IGNOU MHD 16 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

MHD 16

MHD 16 Free Solved Assignment

MHD 16 Free Solved Assignment july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1 तकषी शिवशंकर पिल्लै के कृतित्व पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- तकषि शिवशंकर पिल्लै मलयालम साहित्य के आधुनिक रचनाकारों में प्रमुख हैं।। उन्होंने मलयालम साहित्य को अपनी लोकप्रिय रचनाओं से विश्व साहित्य में सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

जीवन परिचय मलयालम साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकार तकषि शिवशंकर पिल्ले का पूरा नाम के.के.शिवशंकर पिल्लै है।

साहित्य जगत में उन्हें तकषि शिवशंकर पिल्ले के नाम से ही जाना जाता है। उनका जन्म केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम् से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर अंपल जिले के तकषि गाँव में 17 अप्रैल 1912 को हुआ था।

उनकी माता का नाम पार्वती अम्मा और पिता का नाम पोरपल्लि कलत्तिल शंकर कुरूप था। उनके पिता किसान होने के साथ-साथ कथकली और तुल्लन कलाओं के जानकार थे। उनका पारिवारिक वातावरण धार्मिक था।

परिवार में समय-समय पर पुराण कथाओं से बालक तकषि का परिचय धीरे-धीरे होता गया, जिसकी झलक उनकी रचनाओं में दिखाई देती है।

तकषि की आरंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने अपने गाँव से बारह किलोमीटर दूर अम्पलपुण्या नामक स्कूल में सातवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी की।

यहीं पर उनका परिचय मछवारी जीवन – वत्ति यापन करने वाले अरय समुदाय सम्पादक केसरी बालकृष्ण पिल्लै से हुआ। MHD 16 Free Solved Assignment

उनके महान अनुभवों का अधिक से अधिक लाभ तकषि ने उठाते हुए अपनी साहित्य शक्ति को पूर्वापेक्षा अधिक बढ़ा लिया। तेईस वर्ष की आयु में उनका विवाह चंपकशेरी चिखकल कमलाक्षि अम्मा नामक कन्या से हुआ।

उसे शुभ लक्षणी मानते हुए वे ‘कात्ता’ नाम से ही पुकारते थे। उससे उन्हें चार लड़कियाँ और एक लड़का कुल मिलाकर पाँच संतानें हुई। अपने आर्थिक तंगी के दिनों , से गुजरते वे सन् 1939 में म्यूनिसिपल कोर्ट के वकील बन गए।

इसके बाद लगभग ग्यारह वर्षों में उनके माता-पिता का निधन हो गया। इससे उनके ऊपर पारिवारिक दायित्व का भार और अधिक आ गया। उनकी रचनाओं का अनुवाद देशी-विदेशी भाषाओं में जैसे-जैसे होता गया, उनकी आर्थिक दशा सुधरने लगी।

तकषि को समयसमय पर अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। उनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार केन्द्र साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड एवार्ड, वयलार पुरस्कार, मानद डि. लिट सम्मान आदि प्रमुख हैं। उनका निधन 10 अप्रैल 1990 को सत्तासी वर्ष की आयु में हुआ।

रचनाएँ – तकषि का साहित्य-संसार संख्या की दृष्टि से बहुत अधिक है। दूसरी बात यह है कि उनका साहित्य-संसार वैविध्यपूर्ण है। फलस्वरूप उसके अनेक रूप हैं। वह उनकी रचना यात्रा के अलग-अलग पड़ावों के अलग-अलग चिह्न रूप हैं। उनकी निम्नलिखित रचनाएँ हैं।

कहानी-संकलन- ‘नित्यकन्यका” इनकलाब’, ‘अडियोष क्कुकल’, ‘घोषयात्रा’,’मानचुवट्टिल’, ‘पतिव्रता’ ‘प्रतीक्षाकल’ ‘चंतिकल’ ‘ज्ञानपिरन्न नाड’, ‘चरित्र सत्यंगल’ ‘पुतुमलर’ आदि।

उपन्यास ‘प्रतिफलम्’, ‘पतित पंकजम’, ‘परमार्थगल’, तोट्टियुडे मकन (भंगी का बेटा), ‘रडिड्रगषि’ (दो सेर धान), ‘तलयोडु’ (कपाल), ‘तैंडीवर्गम्’ (भिखारी वर्ग), ‘चुम्मीन’, ‘अवन्टे स्मरणकल’ (उनकी याद), ‘नुरयुम पतयुम’ (फेन और बुदबुद), ‘कुरे मनुष्य रूटे कथा’ (कुछ मनुष्यों की कथा). ‘अकतलम्’ (अन्दर का अहाता), ‘अषियाक्कुरूक्कु’ (उलझे फंदे). ‘माँसत्तिन्टे विलि’ (माँस की पुकार), ‘अंचु पेण्णुगल’ (पाँच औरतें), ‘कयर’ आदि।

नाटक – ‘तोट्टिल्ला’ (पराजित नहीं हुआ) ।
आत्मकथा – ‘ओर्मयुटे तीरडू इलिल’ (स्मृति के तटों पर)।
यात्रा विवरण – ‘अमेरिकन तिरश्शीला’ (अमेरिकन पर्दा)

कृतित्व – तकषि शिवशंकर पिल्लै का कृतित्व संख्या की दृष्टि से बहुत अधिक होने के साथ-साथ विविध रूपों में है। उनके समग्र कृतित्व पर दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उसके एक नहीं, अपितु कई दौर हैं।

मुख्य रूप से तीन दौर हैं। इसे हम चरणवद्ध रूप में रखना चाहें, तो इसे तीन चरणों में इस प्रकार रख सकते हैं।

पहला चरण – यह तकषि के लेखन का आरंभिक दौर कहा जा सकता है। इस दौर में उन्होंने कहानी लेखन के साथ-साथ उपन्यास लेखन की शुरुआत की। इस दौर में उनकी लिखी हुई कहानियों पर बंगला कहानियों के रूमानी प्रभाव दिखाई देते हैं।MHD 16 Free Solved Assignment

उन्होंने सन् 1931 में (विवाह के दिन) नामक पहली कहानी लिखी जो ‘केसरी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई। धीरे-धीरे वे बंगला के रूमानी प्रभाव के साथ-साथ पाश्चात्य कथाकारों मोपांसा, जोला, स्टीफन ज्वींग आदि से प्रभावित होते गए। इस दौर की उनको अन्य कहानियाँ हैं-‘बिन नाम और तारीख का एक पत्र’ और ‘बाढ़’।

इस दौर में उनका पहला उपन्यास ‘प्रतिफलम्’ 1934 में दूसरा उपन्यास ‘पतित पंकजम्’ 1935 में और तीसरा उपन्यास ‘परमार्थगल’ 1936 में प्रकाशित हुआ। इन उपन्यासों में नारी की विवशता और शोषित दशा का मार्मिक चित्रण हुआ हैं।

दूसरा चरण – तकषि के इस दौर के लेखन स्वरूप पर किसी समालोचक ने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है “यह ठीक है कि बंगला के रूमानी और फ्रांसीसी के यौन प्रभाव को तकथि ने काफी पीछे छोड़ दिया और अब लेकिन साथ ही राजनीतिक प्रभाव के कारण लेखन में वैचारिक तत्व का बाहुल्य रहा, जिसने उसके कलात्मक पक्ष को काफी दबा दिया।”

उपर्युक्त मत को सामने रखकर तकषि के दूसरे दौर के लेखन को देखने से यह कहा जा सकता है कि इस दौर का उनका लेखन तीव्र गति से बदलती हुई तत्कालीन सामाजिक स्थितियों का प्रतिफल है।

इस दौर में वे जिस तरह मार्क्सवाद के गहरे प्रभाव में आकर यह तय कर चुके थे कि सामाजिक समस्याओं का समाधान साहित्य के द्वारा ही होना चाहिए।

इस प्रकार की मनोवृत्तियों के चित्र उनके इस काल के लेखन पर दिखाई देते हैं। इस दौर की उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘तोट्टियुडे मकन’ (भंगी का बेटा, 1945), ‘रंटटिड्षी ‘ ( दो सेर धान, 1948) ‘तलयोडु’ (कपाल, 1948) और ‘तेंडीवर्गम्’ (भिखारी वर्ग, 1950) आदि उपन्यास उल्लेखनीय हैं।

इसी दौर में उनके कुछ कहानी संग्रह ‘अतियोषुक्कुकल’ (अन्तर्धारा 1945), ‘नित्यकन्निका (अविवाहिता 1945), ‘चगानिकल’ (मित्र, 1945) तथा ‘इन्कलाब’ (1950) प्रकाशित हुए।

उनकी इस दौर की रचनाओं में तत्कालीन समाज के यथार्थपरक संवेदनशील चित्र प्रस्तुत हुए, जिनसे उन्होंने मलयालम कथा साहित्य के प्रतिनिधियों में अपना स्थान बना लिया।

