IGNOU MHD 01 Free Solved Assignment 2022- Helpfirst

MHD 01

आदि काव्य ,भक्ति काव्य, रीती काव्य

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Table of Contents

MHD 01 Free Solved Assignment Jan 2022

1 . निम्नलिखित प्रत्येक काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए

(क) जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मेल करो तलवार का पड़ा रहन को म्यान||
हस्ती चढ़िये ज्ञान को ,सहज दुलीचा डारि सवां रूप संसार हैं भूकन दे झक मारी | |

त्तर. संदर्भ प्रस्तुत दोहे भक्ति कालीन निर्गुण संत काव्यधारा के कवि कबीरदास द्वारा रचित हैं। पहले दोहे में ज्ञान के आधार पर सज्जन की पहचान की बात सही है। दूसरे दोहे में संसार की आलो की परवाह न करने की बात कही है।

व्याख्या- कबीरदास कहते हैं, सच्चा साधु सब प्रकार के भेदभावों से ऊपर उठा हुआ माना जाता है। साधु से यह कभी नहीं पूछा जाता की वह किस जाति का है उसका ज्ञान ही, उसका सम्मान करने के लिए पर्याप्त है।

जिस प्रकार एक तलवार के मोल का आकलन उसकी धार के आधार पर किया जाता है, न की उसकी म्यान के आधार पर। ठीक उसी प्रकार, एक साधु की जाति भी तलवार के म्यान के समान है और उसका ज्ञान तलवार की धार के समान है।MHD 01 Free Solved Assignment

दूसरे दोहे में कबीर ने ज्ञान की तुलना हाथी से की है। यहाँ कवि कह रहा है मनुष्य को इस ज्ञान रुपी हाथी की सवारी गलीचा डाल कर करनी चाहिए।

ऐसा करते वक्त अगर यह समाज अथवा संसार उसकी आलोचना करता है तो मनुष्य को उस आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए।

मनुष्य का मूल उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति का होना चाहिए। कवि ने भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ने वालों को प्रेरणा दी है कि वह व्यर्थ की आलोचनाओं की परवाह न करें। MHD 01 Free Solved Assignment

विशेष :

  1. दोहा छंद है
  2. सधुक्कड़ी भाषा है
  3. तत्सम और तद्भव शब्दों का सहज प्रयोग किया गया है ।
  4. लाक्षणिकता से भाव गहनता को प्रकट किया है।
  5. स्वर मैत्री ने गेयता का गुण उत्पन्न किया है।

(ख) पूछा राजै कहु गुरू सूआ। न जनौं आजु कहाँ दहुँ ऊआ॥
पौन बास सीतल लेइ आवा। कया दहत चंदनु जनु लावा।।
कबहुँ न ऐस जुड़ान सरीरू। परा अगिनि महँ मलय समीरू॥
निकसत आव किरिन रविरेखा। तिमिर गए निरमल जग देखा॥
उठै मेघ अस जानहुँ आगै। चमके बीजु गगन पर लागे।
तेहि ऊपर जनु ससि परगासा। औ सो चंद कचपची गरासा॥
और नखत चहुँ दिसि उजियारे। ठावहिं ठावँ दीप थस बारे॥

उत्तर. सन्दर्भ प्रस्तुत पंक्तियाँ जायसी कृत ‘पद्मावती’ के ‘सिंहलद्वीप खंड’ से ली गई हैं। तोते के राजा रत्नसेन से मिलने पर रत्नसेन को एक सुखद अनुभूति होती है और वह तोते से अपनी अनुभूति को प्रकट करता है, उसी का वर्णन यहाँ है।

व्याख्या:- राजा रत्नसेन ने तोते करनी प्रारम्भ की कि न मालूम आज भाग्य से यहाँ तक कहाँ आ गये हैं? यहाँ की वायु भी प्रअत्यन्त शीतल है। यह सुगन्धित वायु शरीर की तपन को चन्दन के समान शीतल करने वाली है।

जो ठंडक एवं शीतलता शरीर को अब मिली है, वह पहले कभी नहीं प्राप्त हुई। इसे प्राप्त कर ऐसा लगता है मानो अग्नि में मलयगिरि को हवा लग रही हो। सूर्य की किरणों से यहाँ एक रेखा-सी निकल रही है।

उसके द्वारा सारे संसार का अन्धकार दूर हो गया है। सर्वत्र संसार पवित्र-सा दिखाई पड़ रहा है। सामेन ही बादल भी उठते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। MHD 01 Free Solved Assignment

आकाश में बिजली भी चमकती हुई प्रतीत होती है। आकाश में चारों और चन्द्रमा का प्रकाश दिखाई
पड़ता है। उसी चन्द्रमा के पास कृतिका नक्षत्र भी है और चारो ओर से आकाश नक्षत्रों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। ऐसा लगता है। MHD 01 Free Solved Assignment

जगह-जगह पर दीपक प्रकाशित हो रहे हों। दक्षिण की ओर सोने का सुमेरु पर्वत दिखाई पड़ रहा है। चारों ओर ऐसी सुगन्धित वायु आ रही थी जैसे कि बसन्त ऋतु में आती है।

विशेष-1. जग योगी की साधना पुरी जो जाती है तो उसे चारों ओर का वातावरण हर्षित एवं सुखद दिखाई देता है। इसी को कबीरने अनहद-नाद भी कहा है।

  1. कवि ने यहाँ प्रकृति का भी सुन्दर वर्णन किया।
  2. अलंकार-समासोक्ति।
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(ग) बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूंकि पहारू॥
।…………

देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥ भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।। बंधे पापु अपकीरति हारें। मारत हूँ पा परिअ तुम्हारें।कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धारहु धानु बान कुठारा॥

उत्तर प्रसंग:-प्रस्तुत पद तुलसीदास जी के द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ के बाल कांड से लिया गया है। सीता स्वयंवर के समय श्री राज ने शिवाजी के धनुष को तोड़ दिया था जिस कारण पराशुराम ने बहुत गुस्सा किया था। लक्ष्मण ने उस पर व्यंग्य किया था जिससे परशुराम क गुस्सा भड़क उठा था।

