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MHD 06

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MHD 06 Free Solved Assignment jan 2022

1. आदिकाल की पृष्ठभूमि का परिचय दीजिए।

उत्तर – हमें यह सहजतापूर्वक स्वीकारने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि किसी भी युग के साहित्य के मूल्य उसके अपने समाज की वास्तविकता से ही प्रमाणित होते हैं । यही कारण है कि साहित्य के सामाजिक मूल्य और उसकी कलात्मक व्याख्या की पूर्णता के लिए समाज की गतिविधि गायों का यथेष्ट ज्ञान अपेक्षित ही नहीं, अपितु अनिवार्य भी है।

अतएव साहित्य के सत्ता, समाज, आर्थिक गतिविधियों धार्मिक विचारों और दर्शनों के साथ है। आंतरिक सम्बन्धों का लेखा-जोखा भी बहुत ही आवश्यक है ।

हिन्दी भाषा के प्राचीन रूप का आरम्भ अपभ्रंश साहित्य बाद से माना जाता है । यह निर्धारित करना कठिन है कि हिन्दी साहित्य का आरम्भ किस तिथि वर्ष से हुआ? अधिकांश विद्वान् इस बात से सहमत हैं कि जिस बिन्दु में अपभ्रंश के प्रभाव से सहमत होकर जिस बिन्दु पर अपभ्रंश के विद्वान् से मुक्त होकर हिन्दी साहित्य का अपना अलग रूप निश्चित हुआ, वही हिन्दी साहित्य की आरम्भिक तिथि थी।

सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि दसवीं शताब्दी के पूर्व का साहित्य अपनी भाषागत विभिन्नताओं के कारण हिन्दी साहित्य से बिल्कुल भिन्न जान पड़ता है। MHD 06 Free Solved Assignment

अतः दसवीं शताब्दी के बाद का ही साहित्य हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत आएगा । पं० रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल का आरम्भ सं० 1050 (993) से माना है, जबकि डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे 1000 तक माना है।

शुक्लजी इसकी सीमा सं० 1375 (1318) तक मानते हैं, जबकि द्विवेदीर्ज इसे 1400 ई० तक माना है। हिन्दी साहित्य के इस आरम्भिक काल को हिन्दी विद्वानों ने भी अलग-अलग नाम दिये हैं।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘बीजवपन काल’ । कहा है, जबकि पं० रामचन्द्र शुक्ल ने वीरगाथा काल, राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध सामन्त युग, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल तथा रामकुमार वर्मा ने चारण काल की संज्ञा दी है।

इस काल में धर्म, नीति, शृंगार तथा वीर रस प्रधान सभी प्रकार की रचनाएँ उपलब्ध होती हैं। इस युग में भारतवर्ष पूर्णतः हिन्दू देश था। इसी काल में मुसलमानों के आक्रमण हुए थे, जिसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की साहित्यिक प्रवृत्तियों का जन्म हुआ।

राज्यों के आश्रित चारण कवियों ने अपने-अपने आश्रयदाताओं के परिश्रमपूर्ण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया।

मुसलमानों के आक्रमण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया। मुसलमानों के आक्रमण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया।

मुसलमानों के आक्रमण के परिणामस्वरूप जनता का अधिकांश जीवन युद्धमय वातावरण के बीच ही बीतता था । आदिकाल का साहित्य अधिकांशतया वीररसात्मक काव्यों का युग है, जिसके परिणाम ‘रासो ग्रन्थ’ हैं। इतिहास बताता है कि हिन्दी साहित्य है के आदिकाल के समय उत्तर भारत की दशा अत्यंत दयनीय हो गई थी ।

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में यह एक ऐसा समय था, जब केन्द्रीय सत्ता का पतन हो चुका था। सम्राट् हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् सम्पूर्ण राष्ट्र छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो चुका था। इस युग में राजा अपने वैयक्तिक | लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वीर योद्धाओं का प्रयोग करते थे। MHD 06 Free Solved Assignment

इस काल में सर्वाधिक साहित्य रचना राजस्थान में हुई, इस कारण साहित्य की भाषा डिंगल-पिंगल ही रही। इस युग में ऐसा साहित्य भी काफी मात्रा में लिखा गया, जिसमें अपभ्रंश भाषा का परिष्कृत रूप दिखाई पड़ता है।

इस युग की मुख्य परिस्थितियां निम्नलिखित हैंराजनीतिक पृष्ठभूमि-यह युग राजनीतिक दुरावस्था, अस्त-व्यस्तता और गृहकलह का युग था। एक ओर विदेशी आक्रमण की निरन्तर चलने वाली भीषण आंधियाँ थीं, तो दूसरी ओर राजाओं एवं सामन्तों की आपसी फूट तथा शत्रुता देश को खोखला कर रही थी।

मुसलमानों ने भारतीय राजाओं की आपसी कलह का लाभ उठाया। 19वीं शताब्दी तक मुसलमान सिन्ध से आगे भारत में प्रवेश नहीं कर सके थे। 10वीं शताब्दी में गजनी के सुलतान महमूद गजनवी ने भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के राज्यों पर विजय प्राप्त की।

उसने मथुरा, कन्नौज, ग्वालियर, कालिंजर को जीतकर सोमनाथ के मन्दिर की अपार धनराशि लूट ली थी। दक्षिण के चोलवंशीय राजा राजेन्द्र ने महमूद गजनवी को उखाड़ने में अन्य राजाओं को कोई सहयोग नहीं दिया। 11वीं-12वीं शती में अजमेर में चौहान, दिल्ली में तोमर तथा कन्नौज में गहउवाल राजाओं का शासन था।

अजमेर के बीसलदेव चौहान ने सीमान्त उत्तर-पश्चिमी भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था। इसी समय मोहम्मद गौरी ने भारत-विजय के सपने देखे। MHD 06 Free Solved Assignment

उसने भारत पर कई आक्रमण किए। अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को अनेक बार पराजित किया। किन्तु जब पृथ्वीराज जागरूक न रहा तथा वह राजा परमार के साथ युद्ध में उलझ गया तथा कन्नौज के राजा जयचन्द से शत्रुता रखने लगा, तो मोहम्मद गौरी ने अचानक आक्रमण करके पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिया।

पृथ्वीराज की पराजय के साथ ही भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव पड़ गई। मोहम्मद गौरी ने अपने राज्य का विस्तार किया और धीरे-धीरे मुस्लिम साम्राज्य की पताका समस्त उत्तर भारत में फहराने लगी ।

आदिकाल की राजनीतिक परिस्थितियों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय के राजपूत | राजा अपने छोटे-से प्रान्त को ही राष्ट्र समझते थे तथा वे उसी की रक्षा करना अपना धर्म समझते थे।

