IGNOU MHD 03 Free Assignment In Hindi 2022- Helpfirst

MHD 03

उपन्यास एवं कहानी

MHD 03 Free Assignment In Hindi

MHD 03 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. किसान जीवन के संदर्भ में गोदान का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर-‘गोदान’ में प्रेमचंद ने ग्राम जीवन और कृषि-संस्कृति को उसकी संपूर्णता में प्रस्तुत किया है । ग्राम-जीवन से तात्पर्य है – गांवों का भौगोलिक और प्राकृतिक परिवेश, गांव में रहने वालों का सामाजिक और आर्थिक स्थिति का चित्रण तथा कृषि संस्कृति से अभिप्राय है किसानों की मान्यताएं, जीवन-मूल्य, संस्कार, नैतिक दृष्टि आदि ।

‘गोदान’ में भारतीय गांवों के जीवन का बड़े पैमाने पर यथार्थ चित्र अंकित किया गया है । ग्राम-जीवन के जिन पक्षों पर प्रेमचन्द ने विशेष रूप से ध्यान दिया है, वे हैं :

        गांवों की भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति 
        पात्रों के नाम, शारीरिक गटन और उनकी पोशाक
        पात्रों के कार्य और बातचीत के विषय
        उनकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति तथा पात्रों की भाषा।

गांवों की भौगोलिक स्थिति का परिचय देने के लिए उन्होंने किसानों के घर-द्वार, खेत, खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का अंकन किया है।

गांव का वर्णन केवल एक वाक्य में किया गया है, पर यह संक्षिप्त चित्र पाठकों के सम्मुख गांव का सजीव चित्र प्रस्तुत कर देता है- “गांव क्या था, पुरवा था, दस-बारह घरों का जिसमें आधे खपरैल के थे, आधे फूस के मथुरा के घर, भोला की बैठक और सिलिया की झोंपड़ी के चित्र गांव वालों के रहन-सहन पर पूरा प्रकाश डालते हैं-

“एक किनारे मिट्टी का घड़ा था, दूसरी ओर चूल्हा था, जहां दो-तीन पीतल और लोहे के बासन मंजे-धुले थे, बीच में पुवाल बिछा था, गांव वालों के लिये खेत और खलिहान विशेष महत्त्व रखते हैं, क्योंकि उनका अधिकांश समय यहीं बीतता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

बेलारी के खलिहान का वर्णन गांव की यथार्थ स्थिति का चित्रण करता है – “कहीं मड़ाई हो रही थी, कहीं अनाज ओसा जा रहा था, कहीं गल्ला तोला जा रहा था। सारे खलिहान में मंडी की-सी रौनक थी।”

ग्रामीण प्रकृति के चित्रों को प्रस्तुत करते समय लेखक ने उन्हीं पेड़-पौधों और वनस्पतियों का उल्लेख किया है, जो गांवों में पाये जाते है । ग्रीष्म ऋतु का यह चित्र देखिये

“जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने रजत प्रताप से तेज प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गर्मी आने लगी थी । दोपहर के समय लू चल रही थी, बगूले उठ रहे थे, भूतल धधक रहा था, जैसे प्रकृति ने वायु में आग घोल दिया हो ।”

इसी प्रकार वसंत ऋतु की एक झलक देखिए, “फागुन अपनी झोली में नवजीवन की विभूति लेकर आ पहुंचा था । आम के पेड़ दोनों हाथों से सुगंध बांट रहे थे और कोयल आम की डालियों में छिपी हुई संगीत का गुप्त दान कर रही थी ।” MHD 03 Free Assignment In Hindi

‘गोदान’ में पात्रों का नामकरण – होरी, गोबर, भोला, दमड़ी, मातादीन, झुनिया, धनिया, पुनिया, सिलिया, उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनकी वेशभूषा और शारीरिक गठन के चित्र भी पाठक को गांव वालों का निकट परिचय देते हैं । उपन्यास के आरंभ में ही होरी के बाहर निकलते समय का चित्र देखिये – “लाठी, मिर्जई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ, यह ग्राम सभ्यता की सबसे अच्छी पोशाक है ।”

सामान्य गांव का किसान ऐसी पोशाक नहीं पहनता | उसकी सारी जिंदगी तो फटे-पुराने कपड़ों में बीतती है । होरी की मिर्जई बने पांच साल है। गये थे और जिस कंबल का वह जाड़े में प्रयोग करता है, वह तो उसके जन्म से पहले का है। बचपन में अपने बाप के साथ यह इसी में सोता था और जवानी में गोबर को लेकर उसमें जाड़े की रातें काटी थीं ।

गोदान’ के सभी पात्र अपने-अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं । होरी भारतीय किसान का, रायसाहब उस समय के जमींदारों का, खन्ना मिल-मालिकों का, गोबर नव-चेतना से सम्पन्न मजदूरों का पात्रों की संख्या एवं उनका बहुमुखी प्रवृत्तियों का चित्रण रचना को महाकाव्यात्मक बना देता है ।

सभी पात्र एक युग-विशेष, एक संस्कृति की समग्र चेतना को प्रतिबिम्बित करते हैं ।

गोदान’ में किसानों की आर्थिक दुरावस्था का मार्मिक और विश्वसनीय चित्रण करते हुए प्रेमचंद बताते हैं कि उनकी विपन्नता का मूल कारण शोषण है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

अंग्रेजी सरकार, जमींदार और महाजन तो शोषण करते ही हैं, सरकारी अधिकारी जैसे पटवारी और पुरोहित जैसे दातादीन उनका शोषण करते रहते हैं ।

धनिया के इस चित्र से किसान परिवार की गरीबी का पता चल जाता है । “तीन लड़के बचपन में ही मर गये, क्योंकि वह एक धेले की भी दवा न मंगवा सकी थी । उसकी उम्र अभी क्या थी, पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी ।

अपनी इसी गरीबी के कारण होरी और उसके बच्चे फाके (उपवास) सहते हैं । कभी-कभी नीयत भी बिगाड़ लेते हैं। होरी बा. बेचकर अपने भाइयों को बराबर का हिस्सा नहीं देता, कुछ पैसे बचाने की चेष्टा करता है । इसी गरीबी के कारण उसे अपनी बेटी का विवाह अधेड़ उम्र के रामसेवक से करना पड़ता है

और द्वार पर गाय बांधने की अभिलाषा मन में ही लिये वह मर जाता है । प्रेमचंद ने ग्रामीणों की इस दुरावस्था के कारणों का भी संकेत दिया है – किसान अशिक्षित, धर्मभीरु और अंधविश्वासी है, इसलिए सभी निर्भय होकर उनका शोषण करते हैं । MHD 03 Free Assignment In Hindi

जमींदार उनसे बेगार लेता है, महाजन ऊंची दर पर ऋण देकर और बेईमानी कर के ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं कि ऋण ऐसा मेहमान बन जाता है कि जो एक बार आकर जाने का नाम ही नहीं लेता ।

पुरोहित जजमानी करके पैसा कमाते हैं और किसान की मृत्यु के बाद भी गोदान के लिए हाथ फैलाये खड़े रहते हैं । MHD 03 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार ‘गोदान’ में किसानों की आर्थिक विपन्नता और क्लेशों का सजीव चित्र अंकित किया गया है । यद्यपि ‘गोदान’ में नगर-कथा भी है, पर वस्तुतः वह भी कन्ट्रास्ट के माध्यम से ग्राम जीवन के चित्र को ही अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है ।

साथ ही नगर और गांव दोनों के चित्र प्रस्तुत करके लेखक ने अपनी कृति को महाकाव्यात्मक आयाम प्रदान किया है और वह सम्पूर्ण देश की महागाथा बन गयी है।

ग्रामीण जीवन के सजीव चित्रों के साथ ही ‘गोदान’ में किसानों के जीवन-मल्यों और मान्यताओं धार्मिक विश्वासों त्यौहारों आदि का चित्र प्रस्तुत करके कृषि-संस्कृति को साकार कर दिया गया है ।

कृषि-संस्कृति में भूमि और गोधन का बड़ा महत्त्व है । किसान को भूमि से बेहद प्यार होता है और गाय उसके लिए श्रद्धा और पूजा की वस्तु होती है।

अपनी इसी मान्यता के कारण स्वयं को महतो कहल और द्वार पर गाय बांधने की अभिलाषा के कारण होरी आजीवन कष्ट पाता है – “खेती में जो मर्जाद है वह नौकरी में तो नहीं है” और किसान मजदूरी करना मर्यादा के विरुद्ध समझता है । इस प्रकार झूठी मर्यादा बनाये रखना किसान के संकट का मूल कारण है।

ग्रामीण संस्कृति परंपरावादी है । किसान कर्ज लेता है, एक वक्त खाना खाता है, पर मजदूरी नहीं करना चाहता । वह ब्राह्मण का ऋण न चुकाने पर कोढ़ी हो जाता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

वह पुलिस द्वारा घर की तलाशी को मर्यादा-भंग समझता है, अतः उससे बचने के लिए रिश्वत देता है और रिश्वत के लिए कर्ज लेने में संकोच नहीं करता। किसानों की सामान्य धारणा है कि बेटी के विवाह में खूब खर्च करना चाहिए।

कुश-कन्या विधि से बेटी का विवाह करना हेठी की बात समझी जाती है । सोना के ससुराल वाले बिना दान-दहेज लिये विवाह को तैयार हैं, पर धनिया दहेज देना आवश्यक बताती है ।

“हमें भी तो अपना मर्जाद का निबाह करना है….. कुल मर्जाद नहीं छोड़ा जाता ।” कृषकों की परंपरागत मान्यताओं में एक है बिरादरी में रहने का मोह । इसी मोह के कारण होरी पंचायत द्वारा लगाये गये दंड के सौ रुपये नकद और तीस मन अनाज चुकाता है ।

धर्म और ब्राह्मण का भय भी किसानों की दुरावस्था का एक कारण है । यद्यपि नयी पीढ़ी का गोबर इस मान्यता को ठोकर लगाना चाहता है, परंतु होरी पर धर्म का भूत सवार है ।

