋणी होना भी उचित है।”

वैदिक मतावलम्बियों ने लोकायत दर्शन की निरन्तर आलोचना की। इसे अत्यधिक विकृत रूरूप में प्रस्तुत किया गया।

इसके मूल उद्देश्य की भी उपेक्षा की गयी। इसे केवल भौतिकवादी दर्शन सिद्ध करने का प्रयास किया गया। जबकि चावाक दर्शन में जिस भौतिकवाद का समर्थन किया गया है,

वह आज के भौतिकवाद से सर्वथा भिन्न है चार्वाक दर्शन में जिस भौतिकवाद की कल्पना की गई है, वह सामान्य जन के सरोकारों, उनको तकलीफों एवं संघर्षों से जुड़ा हुआ है।

चार्वाक दर्शन के खिलाफ एक ऐसी मुहिम चलायी गयी, जिससे इसे समाज-निरपेक्ष सिद्ध किया जा सके। इस दर्शन को स्वार्थी सिद्ध करने का भी प्रयास किया गया।

चार्वाक दर्शन की मूलभूत मान्यताएँ कर्मकाण्डों का विरोध करते हुए जीवन की मूलभूत समझ प्रदान करना है।

(घ) कन्नड की भक्ति साहित्य परंपरा का परिचय दीजिए।

उत्तर कन्नड़ भाषा में साहित्य का उदय 12वीं शताब्दी के आस-पास हुआ। कन्नड़ भक्ति साहित्य को एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक आन्दोलन का स्वरूप देने वाले कवियों (वचनकारों) में प्रमुख हैं- बसवेश्वर अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी, चन्न बसवण्णा इत्यादि कन्नड़ भक्ति साहित्य में जिन वचनकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा,

वे हैं-दासकूट, राघवांक, सर्वज्ञ, व्यासराय, श्रीपादराज कनकदास पुरंदरदास, विजयदास, प्रसन्नवेंकट दास गोपालदास हरिदास, जगन्नाथदास, प्रणेशदास. हेल्वनकट्टे गिरियम्म, हरपन हल्ली भीमन्न, लक्ष्मीदेवम्म सर्वज्ञ, इत्यादि वीरशैव पुराण परंपरा के प्रमुख कवि थ-भीमकवि,

लक्कण्ण दण्डेश, सक्कणाचार्य विरुपाक्ष पण्डित विरत महालंग देव (गुरु बोधामृत) चामरस (प्रभुलिंग लीला), निजगुण शिवयोगी (केवल्य पददति), सर्वभूषण शिवयोनी कैवल्य कलय वल्लरी), बाललीला महत शिवयोगी (कैवल्य दर्पण), मडिवालव्य, शिशुनाल शरीक तथा शंकर दास इत्यादि इन सन्तों द्वारा कन्नड़ साहित्य में भक्ति साहित्य का विकास किया गया।

वीरशैव धर्म की स्थापना बसवण्णा ने की थी। ‘अनुभव मण्डप’ नामक संस्था में प्रतिदिन जीवन एवं साहित्य की चर्चा की जाती थी।MHD 17 Free Solved Assignment

वचन साहित्य की एक सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि अनुभव मण्डप नामक संस्था में समाज के निम्न स्तर के लोगों को भी अपने अनुभवों की चर्चा करने का अधिकार था।

यहाँ तक कि वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को भी अनुभव मण्डप में अपने विचारों को प्रस्तुत करने का अधिकार था।

हरिदास साहित्य के प्रवर्तक दासकूट थे। ये भक्त एवं भगवान के सम्बन्ध को दास सम्बन्ध के रूप में ही मानते थे। जिस प्रकार वचन साहित्य की रचना की गयी, उसी प्रकार दास साहित्यकारों ने भी भक्ति साधना एवं साहित्य की रचना की।

हरिदास ने गीतों के द्वारा अपनी रचनाओं को प्रस्तुत किया। अपनी विद्वत्ता के कारण व्यासराय को कर्नाटक संगीत का पितामह कहा जाता है।

दास साहित्यकार भगवान कृष्ण को अपना आराध्य देव मानते थे। संत साहित्य में दास परंपरा के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं- पुरन्दरदास तथा कनक दास पुरन्दरदास द्वारा रचित कविताओं में संगीत का भी पुट हैं।

कर्नाटक में आज भी पुरन्दरदास के गीत बहुत लोकप्रिय हैं। सन्त कनकदास की कविता में भक्ति का उल्लेख है।