व्याख्या:– लक्ष्मण ने हँस कर कोमल वाणी में कहा- अहो, मुनीश्वर तो अपने आप को बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। ये मुझे देख क. बार-बार अपनी कुल्हाड़ी दिखाते हैं। ये तो फूंक से पहाड़ उड़ा देना चाहते हैं।

यहाँ कोई काशीफल या कुम्हड़े का बहुत छोटा-सा फल नहीं है जो आप की अंगूठे के साथ वाली उंगली को देखते ही मर जाती है। मैंने तो जो कुछ कहा है वह आप के कुल्हाड़े और धनुष-बाण को देखकर ही अभिमान सहित कहा है। MHD 01 Free Solved Assignment

भृगु वंशी समझकर और आप का यज्ञोपवीत देख कर आप जो कुछ कहते हैं, उसे मैं अपना गुस्सा रोक कर सह लेता हूँ। देवता, ब्राहमण, भगवान् के भक्त और गौ-इन पर हमारे कुल में अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं किया जाता है MHD 01 Free Solved Assignment

क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इन से हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिए यदि आप मारें तो भी आप के पैर ही पड़ना चाहिए। आप का एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान है।

धनुष-बाण और कुल्हाड़ा तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं। आप के इस धनुष-बाण और कुल्हाड़े को देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो तो हे धीर महामुनि! आप क्षमा कीजिए। यह सुन कर भृगु वंशमणि परशुराम क्रोध के साथ गंभीर वाणी में बोले।

(घ) झलकै अति सुन्दर आनन गौर, छके दृग राजत काननि छवै।
हँसि बोलन मैं छबि फूलन की बरषा उर ऊपर जाति है।लट लोल कपोल कलोल करै, कल-कंठ बनी जलजावलि द्वै।अंग अंग तरंग उठै दुति की, परिहे मनौ रूप अबै धार च्चै ॥

उत्तर प्रसंग:-धनानन्द कृत इस सवेये में कवि ने नायिका के अग-प्रत्यंग की सुन्दरता, लावण्य का चित्रण किया है

व्याख्या:-नायिका के केश लम्बे, घने, कोमल हैं, उनकी लटें उसके कपोलों पर क्रीड़ा कर रही हैं । उसकी सुन्दर ग्रीवा में मोतियों की दो मालाएं सुशोभित हैं। उसके मुख का वर्ण गोरा है और उसके तेज, दीप्ति, प्रभा से चारों दिशाएं आलोकित हो रही हैं, जगमग-जगमग हो रही हैं।

उसके नेत्र विशाल हैं कानों तक को छूते प्रतीत होते हैं और उनमें प्रेम का मद लबालब भरा है । जब वह मुस्कराती हुई कुछ कहती है तो लगता है उसके मुख से फूलों की वर्षा हो रही है और वे पुष्प उसके वक्षस्थल की शोभा को और भी बढ़ा रहे हैं ।MHD 01 Free Solved Assignment

उसके अंग-अंग में कामदेव और काम भावनाओं का वास है, अतः उसकी प्रत्येक अंग-भंगिमा, शारीरक मुद्रा, चेष्टा को देखकर लगता है जैसे उसके अंग-प्रत्यंग से रस चू कर, टपक कर पृथ्वी पर बिखर रहा है। सारी धरा उस रस में डूब गयी है, आप्लावित होकर सबको आनन्द मग्न कर रही है ।

विशेष-1. उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार ।

२. अनुप्रास अलंकार-लट लोल कपोल कलोल करै ।

2 . (क) पृथ्वीराज रासो की भाषा पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ‘पृथ्वीराज रासो’ की भाषा के संबंध में दो मत प्रमुख हैं । एक मत के अनुसार ‘पृथ्वीराज रासो’ की रचना एक निश्चित भाषा में हुई है | इस मत में भी विद्वानों के दो वर्ग हैं-एक वर्ग डिंगल को रासो की काव्य-भाषा मानता है, तो दूसरा वर्ग पिंगल को । अधिक बल पिंगल पर ही दिया गया है ।

अपभ्रंश के बाद पश्चिमी भारत में दो मुख्य भाषाएँ प्रचलित हुईं-दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में डिंगल तथा पूर्वी राजस्थान और ब्रजमंडल में पिंगल । चन्दबरदाई पूर्वी राजस्थान के भाट थे । राजस्थान की अनुश्रुति या परम्परा के अनुसार ‘पृथ्वीराज राजो’ की रचना पिंगल में हुई है।MHD 01 Free Solved Assignment

डा0 उदयनारायण तिवारी का कहना है कि लन्दन की रायल एशियाटिक सोसायटी में सुरक्षित ‘पृथ्वीराज रासो’ की हस्तलिखित प्रति के ऊपर फारसी में लिखा है- ‘चन्दरबरदाई लिखित पिंगल भाषा में पृथ्वीराज का इतिहास।’ इस अनुश्रुति की पुष्टि फ्रांसीसी विद्वान् गार्सा द तासी ने भी की है।

उन्होंने रासो की रचना कन्नौजी बोली (ब्रज) में मानी है । रासो की भाषा संबंध में बीम्स ने जो कुछ कहा है, उसका सारांश देते हुए डा0 धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है-(यद्यपि) शब्द-समूह में अपभ्रंशाभास और डिंगल रूपों का प्रयोग रासो, बहुत हुआ है।

यह एक शैली मात्र थी जिसका प्रयोग वीर रस संबंही स्थलों पर अनेक समकालीन कवियों ने किया है। युद्ध-प्रहान ग्रंथ होने के कारण ही रासो में इनका प्रयोग आद्योपान्त और अहिक मात्र में मिलता है ।

इस शब्दावली के कारण ही रासो की भाषा के डिंगल अथवा अपभ्रंश होने का संदेह पाठकों को होने लगता है।

वस्तुतः किसी ग्रंथ की भाषा का निर्धारण शब्द समूह के आधार पर न होकर व्याकरण के ढाँचे के आधार पर होता है और इस दृष्टि से रासो की भाषा पिंगल ही है।

