IGNOU MHD 14 Free Solved Assignment 2021-22- Helpfirst

MHD 14

MHD 14 Free Solved Assignment

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MHD 14 Free Solved Assignment July 2021 & Jan 2022

(क) यह सब मेरे कर्मों का फल है। आह । एड़ी में कैसी पीड़ा हो रही है, यह कांटा कैसे निकलेगा ? भीतर उसका एक टुकड़ा टूट गया है। ………… ………………………….जो उससे अधिक कष्ट झेलकर भी अपनी आत्मा की रक्षा करती हैं?

उत्तर- ‘सेवासदन’ का मुख्य कथानक है स्त्रीत्व के आदर्श से सुमन का पतन और उसके पुनः उत्थान का प्रयास, उधर ‘उमरावजान अदा’ का कथानक तवायफों के जीवन के अंदरूनी कार्यव्यापार, बाजार में बैठी स्त्री की तहजीब, रचनात्मक रुझानों और लोकप्रियता के व्याज से अपने समय- समाज से निर्मित हुआ है।

‘सेवासदन’ में प्रेमचंद सुमन से सुमनबाई बन जाने वाली स्त्री के पतन की कहानी सुनाते हैं और ‘उमराव जान अदा’ में हादी रुसवा अमीरन से उमराव बनी रेख्ती कहने वाली तवायफ की कहानी सुनाते
(इसकी जगह सुनते होगा) हैं।

‘सेवासदन’ के छपते-छपते मिर्ज़ा हादी के उपन्यास को बीस वर्ष बीत चुके थे और इन बीस वर्षों का अंतराब उत्तर भारत में आ रहे बहुत से सांस्कृतिक सामाजिक बदलावों और आहटों का अंतराव है।

इसलिए ‘सेवासदन’ पर बात करने के लिए उमराव जान अदा से होकर गुजरना जरूरी है। मिर्ज़ा हादी रुसवा ‘उमराव जान अदा’ को आपबीती या आत्मकथा या जीवनी कहने के पक्ष में हैं और भूमिका में लिखते हैं

“अपनी आपबीती, वह जिस कदर कहती जाती थी, मैं उनसे छुपा के लिखता जाता था। पूरी होने के बाद मैंने मसीदा लिखाया। इस पर उमराव जान बहुत बिगड़ीं।

आखिर खुद पढ़ा और जा-बजा जो कुछ रह गया था, उसे दुरुस्त कर दिया। मैं उमराव जान को उस जमाने से जानता हूँ, जब उनकी नवाब साहब से मुलाकात थी।

उन्हीं दिनों मेरा उठना-बैठना भी अक्सर उनके यहाँ रहता था। बरसों बाद फिर एक बार उमराव जान की मुलाकात नवाब साहब से उनके मकान पर हुई, जब वह उनकी बेगम साहिब की मेहमान थीं। इस मुलाकात का जिक्र आगे है। इसके कुछ अर्से बाद उमराव जान हज करने चली गई।

उस वक्त तक की उनकी जिंदगी की तमाम घटनाओं को मैं निजी तौर से जानता था इसलिए मैंने यह किस्सा वही तक लिखा, जहाँ तक मैं अपनी जानकारी से उनके बयान के एक एक लफज को सही समझता था।

हज वापसी के बाद उमराव जान खामोशी की जिंदगी बसर करने लगी। जो कुछ पास जमा था उसी पर गुजर औकात थी। वैसे उनको किसी चीज की कमी नहीं थी।

मकान, नौकर चाकर, आराम का सामान, खाना पहनना, जो कुछ पास जमा था, उससे अच्छी तरह चलता रहा। वह मुशायरों में जाती थी, मुहर्रम की मजलिसों में सोज पढ़ती थीं और कभी कभी वैसे भी गाने बजाने के जलसों में शरीक होती थीं।MHD 14 Free Solved Assignment

(ख) किसान कुली बनकर कभी अपने भाग्य-विधाता को धन्यवाद नहीं दे सकता, उसी प्रकार जैसे कोई आदमी व्यापार का स्वतन्त्र …………………….के साथ रहकर संतोष के साथ कालक्षेप करेगा

त्तर- ‘प्रेमाश्रम के रायकमलानंद औद्योगिकरण के सहसों ताम-झाम के बावजूद भी यह स्वीकार नहीं करते कि सहसों किसान कूली बनकर अपने भाग्य को सराहेंगे। उन्हें अच्छी तरह पता है कि किसान मजदूरी में ही मजदूरी के पेशे को अपनाते हैं, दिली खुशी से नहीं।

किसानों की मरजाद छोड़ने में उनका गौरव कुचल जाता है। कमलानंद कहते हैं- “किसान कुली बनकर कभी अपने भाग्य-विधता को धन्यावाद नहीं दे सकता,

उसी प्रकार जैसे कोई आदमी व्यापार का स्वतंत्र सूख भोगने के बाद नौकरी की पराधीनता को पसंद नहीं कर सकता।

संभव है कि अपनी दीनता उसे कुली बने रहने पर मजबूर करे पर मुझे विश्वास है कि वह इस दासता में मुक्त होने का अवसर पाते ही तुरंत अपने घर की राह लेगा और फिर उसी टूटे-फूटे झोपड़ी में अपने बाल बच्चों के साथ रहकर संतोष के साथ कालक्षेप करेगा।

” प्रेमचंद” भी नहीं चाहते थे कि शहर की रौनक गाँवों के गरीब और भोले किसानों के संपर्क में आए। वे जानते थे कि हमारे देश की आधी से अधिक जनता गाँवों में बसती हैं और खेती करके अपना पेट भरती है।

अगर वह भी मजदूरी करने लगे तो खाद्य-संकट तो उत्पन्न होगा ही, भारतीयय संस्कृति भी खतरे में पड़ जाएगी. स्त्रियों का जीवन नरक बन जाएगा, अनाचार फैलेगा, अनैतिकता का प्रसार होगा।

किसानों की दूरवस्था और खेती में भर पेट रोटी न मिल सकने की मजदूरी में प्रेमचंद किसानों के लिए एक नया विकल्प ढूँड़कर देते हैं। प्रेमचंद औद्योगिकरण की प्रत्येक क्रिया प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ हैं।

वे भली-भांति जानते हैं कि उद्योगपति अपने मजदूरों को सुख-सुविधा देते है, एक अच्छा जीवन स्तर प्रदान करते हैं। एजेंट कहता है- “हम कुलियों को जैसे वस्त्र, जैसा भोजन, जैसे घर देते ह वैसे गाँव में रहकर उन्हें कभी नसीब नहीं हो सकते। MHD 14 Free Solved Assignment

हम उनकी दवादारू का, उनकी संतानों की शिक्षा का उन्हें बूढ़ापे में सहारा देने का उचित प्रबंध करते हैं। यहाँ तक कि हम उनके मनोरंजन और व्यायाम की भी व्यवस्था कर देते हैं।

यह चाहें तो टेनिस और फुटबॉल खेल सकते हैं, चाहें तो पार्क में सैर कर सकते हैं। सप्ताह में एक दिन गाने-बजाने के लिए समय से कुछ पहले ही छुट्टी दे दी जाती है जहाँ तक मैं समझता हूँ पार्कों में रहने के बाद कोई कुली फिर खेती करने की परहवा नहीं करेगा।

किंतु प्रेमचंद का होरी इन सूखों का लालची नहीं है, उसे तो अपनी मरजाद प्यारी है। वह कहता है मजूर बन जाएँ, तो किसान हो जाता है।

पूँजीवाद के आगमन उसके आगमन के साथ हमारी नैतिकता में परिवर्तन और मूल्यों में गिरावट को प्रेमचंद बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे प्रेमचंद महाजनी सभ्यता के कट्टर विरोधी थे और इस सभ्यता से उत्पन्न समस्याओं के कारण चिंतित भी थे।

उनका मुख्य विषय था समाज में व्याप्त आर्थिक शोषण का पर्दाफाश करना और गाँव में रहने वाले किसानों की स्थिति को आम जनता तक पहुँचाकर उसमें मूलभूत बदलाव करना।

इसी कारण प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में किसानों की स्थिति पर भारतीय गाँवों की स्थिति पर और कृषि व्यवस्था पर पूरी निष्ठा से चित्रण किया। भारतीय किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

इनके वगैर खुशहाल देश की उम्मीद करना बेईमानी होगी। जब तक किसान खुश नहीं होंगे वह तब भारतीय व्यवस्था पूरी तरह से मजबूत नहीं होगी। भारत की चतुर्मुखी विकास के लिए भारतीय किसानों का उद्धार होना जरूरी है।MHD 14 Free Solved Assignment

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(ग) मैं तुम्हें जितना सरल हृदय समझती थी, तुम उससे कहीं बढ़कर कूटनीतिज्ञ हो। मैं तुम्हारा आशय समझती हूँ और इसलिए कहतीटियों और दोषों का प्रद……………………………… तुम मुझसे डरते हो, इसलिए तुम्हारे सम्मुख न आऊँगी, पर रहूँगी तुम्हारे ही साथ

उत्तर- प्रसंग प्रस्तुत अवतरण प्रेमचन्द करत उपन्यास ‘रंगभूमि’ से अवतरित हुआ है। उपन्यास में स्वाधीनता आंदोलन का नेतष्टत्व करने वाला पात्र विनय है जबकि जमींदार कुँवर भरत सिंह और रानी जाहनवी का पुत्र है। विनय ‘सेवा समिति’ का संचालक है ‘सेवा समिति का मुख्य कार्य संरचनात्मक कार्य करना है।

व्याख्या- सोफिया मि. जॉनसेवक की पुत्री है। उसे अपनी माँ मिसेज जॉतसेवक की कट्टर धार्मिक प्रवष्टत्ति रास नहीं आती। वह खुले विचारों की लड़की है जबरदस्ती कोई भी कार्य करना उसे पसंद नहीं माँ का कट्टर ईसाई होना।

जाना उसे पसंद नहीं वह धर्म की ओर ‘मैंने देखा है, हिंदू भरानों में भिन्न-भिन्न मतों के प्राणी कितने प्रेम से रहते हैं। बाप सनातन धर्मावलंबी है, तो बेटा आर्य समाज पति ब्रह्म समाज में है तो स्त्री पाञ्चाण पूजकों में सब अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