इसके साथ-साथ कनकदास की कविता में सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की भावना भी देखने को मिलती है। सर्वज्ञ एक ऐसे सन्त थे, जिन्हें किसी भी वाद से नहीं जोड़ा जाता। सर्वज्ञ घुमक्कड़ प्रवृति के थे।

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प्रश्न 3. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर लगभग 100 दीजिए:

अश्वघोष की कृतियों की भाषा शैली, वस्तु योजना तथा प्रकृति-चित्रण पर प्रकाश डालें।

उत्तर- अपने व्यक्तित्व के अनुरूप हो महाकवि अश्वघाप ने अपने काव्यों को भाषा शैली, वस्तु योजना, प्रकृति चित्रण आदि सभी दृष्टिकोणों से अतीव सुंदर एवं सफल बनाया है।

कवि अश्वघोष के ग्रंथों की भाषा सुगम और सरल है तथा शैली परिष्कृत एवं विच्छित्तशाली है। उन्होंने अपने काव्यों में अङगो रस शांत रस’ को बनाया है तथा वौर, करुण, श्रृंगार, रौद्र, भयानक आदि रसों का भी सफल चित्रण किया है। MHD 17 Free Solved Assignment

उन्होंने अपने काव्यों में शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित, मालिनी, उन्होंने अपने काव्यों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अनुप्रास, यमक आदि सभी शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए सौन्दरानन्द’ में उपमा का स्वाभाविक प्रयोग

        "तं गौरव बुद्धगतं चकर्ष भार्यानुरागः पुनराचकर्ष
        सोऽनिश्चयान्नापि ययौ न तस्थौ तरस्तरंगेष्विव राजहंसः ।।" 

अर्थात् “बुद्ध का गौरव नन्द को एक और खींच रहा था और प्रिया का प्रेम दूसरी और लहरों के कारण तैरते हंस की तरह वह न तो जा सका और न ठहर ही सका।”

महाकवि अश्वघोष ने अपने व्यक्तित्व का प्रभाव अपने ग्रंथों के प्रकृति चित्रण पर भी छोड़ा है। ‘सौन्दरनन्द’ के दशम् सर्ग में स्वर्ग दर्शन के प्रसंग में प्रकृति का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया गया है.

(ख) आर्य वसुबंधु की रचनाओं पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- आर्य वसुबन्धु की ग्रंथ सम्पदा-अभिधर्मकोष आर्य बसुबन्धु का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना उन्होंने आठ परिच्छेदों में की है। ये आठ परिच्छेद इस प्रकार हैं

धातु निदर्श, इन्द्रिय निदर्श लोकधातु निदर्श, कर्म निदर्श, अनुशय, आर्य मार्ग, ज्ञान तथा ध्यान राहुल सांकृत्यायन के अनुसार-“यह ग्रंथ (अभिधर्म कोष) हीनयान के सभी निकायों का सम्मिलित ग्रंथ है।

वसुबन्धु ने कश्मीर के वैभाषिक मत के अनुसार इस ग्रंथ की रचना की थी। आर्य वसुबन्धु 18 निकायों तथा महायान के दार्शनिक सिद्धान्तों के ज्ञाता एवं एक प्रतिभाशाली दार्शनिक थे।

अभिधर्मकोष के अतिरिक्त वसुबन्धु के अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं कर्मसिद्धि प्रकरण’, ‘त्रिरचभावनिर्देश’, ‘विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि त्रिंशिका तथा विशिका इत्यादि राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, वसुबन्धु की 55 रचनाओं के अनुवाद उपलब्ध हैं। MHD 17 Free Solved Assignment

वसुबन्धु ने वज्रयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित किसी ग्रंथ की रचना नहीं की। वसुबन्धु को रचनाओं की सूची इस प्रकार है

(1) बौद्ध सामान्य- (i) अभिधर्म, (ii) प्रमाण शास्त्र (iii) टीका, (iv) कथा।
(2) महायान- (i) विज्ञानवाद (क) मूल एवं (ख) टीका;

(ii) स्रोत।

(1) बौद्ध सामान्य वसुबन्धु के अभिधर्म से सम्बन्धित ग्रंथ हैं- अतिमोपदेश, अभिधर्मकोशकारिका, अभिभाष्य, गाथासंग्रहशास्त्र, गाथा अर्थ, निर्वाणशास्त्र शास्त्र तथा निर्वाणसूत्र
वसुबन्धु का प्रमाणशास्त्र से सम्बन्धित ग्रंथ