गो-हत्या के उपरांत प्रायश्चित रूप से हीरी को तीर्थ यात्रा करनी पड़ती है और भोज देना पड़ता है । अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ किसान मानता है कि कुछ लोगों की नज़र लगने पर, टोना-टोटका से व्यक्ति का अनिष्ट होता है ।

होरी सोचता है कि किसी की नज़र लगने से ही गाय का दूध सूख जाता है । गांव वाले सत्यासत्य का परख के लिए गंगाजल लेकर शपथ ग्रहण करते हैं ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

परदेश से लौटने पर बैना बांटा जाता है, सत्यनारायण की कथा सुनी जाती है । कथा के बाद आरती में पैसा न डालना मर्यादा के प्रतिकूल समझा जाता है ।

गांव के प्रचलित त्यौहारों और उत्सवों का यथार्थ वर्णन भी ‘गोदान’ में मिलता है। साल के हर महीने किसी उत्सव में ढोल-मंजीरा बजता रहता है ।

होली के एक महीने पहले से एक महीना बाद तक फाग उड़ती है, आषाढ़ लगते ही आल्हा शुरू हो जाता है और सावन-भादों में कजलियां होती हैं और फिर रामायण-गान होने लगता है ।

जहां तक सामाजिक जीवन का चित्र है, गांवों में सम्मिलित परिवार की परंपरा निभाने की चेष्टा तो हो रही है, परंतु धीरे-धीरे वे टूटते जा रहे हैं । होरी और उसके भाइयों का अलगौझा इसका संकेत है ।

सामाजिक समस्याओं में प्रेमचंद ने अनैतिक संबंधों, ऊंच-नीच की भावना, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, विधवा और दहेज की समस्याओं की ओर संकेत किया है । होरी की बेटी रूपा का विवाह दहेज न दे सकने के कारण ही वृद्ध रामसेवक से होता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

झुनिया विधवा है, अतः गोबर साहसपूर्वक झुनिया को घर ले तो आता है, महाकाव्यात्मक उपन्यास में एक से अधिक पीढ़ियों का वर्णन होता है ।

‘गोदान’ में भी दो पीढ़ियों-होरी-दातादीन की पीढ़ी गोबर-मातादीन/रायसाहब तथा उनके बेटों-बेटियों की पीढ़ी का चित्रण है और विशेषता यह है कि सभी पात्रों को लेखक की सहानुभूति प्राप्त है । इसका कारण है, प्रेमचन्द की मानवतावादी दृष्टि जो महाकाव्य के लिए आवश्यक बतायी गयी है ।

सारांश यह है कि महाकाव्य के लिए जिस विशाल पैमाने पर जीवन का चित्र प्रस्तुत करना अपेक्षित होता है, वह ‘गोदान’ में व्यापक चित्र फलक पर प्रस्तुत किया गया है ।

प्रेमचंद ने ‘गोदान’ द्वारा पात्रों की भीड़ भी प्रस्तुत की है और जिस ग्रामीण जीवन का चित्र प्रस्तुत किया है, उसमें विस्तार के साथ-साथ गहराई भी है ।

पात्रों के बाह्य और आंतरिक संघर्षों का चित्र मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अंकित किया गया है । युग-जीवन का सर्वांगीण चित्र प्रस्तुत करने की दृष्टि से भी यह उपन्यास महाकाव्य कहलाने का पूर्ण अधिकारी है ।

अतः ‘गोदान’ को ग्रामीण जीवन और कृषक संस्कृति का महाकाव्य कहना उचित ही है । डॉ० गोपालराय के शब्दों में “गोदान ग्रामीण समाज की भाग्यगाथा प्रस्तुत करने वाला अपूर्व महाकाव्य है, जिसमें कृषक समाज की अभाव और आंसुओं की दर्दभरी पुकार अभिव्यक्ति पाने में समर्थ हुई है

आचार्य नंददुलारे वाजपेयी भी ‘गोदान’ को भारतीय ग्रामीण जीवन तथा कृषकों की संघर्ष-गाथा कहते हैं । “गोदान का कथान ग्रामीण जीवन का कथानक है । उसका नायक एक ग्रामीण कृषक है ।

गोदान में भारतीय गांव के अनेकमुखी जीवन का दिग्दर्शन कराया गया है । भारतीय कृषकों के समस्त संस्कारों से युक्त उसकी वर्तमान दशा का चित्रण किया गया है ।

उपन्यास का उद्देश्य भारतीय ग्रामीण जीवन के विविध पक्षों को उपस्थित कर के ग्रामीण जीवन की स्थिति का उद्घाटन करना है ।” MHD 03 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 2. ‘धरती धन न अपना’ के आचंलिक पहलू को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-‘धरती धन न अपना’ का घटना-स्थल, परिवेश, रहन-सहन, रीति-रिवाज़, पर्व-उत्सव पंजाब के दोआबा के ग्रामीण अंचल के होशियारपुर जिले एक गाँव घोड़ेवाह का दलित मुहल्ला है । यह गांव काल्पनिक नहीं, वास्तविक है यह उनका पैतृक गाँव है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

अतः लेखक को इसके जीवन की, वहां के रहने वालों की दीन-हीन अवस्था, उनके शोषण-उत्पीड़न की पूरी जानकारी है । उसने इस दयनीय जीवन का बड़ी सहजता एवं सहानुभूति से चित्रण किया है।

गांव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पूरी जीवन्तता के साथ चित्रित किया गया है। उपन्यास की भाषा हिन्दी है, पर उसमें अंचल की भाषा की रंगत भी सहज ही दिखाई देती है ।

दलित मुहल्ला गांव के एक किनारे पर है, जहां सवर्ण जाति के लोगों ने उन्हें अछूत मानकर रहने को बाध्य किया है । वैसे भी ये लोग अनपढ़, पिछड़े, रूढ़ियों और धार्मिक अन्धविश्वासों में जबड़े हुए हैं ।

अतः इनकी अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समस्याएं हैं । अधिकार, सत्ता, संपत्ति और सुरक्षा से वंचित ये लोग इतने दबे, डरे, आतंकित हैं कि प्रतिरोध, विरोध करने का साहस भी इनमें नहीं है । अतः यह एक वर्ग है, जिसकी अपनी अलग पहचान है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

“धरती धन न अपना” के दोआबा क्षेत्र में होशियारपुर जिले का गाँव घोड़ेवाहा चित्रित हुआ है । होशियारपुर जिले की हद हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र से लगती है व होशियारपुर क्षेत्र पहाड़ी क्षेत्र की गोद में बसा है | इस क्षेत्र का “चो” विशिष्ट शब्द है, जो इसी क्षेत्र में प्रयुक्त होता है ।

“चो” एक प्रकार की पहाड़ नदी या नाला है, जिस रास्ते से ऊपर पहाड़ों से वर्षा का पानी आकर बहता है । कई बार “चो” सूखा रहता है, तो वहाँ बच्चों की खेल-कूद जैसी गतिविधियाँ चलती रहती हैं ।

अतः “चो” इस अंचल विशेष की विशिष्ट पहचान है और “धरती धन न अपना” में “चो” की बड़ी भूमिका है । “चो” से ही बाढ़ आती है और “चो” में ही बच्चे खेलते हैं ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

“धरती धन न अपना” में लेखक को अंचल विशेष के परिवेश चित्रण में पर्याप्त सफलता मिली है, इसीलिए कई आलोचकों ने “धरती धन न अपना” की गणना आंचलिक उपन्यासों में की है । उपन्यास के आरंभ से ही लेखक ने परिवेश चित्रण पर विशेष ध्यान दिया

भौगोलिक से सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश तक उसकी दृष्टि का विस्तार है । गाँव में दाखिल होते ही काली के नाक को गाँव की विशिष्ट गंध की पहचान मिलती हैं । उपन्यास का आरंभ काली के गाँव लौटने की घटना से होता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

लेकिन काली के गाँव की सीमा में दाखिल होने से लेकर उसके घर पहुँचने तक लेखक ने पूरे गाँव के भूगोल को और सामाजिक वातावरण को अंकित कर दिया है ।

पहले आता है चौधरियों का मुहल्ला, जिसमें हवेलियाँ हैं, फिर स्कूल आता हैं, जहाँ के मुंशी के लिए साग, गन्ने, गाजरें, मूलियाँ जाटों के लड़के लाते थे, लेकिन मुंशी के घर उन्हें कम्मियों के लड़के पहुँचाते थे।

फिर मंदिर और उसके चारों ओर दुकानदारों के चौबारे । उससे आगे हरिजन बस्ती है । जहाँ गोबर की तेज बदबू है, जिसका कुआं गंदे पानी और कीचड़ से घिरा है, इस गली में सारे घर कच्चे व टूटे-फूटे हैं।

पौ फटने पर काली गांव के पास पहुंचता है । गांव में छह सालों में कोई तब्दीली नहीं हुई है । गलियों के कुत्ते भौंक-भौंक कर काली का स्वागत करते हैं और घर पर चाची को जीवित पाकर काली प्रसन्नता से अभिभूत हो उठता है । काली की चाची काली के लौटने की सूचना पूरे मुहल्ले को शक्कर बाँट कर देती है ।

दलितों के मुहल्ले में एक कोठा भी अभी तक पक्का नहीं हुआ है । मुहल्ले की औरतें काली से हंसी-मजाक करती हैं । छह साल कानपुर में मजदूरी कर काली कुछ कमाई कर गांव लौटा है ।

इससे दलित होने पर भी गांव में उसके व्यक्तित्व का कुछ प्रभाव पड़ता है और | कुछ गाँववासी उसे बाबू कालीदास कहते हैं । ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

सारे उपन्यास का कार्यस्थल एक गांव है, और गांव में भी विशेषतः अछूत मोहल्ले की गलियां, कच्चे मकान, चौबारे, साईं भुल्लेशाह की मजार का तकिया (चौपाल) आदि ।

चौधरियों-महाजनों के मुहल्लों तथा खेतों तथा हवेलियों के लिए अपने-अपने दलित स्त्री-पुरुष (कमीन और कामी) पुश्तैनी से गुलाम तथा चाकर हैं | मालिक और गुलाम के बीच के ये संबंध अर्द्ध-दासीय तथा पूर्ण सामंती हैं ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