संकुचित राष्ट्रीयता के कारण मुसलमानों ने लगभग सम्पूर्ण भारत पर आधिपत्य जमा लिया था । यदि उस समय सभी राजपूत राजा मिलकर मुस्लिम आक्रमणकारियों से युद्ध करते, तो आज हमारे देश का मानचित्र कुछ और ही होता।

सामाजिक पृष्ठभूमि-किसी भी देश की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों का उसकी सामाजिक परिस्थितियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिस समय देश की धार्मिक एवं राजनीतिक परिस्थिति शोचनीय हो, उस समय उच्च सामाजिकता की आशा नहीं की सकती 10वीं-11वीं शती तथा इससे कुछ पहले ही भारतीय समाज वर्ण के आधार पर जातियों की कठोर व्यवस्था में जकड़ा जा चुका था।

इस समय कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर व्यक्ति को श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट समझा जाता था। जातियों का वर्ग-भेद बढ़ता जा रहा था। समाज में छुआछूत की दुर्गन्ध बहुत अधिक मात्रा में फैल चुकी थी।

हिन्दू समाज से बहिष्कृत लोग पुनः अपना धर्म नहीं अपना सकते थे। समाज विभिन्न प्रकार की रूढ़ियों से ग्रस्त था। सामन्तों की वीरता का दंभ समाज की छाती पर , भयंकर विषधर बनकर लहराने लगा था। इस समय राजपूत वंश में स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी। MHD 06 Free Solved Assignment

स्वयंवरों के अवसर पर वीरता और सम्मान के नाम पर अपहरण काण्ड होते थे। इसी कारण ऐसे अवसरों पर रक्त की नदियां बह जाना एक सामान्य बात थी। इस समय के राजपूत सामन्त वीर, दृढ़व्रती तथा सत्यनिष्ठ थे । वे अपने स्वामी के गौरव की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान करने में संकोच नहीं करते थे।

इस समय एक ओर तो कर्तव्यनिष्ठा एवं वीरता का अजस् प्रवाह था तथा दूसरी ओर भोग-विलास और रंगरेलियों की भरमार थी। समाज में क्षत्रियों का प्राधान्य हो चला था। अधिकांश क्षत्रियों में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था।

इस समय की राजपूत स्त्रियों में भी वीरता तथा साहस का अभाव नहीं था। युद्ध क्षेत्र में पीठ दिखाने वाले पुरुषों को सर्वत्र अपमानित होना पड़ता था । स्त्रियां अपने पति की चिता पर जौहर करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करती थीं ।

राजा लोग युद्ध से लौटने पर अपनी रानियों के साथ रंगरेलियां मनाते थे। उस समय स्त्रियों को समाज में अधिक सम्मान नहीं मिलता था, बल्कि उन्हें भोग-विलास की सामग्री मात्र समझा जाता था

आर्थिक क्रिया – कलाप – आदिकालीन युग की अध्ययन-मनन के उपरान्त जब हम इसके आर्थिक क्रिया-कलाप पर दृष्टिपात करते हैं, तो हम यह पाते हैं कि इस काल का मुख्याधार कृषि ही थी।

ऐसा इसलिए कि इससे ही सभी प्रकार की शासकीय व्यवस्था संचालित थी। यह लक्षितव्य है कि उस समय के पदाधिकारियों को नकद वेतन न देकर कोई न कोई उन्हें जागीर दी जाती थी।

दूसरी बात यह कि किसानों की पैदावार में से आधा भाग तो राज्य का होता था । इस युग का समाज दो वर्गों में बँटा हुआ था उत्पादक |MHD 06 Free Solved Assignment

उत्पादक वर्ग को समाज में उपेक्षा और अनादर की दृष्टि से देखा जाता था। यह इसलिए कि ये दूसरे के उत्पादन का लाभ न उठाकर स्वयं ही उत्पादन करके आत्मनिर्भर होने का निरंतर प्रयास करते थे। दूसरी ओर उपभोक्ता वर्ग उत्पादक वर्ग की गाढ़ी कमाई का लाभ उठाकर चैन की वंशी बजाया करते थे।

इस प्रकार ये उच्च वर्ग से अपना सम्बन्ध रखते थे। इनकी प्रशंसा में कवि और चारण रचनाशील थे। धार्मिक स्थिति- इस युग में धर्म के क्षेत्र में अराजकता विद्यमान थी। उत्तर भारत में ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म की प्रधानता थी । बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म में अनेक बुराइयों , का प्रवेश हो चुका था।

शंकराचार्य के प्रयत्नों से बौद्ध धर्म क्षत-विक्षत हो चुका था। बौद्ध धर्म अनेक शाखाओं में बंट चुका था। वह हीनयान, महायान, वज्रयान, सहजयान, मन्त्रयान आदि विचित्र कर्मकाण्ड प्रधान सम्प्रदायों में विभक्त होकर इस देश में अन्तिम घड़ियां गिन रहा था।

बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा ने भ्रष्टाचार को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। चमत्कार प्रदर्शन के नाम पर ये तथाकथित धार्मिक लोग भोली-भाली जनता को ठगते थे। निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ भोग-विलास एक साधारण-सी बात हो चुकी थी।

अलौकिक शक्तियों और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए बौद्धों के विभिन्न सम्प्रदाय गुप्त मन्त्रों का जाप, | नारी सम्भोग तथा सुरापान आदि करते थे। इस युग में धर्म की आड़ में अधर्म का पोषण हो रहा था। तन्त्र-मन्त्र द्वारा सिद्धि की इस परम्परा का जैन धर्म पर भी प्रभाव पड़ा।MHD 06 Free Solved Assignment

बौद्धों की देखादेखी वैष्णव सम्प्रदाय भी विकृति के शिकार होने लगा। पांच रात्र, शेव कापालिक कालमुख आदि सम्प्रदाय भी वाममार्ग से प्रभावित हो चुके थे। शाक्त सम्प्रदाय में तो सुरासुन्दरी के प्रति गहन आकर्षण व्याप्त हो चुका था। समाज का निम्न वर्ग कामाचारियों के चंगुल में अधिक उलझा हुआ था।

इसी काल में बौद्ध धर्म के विकृत रूप और शैव धर्म के सम्मिश्रण से नाथपंथ विकसित हुआ। इस युग में बौद्ध धर्म के पतन के कारण ब्राह्मण धर्म पुनः प्रतिष्ठित हुआ, परन्तु उसमें भी अनेक बुराइयों ने प्रवेश पा लिया था।