दूसरे मत के अनुसार चन्दबरदाई उन्मुक्त प्रकृति के कवि थे और उन्होंने छन्द-योजना और भाषा के प्रयोग में उन्मुक्त दृष्टि अपनाई । इसी उन्मुक्त दृष्टि के कारण रासो की भाषा में कई भाषाओं के शब्द आ गये हैं

विकसनशील महाकाव्य होने के कारण भी उसमें भाषा के स्तर-भेद स्वभावतः आ गये हैं। इसी कारण कुछ विद्वानों ने रासो की भाषा को पंचमेल या खिचड़ी भाषा कहा है । अपने मत की पुष्टि के लिए ये विद्वान् चन्द की इस पंक्ति को उद्धृत करते हैं- ‘षटभाषा पुरानं च कुरानं च कथितं मया ।

“चन्द की इस उक्ति में छः भाषाओं की ओर संकेत है-संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, पेशाचो, मागधी और शौरसेनी । इन भाषाओं के अतिरिक्त रासो में प्राचीन राजस्थानो, गुजराती, पंजाबी आदि भारतीय आर्य भाषाओं के तथा अरबी, फारसी और तुर्की जैसी विदेशी भाषाओं के शब्द भी मिलते हैं ।

उसमें देशज शब्दों की भी संख्या पर्याप्त है।

यद्यपि ‘षट्भाषा’ वाला पद्य किसी न किसी रूप में सभी रूपान्तरों में प्राप्त होता है, लेकिन मध्ययुग में संस्कृत आलंकारिकों, प्राकृत वैयाकरणों तथा कवियों में ‘षट्भाषा’ शब्द साल हो चला था।

भिखारीदास ने षिभाषा का उल्लेख करते हुए लिखा है ।

ब्रज मागही मिलै अमर नाग यवन भाषान ।
सहज फारसी हू मिलै षङ् विहि कहत बखान ।।

षड्भाषा का अर्थ है जीवित भाषा, जिसमें सर्जनात्मक सम्भावनाएँ हों और जो जन बोली का स्पर्श लिए हो । इसके अतिरिक्त रासो के उक्त छन्द में : वैविध्य की ओर संकेत नहीं है, बल्कि षड्भाषा में रचित साहित्य के सार-ग्रहण करने की घोषणा है । MHD 01 Free Solved Assignment

उक्ति में प्रयुक्त पुराण और कुरान के उल्लेख का भी यह। प्रयोजन है। कोई भी काव्य एक निश्चित भाषा में लिखा जाता है, कोई कवि अपनी रचना को भाषाओं का अजायबघर नहीं बनाना चाहता,

उसमें शैली-भेद तो हो सकता है, पर भाषा-भेद नहीं । अतः रासो की भाषा खिचड़ी भाषा न होकर एक सुनिश्चित भाषा है और वह है-पिंगल।

‘पृथ्वीराज रासो’ को पिंगल की कृति मानते हुए भी विद्वानों के सम्मुख यह आरोप आड़े आता है कि उसमें व्याकरण की कोई व्यवस्था नहीं है और उसकी भाषा का रूप बिखरा हुआ है ।

पर यदि ध्यान से देखा जाए तो रासो में व्याकरण की व्यवस्था है। यदि उसमें थोड़ी-बहुत कमजोरी है भी, तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि रासो काव्य-ग्रन्थ है, व्याकरण ग्रन्थ नहीं ।

जब रससिद्ध कवि गोस्वामी तुलसीदास के धर्म-ग्रन्थ की तरह पूज्य तथा सुरक्षित ‘रामचरितमानस’ में भी एक शब्द के अनेक रूप मिलते हैं, तो मौखिक परम्परा में रूपान्तरित इस राजप्रशस्ति-मूलक रचना में शब्द-रूपों की किंचित् अव्यवस्था स्वाभाविक ही है।

रासो में एक ही शब्द के विभिन्न रूपों को देखकर बीम्स ने उसके दो कारण बताये हैं-छन्दानुरोध और भाषा की संक्रमणशीलता।

वस्तुतः रासो ऐसे की भाषा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें तद्भव शब्दों का रूप स्थिर नहीं हो सका था । फलतः एक शब्द के अनेक रूप प्रचलित थे ।

व्याकरणिक दृष्टि से संज्ञा शब्दों की कारक-रचना में निर्विभक्तिक रूप, सविभक्तिक विहारी रूप तथा स-परसर्ग रूप तीनों ही विधियाँ दिखाई पड़ती हैं; जैसे-चंद, चंदु, चंदहि, चंदह ।

परसर्गों में ने को छोड़कर एक-एक कारक के लिए कई कारक चिह्नों का प्रयोग हुआ है। जैसे अपादान कारक के चिह्नों हैं-सम, सौं, सों, से ।

क्रियापद सामान्यतः ब्रजभाषा के हैं। अनेक स्थलों पर क्रिया नहीं प्रयुक्त की गई है और बहुधा धातु में हस्व इकार लगाकर उसको इच्छानुसार भूत, भविष्य और वर्तमानकालों के अर्थ में व्यवहार किया गया है-सुनाइ, जाइ । भूतकाल में करिग, चलिग, झरिग जैसे विशिष्ट रूप भी मिलते हैं ।

‘पृथ्वीराज रासो’ में जहाँ श्लोक आये हैं वहाँ संस्कृत शब्द और संस्कृत वाक्य-विन्यास भी मिलता है

उक्ति कर्म विशालस्य राजनीति नवं रसं ।
षट्रभाषा पुरानं च कुरानं च कथितं मया।।

गाहा या गाथा छन्द में प्राकृत, अपभ्रंश या अपभ्रंश-मिश्रित हिन्दी का प्रयोग है । शेष छन्दों में भाषा की कोई रोक-टोक नहीं है । MHD 01 Free Solved Assignment

रासो की भाषा को अपभ्रंश से भिन्न करने वाली हिन्दी की तीन व्यावर्तक प्रवृत्तियाँ हैं-क्षतिपूरक दीर्धीकरण, परसर्गों का प्रयोग और संस्कृत शब्दों का प्रयोग । उदाहरण- अज्ज का आज ।