तीसरा चरण – अपने लेखन के तीसरे दौर में आकर तकषि की विचारधारा बदल गई। वे हर प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर पूर्ण रूप से मौलिक लेखन में जुट गए।

इससे उनके सृजनात्मक क्षितिज का विस्तार होने लगा। इस दौर में उनको विश्वस्तरीय लोकप्रियता ‘चेम्मीन’ 1953 के प्रकाशन के द्वारा प्राप्त हुई।MHD 16 Free Solved Assignment

साहित्यिक महत्त्व – तकषि का मलयालम के कथाकारों में बहुत अधिक महत्त्व है। उनका महत्त्व उनको वैविध्यपूर्ण रचनाओं में उनके जादुई लेखन के फलस्वरूप है।

उनकी कविताएं, आत्मकथाएं, यात्रा वृत्तान्त कहानियाँ, उपन्यास, नाटक आदि इसके प्रमाण हैं। तकषि के साहित्य में एक नयी रीति की शुरुआत, मार्गान्तर की सृष्टि मौलिकता की प्रचुरता, व्यक्तिरिक्त विशेषता की प्रधानता आदि अधिक प्रभावशाली रूप में हैं।

उनकी अपनी एक खास तरह की ऐसी अभिव्यक्ति शैली है, जिसमें काल (समय) के अनुसार भाषा की पकड़ है।

इस प्रकार की भाषा शैली के द्वारा उन्होंने अपने आसपास और अध्ययन-मनन से प्राप्त हुए समाज का यथार्थपूर्ण चित्रांकन किया है। तकषि का सम्पूर्ण साहित्य स्वतंत्रता, समानता, सौहार्द आदि का साहित्य है।

उसमें सर्वहारा, बेरोजगार, वेश्याएं, निर्धन, भिखमंगे, भंगी, किसान आदि ज्वलंत प्रश्न के रूप में चित्रित हुए हैं।

उनका लेखन जनमानस का लेखन है। इस प्रकार का विषय वैविध्य उनकी रचनाओं को न केवल आकर्षक बनाता है, अपितु उन्हें मलयालम कथा साहित्य को विश्वकथा साहित्य के क्षितिज तक ऊंचा उठाने की योग्यता भी प्रदान करता है।

इस योग्यता के बलबूते पर वे विश्वस्तरीय कथाकारों में मलयालम के पहले कथाकार सिद्ध होते हैं। उनका ‘चम्मीन’ उपन्यास मलयालम का पहला विश्वविख्यात उपन्यास है।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि तकषि की मलयालम उपन्यास को देन अतुलनीय और अपूर्व है।

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प्रश्न 2 “संस्कार में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना को रेखांकित कीजिए।

उत्तर-संस्कार का सामाजिक परिवेश किसी भी कहानी अथवा उपन्यास का सामाजिक परिवेश उसकी स्वाभाविकता और सजीवता का निर्धारण करता है। यह सामाजिक परिवेश देश, काल और परिस्थिति से मिलकर बना होता है।

चन्द्रकान्ता जैसी वायवी रचनाएं मनोरंजक तो हो सकती हैं, पर किसी भी सामाजिक सत्य का उद्घाटन कर सकने में समर्थ नहीं होतीं दूसरी तरफ शेखर एक जीवनी या गोदान जैसे उपन्यास चाहे व्यक्ति केन्द्रित हों या फिर समाजोन्मुख, वे किसी न किसी वृहद् सामाजिक सत्य का उद्घाटन करते हैं।

हिन्दी उपन्यास या यूं कहें कि हिन्दी साहित्य के विकास में चन्द्रकान्ता अथवा चन्द्रकान्ता संतति जैसे उपन्यासों के महत्व को नकारा तो नहीं जा सकता है, परन्तु मनोरंजन मात्र का उद्देश्य लेकर चलनेवाली रचना साहित्य की कोटि पर बहत खरी नहीं कही जा सकती।MHD 16 Free Solved Assignment

ऐसे उपन्यासों में घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती दिखाई जाती हैं कि पाठक कौतुक और आश्चर्य से ठगा रह जाता है और बुद्धि और विचार से उसका नाता ही टूट जाता है।

इन उपन्यासों का स्वाभाविकता से कोई वास्ता नहीं होता। जहाँ तक सामाजिक उद्देश्य को लेकर लिखे जानेवाले साहित्य का संबंध है, अपने कथानक के आधार पर वह नाटकीय या चरित्र प्रधान में से कुछ भी हो सकता है।

सामाजिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे जाने के बावजूद प्रेमचन्द कृत ‘गोदान’ या अमृतला नागर रचित नाच्यो बहुत गोपाल’ जैसे उपन्यासों को सामाजिक कहने की बजाय सामयिक कहना ज्यादा उचित प्रतीत होता है क्योंकि सामाजिक उद्देश्य से लिखी गई इन रचनाओं में काल एवं स्थान सापेक्ष समाज का ही चित्रण होता है।

शास्त्रीय शब्दावली में नाटकीय उपन्यास कहे जानेवाली इन रचनाओं में कथानक किसी एक वर्ग विशेष अथवा जीवन शैली में ही केन्द्रित रहता है, जिससे कि घटनाओं में नाटकीयता आ जाती है।

ऐसे उपन्यासों में कथानक तथा चरित्र के बीच की दूरी प्रायः समाप्त हो रहती है और इसके पात्र घटना प्रधान उपन्यासों की तरह न तो कथानक तंत्र के पुर्जे होते हैं और ना ही इन उपन्यासों का कथानक चरित्रों के चारों ओर का मुखौटा मात्र होता है, जैसा कि चरित्र प्रधान उपन्यासों में देखा जा सकता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो नाटकीय उपन्यासों में न तो कथानक ही पात्रों को चारों ओर से घेरे रहता है और न पात्र ही कथानक के अविभाज्य अंग होते हैं।

पहले ही चर्चा की जा चुकी है कि समाज से कटकर या उससे विरत होकर तो चरित्र प्रधान उपन्यासों की रचना कर पाना भी संभव नहीं।

सच तो यह है कि न तो कोई उपन्यास विशुद्ध तौर पर चरित्र प्रधान हो सकता है और ना ही विशुरू रूप से नाटकीय या सामयिक सुविधा की दृष्टि से किसी एक तत्व की गौणता या प्रधानता के अनुसार उन्हें चरित्र प्रधान या नाटकीय आदि वर्गों में बाँट दिया जाता है।

इस प्रकार चरित्र प्रधान उपन्यासों में यदि पात्र अपरिवर्तनीय रहते हैं और दृश्य परिवर्तनशील तो नाटकीय उपन्यासों में दृश्ययोजना नहीं बदलती, जबकि पात्रों में मानवीय अनुभवों के विस्तृत परिसर के दर्शन होते हैं।

इस तरह किसी भी उपन्यास में संयोजित सामाजिक चेतना उसके परिवेश से कटकर नहीं हो सकती। जबकि यह सामाजिक परिवेश उपन्यास की कथावस्तु, उसमें दर्शाए गए स्थान एवं काल और उसके पात्रों के सम्मिलन से बनता है। MHD 16 Free Solved Assignment

संस्कार में निरूपित सामाजिक चेतना को हम इन तत्वों के आधार पर देखने परखने की कोशिश करेंगे।

प्रश्न 3 मानविनी भवाई की कथावस्तु का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- ‘मानवीनी भवाई’ गुजराती साहित्य के जाने-माने कथाकार पन्नालाल पटेल की अमर कथाकृति है। इसमें गुजरात के ग्रामीण परिवेश का यथार्थपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया गया है।

इसे कथाकार ने अपनी काव्यमयी कल्पना के द्वारा अधिक सरस और हृदयस्पर्शी रूप में सामने लाने का सफल प्रयास किया है।

इसके कथा-परिवेश के बारे में हम कहना चाहें, तो यह कह सकते हैं कि इसकी कथा ग्रामीण परिवेश की है। दूसरे शब्दों में, यह एक आँचलिक उपन्यास है। इसलिए इसमें एक विशेष प्रदेश की कथा का बड़ा ही कलात्मक निरूपण हुआ। है।

इस आधार पर अगर हम कहना चाहें तो इसे हम प्रादेशिक उपन्यास भी कह सकते हैं। इस प्रादेशिक उपन्यास का कथास्वरूप खेतिहर जीवन का ही है।

यहाँ के निवासी केवल खेती के ही सहारे अपना जीवन जीते हैं। इसके लिए वे अनेक प्रकार की मुसीबतों को झेलने के लिए बार-बार मजबूर होते रहते हैं।

पन्नालाल ने अपने उस प्रादेशिक अंचल को अपनी आँखों से देखा और पूरापूरा अनुभव किया था। यह इसलिए कि उनका पूरा तो नहीं, लेकिन अधिकांश समय इसी अंचल विशेष में बीता था। इससे उन्होंने अपने ‘मानवीनी भवाई’ उपन्यास का प्रमुख पात्र किसान को ही रखा।

