IGNOU MHD 05 Free Solved Assignment 2022- Helpfirst

MHD 05

MHD 05 Free Solved Assignment

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MHD 05 Free Solved Assignment jan 2022

1. संस्कृत आचार्यों द्वारा दिए गए काव्य लक्षणों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर – काव्य लक्षण से तात्पर्य है कविता की विशिष्टताएँ, उसका स्वरूप विवेचन, उसकी परिभाषा। काव्य लक्षण में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए

1) वह सारगर्भित, संक्षिप्त, सूत्रबद्ध तथा अर्थवान होना चाहिए।

2) उसमें कोई पारिभाषिक शब्द नहीं होना चाहिए, जिसे समझने में कठिनाई हो।

3) उसमें अतिव्याप्ति दोष नहीं होना चाहिए, अर्थात् विषय का अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए।

4) लक्षण तार्किक, स्पष्ट और सहज बोधगभ्य होना चाहिए। संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य-लक्षण

5) उसमें अव्याप्ति दोष भी नहीं होना चाहिए अर्थात उसमें काव्य की सभी विशेषताएँ बतानी चाहिए, कोई विशेषता छूटनी नहीं चाहिए।

प्रस्तुत करने की परम्परा प्रारंभ से ही मिलती है।

सर्वप्रथम भारत के आदि आचार्य भरत मुनि ने नाटक पर आधारित काव्य-लक्षण प्रस्तुत किये-मृदु ललित पदावली, गूढ शब्दार्थहीनता, सर्वसुगमता, युक्तिमत्ता, रस प्रवाहित करने की क्षमता।

भामह : इनके अनुसार शब्द और अर्थ का सहित भाव काव्य कहलाता है शब्दार्थों सहितौ काव्यम्। इनका यह लक्षण केवल काव्य पर घटित नहीं होता, प्रत्येक प्रकार के सार्थक कथन पर लोकवार्ता और शास्त्र-कथन पर भी घटित होता है। MHD 05 Free Solved Assignment

दण्डी : इनके अनुसार, इष्ट अर्थ से परिपूर्ण पदावली काव्य का शरीर है। शरीर सावद् इष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली। ‘इष्ट अर्थ’ से उनका तात्पर्य अलंकारजन्य आजाद माना जा सकता है।

दण्डी का उक्त कथन ‘काव्य शरीर’ का स्वरूप प्रस्तुत करता है, न कि काव्य का इसमें एक दोष तो यह है कि काव्य का शरीर पदावली नहीं है, अपितु शब्द (वाचक) और अर्थ (वाच्य) दोनों का समन्वित रूप है।

वामन : काव्य उस शब्दार्थ को कहते हैं, जो दोषरहित हो तथा जिसमें गुण नित्य रूप से और अलंकार अनित्य रूप से विद्यमान हों, और इसकी आत्मा है रीति।

आनन्दवर्धान : काव्य उस शब्दार्थ रूप शरीर को कहते हैं, जिसकी आत्मा ध्वनि (व्यंग्यार्थ) है। यद्यपि यह लक्षण काव्य के आन्तरिक तत्त्व ध्वनि की ओर सर्वप्रथम संकेत करता है, किन्तु स्वयं ‘ध्वनि’ शब्द अत्यन्त व्याख्यापेक्ष है।

2. काव्य हेतु को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – काव्य हेतु से तात्पर्य है वह तत्त्व या उपादान जो काव्य रचना का कारण है। काव्य-रचना की सामर्थ्य प्रत्येक व्यक्ति में नहीं होती, केवल उसी व्यक्ति में होती है, जो विशिष्ट प्रकार की प्रतिभा से सम्पन्न होता है।

यही प्रतिभा काव्य का हेतु है। भारतीय काव्यशास्त्रियों ने इनके अतिरिक्त अन्य हेतुओं का भी उल्लेख किया है।

दण्डी : (1) नैसर्गिकी प्रतिभा, (2) निर्मल शास्त्रज्ञान और (3) अमन्द अभियोग (अभ्यास)।

रुद्रट और कुन्तक : (1) शक्ति, (2) व्युत्पति और (3) अभ्यास।

वामन :

(1) लोक (लोकव्यवहार ज्ञान)

(2) विद्या (विभिन्न शास्ञान) और MHD 05 Free Solved Assignment

(3) प्रकीर्ण प्रकीर्ण के अन्तर्गत

(क) लक्ष्यज्ञता अर्थात् काव्यों का अनुशीलन,
(ख) अभियोग अर्थात् अभ्यास,

(ग) वृद्धसेवा अर्थात् गुरु द्वारा शिक्षा प्राप्ति,
(घ) अवेक्षण अर्थात् उपयुक्त शब्दों का चयन तथा अनुपयुक्त शब्दों का अपसारण,

(ड.) प्रतिभा और
(च) अवधान अर्थात् चित्त की एकाग्रता

इन आचार्यों के उपरान्त सारग्राही मम्मट ने उक्त सभी काव्य हेतुओं को निम्नोक्त तीन काव्य हेतुओं में अन्तर्भूत कर दिया :

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षात्।

काव्यज्ञशिक्षयाऽभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे।।

अर्थात् –

  1. शक्ति अर्थात् प्रतिभा
  2. लोक, काव्यशास्त्र, काव्य आदि के अवेक्षण (निरीक्षण तथा अध्ययन) द्वारा प्राप्त निपुणता तथा
  3. काव्य के मर्मज्ञ व्यक्तियों से प्राप्त शिक्षा के द्वारा अभ्यास

इन तीनों का समन्वित रूप काव्य रचना का हेतु है। इन तीन काव्य हेतुओं में प्रतिभा को सर्वोत्कृष्ट एवं अनिवार्य हेतु माना है।

प्रतिभा से तात्पर्य है काव्य-सृजन की शक्ति। इसीलिए प्रतिभा को शक्ति भी कहा गया है। इसके अभाव में उत्तम काव्य की रचना की ही नहीं जा सकती। वह काव्य-सृजन की मूल एवं बीजरूपा आद्याशक्ति है।

प्रतिभा के दो भेद माने गये हैं :

1) कारयित्री प्रतिभा जो कवि में होती है और जिसके द्वारा काव्य-सृजन होता है।

2) भावयित्री प्रतिभा जो सहदय पाठक में होती है और जिसके द्वारा वह काव्यार्थ को ग्रहण करता है, उसके मर्म को समझता है, उसका मूल्यांकन करता है।