शब्द-भण्डार की दृष्टि से रासो में तत्सम और तद्भव शब्दों के अतिरिक्त देशज शब्दों का भी अपरिमित भण्डार है। इनका प्रयोग अब नहीं होता; अतः उनक प्रयोग से रासो काव्य कुछ दुरूह हो उठा है ।

जैसे-जूक, गुदरन, बिसाहन। रासो में प्रयुक्त विदेशी शब्दों का भी बाहुल्य है । उसमें फारसी (मस्त, जवानी), तुर्की (तोप, सौगात) और अरबी (कैद, हाल, नूर) के शब्द प्रयुक्त हुए हैं।

हिन्दी इतर भारतीय भाषाओं में पंजाबी के शब्द भी खुलकर प्रयुक्त हुए हैं-रहंदी, हनंदे । इस प्रकार शब्द-भण्डार की दृष्टि से रासो में प्राचीन भारतीय भाषाओं, मध्यकालीन भारतीय भाषाओं के शब्द-समूह के अतिरिक्त विदेशी शब्दों और देशज शब्दों का अपार भण्डार मिलता है।

संक्षेप में भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से पिंगल को ही रासो की काव्य-भाषा कहा जा सकता है जिसमें नवोदित भारतीय आर्य-भाषा हिन्दी की विशेषताएँ लक्षित होती हैं ।

रासो की भाषा परवर्ती काल में मध्यदेश की सामान्य काव्य-भाषा का पूर्व रूप है. जिसमें प्राकृत और अपभ्रंश की प्रवृत्तियाँ भी सुरक्षित हैं ।

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(ख) विद्यापति पदावली की विशेषताओं को रेखांकित कीजिए।

उत्तर:- हिन्दी में विद्यापति मैथिल कोकिल’ के नाम से प्रसिद्ध है। परन्तु इस कोकिल की अमृत-काकली मे मिथिला की अमराइयाँ ही नहीं गूंज रही हैं, सम्पूर्ण उत्तर-भारत को उसने अपनी पीयूष-वर्षा से अभिषिक्त किया है।

उनकी ‘पदावली मूर्छना-भरे संगीत की रंगस्थली है और है आत्म-विभोर कर देने वाली अनुभूतियों का साधना-मंदिर । इस कोकिल ने साहित्य के प्रांगण में जिस अभिनव वसन्त की स्थापना की है,

उसके सुख-सौरभ से आज भी पाठक मुग्ध है क्योंकि उनके गीतों में जो संगीत धारा प्रवाहित होती है। वह अपनी सुरताल से श्रोता या पाटक को नाद-वेसुध और गद्गद् कर देती है। विद्यापति ने स्वयं अपने काव्य के संबंध में जो कहा था– MHD 01 Free Solved Assignment

                "करोतु कवितुः काव्यं भव्यं विद्यापतिः कविः।" 

वह उनकी लोकप्रियता को देख सत्य सिद्ध होता है । मिथिला में तो घर-घर इनके गीत विभिन्न अवसरों पर गाये ही जाते हैं इतनी लोकप्रियता का एकः कारण है उनके गीतों की संगीत-माधुरी और भावानुभूति की तीव्रता ।

ऐतिहासिक दृष्टि से विद्यापति हिन्दी में गीति-काव्य के आदि प्रणेता या प्रवर्तक कहे जा सकते हैं । यद्यपि उनसे पूर्व भी सिद्धों और नाथों ने गीत रचे थे, परन्तु वे मानव-मन को न तो अपनी संगीत माधुरी से और न भाव-तन्मयता से मुग्ध कर सके ।

वस्तुतः यह उनका लक्ष्य भी न था। उन्होंने परवर्ती कवियों कबीर, मीरा, अष्टछाप के लगभग सभी कवियों और रीति कवियों को भी इतना प्रभावित और प्रेरित किया है कि उन्हें हिन्दी गीति काव्य का प्रवर्तक मानने में कोई संकोच नहीं होता, भाव और शिल्प दोनों क्षेत्रों में उन्होंने हिन्दी गीति-काव्य को स्वरूप प्रदान किया ।

विद्यापति गीत काव्य के अद्भुत शिल्पी हैं । वह जानते हैं कि चतुर्दिक वातावरण को मूर्तिमान करने और नायक-नायिका की मनोदशा को सच्ची अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए कौन-सा राग, कौन-सा छन्द और शब्दों का शिल्प-विधान किस प्रकार का करना होगा ।

यदि नायिका की आंतरिक अनुभूति का चित्रण करना होता है, तो वह एक प्रकार का गीत लिखते हैं और यदि उसकी विरह-शिथिलता, शारीरिक क्षीणता और मानसिक जड़ता का चित्र उकेरना होता है,

तो दूसरे प्रकार के गीत-शिल्प का विधान करते हैं । उदाहरण के लिए, निम्न गीत लीजिए जिसमें पंक्ति की मन्द गति, टेक और शब्दों के कुशल विन्यास द्वारा विरहिणी की व्याकुलता और शारीरिक क्षीणता का चित्र अंकित किया गया है MHD 01 Free Solved Assignment

                      माहव सुन-सुन वचन हामारि।
                           
                      तुव गुन सुन्दरि अति भेल दूबरि
                          
                      गुनि-गुनि प्रेम तोहारि।
                           
                            + + + 
                          
                      कातर दिठि करि चौदिस हेरि हेरि
                          
                      नयने गलये जलहारा।

छोटे-छोटे शब्दों द्वारा गीत में नाद-सौन्दर्य, स्वर-ताल और अद्भुत थिरकन भरने की कला में भी विद्यापति सिद्धहस्त हैं। नीचे के गीत में कृष्ण प… मिलनोत्कंठा न केवल शब्दार्थ द्वारा, अपितु गीत की गति से भी प्रकट होती है

                        नन्दक नन्दन कदम्बेरि तरुतरे, 
                        घिरे-घिरे मुरलि बोलाव। 
                        समय संकेत निकेतन बइसल
                        बेरि बेरि बोलि पठाव ।

पहली दो पंक्तियों के एक-एक शब्द में धुंघरुओं की रुनझुन बजती सी-प्रतीत होती है । ‘घिरे-घिरे, तरु तरे’ में ताल है, तरलता है और साथ ही थिरकन भी है ।