इसके द्वारा उन्होंने खेती को जीवन आधार बनाने वाले गाँव और वहाँ के गरीब लोगों के जीवन में ऋतुओं के आने-जाने के प्रभाव से बदली हुई दशा का ध्यानाकर्षक चित्रण किया है।

उन किसानों की जीवनगाथा को इस उपन्यास में बार-बार दिखलाने का प्रयास किया है। इस प्रकार इस उपन्यास की कथा में खेती, गाँव, मैदान, पूरा ग्रामीण अंचल, ऋतुओं और मौसमों के अनुसार रंग लाती हुई फसलें, धरती के रंग-रूपों और इनसे संबंधित प्रासंगिक कथाओं के ताने-बाने बुने गए हैं।

इस उपन्यास में गरमी के समय किसानों द्वारा खेतों में खाद डालना, आषाढ़ आने से पहले कई बार खेतों की जुताई करना, फिर अच्छे बीजों के द्वारा बुवाई करना आषाढ़ के बाद भादो के शुरू होते ही खेतों में अनावश्यक रूप से निकली हुई घासों की निराई करना, सावन तक फसल की अच्छी तरह से देखभाल करना और क्वार आते-आते – फसल के पक जाने पर उसकी खुशी-खुशी कटाई करना आदि के चित्र इसमें दिखाई देते हैं।

गर्मी और बरसात के बाद कार्तिक से लेकर चैत्र तक गेहूँ, चने, सरसों आदि की फसल को किसान पूरे जाड़े भर अपनी कड़ी मेहनत और लगन से किस प्रकार तैयार करता है, इसे भी उपन्यासकार ने इस उपन्यास के कथाक्रम में रखने में सफलता हासिल की है।MHD 16 Free Solved Assignment

इस कथाक्रम में पाठक वर्ग के मनोरंजन और आनंद का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है। इसके अंतर्गत यह दिखलाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार किसान विभिन्न प्रकार के गीतों और बाजों से अपनी किसानी की कठोरता को सरस बनाने में सफलता हासिल कर लेता है।

हम यहाँ यह देख सकते हैं कि वर्षा ऋतु के आते ही फसलों पर बैठकर दाना खाने वाले पक्षियों को भगाने के लिए मचान बनाए जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ‘मानवीनी भवाई’ नामक इस उपन्यास की रचना उपन्यासकार पन्नालाल पटेल ने खेत में मचान पर बैठकर ही की थी।

इस उपन्यास की कथावस्तु में केवल किसानों और उनकी किसानी का ही यथार्थपूर्ण चित्रों में ग्रामीणों द्वारा समय-समय पर मनाए जाने वाले तिथि त्योहारों, अंधविश्वासों, मान्यताओं और जीवन दृष्टि के चित्र हैं।

इसमें हम यह देखते हैं कि किस प्रकार यहाँ वे स्त्री-पुरुष और बच्चे विवाह के समय ढोलक की ताल पर नाचते-गाते हुए थिरकते हैं।

विवाह के समय परस्पर किस प्रकार लोग एक-दूसरे के यहाँ आते-जाते हैं। यही नहीं, किसी मुसीबत और परेशानी के आने पर न केवल एक दूसरे को सांत्वना देते हैं, अपितु एक दूसरे की मदद भी करते हैं।

इसी प्रकार के सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हुए उपन्यासकार ने सामाजिक मान्यताओं जैसे अनेक प्रकार के अंधविश्वासों-टोना टोटका, जंतर-मंतर धागा ताबीज ओझा, भूत-प्रेत आदि को भी कधाक्रम में रखने का सफल प्रयास किया है। ये सभी उल्लेख मुख्य कथा से घुले मिले हुए हैं।

इनसे मुख्य स्थानीय बोली और भाषा में वहाँ के प्रचलित मुहावरों-कहावतों से प्रस्तुत करके बहुत । बड़ी सफलता प्राप्त की है। इस उपन्यास में प्रस्तुत कालक्रम का विशेष महत्त्व है। इसे उपन्यासकार ने बड़ी सावधानी से प्रस्तुत किया है।MHD 16 Free Solved Assignment

इस दृष्टि से यदि हम देखते हैं कि इस उपन्यास में कथाक्रम निरन्तर गतिशील है, जो वर्ष 1900 के फलक पर रचा गया है। उस समय आए हुए अकाल की भयानकता सर्वविदित है और उसे “छप्पनिया अकाल’ कहा गया,

इसलिए उस अकाल को काल का एक विकट और क्रूर रूप ही कहा जा सकता है। इस अकाल का वर्णन उपन्यासकार ने बड़े ही सजीव और मर्मस्पर्शी रूप में किया है। एक उदाहरण देखिए :

“कालू के रास्ते में पड़ने वाला छप्पन के अकाल का मारा जंगल मानो खाने को दौड़ रहा था। पक्षी भी भूख और प्यास से बिलबिला रहे थे। चैती हवा भी बिगड़ गई थी। ऐसी जली-भुनी धरती मानो कालू के पाँवों की दुश्मन बन गई थी, इस तरह वह आग उगल रह थी।”

इस उपन्यास में प्रयुक्त हुई भाषा स्थानीय और आंचलिक शब्दों की है। यही नहीं, इसमें उस स्थान और अंचल के मुहावरे और कहावतों के भी प्रयोग यथास्थान हुए हैं।

कालू को आपबीती सुनाती हुई राजू के कथन में प्रयुक्त हुई स्थानीय और आँचलिक भाषा और मुहावरों-कहावतों का एक उदाहरण देखिए:”एक दिन मैं दुकान पर अनाज लेने गई। सेठ ने मेरे शरीर का बखान किया और मेरे साथ छेड़छाड़ करने लगा। उस दिन मैं खाली हाथ वापस आ गई।

लौटते समय मेरे मन में तरह-तरह के विचार उठने लगे। मैं सोचने लगी कि यदि मैं मरद होती, तो उस सेठ का खू ही कर डालती और उसके गोदाम को भूखे लोगों द्वारा लुटवा देती।”

इस उपन्यास की विशेषताएँ औपन्यासिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अगर हम इसे पात्रगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से देखते हैं, तो हम यह पाते हैं कि यह उपन्यास अधिक सफल और सार्थक है।

इसमें दोनों ही प्रकार के पात्रों की संयोजना उपन्यासकार ने बड़े ही आकर्षक रूप में की है। ये दोनों ही प्रकार के पात्र हैं- मुख्य और गौण इस प्रकार के पात्रों की संयोजना करके उपन्यासकार ने उनके वैयक्तिक चरित्र को सामने लाने का प्रयास किया है। वह वैयक्तिक चरित्र मानव विरोधी न होकर मानव समर्थक है।

मुख्य पात्रों में कालू और राजू के वैयक्तिक चरित्र इसी प्रकार के हैं। इन दोनों पात्रों की चारित्रिक विशेषताएं प्रेरक रूप में हैं। उनमें पहली विशेषता यह है कि वे दोनों सच्चे प्रेमी हैं। उनका प्रेम एकनिष्ठ और अन्यतर है।

उन दोनों का परस्पर प्रेम स्वार्थ पर नहीं अपितु त्याग पर टिका हुआ है। दोनों में पूरी मानवीय भावना भरी हुई है। अगर हम उस उपन्यास के प्रमुख पात्रों विशेष रूप से कालू, राजू और माली के चारित्रिक वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालना चाहें, तो वह यह हो सकता है कि कालू एक सरल, उदार, सच्चा प्रेमी और निष्ठावान चरित्र है।

उसका प्रेम राजू के प्रति अटल, अचल और अडिग है। वह किसी भी परिस्थिति को झेलने के लिए तैयार है, लेकिन राजू के प्रेमजाल से मुक्त नहीं होना चाहता है। हम उसकी इस स्थिति को आरंभ से अंत तक देखते हैं। इस उपन्यास का दूसरा प्रमुख पात्र है-राजू राजू कालू की प्रेमिका है।

वह भी अपना एकनिष्ठ प्रेमभाव राजू के प्रति बनाए रखती है। उसके लिए यह तभी तक संभव होता है, जब तक वह दयालजी के साथ विवाह के बंधन में नहीं बँध जाती है।

जब वह विवाह के बंधन में बँधकर ससुराल जाती है, तब वह काल के प्रेमपाश को अनुचित समझकर उसे भूल जाना ही अपना पतिव्रता धर्म समझ है।MHD 16 Free Solved Assignment

हालाँकि उसका पति दयाल जी रोगग्रस्त और लूला है, फिर भी वह उसकी सेवा में अपना जीवन बिताना अपना परम कर्त्तव्य समझती है। इस प्रकार वह इलाज के लिए रात-दिन एक किए रहती है। जरूरत पड़ने पर वह । अपने जेवर गिरवी रख देती है।

उसके इस पुनीत कर्त्तव्य को देखकर कालू अपनी मर्यादा को अच्छी तरह से समझने लगता है। वह हर कोशिश करके उसका निर्वाह भी करता है।