MHD 03 Free Assignment In Hindi
MHD 03 Free Assignment In Hindi

अछूत मोहल्ले में रहने वालों को प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रकोप भी सहना पड़ता है | बाढ़ के उफनते पानी में न केवल उनके कच्चे घर और फूस के झोंपड़े ही नष्ट होते हैं, उन्हें पानी पीने के भी लाले पड़ जाते हैं।

उनका कुंआ बाढ़ के पानी में डूब जाता है और सवर्ण जाति के लोग उन्हें अपने कुएं से पानी भरने नहीं देते ।।

आंचलिक उपन्यास में अंचल विशेष की लोक संस्कृति लोक गीत, लोकनृत्य, लोक कथाएँ उत्सव-पर्व, त्यौहारों के चित्रण पर बहुत बल दिया जाता है ।

‘धरती धन न अपना’ में लोक संस्कृति के विवरणात्मक चित्र तो नहीं हैं, पर उसकी झलक अवश्य मिलती है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

‘धरती धन न अपना’ में काली के गांव वापस आने पर प्रौढ़ नारियों द्वारा घोड़ियां-लोकगीत गाना तथा सुगन में शक्कर बांटना, प्रौढ़ औरतों (ताई निहाली, चाची प्रतापी, प्रीतो) के बीच अश्लील तथा भद्दा गाली-गलौज, चो-पार के बाजीगरों की जिंदगी, चो के मैदान में कब्बडी तथा कुश्ती, नंदसिंह के ईसाई बनने का आयोजन,

रब्बो घेबर द्वारा भूत-प्रेत झाड़ने-फूंकने का ढोंग-ढकोसला, ख्वाजा पीर को बकरे की बलि दिया जाना, मुहल्ले के हर व्यक्ति द्वारा ज्ञानो की अर्थी को कंधा दिया जाना आदि लोक-जीवन के स्थानीय रंगों को भरकर सनातन लोकचित्त की पहचान कराते हैं। MHD 03 Free Assignment In Hindi

गांव में पाठशाला तो है, पर वहाँ दलित बच्चों का प्रवेश निषिद्ध है अतः वे अशिक्षित रहते हैं और अशिक्षा के कारण पुरातन संस्कारों, अंधविश्वासों तथा रूढ़ियों में जकड़े हुए हैं ।

गाँव में एक भी ऐसा उदार मन व्यक्ति नजर नहीं आता, जो उनके प्रेम का प्रशंसक हो । मिस्त्री संता सिंह काली को ज्ञानो का यौ लूटने के लिए ही उकसाता है, उनके सच्चे प्रेम का वह प्रशंसक नहीं है।

धार्मिक पाखंड, आडम्बर, धर्म के नाम पर छूआछूत, शोषण भी इन दलितों के जीवन को नाटकीय बनाते हैं । इसी अस्पृश्यता के अपमान से परेशान होकर नंदसिंह पहले सिख और फिर ईसाई हो जाता है, पर धर्म-परिवर्तन करने पर भी उसकी स्थिति वही रहती है।

दलित मोहल्ले के लोगों के अपने रीति-रिवाज, रूढ़ियाँ तथा विश्वास हैं, जिनका पालन वे बड़ी निष्ठा से करते हैं और उसी में अपना गौरव मानते हैं । काली की चाची प्रतीपी उसे बिना दरों पर तेल चुपड़े घर में प्रवेश नहीं करने देती, भले ही उसकी शीशी में मुश्किल से तेल की एक बूंद ही हो ।

उसके बीमार होने पर काली जैसा समझदार जागरूक युवक भी ओझा के जाल में फंस जाता है ; वह झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ कर चाची के प्राण गंवा बैठता है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

कुछ वर्ष कानपुर में बिताने तथा छह वर्ष बाद गांव लौटने पर गांव के चौधरियों के अन्याय-अत्याचार, उत्पीड़न-शोषण देखकर उसमें नई चेतना अवश्य जागती है और वह दलितों को चौधरियों के विरुद्ध संघर्ष करने, बेगार न करने, दिहाड़ी पर काम करने की प्रेरणा देता है ।

परिणामतः संघर्ष होता है और उसके तथा उसका साथ देने वाले युवकों के प्रयासों से ही उन्हें आंशिक सफलता मिलती है । आधी दिहाड़ी पर काम करने का फैसला होता है ।।

उपन्यास की भाषा पर इस क्षेत्र की अपनी भाषा (पंजाबी का दोआबा रूप) की छाप अपनी पूरी शैली लिए हुए है । लेखक ने उपन्यास उर्दू प्रभावित हिंदी या हिंदुस्तानी जैसी हिंदी भाषा में रचा है। लेखक की इस भाषा-शैली में पंजाबी भाषा के “चो”, “शामलात” जैसे शबद आदि व पंजाबी मुहावरों के प्रयोग ने “धरती धन न अपना” के आंचलिक पहलू को और भी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

हालांकि कई स्थला पर पंजाबी मुहावरों का हिंदी रूपांतरण कुछ अटपटा-सा भी लगता है जैसे -चौधरियों से “माथा लेता है, “चोट नहीं खाएगा, तो और क्या होगा । शुक्र करे जान बच गई ।” पंजाबी में ये मुहावरा “पंगा लेना” तो है, लेकिन “माथा लेना” प्रयोग अटपटा है ।

‘धरती धन न अपना’ की भाषा में आंचलिकता वाला शैलीकरण नहीं है । इसमें न तो फोटोग्राफिक तफसीलें हैं ; न प्रतीकवादी ढंग की सच्चाइयाँ हैं; न पात्रों के थोपे हुए विवरण हैं ; बल्कि अपने इस समय में यथार्थ आवश्यकताओं के कारण समूहकरण तथा टाइपीकरण हैं |

धरती धन न अपना’ आंचलिक उपन्यास नहीं है । हां, उसमें आंचलिक उपन्यास के कुछ तत्त्वों की झलक अवश्य मिलती है । उपन्यास का घटना स्थल पंजाब के अंचल विशेष दोआबा के होशियारपुर जिला का गाँव है ।

दोआबा क्षेत्र देश के और हिस्सों में भी है, क्योंकि शाब्दिक अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र होता है ।

जहाँ-जहाँ देश में विशेषतः उत्तर भारत में दो नदियों के बीच का प्रदेश आबाद होगा, उसे दोआबा कहा जाता है । जैसे मालवा पंजाब का भी अंचल विशेष है और मध्य प्रदेश का भी । पंजाब का यह दोआबा क्षेत्र विभाजन पूर्व पंजाब में भी दोआबा ही कहलाता था ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

जिन समस्याओं – छूआछूत, सवर्ण, सम्पन्न लोगों द्वारा दलितों का उत्पीड़न-शोषण, पिछड़े लोगों के अंधविश्वास और रूढ़ियाँ जिनक कारण वे जीवनभर कष्ट झेलते हैं, नारी का शोषण, युवा प्रेम-प्रसंगों की असफलता, धर्म-परिवर्तन, ईसाई धर्म का प्रचार, जमीन का मौरूसी होना तथा जमीदारों द्वारा बेगार की समस्या, साम्यवादी विचारों का धीरे-धीरे गांवों में प्रसार आदि – ये होशियारपुर की ही समस्याएं और स्थितियां नहीं हैं, भारत के अन्य अनेक भूखंडों में भी ये उतने ही भयावह व क्रूर रूप में व्याप्त हैं।

दलित मुहल्ले के लोग भूमिहीन हैं और उन्हें सांस्कृतिक या सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से एक विशिष्ट वर्ग नहीं कहा जा सकता, जिसकी अपनी अलग से पहचान हो । MHD 03 Free Assignment In Hindi

घोड़ेवाहा कोई आदिम इलाका नहीं है। वहां की समाज-रचना कबीलाई समाज-रचना नहीं है ; वह केवल पिछड़ी हुई सामंतीय समाज-रचना है, जो अनेक प्रदेशों में पाई जाती है ।

दलित मोहल्ले में सांस्कृतिक सौन्दर्य तथा सांस्कृतिक पर्यों के स्थान पर ऐसे चित्र हैं, जो किसी भी सामाजिक उपन्यास में मिल जाते हैं और उन्हीं की तरह सामाजिक अन्यायों को उभारा गया है।

इसमें आंचलिक चित्रोपमता प्रमुख नहीं है । प्रमुख है मध्यकालीन सामंतीय मूल्यों के कारण जन-सामान्य की यातना का करुण चित्र । दलित जीवन की त्रासदी के अनेक पहलू ।

इस त्रासदी का विरेचन (Catharsis) न होकर अपोलो कैथार्सिस है अर्थात् इसमें भावुकता रहित व्यथा तथा तटस्थताविहीन संघर्षों का आंतकोल्लास छाया हुआ है।

‘धरती धन न अपना’ में उपन्यासकार जगदीशचन्द्र ने पंजाब राय के दोआबा क्षेत्र के दलितों के उत्पीड़न, शोषण, अपमान व वेदना को चित्रित किया है ।

उनकी दयनीय व हीन स्थिति के लिए जिम्मेदार भारतीय जाति व्यवस्था, हिंदू धर्म व्यवस्था और जन्म-कर्म सिद्ध के आधारभूत तथ्यों को भी उजागर किया है ।

जन्म के आधार पर अछूत करार दी गई जातियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृति. सरोकारों को इस उपन्यास के द्वारा एक विस्तृत पटल पर चित्रित करके भारतीय हिंदू धर्म मूल्य व नीति मूल्यों की आलोचना की है।

यह उपन्यास धरती के दुखियारों का सामाजिक दस्तावेज़ है, जिसे प्रेमचन्द की परम्परा की रचना कहा जा सकता है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

अन्तर इतना ही है कि प्रेमचन्द के उपन्यास दस्तावेज और दीपक होते थे और ‘धरती धन न अपना’ दस्तावेज और दर्पण है । इसे पढ़कर हमारे मन में ठंडी करुणा का ज्वार उमड़ने लगता है और यही कृति की सफलता का रहस्य है ।

प्रश्न 3. ‘मैला आंचल’ के सामाजिक संदर्भ पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-‘मैला आँचल’ आँचलिक उपन्यास होते हुए भी अंचल विशेष के समाज का समग्र चित्र प्रस्तुत करता है । इस दृष्टि से इसे सामाजिक उपन्यास भी कह सकते हैं ।