3अलंकार सिद्धांत पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

उत्तर – ‘अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति प्रायः दो प्रकार से की जाती है-करुणपरक और भावपरक।

करुणपरक : करुण अथवा उपकरण कहते हैं साधान (इन्स्टूमेंट) को- जिसके द्वारा कोई कार्य किया जाता है।

(क) ‘अलक्रियते नेन इति अलंकार’ : अर्थात् जिसके द्वारा अलंकृत किया जाता है, शोभा दी जाती है, अथवा

(ख) ‘अलंकरोति इति अलंकारः’ अर्थात् जो अलंकृत करता है, शोभित करता है। इस प्रकार की व्युत्पत्ति करणपरक मानी जाती है। MHD 05 Free Solved Assignment

भावपरक : यहाँ ‘भाव’ शब्द से तात्पर्य है-सिद्धि। ‘अलंकृतिः अलंकारः’ अर्थात् अलंकरण (शोभा, सौंदर्य, सजावट) को अलंकार कहते हैं। इस प्रकार की व्युत्पत्ति को भावपरक माना जाता है।

अलंकारवादी आचर्य और इनका अलंकार-सिद्धांत : भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ में हमें केवल चार अलंकारों के नाम मिलते हैं उपमा, रूपक, दीपक और यमक। भरत के बाद इस दृष्टि से भामह (छठी शती) का नाम उल्लेखनीय है। इन्हें (अलंकार-सिद्धांत) का प्रवर्तक माना जाता है।

इनके प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम है -‘काव्यालंकार’। भामह ने 37 अलंकारों का निरूपण किया तथा अलंकार को काव्य का अनिवार्य तत्त्व घोषित किया।

भामह का अनुकरण दण्डी ने किया और भामह और दण्डी का उद्भट ने इन तीनों अलंकारवादी आचार्यों की मान्यताओं से स्पष्ट है कि वे अलंकार को काव्य का सर्वस्व एवं अनिवार्य तत्त्व स्वीकार करते थे।

निष्कर्षत :- अलंकारवादियों के मत में –

(1) ‘अलंकार’ व्यापक अर्थ का द्योतक है, संकुचित अर्थ का नहीं। अर्थात् ‘अलंकार’ काव्य-सौंदर्य या काव्य-चमत्कार के उत्पादक सभी प्रकार के साधानों का वाचक है, केवल अनुप्रास, उपमा आदि का नहीं।

(2) इसी कारण, ‘अलंकार’ काव्य का अनिवार्य साधान है-चाहें तो परवर्ती शब्दावली में कह सकते है कि अलंकारवादी आचार्यों को यह स्वीकृत था कि ‘अलंकार काव्य की आत्मा है’, यद्यपि उन्होंने ‘आत्मा’ शब्द का कहीं इस अर्थ में प्रयोग नहीं किया। पर वे ‘अलंकार’ को ही काव्य का प्राण-तत्त्व मानते थे।

अलंकार सिद्धांत की स्वीकृति तथा अलंकार का मान्य स्वरूप : भामह आदि द्वारा प्रस्तुत अलंकार-सिद्धांत का खण्डन किया गया। MHD 05 Free Solved Assignment

दण्डी द्वारा प्रस्तुत अलंकार के उक्त लक्षण को ही अस्वीकृत करके मानो अलंकार-सिद्धांत को जड़ से उन्मूलित कर दिया गया दण्डी ने अलंकार का जो लक्षण किया था, वामन ने वही लक्षण गुण का प्रस्तुत कर दिया।

तुलनार्थ –

दण्डी : काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचलते।

वामन : काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणा।

इतना ही नहीं, वामन ने गुण को काव्य में नित्य स्थान दिया और अलंकार को अनित्य – ‘पूर्वे नित्याः’। उनके कथानुसार गुण यदि काव्य के शोभावर्धक धर्म हैं तो अलंकार उस शोभा के वर्धक हैं- तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः। इस प्रकार वामन की दृष्टि में अलंकार का महत्त्व गुणों की अपेक्षा कम हो गया।

इसके पश्चात आनन्दवर्धन ने अलंकार का नूतन लक्षण प्रस्तुत करते हुए इसका महत्त्व और भी कम कर दिया, और इनकी स्थिति इस रूप में स्वीकृत की, जैसी कि शरीर के कटक, कुण्डल आदि शोभाकारक आभूषणों की होती है –

   अंगाश्रितास्त्वलंकाराः मन्तव्याः कटकादिवत्।

यहाँ अंग’ से तात्पर्य है शब्दार्थ – रूप काव्य शरीर के अस्थिर धर्म के रूप में उसकी अतिशय शोभा बढ़ाते हुए रसादि का कभी उपकार करते हैं। इनके बाद पण्डिताराज जगन्नाथ के अनुसार ‘अलंकार’ उन्हें कहते हैं जो काव्य की आत्म ‘व्यंग्य’ की रमणीयता के प्रयोजक हैं।

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4. साधारणीकरण का अर्थ बताते हुए आचार्य अभिनव गुप्त की साधारणीकरण संबंधी व्याख्या को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के मत में संशोधन कर साधारणीकरण को अपने ही ढंग से प्रस्तुत किया – वाक्यार्थ के ज्ञान के उपरांत साधारणीकरण नामक व्यापार द्वारा सहदय की कुछ इस प्रकार की मानसी एवं साक्षात्कारात्मिका प्रतीति होती है कि जिसके द्वारा काव्य अथवा नट आदि सामग्री (दृश्य काव्य में) में वर्णित देश, काल, प्रमाता आदि की विषय-सीमा नष्ट हो जाती है। MHD 05 Free Solved Assignment

अर्थात् ये नियामक कारणों के । बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। वस्तुतः यही साधारणीकरण व्यापार है।

उदाहरणार्थ – भयानक रस के निदर्शन ‘ग्रीवाभंगाभिराम…..तस्यां च यो मृगयोतकादिर्भाति तस्य विशेष रूपत्वा भावाभित इति, त्रासकस्यापारमार्थिकत्वाद् भयमेव परं देशकालाद्यनलिगितम्।’