बेरि बेरि, फिरि-फिरि, जनि-जनि’ में कृष्ण की उत्कण्ठा तो मूर्तिमान हुई ही है, शब्द भी नृत्य करते प्रतीत होते हैं । ‘बोलाव और पठाव’ में एक प्रकार का मधुर और सुकुमार स्वर खिंचाव है और ये शब्द संगीतकार को आलाप के लिए भी पर्याप्त सामग्री प्रदान करते हैं ।

अतः गाने की दृष्टि से यह गीत बहुत ही उपयुक्त एवं श्रोताओं को विमुग्ध करने में सफल है

राग-रागिनियों की दृष्टि से भी विद्यापति का काव्य अपने वैविध्य एवं सफल निर्वाह के लिए विरस्मणीय रहेगा। यह महान् कवि भाव साधना के मन्दिर निष्ठावान पुजारी ही नहीं, संगीत का विज्ञ आचार्य भी था।

अतः उनके काव्य में परवर्ती आचार्यों को विभिन्न राग रागिनी गाने के लिए अपूर्व भण्डार मिला । ३.. क्षेत्र में उनकी समानता केवल सूरदास कर सकते हैं ।

मालव, घनछरी, सामरी, महिरानी, कोलाव, विभास, असावरी, मल्हार, केदारा, कानड़ा, सारंग, गुजरी, बसन्त, नाट, ललित आदि रागों में निबद्ध विद्यापति के ये गीत सचमुच संगीतकारों के लिए बहुमूल्य कोष हैं ।

उनके गीतों में कोमलकांत पदावली होते हुए भी अनुप्रास का आग्रह नहीं है। सर्वत्र सरल लय, मधुर झंकार युक्त शब्द और नादपूर्ण शब्दावली का प्रयोग ही उनके काव्य को श्रुति मधुर बनाता है।

सुकुमारता और तरलता के लिए उन्होंने संयुक्त वर्णों को भी तोड़ डाला है जैसे भमर, धुनि, पिय, सोभाव, कओन, जउवन, पाओल, बेआकुलि आदि । MHD 01 Free Solved Assignment

व्यंजनों के स्थान पर स्वरों का प्रयोग भी, जो अपभ्रंश की प्रवृत्ति थी, उनके काव्य को अद्भुत संगीत-माधुरी प्रदान करता हैं ।

छन्दों की अनेकरूपता की दृष्टि से भी विद्यापति का काव्य अपना विशिष्ट स्थान रखता है । संगीत के लिए चूंकि मात्रिक छन्द अधिक उपयुक्त होते हैं, अतः इनके काव्य में मात्रिक छन्द ही अधिक मिलते हैं।

वैसे भी हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप जितने मात्रिक छंद हैं, उतने वर्ण-वृत्त नहीं । पंत और अयोध्यासिंह उपाध्याय के काव्य की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। उनकी सूझ-बूझ ने विषयानुकूल छन्दों का प्रयोग किया है ।

अनुभूति-प्रधान तथा गेय गीत यदि छोटे हैं, तो वर्णनात्मक और आरती वाले पद लम्बे हैं, क्योंकि संगीत की दृष्टि से लम्बे पद उपयुक्त नहीं होते, उनमें आलाप नहीं भरा जा सकता ।

घटनात्मक रचनाओं में 8, 11, 12 और 15 मात्राओं वाले छंदों का प्रयोग हुआ है । उनका सर्वाधिक प्रिय छंद 28 मात्राओं वाला है, यद्यपि उनके गीतों में 22, 24,25,27 मात्राओं के छंदों का भी प्रयोग हुआ है।

28 मात्रा वाले छंद को उन्होंने अपनी प्रतिभा और संगीत-कौशल से जगह-जगह भिन्न भिन्न रूप प्रदान किया है-क. 16 मात्राओं की टेक है और 28 मात्राओं का अंतरा, तो कहीं 12 की टेक और 28 का अंतरा है।

नाटकीय चित्र उपस्थित करने और ध्वनि-अर्थ की दृष्टि से भी इनके गीत प्रशंसनीय हैं । कहीं नारी के सौंदर्य का, कहीं नायक-नायिका की छेड़-छाड़ का, कहीं उनके हाव-भाव और केलि-विलास का बिम्बात्मक चित्र प्रस्तुत किया गया है, तो कहीं उनकी विनोदप्रियता में ध्वनि से सहायता ली गई है।

छोड़ कन्हैया मोर आंचर रे, फाटत नव सारी।’

अपजस होएत जगत भरि हे, जनु करिअ उघारी’ में नायक-नायिका की चपलता, नायक की ढिठाई, नायिका की क्रीड़ा, आँचल खींचने और छुड़ाने का उपक्रम, उनके बीच संवाद की चुहल और संवाद के समय नायिका के विभ्रम का चित्र साकार हो उठता है, MHD 01 Free Solved Assignment

विद्यापति ने परवर्ती कवियों-कबीर, मीरा, सूर, तुलसी, अष्टछाप के ब्रजभाषा कवियों और रीति-काव्य को भी प्रभावित किया, अतः उनकी देन अविस्मरणीय है ।

कबीर के भक्ति-काव्य में प्रेम का सुकुमार एवं मधुर तत्त्व, मीरा के काव्य में पाया जाने वाला कृष्ण का लीला-माधुर्य, मिलनोत्कंठा और उत्कट विरह-पीड़ा, अभिसार, मान तथा संयोग के चित्र, अष्टछाप तथा रीति काल के कवियों की रचनाओं में शृंगार के आलम्बन, आश्रय, अनुभाव, दूती, अभिसार, मानमनुहार अर्थात् शृंगार-निरूपण की पद्धति सभी पर विद्यापति की छाप है ।

(ग) कबीर की भाषा में निहित व्यंग्य बोध की चर्चा कीजिए।

उत्तर: कबीर निर्गुण काव्यधारा के सबसे प्रखर कवि माने जाते हैं। जीवनपर्यन्त उन्होंने समाज में जाति, प्रथा, धार्मिक रूढ़ियों, सामाजि असामनता जैसी विसंगतियों को दूर करने का अथक प्रयास किया।