समाज की संरचना एवं सामाजिक सम्बन्ध :- मेरीगंज छोटा-सा गाँव है, परन्तु उसमें बारह वर्गों के लोग रहते हैं। प्रत्येक जाति का अपना मोहल्ला है, जिसे टोली कहते हैं । गाँव में तीन जातियां प्रमुख हैं – राजपूत, कायस्थ और यादव ।

जाति के नाम पर मुहल्लों के नाम रखे गये हैं जैसे कायस्थ टोली या मासिक टोली, राजपूत टोली, यादव टोली, ततया टोली, गुमर टोली । इन जातियों और उपजातियों से लोगों में परस्पर ईर्ष्या-द्वेष, वैमनस्य, मनमुटाव-झगड़े, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की मनोवृत्ति है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

ऊँच-नीच, छूआछूत की भावना इनमें दिलो-दिमाग पर इस कदर छायी हुई है कि गाँव वालों के बीच सौहार्द एवं सहयोग न होकर उनके बीच की दरारें बढ़ती जाती हैं ।

भंडारे के अवसर पर राजपूत टोली वाले के साथ ब्राह्मण टोली के लोग भोजन करने से मना कर देते हैं । उनके लिए अलग से प्रबंध किया जाता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

सिपैरिया टोली के लोग ग्वाला टोली के साथ एक पंगत में खाने से इंकार कर देते हैं । कुछ लोग धमकी देते हैं कि यदि भंडारे इन्तजाम बालदेव करेगा, तो भंडारा मंछुल होगा |

जाति-बिरादरी का दबदबा इतना अधिक है कि कोई भी व्यक्ति यदि बिरादरी की बात नहीं मानता है, तो उसे जाति-बहिष्कृत कर दिया जाता है । विरंची ने एक बार गवाही के बदले तहसीलदार द्वारा दी गयी जलेबी खा ली
थी, अफवाह उड़ी कि उसने तहसीलदार की झूठन खायी है ।

बस उसे सजा सुनाई गयी । लोगों ने कहा, जाति-बिरादरी का मामला है, इसमें वे कुछ नहीं बोल सकते ।

गाँव में जहालत तो है ही, पूरे गाँव में कुल दस लोग दस्तखत कर सकते हैं । आये दिन संक्रामक रोग – मलेरिया, काला आजार आदि के कारण लोग परेशान रहते हैं । गरीबी इतनी है कि बहुत-से लोगों ने दही-चीनी, जलेबी-पूड़ी चखी तक नहीं है ।

यदि विद्यापति के इस योग में प्रेम की मदिरा पिये हुए लोगों के बीच विवाहेतर सम्बन्धों को न अनैतिक पाया जाता है, न उन पर कोई विशेष ध्यान देता है ।

महंत सेवादास भाट मठ की कोठारिन लवली बालीचरण और चरखा सेन्टर की मास्टरनी मंगलादेवी, पुलिया और खलासी, रामदास और रामपियारी बालदेव और लक्ष्मी, कमला और प्रशान्त के सम्बन्ध विवाहेतर सम्बन्ध हैं | कमला तो विवाह से पूर्व ही गर्भवती हो जाती है, पर गाँव में कोई तूफान नहीं आता ।

यहाँ के समाज में स्त्री की दशा सदा की तरह शोचनीय और दयनीय है । उसका यौन-शोषण भी होता है और आर्थिक शोषण भी। अंधा और बूढ़ा महंत सेवादास अबोध किशोरी लक्ष्मी का यौन शोषण करता है और फुलिया के माँ-बाप अपनी विधवा बेटी का पुनर्विवाह इसलिये नहीं करते, क्योंकि उसका शरीर नोचकर प्राप्त धन से ही उनकी गृहस्थ की गाड़ी चलती है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

छोटी-छोटी बातों को लेकर औरतों में कहा-सुनी, गाली-गलौज आम बात है । रमजूदास की स्त्री और फुलिया की माँ के बीच का झगड़ा इस प्रकार के झगड़ों का स्वरूप बताता है।

अंचल निवासियों की आधिदैविक चेतना :- आंचलिक उपन्यास में अनपढ़, अज्ञानी, अंधविश्वासी लोगों का चित्रण होता है । अतः लेखक अंचल में व्याप्त अंधविश्वासों, रूढ़ियों, शगुन-अपशगुन, जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि में विश्वास के चित्र भी प्रस्तुत करता है ।

मेरीगंज के लोग देवी-देवताओं के कोप एवं कृपा में विश्वास करते हैं । प्रातःकाल वे कालीथान की ओर मुंह कर काली माँ को प्रणाम करते हैं । उनका विश्वास है कि जंगल में भूत-प्रेत रहते हैं । ततया टोली का नन्दलाल एक बार जंगल में गया था ।

वहाँ बगुले की तरह सफेद प्रेतनी ने मिलकर साँप के कोड़ों से उसकी इतनी पिटाई की कि वह कुछ क्षणों में ही वहीं ढेर हो गया । जहालत और अंधविश्वासों के कारण ही बुढ़ापे भी सुन्दर लगने वाली तथा सबके प्रति स्नेह लुटाने वाली पारवती मौसी को डाइन मानकर उसमें साथ क्रूर और अपमानजनक व्यवहार कि जाता है।

वे नदियों को माँ कहते हैं, क्योंकि वे उनके खेतों के लिए जल तो देती हैं, आवश्यकता पड़ने पर नदी की पूजा-अर्चना करने वालों की अनेक प्रकार से सहायता करती हैं। यदि गृह-स्वामी नदी में स्नान करता है, गले में कपड़े का खूट डालकर कमला मैया को पान-सुपारी चढ़ाता है, तो कमला मैया चांदी के बरतन देकर गृह-स्वामी के अनुष्ठान में, शादी-ब्याह या श्राद्ध के योग में सहायता करती हैं ।

अंधविश्वासी खलाजी का विश्वास है कि डॉक्टर लोग रोग फैलाते हैं । सुईं घोंपकर देह में जहर दे देते हैं, उनके द्वारा कुओं में दवा डालने से और उस पानी पीने वालों को हैजे के प्रकोप का शिकार बनना पड़ता है – गाँव का गाँव हैजे से समाप्त हो जाता है।MHD 03 Free Assignment In Hindi

काला आजार फैलने का कारण भी वह डॉक्टरों को बताते हैं और आरोप लगाते हैं कि विलायती दवाओं में गाय का खून मिलाकर उन्हें धर्मभ्रष्ट करते हैं ।

धार्मिक वातावरण – मेरीगंज का यह धार्मिक स्थल तो है ही, उसमें सम्पत्ति का आकर्षण भी है । डेरे का महंत नौ सौ बीघे की जमीन का मालिक भी हो जाता है ।

अतः यह सम्पत्ति का क्रीड़ा-स्थल और विकृतियों की पूर्ति का माध्यम बन गया है । मेरीगंज के लोग गाँव में स्थापित मट तथा उसमें अधिपति महंत में पूरी श्रद्धा रखते हैं । महंत द्वारा आयोजित विभिन्न अनुष्ठानों में भाग लेते हैं ।

कबीर पंथी मठ होने वाले धार्मिक क्रिया-कलाप के चित्र-प्रातःकाल प्रातमक शबद-गायन खंजड़ी बजाकर कीर्तन, प्रातकी के बाद सत्संग होता है, जिसमें मट के सब लोगों का भाग लेना अनिवार्य है । सत्संग में महंत जी उपस्थित लोगों को उपदेश देते हैं, उनके प्रश्नों के उत्तर देते हैं ।

राजनीतिक चेतना – मेरीगंज में सभी राजनीतिक दल सक्रिय हैं | बावनदास और बालदेव कांग्रेसी है, गांधीजी के भक्त हैं, कालीचरण समाजवादी है, समाजवादी विचारों से विद्रोह की भावना जगाता है, अन्याय-अत्याचार का विरोध करता है, नवयुवकों को क्रांति करने का आह्वा देता है ।

उसी के प्रयत्नों से मठ में नागाबाबा का समर्थन प्राप्त प्रत्याशी नरसिंह दास मठाधीश न होकर रामराज मठ का महंत बनता उसी के प्रयत्नों से खलाजी और फुलिया का चुभौना कराया जाता है ।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं की चहल-पहल का भी वर्णन है । चुनावों, उनको जीतने के लिए अपनाये गए हथकंडों और चुनाव जीतने के बाद एम.एल.ए. बने राजनेताओं के कुकर्मों का पर्दाफाश किया गया है ।

प्रश्न 4. ‘बाणभट्ट’ की आत्मकथा में अभिव्यक्त नारी चेतना को रेखांकित कीजिए।

उत्तर-सम्राट हर्षवर्धन के काल (छठी-सातवीं शताब्दी) के समय में नारी के प्रति दृष्टि सामन्तीय थी । ‘मनुस्मृति’ नारी को पुरुष की अनुगामिनी तथा आज्ञाकारिणी बताता है । नारी की स्वतंत्रता को अमंगलकारी कहता है ।

सामन्तीय दृष्टि में नारी पुरुष की भोग्या, दासी एवं सन्तान का पालन-पोषण करने वाली परिचारिका है ।

वह पण्यवस्तु (Commodity) है, जिसकी बाज़ार में खरीद-फरोख्त होती है, जिसका अपहरण कर उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध बन्दी बनाकर रखा जा सकता है और जिसके शरीर को कामना-वासना की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

उसे अपना जीवनसाथी चुनने का कोई अधिकार नहीं है । प्रतापी सम्राट् तुवुरमिलिन्द की बेटी राजकुमारी मोहिनी का अपहरण कर उसे छोटे राजकुल के अन्तःपुर में बन्दिनी बनाकर रखा जाता है और बहला-फुसलाकर मौखरि सामन्त की अंकशायिनी बनने के लिए बाध्य किया जाता है ।

महामाया कहती है- मैं तुम्हारे देश की लाख-लाख अवमानित, लांछित और अकारण दंडित बेटियों में से एक हूं।

भट्टिनी कहती है, …. मेरा कौन-सा ऐसा पाप-चरित्र है, जिसके कारण मैं निदारुण दुःख की भट्टी में आजीवन जलती रही । क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की गड़ नहीं है ?