इस उपन्यास का तीसरा प्रमुख पात्र है- माली। यह एक ऐसा नारी पात्र है, जिसे खलनायिका कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए कि उसका हर कार्यकलाप नायक कालू और नायिका राजू के प्रति दुखद है।

वह तो आरंभ से कालू के प्रति बहुत ईर्ष्याभाव रखती हुई दिखाई देती है और इस दुखद भाव को जीते जी नहीं छोड़ पाती है। इस प्रकार पात्रों की दृष्टि से यह उपन्यास अधिक प्रेरक, रोचक और श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

इसके लिए अगर किसी पात्र की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण और सराहनीय कही जा सकती है, तो वह है, इस उपन्यास की नायिका राजू का चरित्र सचमुच, राजू का चरित्र एक भारतीय आदर्श नारी के रूप में हमारे सामने उभरकर आया है।

लेखक ने उसके यौवन का वर्णन करते हुए उसे वसंत ऋतु की हरी-भरी और विविध रंगों वाले फूलों से लदी प्रकृति की तरह कहा है। इससे वह कालू को भी प्रेरित करती रहती है।

उससे वह प्रेरित भी होता है। उसमें शरद् बाबू के नारी पात्रों के समान अतिरिक्त भावुकता नहीं है। इस प्रकार वास्तविकता के धरातल पर उसके चारित्रिक वैशिष्ट्य विकसित हु

उपन्यासकार ने उपन्यास के अन्य पात्रों में भली, नाना, परमा, पटेल, कालू के माँ-बाप, रूपा वाला फूली, डोसी है। इन सभी पात्रों के चरित्र को उपन्यासकार ने अपेक्षित रूप में उभारने का प्रयास किया है। फलस्वरूप ये सभी पात्र अपने उच्च और आकर्षक चरित्र से पाठकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं।

अगर हम इस उपन्यास के सभी । पात्रों को चारित्रिक वैशिष्ट्य की गहराई से देखें तो हम इस बात से सहमत होंगे कि इनमें से केवल एक ऐसा पात्र है, जिसके चरित्र को पाठक नहीं भूल सकता है। वह पात्र है माली और उसका चरित्र है मानव विरोधी। माली का चरित्र साधारण नहीं है।

वह इतना असाधारण है कि उससे उपन्यास के प्रायः सभी पात्र प्रभावित हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि माली सगी बेटी को भी सुखी नहीं रहने देती, बहुओं और नाती-पोतों को भी शान्ति से खाने पीने नहीं देती।

वह अपने इज्जतदार और प्रतिष्ठित पति को भी अकारण गालियाँ दे-देकर उसकी इज्जत को दो कौड़ी की कर देती है। MHD 16 Free Solved Assignment

राग-द्वेष से सुलगती माली अंत में लुटेरों के हाथों लूटी जाती है और बेरहमी से उनके हाथों मारी जाती है। अंत में हम वस्तु-चित्रण और वर्णन के प्रति अपना मत रखना चाहेंगे।

इस विषय में हमें यह कहना है कि उस उपन्यास में प्रस्तुत हुए वस्तु-चित्रण और वस्तु-वर्णन सरस और अधिक रोचक हैं।

मानवीय व्यापारों की तरह कथाकार ने प्रकृति के नाना व्यापारों का बड़ा ही सजीव रूप रखने में अपनी अद्भुत क्षमता का परिचय दिया है।

इसे उसने काव्यात्मक शैली के माध्यम से प्रस्तुत करने में काफी हद तक सफलता हासिल की है। इसी प्रकार उपन्यासकार ने अनेक प्रकार की घटनाओं की आकर्षक प्रस्तुति की हैं।

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प्रश्न 4 जंगल के दावेदार उपन्यास की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- 1895 से 1900 ई. तक के मुंडा विद्रोह के नायक बिरसा मुंडा को लेकर महाश्वेता देवी का यह ‘जंगल का दावेदार’ उपन्यास है। उपन्यास परोक्ष अवदान की नींव के ऊपर खड़ा है।

कुमार सुरेश सिंह नामक ऐतिहासिक नृतात्विक के लिखे। किताब ही ‘जंगल के दावेदार’ के उत्स का मूल है। परोक्ष उपादान की नींव के आधार पर ही महाश्वेता ने समग्र उपन्यास को अपने अनुसार लिखा है।

पूरा उपन्यास ही प्रायः कथोपकथन शैली में लिखा गया है। उपन्यास में रचनाकाल (1975) के एक विशेष दृष्टिकोण से पचहत्तर वर्ष पहले की एक घटना को चित्रित किया गया है।

बिरसा के समय से अनुभव को लेना और जीवन के निरीक्षण का समय सुयोग न रहने के बावजूद इस उपन्यास में कितनी साधारण और दीर्घस्थायी वास्तविकता अंकित की गई है।

लेकिन मुंडाओं के दैनिक जीवन के क्रियाकलाप खूब स्पष्ट रूप से उभरकर सामने नहीं आ पाये हैं। समग्र उपन्यास में चरित्रों का परम्परागत संलाप ही कहानी को गति प्रदान करता है।

इस तीव्र गति के संलाप के फलस्वरूप ही मुंडा जीवन की तत्कालीन वास्तविकता को कितने विशद रूप से चित्रित किया गया है।MHD 16 Free Solved Assignment

महाश्वेता अपने कैनवस को एक निश्चित सीमा के अंदर रखती हैं सिर्फ आदिवासी मुंडा तथा बिरसा ही उनके कलम के जादू से निखर पाये हैं, जिसके फलस्वरूप शोषण और दरिद्रता का भयावह रूप जो सिर्फ आदिवासी जीवन में ही सीमित नहीं था बल्कि अभी भी उसी तरह व्यापक है यह बात ‘जंगल के दावेदार में नहीं आ सकी है। मुंडाओं का विद्रोह समकालीन सामंतवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह था।

‘जंगल के दावेदार की भूमिका में ही महाश्वेता ने पाठकों का ध्यान इस तरफ आकर्षित किया है। उपन्यास में मुंडाओं के विद्रोह की ऐतिहासिक परम्परा को महाश्वेता देवी ने स्पर्श किया है, जो वास्तविक इतिहास के सत्य को ही प्रतिष्ठित करता है।

संथाल विद्रोह (1855) के संदर्भ में वर्णित हुआ है:”मुंडाओं के सभी लड़के चंदा लेकर ही खुटकट्टि व्यवस्था की जमीन पर दखल बनाए रख सकते थे। सवताल जंगल काटकर जो जमीन हासिल करते थे, उसका नाम दामीन ई को था।

सवतालों के जीवन के साथ ही साथ उनके दामिन-ई-को में भी ‘दिकु’ लोग आ टूटे।” इतिहास के साथ साल-तारीख मिलाकर भी देखा जा सकता है कि मुंडाओं के विद्रोह के साथ महाश्वेता के जंगल के दावेदार की अत्यधिक समानता है।

सुप्रकाश राय के मुक्तियुद्ध भारतीय कृषक’ ग्रंथ और भारतीय कृषक विद्रोह और गणतांत्रिक संग्राम के वर्णन से भी जाना जा सकता है।

“1895 के नवम्बर महीने में बिरसा को अढ़ाई साल एवं उसके अनुयायियों को विभिन्न समय के लिए सश्रम कारावास का दंड दिया गया था।” वे और लिखते हैं, “जमींदारों महाजनों के इस उत्पीड़न एवं शोषण के साथ ही साथ महामारी और अकाल के आक्रमण ने भी आदिवासियों को ध्वंस के करीब ला पटका।

जमींदार समूहों के भयंकर उत्पीड़न और अनावृष्टि के चलते 1897 में समग्र मुंडा अंचल में एक भयानक दुर्भिक्ष देखने को मिला । अनाचार के चलते अत्यधिक लोग मृत्यु के ग्रास बने।

इसके अतिरिक्त 1898 में गर्मी के समय समस्त मुंडा अंचल में हैज़ा महामारी का फैलना, जिससे सैकड़ों आदिवासी चिकित्सा के अभाव में मृत्यु के ग्रास बने।

इससे आदिवासी कृषकों में हाहाकार मच गया। इस अवस्था में बिरसा एवं उसके अनुयायी 1897 के जनवरी महीने में जेल से मुक्त होकर मुंडा अंचल में वापस आए। बाहर आकर मुंडाओं की यह चरम अवस्था देखकर बिरसा और स्थिर न रह सके।” MHD 16 Free Solved Assignment

विभिन्न लेखकों की रचनाओं में हैजा या चेचक के बारे में तथ्यगत अन्तर देखने को मिलता है। किन्तु ‘जंगल के दावेदार में हैज़े के प्रतिरोधक के रूप में बिरसा की भूमिका आलोकप्राप्त गुणी या ओझा के रूप में उभरकर सामने आती है। रोगियों के कष्ट भोगमृत्यु की गणना उस तरह प्रकाश में नहीं आ पायी है।