ब्राह्मण धर्म दो भागों में विभक्त हो गया था शैव धर्म तथा वैष्णव धर्म । ब्राह्मण धर्म के पुनः प्रतिष्ठित होने से वर्ण-व्यवस्था फिर से जीवित हो उठी थी। हिन्दुओं में आचार-विचार, व्रत-पूजादि की भावना में वृद्धि हुई। हिन्दू समाज में धर्म के नाम पर आडम्बरों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा।

इस युग में ब्राह्मण अपने प्राचीन गौरव को खो बैठे थे। राजदरबार में अपने आश्रयदाता का गुणगान करने वाले कुछ ब्राह्मण आदर के पात्र समझे जाते थे। MHD 06 Free Solved Assignment

नैष्ठिक हिन्दुओं में शिव तथा नारायण की उपासना लोकप्रिय होने लगी थी। इस युग के सिद्धनाथ साहित्य से तत्कालीन वाममार्गी सम्प्रदायों की विकृति का परिचय मिलता है।

इसी समय इस्लाम धर्म भी तलवार के जोर पर पनपने लगा था, किन्तु आदिकालीन साहित्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ सका। मिश्रित सांस्कृतिक प्रक्रिया- यह काल राजनीतिक अराजकता एवं बाहरी आक्रमणों का युग था।

इस युग में मुख्यतः मुसलमानों (महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी आदि) के आक्रमण हुए। मुसलमानों ने धीरे-धीरे हमारे देश के एक बहुत बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया। मुसलमानों के भारत में रहने से हिन्दू तथा मुस्लिम संस्कृतियों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ा।

प्रारम्भ में मुसलमान भारतीय संस्कृति की ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुए। उन्होंने संगीत, वास्तुकला, ज्योतिष, गणित तथा आयुर्वेद आदि का अध्ययन भी किया। यद्यपि मुसलमानों ने क्रूरता और अत्याचार का ही विशेष अवलम्ब लिया था, तो भी पारस्परिक आदान-प्रदान निरन्तर जारी रहा।

सांस्कृतिक दृष्टि से मुसलमान हिन्दुओं पर | विजय न पा सके, बल्कि वे स्वयं भारतीय रंग में रंग गए। कुछ विद्वान् इस काल को हिन | मुसलमान संस्कृतियों का मिलन काल कहते हैं। हिन्दू-संस्कृति पर भी धीरे-धीरे मुस्लिम
संस्कृति का प्रभाव दृष्टिगत होने लगा था। MHD 06 Free Solved Assignment

भारत में प्रचलित मुख्य मेलों, तीज-त्योहारों, वेश-भूषा, आहार-विहार तथा मनोरंजन आदि पर मुस्लिम संस्कृति का कुछ प्रभाव दिखाई देने लगा था। मुस्लिम राजाओं के प्रभाव से हिन्दू राजदरबारों में भी मुस्लिम कलाएं प्रवेश पाने लगी थीं।

2 कृष्ण भक्ति काव्य के शिल्प विधान पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – कृष्ण भक्ति काव्य का शिल्प-विधान विविध रूपों में है। इस धारा के कवियों की शैली अपने वैविध्यपूर्णता के कारण रोचक और आकर्षक है। समग्र रूप से देखकर यह कहा जा सकता है कि कृष्ण भक्तिकाव्य की शैली उस गीतिकाव्य की सृष्टि है, जो आख्यान अर्थात् शास्त्रीय गायन और लोक गायन पर आधारित है।

वह गीति शैली संगीतात्मकता नामक वैशिष्ट्य से परिपूर्ण और सम्पन्न है। यह गीति शैली शिष्ट, मर्यादित लोकरंजित और भाववर्धक है। गेयता इसका सराहनीय गुण है। इसमें लीला पदों की अधिकता है, जहाँ माधुर्य भाव की प्रधानता की सहायता से भाव-संचार हो सका है।

भाषा-कृष्ण-काव्य की भाषा लोक प्रचलित ब्रज भाषा है। कृष्ण-भक्ति साहित्य में प्रयुक्त होने के कारण यह भाषा तत्कालीन समस्त उत्तर भारत की साहित्यिक भाषा का गौरव पा सकी। इस भाषा का प्रभाव बंगला भाषा पर भी पड़ा। समस्त रीति काल में और भारतेन्दु काल में भी इस भाषा की प्रधानता रही।

इस काव्य की भाषा में संगीतात्मकता तथा कोमलता है। कृष्ण-भक्त कवियों की भाषा अलंकारों, बिम्बों तथा प्रतीकों की दृष्टि से भी समृद्ध है। भाषा में चित्रात्मकता का सौन्दर्य देखते ही बनता है। अलंकारों के प्रयोग से भाषा का सौन्दर्य जगमगा उठा है। छन्दों की दृष्टि से अधिकतर गीति-पदों का प्रयोग हुआ है।

कवित्त, सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, गीतिका, हरिगीतिका आदि छन्द भी इस काव्य – में प्राप्त हो जाते हैं। अन्त में डॉ० चातक के शब्दों में कहा जा सकता है कि कृष्ण भक्ति काव्य आनन्द और उल्लास का काव्य है।

इसमें सर्वत्र ब्रज-र व्याप्त है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवदी के शब्दों में, ‘मनुष्य की रसिकता को उबुद्ध करता है, उसकी अन्तर्निहित अनुराग लालसा को | ऊर्ध्वमुखी करता है और उसे निरन्तर रससिक्त बनाता रहता है।”

कृषि चरागाही संस्कृति कृष्ण भक्ति काव्य को मुख्य रूप से चरागाही संस्कृति का दर्पण | कहा जाए, तो यह कोई अत्युक्ति यो अनुचित बात नहीं होगी। यह इसलिए कि इसमें मुख्य रूप से कृष्ण-राधा, नन्द-यशोदा, गोप-गोपी आदि ब्रजभूमि (प्रदेश) से ही सम्बद्ध हैं। गोकुल-वृन्दावन कृष्ण के लीला क्षेत्र हैं।

हम देखते हैं कि कृष्ण के जीवन से जुड़ी मुख्य लीलाएं कृषि चरागाही संस्कृति का ही बोध कराती हैं। दूध-दही, माखन, गो-चारण, वंश. वादन, गायन-संगीत, उन्मुक्त लीलाएं, रास आदि सब कुछ इसी कृषि चरागाही संस्कृति के प्रतीक-परिचायक हैं। कृष्ण के चले जाने पर गोपिकाएं प्रश्न करती हैं