वसुबन्धु के टीका से सम्बन्धित ग्रंथ है- नागार्जुन भाष्य, ग्रंथशीर्ष, ग्रंथ आख्यान, धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्रोपदेश, प्रतीत्यसमुत्पादादि गवभंगभाष्य, बुद्धहानुस्मृतिटीका

वसुबन्धु के कथा से सम्बन्धित ग्रंथ हैं- पंचकाम गुणोपालभनिर्देश सप्तगुणविवरणकथा तथा सम्बन्धपरिकथा शीलपरिकथा सप्तगुणपरिवदनकथा,

(2) महायान-विज्ञानवाद के अन्तर्गत मूल से सम्बन्धित आर्य वसुबन्धु के ग्रंथ हैं- अपरिमितायु शास्त्र कर्मसिद्धिप्रकरण (3 भाग), चतुधर्मोपदेश, त्रिपूर्णसूत्रोपदेश, त्रिस्वभावनिदेश, दशभूमिकाशास्त्र, व्याख्यान, ध्यानव्यवहार, पंचस्कंधशास्त्र प्रकरण, बुद्धगोत्रशास्त्र, बिधिचितोत्पाद, मध्यातविभाग, टीका, महायानशतधर्मविद्याद्वार, वज्रच्छेदिकाशास्त्र व्याख्या, विज्ञप्ति मात्रता, विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि, विज्ञप्तिमात्रताविशिकाकरि, वृत्ति, व्याख्यायुक्ति तथा सूत्रखण्डशत

टीका से सम्बन्धित बसुबन्धु के ग्रंथ हैं अक्षयमतिनिर्देशटीका धर्मधर्मताविभगवत्ति, भद्रचर्याप्रणि टीका, महायानशतधर्मप्रकाशद्वार, महायानसंग्रह भाष्य वज्रच्छेदिकासप्तार्थटीका. विवत्तगुह्यार्थपिण्डव्याख्या विशेषचिंताब्ररमपरिपृच्छाटीका पश्मुखी धारणीव्याख्या शतशास्त्रटीका शमथविपश्यनाद्वार सद्धर्मपुंडरीकसतटीका तथा सूत्रालंकारव्याखान।

(ग) तेलुगु के प्रमुख संतों का परिचय दीजिए।

उत्तर- तेलुगु साहित्य को अनेक सन्त-कवियों ने समृद्ध किया है। तेलुगु में अनेक सन्त-कवि हुए हैं, जिनमें से कुछ का परिचय नीचे दिया जा रहा है

(1) संत वेमना 1556-1650) तेलुगु साहित्य में सन्त वेमना का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। संत वैमना के पद तेलुगु में इतने लोकप्रिय हैं कि शायद ही कोई तेलुगु व्यक्ति होगा, जो वेमना का एक पद भी न जानता हो। वेमना को तेलुगु साहित्य का कबीर माना जाता है।

हिन्दी साहित्य एवं तेलुगु साहित्य परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि हिन्दी साहित्य में पहले निर्गुण धारा का विकास हुआ, उसके बाद सगुणधारा का विकास हुआ।

कबीर निर्गुणधारा के ही सन्त-कवि थे, परन्तु तेलुगु साहित्य में पहले सगुणधारा का विकास हुआ, उसके बाद निर्गुणधारा का विकास हुआ।MHD 17 Free Solved Assignment

वेमना निर्गुणधारा के सन्त कवि थे। तेलुगु साहित्य में किसी विशिष्ट धारा का प्रचलन नहीं हुआ, परन्तु इतना सत्य अवश्य है कि तेलुगु साहित्य में निर्गुण प्रवृत्तियों को प्रचलित करने वाले संत अवश्य हुए हैं। इन सन्तों में वेमना सबसे श्रेष्ठ सन्त-कवि थे।

सन्त बेमना ने धार्मिक पाखण्डों, अंधविश्वासों, सामाजिक असमानताओं एवं असंगतियों का खुलकर विरोध किया। निर्गुण भक्तिधारा के कवि कबीर में जो स्पष्टवादिता हमें दिखाई देती है, वही स्पष्टवादिता हमें वेमना में भी दिखाई देती है।

वास्तव में वेमना को कबीर की ही तरह एक महान सन्त, समाज सुधारक तथा युगपुरुष माना जाता है। वेमना ने तेलुगु प्रान्त में अपने विचारों को प्रसारित किया। वेमनार के जन्म के विषय में विद्वानों के बीच मतभेद है।