“स्पर्शआतुर मानवीय वेदना से भी वस्तुवादी ऐतिहासिकता को ‘अंगीकारबद्धता’ की भावना ज्यादा मुखर या प्रकाश में आ पायी है हो सकता है कि इसीलिए वेदना बोध की भावलोलुपता को लेखिका ने छोड़ दिया हो।

या ऐसा भी हो सकता है कि प्रत्यक्ष अनुभव की अभिज्ञता के मुँह में ईश्वरीय वाणी के रूप में हैजे से बचाव का दिशा निर्देश दिलवाया हो। धर्म एवं राजनीति को एकत्रित करके मुंडा लोगों के बहुईश्वरवाद से एकेश्वरवाद में लाने की चेष्टा भी बिरसा ने की थी।

इस बारे में सुप्रकाश राय लिखते हैं-“स्वजातियों की मुक्ति साधने में निवेदित प्राण ही इस मुंडा नायक को उसके धार्मिक और राजनैतिक संग्राम के बीच से मुंडावासियों के भीतर जो नई चेतना का संचार करता है,

उनके मध्य (बीच) मनुष्य बन के बचे रहने की जो तीव्र आकांक्षा पैदा कर देता है, उसी के लिए उसे (बिरसा) भगवान के आसन पर बैठा दिया जाता है।

आज भी बिरसा उस उच्च आसन पर प्रतिष्ठित है।” महाश्वेता द्वारा चित्रित मुंडाओं के इस स्वप्न या परिकल्पना के बीच एक विरोध या असामंजस्य लक्षित किया जाता है।

इसमें दिखाया गया है कि नये समाज जीवन व्यवस्था की तैयारी के लिए पुराने युग के धर्म को त्याग करके बिरसाइत होना पड़ेगा। जिस व्यवस्था को फिर से वापस मांगा जा रहा है वह है भी आदिम ग्राम-व्यवस्था। जिसमें आदिम ग्राम व्यवस्था को छोड़कर नयापन कुछ भी नहीं है।

मुंडाओं के बहुईश्वरवाद के बदले धर्म एवं राजनीति को एकत्रित करके बिरसा ने जो चेष्टा की थी. उसके मूल्यांकन में सुप्रकाश राय लिखते हैं- “स्वजातियों की मुक्ति चेतना के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देने वाली इस मुंडा नायक ने उनमें धर्मीय एवं राजनैतिक संग्राम के जरिए जो नई चेतना का संचार किया,

उनके बीच मनुष्य बने रह की जो तीव्र आकांक्षा जगा पाया, उसी के लिए उन्होंने भगवान के आसन पर बिठा दिया” आज भी वह उसी आसन पर बैठा है। MHD 16 Free Solved Assignment

बिरसा अपने ईश्वरीय शक्ति में स्वयं विश्वास करना आरम्भ कर दिए थे, इस धारणा के ऐतिहासिक तथ्य एवं सैद्धांतिक आधार रहे हैं।

महाश्वेता ने भी लिखा है “बिरसा जानता था कि बन्दूक में क्या क्षमता होती है। किंतु वह तो भगवान किन्तु बिरसा यह भी जानता था कि हार-जीत सफलता – विफलता से सभी युद्धों को विचार नहीं किया जा सकता …. किन्तु यह वक्तव्य उस काल की कसौटियों पर चढ़ा दी गई है, एवं वर्तमान समय में बिरसा आंदोलन का मूल्य बिरसा पर आरोपित हुआ है।

क्योंकि जिस समय में आन्दोलन की सफलता व्यर्थता के मूल्यांकन की आवश्यकता थी उस समय के बीच बिरसा की मृत्यु जेल में ‘हैज़े’ (निश्चय ही संदेह है कि यह रोग या अंग्रेज की साजिश के चलते) से हो गई।

मुंडा विद्रोह में बिरसाइतों एवं अंग्रेज वाहिनी के बीच हुए युद्धों का रूप और प्राकृतिक ऐतिहासिक वर्णन सच्चिदानंद के एक ऐतिहासिक ग्रंथ में पाया जाता है: इस सम्बन्ध में सुप्रकाश राय अपनी पुस्तक ‘भारत में विद्रोही संग्राम का इतिहास में लिखते हैं “सेना एवं सशस्त्र पुलिसवालों की कुल संख्या मात्र 300 थी।

सुप्रकाश राय और भी लिखते हैं- “विद्रोहियों ने चारों तरफ फैल कर राँची एवं सिंहभूम जिले में ” लगातार दो महीने तक युद्ध जारी रखा।”

किंतु यह तथ्य विश्वासयोग्य नहीं मालूम पड़ता, क्योंकि नेतृत्वहीन, आग्नेयास्त्रहीन और लक्ष्यविहीन विद्रोहियों द्वारा लगातार दो महीने तक युद्ध जारी रखना युद्ध के नियमानुसार मुश्किल ही नहीं बल्कि असम्भव भी था।

महाश्वेता भी उपन्यास वर्णना में लिखती हैं :-……..साहब और सरकार के साथ बड़े दिन की देर रात से लेकर 9 जनवरी 1900 ई. तक चला। अर्थात मात्र 16 दिन में युद्ध समाप्त हो गया था।

किसी-किसी क्षेत्र में महाश्वेता के उपन्यास में इतिहास की भ्रांति देखी जा सकती है जिससे उपन्यास ऐतिहासिक धरातल से दूर खड़ा दिखलाई पड़ता है।MHD 16 Free Solved Assignment

ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन काल में ही आदिवासी अपने वनों एवं वन्य सम्पदा से विजड़ित एवं निर्मूल हो रहे थे, जिसके चलते आदिवासियों को विद्रोह एवं विक्षोभ बढ़ता रहा। कोल एवं मुंडाओं के विद्रोह के बारे में हमलोग इस अध्याय के शुरू में ही जानकारी प्राप्त कर चुके है।

इस काल में अन्य आदिवासी जातियों ने भी कई बार विद्रोह किया। इसके फलस्वरूप एक कानून बना, जिसके द्वारा आदिवासियों को बहुत कम अधिकार दिए गए लेकिन इसी के साथ-साथ राष्ट्र के शासन तंत्र के लिए पुलिस एवं सामरिक वाहिनियों का कार्य व्यापार बढ़ने लगा। ‘जंगल के दावेदार’ उपन्यास में ‘अधिकार’ का प्रश्न उठता है।

“देखा जाता है कि जो मुंडा कानून नहीं जानते, अदालत नहीं जानते, जज क्या बोल रहा है नहीं जान पाते, वे प्रचलित निवासों का अधिकार खोने लगे” ।

अधिकार रक्षा के लिए असहिष्णु विद्रोह या प्रतिवाद करने से सेना या पुलिस वाहिनी द्वारा उन्हें दबा कुचल दिया जाता। जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश द्वारा प्रचालित कानून की पवित्रता’ के प्रति उनमें भय और घृणा पैदा हो गई।

क्रमशः उनके मन में यह बात बैठती गई कि ब्रिटिश कानून में यथार्थ विचार या सत्य विचार नहीं है। जंगल के दावेदार’ में इसी उपलब्धि को संचारित होते देखा गया है: सरदार केस करने गए, केस हुआ क्या ?

कानून के समक्ष उनकी बात खड़ी हो पायी? फिर कानून का यह अधिकार प्रायः बाजार के क्रय द्रव्य में परिवर्तित हो गया, जब देखा गया कि अदालत के शरणापन्न होने जाकर मुंडा लगातार प्रताड़ित होते। इतिहास एवं उपन्यास दोनों का एकाकार होना वांछनीय नहीं है।

जंगल के दावेदार में ये घटा भी नहीं है। महाभेता ने इस उपन्यास में मुंडा विद्रोह के मल निर्णायक तत्व उसके अपने मूल रूप में रखे हैं। मूल तथा केन्द्रीय चरित्र बिरसा के जीवन के परम्परागत विकास के लिए महाश्वेता को कल्पना की जरूरत अधिक पड़ी है।

यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वे उपन्यास लिख रही हैं. इतिहास नहीं। जिस देश में डेढ़ सौ वर्षों से इतिहास चर्चा का मतलब राजाओं, महाराजाओं, जमींदारों के सिंहासन आरोहण, अवरोहण की कहानी हो, उस देश में स्वभावतःजंगलवासियों के जीवन और संग्राम का व्यवस्थित इतिहास मिलना कठिन है।

बल्कि नयी इतिहास दृष्टि या चेतना विद्रोह क्षेत्र की तत्कालीन नजदीकी जन प्रतिश्रुत है। दायित्व स्वीकार करने का अपराध समाज कभी क्षमा नहीं करेगा। मेरा बिरसा केन्द्रित उपन्यास उसी प्रतिश्रुति का ही परिणाम है।

प्रश्न 5 निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए :

(क) परीक्कुट्टि’ का चरित्र

उत्तर- चेम्मीन दुःखान्त कथा का नायक है परीक्कुट्टि। तकषि दृढतापूर्वक मानते थे कि कथापात्र चलते-फिरते सहज मनुष्य हों।MHD 16 Free Solved Assignment

इसका मतलब यही कि जीवन की परिस्थितियों में प्रकट होनेवाली सहजता उसमें हो। चेम्मीन के ही नहीं, तकषि की सभी रचनाओं के कथापात्र इस प्रकार के हैं।

दिन प्रतिदिन सामने दिखाई देनेवाले मनुष्यों के समान सहज एवं सरल। परीक्कुट्टि का जन्म नीकुन्नम के सागर तट प्रदेश में नहीं हुआ था। उसका बाबा रु उसी प्रदेश का झींगा व्यापारी था। बाबा की हथेलियों में झूलकर बचपन ही में तट प्रदेश में 14 पहुँचा था।

उसी दिन उसे करूतम्म से एक भेंट मिली थी सागर तट से चुनकर सुरक्षित रखा गया एक बड़ा गुलाबी शंख उस स्नेह प्रकटन के पश्चात् दोनों उसी तट प्रदेश में मित्रता से रहे और बड़े हुए। फिर उनके मैत्री बंध में प्यार का नया रंग चढ़ा।

लेकिन परीक्कुट्टि ने कभी अस्य स्त्रियों के रीति-रिवाज़ एवं तमीज़ को तोड़ने की प्रेरणा नहीं दि। नाव का छावमबठकर बहुत कुछ हसत थाजसम दूसरा का हसा नहीं आता था।।

इसबीच, एक दिन उसने पूछा- नाव और जाल खरीदने का पैसा दोगे ? पिताजी की बातों को सुनकर ही उसने यह – मांग की थी; उसमें प्रेम का स्वर नहीं था; एक साधारण वाक्य ।

लेकिन उस वाक्य ने परीक्कुट्टि के ही नहीं दूर प्रदेश तृक्कुन्नप्पुषा के पलनि के जीवन को भी बदल डाला। करुतम्मा का परिवार शिथिल हुआ। परीक्कुट्टि एवं करुतम्मा के जीवन टूट गये। सर्वत्र दुरन्त फैलने लगा।

वह प्रश्न दुरन्त का बीज था। उस प्रश्न की प्रेरणा स्त्रोत परीक्कुट्टि का प्यार भरा हृदय था। लैला-मजनू के मजनू के समान, उसका एकमात्र ध्येय प्यार था। उसके प्रमाण स्वरूप जब जब चेम्पनकुंजु ने चाहा तब-तब उसने पैसे दिये।MHD 16 Free Solved Assignment

नाव खरीदी गयी जब अच्छी पकड़ मिली, उसका माल परीक्कुट्ट को न बेचकर उसने धोखा दिया। उसकी परवाह किये बिना परीक्कुट्टि ने अपने भंडार की सूखी मछलियाँ चेम्पनकुंजु को दे दी |

जिससे दूसरी नाव खरीदी गयी। ‘चाकरा’ के मौसम में असीम धन राशि मिली तो भी उसने परीक्कुट्टि के पैसे वापस नहीं दिये। परीक्कुट्टि चकना चूर हो गया। तब ‘चाकरा’ के सिलसिले में आये पलनि के साथ अपनी प्रेयसी के विवाह बन्ध पक्का करने की बात मालूम हुई।

उनके भावोज्वल विदाई के समय परीक्कुट्टि ने कहा तृक्कुन्नप्पुषा में रहनेवाली करुतम्मा की याद में नीर्छन्नम में बैठकर गाते गाते मैं जान दे दूंगा। प्रेम के लिए प्रेमवाली धारण को दृढ करने वाला मुहूर्त। करुतम्मा जब पलनि के साथ गयी तो अस्वस्थता से चक्कि गिर पड़ी।

तब उसने परीक्कुट्टि को बुला भेजकर अनेक दुःख भरी बातें बतायी और चेम्पनकुंजु की लालच की शिकायत की। उसके बाद उसने यह माँग की कि उसे करुतम्मा को बहन मानना चाहिए। चक्कि की मृत्यु की खबर देने गया।

चतुर्थवेदी (इस्लाम) जब मृत्यु की खबर देने गया तो करुतम्मा के जीवन में समस्याएँ बढ़ी। तृक्कुन्नपुषा के लोगों ने अफवाहें फैलायीं। पलनि अपनी पत्नी पर शक करने लगा।

गिरी नारी के पति पर विपदा आ। पड़ती है इस विश्वास से प्रेरित होकर कोई भी पलनि को अपनी नाव में ले जाना नहीं चाहता था।

पलनि अकेले छोटी नौका में काँटे में मछली फाँसने जाता था। समस्याएँ । बढ़ी। तब भी करुतम्मा एक धर्मनिष्ठ पत्नी बनकर रही करुतम्मा की छोटी बहन पंचमी ने आकर छोटे मियाँ की कष्ट-दशाएँ बतायी तो करुतम्मा ने पूछा- छोटे मियाँ कभी मेरी याद करते हैं? पलनि ने यह प्रश्न सुना तो उसका सन्तुलन नष्ट हुआ।

वह अपनी पत्नी के विश्वास को समझने की कोशिश कर रहा था। गुस्से में आकर पलनि अपनी छोटी नौका लेकर समुद्र में गया। उसी रात को परीक्कुट्ट ने आकर करुतम्मा को बुलाया।

उस आश्रय हीन पुरूष को, जो अपनी ही कारण सभी प्रकार से चकनाचूर हो गया था, एक पल का आश्वास प्रदान करना चाहा, करुतम्मा के अन्दर की प्रेमिका ने वह, बाकी सब भूल गयी समुद्र में गये पलनि को भी भूल गयी।

चाँदनी बिछी वह रात कालीरात बनी। परीक्कुट्टि का बुलावा स्वीकार कर करुतम्मा उसके साथ चली। दो दिन बाद सागर तट पर उनके शव दिखाई पड़े।MHD 16 Free Solved Assignment

करुतम्मा एवं परीक्कुट के प्रेम सम्बन्ध में अपूर्व कल्पना शक्ति एवं चारुता है। इसी दशा में परीक्कुट्टि साधारण पुरूष एवं नायक बन जाता है। लगता है एक साधारण व्यक्ति, दूसरों के ही समान; लेकिन सबसे भिन्न है। अपनी प्यारी प्रेयसी दूसरे की पत्नी बनी माता बनी।

तब भी उसके प्रति जो मनोदशा थी, उसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। यही अपूर्वता है। करुतम्मा के ही कारण परीक्कुट्टि की अजीविका, जीवन पारिवारिक संबन्ध सब नष्ट हुए यही साधारण धारणा हो सकती है।

लेकिन इस असाधारण नायक के मन में ऐसी धारणा नहीं थी। वे दोनों, विशेषकर परीक्कुट्ट चाहता था कि जीवन में साथ-साथ मिलन न हो पाए तो मृत्यु के बाद हो जाए। धन, कर्ज, घाटा, चेम्पनकुंजु का धोखा में से एक भी उसके लिए समस्या नहीं।

सभी भौतिक परिवेश में वह प्रेमी था केवल एक प्रेमी करुतम्मा के परिचय से प्रेरित होकर परीक्कुट्टि ने पैसे दिये यह जानकारी जब प्राप्त हुई तब चेम्पनकुंजु ने कर्ज चुकाना चाहा।

तब तक वह परीक्कुट्टि से कहा करता था कि ‘जब पैसा तब व्यापारा यह वाक्य सुनकर चुपचाप पराजित-सा परीक्कुट्टि लौट जाता था।

उसका एक ही कारण था करुतम्मा के प्रति प्यार पागल बनकर निराधार प्रेतात्मा की तरह तट प्रदेश में भटकनेवाला चेम्पनकुंजु, कुछ परीक्कुट्टि के हाथों थमा देट’ है।

तब उसने सोचा हो कि इस पैसे से जीवन दुबारा हरा-भरा बन जाएगा, तो वह परीक्कुट्टि बन नहीं पाता उसके लिए प्रेम ही सबसे मूल्यवान है। MHD 16 Free Solved Assignment

दूसरे दिन उसने करुतम्मा से मिलना चाहा। इस प्रकार के अपूर्व भावाविष्कार के मुहूर्त में उपन्यासकार सफलता प्राप्त करता है। सब ऐसा सोचते हैं की प्रेम का साक्षात्कार विवाह में है।

परीक्कुट्ट विवाह की सोचता तक नहीं। इसलिए घर छोड़कर भागने की बात भी नहीं जैसे जीवन की पूर्णता मृत्यु में है वैसे यहाँ प्रेम, मृत्यु से पूर्ण हो जाता है।

परीक्कुट्टि के ज़रिये तकषि ने अपूर्व प्रमानुभूति को अभिव्यक्त किया है। यह कथापात्र व्यक्त कर देता है कि तकषि का प्रेम दर्शन असाधारण है।