    मधुबन तुम कत रहत हरे । 
    विरह वियोग स्याम सुन्दर, ठाढ़े क्यों न जरे।। 
    तुम हो निलज लाज नहीं तुमको, फिर-फिर पुहुपधरे। 
    सखा सयार और वन के पखेरू, धिक-धिक सबन करे। 
    कौन काज ठाढ़े रहे बन में, काहे न उकठि परे ।।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कृष्ण भक्ति काव्य का संवेदन-संसार कृषि चरागाही संस्कृति का सरस संसार है। ललित कलाएं- कलाओं का अन्तरावलम्बन रचनाशीलता और रचनाधर्मिता को गतिशील बनाता है। यह मध्यकाल में विशेष रूप कृष्ण-भक्तिकाव्य के संदर्भ में देखा जा सकता है।

महाभारत के बाद भागवत इसके प्रेरणास्रोत कहे जा सकते हैं। इससे कृष्ण भक्तिकाव्य से को सक्रियता और गतिशीलता प्राप्त हुई है। MHD 06 Free Solved Assignment

इसका वैशिष्ट्य यह है कि इसका मुख्य आधार कृष्ण की विभिन्न लीलाएं हैं; जैसे-यमुना तट, वृन्दावन आदि की अनेक रोचक और मर्मस्पर्शी लीलाएं जब हम इसे देखते हैं, तो हम यह पाते हैं कि इसका स्वरूप मुख्यतः लौकिक कला ही है।

ये लीलाएं कलात्मक होने के साथ-साथ वैविध्यपूर्ण भी है। ऋतु परिवर्तन और ऋतु-क्रम पर आधारित होने से और रोचक हो गयी है।

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3. प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।

उत्तर इस काव्य धारा की प्रमुख विशेषताओं या प्रवृत्तियों को इस प्रकार निरूपित किया जा सकता है।

(1) काव्य संबंधी पुरानी अवधारणा में बदलाव-अज्ञेय ने कहा कि युग परिवर्तन के साथ हमारे रागात्मक संबंध बदल गए है। जीवन जग को देखने की दृष्टि के बदलाव ने राग बोध को परिवर्तित कर दिया है।

आज की कविता “मूलतः अपने को अपनी अनुभूति से पृथक करने का प्रयत्न है, अपने ही भावों के निर्वैयक्तीकरण की चेष्टा”। कविता आत्माभिव्यक्ति नहीं है, आत्म से पलायन है। रोमान्टिक भाव-बोध के विरोध से उपजी गैर-रोमान्टिक दृष्टि का समर्थन अज्ञेय ने किया। MHD 06 Free Solved Assignment

जगदीश गुप्त ने कहा कि कविता सहज आंतरिक अनुशानसे मुक्त अनुभूतिजन्य सघन लयात्मक शब्दार्थ है, जिसमें सह-अनुभूति उत्पन्न करने की यथेष्टा क्षमता निहित रहती हैं।

केदारनाथ सिंहने कविता को एक विचार – एक अनुभूति एक दृश्य और इन सबका कलात्मक संगठन मानकर बिंब सिद्धांत का संकेत दिया।

(2) लघु मानव दर्शन में नए व्यक्तित्व की खोज- अहंग्रस्त आत्मलीन समाज विमुख, कुंठाग्रस्त, वर्जना-पीड़ित मानव है? या इस व्यक्ति की कोई और ही किस्म है? महाकाल का उदात्त नायक – आदर्श नायक कहाँ गायब हो गया है? लक्ष्मीकांत वर्मा ने “नए प्रतिमान पुराने निकष” पुस्तक में प्रथम बार लघु मानव को ” सहज मानव” कहकर चर्चा के केन्द्र में रख दिया।

फिर साही जी ने “लघु मानव के बहाने हिन्दी कविता पर एक बहस” शीर्षक निबंध में लघु मानव को ‘सहज मानव” या “महत् के स्थान पर लघु स्थापना” का नयी कविता में समर्थन किया।

जगदीश गुप्त ने कहा कि “पहले अपने को “लघु कहना, फिर लघुता की महानता प्रदर्शित करना, प्रकारांतर से अपने को महान कहना है। MHD 06 Free Solved Assignment

कहना न होगा कि इस लघु मानव को अमरीकी पूँजीवादी भोगासक्त, व्यक्तिवादी मानव का पर्याय मानकर ग.मा. मुक्तिबोध को कहना पड़ा, “आधुनिक भावबोध वाले सिद्धांत में जन साधारण के उत्पीड़न अनुभवों, उग्र विक्षोभों और मूल उद्वेगों का – बायकाट किया गया।

(3) अनुभूति की ईमानदारी और प्रामाणिकता – अनुभूति की ईमानदारी का दावा नयी कविता से पहले के कवि भी कम नहीं करते हैं, फिर नयी कविता में “ईमानदारी का क्या अर्थ?

छायावाद और प्रगतिवाद के कवियों की ईमानदारी पर प्रयोगवाद और नयी कविता ने संदेह व्यक्त किया और कहा कि छायावादी कवि में ” करुणा” और प्रगतिवादी कवि का -वेदना” का नारा झूठा था – कोरी “बौद्धिक सहानुभूति” मात्र छलना है।

रघुवीर सहाय ने कहा कि काव्य-सृजन का ” ईमानदारी एक मौलिक गुण है और उस बौद्धिक स्तर का पर्याय हैं

(4) रस के प्रतिमान की अप्रासंगिकता लगभग सभी नये कवियों ने तनाव घिराव, आक्रोशयंत्रणा, की कविताएँ रची हैं। इन कविताओं का मूल्यांकन रस के प्रतिमान से नहीं किया जा सकता। क्या कोई “अंधायुग” या “चाँद का मुँह टेढ़ा है” का मूल्यांव रस प्रतिमान से कर सकता है?

यदि करता है तो क्या यह अनौचित्य नहीं होगा? नयी कविता हृदय की मुक्तावस्था नहीं है, बुद्धि की मुक्तावस्था का पर्याय हैं। MHD 06 Free Solved Assignment

नयी कविता का विषय है क्षण की अनुभूति जबकि रस का आधार है (जन्मांतर्गत) वासना और स्थायी भाव।” जाहिर है कि नयी कविता रसाश्रयी कविता नहीं है।

(5) स्वाधीनता प्राप्ति के बाद का मोह भंग नेहरू युग ने जनता की आशाओं-आकांक्षाओं को जलाकर राख कर दिया। अमीर और गरीब के बीच खाई और चौड़ी हो गई तथा विदेशी पराधीनता का संकट गहराने लगा।

पूरा देश एक ऐसी उथल-पुथल के दौर से गुजरा कि जागरूक और संवेदनशील रचनाकार ‘मोह भंग” की पीड़ा से कराहने लगा।

विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी-पूँजीवाद के शीतयुद्ध की छाया, असीम प्राविधिक विकास और स्थापित व्यवस्था के बढ़ते हुए विराट, संवेदनशील, अमानवीय तंत्रों की स्वार्थपरता के कारण सर्वग्रासी मानव विनाश का खतरा, हर स्तर पर झूठ, फरेब, आडम्बर पाखण्ड और भ्रष्टाचार से भारतीय लोकतंत्र चरमराने लगा।

(6) प्रयोग परम्परा और आधुनिकता – इन कवियों ने अपनी “परम्परा” के गतिशील तवं को पहचान कर रचना में ढाला तथा “रूढ़ि” के बासीपन का निषेध किया। इनके लिए “परम्परा” का अर्थ – यदि ऐतिहासिक चेतना रहा है तो दूसरा अर्थ “निरंतरता” भी है अर्थात् रचना में प्राचीन नमक’ का नया स्वाद ।

“परम्परा” और “आधुनिकता” पर इन सभी कवियों ने करारी बहसें कीं। मूल विचार यह है कि परम्परा से ही आधुनिकता फूटती है, वह आकाशसे नहीं टपकती। MHD 06 Free Solved Assignment

आधुनिकता नए संदर्भो में देखने की दृष्टि है, रूढ़ियों की अस्वीकृति है, मध्ययुगीन पिछड़ी जीवन-दृष्टियों का विरोध है एक तरह की सामयिक नवीनता है।

(7) प्रकृति सौंदर्य पर नई दृष्टि छायावादी कवि प्रकृति में एक विराट सत्ता का संकेत पाता था और मानसिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति में भी प्रकृति का पूरा उपयोग था।

प्रकृति उसके भावों का आलम्ब थी। हृदय की स्वच्छंदता समाज के सभी बंधनों तोड़कर “तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल” के गीत गाती थी।

प्रयोगवाद तथा नयी कविता के काल में कवि पर जीवन जगत की स्थिति परिस्थिति के तनाव संघर्ष, औद्योगिक समाज के आर की टूटन, नेहरू युग की निराशा से – उत्पन्न मोह भंग उसकी चेतना को डसता था। इसी को कम करने के लिए वह प्रकृति के पास जाता है।

(8) काव्यरूप पुराने प्रबंध काव्य के “अखण्ड कथात्मकता और अखण्ड रसात्मकता वाले रूढ़ ढाँचे – को तोड़कर एक नवीन प्रबंध चेतना को विकसित किया। धर्मवीर भारती के “अंधायुग” और कुँवर नारायण की “आत्मजयी” को पुराने ढंग का प्रबंध काव्य नहीं कहा.. जा सकता है।

कथा का उपयोग विचार-विशेष के केन्द्र को आलोकित करने के लिए किया गया है और प्रभाव की दृष्टि से कृति “रस-चेतना” से कोसों दूर हैं। इसी तरह प्रयोग सिद्धि का आलम यह है कि इस दौर में प्रबंध का स्थानापन्न “नयी लम्बी कविताओं” को बनाया गया। MHD 06 Free Solved Assignment

4 स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों पर निबंध लिखिए।

उत्तर – स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास- स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास हमें पाँच प्रकार के मिलते हैं ।

. ऐतिहासिक उपन्यास ।

मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास ।

. रोमानी प्रवृत्ति वाले उपन्यास ।

. प्रगतिवादी उपन्यास ।

. अतियथार्थवादी या यौन सम्बन्धी उपन्यास ।

इस युग के उपन्यासों में आंचलिकता को विशेष महत्त्व दिया गया। किसी अंचल या जनपद की संस्कृत का चित्रण करने वो अनेक उपन्यासों की रचना इसी युग में हुई है।

आंचलिक उपन्यासकारों में प्रमुख हैं – फणीश्वरनाथरेणु, रांगेयराघव, नागार्जुन, देवेन्द्र सत्यार्थी, शैलेश मटियानी, शिवप्रसाद रुद्र, रामदरश मिश्र आदि। ऐतिहासिक उपन्यासकारां में वृन्दावनलाल वर्मा, चतुरसेन शास्त्री, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, डॉ० राँगेयराघव, डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार आदि प्रमुख हैं।

साम्यवादी विचारधारा को लेकर यलने वाले उपन्यासकारों में डॉ० रांगेयराघव, उपेन्द्रनाथ अश्क, नागार्जुन, अमृतलाल नागर आदि हैं। इसी प्रकार अन्य विविध प्रकार के उपन्यास इस युग में लिखे जा रहे हैं।

रोमानी और यौन प्रवृत्तियों से सम्बन्धित उपन्यासों की तो बाढ़ सी आ गई है । इस प्रकार हम देखते हैं आधुनिक युग में हिन्दी उपन्यासों के विविध रूपों का विकास हो रहा है। वर्तमान युग में हिन्दी उपन्यास ने नवीन विषय और रचना-शिल्प को अपनाया है। विश्व की अनेक भाषाओं में प्रमुख उपन्यासों का भी हिन्दी में अनुवाद हआ है।

इसी प्रकार भारतीय भाषाओं के अनेक उपन्यासों का भी हिन्दी में अनुवाद किया गया है। स्वातंत्र्योत्तर उपन्यासों में यशपाल के ‘झूठा सच’ का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसमें भारत पाक विभाजन के समय को बहुत प्रामाणिकता और मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। MHD 06 Free Solved Assignment

स्वातंत्र्योत्तर समय की राजनीतिक गलाजत और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का भगवतीचरण वर्मा के ‘सबहिं नचावत राम । गुसाईं’ में बहत गहराई से चित्रित किया गया है।

इसी श्रृंखला में अमृतलाल नागर के ‘करवट’ उपन्यास को भी महत्त्वपूर्ण उपन्यासों की कोटि में रखा जा सकता है। मन्नू भण्डारी के ‘महाभोज’ उपन्यास में भी राजनीति के छल छंद को उजागर किया गया है।

स्वातंत्र्योत्तर व्यक्ति चिंता के उपन्यासों में अज्ञेय के ‘शेखर एक जीवनी’ (दो भाग) तथा ‘नदी के द्वीप’ उपन्यासों का विशेष महत्त्व है, जिनमें प्रेम जैसे तरल विषय को बहुत सूक्ष्मता से विश्लेषित किया गया है।

उपेद्रनाथ ‘अश्क’ के ‘गिरती दीवारें, शहर में घूमता आईना’, ‘गर्म राख’ भी लोकप्रिय उपन्यास रहे हैं।

5 आदिकाल से आधुनिक काल तक के हिंदी के विकास क्रम का परिचय दीजिए।

उत्तर – हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे भारत में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। MHD 06 Free Solved Assignment