में त्रस्त मृग, त्रासक (दुष्यंत) और भय . स्थायी भाव, देशकाल आदि के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सहृदय को जिस भयानक रस की प्रतीति होती है – वह उस भावना से भिन्न होती है कि ‘मैं भीत हूँ’ अथवा ‘यह भीत है’

अथवा ‘शत्रु-मित्र’ अथवा ‘उदासीन भीत है। यह प्रतीति लौकिक सुख-दुख के मान से भिन्न या विलक्षण होती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि आश्रय और आलंबन का साधारणीकरण हो जाने से स्थायी भाव ही देशकाल के बंधन से मुक्त हो जाता है।

इसी तथ्य को और स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं – इसीलिए ‘मैं भीत हूँ’, ‘यह भीत है’ या ‘शत्रु’ ‘मित्र’ अथवा ‘तटस्थ भीत है’ इत्यादि सुख-दुःखकारी अन्य प्रत्ययों (ज्ञान) को नियमतः उत्पन्न करने के कारण विघ्न बहुल प्रतीतियों से भिन्न निर्विघ्न प्रतीति रूप में ग्राह्य (भय स्थायी भाव ही) भयानक रस बन जाता है।’

अर्थात् काव्य में स्थायी भाव सभी प्रकार के व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त हो जाता है वे व्यक्ति-संसर्ग अपनी परिमिति के कारण दुःखादि के कारण होते हैं। MHD 05 Free Solved Assignment

अतः इनसे मुक्ति का अभिप्राय होता है- लौकिक सुखदुःख आदि की चेतना से मुक्ति।

यह साधारणत्व परिमित न होकर सर्वव्याप्त होता है – अनादि संस्कारों से चित्रित चित्त वाले समस्त सामाजिकों की एक-जैसी वासना (संस्कार) होने के कारण सभी को एक जैसी ही प्रतीति होती है। अतः अभिनवगुप्त के मतानुसार,

5. प्रत्ययवाद से आप क्या समझते हैं। समझती हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : प्लेटो में काव्य और दर्शन के सापेक्ष महत्व को लेकर प्रायः अतद्वंद्व दिखाई देता है। इसका कारण है वे स्वभाव और संस्कार से कवि हैं तथा शिक्षा और परिस्थिति से दार्शनिक।

कभी ये काव्य और दर्शन के पुराने कलह की याद दिलाते हैं तो कभी काव्य को ईश्वरीय प्रेरणा से उद्भूत मानकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

प्रायः प्लेटो का स्मरण काव्य के विरुद्ध अनेक अभियोग लगाने वाले दार्शनिक आचार्य की तरह किया जाता है। उनके मत से काव्य की अग्राह्यता के दो आधार हैं – दर्शन और प्रयोजन।

मूलतः प्लेटो प्रत्ययवादी दार्शनिक हैं। प्रत्ययवाद के अनुसार प्रत्यय अर्थात् विचार ही परम सत्य है, वह नित्य है, एक है. अखंड है और ईश्वर ही उसका स्रष्टा है। MHD 05 Free Solved Assignment

यह दृश्यमान वस्तु-जगत प्रत्यय (परम सत्य या ईश्वर) का अनुकरण है क्योंकि कलाकार किसी वस्तु को ही अपनी कला के द्वारा निर्मित अंकित या चित्रित करता है।

इस क्रम में कला तीसरे स्थान पर है- पहला स्थान प्रत्यय का (अर्थात् . ईश्वर का), दूसरा स्थान उसके आभास या प्रतिबिंब या वस्तु-जगत का और तीसरा स्थान वस्तु-जगत के प्रतिबिंब कला-जगत का।

इसलिए परम सत्य से कला का तिहरा अलगाव है और अनुकरण का अनुकरण होने के कारण वह मिथ्या या झूठ है। प्लेटो के शब्दों में कविता या कला सत्य से तिगुना दूर होती है।

अपने इस सिद्धांत कथन को प्लेटो अपने उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। उनका कहना है कि संसार में प्रत्येक वस्तु का एक नित्य रुप होता है।

यह प्रत्यय या विचार में ही निहित रहता है और यह रूप ईश्वर निर्मित है। विचार (प्रत्यय) में मौजूद उसी रूप के आधार पर किसी वस्तु का निर्माण होता है।

प्लेटो के द्वारा दिया गया पलंग का उदाहरण लें। यथार्थ पलंग वह है जिसका रूप हमारे प्रत्यय या विचार में है और इस रूप का निर्माण ईश्वर ने किया है।

इस विचार में विद्यमान रूप के आधार पर बदई लकडी के पलंग का निर्माण करता है और उसके द्वारा निर्मित पलंग का चित्र कवि या कलाकार निर्मित करता है। इस प्रकार तीन पलंग हुए –

(1) एक तो वह जिसका निर्माण ईश्वर करता है (प्रत्यय या विचार रूप में पलंग),

(२) दुसरा वह जिसका निर्माण लकड़ी से बदई करता है;

(3) तीसरा वह जिसका निर्माण कलाकार या चित्रकार करता है। इन तीनों के पलंग में अंतर है।

मूल बात यह कि वस्तु प्रत्यय में ही रूपायित होती है, फिर उसके अनुकरण कर निर्माता उसे ठोस आकार देता है। MHD 05 Free Solved Assignment

यह आकार यथार्थ की नकल होता है। इसलिए उसकी स्थिति यथार्थ के दूसरे स्थान पर है। कलाकार – कवि, चित्रकार मूर्तिकार – किसी माध्यम (शब्द रंग या पत्थर) के द्वारा उस ठोस वस्तु की नकल कर उसे नया रूप देता है। इसलिए वह यथार्थ से तीसरे स्थान पर है।

इसीलिए प्लेटो कहते हैं कि कला नकल की नकल है, अनुकरण का अनुकरण है, छाया की छाया है, प्रतिबिंध का, प्रतिबिंब है अर्थात् नकल या मिथ्या है।

प्लेटो अपना यह तर्क सभी कलाओं पर लागू करते हैं। प्लेटो का विचार है कि होमर और हैसिओड (आठवीं शताब्दी ई.पूर्व) जैसे कपियों के काव्य अथवा सोफोवलीज़ अरिस्तोफोनीज़ जैसे नाटककारों के नाटक भी अपवाद नहीं हैं।