कोई किसी से नहीं बोलता हमारे यहाँ आत्मा कुचली जाती है फिर भी यह दावा है कि हमारी शिक्षा और सभ्यता विचार स्वातंत्रय की पोजक हैं। MHD 14 Free Solved Assignment

वह दोनों धर्मों की तुलना करते हुए विचार करती है सूफी विनय को कहती है मैं तुमकों जितना साफ, सरल मन वाला समझती थी, तुम उससे कहाँ बढ़कर कूटनीति करने वाले हों।

मैं तुम्हार मतलब समझती हूँ और इसीलिए तुम्हें कर रही हूँ जैसी तुम्हारी इच्छा तुम वैसा ही करो पर तुम्हें शायद यह मालूम नहीं है कि यूवती का मन एक छोटे से बच्चे की तरह होता है।

इसे जिस बात के लिए मना करो, वह उसी तरफ ही डोलता है। अगर तुम अपनी प्रशंसा करते हुए अपने कार्य की अप्रत्यक्ष रूप से झींग मारते हो तो मुझे शायद तुमसे अरूचि हो जाती।

अपनी त्रुटियों और दोखों का खुलासा करके तुमने मुझे और भी बळीभूत कर लिया है। तुम मुझसे डरते हो, इसलिए मैं तुम्हारे पास नहीं आऊँगी पर रहूँगी तुम्हारे ही साथ विधर-विधर तुम जाओंगें मैं तुम्हारी परछाई की तरह हर समय तुम्हारे साथ रहूंगी।

सोफिया जब कुँवर भरत सिंह के घर में रह रही है तेच विजय के देशप्रेम और कर्मठता को देखकर उसके प्रति समर्पित हो जाती है।

विनय भी उसके रूप, लावण्य गुणों से प्रभावित हुए बिना नहीं या पाता। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। हालाँकि दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं लेकिन उनके प्रेम को विवाह की परिणति नहीं मिल पाती।

रानी जाह्वनी इस तथ्य से भली-भाँति अवगत है सोफिया के गुणों से प्रभावित भी होती है लेकिन विवाह के पक्ष में नहीं आ पाती क्योंकि सोफिया एक तो ईसाई है और दूसरे वह विनय की देश सेवा के लक्ष्य में भी बाघ 1 हो सकती थी। विनय द्वारा आत्मबलिदान कर दिए जाने के बाद सोफिया भी आत्महत्या कर लेती है।

विशेष : MHD 14 Free Solved Assignment

  1. विनय के चरित्र पर प्रकाष्ठा पड़ता है।
  2. मानव स्वभाव का सुन्दर तथा सच्चा विठलेजण है।
  3. उपमा के सुन्दर प्रयोग तथा भाजा की प्राजलता से पता चलता है कि प्रेमचन्द साहित्यिक भाजा-शैली का प्रयोग भी कर सकते थे।

(घ) हर एक अपना छोटा-सा मिट्टी का घरौंदा बनाए बैठा है। देश बह जाए, उसे परवाह नहीं उसका घरौंदा बचा रहे! उसके स्वार्थ…………………………..आवाज तक नहीं आती।

उत्तर– प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश प्रेमचंद द्वारा लिखित ‘गवन’ उपन्यास से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्तियों में जालपा की मनोदशा का वर्णन किया गया है। जब रमानाथ सोने की चूड़ियाँ लाता है। तो, रमानाथ की माँ । गुस्से में चूड़ियाँ फेंक देती है और रमानाथ वहाँ से चला जाता है।

व्याख्या :– इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जी है। देश की परवाह किए बिना सभी अपनेअपने स्वार्थ में लगे हुए हैं। किसी को धन की किसी को गहनों की लालसा है।

सब अपने स्वार्थ की इन चीजों को प्राप्त करने में लगे हुए हैं। शाम के समय जालपा बाजार को बंद होते हुए देखती है और खुश होती है। वह बाजार में लोगों को देखती है।

सभी के सिर शौक से झुके हैं, उनकी व्योरियाँ बदली हुई हैं और वे अपने स्वार्थ के नशे में चूर हैं। सभी अपने आप को दूसरों से कम आँकते हैं तो उन्हें अपने भीतर जलन महसूस होती है।

जालपा के बारे में कहा गया है कि वह यह नहीं जानती थी कि इस जन रूपी सागर में कुछ घटनाएँ ऐसी है जो छोटी-छोटी ककड़ियों का प्रतीक हैं और जिस प्रकार छोटी-छोटी कंकड़ियों से सागर में आवाज भी नहीं उठती उसकी प्रकार लोगों के मन पर उन घटनाओं का कोई असर नहीं होता।

यहा पर तह घटना दिनेश को फाँसी की होता है।

विशेष-

1 प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है।

2 जालपा की मनोदशा का वर्णन किया गया है।

3 ‘मिट्टी का घरौंबा’ लोगों के स्वार्थ का प्रतीक

2 सुमन की चारित्रिक विशिष्टताएँ बताइए।

उत्तर- सुमन को कीचड़ में स्थित रहने वाले उस कमल पुष्प से उपमित करना जो उससे अछूता रहता है. पर्याप्त अंशों में उपयुक्त है। MHD 14 Free Solved Assignment

यह सत्य है कि वह एक बार अर्थात् अपने विवाहोपरान्त कुछ अंशों में कीचड़ में फँस जाती है भोली के ठाठ-बाद को देखकर उससे ईर्ष्या करती हुई सुमन परिस्थितियवश वेश्यावृत्ति की कीचड़ में सन जाती है,

किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मौना बाजार की सर्वाधिक सुन्दरी तथा आकर्षण का केन्द्र होते हुए भी अपना शरीर नहीं बेचती यह दूसरी बात है कि ऐसी परिस्थितियों में कोई युवती अपने सतीत्व की रक्षा कर सकती भी है अथवा नहीं,

किन्तु उपन्यासकार ने तो उसे बहुत कुछ अंशों में एक दूध-घुली सी पथभ्रष्ट युवती चित्रित किया है और हमारा सम्बन्ध सुमन के उस रूप से ही है जिसकी उपन्यास में अभिव्यक्ति हुई।

जहाँ तक सुमन के उपन्यास में अभिव्यक्त हुए स्वरूप का सम्बन्ध 1 है, अपने जीवन के आरंभ में कुछ भूल करने वाली सुमन अन्तत देवील की ओर उठती जाती है।

यदि उसका आरम्भिक जीवन किसी सामान्य चंचल युवती जैसा है, तो उसके जीवन का अंतिम भाग निश्चय ही देवीत्व के गुणों से ओत-प्रोत है।

वह दाल मंडी में रहते हुए भी अपना शरीर नहीं बेचती, विधवाश्रम में रहते हुए तपस्विनियों जैसा जीवन व्यतीत करती है तथा अपने अनथक सेवा भाव से सभी का दिल जीत लेती है,

अपने पूर्व प्रेमी सदन और शांता के साथ रहते हुए वह रंच मात्र भी ऐसा आचरण नहीं करती कि उसकी और उंगली उठाई जा सके. जबकि उपन्यास के अन्त में तो वह वेश्यापुत्रियों की शिक्षा-दीक्षा में अनुरक्त परहित-रता महामानवी है ।

अतः उसे कीचड़ में रहते हुए भी कीचड़ से अछूती मानना सर्वथा उपयुक्त है। उसके चारित्रिक गुणावगुणों पर निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रकाश डाला जा सकता है

(1) लाड़ प्यार में पली अभिमानिनी पुत्री- सुमन दारोगा कृष्णचन्द्र की दो पुत्रियों में से बड़ी पुत्री है तथा उसके कोई पुत्र न होने के कारण माता-पिता का लाड़ प्यार अपनी इस बड़ी पुत्री पर ही केन्द्रित है।

इस लाड़-दुलार ने उसे बिगाड़ दिया है। उपन्यासकार ने उसका परिचय देते हुए लिखा है कि दोनों पुत्रियों में से “बड़ी पुत्री सुमन बचपन से ही चंचल अभिमानिनी शृंगारप्रिय तथा दूसरों से बढ़कर रहने की प्रवृत्ति की है।”

अपनी अभिमानिनी तथा दूसरों से बढ़कर रहने की प्रवृत्ति के कारण ही उसे यह भी सहन नहीं होता कि उसकी छोटी बहन के लिए भी वैसी ही साड़ी क्यों लाई गई है, जैसी कि उसके लिए आई है और वह इसी बात को लेकर मुँह फुला देती है।MHD 14 Free Solved Assignment

अफसर पिता की लाड़ली पुत्री होने के कारण वह गृहकायाँ की ओर अपना ध्यान ही नहीं देती उसके माता-पिता भी उस पर तदर्थ जोर नहीं डालते कदाचित् सुमन ने सोव रखा था कि उसका विवाह किसी ऐसे घर में होगा जहाँ नौकरचाकर और महरी दासियाँ होंगी अतः मुझे गृहकार्यों को सीखकर क्या करना है?