कबीर मूलतः भक्त थे, पर उनकी भक्ति समाज-सापेक्ष थी। वह एकांतिक साधना और उत्थान के प्रेरक न होकर सामाजिक उत्थान के उत्प्रेरक थे।

उन्होंने अपने काव्य में ईश्वर के निर्गुण रूप की आराधना करने का उपदेश दिया तथा भक्ति को धर्म की सीमाओं से मुक्त कर जन-जन में व्याप्त किया।

अपनी इसी साधना पद्धति के लिए उन्होंने उन सभी चिंतकों, विचारकों और संप्रदायों का विरोध किया, जो जन-कल्याण विरोधी थे। MHD 01 Free Solved Assignment

कबीर जब अपने विरोधी के मत का खंडन करते हैं, तो वे ओजस्वी कवि के रूप में सामने आते हैं। अपने विरोध को प्रकट करने के लिए कबीर ने व्यंग्यात्मक शैली का बहुलता से प्रयोग किया है।

कबीर के व्यंग्य की सबसे विशेषता उनकी निडरता है। जिस युग में धर्म और धार्मिक व्यवहार ही समाज का आधार था, उस युग में कबीर ने धर्म और धार्मिक आडंबरों पर गहरी चोट की।

यह निडरता कबीर में अपनी दार्शनिक मान्यताओं से आई है, जो ईश्वर को निराकार और सर्व शक्तिशाली मानती है, जो ईश्वर को निराकार और सर्व शक्तिशाली मानती है।

कबीर अधार्मिक नहीं थे। ईश्वर में उन्हें गहरी आस्था थी। यही कारण है कि वे ईश्वर के नाम पर फैलाये जा रहे पाखंड की कटु आलोचना करते हैं।

कबीर के काव्य में सहज ज्ञान और भक्ति के विरोध में आने वाली बातों का विरोध दिखाई देता है। इसी विरोध प्रक्रिया को वे व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करते हैं। वे बहुत सरल तरीके से की भी पाखड का खंडन करते चलते हैं

                      जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। 
                       
                      अंधा अंधे ठेलिया, दून्यूँ कूप पंडत॥

अपना विरोध प्रकट करने के लिए कबीर हमेशा उग्र नहीं होते। वे हमेशा अपनी बात सिद्ध करने के लिए तर्क भी नहीं देते, बस अर असहमति व्यक्त कर देते हैं।

कबीर की कविता परिस्थितियों का बयान करती है, उपहास करती है पर कोई अतिरंजना नहीं करती। सहज रूप से गहरा व्यंग्य करती है। उनकी कविता में व्यंग्य अदृश्य रूप से उपस्थित रहता है

                    कबिरा गरब न कीजिए, ऊँचा देख अवास। 
                   
                    काल परे भुइँ लोटिहैं, ऊपर जमिहैं घास।

इन पंक्तियों में एक चेतावनी है और उपदेश भी। यहाँ व्यंग्य सधा हुआ है। सतही स्तर पर अपने श्रोता से संवाद है। इस संवाद में कहीं कोई व्यंग्य दिखाई नहीं देता, क्योंकि यहाँ कटुता नहीं है।

लेकिन विश्लेषण करने पर उस व्यंग्य को समझा जा सकता है।

मध्ययुग में शास्त्र अध्ययन पंडितों का काम था। निम्न वर्ग को तो वेद-शास्त्र पढ़ने की अनुमति नहीं थी। इस स्थिति में शास्त्र ज्ञानियों के मन में अंहकार आना स्वाभाविक था। MHD 01 Free Solved Assignment

कबीर ने इस अहंकार पर सीधी चोट की और ऐसे शास्त्रीय ज्ञान की निरर्थकता सिद्ध की। इस तरह कबीर सहज कथन में व्यंग्य का तालमेल करके अपनी बात को संप्रेषित कर देते हैं।

कबीर का व्यंग्य उनके जीवन ज्ञान के भीतर से पैदा होता है। यह व्यंग्य उनका बड़बोलापन नहीं है। यह एक ऐसे कवि का व्यंग्य है, जिसने दुनिया देखी है, दुनिया का दुःख देखा है, उस दु:ख को भोगा भी है, इसलिए उनकी बातों में सच्चाई है जो भोगे हुए यथार्थ से उपजी है

                  कबिरा नाम बिकावत जहँ तँह, बनियों का संसार। 
                  
                  ठगते और ठगाते देखा, दुनिया का बाजार।।

कबीर अपने आत्म-बल और आत्मिक ज्ञान के आधार पर व्यंग्य करते हैं, इसलिए वे निश्चित स्थिति में निश्चित स्थान पर चोट करते हैं। भीतर और बाहर की असंगति कबीर के लिए असहनीय है और जहाँ इन दोनों में अंतर दिखाई देता है। कबीर वहाँ चोट करते हैं

                  कबीर भेष अतीत का, करतूति करै अपराध। 
                  
                  बाहरि दीसै साध गति, माँहे महा असाध॥

कबीर की विचारधारा उनके काव्य से ही प्रकट होती है। कबीर अपनी बात कहने पर जोर देते हैं। उनके कथन से उनका विरोध भी स्वतः रेखांकित हो जाता है।

यह कबीर की सामाजिक चेतना है, जो उनके सहज कथनों से व्यक्त हो जाती है। उनकी चेतना का भक्ति के सहज सुलभ मार्ग को जन-जन के लिए उपलब्ध बनाना था, जो काम कबीर ने कभी विरोध द्वारा कभी व्यंग्य द्वारा, उपदेश द्व.. यथासंभव किया है। MHD 01 Free Solved Assignment

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3.(क) सूरदास की काव्य भाषा की विशेषताएं बताइए।

उत्तर:– सूरदास से पूर्व काव्य में प्रायः दो भाषाओं का प्रयोग होता था- अपभ्रंशमिश्रित डिंगल भाषा तथा घुमक्कड़ साधु-संतों की सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा । सूरदास के ‘भ्रमरगीत’ की भाषा चलती हुई बोलचाल की ब्रजभाषा है ।