इन कृतियों को पढ़ने, देखने या सुनने से अके नागरिकों का निर्माण आदर्श राज्य के लिए संभव नहीं है। नैतिकतावादी आग्रहों से प्रेरित होकर प्लेटो काव्य और कलाओं की निंदा करते हैं। उनके कुछ तर्क इस प्रकार हैं

1) होमर के महाकाव्यों – ‘इलियड’ और ‘ओडसी’ – में देवताओं का चरित्र असत्य भी है और अनुचित भी। उनमें देवत्व कहाँ है और देवत्व नहीं है तो वे मनुष्यों के उन्नयन में सहायक नहीं हो सकते।

2) होमर और हैसिओड के काव्य में ऐसे स्थल प्रायः आते हैं जो पाठक को वीर और साहसी के बदले दुर्बल और कायर बनाते हैं। MHD 05 Free Solved Assignment

काव्य तो ऐसा होना चाहिए जो नवयुवकों में शौर्य की भावना भरे उनके चरित्र का निर्माण करे और मृत्यु की लालसा के लिए उन्हें तैयार करे। प्लेटो का प्रसिद्ध कथन है – ‘दासता मृत्यु से भी बुरी चीज़ है।’

3) प्रायः कवि भोग और विलास की कामना से भर कर आवेशपूर्ण, कामुकतापूर्ण भावों की सृष्टि करते हैं। इनसे शुद्धता और संयम में बाधा पड़ती है तथा चरित्रहीनता, भोग-लिप्सा और अराजकता फैलती है।

6. लांजाइनस के उदात्त विषयक विचारों को रेखांकित कीजिए।

त्तर – लांजाइनस ने उदात्त की परिभाषा नहीं दी है – उसे एक स्वतः स्पष्ट तथ्य मानकर छोड़ दिया है। उसका मत है कि उदात्तता साहित्य के सब गुणों में महान् है।

यह वह गुण है जो अन्य क्षुद्र त्रुटियों के बावजूद साहित्य को सच्चे अर्थों में प्रभावपूर्ण बना देता है। उसकी दृष्टि व्यावहारिक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार की थी,

अतः उसने जहाँ एक ओर उदात्त के बहिरंग तत्त्वों की चर्चा की, वहाँ उसके अंतरंग तत्त्वों की ओर भी संकेत किया। उदात्त के इस विवेचन में उन्होंने पाँच तत्त्वों को आवश्यक ठहराया –

(1) महान् धारणाओं की क्षमता या विषय की गरिमा,

(2) भावावेश की तीव्रता,

(3) समुचित अलंकार-योजना,

(4) उत्कृष्ट भाषा तथा

(5) गरिमामय रचना-विधान। इनमें से प्रथम दो जन्मजात हैं, अत: उसके अंतरंग पक्ष के अन्तर्गत आते हैं, तो शेष तीन कलागत हैं और बहिरंग पक्ष के अन्तर्गत आते हैं। MHD 05 Free Solved Assignment

उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन तत्त्वों का भी उल्लेख किया है, जो औदात्य के विरोधी हैं। इस प्रकार उनके उदात्त के स्वरूप-विवेचन के तीन पक्ष हो जाते हैं-
(1) अन्तरंग तत्त्व,

(2) बहिरंग तत्त्व और

(3) विरोधी तत्त्व।

अन्तरंगतत्त्वः

1- उदात्त विचारया विषयकीगरिमाः उनके अनुसार उस कवि की कृति महान् नहीं हो सकती, जिसमें महान् धारणाओं की क्षमता नहीं है। कवि को महान् बनने के लिए अपनी आत्मा में उदात्त विचारों का पोषण करना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट लिखा है, ‘यह सम्भव नहीं है कि जीवनभर क्षुद्र उद्देश्यों और विचारों में ग्रस्त व्यक्ति कोई स्तुत्य एवं अमर रचना कर सके। महान् शब्द उन्हीं के मुख से निःसृत होते हैं, जिनके विचार गम्भीर और गहन हो।’

अरस्तू ने विषय को स्वतः साधय माना था। लांजाइनस उसे साधन मानते हैं। उनका मत है कि विषय के महत्त्व से काव्य में आनन्दातिरेक का तत्त्व आता है।

उनके मतानुसार यद्यपि यह कार्य प्रतिभा द्वारा ही सिद्ध होता है, तथापि महान् कवियों की कृतियों का अनुशीलन भी सहायक हो सकता है। लांजाइनस प्राचीन कवियों का अन्धानुकरण नहीं चाहते; वे चाहते हैं कि कवि उनसे संस्कार ग्रहण करें, उनकी शक्ति प्राप्त करें।

2- भावोंकीउत्कटता: लांजाइनस प्रेरणा-प्रसूत भव्य आवेग को उदात्त का दूसरा तत्त्व मानते हैं। भव्य आवेग से उनका अभिप्राय ऐसे आवेग से है, जिसके परिणामस्वरूप हमारी आत्मा अपने आप ऊपर उठ कर मानो गर्व से उच्चाकाश में विचरण करने लगती है तथा हर्ष और उल्लास से भर जाती है।

उन्होंने आवेग के दो भेद किये हैं-भव्य और निम्न। निम्न आवेग के अन्तर्गत वे उन आवेगों को लेते हैं जिनका सम्बन्ध दया, शोक, भय आदि से है। MHD 05 Free Solved Assignment

भव्य आवेग से आत्मा का उत्कर्ष होता है, तो निम्न से अपकर्ष। उदात्त के लिए भवय आवेग को आवश्यक माना गया है।

वह उसी को उदात्त कहते हैं जो अपनी ऊर्जा, उल्लास और संभ्रम आदि के सम्मिलित प्रभाव रूप ऐसी अनुभूति को जन्म दे, जो अन्ततः पाठक की सम्पूर्ण चेतना को अभिभूत कर सके।

बहिरंगतत्व :- लोजाइनस ने कलागत उदात्त के तीन तत्त्व माने हैं – 1. समुचित अलंकार योजना, 2. उत्कृष्ट भाषा, 3. गरिमामय रचना-विधान।

(1) समुचित अलंकारयोजना- अलंकारों का प्रयोग तो लांजाइनस वे५ युग में निर्बाध होता था, पर उसका मनोवैज्ञानिक आधार नहीं था। लांजाइनस ने उनका सम्बन्ध मनोविज्ञान से जोड़ा और मनोवैज्ञानिक प्रभावों को व्यक्त करने के निमित्त की अलंकारों को उपयोगी ठहराया।