कहना न होगा कि इस धारणा के कारणा उसका गृहस्थ जीवन बड़ा दुखद सिद्ध होता है।

(2) आलसी तथा गृहकार्यों में अकुशल-“एक तो करेला कड़वा दूजे नीम चढ़ा की उक्ति सुमन के पत्नी रूप पर चरितार्थ होती है।

उसकी आशा-आकांक्षाओं के सर्वथा विपरीत उसका विवाह 14) मासिक पाने वाले गजाधर के साथ होता है। कुछ समय तक तो गजा पर की फूआ द्वारा गृहकार्यों को करते।

रहने के कारण गजाधर और सुमन की गृहस्थी की गाड़ी चलती रहती है, किन्तु फूआ की हैजे से मृत्यु हो जाने पर उसमे ब्रेक लग जाते हैं।

चौका-बर्तन से जी चुराने वाली सुमन के कारण (शोक के कारण नहीं) घर में दो-तीन दिन तक चूल्हा नहीं जलता अतः गजाधर को बाजार से पूड़ियाँ लाकर दिन काटने पड़ते हैं किन्तु 14 वेतन पाने वाला गजाधर बाजार से पूड़ियाँ हैं।

खा-खाकर कितने दिन खर्च चला सकता था, अतः वह बेचारा तीसरे दिन घड़ी रात रहते ही उठकर बरतन मांज डालता है, चौका लगा देता है तथा नल से पानी नी भर लेता है।

जब सुमन स्व-पति को इस प्रकार गृहकार्यों में संलग्न देखती है, तो मन मारकर उसे ही चौका-चूल्हा संभालना पड़ता है।

गजाधर उसकी स्व-मित्रों से यह कहकर प्रशंसा करता तो है बनाती है कि दाल-रोटी में पकवान “इतने बड़े घर की लड़की, घर का छोटे से छोटा काम भी अपने हाथ से करती है।

भोजन तो ऐसा का स्वाद आ जाता है। किन्तु यह प्रशंसा मिथ्या-प्रशंसा ही है क्योंकि सुमन गृहकार्यों को लगन से नहीं करती। वह चटोरी भी है। यही कारण है कि जब गजाधर उसे अपना वेतन सौंप देता है,

तो महीने के बीस दिन भी नहीं बीत पाते कि रुपये समाप्त हो जाते हैं। शेष दस दिन का खर्च कैसे चले इस बात को लेकर पति-पत्नी में प्रथम बार तो चख चख हो ही जाती है।

गजाधर की उसके विषय में यह धारणा उचित है कि वह उसकी रसपूर्ण बातों की अपेक्षा मिठाई के दोनों से अधिक प्रेम करती है। MHD 14 Free Solved Assignment

(3) प्रदर्शन प्रिय-सुमन के चरित्र में अपनी स्थित को अपनी वास्तविक स्थिति से बढ़-चढ़कर दिखाने की दुर्बलता है।

सौभाग्य से उसे ईश्वर-प्रदत्त सुन्दरता उपलब्ध है, जिसके ऊपर गर्व करते हुए तथा प्रदर्शन-प्रियता का आश्रय लेकर वह मुहल्ले की स्त्रियों से सीधे मुँह बात नहीं करती।

उपन्यासकार के शब्दों में “अपने सौंदर्य और गवली प्रकृति के कारण मुहल्ले की स्त्रियों की रानी बनी सुमन उसके समक्ष स्वयं को बढ़-चढ़कर दिखाती।

वह उनके सामने रेशमी साड़ी पहनकर बैठती जो वह मैके से लायी थी। रेशमी जाकट झूटी पर लटका देती।” कुछ दिनो तक तो वह अपनी रेशमी साड़ी और रेशमी जाकट का गुहल्ले की स्त्रियों पर प्रभाव डालती है स्वयं को उनसे ऊँची सिद्ध करने के लिए अपने भाग्य की सराहना करती है

जबकि मुहल्ले की स्त्रियों अपने भाग्य का रोना रोती है, किन्तु विवाह के समय के कपड़े कितने दिनों तक उसकी प्रदर्शन-प्रियता का आधार बन सकते थे?

अतः धीरे-धीरे उसके मन में यह असंतोष जड़ें पकड़ने लगता है कि अन्य स्त्रियों के लिए तो नये-नये वस्त्र-आभूषण आते रहते हैं,

जबकि मेरे लिए नये वस्त्र आभूषण आने का तो कहना ही क्या, पति के कम वेतन के कारण गुजारा तक कठिनता से होता है। वह पति को जलीकटी सुनाने लगती है,

क्योंकि पड़ोसिन स्त्रियों की बातों में आकर वह उसी पति को आदर और प्रेम के योग्य समझने लगती है जो पत्नी का वस्त्र आभूषणों और स्वादिष्ट पदार्थों से तप्त करता हो।

3 प्रेमाश्रम के औपन्यासिक शिल्प पर विचार कीजिए।

उत्तर प्रेमाश्रम की रचना उस समय हुई जब भारत पर औपनिवेशिक शासन तंत्र का शिकंजा कसा हुआ था। अंग्रेजों ने भारत में नई भू-व्यवस्था लागू कर दी थी।

जिसके चलते सदियों से स्वयं की भूमि का मालिक समझने वाले कृषक दासों की स्थिति में आ गए और जमींदार भूमि के मालिक बन गए।

इन जमींदारों और वाल्लुकदारों की पीठ पर औपनिवेशिक शासनकर्ताओं का हाथ था, जिससे ये लोग उत्साहित होकर कृषकों का शोषण करते थे। MHD 14 Free Solved Assignment

उनसे क्रूर से क्रूर अमानवीय व्यवहार करते थे। इन्हें अपनी लगान वसूली, नजराना व बेगार से सरोकार होता था, कृषि भूमि की उत्पादकता आदि से कोई मतलब नहीं होता था।

इन सबके चलते उत्पादकता में द्वारा होने लगा था. अकाल, महामारी, बाद आदि प्राकृतिक आपदाओं का भाजन भी गरीब कृषक ही बनते थे। ऐसे में भी जमींदार वर्ग द्वारा उन्हें कोई राहत न मिलती थी,

सहयोग की आस तो बहुत दूर की बात थी। कृषकों का संतोष अब समाप्त होता जा रहा था, धैर्य छूटता जा रहा था। वे प्राकृतिक आपदाओं से तो मुकाबला नहीं कर सकते थे

लेकिन इस दानव-रूपी जमदार-वर्ग से उन्होंने लोहा लेने की ठान ली थी। परिणामतः जगह-जगह कृषक विद्रोह होने शुरू हो गए थे। चंपारन अवध खेड़ा आदि के विद्रोह ऐसे ही आंदोलन है।

‘प्रेमाश्रम’ में भी ऐसे ही विद्रोही कृषकों की गाथा है जोकि जमींदार वर्ग से संघर्षरत है। उपन्यास में इन विद्रोही कृषकों का नेतृत्व मनोहर, बलराज काविर एवं बिलासी आदि पात्रों ने किया है

जबकि जमींदारों के दो वर्ग चित्रित किए गए हैं। पहले वर्ग में वे जमींदार है जोकि शिक्षित, उदारवादी एवं नियम-कानूनों को मानने वाले हैं, जिसके चलते वे कृषकों को साथ लेकर चलने के पक्ष में हैं।

इस वर्ग का प्रतिनिधि त्व मुख्य रूप से प्रेमशंकर एवं मायाशंकर करते हैं। जमीदार वर्ग में दूसरा वर्ग, कृषकों पर अत्याचार करने वाला वर्ग है, जिसका एकमात्र उद्देश्य सुखोपभोग करना है

इस वर्ग का मुख्य प्रतिनिधित्व ज्ञानशंकर ने किया है। उपन्यास के आधे से ज्यादा पृष्ठ ज्ञानशंकर द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को ही , समर्पित हैं। MHD 14 Free Solved Assignment

‘प्रेमाश्रम’ की कथा का आरंभ ही ज्ञानशंकर द्वारा कृषकों पर की जा रही जबरदस्ती द्वारा होता है। ज्ञानशंकर के पिता जटाशंकर की बरसी का अवसर होता है,

ज्ञानशंकर कृषकों में घी के लिए रुपये बाँटने का आदेश देता है और साथ ही वह चाहता है कि रुपये में सेर भर जून के खाने का कुछ नहीं पता, पल्ले एक कौड़ी नहीं, वे रुपये में सेर घी कहाँ से देंगे।

मनोहर रुपये लेने से इंकार कर देता है और संघर्ष के लिए उतारू हो जाता है। जमींदार का कारिदा उसे धमकाते हुए कहता है कि “जब जमींदार की जमीन जोतते हो तो उसके हुकुम से बाहर नहीं जा सकते।”

मनोहर भी एक कदम बढ़कर जवाब देता है- “जमीन कोई खैरात जोतते हैं? उसका लगान देते हैं। एक किस्त भी बाकी पड़ जाये तो नालिस होती है।

मनोहर का पुत्र बलराज भी आगे बढ़कर बोलता है- “कोई हमसे क्यों घी माँगे? किसी का दिया खाते हैं कि किसी के घर माँगने जाते हैं? अपना तो एक पैसा नहीं छोड़ते तो हम क्यों धौंस सहँ ?”

यही से जमींदार और किसान के संघर्ष का श्रीगणेश हो जाता है। ज्ञानशंकर अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए मनोहर के लगान में वृद्धि कर देता है।

यहाँ हमें तयुगीन कृषक आंदोलन की भी छाप देखने को मिलती है क्योंकि आंदोलनों के भी मुख्य मुद्दे बेगार, बेदखली, गैरकानूनी कर आदि पर प्रतिबंध लगवाने के थे।

सुखोपभोग के आकांक्षी ज्ञानशंकर जैसे दुष्ट अभिमानी जमीदारों की तृष्णा यही शांत नहीं होती। उसकी यही तृष्णा उसे अपनी ससुराल लखनऊ की ओर ले जाती है।

चूँकि उसकी ससुराल की जमींदारी का कोई पारिस नहीं है अतः वह वहाँ की जमींदारी हड़ना चाहता है जिसके लिए तरह-तरह के आडम्बर रचता है। MHD 14 Free Solved Assignment

इसके साथ ही साथ ज्ञानशंकर की निगाह अपनी साली गायत्री की जमींदारी पर भी है जोकि गोरखपुर में है। इस आकांक्षा से वह गोरखपुर में विधवा साली के प्रति प्रेमासक्त भी हो जाता है और अनेक प्रपंच के पश्चात उसकी जमींदारी का मैनेजर बनने में सफलता पाता है।

उसके साथ ही गोरखपुर में भी उसके अत्याचारों का ताण्डव शुरू हो जाता है। इसकी अनुपस्थिति में लखनपुर में स्थिति कुछ शांत रहती है किन्तु लखनपुर में फौजदारी के सिलसिले में लौट आता है।

प्लेग की बीमारी के चलते गाँव वालों ने अपनी झोंपड़ियाँ जमींदार के बाग में बसा ली थी। वह आकर बीमारी की मार से पहले की से मरे हुए कृषकों के झोंपड़ों में आग लगवा देता है।

इस पर भी सब नहीं आता तो तालाए के पाढ़ी पर प्रतिबंध लगाकर पराई भूमि पर से ही उनके अधिकारों को खत्म करना चाहता है। गाँव वाले अब उसके अत्याचारों को और नहीं सह पाते और गाँव वाले विद्रोही मनोहर एवं बलराज के साथ एका कर लेते हैं।

सभी मिलकर उसके खिलाफ एक मोर्चा बना लेते हैं। सुक्खू चौधरी उन लोगों में से थे जो किसी भी हालत में जमींदार के खिलाफ नहीं जाते थे. लेकिन अन्त में उन्हें भी मनोहर और बलराज की बोली बोलनी पड़ती है।