भारतेंदु पूर्व युग – हिन्दी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास हुआ। इस विकास में कलकत्ता के कोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस कॉलेज के दो विद्वानों लल्लूलाल जी तथा सदल मिश्र ने गिलक्राइस्ट के निर्देशन में क्रमश: प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक पुस्तकें तैयार की इसी समय सदासुखलाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशा अल्ला खाँ ने ‘रानी केतकी की कहानी’ की रचना की इन सभी ग्रंथों की भाषा में उस समय प्रयोग में आने वाली खड़ी बोली को स्थान मिला। ये सभी कृतियाँ सन् 1803 में रची गयी थी।

आधुनिक खड़ी बोली के गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की परिचयात्मक पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमें ईसाई धर्म का भी योगदान रहा।

बंगाल के राजा राम मोहन राय ने 1815 ई. में वेदांत सूत्र का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवाया। इसके बाद उन्होंने 1829 में बंगदूत नामक पत्र हिन्दी में निकाला। MHD 06 Free Solved Assignment

इसके पहले ही 1826 में कानपुर के पं जुगल किशोरी ने हिन्दी का पहला समाचार पत्र उदंतमार्तड कलकत्ता से निकाला। इसी समय गुजराती भाषी आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिन्दी में लिखा । भारतेंदु युग

भारतेंदु हरिशचंद्र (1850-1885) हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग का प्रतिनिधि माना जाता है। उन्होंने कविवचन सुधा, हरिशचन् मैगजीन और हरिशचन्द्र पत्रिका निकाली।

साथ ही अनेक नाटकों की रचना की चन्द्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, ये नाटक रंगमंच भी बहुत लोकप्रिय हुए। इस काल में निबन्ध नाटक उपन्यास तथा कहानियों की रचना हुई।

इस काल के लेखकों में बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा चरण गोस्वामी, उपाध्याय बदरीनाथ चौधरी प्रेमघन, लाला श्रीनिवास दास, बाबू देवकी नंदन खत्री और किशोरी लाल गोस्वामी आदि उल्लेखनीय हैं।

इनमें से अधिकांश लेखक होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। श्री निवासदास के उपन्यास परीक्षागुरु को हिन्दी का पहला उपन्यास कहा जाता है। MHD 06 Free Solved Assignment

कुछ विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी के उपन्यास भाग्यवती को हिन्दी का पहला उपन्यास मानते हैं। बाबू देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता तथा चंद्रकांता संतति आदि इस युग के प्रमुख उपन्यास हैं।

ये उपन्यास इतने लोकप्रिय हुए कि इनको पढ़ने के लिये बहुत से अहिन्दी भाषियों ने हिन्दी सीखी…. युग की कहानियों में शिवप्रसाद सितारे हिन्द की राजा भोज का सपना महत्वपूर्ण हैं।

द्विवेदी युग- सन् 1903 ई. में द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के संपादन का भार संभाला, उन्होंने खड़ी बोली गद्य के स्वरूप को स्थिर किया और पत्रिका के माध्यम से रचनाकारों के एक बड़े समुदाय को खड़ी बोली में लिखने को प्रेरित किया। इस काल में निबन्ध, उपन्यास, कहानी, नाटक एवं समालोचना का अच्छी विकास हुआ।।

6 निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए :

क) स्वच्छंदतावादी आलोचना

उत्तर. स्वच्छंदतावादी आलोचना का विकास हिन्दी की छायावादी काव्यधारा के मूल्यांकन के साथ हुआ। पुराने आचार्यों ने छायावादी काव्य की नवीन चेतना को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा और न उसका ठीक से मूल्यांकन किया।MHD 06 Free Solved Assignment

छायावादी कवियों ने अपने काव्य के समुचित मूल्यांकन के लिए जहाँ अपने काव्य सिद्धांतों और मान्यताओं को स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया, वहीं नए आलोचकों को प्रेरित एवं प्रभावित करके छायावादी या स्वच्छंदतावादी काव्यालोचना का मार्ग प्रशस्त किया।

वाजपेयी जी के साथ ही डॉ. नरेंद्र ने छायावादी काव्य का जो मूल्यांकन प्रस्तुत किया, वह भी हिन्दी की स्वच्छंदतावादी आलोचना को परिपुष्ट करने वाला है।

‘आधुनिक हिन्दी कविता की प्रवृत्तियाँ और ‘सुमित्रानंदन पंत’ जैसे ग्रंथों से उन्हें छायावादी आलोचक के रूप में ख्याति मिली।

उन्होंने काव्य में आत्माभिव्यक्ति कामहत्वपूर्ण माना और छायावाद को ‘स्थूल के विरुद्ध का विद्रोह’ कहा। उन्होंने यह स्थापित किया कि भक्ति आंदोलन के बाद हिन्दी साहित्य में छायावाद एक बड़ा काव्यान्दोलन था ।

ख) वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य से तात्पर्य उस विपुल साहित्य से है । जिसमें वेद, ब्राह्मण, अरण्यक एवं उपनिषद् शामिल हैं। वर्तमान समय में वैदिक साहित्य ही हिन्दू धर्म के प्राचीनतम स्वरूप पर प्रकाश डालने वाला तथा विश्व का प्राचीनतम् स्रोत है। MHD 06 Free Solved Assignment

वैदिक साहित्य को ‘श्रुति’ कहा जाता है, क्योंकि (सृष्टि/नियम)कर्ता ब्रह्मा ने विराटपुरुष भगवान् की वेदध्वनि को सुनकर ही प्राप्त किया है।

अन्य ऋषियों ने भी इस साहित्य को श्रवण-परम्परा से ही ग्रहण किया था तथा आगे की पीढ़ियों में भी ये श्रवण परम्परा द्वारा ही स्थान्तरित किये गए।

इस परम्परा को श्रुति परम्परा भी कहा जाता है तथा श्रुति परम्परा पर आधारित होने के कारण ही इसे श्रुति साहित्य भी कहा जाता है।

वैदिक साहित्य के अन्तर्गत ऊपर लिखे सभी वेदों के कई उपनिषद, आरण्यक इनकी भाषा संस्कृत है जिसे अपनी अलग पहचान के अनुसार वैदिक संस्कृत कहा जाता है -… इन संस्कृत शब्दों के प्रयोग और अर्थ कालान्तर में बदल गए या लुप्त हो गए माने जाते हैं।MHD 06 Free Solved Assignment

ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्दू-आर्य जाति के बारे में इनको एक अच्छा सन्दर्भ माना जाता है। संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्त्व बना हुआ है।

रचना के अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि के चार भाग हैं। वेद के मुख्य मन्त्र भाग को संहिता कहते हैं। संहिता के अलावा हरेक में टीका अथवा भाष्य के तीन स्तर होते हैं। कुल मिलाकर ये हैं

• संहिता (मन्त्र भाग)

• ब्राह्मण-ग्रन्थ (गद्य में कर्मकाण्ड की विवेचना) .