केवल चमत्कार-प्रदर्शन के लिए अलंकारों का प्रयोग उन्हें मान्य न था। वह अलंकार को तभी उपयोगी मानते थे जब वह जहाँ प्रयुक्त हुआ है, वहाँ अर्थ को उत्कर्ष प्रदान करें, लेखक के भावावेग से उत्पन्न हुआ हो, पाठक को

आनन्द प्रदान करे, उसे केवल चमत्कृत न करे। अतः उनका अलंकार-संबंधी विवेचन अत्यन्त मार्मिक है। भव्य से भव्य अलंकार भी यदि स्थान, प्रसंग आदि के अनुरूप नहीं हैं, तो कविता-कामिनी का श्रृंगार न करके उसका बोझ बन जाएगा।

वह साधन-मात्र है, अत: उसे प्रसंग का सहज अंग बनकर आना चाहिए। इस बात पर किसी का ध्यान न जाए कि वह अलंकार है। उन्होंने केवल उन्हीं अलंकारों का विवेचन किया है, जो शैली को उत्कर्ष प्रदान करते हैं।

उन्होंने विस्तारणा, शपथोक्ति, प्रश्नालंकार, विपर्यय, व्यतिक्रम, पुनरावृत्ति, छिन्न-वाक्य, प्रत्यक्षीकरण, संचयन सार, रूप-परिवर्तन, पर्यायोक्ति आदि का विवेचन किया है।

(2) उत्कृष्टभाषा- उत्कृष्ट भाषा के अन्तर्गत लांजाइनस ने शब्द-चयन और भाषा की सज्जा को लिया है। उन्होंने विचार और पद-विन्यास को एक दूसरे के आश्रित माना है, MHD 05 Free Solved Assignment

अतः सहज ही निष्कर्ष निकल आता है कि उदात्त विचार क्षुद्र या साधारण शब्दावली द्वारा अभिव्यक्त न होकर गरिमामयी भाषा में ही अभिव्यक्त हो सकते हैं।

भाषा की गरिमा का मूल आधार है शब्द-सौन्दर्य अर्थात् उपयुक्त और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग। सुन्दर शब्द ही वास्तव में विचार को विशेष प्रकार का आलोक प्रदान करते हैं।

शब्द -विन्यास के दो पक्ष होते हैं-धवनि-पक्ष और अर्थ-पक्षा लांजाइनस ने दोनों पक्षों पर समुचित ध्यान दिया है।

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7. टी.एस.इलियट के निर्वैयक्तिकता सिद्धांत का विवेचन कीजिए।

उत्तर – इलियट ने परम्परा को समझने और अपनाने पर बहुत बल दिया है। उनका विचार था कि साहित्य-रचना में साहित्यकार को आत्मनिष्ठ तत्त्व पर नियंत्रण रखना चाहिए। कविता कवि के तीव्र भावों का सहज उच्छलन नहीं है जैसा कि रोमांटिक कवि वर्ड्सवर्थ मानता था।

इलियट ने कला को निर्वैयक्तिक घोषित किया। उनके अनुसार काव्य-रचना में कवि का मानस केवल माध्यम है, जहाँ कवि के भाव और अनुभव नए-नए समुच्चय में बंधाते रहते हैं।

काव्य-रचना की प्रक्रिया पुनमरण के स्थान पर एकाग्रता की मांग करती है। काव्य एकाग्रता का प्रतिल है। वह लिखते हैं कवि अपने व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं करता, वह केवल माध्यम मात्र है।

इसके लिए इलियट ने एक उत्प्रेरक का दृष्यन्त दिया है।

आक्सीजन और सल्फर डायोक्साइड के कक्ष में यदि प्लेटिनम का तार डाल दिया जाए तो आक्सीजन और सल्फर डायोक्साइड मिलकर सल्फर एसिड बन जाते हैं, पर प्लेटिनम के तार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न एसिड में प्लेटिनम का कोई चिह दिखाई देता है। MHD 05 Free Solved Assignment

कवि का मन भी प्लेटिनम का तार है। व्यक्तिगत भावों की अभिव्यक्ति कला नहीं है, वरन उनसे पलायन कला है। कलाकार की प्रगति निरन्तर आत्मोत्सर्ग, व्यक्तित्व का निरन्तर निर्वापण है।

सम्बन्धी मान्यताओं के विपरीत था, जो काव्य को भावोद्रेक का उच्छलन मानते थे। रोमांटिक युग की धारणा कि काव्य व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है उन्हें मान्य न थी।

अतः काव्य का महत्त्व व्यक्तिगत भावों की तीव्रता या महत्ता का नहीं, काव्य-प्रक्रिया की कलात्मक सघनता पर निर्भर करता है, जिसमें विभिका भाव, घुल-मिलकर एक हो जाते हैं।

अत: कलाकार को निरन्तर कलात्मक प्रक्रिया के प्रति आत्म समर्पण करते रहना चाहिए। इलियट का विचार है कि काव्य की प्रेरणा कवि को मानव-स्थिति की सचेतन अनुभूति से प्राप्त होती है।

उनके प्रारम्भिक वक्तव्यों से स्पष्ट है कि कवि कविता लिखता नहीं, कविता स्वयं कवि के माध्यम से कागज पर शब्द-विधान के रूप में उतर आती है; जब तक कविता पूरी नहीं हो जाती, तब तक कवि को ज्ञान नहीं होता कि क्या होने जा रहा है।

पर क्या उनके कला की निर्वैयक्तिकता सम्बन्धी से आरम्भिक विचार अन्त तक बने रहे? यीट्स के काव्य के सम्बन्ध में जो विचार उन्होंने प्रकट किए हैं और जो शिकायत की है

कि उसके आरम्भिक काव्य में कवि का अपूर्व व्यक्तित्त्व नहीं मिलता, उससे लगता है कि बाद में चलकर इलियट के विचार या तो बदल गए थे जा जैसा कि स्वयं उन्होंने कहा, ‘मैं उस समय अपनी बात ठीक से व्यक्त न कर सका था।’ बाद में निर्वैयक्तिकता के सम्बन्ध में अधिक सहायता देता है।