जब डॉक्टर प्रियनाथ, गौस खाँ की हत्या के कारण की झूठी रिपोर्ट बनाकर गाँव वालों को हत्या के आरोप में फँसवा देते हैं,

तब फैसले की सुनवाई वाले दिन गाँव वाले विद्रोह कर देते हैं, डॉक्टर के धमकाने पर ये कहते हैं
यह न समझें कि साधारणतः जो लोग आँख के इशारे से काँप उठते हैं, वे विद्रोह के समय गोलियों की परवाह नहीं करते।” प्रेमचन्द के इस कथन पर रामविलास शर्मा ने लिखा है

“विद्रोह किसके प्रति विद्रोह ? स्पष्ट है अंग्रेजी राज के प्रति विद्रोह असहयोग आंदोलन से पहले यह विद्रोह-भावना जनता में विद्यमान थी विद्रोह के समय गोलियों की परवाह न करना, यह भावना गाँधीवाद की देन थी वह जनता की सहज देशभक्ति का विकास थी।” MHD 14 Free Solved Assignment

अर्थात् प्रेमचन्द ने ‘प्रेमाश्रम के माध्यम से यह दिखाया है कि किसान आंदोलन अपने पूरे जुनून से आगे बढ़ रहा था। डॉक्टर भी इस जुनून के आगे अपनी गवाही बदलने को विवश हो जाता है

जिससे गाँव वालों की जीत हो जाती है। डॉक्टर का हृदय परिवर्तन होना प्रेमचन्द के आदर्शवाद के चलते हैं। यह तो थी कहानी अत्याचारी ज्ञानशंकर की।

लेकिन इसके समानान्तर ही दूसरी कहानी उसके भाई प्रेमशंकर की चलती है, जो अमेरिका से शिक्षा प्राप्त करके लौटा है।

वह उदारवादी विचारों का धनी व्यक्ति है तथा किसानों की सहायता करने के लिए तत्पर भी दिखाई देता है और अन्त में कृषकों के हितार्थ प्रेमाश्रम की स्थापना करता है

जोकि प्रेमचन्द के आदर्शवाद की चरम परिणति को भी द्योतित करता है। इसके अतिरिक्त राय साहब, जोकि लखनऊ, मसूरी, नैनीताल आदि से संबद्ध है, की कथा मी चलती है।

गायत्री के माध्यम से गोरखपुर के जमींदार की कथा चलती है। वस्तुतः प्रेमचन्द ने प्रेमाश्रम’ में एक से अधिक कथाओं को एक सूत्र में पिरोकर संश्लिष्ट रूप से समस्याओं का उद्घाटन किया है।

‘प्रेमाश्रम’ में जमींदार कृषक संघर्ष की झाँकी प्रस्तुत करने के साथ-साथ प्रेमचन्द ने भारतीय समाज एवं संस्कृति की भी बानगी प्रस्तुत की है।MHD 14 Free Solved Assignment

यहाँ परम्परागत भारतीय संस्कृति का चित्रण, कहीं रूढ़िवादी परम्पराओं के रूप में दिखाया गया है, तो कहीं अंधविश्वासों के रूप में। जमींदार राय कमलानन्द योग सिद्धि के द्वारा चिरयौवन को पाना चाहते हैं।

वे कहते हैं “मैं अपने जीवन को चरम सीमा तक ले जाना चाहता था। इसके लिए मैंने कितना संथम किया, कितनी योग क्रियाएँ की, साधु-संतों की सेवा की जड़ी-बूटियों की खोज में कहाँ-कहाँ मारा-मारा फिरा. तिब्बत और कश्मीर की खाक छानता फिरा।

मैंने कार्य-सिद्धि पर अर्पण कर दी थी। योग और तंत्र का अभ्यास इसी हेतु से किया था कि अक्षय यौवन तेज का आनन्द उठाता रहूँ।”

अपनी सारी संपत्ति प्रभाशंकर के पुत्रों तेज और पदम को भी तंत्र मंत्र पर अंधश्विास है। वे अपने धन और सामर्थ्य को असीम बनाने के जरिए सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।

लेकिन जब इन मंत्रों को जागृत कर प्रयोग में लाते हैं तो मृत्यु का ग्रास बनते है।

प्रेमचन्द ने इस बहाने तेजशंकर के माध्यम से अंधविश्वासों एवं तंत्र-मंत्र के आडम्बरों के दुष्परिणामों को प्रकट करते हुए कहा है “जिस धूर्त पापी ने यह किताब लिखी है, उसकर इसी तलवार से उसकी गर्दन काट लूँगा।

” ‘प्रेमाश्रम’ में तयुगीन समाज की संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। कृषक जमींदार संघर्ष समानान्तर समाज का भी सहज और स्वाभाविक चित्र देखने को मिलता है।

4 ‘रंगभूमि पर स्वाधीनता आंदोलन के प्रभाव को विश्लेषित कीजिए।

उत्तर- ‘रंगभूमि प्रेमचन्द का ऐसा उपन्यास है जिसका आरंभ औद्योगीकरण बनाम ग्रामीण संस्कृति से हुआ है। इसके प्रारंभ को देखकर अनुमान कर पाना कठिन है कि इसका संबंध कुछ स्वाधीनता आंदोलन से भी हो सकता है। MHD 14 Free Solved Assignment

वस्तुतः उपन्यास में दो धाराएँ समानान्तर बहती हैं। एक धारा तो औद्योगीकरण बनाम ग्रामीण संस्कृति के संघर्ष की धारा है, दूसरी स्वाधीनता आन्दोलन से संबंधित है।

पहली धारा से सूरदास का संबंध है। दूसरी से कुंवर भरत सिंह के पुत्र विनय का उपन्यास के अन्त में दोनों धाराएँ मिल जाती है जिससे यह संघर्ष जनता बनाम अंग्रेजी सत्ता का संघर्ष जाता है।

• इसी क्रम में प्रेमचन्द ने स्वाधीनता आंदोलन के विभिन्न रूपों को उपन्यास में भी दिखाया है। जिस समय प्रेमचन्द ने रंगभूमि’ की रचना की उस समय यूँ तो गाँधीजी भारत के नेता के रूप में उमर चुके थे।

1920 को असयोग आंदोलन होकर 1922 में स्थापित भी हो चुका था लेकिन प्रेमचन्द ने अपने उपन्यास में स्वाधीनता के प्रारंभिक चरण से लेकर असहयोग के चरण को रेखांकित किया है।

प्रारंभ में जंब 1885 ए.ओ. ह्यूम के सहयोग से ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी, उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति पत्र और प्रतिवेदन की थी।

कांग्रेसी नेता भारत में हो रहे अन्याय को समझने तो लेकिन उनका मानना था कि यह सब सरकार के निचले तबके के कारियों के कारण है।

अगर आवाज ऊपर तक पहुँचेगी तो सरकार जरूर न्याय करेगी। इसके लिए वे सरकार को उसकी नीतियों में बदलाव के लिए पत्र लिखा करते थे। MHD 14 Free Solved Assignment

प्रार्थना पत्र दिया करते थे और विभिन्न मुद्दे उठाकर सरकार के आगे अन्याय की गुहार लगाते थे लेकिन औपनिवेशिक सरकार ने उनकी एक न सुनी थी और न ही कोई न्याय किया।

कांग्रेस की इन नीतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला न्याय किया। कांग्रेस की इन नीतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला पात्र रंगभूमि’ में डॉ. गांगुली है जोकि एक सच्चा देशभक्त है

लेकिन वह किसी भी संघर्ष के बनाए पत्र और प्रतिवेदन की नीति पर भरोसा करते हैं उन्हें प्रारंभिक कांग्रेसी नेताओं की तरह विश्वास है कि सरकार अच्छी है

अगर उसके कानों तक बात पहुँचेगी तो वह न्याय अवश्य करेगी इसीलिए वे अंग्रेजों के द्वारा बनाई गई कौंसिलों में जोर-शोर से भाग लेते थे।

कौंसिल में वे मि. क्लॉक के विरूद्ध भी आवाज उठाते हैं लेकिन वहाँ उनकी कोई सुनवाई नहीं होती अपितु उन्हें वहाँ से चले जाने के लिए कह दिया जाता है जिसके कारण उनका गोरों की सरकार के प्रति जो अच्छे’ होने का भ्रम होता है वह टूट जाता है।

डॉ. गांगुली अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं- “आप पशुबल से मुझे चुप करना चाहते हैं, इसीलिए भी आप में धर्म और न्याय का बल नहीं है। आज मेरे दिल से यह विश्वास उठ गया।

जो गत चालीस वर्षों से जमा हुआ था कि गवर्नमेंट हमारे ऊपर न्याय-बल से शासन करना चाहती है। आज उस न्याय-बल की कलई खुल गई, हमारी आँखों से पर्दा उठ गया. और इस गवर्नमेंट को उसके नग्न, आवराहीन रूप में देख रहे हैं।MHD 14 Free Solved Assignment

अब हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि केवल पीसकर तेल निकालने के लिए हमारा अस्तित्व मिटाने के लिए हमारी सभ्यता और हमारे मनुष्यत्व की हत्या करने के लिए हमारे ऊपर राज्य किया जा रहा है।”

वस्तुतः यह निष्कर्ष डॉ. गांगुली के माध्यम से प्रेमचन्द का ही है। वे स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप को नकार कर अपनी असहमति व्यक्त करते हैं और लोगों को समझाना चाहते हैं कि इस नीति से काम नहीं चलने वाला।

कांग्रेस की पत्र और प्रतिवेदन की नीतियों के चलते कांग्रेस के इस समय के नेताओं को उदारवादी कहा जाता था। उदारवाद की असफलता के चलते स्वाधीनता आंदोलन का एक और रूप सामने आया जिसे उग्रवाद कहा जाता था।

इसमें वे लोग थे जो कांग्रेस की इस नीति का प्रतिकार कर आंदोलन को आक्रामक रूप देना चाहते थे। घरने देने आंदोलन चलाने बहिष्कार करना आदि नीतियों का पालन करने के पक्ष में थे।

इस वर्ग का प्रतिनिधित्व भारतीय परिदृश्य में बाल पाल और लाल कर रहे थे। ‘बाल’ से ‘बालगंगाधर तिलक जिन्होनें ‘स्वराज को अपना जन्मसिद्ध अधिकार माना, ‘पाल’ से विपिन चन्द्रपाल’ और ‘लाल’ से ‘लाला लाजपत राय थे।