निपुणिका बाल-विधवा है, सुचरिता का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध कर दिया है, मदनश्री और अस्मिता वेश्याएँ हैं । सभी सतायी हुई, पीड़ित तथा पुरुष प्रधान समाज द्वारा उत्पीड़िता हैं ।

वर्तमान भारत में नारी की स्थिति इतनी दयनीय तो नहीं है, परन्तु आज भी उसका शोषण-उत्पीड़न होता है । आज भी समाज उसे दासी, काम-पूर्ति का साधन, भाग्या समझता है । मैथिलीशरण गुप्त करुणा-द्रवित होकर लिखती है

        अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
        आँचल में है दूध और आँखों में पानी

हजारीप्रसाद द्विवेदी भी अपने समय की नारी की इस दयनीय स्थिति से क्षुब्ध थे । अतः इस उपन्यास में उन्होंने भट्टिनी, निपुणिका महामाया और सुचरिता द्वारा नारी की महिमा, उसकी शक्ति, उसकी तेजस्विता तथा उसके हृदय की कोमलता एवं चरित्र की उदात्तता उजागर किया है ।

बाणभट्ट के रूप में वह नारी-शरीर को देवता का मन्दिर मानते हैं । बाणभट्ट का निउनिया तथा भट्टिनी के प्रति व्यवहार, आचरण इसी विचार पर टिका है कि नारी का शरीर देवता का मन्दिर है, स्त्री भाग्या या काम-पूर्ति का साधन मात्र नहीं है तथा महामाया के शब्दों में उसे शक्ति-स्वरूपा तथा उत्सर्गमयी बताते हैं ।

इन नारी पात्रों का चरित्र, आचरण तथा तेज देखकर एक ओर जयशंकर प्रसाद की पंक्ति याद आती है -नारी तुम केवल श्रद्धा हो।MHD 03 Free Assignment In Hindi

तथा दूसरी ओर वराहमिटिर का यह कथन कि स्त्रियां ही रत्नों को भूषित करती हैं, रत्न स्त्रियों को क्या भूषित करेंगे ? ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में नारी के तीन रूप प्रमुख हैं-प्रेमिका का रूप संन्यासिनी का रूप और धर्मपत्नी का रूप द्विवेदी जी ने नारी के गुणों का गुणगान किया है ।

‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में निपुणिका और भट्टिनी दोनों ही प्रेमिका रूप में वर्णित की गई हैं । निपुणिका बाण को अपनी पूर्ण शक्ति से प्रेम करती है आरम्भ में इसका प्रेम दैहिक होता है, जिसमें वासना का भाव अधिक और त्याग का भाव कम हैं ।

जब बाण की ओर से उसे कोई उचित प्रतिदान नहीं मिलता, तो वह निराश होकर एक रात को सहसा भाग जाती है । इसके बाद उसे अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ता है ।

ये संघर्ष उसके चित्त के कालुष्य को धोकर उसे निर्मल बना देते हैं और इसका दैहिक प्रेम भक्ति-भाव में परिणत हो जाता है । यह भक्ति-भाव इसके जीवन का सबसे प्रबल सबल बन जाता है |

निपुणिका अपने जीवन में जिन दुष्कर कार्यों का सम्पादन करती है, वे उसकी प्रत्युत्पन्नमति और साहस के परिचायक है ।

भट्टिनी छोटे राजकुल के अन्तःपुर में से निकालकर ले जाना, संभवतः उस समय का सबसे विकट कार्य था । निपुणिका भी इस विकटता से पूर्णतया अवगत थी और यह कार्य उसने अपने अपूर्व साहस, धैर्य एवं समझबूझ के साथ किया ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

भट्टिनी का भी प्रेमिका-रूप उसी आदर्श के साथ चित्रित हुआ है, जिसके साथ निपुणिका का । भट्टिनी पूरी तरह से बाण के प्रति निपुणिका के आकर्षण को जानती है, फिर भी उसे निपुणिका से कोई शिकायत नहीं है ।

जब भी अवसर आया है, उसने बाण और निपुणिका के प्रेम में साधक बनने की ही कोशिश की है । जब बाण स्थाण्वीश्वर को जाने लगता है, तो एकांत पाकर निपुणिका उसके पैरों से चिपट जाती है ।

बाण उसे छुड़ाने का प्रयत्न करता है । इमने में ही भट्टिनी वहाँ आ जाती है और बाण से कहती है कि इसे पैरों में ही पड़ी रहने दो, क्योंकि इन पैरों के स्पर्श से इसे असीम आनन्द मिलता है और यह अपनी वेदना को भूल जाती है । इससे अधिक आदर्श और त्यागमयी प्रेमिका कौन हो सकती है ।

धर्मपत्नी का रूप-धर्मपत्नी के रूप में सुचरिता का अंकन किया गया है । वह एक ऐसे पुरुष की पत्नी है, जो उसे असहाय छोड़ संन्यास का मार्ग ग्रहण कर लेता है ।

सुचरिता को अपने पति का अभाव बहुत खलता है । सुचरिता अपने पति के साथ हर अवस्था में रहना स्वीकार कर लेती है और उसके तप में बाधक न बनकर साधक ही बनती है ।

वह अपने जीवन की समस्त मधुर आकांक्षाओं को, सुनहले स्वप्नों को और यौवन की मृदुल भावनाओं को अपने पति की सफलता के लिए तिलांजलि दे देती है । अपने पति की पूजा को वह अपना अपरिहार्य अधिकार समझती हैं ।

सुचरिता के इन्हीं गुणों से रीझकर बाण कहता है :

'तुम सार्थक हो देवी ! तुम्हारा शरीर और मन सार्थक है । तुमको प्रणाम करके भवसागर में निर्लक्ष्य बहने वाले अकर्मा जीव भी सार्थक होंगे । तुम सतीत्व की मार्यादा हो,     पतिव्रत्य की काष्ठा हो, स्त्र धर्म का अलंकार हो।'

इस प्रकार उपन्यासकार ने सुचरिता के चरित्र में जब सभी विशेषताओं का समावेश कर दिया है, जो एक आदर्श धर्मपत्नी के लिए अपेक्षित हैMHD 03 Free Assignment In Hindi

तेजस्वी, विद्रोहिणी एवं प्रेरणादात्री का स्वरूप-महामाया के रूप में लेखक ने नारी का तेजस्वी रूप प्रस्तुत किया है। महामाया सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में उथल-पुथल मचा देने में समर्थ है ।

वह अपने लम्बे भाषण से जनता में विद्रोह की ज्वाला धधका देती है- मैं महाराष्टि राज से प्रार्थना करने के निर्णय का विरोध करती हूं ।

मैं संन्यासिनी हूं मैंने स्वेच्छा से दुःख और क्लेश का मार्ग स्वीकार किया है मृत्यु से नहीं डरती आप मेरी गर्दन उड़ा सकते हैं ; परन्तु सत्य कहने से मुझे नहीं रोक सकते ।

आचार्य भार्वपाद के पत्र के पौरुषहीनता । का आपने विचार किया होता, तो ऐसा निर्णय नहीं करते ? वह पौरुषहीनता का नग्न प्रचारक है । वह पत्र आर्यावर्त की भावी पराजय का अग्रदूत है ।

आपका निर्णय उसी मनोवृत्ति का पोषक है। आप कहते हैं कि उत्तरापथ के ब्राह्मण और श्रमण वृद्ध और बालक, बेटियाँ और बहुएँ किसी प्रचण्ड नरपतिशक्ति की छाया पाये बिना नहीं बच सकतीं ।

आर्य सभासदों, उत्तरापथ के लाख-लाख नौजवानों ने क्या कंकण वलय धारण किया है ? क्या वे वृद्धों और बालकों, बेटियों और बहुओं, देवमन्दिरों और विहारों की रक्षा के लिए अपने प्राण नहीं दे सकते?

स्पष्ट है कि द्विवेदी जी नारी को अबला न मानकर शक्तिस्वरूपा मानते हैं उनकी दृष्टि में नारी स्वभावतः कुसुम से भी कोमल है, परन्तु अवसर पड़ने पर वज्र से भी अधिक कठोर बन जाती है ।

उसमें जीवन की कठिन-से-कठिन साधना से भी जूझ जाने की शक्ति होती है । विघ्नों से संघर्ष करने की उसमें जन्मजात शक्ति होती है । बल्कि कहना चाहिए कि विघ्न ही उसका वास्तविक रूप है और विघ्न ही उसकी साधना है । महामाया भट्टिनी से कहती है MHD 03 Free Assignment In Hindi

‘ना-रे-ना, मैं विघ्नों की पूजा का ही तो तप कर रही हूं । विघ्न ही तो मेरे उपास्य हैं । तेरे शास्त्र के अनुसार तू भी एक विघ्न ही है । विधाता ने तो विघ्न के रूप में ही तो सुन्दरियों की सृष्टि की थी । क्यों रे, तू अपने को किसी का विष्न नहीं समझती ?’ .