‘निर्वैयक्तिकता के दो रूप होते हैं-एक वह जो ‘कुशल शिल्पी मात्र’ के लिए प्राकृतिक होती है। दूसरी, वह है, जो प्रौढ़ कलाकार के द्वारा अधिकाधिक उपलब्ध की जाती है। MHD 05 Free Solved Assignment

दूसरे प्रकार की निर्वैयक्तिकता उस प्रौढ़ कवि की होती है, जो अपने उत्कट और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सामान्य सत्य को व्यक्त करने में समर्थ होता है।’

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि भले ही उनके प्रारम्भिक मत की शब्दावली से लोगों को यह भ्रम हो गया हो कि वह कविता को कुशल शिल्प-विधान मानते थे, परन्तु बाद में चलकर कला की निर्वैयक्तिकता से इलियट का अभिप्राय मात्र कुशल शिल्पी की निर्वैयक्तिकता नहीं है।

अब तो वह कला की निर्वैयक्तिकता को प्रौढ़ कवि के निजी अनुभावों की सामान्य अभिव्यक्ति मानते हैं। भारतीय आचार्यों की तरह वह भी यह मानते हैं कि कवि अपने निजी भावों की अभिव्यक्ति कविता में करता है, पर उसे इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वे भाव उसके ही नहीं, सर्व-सामान्य के भाव बन जाते हैं।

8. शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना की बृहत्तरीय के योगदान की चर्चा कीजिए।

उत्तर आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को जो प्रौढ़ता और स्तर प्रदान किया था उसे उससे आगे ले जाना या उसका दिशा-परिवर्तन करना, बड़ा चुनौतीपूर्ण काम था।

पर अपनी विशेष प्रकार की मान्यताओं और दृष्टिकोण के कारण वे समकालीन छायावादी कवियों को अपेक्षित सहानुभूति नहीं दे सके।

इस काव्याधारा की सराहना के प्रश्न के साथ कुछ और बातों में मतभेद के कारण भी उनके बाद नन्ददलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नगेंद्र ने शुक्लोत्तर आलोचना की जिस बृहत् त्रयी का निर्माण किया वह अलग-अलग ढंग से आचार्य शुक्ल से टकराई।

यह टकराहट नंददुलारे वाजपेयी के कर्कश सिद्धांत-विरोध में, हजारीप्रसाद द्विवेदी के नवीन इतिहास-बोध में और नगेंद्र की छायावादी काव्य की सरस व्याख्याओं में प्रकट हुई।

1) इस प्रगति के बारे में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी ने कहा था : ‘शुक्ल जी की नैतिक और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा नये समीक्षकों की सौंदर्य अनुभूति और कला-प्रधान दृष्टि एक निश्चित प्रगति है।’

इस नयी दृष्टि की प्रेरणा से वाजपेयी जी ने जो आलोचनात्मक प्रतिमान बनाए उनका आधार विशेष रूप से प्रगीत-काव्य था। ‘आँसू’, ‘परिमल’ और ‘पल्लय’ की गीति रचनाओं ने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया था। जाहिर है कि ये प्रतिमान प्रगीतों के विवेचन-व्याख्या के लिए ही उपयोगी थे

वाजपेयी जी को प्रसाद और निराला के काव्य में व्याप्त पौरुष और शक्ति तत्व तो विशेष आकर्षित करता ही था इसके अलावा इनकी काव्य के प्रति अप्रतिम निष्ठा’ भी।MHD 05 Free Solved Assignment

वाजपेयी जी साहित्य के मूल्यांकन के लिए किसी साहित्येतर मूल्य को निर्णायक स्थिति में रखने के पक्ष में नहीं थे। काव्य के संदर्भ में उन्होंने काव्य सौष्ठव को सर्वोपरि महत्व दिया।

वे मूलतः छायावादी चेतना के आलोचक थे। इसीलिए वे न प्रेमचंद के साथ न्याय कर सके न प्रगतिशील साहित्य के साथ।

उनका एक महत्वपूर्ण योगदान छायावाद को राष्ट्रीय स्वातंत्र्य-आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छायावाद की ‘मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है।

2) आचार्य शुक्ल से हजारी प्रसाद विवेवी का मतभेद साहित्य के प्रति सम्पूर्ण दृष्टिकोण को लेकर था। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक समवेत, भारतीय पिता के स्वाभाविक विकास के रूप में समझने का प्रयास किया।

इसे वे जैन, नाथ, सिद्ध सन्त आदि सभी धर्मों की संयुक्त और साझी चेतना का प्रतिफलन मानते थे।

द्विवेदी जी एक और सांस्कृतिक निरंतरता का समर्थन करते थे और दूसरी ओर अखंडता का इसीलिए उन्होंने एक ओर भक्ति साहित्य में एक कालक्रमिक चिंतन परंपरा की खोज की और दूसरी उसकी विभिन्न धाराओं को एक विराट भक्ति-चेतना के रूप में देखने का प्रयत्न किया।

हिंदी आलोचना को द्विवेदी जी की मौलिक देन है काव्य-रदियों और कवि-प्रसिद्धियों के माध्यम से काव्य के अध्ययन की पद्धति का प्रस्ताव उनका विचार था कि समाज और संस्कृति के आंतरिक स्तर पर निरंतरता और अखंडता को प्रतिफलित होते हुए देखने का कारगर उपाय यही है।

इस सिद्धांत को उन्होंने ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रामाणिकता पर विचार करते हुए व्यावहारिक रूप दिया।

आचार्य द्विवेदी की आलोचना की सबसे बड़ी सामर्थ्य यह थी कि उन्होंने बड़े पैमाने पर साहित्यिक-रुचि में परिवर्तन करने का प्रयल किया। अपने इस प्रयास में वे बहुत दूर तक सफल भी हुए।

वे स्वयं जनता की रुचि को महत्व देते थे। जन जीवन के प्रति यह मोह उनके मानवतावादी दृष्टिकोण के कारण पैदा हुआ था। उन्होंने एक निबंध लिखा जिसका शीर्षक है : ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है।’

9. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए

(क) अभिदा शब्दशक्ति

उत्तर – शब्द की जो शक्ति उसके मुख्य और प्रत्यक्ष स्वभावगत अर्थ को प्रकट करती है, उसे शब्द-शक्ति कहते हैं। इससे व्यक्ति अर्थ को सांकेतिक अर्थ भी कहा जाता है। MHD 05 Free Solved Assignment

इस प्रकार कह सकते हैं कि अभिधा-शब्द-शक्ति से जिस साक्षात्-सांकेतिक अर्थ का बोध होता है, वह वाचक-अर्थ है। उसका बोध कराने वाला शब्द वाचक-शब्द है।

अभिधा-शक्ति द्वारा प्राप्त या ज्ञात होने वाला अर्थ ही काव्य-समीक्षा में ‘वाच्यार्थ’ के नाम से अभिहित किया जाता है। यहाँ प्रायः शब्दों का सांकेतिक एवं निश्चित पूर्व-निर्धारित अर्थ ही ग्रहण किया जाता है।

जैसे ‘कमल’ का अर्थ एक जाति का पुष्प ही है, ‘गधा’ शब्द का अर्थ एक पशु-जाति प्राणी ही है और ‘पुस्तक’ का अर्थ पढ़ने के काम आने वाली एक वस्तु-विशेष ही है।

तात्पर्य यह है कि शब्द का स्वभावगत अर्थात् सामान्य बोलचाल और व्यवहार में प्रचलित अर्थ ही इस शब्द-शक्ति से प्रकट हो पाता या ग्रहण किया जाता है। इसी कारण इसे मुख्यार्थ भी कहा जाता है।

अभिधा शब्द-शक्ति द्वार मुख्यार्थ या सांकेतिक वाच्चार्थ का ज्ञान कराने वाले प्रमुख साधन है-व्याकरण, आप्त-वाक्य, व्यवहार या बोलचाल, प्रसिद्ध पद सान्निध्य, वाक्य-शेष और विवरण-व्याख्या आदि।

इन्हीं उपकरणों के आधार पर हम किसी शब्द का सामान्य वाच्यार्थ ग्रहण करने में सक्षम हो पाते हैं। उदाहरण के लिए कविवर सियारामशरण गुप्त की कविता का एक अंश है।MHD 05 Free Solved Assignment

(ख) पश्चिमी काव्यशास्त्र में काव्य का अधिकारी’

उत्तर पश्चिमी काव्यशास्त्र में ‘काव्य का अधिकारी’ अथवा ‘सहदय’ जैसी गहन अवधारणा तो नहीं है, पर। आदर्श-पाठक या ‘ग्राहक’ (आईडियल रीडर) की अवधारणा पर पर्याप्त विचार हुआ है।

भारतीय आचार्यों ने ‘सहृदय’ के जिन गुणों पर बल दिया है, उसका पूरा स्वरूप ‘प्रतिभा’ पर खड़ा है – अर्जन पर कम। इसके विपरीत, पश्चिमी चिंतकों ने ‘आदर्श प्रेक्षक’ अथवा ‘आदर्श ग्राहक’ में सतत ग्रहणशीलता, शिक्षा एवं प्रयत्न तीनों का योग महत्वपूर्ण माना है।

वहाँ भी पाठक में भावयित्री प्रतिभा की स्वीकृति है, पर यह सब अभिजात वंशानुक्रम परम्परा से विरासत में प्राप्त संस्कार है,

प्रतिभा का सहज उभार कम पाठक के ‘संस्कार’ को सामाजिक संदर्भ प्रदान करते हुए ‘विशिष्ट वर्ग’ का प्रतिनिधि माना गया जिसमें स्वभावतः काव्यास्वाद का संस्कार भी आ जाता है।

काव्य के अधिकारी संबंधी मान्यता में ‘विशिष्ट वर्ग’ की या अल्पसंख्यक की बात वहाँ बहुत समय से . चली आ रही है। वहाँ माना जाता रहा है कि यह विशिष्ट वर्ग थोड़ा या अल्पसंख्यक होता है।

इस चिंतन परम्परा का परिणाम यह हुआ कि आई.ए.रिचर्डस, टी.एस.एलियट तथा एफ.आर.लीविस जैसे प्रबुद्ध आधुनिक भी ‘अल्पसंख्यक संस्कृति सिद्धांत के प्रति एकदम नरम हैं।

यह ठीक बात है कि हर समाज में सच्चे ग्राहक कम ही होते हैं। टी.एस.एलियट जब अल्पसंख्यक वर्ग को काव्य का अधिकारी कहते हैं तो.. उस वर्ग को पूरे यूरोप की महान परंपरा का वाहक, धारक, उद्धारक और उत्तराधिकारी मानते हैं। MHD 05 Free Solved Assignment

वे स्वयं जब बोलते हैं – चाहे रचनाकार के स्वर में बोलें या पाठक-आलोचक के स्वर में – पूरे यूरोप की तरह से, पूरी ईसाई चिंतन परम्परा के प्रवक्ता की तरह बोल रहे होते हैं।

अभिजात वर्ग ही काव्य-संस्कारों वाला है औद्योगिक समाज का मध्य वर्ग तो संस्कारहीन उपभोक्तावादी संस्कृति का अंग है। एलियट के विचार से लीविस कई अर्थों में सहमत हैं।

लीविस के अनुसार ‘जनतंत्र और शिक्षा के अनियंत्रित प्रचार-विकास से लाभ कम हानि बहुत हुई है।’ उनका मानना है कि ‘अल्पसंख्यक संस्कृति’ में ‘काव्य के ग्राहकों की संख्या भी थोडी ही होती है।

(ग) त्रासदी

उत्तर – अरस्तू ने अपनी परिभाषा में शब्द का प्रयोग किया है और बूचर ने उसका अनुवाद किया है, जिसका हिन्दी अर्थ होगा अनुकृति या अनुकरण।

वस्तुतः की जगह अधिक उपयुक्त शब्द है, क्योंकि त्रासदी में लेखक फोटोग्राफर की तरह अनुकरण नहीं करता। उसका कार्य जीवन का अनुकरण न होकर जीवन का निरूपण करना है। अरस्तू के अनुसार यह निरूपण कार्य का होना चाहिए।

अरस्तू ने केवल गंभीर कार्य की अनुकृति को त्रासदी का विषय माना है। गंभीर से उसका अभिप्राय उस कार्य से है जो महत्त्वपूर्ण हो, जो त्रासदी के गौरव के अनुकूल हो।