कवि ने अपनी प्रतिभा से उसे साहित्यिक भाषा का गौरव प्रदान किया । उनकी भाषा की सर्वप्रमुख विशेषता है उसका भावानुरूपिणी होना बड सहन, स्वाभाविक, प्रवाहमय तथा संगीतमय तो है ही, भावोच्छ्वास के क्षणों में उनके हृदय से निकली भावप्रेरित वाणी स्वतः ही भावों का अनुगमन करती प्रर्तत होती है ।

अतः उसमें सहजता तथा प्रवाह के गुण स्वतः आ गये हैं ।

उद्धव के ज्ञानोपदेश के प्रति सरल स्वभाव वाली गोपियों की सहज प्रतिक्रिया हो, या कृष्ण के विरह में अपनी व्यथा का वर्णन हो, सर्वत्र भाषा सहज तथा सरिता की तरह प्रवाहमयी है :

                 लरिकाई कौ प्रेम कहौ अलि कैसे छूटै 
                
                 चंचल चाल, मनोहर चितवनि, बई मुसकान, मंद धुनि गावत 
                 
                 नटवर भेस नंदनंदन कौ वह विनोद गृहवन तैं आवत।

उनकी भाषा में बोलचाल की ब्रजभाषा के शब्दों का प्राधान्य है। अनुनासिकता पर बल देने के कारण वह अधिक कोमल हो गयी है । MHD 01 Free Solved Assignment

भागवत पर आधृत प्रसंगों में अथवा दृश्य, मुद्रा, आदि का चित्रण करते समय उन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी प्रयोग किया है ।

उन्हें अरबी-फारसी शब्दों से भी परहेज नहीं है क्योंकि उनका उद्देश्य तो अपनी बात को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करना था, भावों का अंकन करना था । सूरदास के काव्य में लाक्षणिक प्रयोगों के साथ-साथ व्यंजना का विशेष प्रयोग हुआ है विशेषतः गोपियो की व्यंग्योक्तियों में ।

लक्षणा– मधुकर स्याम हमारे चोर
मन हरि लियौ माधुरी मूरति चितै नयन की कोर।

व्यंजना- (क) आयौ घोष बड़ौ व्यौपारी
लादि खेप गुन-ज्ञान-जोग की ब्रज में आय उतारी

(ख) सूर स्याम जब तुमहिं पठायै तब नेकहु मुसकाने।

सूर ने अपने काव्य में मुहावरों का, विशेष रूप से ब्रजप्रदेश में प्रचलित मुहावरों का प्रयोग कर अपनी काव्य-भाषा को समर्थ तथा सजीव बनाया है ।

कुछ उदाहरण है-गगन के तारे गिनना, एक डार के तोरे, जी में सूल रहना, जरे पर जारना, पवन को भुस बनाना, धतूरा खाये फिरना । MHD 01 Free Solved Assignment

आंख से संबंधित जितने मुहावरों का प्रयोग सूरदास ने किया है उतना ‘हरिऔध’ के छोड़कर किसी अन्य हिन्दी कवि ने नहीं किया ।

सूर ने लोकोक्तियों का भी खुले-दिल से प्रयोग किया है।

सूर की भाषा भी अत्यंत मधुर है। फिर सूरदास श्रीनाथ जी के मंदिर में प्रतिदिन कीर्तन के समय एकतारे पर अपने रचे पद गाते थे ।

इन पदों का संक्षिप्त आकार, उनकी लयपूर्ण शब्दावली और भावपरिपूर्णता उन्हें गेय बना देती है ।इस प्रकार सूरदास का ‘भ्रमरगीत’ अपनी वाग्विदग्धता के कारण सहृदय पाठकों का प्रिय रहा है ।

(ख) मीरा की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर मीरा के जीवन से परिचित होने तथा उनकी रचनाओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के उपरांत स्पष्ट हो जाता है कि मीरा को किसी भक्ति-सम्प्रदाय या दर्शन ने भक्त-कवयित्री नहीं बनाया ।

जीवन की विषम परिस्थितियों के फलस्वरूप उनके हृदय में सहज रूप में भक्ति-भावना का अजम्न प्रवाह उमड़ता रहा ।

उपास्य का स्वरूप जहां तक उनके उपास्य का संबंध है उसके संबंध में विद्वानों में भले ही मतभेद हो परन्तु उनके प्रारंभिक जीवन का वातावरण और बाद की घटनाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि उनके आराध्य गिरधर गोपाल, नटनागर, कृष्ण थे। MHD 01 Free Solved Assignment

जिन पितामह राव दूदाजी की स्नेहछाया और संरक्षण में मातृविहीना बचपन में पली थीं वह परम वैष्णव भक्त थे, उन्हीं के वैष्णव संस्कारों से मीरा के व्यक्तित्व का निर्माण और विकास हुआ।

भक्ति-पद्धति-डा0 पीताम्बर दत्त बड़श्वाल जैसे कुछ विद्वान मीरा को निर्गुण-निराकार ब्रह्म की उपासिका मानते हैं । यह सत्य है कि मीरा के समय में संत मत का पर्याप्त प्रचार और प्रभाव था और मीरा पर भी उसका थोड़ा-सा प्रभाव दिखाई देता है ।

कुछ पदों में उन्होंने अपने उपास्य को सर्वशक्तिमान, अनिर्वचनीय बताया है, गुरु की महिमा भी स्वीकार की है, अपने उपास्य के साथ एक हो जाने की इच्छा व्यक्त की है, उसके रंग में रंग जाने की बात कही है,

कुछ पदों में संत काव्य की शब्दावली-जोगी, जोगिया, निर्गुण का सुरमा, प्रेमहठी का तेल, मनसा की बाती. सुरत निरत का दिवला, अगम का देस, गगन मंडल, त्रिकुटी, निरंजन, अनहद नाद आदि का भी प्रयोग किया है

परन्तु कृष्णभक्त परिवार में जन्म और पालन पोषण ग्णभक्त परिवार में विवाह तथा उनके पदों में कष्ण-भक्ति का स्वर, कृष्ण के गुणानुवाद, अवतार रूप में उनकी लीलाओं का वर्णन-यह सब सिद्ध करता है

कि उन्होंने ईश्वर के सगुण स्वरूप श्रीकृष्ण को ही अपना आराध्य बनाकर उनके प्रति अपना अविचल प्रेम, सूर्ण समर्पण भाव प्रकट किया था

मीरा को पति की मृत्यु के बाद लौकिक विरह झेलना पड़ा और जब उन्होंने अपनी प्रणय-भावना को उदात्त बनाकर लौकिक प्रिय के स्थान पर कृष्ण को अपना सर्वस्व, अपना पति मान लिया तो उनकी विरह भावना अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच गयी। MHD 01 Free Solved Assignment

मीरा प्रियतम कृष्ण की प्रेम पीड़ा रात दिन झेलती हैं, वह अपना दर्द किसी से कह भी नहीं सकतीं, अतः प्रेम दीवानी हो जाती है

                       हों री! मैं तो दरद दिवानी 
                
                       मेरो दरद न जाने कोय 
                
                       घायल की गति घायल जानै
                
                       की जिन लाई होय। 

(ग) रीति काव्य में घनानंद का क्या महत्व है?