(ख) आधुनिक कन्नड साहित्य

उत्तर-आधुनिक काल में कन्नड़ साहित्य नवोदय, प्रगतिशील, नव्य बन्ध तथा दलित आदि धाराओं में विस्तार पा सका।

भारतीय भाषाओं में जो नवजागरण का काल था, वही कन्नड़ में नवोदय के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। नवोदय युग गद्य और पद्य दोनों विधाओं के लिए ही सर्वाधिक उर्वर सिद्ध हुआ।

इस युग को एक तरफ जहाँ मास्ति वेंकटेश आय्यंगर जैसे शीर्षस्थ लेखक ने अपने कथा साहित्य से समृद्ध किया, वहीं डी.आर. बेन्द्रे जैसे मूर्धन्य कवि ने उसे अपनी रचनाओं से सँवारा कन्नड़ भाषा एवं साहित्य में पुनर्जागरण का घोष करने वाली पीढ़ी के आधार स्तंभ मास्ति वेंकटेश कन्नड़ साहित्य के जनक समझे जाते हैं।

तो कन्नड़ में गर्व का भाव फूंकने वाले बेन्द्रे आधुनिक कन्नड़ काव्य के अगुआ।

चाहे वह राष्ट्रीय चेतना हो, परिवर्तन की कामना हो, भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण हो, परम्परा की शक्ति हो, रहस्यमयता का आवरण हो या फिर वैयक्तिता का भाव हो, नवोदय धारा के ये तमाम गुण बेन्द्रे के काव्य में देखे जा सकते हैं।MHD 16 Free Solved Assignment

जैसा कि स्वाभाविक था, स्वतंत्रता संग्राम ने प्रदेश के समृद्ध इतिहास के प्रति लोगों का रुझान बढ़ाया और नवोदय युग में चन्द ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे गए मास्ति वेंकटेश आय्यंगर का चक्कवीर राजेन्द्र और चन्नबासव नायक इसी कोटि के सुप्रसिद्ध उपन्यास हैं।

मास्ति और बेन्द्रे के अलावा बी. एम. श्रीकान्तैय्या और के.वी. पुट्टप्पा का अवदान भी नवोदय साहित्य धारा को संवारने में रहा है।

दरअसल, 1920 के दशक में अपने सुंदर अनुवादों से श्रीकान्तैय्या ने इस आंदोलन का सूत्रपात किया। इसके बाद बेन्द्रे और पुट्टप्पा ने अपनी रचनाओं से इसे गति दी।

इसके बाद ही शिवराम कारंथ अनन्तमूर्ति, लंकेश और भैरप्पा जैसे प्रभावशाली लेखकों की पंक्ति खड़ी हो गई।

गिरीश कर्नाड तथा खम्बार जैसे शीर्षस्थ नाटककारों ने कन्नड़ साहित्य की श्रीवृद्धि ही नहीं की, उसे विविधता भी दी। इनमें शिवराम कारन्य का प्रभाव तो खास तौर पर कर्नाटक की सांस्कृतिक चेतना पर बेहद रहा है।

सही अर्थों में वह पुनर्जागरण पुरुष कहे जा सकते हैं। अनन्तमूर्ति की तरह उनकी रुचियाँ और उपलब्धियाँ भी महज साहित्य तक सीमित न रह कर शिक्षा, विज्ञान और पर्यावरण तक पसरी हुई हैं।

कालजयी उपन्यासकार के रूप में ख्यातिप्राप्त कारन्य को कनन्ड़ में यथार्थवादी उपन्यास लेखन का सूत्रपात करने का श्रेय दिया जाता है।MHD 16 Free Solved Assignment

अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कारन्थ के प्रभाव को स्वीकार करते हुए अनन्तमूर्ति ने लिखा है, “मैं अपने अस्तित्व को तभी सार्थक बना सकता था, जबकि मैं अपने चारों तरफ़ घिरी सच्चाई को बेध सकता क्योंकि यह सच्चाई मुझे शेष दुनिया से अलग थलग कर देती थी। मैं बहुत सी पवित्र चीजों से घिरा हुआ था।

इसलिए मैं पेड़ के नीचे रखे पत्थर पर गुपचुप ढंग से पेशाब कर देता था, जबकि इस पत्थर की पूजा शक्तिशाली देवता के तौर पर किया करते थे।

इस तरह मैं रात के अंधेरे में डर से काँपते हुए खुद को यह साबित कर दिखाता था कि पत्थर सिर्फ पत्थर और महज पत्थर है। मैं उस ।

पवित्र समझे जाने वाले मठ का भी तिरस्कार करने लगा, जहाँ कि मेरे पिता काम करते थे क्योंकि यह मठ गरीब किराएदारों के साथ कानूनी कार्रवाइयों में ही उलझा रहता था।

मुझे आदर्श और यथार्थ के बीच का फ़र्क मालूम होने लगा था। इसी समय मैंने अपने महान उपन्यासकारों में एक कारन्थ का ‘चोमना डुडी’ पढ़ा।

यह अपनी जमीन को वापस चाहने वाले अछूत की त्रासद दास्तान है। अब तक मैं जिन समानी कहानियों का दीवाना था, वे मुझे बकवास लगने लगीं।

मैंने जाना कि अगर अपने आस पास दिखने वाले यथार्थ को इतनी सुन्दर कहानी में ढाला जा सकता है तो फिर मुझे सिर्फ उन चीजों को बारीकी से देखने-परखने की जरूरत है।

मेरे अग्रज जो कारन्थ की क्रांतिकारी विचारधारा से नफ़रत करते थे, वे भी उनकी लेखकीय कला की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते थे और उनके बारे में मुग्ध मन से बात करते थे।”

इस तरह अनन्तमूर्ति का रुझान यथार्थवादी साहित्य की तरफ हुआ।मराठी में दलित साहित्य की उन्नत परम्परा देखी जा सकती है। MHD 16 Free Solved Assignment

(ग) पन्नालाल पटेल का कृतित्व ।

उत्तर- वैसे देखें, तो पन्नालाल की दो मातृभाषाएँ थीं- गुजराती और राजस्थानी जन्म से आजणा पटेल। वे संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी तथा उर्दू भी थोड़ा-थोड़ा जानते थे। आजणा पटेलों में उनके पहले शायद ही कोई लेखक हुआ हो ।

परंतु पन्नालाल लेखक हुए; और इतना ही नहीं, बड़े सर्जक के रूप में प्रसिद्ध हुए। भारतीय साहित्य में जो स्थान सरस्वतीचंद्र (गोवर्धनराम त्रिपाठी), गोरा (रवीद्रनाथ), श्रीकांत (शरबाबू) आदि का है, वही स्थान पन्नालाल की कृति ‘मानवीनी भवाई का भी है।

पचास वर्ष से भी अधिक समय तक उन्होंने लेखन कार्य किया और सौ से अधिक पुस्तकें लिखीं; चार सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। इस तरह उन्होंने गुजराती कथा साहित्य को समृद्ध किया। बीस से अधिक उनके कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कुछ प्रमुख कहानी संग्रह इस प्रकार हैं

(1. सुख-दुःखना साथी (1940)
(2. जिदंगीना खेल (1941)

(3. जीवोदांड (1941)
(4. लख चोरासी (1944)

(5.साचा समणां (1949)
(6. वात्रकने काँठे (1952)

(7. पन्नालालनो वार्ता वैभव (1954)
(8. ओरता (1954)

(9.परवाड़ा (1956)
(10. पचालालनी श्रेष्ठ वार्ताओ (1958)

(11.मनना मोरला (1958)
(12. पानेतरना रंग (1961)

(13. धरती आभनाँ छटा (1962)
(14.डालसो (1964)

(15. चितरेली दीवालो (1965)
(16.मोरलीना मूगा सुर (1966)

(17. भांळो (1967)
(18.वातनो कांटको (1969)

उन्होंने सौ से भी अधिक उपन्यास लिखे, जिनमें सामाजिक उपन्यास विशेष महत्वपूर्ण हैं। जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने पौराणिक उपन्यास भी लिखे। जिस दौरान शहर में रहे, उस समय नगर जीवन पर भी उपन्यास लिखे।

इतिहास के प्रसंगों, दंतकथाओं, तथा लोककथाओं को लेकर उन्होंने छोटे-बड़े उपन्यास और कहानियाँ लिखीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नाटक, एकांकी और बाल साहित्य भी लिखा । : ‘अलप – झलप’ (1973) और ‘अलक मलक’ (1986) ये दोनों आत्मकथात्मक संस्मरण ग्रंथ हैं।

इसी तरह एकाधिक भागों वाला ‘ज़िदंगी संजीवनी’ नामक उपन्यास उनके अपने अनुभव पर आधारित आत्मकथात्मक उपन्यास कहा जा सकता है। ‘जेणे जीवी जाण्यु उपन्यास पू. रविशंकर महाराज के जीवन पर आधारित चरित्रात्मक उपन्यास है।MHD 16 Free Solved Assignment