इसी समय भारतीय परिदृश्य में एक और आंदोलन का रूप समाने आया तो आंतकवाद के नाम से विख्यात हआ। देश के देशभक्तों ने इसमें यम की नीति को प्रमुखता दी।

इसका प्रतिनिधित्व शहीद भगत सिंह जैसे लोगों ने किया ‘रंगभूमि में प्रेमचन्द ने आंदोलन के रूप को भी रूपायित किया है। MHD 14 Free Solved Assignment

उपन्यास में इसका नेतृत्व वीरपाल सिंह करता है वह उदयपुर रियासत के अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करता है वह राज्य के अधिकारियों की हत्या से लेकर राजकोष को लूटने तक सभी कार्य करता है।

वह अपना पूरा जीवन इसी प्रकार की नीतियों से देश की सेवा करता है। हालाँकि प्रेमचन्द को देशभक्तों से गहरी सहानुभूति है और उनके प्रति सच्चा स्नेह भी है।

किन्तु वे आंदोलन की इस दिशा से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि बेगुनाह लोगों की हत्या से कभी भी आजादी की प्राप्ति नहीं हो सकती। चूँकि तोप का जवाब सरकार भी तोप से ही देती थी,

जिससे मारे तो बेकसूर लोग जाते थे अतएव प्रेमचन्द ऐसे देशप्रेमियों को गुमराह मानते हैं। इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप के प्रति भी असहमत होते हैं उपन्यास में स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाला पात्र विनय है

जबकि जमींदार कुंवर भरत सिंह और रानी जाहनवी का पुत्र है। विनय सेवा समिति का संचालक है। सेवा समिति का मुख्य कार्य संरचनात्मक कार्य करना है।

यथा- जहाँ कोई विपदा हो, मैले त्योहार हो, वहाँ लोगों की मदद करना। लोगों को , आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाना आदि। सेवा समिति के कार्यक्षेत्रों में गाँधी के संरचनात्मक कार्यों की झलक मिलती है जोकि उस युग में स्वाधीनता आंदोलन का ही अंग था।

लोगों को जागरूक बनाया जाता था जिससे कि ये सक्रिय रूप से आंदोलन में भागीदारी निभायें विनय भी इसी तरह से कार्य कर रहा था।

डॉ. गांगुली, सोफिया, प्रभुसेवक आदि उसके सहायक बनकर आते हैं और स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप को और भी मुखर बनाते हैं।MHD 14 Free Solved Assignment

यह सेवा समिति सत्ता की आँख की किरकिरी बनती जाती है लेकिन ये अपना कार्य करते हैं। समाज की सेवा के साथ-साथ लोगों को जागरूक बनाने में ये कोई कसर नहीं उठा रखते।

प्रेमचन्द स्वाधीनता आंदोलन के इस पक्ष के साथ सहमत दिखाई देता है क्योंकि इससे लोगों में जागृति आती है। वह अपने कार्य स्वयं करने के लिए तत्पर होते हैं वे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एकजुट होना सीखते हैं। इस प्रकार वे संरचनात्मक कार्यक्रमों को स्वाधीनता

• आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। इन सबसे बढ़कर ‘रंगभूमि’ उपन्यास में स्वाधीनता-अभिलन को प्रगति देने काल गाँधीजी के असहयोग, आंदोलन का स्पष्ट चित्रण हुआ है।

हालांकि सूरदास औरमि, जॉनसेवक के बीच संघर्ष की शुरुआत निहायत ही व्यक्तिगत कारणों से होती है। मि. जॉनसेवक सिगरेट का कारखाना लगाने के लिए जमीन खरीदना चाहता है।

सूरदास परंपरागत नैतिक पाण्डेपुर बस्ती के सभी लोगों को पूँजीवादी चातुर्य से अपने पक्ष में करने में सफल हो जाता है

लेकिन सूरवास, ऊँचा भिरखारी अकेले संघर्ष करने का निर्णय लेता है। वह हार जाता है, सत्ता के हस्तक्षेप से जमीन उसके हाथ से चली जाती है।

मामला तब तूल पकड़ना है, जब पाण्डेपुर बस्ती को खाली करवाने की बारी आती है। मि. जॉनसेवक औपनिवेशिक सत्ता को अपना हथियार बनाकर उसकी आड़ में खड़ा हो जाता है।

सूदास के सामने अब सरकार होती है। सूरदास संघर्ष के लिए तत्पर है वह अपना झोंपड़ा खाली नहीं करने का निर्णय लेता है नगर के सभी लोग, सेवा समिति के लोग, विनय, सोफिया, प्रभुसेवक, इन्दु आदि सूरवास के पक्ष में हैं। MHD 14 Free Solved Assignment

जनता सूरदास के पक्ष में है इस प्रकार संघर्ष आम जनता व सरकार का हो जाता है। सूरदास के व्यक्तित्व के प्रभाव में सरकार के सिपाही सरकार के साथ सहयोग करने से इंकार कर देते हैं।

गोली चलाने से मना कर देते हैं। राजा साहब और ब्राउन दोनों खड़े देखते रह जाते हैं जिसे लेखक ने इन शब्दों में व्यक्त किया हैउनकी आँखों के सामने एक ऐसी घटना घटित हो रही थी,

जो पुलिस के इतिहास में एक भूतन युग की सूचना दे रही थी, जो परंपरा के विरूद्ध मानव प्रकृति के विरुद्ध नीति के विरूद्ध थी।

सरकार के वे पुराने सेवक, जिनमें से कितनों ही ने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रजा का दमन करने ही में । व्यतीत किया था, यो अकड़ते हुए चले जायें अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राणों को भी समर्पित करने को तैयार हो जाएँ।”

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5 गबन की अंतर्वस्तु का परिचय देते हुए उसकी भाषा शैली की विशिष्टता बताइए।

उत्तर- ‘गबन’ को पढ़ते हुए हम कभी तो लेखक की आवाज में सुनते हैं, तो कभी लेखक के द्वारा कल्पित पात्र की आवाज में इसी तकनीक के आधार पर गवन की कथा बुनी गयी है।

जहाँ उपन्यास में लेखक की अपनी आवाज में कथा सुनायी जाती है उसे प्रत्यक्ष भाषा-शैली कहते हैं ‘गबन में हम प्रेमचंद को कहीं कहानी सुनाते, कहीं स्थानों और पात्रों की बाह्य रूप रेखा का चित्रण करते, कहीं पात्रों की मनःस्थिति का वर्णन करते, कहीं उनकी मानसिक दशा का विश्लेषण करते,

कहीं उनके चरित्र पर टिप्पणी करते, कहीं समस्याओं का विवचेन करते हुए पाते हैं। हम प्रेमचंद के किस्सागो रूप में उनकी भाषा को देखें। कहानी सुनाते समय प्रेमचंद तत्सम शब्दों का प्रयोग कम करते हैं।

अधिकांश प्रयोग तद्भव शब्दों का होता है और उसके साथ ही उन्होंने संस्कृत तथा अरबी-फारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है। कुल मिलाकत यह भाषा बोलचाल की भाषा होती है।

प्रेमचंद ने छोटे-छोटे वाक्यों की रचना की है। अधिकतर के भरल वाक्यों की ही रचना करते हैं, कहीं-कहीं ही उन्होंने संयुक्त वाक्यों की रचना भी की है। MHD 14 Free Solved Assignment

आरम्भ से लेकर अंत तक पूरे उपन्यास में इसका उदाहरण देखा जा सकता है इसके साथ ही इस उपन्यास में अनेक पात्रों की आवाज भी सुनायी देती है।

कहीं तो वे आपस में वार्तालाप करते हुए तो कहीं स्वगत चिंतन करते हुए दिखाई देते हैं। प्रेमचंद ने पात्रों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अवस्थाओं एवं उनकी मनःस्थिति के अनुसार भाषा को विविधता प्रदान की है।

प्रेमचंद ने अपने इस उपन्यास में स्थान और काल को यथार्थ और विश्वसनीय बनाया है। क्योंकि इसी स्थान और काल के आयाम में पात्र को अपने भाग्य का नाटक खेलना है।

यही कारण है कि प्रेमचंद जब किसी स्थान का वर्णन करते हैं तो उसकी सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ प्रस्तुत कर देते हैं। उस स्थल की छोटी से छोटी वस्तु का भी उल्लेख करते हैं।

जैसा स्थान होता है, वैसा ही भाषा होती है। उदाहरण – “सन्ध्या हो गयी थी, म्युनिसिपैलिटी के अहाते में सन्नाटा छा गया था। कर्मचारी एक-एक करके जा रहे थे।

मेहतर कमरों में झाड़ लगा रहा था। चपरासी ने भी जूते पहनना शुरू कर दिया था। खोंचेवाले दिन भर की बिक्री के पैसे गिन रहे थे। पर रमानाथ अपनी कुरसी पर बैठा रजिस्टर लिख रहा था।”

इसके साथ ही प्रेमचंद जब पहली बार किसी पात्र को सामने लाते हैं तब उसका ऐसा जीता जागता शब्द-चित्र खींचते हैं कि वह पात्र पाठकों के सामने एकदम से मूर्त हो जाता है।

वे उन पात्रों की रूपरेखा, वेश-भूषा, आयु, आदि का वर्णन बहुत ही सूक्ष्मता के साथ करते हैं। इसके माध्यम से प्रेमचंद पात्रों को ठोस शरीर और विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। प्रेमचंद की यह विशेषता उनके सभी उपन्यास में देखी जा सकती है।

प्रेमचंद अपने पात्रों के वार्तालाप एवं स्वगत कथन में किस तरह की भाषा प्रयोग करते हैं। गबन में प्रेमचंद के अपने पात्रों को उनकी शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन, परिस्थिति और मानसिक स्थिति के अनुरूप भाषा प्रदान की है।

यही कारण है कि उनके पात्रों की भाषा में हम वैविध्य को साफ-साफ देख सकते हैं। वकील साहब उच्चवर्गीय पात्र हैं इसलिए उनकी भाषा में तत्सम के शब्दों के साथ-साथ अंगरेजी के शब्द आते हैं।