उत्तर घनानन्द और रीतिकाल के अन्य कवियों के काव्य में जो भेद दिखाई पड़ता है जो उन्हें रीतिकाल का विशिष्ट कवि बनाता है।

1 रीतिकाल के अन्य कवि राज्याश्रित कवि थे, उनकी काव्य-रचना का प्रमुख उद्देश्य अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करना था,

उन्होंने इन राजाओं तथा सामंतों को रिझाने, उनके मनोविनोद के लिए काव्य लिखा जबकि घनानन्द ने अपनी प्रेयसी राजनर्तकी सुजान के सच्चे प्रेम में डूबकर अपने आश्रयदाता को रुष्ट कर दिया और जो कुछ लिखा स्वान्तः सुखाय लिखा, अपनी मार्मिक पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए लिखा।

2 रीतिकाल के अधिकांश कवियों में आचार्य बनने की महत्त्वाकांक्षा थी । मौलिक चिन्तन और उद्भावनाओं की शक्ति न होते हुए भी उन्होंने लक्षण-ग्रंथ लिखे और उदाहरण के रूप में छंद लिखे ।

इन ने दृष्टि कविता कामिनी के बाह्य रूप को सजाने-संवारने पर केन्द्रित थी, अनभति पक्ष की उन्होंने उपेक्षा की । इन्होंने साहित्यशास्त्र की बंधी-बंधाई सरणियों का आश्रय लेकर शृंगार रस की रचनाएं लिखीं ।

इस मानसिकता में लिखी गयी कविता हृदय से निकली अनुभूतियां कम होती हैं, बुद्धि का सहारा लेकर अधिक लिखी जाती हैं । MHD 01 Free Solved Assignment

घनानन्द में यह दोष नहीं था, अतः उनकी कविता में बुद्धि तत्त्व कम है, हृदय पक्ष प्रधान है ओर वही कविता का प्राण होता है।

3 अन्य रीतिकालीन कवियों ने अनुभूति के अभाव में बुद्धि, कल्पना, अनुमान के आधार पर प्रेम की विभिन्न स्थितियों के अलंकृत चित्र प्रस्तुत किये हैं।

इसके विपरीत घनानन्द सच्ची अनुभूति को बुद्धि और कल्पना से श्रेयस्कर मानते थे-बुद्धि को दासी तथा रीझि (प्रेमानुभूति) को पटरानी मानते थे । वह कृत्रिम प्रेम के विरुद्ध थे ऐसे प्रेम-कथन को नीर-मंथन कहते थे जिससे कुछ प्राप्त नहीं होता ।

4 प्रेम के प्रति दृष्टि-भेद के कारण ही घनानन्द अन्य कवियों से विशिष्ट हैं । जहां बिहारी प्रेम को चौगान का खेल बताते हैं और उसमें चालाकी, धूर्तता, दिखावे को बुरा नहीं मानते, वहां घनानंद प्रेम को एक सीधा स्नेहपूर्ण मार्ग बताते हैं

जिसमें चतुराई, कपट, बुरे आचरण के लिए कोई स्थान नहीं अति सूधों सनेह को मारग है जहां नेकु सयानप बांक नहीं तहां सांचे चलें तजि आपनपौ झझक कपटी जो निसाँक नहीं

5 जहां रीतिकाल के अन्य कवियों ने संयोग शृंगार के चित्रों में रति-क्रिया के अश्लील चित्र अंकित करने में भी संकोच नहीं दिखाया है, MHD 01 Free Solved Assignment

वहां घनानन्द के संयोग-चित्रों में नायक-नायिका के मिलन के क्षणों में भी उन्हें अतृप्त, अशांत, बेचैन दिखाया है क्योंकि मिलन के क्षणों में भी उनके मन में विविध भावों की भीड़ इतने तीव्र वेग से उमड़ती है कि संयोग का ऐन्द्रिय सुख लुप्त हो जाता है ।

सुजान से संयोग होने पर कवि की बुद्धि आश्चर्य में डूब जाती है; वह प्रिय का दर्शन भी अच्छी तरह नहीं कर सकता, संयोग के क्षण स्वप्न की तरह टूट जाते हैं।

घनानन्द की विशेषता है कि विरह के क्षणों में तो विरही-युगल अशांत रहते ही हैं, मिलन के क्षणों में भी उन्हें शांति नहीं मिलती

6 घनानन्द नायिका-भेद, नखशिख वर्णन, वयःसंधि आदि रूढ़ियों से मुक्त रहे हैं । उनका मन तो प्रेमी-प्रेमिकाओं के मनोभावों के चित्रण तथा विश्लेषण में ही रमा है ।

नायिका के रूप वर्णन में नख शिख वर्णन की प्रणाली न अपनाकर सौंदर्य का सहज स्वाभाविक वर्णन करते हैं, नायिका की रूप राशि के सामूहिक प्रभाव का वर्णन करते हैं, अतः उसमें गरिमा है- –

झलकै अति सुंदर आनन गौर, छके दृग राजत काननि हुवै ।
हँसि बोलन मैं छवि फूलन की बरषा, उर ऊपर जाति है हुवै।
लट लोल कपोल कलोल करै, कल-कंठ बनी जल जावलि हुवै।
उठै दुति की, परिहै मनौ रूप अबै धर चैं।।

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