दूसरी भाषाओं के उपन्यासों-कहानियों का अनुवाद भी उन्होंने किया। मात्र आठवीं कक्षा तक की स्कूली शिक्षा पाए पन्नालालं का नाम विश्व के बड़े रचनाकारों की पंक्ति में लिखा जाता है, यह एक चमत्कार ही है।

(घ) धानी मुंडा का चरित्र

उत्तर- धानी मुंडा मुंडा जाति के स्वाधीनता युद्ध के सपनों का फेरीवाला ही है। मुलकई। लड़ाई के समय ही वह बिरसा के अंदर (जब बिरसा किशोर था) भविष्य के नायक को देखा था।

मुलकई लड़ाई का योद्धा धानी इस समय से ही सरदारों को बोलता “अब हाथों में बलोया रहेगा, तीर-धनुक रहेंगे।” छोटानागपुर इलाके के इतिहास का बहुदर्शी साक्षी है धानी मुंडा । लेखिका उसके अनुभव के अंदर से की इतिहास को पाठकों से परिचित करवाती है।

सर्वमुखी शोषण में शोषित मुंडाओं का जीवन सत्य गानों में किस तरह उद्घाटित होता, उसके वर्णन के लिए लेखिका ने धानी मुंडा के युवा समय में गाये गये गीत का एक अंश उद्धृत किया है।

इस गाने की सारकथा है- “बेगारी करते-करते मेरे कंधे से खून बहने लगा है। जमींदार का सिपाही रात-दिन मुझे डाँटता रहता है। मैं दिन-रात रोता रहता हूँ। बेगार करते करते मेरा यह हाल हो गया।

घर नहीं है, तो मुझे सुख कौन देगा? मैं दिन रात रोता रहता हूँ। आँसुओं की तरह मेरा खून नोनखरा (नमकीन) हो गया है।” MHD 16 Free Solved Assignment

प्रसंगतः लेखिका मुंडाओं के जीवन में गीतों से उनके गहरे जुड़ाव के संबंध में लिखती हैं, “धानी को मालूम है। जीवन में सब यातनाओं यंत्रणाओं के अवसरों को मुंडा लोगों ने गान-गान में भर रखा है।

वे गाने किसने बनाए, कौन सुर देता था, किसी को पता नहीं।” धानी मुंडा के गल्प-कहानी से स्पष्ट होता है- और मुंडा लोग एवं सवताल लोग लड़ते हैं मरते हैं एवं अन्यत्र भागते हैं।

धानी के युवा समय में छोटानागपुर के राजा का भाई हरनाथ शाही एकबार खुटकट्टि ग्राम को भिन्नदेशी महाजन ठेकेदारों को दे दिया था।

तब भी मुंडा लोगों को दिकु लोगों के हाथों कई सौ गाँव छोड़ने पड़े। मुंडाओं के वैभव हरण की यह परम्परा धानी के एक वाक्य से पता चलती है, “दिकु लोगों से देश छा गया। खोजने पर एक मुंडा नहीं मिलता था जिसके घर में दस रुपये भी हों। सब भिखारी हो गए।”

वृद्ध धानी मुंडा सरदारों के आंदोलन के व्यर्थ हो जाने से हतोत्साहित नहीं हुआ था। उसकी गतिविधियों को लक्ष्य करने पर पता चलता है कि मुंडा जाति के आत्म जागरण के लिए जैसे वह एक समर्पित सैनिक हो।

इस जागरण के प्रयास के दुसमय की अंधेरी रातों में भी पथिक की तरह स्वतंत्रता के प्रदीप को बचा कर सत्य पथ को खोज में वह अकेला निकल पड़ा था इसलिए बिरसा के पास बार-बार तिरस्कृत उपेक्षित होने के बाद भी वह बिरसा को नहीं छोड़ता था। बिरसा के मध्य में वह ‘भगवान’ के आत्मजागरण को जगाना चाहता है।

इसलिए चाइबासा मिशन से बड़े दिन की छुट्टी पर बिरसा जब गाँव जा रहा था तो रोकोमबा से धानी मुंडा बिरसा का पीछा करता है। फिर वह बिरसा को समझाने लगता है कि ‘भगवान’ बनने के सारे लक्षण सिर्फ बिरसा में ही हैं, जो भगवान मुंडा लोगों की ओर से आयेगा।MHD 16 Free Solved Assignment

मुलकी लड़ाई की मंद-मंद आग से सब कुछ जला देगा। साहब – दिकु सबको भगा देगा हमारे अपने गाँवों में मुंडा लोगों की बस्ती बना देगा।

धानी, बिरसा को स्पष्टता से आह्वान करके बोलता है-“बिरसा, तू कर सकता है। छोटानागपुर तेरे आदि पुरुषों का बनाया हुआ है। तू भगवान बन सकता है।”

यह धानी मुंडा ही मुंडा विद्रोह का चारण होता है। साहबों के अत्याचारों से जब मुंडा संत्रस्त और दिशाहारा होते हैं,

तब धानी सिर्फ विद्रोह की सम्भावना को टटोलता ही नहीं बल्कि विद्रोह में नई शक्ति के संचार करने की परिकल्पना भी बनाता है। बिरसा को भगवान होने के लिए कहना, इस परिकल्पना का ही एक अंग है।

परवर्ती रणकौशल से बिरसा को परिचित कराना भी इसी रणकौशल का एक अंग है एवं प्रमुखता से वह बिरसा को बोलता है- “पुराने सरदारों से काम न होगा।” धानी जाति के प्रति कितना गंभीर था, |

यह बात हम धानी से बिरसा के साथ मिलने एवं बोलने के वार्तालाप में पाते हैं। वह बिरमा से बोलता है- “तू वह मिशन छोड़ दे साहेब क्या कहते हैं-मुंडा जंगली हैं, नंगे रहते हैं

सारे मुंडा चोर और डाकू हैं। वह मिशन छोड़ दे।” 1895 ई. में बिरसा के गिरफ्तार हो जाने के बाद बिरसा के भावावेश का प्रसार करते हुए आगे ले जाने में बिरसा के अनुगामियों में वृद्ध धानी मुंडा का स्थान प्रमुख है।

धानी जेल तोड़ कर भाग आता है। शाली उसे गुप्त गुफा में ले जाकर रख आती है। 1897 के नवम्बर महीने में बिरसा जेल तोड़कर भागने के लिए धानी मुंडा को तिरस्कृत करता है।

बिरसा उसके पास से अंग्रेजों के जारी किए गए जंगल के कानून के बारे में जानना चाहता है। धानी कहता है- “लगान बढ़ाने का कानून बना लगान वसूल करने का कानून बना।

एक ही कानून में कह दिया कि लगान बढ़ायेंगे और जब देखेंगे कि रैयत को सामर्थ नहीं हैं, तो लगान माफ कर देंगे। जो रैयत ज्यादा लगान नहीं दे सकेगा, वह बेगारी देगा।

जिसके साथ पैसे की बात हो, वह बेगारी न देकर रुपये देकर रिहाई पा जायेगा।” बिरसा की अनुपस्थिति में जब दो साल फसल न हुई, खैरात नहीं बँटी. कर्ज-उधार नहीं मिला, लगान बढ़ गए, बेगारी का बड़ा शोर मचा तो उसपर धानी मुंडा ने मुंडाओं को जमींदारों के घर से धान लेने के लिए बुद्धि दी।

जिसके फलस्वरूप सरकार ने ‘पिदुनी’ खजाना जारी किया जिसमें गाँव से चोरी हो गये कर को सभी गाँव वालों को मिल कर देना पड़ेगा। मुंडा लोग पिटुनी खजाने से बचने के लिए जंगल में छिप जाते थे।

इस अवस्था में बिरसा की मुक्ति के बाद 7 दिसम्बर की एक सभा में धानी मुंडा बिरसा को कहता है. “अब मुंडा लोगों को पता चल गया है कि तुम्हारे बिना उनकी गति नहीं है।”

मुंडाओं की स्वाधीनता की लड़ाई के स्वप्न में अपने बालों को सफेद कर देने वाला धानी मुंडा, किशोर उम्र से ही छाया की तरह उसके पीछे लग गया था, MHD 16 Free Solved Assignment

उसे मुंडाओं के मुक्तिदाता ‘भगवान’ के आसन पर प्रतिष्ठित करने के लिए। उपन्यास के दसवें अध्याय में उसके उस स्वप्न को सार्थक होते देखा जाता है,

जब बिरसा धर्म संस्कार एवं चेचक के प्रतिरोध की भूमिका का त्याग करके गाँव-गाँव में तीर भेजना चालू करता है।

वह मुंडाओं का लड़ाई के लिए आह्वान करता है और उसमें आनंद के अतिरेक से धानी कूद पड़ता है। इस दिन को देखने के लिए ही वह कितने दिनों से धैर्य रखकर प्रतीक्षा कर रहा था।

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