वाक्य की संरचना भी बदल जाती है। सरल के साथ-साथ संयुक्त एवं मिश्र वाक्यों को हम देख सकते हैं। उनके वाक्यों की लंबाई भी बढ़ जाती है। MHD 14 Free Solved Assignment

उदाहरण “नान्सेंस ! आप एक युवती को किसी पुवक के साथ एकान्त में विचरते देखकर दाँतों तले उँगली दबाते हैं। आपका अंतःकरण इतना मलिन हो गया है कि स्त्री पुरुष को एक जगह देखकर आप संदेह किये बिना रह ही नहीं सकते हैं।

पर जहाँ लड़के और लड़कियाँ एक जगह शिक्षा पाते हैं, वहाँ यह जाति भेद बहुत महत्व की वस्तु नहीं रह जाती – आपस में स्नेह और सहानुभूति की इतनी बातें पैदा हो जाती है कि कामुकता का अंशा बहुत. थोड़ा रह जाता है।” देवीदीन निम्नवर्गीय चरित्र है।

निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए :

(क) प्रेमचंद के नाटक

उत्तर- उपन्यास और कहानी के अतिरिक्त प्रेमचन्द ने तीन नाटक भी लिखे। यह एक रोचक तथ्य है कि प्रेमचन्द के लेखन का आरम्भ एक नाटक से हुआ तब प्रेमचन्द की उम्र लगभग 13 वर्ष की थी।

उर्दू अफसाने पढ़ने का चस्का तो लग ही चुका था, रामलीला देखने का शौक भी कम न था।

प्रेमचन्द का पहला नाटक संग्राम था जो 1923 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद उनके दो और नाटक प्रकाशित हुए कर्बला (1924) और प्रेम की बेदी (1933) संग्राम गाँव में किसान और जमीन्दार के सम्बन्धों पर आधारित एक सामान्य कोटि का नाटक है।

जमीन्दार ठाकुर मचल सिंह गाँव के एक किसान हलधर की पत्नी राजेश्वरी को देखकर उस पर आसक्त हो जाता है और उसे हस्तगत रने के लिए उसके पति हलधर को एक षड्यन्त्र के जरिए जेल भिजवा देता है।

इस पर राजेश्वरी करने. प्रतिशोध की भावना से भर कर जमीन्दार को मटियामेट कर देने का संकल्प करती है। वह जमीन्दार का प्रस्ताव मान लेती है

और उसके द्वारा उपलब्ध करायी हवेली पर यह रहस्य अधिक दिनों तक गोपनीय नहीं रह अधिका रह पाता और संबल का भाई भी राजेश्वरी का आणिक हो घर अपने ग्रामीण भाइयों पर सिंह अपने भाई की हत्या का मन्त्र पत्नी दोनों से बदला लेने के जाता है।MHD 14 Free Solved Assignment

इस पर कीट कर आ जाता है और जमीन्दार तथा लिए डाकू बन जाता है। वेन सिंह अपराध हो से अशान्त होकर हत्या का आरन करता है प्रात्न सबल सिंह भी अपने भाई की मृत्यु का समाचार करने की कोशिश करता है।

हर दोनों की प्राणरक्षा करता है। सबल सिंह की पत्नी हत्या कर लेती है और सबल सिंह जीवन उदासीन होकर तीर्थयात्रा के लिए निकल जाता है।

हलधर को भी अपनी पत्नी की सच्चरित्रता का प्रमाण मिल जाता है और दोनों साथ रहने लगते हैं। सबल सिंह के तीर्थयात्रा पर निकल जाने के बाद जमीन्दारी प्रथा की समाप्ति और जमीन पर किसानों के स्वामित्य की घोष समाप्ति होती है।

नाटक की सुणामय संग्राम में घटनाओं की बहुलता, संयोगों की भरमार और क्या को भगमाना मोड़ देने की प्रवृत्ति बहुत प्रबल है। इस कारण इसमें टकीय तनाव का है।

औपनिवेशिक भारतीय किसान के उद्धार, की अभिलक्षित सोच नाटक को अविश्वसनीय भी बनाती है। प्रेमाश्रम की तरह जमीन्दारों के हृदय- पर प्रेमचन्द का विश्वास संग्राम में भी परिलक्षित होता है।

य-परिवर्तन पर कर्बला की भाषा, प्रेमचन्द के ही शब्दों में सरासर उर्दू श्री, यद्यपि यह नागरी लिपि में लिखी गयी थी।

परिणामतः इसे न तो हिन्दी पाठकों ने अधिक महत्त्व दिया न उर्दू पाठकों ने कर्मता की रचना रंगमंच को ध्यान में रख कर नहीं की गयी थी और मुस्लिम समाज के नाटक के प्रति रवैये को देखते हुए इसके प्रदर्शन की सम्भावना भी नगण्य थी।

प्रेमचन्द ने दयानरायन निगम के लिए पत्र में स्वयं ही स्वीकार किया था कि “यह ग्रामा महज पढ़ने के लिए लिखा गया था।”

प्रेम की वेदी (1933) का केन्द्रीय कथ्य प्रेम को संसार के सभी सम्बन्धों से श्रेष्ठ सिद्ध करना है। इसकी नायिका मिस जेनी नाटक के अन्त में कहती है “आज मैं सारे ढकोसलों को इन सारे बनावटी बन्नों को प्रेम की वेदी पर अर्पण करती हैं।

यही ईश्वर का धर्म है धन का धर्म विद्या का धर्म, राष्ट्र का धर्म संघर्ष में हो सकता है खुदा का धर्म प्रेम है और मैं इसी धर्म को स्वीकार करती है। शेष धोसा है।” MHD 14 Free Solved Assignment

(ख) प्रेमाश्रम की भाषा

उत्तर- किसी भाव को रचनात्मक अभिव्यक्ति देने और उसे लिखित स्वरूप से प्रकट करने में भाषा एक प्रमुख उपादान है।

रचना में निहित भावों की सम्प्रेषिका होने के कारण भाषा का अपना एक विशिष्ट महत्त्व है इसलिए समझदार कृतिकार सदैव ऐसी भाषा को अपनी कृति में व्यवहृत करते है

जो सहज बोधगम्य हो और भाव-सम्प्रेषण में पूर्णतः सक्षम हो। प्रेमाश्रम उपन्यास की भाषा-शैली का विवेचन करने से पूर्व यह उचित होगा कि हम स्वयं उसके कृतिकार प्रेमचन्द की भाषा से सम्बन्धित विचारों का अनुशीलन कर ले।

प्रेमचन्द जी का यह स्पष्ट मत था कि भाषा की गुलामी ही सच्ची गुलामी है। अंग्रेजी भाषा इस मिट्टी की भाषा नहीं है इसीलिए उन्होंने साहित्य का उद्देश्य में स्पष्टता से लिखा है हमारी पराधीनता का सबसे अपमानजनक, सबसे व्यापक,

सबसे कठोर अंग अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व है और आगे बढ़कर ये स्वीकारते थे कि भाषा शोषण का अंग बनकर सामने आयी है। शोषण के चक्र को तोड़ने के लिए विदेशी भाषा के चक्र को तोड़ना जरूरी है।

प्रेमचन्द भाषा को राष्ट्रीय एकता से सम्बद्ध करते हुए कहते हैं- “राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश में सांस्कृतिक एकता हो और भाषा की एकता उस सांस्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है।

किन्तु जब प्रेमचन्द के सामने भाषा-स्वीकार का प्रश्न आया, तब हिन्दी के तीन रूप उनके सामने आये। एक तो था हिन्दी जो संस्कृतनिष्ठ थी,

दूसरी वह जो फारसी लिपि में लिखी जाने के कारण उर्दू कहीं और तीसरी आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी प्रेमचन्द ने हिन्दुस्तानी को ही अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया इसलिए कि बोलचाल की भाषा ही किसी रचना को आम जनता तक पहुँचा सकती है तथा सहज बोधगम्य होने के कारण शीघ्र ही रचना को लोकप्रिय भी बना सकती है।”

‘प्रेमचन्द ने जब यह देखा कि ‘सेवासदन’ को केवल कालिये इतना अधिक आवरणात हुआ है कि उसकी भाषा हिन्दुस्तानी है तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि वह शैली जिसे लेकर वे अपने समस्त उर्दू पाकों तक पहुँच सकते हैं हिन्दी पाठकों के लिए भी एकदम बोधगम्य है। MHD 14 Free Solved Assignment

और कहना न होगा कि प्रेमचन्द ने इसी भाषा को व्यवहुत करने का निर्णय ले लिया तथा अपार सफलता अर्जित की आज उनके उपन्यासों को अपनी भाव-गरिमा, चरित्र-चित्रण एवं सामाजिक चेतना के कारण जो आदर प्राप्त से रहा है उसमें उनकी भाषा का भी कम योगदान नहीं है, इसे सभी जानते हैं।

वास्तव में प्रेमचन्द भाषा के जादूगर थे भाषा पर उनका अदभूत अधिकार था। इसका एक ज्वलन्त प्रमाण यह है कि कथोपकथन में जिस पात्र के मुख से कोई बात कहलायी गयी है. उस कथन की भाषा उसी पात्र के अनुकूल है। ऐसी सप्राण भाषा हिन्दी में दुर्लभ है।

पंडित जगन्नाथ प्रसाद शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी की गद्य शैली का विकास में प्रेमचन्द की भाषा पर खिचड़ी होने का आरोप लगाया है, किन्तु दूसरी ओर डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल कहते हैं

अपरिपक्वता और उसके “प्रेमचन्द भाव और अनुभूति के साथ-साथ भाषा के भी बहुत बड़े बादशाह थे। प्रेमचन्द का मोठा पक्ष इतना समृद्ध और विशाल था कि उसमें पण्डित भी अपने अनुकूल भाषा पा सकता था, मौलवी भी जज-वकील भी और गाँव के किसान-मजदूर भी।”

प्रेमचन्द जी की भाषा पर इससे अधिक और कहा भी क्या जा सकता है? प्रेमचन्द की भाषा हिन्दुस्तानी है-स्वाभाविक बोलचाल की भाषा, पर इस भाषा में लेखक ने भाषा की चुस्ती, मुहावरों की सजावद, कहावतों और सूक्तियों के अपूर्व समन्वय से अपना व्यक्तित्व ढाल दिया है और इस भाषा को लोग प्रेमचन्दीय भाषा कहने लगे हैं।