पोतुलूरि वीर ब्रह्म (1608-1693) वीर ब्रह्म के पद भी काफी लोकप्रिय हैं। आम जनता की जुबान पर वीर ब्रह्म के पद आज भी जिन्दा हैं। विशेषकर ग्रामीण प्रान्तों में इन्हें खूब गाया जाता है।

यह माना जाता है कि वीर ब्रह्म का जन्म योग-शक्तियों के साथ हआ था। काल का ज्ञान बताने वाले योगियों में वीर ब्रह्म का स्थान सबसे ऊंचा है।

उनका जीवन अनेक अद्भुत घटनाओं से भरा पड़ा है। तेलुगु में एक कहावत प्रचलित है “वेमना जैसा कोई संत नहीं है, वीर ब्रह्म जैसा कोई गुरु नहीं है और सिद्धव्या जैसा कोई शिष्य नहीं है। “

(घ) निर्गुण संतों के काव्य का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर- दलित समाज की उपेक्षा तथा यातना का आधार तर्कहीन वर्ण व्यवस्था तथा ईश्वर संबंधी विधिविधान में निहित है। सगुण ब्रह्म की अवधारणा अपने जन्म से लेकर ईश्वरीय लोला के वर्णन में सदैव राजा और मंदिर के पक्ष में कर्मकांड का निर्माण करती रही।

उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों में वर्णित विधि-विधान दलित विरोधी ही है लेकिन ब्राह्मण के पक्ष में उसकी श्रेष्ठता का बखान करती है। सगुण पंथ आरंभ से हाँ ब्राह्मण, गो और धर्म का सेवक तथा रक्षक था।

दलित समाज से उसका कोई रिश्ता नहीं बनता था। संत कवियों को सुधारवादी अथवा समाज सुधारक मान लेने वाले आचार्यों ने भी संत काव्य के इस प्रस्थान बिंदु को नहीं देखा जिसमें दलित सता की भक्ति पद्धति तथा उसका आलंबन न ईश्वर, न मंदिर जीवी है, MHD 17 Free Solved Assignment

.न पोथी प्रमाणित इसी रूप में शुद्ध संतों की धर्म संबंधी अवधारणा में ईश्वर पोथी और मंदिर वर्ण व्यवस्था के पोषक तत्त्व माने गए हैं। वह धर्म भी कर्मकांडी पुरोहिती से दूर सहज साधना के रूप में वर्णित है।

यदि हम ईश्वर भक्ति तथा धर्म इन तीनों केंद्रीय तत्त्वों की व्याख्या निर्गुण शुद्र संतों तथा पारंपरिक ब्राह्मणवादी चितन को साथ रखकर करें तो निर्गुण सतों की दलित चेतना का प्रस्थान बिंदु अच्छे से समझ सकते हैं।

कबीर, दादू, नानक, रैदास, सदना, धन्ना, पोषा, सेना, नाई, रज्जब आदि शूद्र संतो की कविता में वर्णित ब्राह्मणवादी चिंतन के विरोध को अत्यंत सौम्प रूप में देखा जाता है।

लेकिन सूक्ष्म विश्लेषण तथा पर्यालोचन से यह स्पष्ट होता है कि निर्गुण कवियों ने ब्राह्मणवादी चिंतन पद्धति के समानांतर लगभग इसी भाषा में एक लए समाज का स्वप्न तथा एक नई विचार पद्धति का अविकार किया जो दलित चिंतन् । चेतना का एक परिधि में ही सही प्रस्थान बिंदु है।

इसीलिए मध्यकालीन समय-समाज के भीतर नए चिंतन, चेतना तथा साहित्य सृजन के रूप में ही निर्गुण संत काव्यधारा को समझना होगा।

भक्ति आंदोलन के निर्गुण चिंतन पर भाष्य करने वाले आचार्यों ने निर्गुण चिंतन के सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष की व्याख्या करते समय उसके प्रतिरोधी स्वर को सही रूप में प्रस्तुत नहीं किया।

जब कबीर जो घर जारें आपनो की घोषणा करते हैं तो वह ‘घर’ पूरा समाज है जब वे ‘जागने और रोने की बात करते हैं तो इसका अर्थ तत्कालीन शूद्र समाज की पीड़ा जानने से है।

यह वही संपूर्ण दलित समाज है, जो मनुष्य मात्र के भरण-पोषण की सामग्री पैदा करता है।

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