• आरण्यक (कर्मकाण्ड के पीछे के उद्देश्य की विवेचना) .

• उपनिषद (परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन)MHD 06 Free Solved Assignment

जब हम चार ‘वेदों की बात करते हैं तो उससे संहिता भाग का ही अर्थ लिया जाता है। उपनिषद (ऋषियों की विवेचना), ब्राह्मण (अर्थ) आदि मंत्र भाग (संहिता) के सहायक ग्रंथ समझे जाते हैं। वेद ४ हैं – ऋक्, साम, यजुः और अथर्व। पूर्ण रूप में ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।

(ग) हिंदी पत्रकारिता का विकास

उत्तर हिंदी पत्रकारिता में सर्वप्रथम प्रकाशित हिंदी समाचार पत्र के रूप में उदंत मार्तंड का नाम सर्वमान्य है। परंतु वेद प्रताप वैदिक द्वारा संपादित हिंदी पत्रकारिता विविध आहम नामक पुस्तक में प्रकाशित जानकारी में डॉक्टर महादेव साहा में दिग्दर्शन को हिंदी का प्रथम पत्र घोषित किया है।

उनकी यही मान्यता 1959 और 1960 के राष्ट्रीय भारती और सरस्वती के अगस्त एवं जनवरी के अंकों में प्रकाशित हुई है।

इस जानकारी के अनुसार अप्रैल 1818 से मार्च 1819 में श्रीरामपुर बंगाल मिशनरियों ने दिग्दर्शन नाम का एक मासिक समाचार पत्र निकाला जिसके संपादक जॉन क्लर्क मार्सकमेन इस दौरान इस पत्रिका के हिंदी में कुल 16 अंक निकले बाद में इसे अंग्रेजी और बंगला में भी प्रकाशित किया गया इस तरह दिग्दर्शन बंगला तथा हिंदी दोनों ही भाषाओं का पहला समाचार पत्र माना जा सकता है।MHD 06 Free Solved Assignment

एक अन्य विद्वान जोगेंद्र सक्सेना के अनुसार 1818 से 1820 तक दरबार रोजनामचा दैनिक नामक एक अखबार निकला करता था। अखबार राजस्थान के बूंदी से निकलता था।

इस अखबार की हिंदी प्रति उपलब्ध नहीं है। इसीलिए हिंदी के पहले अखबार होने का श्रेय दिग्दर्शन या दरबार रोजनमचा को नहीं जाता है स्पष्ट प्रमाण के अभाव में घोषित रूप से हिंदी का पहला समाचार पत्र उदांत मार्तंड को माना गया उदंत मार्तंड को हिंदी को पहला अखबार घोषित करने का श्रेय मॉडन के संपादक बजेंद्र मोहन बंदोपाध्याय को जाता है।

1931 के पहले तक बनारस अखबार जो गोविंद रघुनाथ के संपादक में 1843 में हुआ था को हिंदी का पहला अखबार माना जाता था। हिंदी पत्रकारिता के उद्गम एवं विकास को पांच निम्नलिखित भागों में बांट कर देख सकते हैं

  1. पूर्व भारतेंदु युग (1826 से 18 66)
  2. भारतेंदु युग (1866 से 1885)
  3. उत्तर भारतेंदु युग (1888-1902)
  4. द्विवेदी युग (1903-1920)
  5. वर्तमान युग (1921 से अब तक) MHD 06 Free Solved Assignment

यद्यपि उपयुक्त काल खंडों में बहुत बड़ी दैनिक अर्द सप्ताहिक पाक्षिक मासिक त्रैमासिक और अर्धवार्षिक पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हुई परंतु उनमें से अधिकांश ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल पायी।

हिंदी प्रदीप भारत मिश्र हिंदुस्तान आज स्वदेश जागरण आर्यभट्ट नवभारत और हिंदू पंच जैसे कुछ समाचार पत्र आज भी अस्तित्व में है।

घ) रामकाव्य परंपरा

उत्तर. राम काव्य परंपरा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं :

राम का स्वरूप : राम-काव्य परंपरा के कवियों के राम महर्षि वाल्मीकि के राम से सर्वथा भिन्न हैं | इन कवियों ने राम को ईश्वर का अवतार स्वीकार किया है। उनका राम शिव, शक्ति व सौंदर्य का समन्वित रूप है।

उनके अनुसार श्री राम दया के सागर, पतित-पावन, महान दानशील व विनयशील हैं | भक्ति भावना से उन्हें सहज ही प्राप्त किया जा सकता है । देवी-देवता भी उनके चरणों की वंदना करते हैं।

पृथ्वी को दुष्टों से रहित करने व संत जनों का उद्धार करने के लिए ही उन्होंने धरा पर अवतार लिया है। राम-कवि उन्हें लोकरक्षक व मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हैं। MHD 06 Free Solved Assignment

क्ति भावना : राम काव्य परंपरा की सबसे प्रमुख विशेषता इन की भक्ति भावना है। इन कवियों की रचनाओं में नवधा भक्ति के उदाहरण मिलते हैं परंतु मुख्यत: इनकी रचनाओं में दास्य भक्ति का परिपाक हुआ है ।

दास्य भक्ति की प्रधानता होने पर भी अन्य प्रकार की भक्ति इनके काव्य में मिलती है । जैसे सीता में माधुर्य भाव की भक्ति है, सुग्रीव में सख्य भाव की भक्ति है, दशरथ, कौशल्या आदि में वात्सल्य भाव की भक्ति देखी जा सकती है।

मन्वय भावना : संपूर्ण राम काव्य अपनी समन्वय भावना के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए इस काव्य को मानवतावादी काव्य भी कहा गया है। विशेषत: तुलसीदास जी के .. काव्य में समन्वय की विराट चेष्टा देखी जा सकती है।

राम काव्य में समन्वय की भावना अनेक रूपों में दिखाई देती है ; यथा – निर्गुण और सगुण का समन्वय, ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय, ब्राह्मण और शूद्र का समन्वय, शास्त्रों व व्यवहार का समन्वय, परिवार व समाज का समन्वय, विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का समन्वय, भोग व त्याग का समन्वय आदि।

भले ही राम कवि श्री राम को अपना आराध्य देव स्वीकार करते हैं परंतु यह कवि अन्य देवी-देवताओं की आराधना भी करते हैं।

स्वयं राम ने सेतुबंध के अवसर पर शिव की उपासना कीतुलसीदास जी ने ‘कृष्ण गीतावली’ की रचना भी की है और ‘रामचरितमानस’ की भी उन्होंने राम भक्ति को कृष्ण भक्ति के साथ जोड़ा। जब वे श्रीराम के सर्व व्यापक रूप का वर्णन करते हैं तो उनका सगुण राम निर्गुण ब्रह्म बन जाता है।