उपर्युक्त विवेचन के उपरान्त अब हम प्रेमाश्रम उपन्यास में एकाइत भाषा-शैली का अनुशीलन- मूल्यांकन करने का प्रयास करेंगे और देखेंगे कि अपने भाषागत दृष्टिकोण को प्रेमचन्द जी इस उपन्यास में कहा तक चरितार्थ कर सके है।

प्रेमाश्रम’ की भाषा का अध्ययन करते समय सामान्यतः उसके निम्नलिखित रूप सामने आते हैं

(1) सरल स्वाभाविक बोलचाल की भाषा-प्रेमचन्च जी आम हिन्दुस्तानी भाषा के प्रबल समर्थक थे, इसलिए स्वभावतः ‘प्रेमाश्रम’ में सरल स्वाभाविक बोलचाल की भाषा का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है और इसी भाषागत सरलता एवं स्वाभाविकता के कारण उपन्यास की कथावस्तु अत्यधिक संवेदनीय एवं सम्प्रेषणीय बन गयी है।

उपन्यास की भाषा जितनी सरल है, उतनी ही नाव सबल भी है, यहाँ पर इस संदर्भ में एक ही उदाहरण देना पर्याप्त होगा, यथा”दूसरी तारीख पर ज्ञानशंकर का मुकदमा पेश हुआ।

ज्वाला सिंह ने फैसला सुना दिया। उनका दावा । खारिज हो गया। ज्ञानशंकर उस दिन स्वयं कचहरी में मौजूद थे यह फैसला सुना तो दाँत पीसकर रह ।

गये क्रोध में भरे हुए घर आये और विद्या पर जले दिल के फफोने फोड़े। आज बहुत दिनों के बाद लाला प्रभाशंकर के पास गये और उनसे भी इस असद व्यवहार का रोना रो आये।

एक सप्ताह तक यही क्रम चलता रहा। शहर में ऐसा कोई परिचित आदमी न था, जिससे उन्होंने ज्वाला सिंह के कपट व्यवहार की शिकायत न की हो। यहाँ तक कि रिश्वत का दोषारोपण करने में भी संकोच न किया और उन्हें शब्दाघात से ही तस्कीन न हुई।

कलम की तलवार से भी चोटें करनी शुरू की। कई दैनिक पक्षों में ज्याला सिंह की खबर ली। जिस पत्र में देखिए उसी में उनके विरूद्ध कॉलम के कॉलम भरे रहते। थे।”

(2) अलंकृत और काव्यात्मक भाषा-यद्यपि प्रेमचन्द जी कथा वर्णनों में आलंकारिता के प्रबल विरोधी थे और जन सामान्य द्वारा व्यवहृत भाषा के ही कथा में प्रयोग करने के पक्षधर थे,

किन्तु पात्रगत औचित्य को देखते हुए कतिपय स्थलों पर उन्होंने काव्यात्मक भाषा का प्रयोग करने के अपने अधिकार को भी अक्षुण्ण रखा है।

यहाँ यह ध्यातव्य है कि ऐसे वर्णनों में भी उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं बनी है वरन् अपनी सरलता में ही यह काव्यात्मक बन गयी है। प्रेमाश्रम में राय कमलानंद के संवादों में ही अधिकांश इस प्रकार की भाषा व्यवहृत की गयी है। एक उदाहरण यहाँ भी प्रस्तुत किया जा रहा है

“आप इस मूर्ति को देखकर चौंकते होंगे यह मेरे लिए मिट्टी के खिलौने है। विषयासक्त आँखें इनके रूप-लावण्य पर मिटती है, मैं उस ज्योति को देखता हूँ जो इनके घट में व्यापक है।

बाह्य रूप कितना ही सुन्दर क्यों न हो, मुझे विचलित नहीं कर सकता। वह मकुए हैं, जो गुफाओं और कदराओं में बैठकर तप और ध्यान स्वांग भरते हैं। वे कायर है, प्रलोभनों से मुँह छिपाने वाले, तृष्णाओं से जान बचाने वाले।

वे क्या जाने कि आत्म-स्वातन्त्रय क्या वस्तु है? चित्त की दृढ़ता और मनोबल का उन्हें अनुभव ही नहीं हुआ। वह सूखी पत्तियाँ हैं जो हवा के एक झोंके से जमीन पर गिर पड़ती है। योग कोई दैहिक क्रिया नहीं है, आत्म-शुद्धि, मनोबल और इन्द्रिय- दमन सच्चा योग सच्ची तपस्या है।”

(3) शुद्ध परिनिष्ठित खड़ी बोली- प्रेमाश्रम’ उपन्यास में अनेक पात्र ऐसे है जो शिक्षित और बौद्धिक हैं। इसलिए स्वाभावतः उनकी भाषा का रूप परिमार्जित है।

ऐसे पात्रों की कथा या भाषा को प्रेमचन्द ने शुद्ध संस्कृतनिष्ठ रूप में ही प्रस्तुत किया है। ज्ञानशंकर, गायत्री, प्रेमशंकर, डॉ. चोपड़ा आदि की भाषा में इसी रूप के दर्शन होते है. राय कमलानंद एवं विद्या के निम्नलिखित संवाद में इस भाषा का एक उत्कृष्टतम रूप द्रष्टव्य है

“विद्या की भौहें तन गयी, मुखराशि रक्तवर्ण हो गयी। गौरवयुक्त भाव से बोली- पिताजी, मैंने सदैव आपका अदब किया है और आपकी अवज्ञा करते हुए मुझे जितना दुख हो रहा है वह वर्णन नहीं कर सकती पर यह असंभव है कि उनके विषय में यह लांछन अपने कानों से सुनू गुझे उनकी सेवा में आज सत्रह वर्ष बीत गये,

पर मैंने उन्हें कभी कुवासनाओं की ओर झुकते नहीं देखा। जो पुरुष अपने यौवनकाल में भी संयम से रहा हो उसके प्रति ऐसे अनुचित क आपकी आत्मा को पाप लगता है।

आप उसके साथ नहीं बहिन के साथ भी अत्याचार कर रहे है। इससे राय साहब तुम मेरी आत्मा की चिंता मत करो। इस दुष्ट को समझाओ, नहीं तो उसकी कुशल नहीं है।

मैं गायत्री को उसकी काम-चेष्टा का शिकार न बनने दूंगा। मैं तुमको वैशव्य रूप में देख सकता है, पर अपने कुल- गौरव को यूँ मिट्टी में मिलते नहीं देख सकता।

मैंने चलते-चलते उससे ताकीद कर दी थी, गायत्री से काई सरोकार न रखे, लेकिन गायत्री के पत्र नित्य चले आ रहे हैं, जिससे विदित होता है कि वह उसके फन्दों में जकड़ी हुई है।

यदि तुम उसे बचा सकती हो तो बचाओ, अन्यथा यही हाथ जिन्होंने एक दिन उसके पैरों पर फूल और हार चढ़ाये थे, उसे कुल- गौरव की वेदी पर बलिदान कर देंगे।”

(ग) रंगभूमि’ में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद

उत्तर – प्रेमचंद अपने आपको शुद्ध यर्थाथवादी लेखक नहीं मानते। उन्होंने आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद की । नई अवधारणा सामने रखी। 22 जनवरी 1930 को श्री हरिहरनाथ को उन्होंने पत्र लिखा।

उसमें लिखामेरा सवाल है कि साहित्य का सबसे बड़ा उद्देश्य उन्नयन है ऊपर उठाना। हमारे यथार्थवाद को भी यह बात आँख से ओझल न करनी चाहिए।

मैं चाहता हूँ कि आप मनुष्यों की सृष्टि करें, साहसी, ईमानदार, स्वतंत्रचेता मनुष्य जान पर खेलने वाले जोखिम उठाने वाले मनुष्य, ऊँचे आदर्शों वाले मनुष्य आज इसी की जरूरत है।

कहना न चाहिए कि ‘रंगभूमि का सूरदास इसी तरह का मनुष्य है। इसे कोई चाहे तो आदर्श पात्र कहे, चाहे यथार्थवादी इस रूप में प्रेमचंद अपने आपको आदर्शवादी लेखक ही मानते हैं।

यह अलग बात है कि आदर्शवाद से उनका तात्पर्य अधिकतर लोगवाद रहा है। वे चाहते हैं कि साहित्य और समाज का एक ऊँचा लक्ष्य हो। वही साहित्य को गति और बल देते हैं।

ऊँचे लक्ष्य के बिना बड़ा काम नहीं हो सकता। इस आदर्श आकांक्षा के साथ प्रेमचंद की इच्छा रही है कि साहित्य को जनता के वास्तविक जीवन से जुड़ा हुआ होना चाहिए।

वे मानते हैं कि साहित्य सच्चा इतिहास है क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है वैसा कोई इतिहास में नहीं हो सकता” साहित्य में यह ऐतिहासिक सत्य तभी आ सकता है जब रचना की आधारभूमि यथार्थवादी होती है।

प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है- यथार्थवाद यदि हमारे आँखें खोल देता है, तो आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुंचा देता है।

लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह गुण है, यहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठे जो सिद्धांतों की मूर्ति मात्र हो- जिनमें जीवन न हो।

किसी देवता की कामना मुश्किल नहीं है, लेकिन उसमें प्राण प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।”

घ) सेवासदन’ की मूल समस्या

उत्तर- किसी भी रचना का कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य होता है अर्थात् उसमें किसी ज्वलंत प्रश्न या । समस्या को उठाकर उसके समाधान का प्रयास किया जाता है।

मुंशी प्रेमचन्द तो पूर्णतया सोद्देश्य साहित्यकार रहे हैं उन्होंने अपने सभी उपन्यासों और कहानियों में किसी समस्या को उभारकर उसका समाधान प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। इस संदर्भ में उनके ये उद्गार द्रष्टव्य है

“वास्तव में कोई रचना रचयिता के मनोभावों का आईना होती है। जिसके हृदय में देश की लगन है उसके चरित्र, घटनावली और परिस्थितियाँ सभी उसी रंग में रंगी नजर आयेंगी।

लहरी आनन्दी लेखकों के चरित्र में भी अधिकांश चरित्र ऐसे ही होंगे, जिन्हें जगत् गति नहीं व्यापती वे जासूसी तिलस्मी चीजें लिखा करते हैं। अगर लेखक आशावादी है तो उसकी रचना में आशावादिता छलकेगी।