नर और नारी दोनों मिलकर एक पूर्ण जीवन बनते हैं । केवल नर अथवा नारी किसी भी तप में पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते

‘हाँ बेटी, नारी-हीन तपस्या संसार की यही भूल है। यह कर्म-धर्म का विशाल आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-व्यवस्थापन सब फेन बुदबुद की भाँति विलुप्त हो जायेंगे, क्योंकि नारी का इनमें सहयोग नहीं है । यह सारा ठाट-बाट संसार में केवल अशांति पैदा करेगा।’

भैरवी गैरिकधारिणी भैरवियों का दल संगठित कर, समस्त देश में घूम-घूम कर, युवा शक्ति को जगाती है । यह उपन्यासकार का नारी शक्ति को आह्वान भी माना जा सकता है

‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में चार नारी पात्र प्रमुख हैं-भट्टिनी, निउनिया, महामाया और सुचरिता । भट्टिनी का प्रेम तो उदात्त है ही, वह चाहती है कि सम्पूर्ण जगत् में स्नेह, भाईचारा, सौहार्द्र के भाव व्याप्त हों, भेद भाव दूर हों । म्लेच्छ कही जाने वाली जातियों को भी समझा-बुझाकर उनको जगाकर कलह-क्लेश दूर किया जाय ।

दूसरी ओर महामाया बर्बरता, दुराचार, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाती है । भट्टिनी यदि हृदय परिवर्तन द्वारा संसार को सुखमय बनाने का संदेश देती है, तो महामाया विद्रोह और क्रान्ति द्वारा त्याग एवं प्रेम की प्रतिमूर्ति है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

वह दलित द्राक्षा की तरह निचुड़ कर दूसरों की तृषा दूर करने में विश्वास करती है । तीनों अपने-अपने ढंग से पुरुष की सुप्त चेतना को संपादित करती हैं, वे पुरुष को प्रेरणा देती हैं । सुचरिता सती-साध्वी पति की अनुगामिनी धर्मपत्नी तो है ही वह अपने गंभीर धार्मिक विचारों से अपना वैदूष्य भी सिद्ध करती है।

लेखक ने स्त्री के प्रति प्रति सामंतीय दृष्टि के स्थान पर मानवीय दृष्टि के स्थान पर मानवीय दृष्टि का संधान किया है

सारांश यह है कि द्विवेदी जी ने ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में नारी महिमा की जो प्रतिमा गढ़ी है, वह अनूठी है । उपन्यास में सर्वत्र नारी जाति के प्रति सम्मान का भाव है ।

MHD 03 Free Assignment In Hindi
MHD 03 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 5. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए

(क) ‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी का महत्व

उत्तर-प्रेमचन्द हिन्दी के प्रथम कथा लेखक हैं जिन्होंने दलितों, अछूत कही जाने वाली जाति की समस्याओं पर गहराई से विचार कर उनके जीवन की त्रासदी का मार्मिक चित्रण किया है ।

उपन्यासों में ‘कर्मभूमि’ तथा कहानियों के ‘सद्गति’, ‘दूध का दाम’, ‘कफन’ और ‘ठाकुर का कुआं’ में दलित समाज के उत्पीड़न, शोषण, अपमान, तिरस्कार तथा गरीबी के कारण उनकी दीन-हीन स्थिति के चित्र प्रस्तुत किये हैं।

‘ठाकुर का कुआँ’ में उन्होंने बताया है कि जाति-प्रथा, ऊँच-नीच के भेदभाव, छूआछूत के कारण अछूत कैसा नारकीय जीवन जी रहे हैं। MHD 03 Free Assignment In Hindi

प्रेमचन्द इस कटु सत्य को उजागर करते हैं कि जीवन की बुनियादी जरूरत और प्राकृतिक सम्पदा जल तक के लिए वे सवर्णों की दया पर निर्भर हैं और सवर्ण इतने हृदयहीन तथा अमानवीय हैं कि वे उन्हें इस प्राकृतिक सम्पदा, जो ईश्वर ने वायु की तरह सबको निःशुल्क दी है, से भी वंचित रखते हैं, फलतः अछूत परिवार को अभाव, अपमान और भयग्रस्त और असुरक्षा का जीवन बिताना पड़ता है ।

परिवार में दो सदस्य हैं – पति जोखू तथा पत्नी गंगी । अछूतों के लिए गाँव की बस्ती से दूर कुएँ का पानी किसी जानवर की .. गिरने से बदबूदार तथा अपेय बन जाता है ।

रोगी और दुर्बल शरीर जोखू से वह बदबूदार पानी नहीं पिया जाता | अतः गंगी उसके लिए गांव में ठाकुर के कुएँ से पानी लाने का प्रस्ताव करती है ।

गंगी के सोच, साहस, प्रयास और अन्त में भयाक्रान्त होकर कुएं से भागने और घर लौटकर पति को दुर्गन्धपूर्ण पानी पीते देखने से कथानक का निर्माण होता है ।

कहानी पानी की समस्या को लेकर गहन चिन्ता में डूबे अछूत पति-पत्नी जोखू और गंगी को लेकर शुरू होती है । जोखू और गंगी स्वच्छ पानी की समस्या से जूझ रहे हैं ।

‘जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आयी । “जोखू बोला – यह कैसा पानी है, मारे बास के पिया नहीं जाता ।” लम्बे समय से बीमार जोखू प्यास के मारे तड़प रहा था।

गंगी प्रतिदिन शाम को पानी भर लिया करती थी। कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । वह अन्य गरीब सवर्ण महिलाओं के कुएँ से पानी नहीं भर सकती। अछूतों को सवर्णों के कुएँ पर चढ़ने का अधिकार ही नहीं था ।

जब गंगी ठाकुर के कुएं से पानी लाने की बात कहती है, तो जोखू उसे बरजता है

“ठाकुर के कुएँ पर कौन चढ़ने देगा दूर से लोग डॉट बताएँगे । ‘साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहाँ भी कौन पानी भरने देगा ? और कोई कुआं गाँव में है नहीं ।’

जोखू के इस बयान से यह साफ पता चलता है कि अछूतों की आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे अपने लिए कुआं खुदवा सकें, मजबूरन सवर्णों के आगे पानी के लिए गिड़गिड़ाने के सिवाए उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है ।

गंगी बोली- ‘यह पानी कैसे पियोगे ? न जाने कौन जानवर मरा है । कुएँ से मैं साफ पानी लाये देती हूँ ।’ जोखू बहुत आश्चर्य में पड़ गया, लेकिन दूसरा पानी कहां से आएगा’ गंगी कहती है “दो-दो कुएँ हैं, एक लोटा पानी न भरने देंगे ।” जोखू ने उस सामान्य यथार्थ की ओर संकेत किया, जिस पर सबसे पहले प्रेमचंद की नजर पड़ती थी।

हाथ-पांव तुड़वा आयेगी और कुछ न होगा बैठ चुपके से ऐसा क्यों होगा ? क्योंकि ‘ब्राह्मण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाती मारेंगे और साहुजी एक के पांच करने में लगे रहेंगे ।

गरीबों का दर्द कौन समझता है ? दर्द छोड़ें यहाँ तो मर भी जाएं तो दुआर पर झांकने तक नहीं आता। कंधा देना तो बड़ी बात है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

प्रश्न उठता है कि सवर्ण जातियाँ अछूतों के प्रति इस हद तक असंवेदनशील क्यों ह, उनके दुःख में शामिल होने, उनकी गरीबी को हटाने या उनकी मृत्यु पर भी कोई क्यों नहीं साथ आता ? प्रेमचंद ने जोखू व गंगी के द्वारा इन प्रश्नों को पहली बार रचना के माध्यम से उठाकर अछूत जीवन की वास्तविकता से परिचित कराया है ।

पति के द्वारा सावधान किये जाने तथा दंड दिये जाने की चेतावनी के बावजूद गंगी ठाकुर के कुएँ से पानी भरने चल पड़ती है। गंगी जानती है कि उसे किसी ने देख लिया, तो उसका बचना मुश्किल है ।

एक घड़ा पानी की कीमत जान गंवाकर चुकानी पड़ सकती है। उस स्थिति की कोई सवर्ण स्त्री क्या कल्पना कर सकती है ? कि पानी जो जीवन की जरूरत है, उसके लिए अछूतों को इस कदर बेबसी का सामना क्यों करना पड़े ? गंगी अभी कुएँ के पास तक भी नहीं पहुंची थी, पेड़ों की आड़ में छुपकर वह ठाकुर का आंगन खाली हो जाने का इंतजार करने लगी ।

कुछ देर बाद गंगी पेड़ की छाया से निकली और कुएँ के जगत के पास आयी, बेफिक्रे चले गये थे । ठाकुर भी दरवाजा बंद करके अंदर आंगन में सोने जा रहे थे ।

गंगी ने सुख की सांस ली किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। गंगी को इतनी सावधानी की जरूरत इसलिए पड़ रही थी क्योंकि अछूत स्त्री ठाकुर या किसी सवर्ण के कुएँ पर चढ़कर पानी भरने का साहस कर रही थी।

किसी अछूत द्वारा नियम को तोड़ने पर हिन्दू धर्म में इस अपराध के लिए बड़ी सख्त सजा का प्रावधान है।

‘उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाएं-बाएँ चौकन्नी दृष्टि से देखा, जैसे कोई सिपाही रात को शु के किले में सूराख कर रहा हो । अंत में देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुएँ में डाल दिया ।

घड़े को पानी में डालकर उसने बहुत ही आहिस्ते से उसे ऊपर खींचा, जिससे कोई आवाज न हो और ठाकुर या अन्य कोई घर सदस्य जाग न जाए । गंगी के इस संकल्प और मनोभाव को प्रेमचंद इन शब्दों में अभिव्यक्त करते है, ‘घड़े ने पानी में गोता लगाया ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

गंगी द्वारा ली गई सावधानी, दिखाई गई तेजी और दृढ़ संकल्प का नतीजा कुछ नहीं निकला । ज्योंही ‘गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखे कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । प्रेमचंद ने लिखा है ‘शेर का मुंह इससे अधिक भयानक न होगा।’

कहानी के अन्त में स्पष्ट है कि दलितों की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उन्हें सवर्णों के अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न सहने पड़ते हैं | इस सामाजिक व्यवस्था की सच्चाई को प्रेमचंद ने नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया है ।

उनका उद्देश्य यही है कि गंगी के शोषण की तीव्रता को पाठक वर्ग समझ सकें । गंगी अस्पृश्य वर्ग की स्त्री है और उसका कुएँ को छूना भयंकर अपराध में शामिल है।

गंगी अपमानबोध, असुरक्षितता, अनिश्चितता, जातिगत उत्पीड़न की शिकार है, उसके मानवीय अधिकारों का हनन हो रहा है, क्योंकि वह अछूत है।

(ख) ‘पाजेब’ कहानी की भाषा।

उत्तर-‘पाजेब’ एक चरित्रप्रधान कहानी है, जिसमें लम्बी-चौड़ी घटनाएँ नहीं घटतीं । घर में पाजेब का खो जाना और खोने को चोरी समझ लेना एक मामूली घटना है ।

इसलिए इस कहानी का कहानीपन घटना के वर्णन में निहित नहीं है, बल्कि बालक पात्रों के चरित्र-चित्रण द्वारा बाल-मनोविज्ञान की कुशल अभिव्यंजना में निहित है । चरित्रप्रधान कहानी की सफलता पात्रों के कुशल चरित्रांकन पर अवलम्बित है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

जैनेन्द्र की इस कहानी के पात्रों के अनुकूल, अवसर के अनुकूल संवाद भी लेखक की कहानीकला के वैशिष्ट्रय हैं प्रायः संवाद लम्बे नहीं हैं। कहीं-कहीं एक-दो शब्दों से, ‘हाँ’ या ‘ना’ से और कभी मौन से काम चलाया गया है ।

आशुतोष और उसके पिता के बीच हुए संवाद ऐसे ही हैं । आशुतोष की माँ और छुन्नू की माँ के बीच हुए संवाद दोनों की संकीर्ण सोच को स्पष्ट करते हैं । वे पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं के द्योतक हैं ।

आशुतोष और उसके पिता के बीच हुई बातचीत देखिए । जब पिता को पत्नी बताती है कि आशुतोष ने छुन्नू को पाजेब दी थी और उसने उसे पतंग वाले को बेच दिया, तो वह पूछते हैं कि पतंगवाले ने कितनी इकन्नियां दी थी, तो वह कुछ नहीं बोलता, पिता क्रोध आता है –

         बोलते क्यों नहीं?
         वह नहीं बोला । 
        सुनते हो ! बोलते नहीं तो ..... 