चरित्र चित्रण : राम काव्य परंपरा के कवियों ने रामकथा से जुड़े पात्रों का चरित्र चित्रण किया है। उन्होंने मुख्य रुप से श्री राम के चरित्र का चित्रण किया है। उनके राम ईश्वर के अवतार हैं । वह सर्वगुण संपन्न व सर्वशक्तिमान हैं | वह शिव, शक्ति व सौंदर्य का समन्वित रूप हैं ।

वह दया के सागर, पतित-पावन, दान शील व महान विनयशील हैं। देवी-देवता भी उनके चरणों की वंदना करते हैं। पृथ्वी को दुष्टों से रहित करने व संत जनों का उद्धार करने के लिए ही उन्होंने अवतार लिया है

राम कवि उन्हें लोकरक्षक व मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हैं। राम के अतिरिक्त लक्ष्मण, भरत, सीता, हनुमान आदि अन्य पात्रों के चरित्रों पर भी समुचित प्रकाश डाला गया है।

इन सभी पात्रों के माध्यम से राम कवियों ने समाज के सामने कुछ आदर्श प्रस्तुत किए हैं जैसे राम अकेले ही आदर्श भाई, आदर्श पुत्र व आदर्श राजा का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

परंतु उनकी छवि एक आदर्श पति के रूप में लाख तर्क देने पर भी एक तर्कशील व्यक्ति के मन में नहीं उभर पाती | उनका व्यक्तित्व नारी समानता और पति-पत्नी के पारस्परिक विश्वास के सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता।

भरत आदर्श भाई का, सीता आदर्श नारी व आदर्श पत्नी का, हनुमान आदर्श सेवक का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि राम काव्य पढ़कर पाठक एक आदर्श नागरिक बनने का संकल्प लेते हैं।

लोकमंगल की भावना : संपूर्ण राम काव्य लोकमंगल की भावना पर टिका है। संपूर्ण राम कथा लोक कल्याण की भावना से प्रेरित है। राम कवि समाज को मर्यादित, अनुशासित व व्यवस्थित देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम रूप में चित्रित किया। MHD 06 Free Solved Assignment

उन्हें आदर्श व्यक्ति व आदर्श राजा के रूप में दिखाया | अन्य पात्र भी लोकमंगल की भावना लिए हुए हैं और जो पात्र लोक-अमंगल चाहते हैं, उनका राम कथा में नाश किया गया है।

यही कारण है कि आज भी भक्तजन जब दुखों से छुटकारा पाना चाहते हैं व अपना कल्याण चाहते हैं तो वे राम कथा का पाठ करवाते हैं। यह भी एक सच्चाई है कि बिना आदर्श व नैतिक गुणों के लोक कल्याण संभव नहीं।

ङ) सूफी रहस्यवाद

ज्ञान के क्षेत्र का अद्वैतवाद, भावना के क्षेत्र में आकर रहस्यवाद कहलाता है। रहस्यवाद अपनी प्रकृति से दो प्रकार का होता है-
(1) साधनात्मक रहस्यवाद
(2) भावनात्मक रहस्यवाद

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार “हमारे यहाँ का योगमार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कराने की आशा देता है।

तत्र और रसायन भी साधनात्मक रहस्यवाद हैं, पर निम्न कोटि के। भावनात्मक रहस्यवाद की भी कई श्रेणियाँ है, जैसे भूत प्रेम की सत्ता मानकर चलने वाली भावना स्थूल रहस्यवाद के अंतर्गत होगी।

अद्वैतवाद या ब्रह्मवाद को लेकर चलने वाली भावना से सूक्ष्म और उच्च कोटि के रहस्यवाद की प्रतिष्ठा होती है।”

भारतीय भक्ति का सामान्य स्वरूप रहस्यमय नहीं। यही कारण है कि यहाँ भक्ति के क्षेत्र में रहस्यधर्मी माधुर्य भाव का अधिक प्रचार नहीं हुआ। MHD 06 Free Solved Assignment

पर सूफियों के यहाँ रहस्यात्मक माधुर्य भाव व्यापक स्तर पर दिखाई पड़ता है। इन्हीं के प्रभाव से सगुण भक्तिधारा की कृष्णाश्रयी शाखा में इस भाव को स्वीकृति मिली।

सूफियों के इस रहस्यात्मक भक्ति मार्ग की कतिपय रूढ़ियाँ रही है, सूफी प्रेमास्थानक परंपरा में इन रूड़ियों का विस्तार दिखाई पड़ता है

हाल की दशा में आकर मूर्छित होना, मद, प्याला, उन्माद तथा प्रियतम ईश्वर के विरह की दूरारूढ़ व्यंजना भी सूफियों की बंधी हुई परंपरा है। सूफियों के इस रहस्यवाद ने निर्गुण संतो को भी व्यापक स्तर पर प्रभावित किया।

जिस प्रकार सूफियों के प्रभाव से भारतीय भक्ति साहित्य के रचनाकार प्रभावित हुए थे, उसी प्रकार सूफी भी यहाँ के साधनात्मक रहस्यवाद से प्रभावित हुए। MHD 06 Free Solved Assignment

आचार्य शुक्ल ने इस प्रभाव को रेखांकित करते हुए लिखा भी है कि “जिस समय सूफी यहाँ आए उस समय उन्हें रहस्य की प्रवृत्ति हठयोगियों, रसायनियों और तांत्रिकों में ही दिखाई पड़ी।

हठयोग की तो अधिकांश बातों का समावेश उन्होंने अपने साधना पद्धति में कर लिया।” इस प्रकार रहस्यवाद सूफियों के यहाँ अपने संपूर्ण रूप में दिखाई देता है।

इस क्षेत्र में सूफी कवियों के प्रदेश को विशेषत: जायसी के प्रदेश को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने स्वीकार किया है “हिंदी कवियों में यदि कहीं रमणीय और सुंदर अद्वैती रहस्यवाद है तो जायसी में, जिनकी भावुकता बहुत ही ऊँची कोटि की है। MHD 06 Free Solved Assignment

वे सूफियों की भक्ति भावना के अनुसार कहीं तो परमात्मा को प्रियतम के रूप में देखकर जगत् के नाना रूपों में उस प्रियतम के रूप माधुर्य की छाया देखते हैं और कहीं सारे प्राकृतिक रूपों और व्यापारों का पुरुषों के समागम के हेतु प्रकृति के श्रृंगार, उत्कंठा या विरह विकलता के रूप में अनुभव करते हैं।”

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