अरस्तु का विचार है कि त्रासदी का कार्य अपने आप में पूर्ण होना चाहिए। पर आज पूर्णता के मत को अमान्य ठहरा दिया गया है। भारत ने कलात्मक भाषा और शैली-गौन्दर्य को वासटी के लिा आवश्यक बताया है।

त्रासदी के तत्त्व : अरस्तू के अनुसार त्रासदी के छः तत्त्व हैं-कथावस्तु या कथानक चरित्र, विचार-तत्त्व, पदावली, दृश्य-विधान, तथा संगीत। MHD 05 Free Solved Assignment

  1. कथावस्तु : कथावस्तु से अरस्तू का तात्पर्य घटनाओं के विन्यास से है। यह कथावस्तु को त्रासदी का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग, उसकी आत्मा मानता है। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित कारण दिये हैं:

(क) त्रासदी अनुकृति है – व्यक्ति की नहीं, कार्य की तथा जीवन की।

(ख) जीवन कार्य-व्यापार का ही नाम है, अत: जीवन की अनुकृति में कार्य व्यापार ही प्रमुख है।

(ग) काव्यगत प्रभाव का स्वरूप सुख या दुःख होता है और यह कार्य पर निर्भर रहता है।

(घ) चरित्र कार्य-व्यापार के साथ गौण रूप से स्वतः ही आ जाता है।

(2) एकान्विति – नाटक, काव्य आदि कलाकृति होते हैं; उनमें अन्विति, पूर्णता आदि गुण होने चाहिए। इसलिए अरस्तू ने एकान्विति से युक्त कथानक को अनिवार्य ठहराया है। एकान्विति का यह अर्थ नहीं कि उसमें एक व्यक्ति की ही कथा हो।

त्रासदी के कथानक की धुरी ऐसा कार्य व्यापार होनी चाहिए जिसके विभिन्न अंग परस्पर सम्बद्ध होने के साथ-साथ मूल कार्य से सम्बद्ध हों, जिसमें कोई अनावश्यक और निरर्थक अंग न हो,

जिसमें इतनी सुसम्बद्धता हो कि एक अंग के हटाने से ही सर्वांग छिन्न-भिन्न हो जाए, कथानक का ढाँचा चरमरा उठे। कार्य की समाप्ति एक निश्चित बिन्दु पर होनी चाहिए, और सब घटनाओं के पीछे एक ही उद्देश्य परिलक्षित होना चाहिए। MHD 05 Free Solved Assignment

प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य से या किसी अन्य आगामी दृश्य से सम्बद्ध हो तथा सभी दृश्य ऐसा भाव उत्पन्न करें, जो अन्तिम प्रभाव उत्पन्न करने में योग दे।MHD 05 Free Solved Assignment

(घ) भारतेन्दु युग की आलोचना

उत्तर – डॉ. रामविलास शर्मा ने ‘भारतेंदु युग’ नामक पुस्तक में ‘बालकृष्ट भट्ट और हिंदी आलोचना का जन्म’ नामक अध्याय में भट्टजी के ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ नामक निबंधा का उल्लेख करते हुए लिखा है, ‘लेख के नाम से ही भट्टजी का आधानिक दृष्टिकोण प्रकट हो जाता है।

साहित्य रसात्मक वाक्य या कवि के अंत:पुर का लीला-विनोद न होकर जन-समूह के हृदय का विकास है।’ यह ‘रस’ निर्जीव रस के प्रति जनसमूह के हृदय का विद्रोह था जिसकी अभिव्यक्ति भारतेंदु युग कर रहा था।

साहित्य को देखने-समझने की दृष्टि बदली तो उसके मूल्यांकन की कसौटी भी बदली और हिंदी आलोचना में युगांतर उपस्थित हुआ। ‘जनसमूह के हृदय की भावनाओं’ का आग्रह करके ही हिंदी की आलोचना रीतिकालीन केंचुल उतार कर आधुनिक बनी।

पंडित रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक युग को गद्य युग कहा। भारतेंदु काल में गद्य की विधा सहसा इतनी लोकप्रिय हो उठती है। उसका कारण है कि आधुनिकता, वैचारिकता के कारण और उसके सहारे आई है। वैचारिकता गद्य में तो है ही, कविता में भी है। MHD 05 Free Solved Assignment

वैचारिकता का आग्रह होने पर साहित्य में आलोचना का विकास होना अवश्यम्भावी था। इस काल में आलोचना पत्र-पत्रिकाओं के लेखों, टिप्पणियों और निबंधों से विकसित हुई है।

‘आलोचना’ उन विधाओं में से है जो पश्चिमी साहित्य की नकल पर नहीं, बल्कि अपने साहित्य को समझने-बूझने और उसकी उपादेयता पर विचार करने की आवश्यकता के कारण जन्मी और विकसित हुई है।

वहाँ होता है इसलिए यहाँ भी होना चाहिए’ इस विचार की भावना से वशीभूत होकर भारतेंदु ने ‘नाटक’ पर अपने विचार नहीं प्रकट किए हैं।

‘हिंदी के नाटकों पर स्वरूप कैसा होना चाहिए’ इसका ध्यान रखकर उन्होंने अपने विचार प्रकट किए हैं। विचारों के इस प्रकटीकरण को ही हम हिंदी आलोचना का प्रारंभ मान सकते हैं।

भारतेंदु ने नाटक संबंधी विचार नाटककार की हैसियत से व्यक्त किए हैं, समीक्षक या आलोचक की हैसियत से नहीं। वे लेख में आद्यन्त रचना पर बल देते हैं और नाटककार को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए यह बताते रहते हैं। इस लेख में उनके सर्जक का चिंतक रूप प्रकट हुआ है। MHD 05 Free Solved Assignment

भारतेंदु ने नाटक पर विचार करते समय उसकी प्रकृति समसामयिक जनरूचि एवं प्राचीन नाटडशास्त्र की उपयोगिता पर विचार किया है।

उन्होंने बदली हुई जनरूचि के अनुसार नाटड-रचना में परिवर्तन करने पर विशेष बल दिया है। भारतेंदु के नाटक विषयक लेख में आलोचना के गुण मिल जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रथम आलोचक कहना अनुचित न होगा। MHD 05 Free Solved Assignment

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