आशुतोष डर गया और कुछ नहीं बोला । इस पर पिता ने उसके कान खींचे । तब भी वह बिना आंसू बहाये गुमसुम खड़ा रहा । अब भी नहीं बोले, तो ?

वह डर के मारे पीला हो गया, लेकिन बोला नहीं, इस प्रसंग से स्पष्ट है कि जैनेन्द्र गहरी से गहरी बात को सरल शब्दों, छोटे-छोटे वाक्यों और संक्षिप्त संवादों के माध्यम से कह देते हैं ।

कथोपकथन की दृष्टि से ‘पाज़ेब’ सजीव रचना है । कहानी के संवाद स्वाभाविक, सशक्त, रोचक, नाटकीय, संक्षिप्त तथा पात्रानुकूल हैं एक अन्य उदाहरण देखिए,

“पतंग वाले से पैसे छुन्नू के लिए हैं न?”MHD 03 Free Assignment In Hindi
“तुमने क्यों नहीं लिए – ” वह चुप । “पाँचों इकन्नी थीं – या दुअन्नी और पैसे भी थे ?”
वह चुप – “बतलाते क्यों नहीं हो-” “इकन्नियाँ कितनी थीं, बोलो ?” “दो ।”

जैनेन्द्र की कहानियों की भाषा, विशेषतः ‘पाजेब’ की भाषा को देखें, तो कहना होगा कि गहरी से गहरी बात को सरल शब्दों, छोटे-छोटे वाक्यों, संक्षिप्त संवादों और शहर के मध्यमवर्ग की बोलचाल की भाषा में कह देने की कला में वे माहिर हैं |

उनकी बोधगम्य पैनी भाषा पाठकों के मन में उतरती जाती है । उनकी भाषा के पीछे उनकी दार्शनिकता, उनका अध्ययन और जीवन-जगत का व्यापक अनुभव बोलता है ।

इसलिए उनकी भाषा प्रायः विशेष अर्थगर्भित हो गई है, जो मुख्यार्थ का अतिक्रमण कर अन्य अर्थध्वनियों की ओर अग्रसर होने लगती है

‘पाजेब’ कहानी द्वारा लेखक माता-पिता तथा अभिभावकों को सन्देश भी देते हैं-

कहानी पढ़कर यह मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने आता है कि बच्चे प्रायः सच बोलते हैं, पर किसी दबाव या लालच के कारण वे झूठ का सहारा लेने पर विवश होते हैं । झूट बोलना उन की विवशता हो सकती है, स्वभाव नहीं ।

रास्ते से भाग आने के बाद आशुतोष को कोठरी में बंद कर दिया गया, जहाँ उसने मुक्ति की सांस ली और सो गया । पिता ने जब उसे एक रुपया देकर ललचाया, तो वह पतंग वाले के पास जाने को तैयार हुआ ।

इस प्रकार पिता द्वारा की गई सख्ती काम नहीं आई एक रुपए का लालच उसे पतंग वाले के पास जाने के लिए तैयार कर गया । इससे स्पष्ट होता है कि सख्त व्यवहार अथवा मारपीट से जिद्दी हो जाते हैं, प्यार-दुलार या लालच से उन्हें वांछित दिशा की ओर मोड़ा जा सकता है। वह बताते हैं कि माता-पिता को बालकों का मनोविज्ञान समझकर कोमल व्यवहार करना चाहिए ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

(ग) ‘तिरिछ’ कहानी का विकास।

उत्तर-‘तिरिछ’ कहानी का आधार है एक लोक-प्रचलित विश्वास । इस विश्वास के अनुसार तिरिछ एक ऐसा विषैला जन्तु है, जिसके काटने से मनुष्य की मृत्यु अवश्यंभावी है ।

लोकमानस में तिरिछ को लेकर कई विश्वास प्रचलित हैं एक तो यह कि जैसे ही वह आदमी को काटता है, वैसे ही वह वहाँ से भागकर किसी जगह पेशाब करता है और उस पेशाब में लोट जाता है ।

अगर तिरिछ ने ऐसा कर लिया, तो आदमी बच नहीं सकता । अगर उसे बचना है, तो तिरिछ के पेशाब में लोटने के पहले ही खुद किसी नदी, कुएँ या तालाब में डुबकी लगा लेनी चाहिए या एक तिरिछ के ऐसा करने से पहले ही उसे मार देना चाहिए ।’ ..

‘दूसरी बात यह है कि तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है, जब उससे नजर टकरा जाए । अगर तिरिछ को देखो, तो उससे कभी आँख मत मिलाओ ।

आँखें मिलते ही वह आदमी की गंध पहचान लेता है और फिर पीछे लग जाता है । फिर तो आदमी चाहे पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा ले, तिरिछ पीछे-पीछे आता है ।’

तिरिछ के विषय में एक और विश्वास का जिक्र कहानी में आता है- ‘बहुत-से कीड़े-मकोड़े और जीव-जंतु चंद्रमा की रोशनी में दुबारा जी उठते हैं,MHD 03 Free Assignment In Hindi

चाँदनी में जो ओस और शीत होती है, उसमें अमृत होता है और कई बार ऐसा देखा गया है कि जिस साँप को मरा हुआ समझकर रात में यों ही फेंक दिया जाता है, उसका शरीर चाँद की शीत में भीगकर दुबारा जी उठता है और वह भाग जाता है, फिर वह हमेशा बदला लेने की ताक में रहता है।

तिरिछ’ कहानी में लेखक का उद्देश्य शहरी समाज की संवेदनहीनता और अमानवीयता का उद्घाटन करना है । आज जब हमारे मानवीय संबंधों की परिधि लगातार सीमित होती जा रही है, तब ऐसे में लोगों की सोच में भी एक तरह का संकोच विकसित होना स्वाभाविक है।

शहरी जीवन की आपाधापी में तो दूसरों के दुःख-दर्द, हैरानी-परेशानी की तरफ नजर उठाकर देखने से लगता है कि किसी को फुर्सत ही नहीं है । मनुष्य आत्मकेंद्रित हो गया है ।

ऐसी स्थिति में अपने परिवेश से वह अलग-थलग सा पड़ गया है । उसके आस-पास के जीवन में क्या कुछ घटित हो रहा है या तो वह उससे अनभिज्ञ रहता है अथवा तटस्थ ।

उस घटना में वह किसी तरह के हस्तक्षेप या संलग्नता से – को बचाता है । वह केवल यह बताना चाहता है कि शहर में संवेदनशीलता का हास बहुत तेजी से हो रहा है ।

कहानी में लेखक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि तिरिछ का काटा मनुष्य बच भी जाए, किन्तु शहर की संवेदनहीनता से वह नहीं बच सकता । वह तिरिछ के जहर से ज्यादा खतरनाक या कहें जानलेवा होता है |

गाँव के सीधे-सादे व्यक्ति के लिए शहर एक अबूझ पहेली जैसा है या कि भूलभुलैया, जिससे निकलना ऐसे व्यक्ति के लिए बहुत कठिन होता है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

‘तिरिछ’ में ‘पिता’ को शहर इतना आतंकित करता है कि वे शहर जाने से बार-बार कतराते हैं, न जाने के बहाने ढूँढते हैं ।

जैसे तिरिछ के जहर की व्याप्ति पूरे शरीर में होती है और व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, उसी तरह शहर आधुनिकता के विभिन्न उपकरणों के माध्यम से अपने आप तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण व्यक्ति की ओर बढ़ रहा है ।

इस कहानी के माध्यम से लेखक परम्परा और आधुनिकता, पुराने और नए मूल्य-बोध को चित्रित करना चाहता है। लोक-प्रचलित विश्वास से लिया गया तिरिछ का प्रतीक कितना प्रासंगिक है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आधुनिकीकरण और नगरीकरण ने पुराने जीवन-मूल्यों को ग्रस लिया है,

वे मूल्य जो नितांत मानीवय प्रकृति थे, हमारे जीवन के लिए मूल्यवान, सारगर्भित और अनिवार्य थे । इनके स्थान पर अनेक विकृतियाँ व्याप्त हो गई हैं, जिनसे समूचा मानवीय अस्तित्व खतरे में पड़ गया है । यह तिरिछ के जहर की भांति समाज में फैल रहा है, जिसका परिणाम निश्चित रूप से भयंकर होगा।

‘तिरिछ’ कहानी में इसे प्रतीकात्मक ढंग से दिखाने की कोशिश की गई है । तिरिछ कहानी का पिता दूषित शहरी वातावरण में अदाल. विभिन्न कार्यालयों, बैंकों आदि के अनेक चक्कर लगाते हुए अत्यन्त सांकेतिक ढंग से सामाजिक विकृतियों और विडम्बनाओं का उद्घाटन करता है।

कहानी शहरों में रहने वालों की इस दूषित, अमानवीय संवेदनाशून्य मानसिकता का चित्रण छोटे-छोटे प्रसंगों द्वारा करती है-बैंक, अदालत, पुलिस, मुहल्ले के पढ़े-लिखे लोग, शरारती बच्चों द्वारा पिता को पागल समझ कर उसको ईंट-पत्थरों से मारना, उसका शरीर जख्मी होने पर भी उसको अस्पताल न ले जाना, पत्रकार तथा कवि कहे जाने वाले व्यक्ति का अमरीकी दूतावास में संगीत कार्यक्रम में भाग लेने के उतावलेपन में बूढ़े, दीन, क्षत-विक्षत व्यक्ति के प्रति उदासीनता ऐसे ही प्रसंग हैं । _