अगर वह शोकवादी है तो बहुत प्रयत्न करने पर भी वह अपने चरित्रों को जिंवादिल न बना सकेगा।” मुंशी प्रेमचन्द के विषय में कहा जा सकता है कि वे आशावादी उपन्यासकारों में से है अतः उन्होंने जिन समस्याओं को प्रस्तुत किया है,

उनके समाधान भी प्रस्तुत किए है-यह बात दूसरी है कि वे समाधान पूर्णतः संभव न हो। सेवासदन में प्रेमचन्द ने मूलतः निम्नांकित समस्याएँ प्रस्तुत की हैं:

(क) दहेज की समस्या
(ख) रिश्वतखोरी की समस्या।

(ग) धार्मिक ठगी की समस्या
(घ) साम्प्रदायिक विद्वेष की समस्या
(ड) वेश्यावृत्ति की समस्या

(क) दहेज की समस्या दहेज की समस्या को प्रेमचन्द ने नाना अनर्थों की जड़ दिखाया है। इसके कारण सीधे-साधु चरित्र वाले पिताओं द्वारा दारोगा कृष्णचंद्र की भाँति रिश्वत लेने को विवश होना पड़ता है,

जिससे वे स्व-पुत्रियों के विवाह में उचित दहेज दे सकें। इसके अभाव में सुयोग्य कन्याएँ भी अयोग्य वरों के गले मद दी जाती है, जिससे उनका वैवाहिक जीवन असफल सिद्ध होता है और वे सुमन की भाँति पथभ्रष्ट हो जाती हैं।

दहेज की प्रथा मुख्यतः सुमन तथा गौणतः शांता के विवाह प्रसंग में उमरकर सामने आती है। दारोगा कृष्णचन्द्र अखबारों में दहेज प्रथा के विरोध में लेख पढ़ते आए हैं जिससे उन्हें विश्वास हो जाता है कि इस कुप्रथा का सीघ्र ही देश से नाम मिटने वाला है,

किन्तु जब वे अपनी पुत्री सुमन के लिए पर खोजने निकलते हैं तो लड़के वालों की दहेज की ऊँची-ऊँची माँगे सुनकर उनके होश उड़ जाते हैं।

लोग किस प्रकार के तर्क देकर दहेज का औचित्य सिद्ध करते हैं इस समाना में दो महशयों के उदगार अवलोकनीय है। उनमें से पहले महाशय जो स्वयं को इस कुप्रथा के जानी दुश्मन बताते हैं,

उनका तर्क देखिए “महाशय, मैं स्वयं इस कुप्रथा जानी दुश्मन हूं, लेकिन क्या करें, अभी पिछले साल लड़की का विवाह किया, दो हजार केवल दहेज में देने पड़े दो हजार खाने-पीने में खर्च किए, आप ही कहिए,

यह कमी कैसे पूरी हो ? दूसरे सज्जन का तर्क है कि जब लड़के की पढ़ाई-लिखाई पर मैंने हजारों रुपये व्यय किए हैं, तो उस खर्च को मैं ही क्यों सहन करूँ, जबकि उसका लाभ आपकी लड़की भी उठायेगी ‘दूसरे महाशय इनसे अधिक नीतिकुशल थे।

दारोगाजी, मैंने लड़के को पाला है, सहस्त्रों रूपये उसकी पढ़ाई में खर्च किए हैं। आपकी लड़की को इससे उतना ही लाभ होगा, जितना मेरे लड़के को तो आप ही न्याय कीजिए कि यह सारा भार में अकेला सुमन के लिए वर खोजने निकले।

उमानाथ को नो दहेज की ऐसी ही लम्बी चौड़ी माँगे सुनकर निराश होना पड़ता है कैसे उठा सकता हूँ। “अंत में उमानाथ ने निश्चय किया कि शहर में कोई वर ढूँढना चाहिए।

सुमन के योग्य वर देहात में नही मिल सकता पर शहर वालों की लम्बी-चौड़ी बातें सुनी तो उनके होश उड़ गये। बड़े आदमियों का तो कहना ही क्या, दफ्तरों के मुसद्दी और क्लर्क भी हजारों का राग अलपाते थे।”

यही दशा शांता के लिए वर खोजते समय होती है और वे उसका एक खाते-पीते घर में तभी रिश्ता तय कर पाते हैं, जब उन्हें गजार से एक हजार रुपये मिलने का वचन मिल जाता है।

(ख) रिश्वतखोरी की समस्या – रिश्वतखोरी की समस्या को उपन्यासकार ने दारोगा कृष्णचन्द्र के माध्यम से उभारा है। पच्चीस वर्षतक थानेदारी करते हुए वे अपने कर्तव्य का निर्लोभ नाव से पालन करते आए हैं,

जिसका परिणाम यह निकलता है कि उनके अफसर तथा उनके अधीनस्थ कर्मचारी सभी उनसे संतुष्ट रहते हैं अधीनस्थ कर्मचारी, जिनके साथ ये भाई-चारे का व्यवहार करते थे,

उनका तर्क था
“यहाँ हमारे पेट नहीं भरता, हम इनकी भलमनसी को लेकर क्या करें चाटें? हमें घुड़की, डाँट-डपट सख्ती सब हमारा पेट भरना चाहिए।

रूखी रोटियाँ चाँदी के बाल में परोसी जायें तो भी वे पूरियाँ न हो जायेंगी। इसके साथ ही उनके अफसरों की असंतुष्टि का कारण यह था स्वीकार है, केवल “दारोगाजी के अफसर भी उनसे प्रायः प्रसन्न न रहते। वह दूसरे थाने में जाते तो उनका बड़ा आदर-सत्कार होता था,

उनके अहलमद, मुहर्रिर और अरदली खूब दायतें उड़ाते। अहलमद को नजराना मिलता। अरदली इनाम पाता और अफसरों को नित्य डालियाँ मिलती।

पर कृष्णचन्द्र के यहाँ यह आदर कहाँ? वह न दावतें करते थे, न डालियाँ ही लगाते थे जो किसी से लेता नहीं, वह किसी को देगा कहाँ से?

दारोगा कृष्णचन्द्र की इस शुष्कता को लोग अभिमान समझते थे।” इसे सामाजिक विडम्बना ही कहा जाएगा कि रिश्वत लेने से बचने वाले कृष्णचन्द्र से न तो उनके अफसर और अधीनस्थ कर्मचारी ही प्रसन्न हैं और न दे पाप की कमाई के अभाव में स्त्री पुत्री के विवाह हेतु दहेज में मोटी रकम देने की स्थिति में ही होते हैं।

दारोगा कृष्णचन्द्र को अपने सत्याचरण और ईमानदारी पर पश्चाताप करते दिखाकर उपन्यासकार ने इस ओर इंगित किया है कि हमारे राष्ट्रीय चरित्र की किस सीमा तक हत्या हो चुकी है

“कृष्णचन्द्र को अपनी ईमानदारी और सच्चाई पर पश्चाताप होने लगा। अपनी निःस्पृहता पर उन्हें जो ड था, वह टूट गया। वह सोच रहे थे कि यदि मैं पाप से न डरता तो आज गुझे यूँ ठोकरें न खानी पड़ती।

इस समय दोनों स्त्री-पुरुष चिंता में डूबे बैठे थे बड़ी देर के बाद कृष्णचंद्र बोले, देख लिया, संसार में सन्मार्ग पर चलने का यह फल होता है।

यदि आज मैंने लोगों को लूटकर अपना घर भर लिय होता तो लोग मुझसे सम्बन्ध करना अपना सौभाग्य समझते, नहीं तो कोई सीधे मुँह बात नहीं करता है। परमात्मा के दरबार में यह न्याय होता है?

अब तो दो ही उपाय है या तो सुमन को किसी कंगाल के पले बाँधू दूं या कोई सोने की चिड़िया फंसाऊँ पहली बात तो होने से रही, बस अब सोने की चिड़िया की खोज में निकलता हूँ।

धर्म का मजा चख लिया, सुनीति का हाल भी देख चुका अब लोगों को खूब दबाऊँगा, खूब रिश्वतें लूँगा, यही अंतिम उपाय है। संसार यही चाहता है और कदाचित ईश्वर भी यही चाहता है।

यही सही आज से मैं भी यही करूंगा जो संसार करता है।” रिश्वतखोरी की कुप्रथा के कारण कैसे अपराधी लोग अदंडित ही रह जाते हैं, उपन्यासकार ने इस तथ्य की ओर भी इंगित किया है।

महंत रामदास निरपराध चेतू अहीर की हत्या करा देता है, किन्तु 3096 की। रिश्वत देकर मामले को दबवा देता है। इस प्रकार न जाने कितने लोग रिश्वत के बल पर अदंडित रह जाते हैं।

(ग) धार्मिक ठगी की समस्या-हंत रामदास के माध्यम से उपन्यासकार ने इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि ईश्वर के नाम पर महंत लोग दीन जनता का किस बुरी तरह शोषण करते हैं।

कोई उनके विरूद्ध सिर भी नहीं उठा सकता, क्योंकि उनके आश्रय में पलने वाले मुस्थंडों के भय से सभी काँपते रहते हैं

“दारोगा जी के हल्के में एक महत रामदास थे वह साधुओं की एक गद्दी के महंत थे। उनके यहाँ सारा कारोबार श्री बांकेबिहारीजी’ के नाम पर होता था।

श्री बांकेबिहारीजी लेन-देन करते थे और 32) सैकड़े से कम सूद लेते थे। वही मालगुजारी वसूल करते थे, वही रेहननामे-बैनामे लिखाते थे।

श्री बांकेबिहारी जी की रकम दबाने का किसी को साहस न होता था और न अपनी रकम के लिए कोई दूसरा आदमी उनसे कड़ाई कर सकता था।

श्री बांकेबिहारीजी को रुष्ट करके उस इलाके में रहना कठिन था। महंत रामदास के यहाँ दस-बीस मोटे ताजे साधु स्थायी रूप से रहते थे।

वह अखाड़े में दंड पेलते मैंस का ताजा दूध पीते संध्या को दूधिया भाँग छानते और गांजे-चरस की चिलम तो कभी ठंडी न होने पाती थी। ऐसे बलवान जत्थे के विरूद्ध कौन सिर उठाता?” ऐसे बलवान जत्थे के विरूद्ध कौन सिर उठा”

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