अग्निहोत्री का यह कथन सरासर झूठ है क्योंकि बूढ़ा, दुर्बल शरीर, थका-माँदा, बेबस, शक्ल से दीन-हीन लगने वाला आतंकवादी नहीं दिख सकता । कैशियर उसकी बेचारगी, बेबसी पर तरस खाने की बजाय, उसकी उपेक्षा या तिरस्कार कर रहा है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

इतवारी कॉलोनी के लड़के उस पर पत्थर मारते हैं | चोट इतनी गहरी है कि खून रिस-रिस कर आंखों पर आने लगता है |

यह शहर की युवा पीढ़ी की अराजकता, उदंडता, उच्छृखंलता, हिंसक वृत्ति तथा बड़े-बूढ़ों के प्रति घृणा, तिरस्कार, अपमान की भावना का द्योतक है ।

उसी कॉलोनी में रहने वाले रिटायर्ड तहसीलदार सोनी साहब और शहर के विख्यात पत्रकार एवं कवि सत्येन्द्र का व्यवहार भी पढ़े-लिखे, स्वयं को सभ्य, सम्भ्रांत, शालीन,बुद्धिजीवी मानने वाले की अमानवीयता का उदाहरण है | कवि महोदय को दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास में संगीत-सभा में जाकर संगीत का आनन्द लेना ज्यादा ज़रूरी है, किसी असहाय, बूढ़े, दीन-हीन के प्राणों को बचाना उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखता।

उनमें न कवि-हृदय की संवेदनशीलता है और न वह पत्रकार होने का दायित्व या कर्त्तव्यनिष्ठा ही दिखाते हैं । लगता है कि उनके शरीर में हृदय जैसी वस्तु है ही नहीं । “सिर चढ़ी रही पाया न हृदय’ वाली पंक्ति उन पर चरितार्थ होती है ।

शहर के लोग इतने व्यस्त, आत्मकेन्द्रित तथा भाग-दौड़ की जिन्दगी में लिप्त हैं कि कोई भी राहगीर बूढ़े पिता द्वारा अदालत का पता पूछने पर या तो चुप रहकर तेजी से आगे निकल जाते थे या हड़बड़ी में कुछ बताते भी, तो इस प्रकार कि उनकी बात को समझना पिता के लिए दुष्कर था ।

होटल में काम करने वाला नौकर उनके पानी मांगने पर उन्हें गालियां देता है, दुत्कार कर अपना रास्ता देखने की झिड़की देता है। MHD 03 Free Assignment In Hindi

ये सब तो खैर अपरिचित थे । स्चयं पुत्र का पिता के प्रति व्यवहार भी पुराने मूल्यों से ध्वस्त होने तथा इन्सान के हैवान बनने का संकेत देता है ।

कहानी का वाचक अपने पिता के त्रासद अंत का जिस तटस्थता, निरपेक्षता से वर्णन करता है, पिता की मौत पर राहत की सांस लेता है, जो बचपन में पिता के वात्सल्य और पालन-पोषण की स्मृति भी दिमाग के कोने में बसाये हुए है, उससे पता चलता है कि मानवता सर्वत्र नष्ट हो गयी है, केवल स्वार्थ पूर्ति ही जीवन का एकमात्र ध्येय रह गयी है ।MHD 03 Free Assignment In Hindi

बचपन में पिता की उपस्थिति एक कवच की तरह थी, जिसके रहते संतान निद्वंद्व होकर खेलती-कूदती और गहरी नींद सोती है। बचपन की अनुभूति है, जिसमें आत्मीयता व मानवीय संवेदना का बहुत कुछ अंश विद्यमान दिखायी देता है ।

वह पूरी तरह अविश्वसनीय लगते हुए भी हमारे सामाजिक यथार्थ से ही जुड़ा हुआ है। अराजक पीढ़ी की विद्रूप मानसिकता के संदर्भ में इसे रखकर विचार करें, तो बात साफ हो जाती है |

आत्मीयता एवं सहानुभूति नितांत मानवीय मूल्य हैं और हमारे संबंधों को स्वस्थ एवं सजीव बनाते हैं पिता की ऐसी दर्दनाक मृत्यु पर पुत्र को राहत महसूस होना स्वस्थ आत्म्य संबंध को रेखांकित नहीं करता ।

इस आत्मीयता का यदि लोप हुआ है या उसमें कमी दिखाई देती है, तो उसके कारण हमारे सामाजिक-राजनैतिक ढाँचे में ही मिल जाएंगे। MHD 03 Free Assignment In Hindi

‘तिरिछ’ की लाश चट्टान से जरा हटकर जमीन पर, घास के ऊपर चित पड़ी हुई थी। बिल्कुल, यह वही तिरिछ था । मेरे भीतर हिंसा, उत्तेजना और खुशी की एक सनसनी दौड़ रही थी।

कहानी में तिरिछ आतंक का पर्याय बनकर उभरा है । यह आतंक शहरी आधुनिकता एवं जीवन-दृष्टि का हो सकता है और सत्ता की निरंकुशता का भी ।

इस कहानी के कई पाट किए जा सकते हैं और ये भिन्न-भिन्न पाट अपना अलग-अलग अर्थ-संकेत छोड़ते हैं। कहानी को अच्छी तरह समझने के लिए इसकी पाठ-प्रक्रिया के स्तरों की पहचान आवश्यक है | इसी अन्वेषण में इसके यथार्थ की प्रासंगिकता निहित है | MHD 03 Free Assignment In Hindi

कहानी में एक तरफ आतंक और यंत्रणा से उपजी बेचैनी, तनाव और असहायता का भाव निहित है, तो दूसरी ओर शहरी या कहें आधुनिक मनुष्य की संवेदनहीनता और अमानवीयता छिपी हुई है । आधुनिकता का सबसे ज्यादा प्रभाव शहरों पर पड़ा है और मूल्यों का संक्रमण यहीं सर्वाधिक दृष्टिगोचर होता है ।

परम्परा और आधुनिकता अथवा पुराने और नए द्वंद्व से जहाँ नवीन भावबोध का सृजन हुआ, वहीं कुछ विकृतियों ने भी जन्म लिया। ये विकृतियाँ मूलतः और सापेक्षिक रूप से मानव-विरोधी थीं।

समाज की आधारभूत इकाई परिवार को ही देखें, तो संयुक्त परिवार में टूटने आधुनिक जीवन स्थितियों का परिणाम या अनिवार्यता तो है, किन्तु इससे मानवीय संबंधों को जो आघात लगा, उसकी क्षतिपूर्ति के लिए कोई विकल्प हमारे समाने मौजूद नहीं है । MHD 03 Free Assignment In Hindi

(घ) हिंदी दलित कहानी का विकास।

उत्तर-दलितों के प्रति अन्याय-अत्याचार, उनके उत्पीड़न-शोषण की करुण कथा कहने के संकेत तो प्रेमचन्द के उपन्यासों (कर्मभूमि) . ‘ कहानियों (ठाकुर का कुआँ) में ही मिलने लगते हैं, पर उनमें इस वर्ग की दीन दशा दिखाकर उसके प्रति सहानुभूति, दया, उदारता का भाव दिखाया गया है ।

शोषकों से सविनय आग्रह किया गया है कि वे क्रूर न बनें, अत्याचार न करें ।

उनमें विद्रोह का स्वर नहीं है, यदि है भी जैसे ‘ठाकुर का कुआँ’ की गंगी में तो वह मानसिक है, मुखर नहीं है, कथनी में है, करनी में नहीं है । दलित साहित्य लिखने का श्रेय मराठी साहित्यकारों को है ।

मराठी लेखकों ने पहली बार दलितों के जीवन की करुण गाथा ही नहीं लिखी, वर्तमान समाज-व्यवस्था के प्रति आक्रोश व्यक्त करने, उसमें परिवर्तन लाने और उसके लिए संघर्ष करने की बात भी कही। महाराष्ट्र में पहले सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ और उसके संचालक थे बाल शास्त्री जांमेकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर तथा विचारक, चिंतक और लेखक डा. ताराचन्द खांडेकर ।

इन महापुरुषों ने संस्थाएं स्थापित की जैसे अनार्य दोष परिहार, आंदोलन चलाये जैसे सत्यशोधक आंदोलन, पत्र-पत्रिकाएं निकाली जैसे विराल विध्वसंक, पुस्तकें लिखीं जैसे जाति भेद, विवेक सार, दलित वर्ग के लड़कों-लड़कियों के लिए पाठशालाएं खोली ।

हिन्दी साहित्य में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी से दलित कहानी का आविर्भाव हुआ । दलित जीवन में व्याप्त दारिद्रय, दीन-हीनता, विवशता और दुख के दृश्य इनकी कहानियों में कई बार बड़ी सफलता से अंकित किए गए हैं । MHD 03 Free Assignment In Hindi

इस दृष्टि से इनकी ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’, ‘सलाम’, ‘कमीन’, ‘अम्मा’, ‘शवयात्रा’ कहानियाँ महत्त्वपूर्ण हैं । हिन्दी साहित्य में जिस स्वत्वबोध की भावना के कारण दलित कहानी ने अपनी विशिष्टता सिद्ध की है, वह सर्वप्रथम ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में ही व्यक्त हुई है।

दलित कहानियों के विषय हैं – दलित समाज की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याएं, उनकी गरीबी, उनको अस्पृश्य समझ कर उनका अपमान और तिरस्कार करना, दलित स्त्रियों को भोग की वस्तु समझ कर उनका खिलौनों की तरह उपयोग करना, सामंतीय मनोवृत्ति तथा ब्राह्मणवादी या मनुवादी प्रवृत्तियों की क्रूरता तथा अमानवीयता का पर्दाफाश करना ।

MHD 02 Free Assignment In Hindi jan 2022

MHD 01 Free Assignment In Hindi jan 2022

Leave a Comment

error: Content is protected !!