IGNOU BPSC 104 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

BPSC 104

BPSC 104 Free Assignment In Hindi

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BPSC 104 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका और महतव की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भारत में बह-दलीय पार्टी व्यवस्था है जिसमें छोटे क्षेत्रीय दल अधिक प्रबल हैं। राष्ट्रीय पार्टियां वे हैं जो चार या अधिक राज्यों में मान्यता प्राप्त हैं। उन्हें यह अधिकार भारत के चुनाव आयोग द्वारा दिया जाता है, जो विभिन्न राज्यों में समय समय पर चुनाव परिणामों की समीक्षा करता है।

इस मान्यता की सहायता से राजनीतिक दल कुछ पहचानों पर अपनी स्थिति की अगली समीक्षा तक विशिष्ट स्वामित्व का दावा कर सकते हैं भारत के संविधान के अनुसार भारत में संघीय व्यवस्था है जिस में नयी दिल्ली में केन्द्र सरकार तथा विभिन्न राज्यों व केन्द्र शासित राज्यों के लिए राज्य सरकार है।

इसीलिए, भारत में राष्ट्रीय व राज्य (क्षेत्रीय), राजनीतिक दलों का वर्गीकरण उनके क्षेत्र में उनके प्रभाव के अनुसार किया जाता है।

राज्य/क्षेत्रीय दलों का विकास-वे दल जिनके पास एक राज्य में पर्याप्त वोट या सीटें हों, उन्हें चुनाव आयोग द्वारा राज्य पार्टी के रूप में अधिकृत किया जा सकता है।

संबंधित राज्य में राज्य दल के रूप में मान्यता मिलने से दल को एक विशेष चुनाव चिन्ह आरक्षित करने का विकल्प मिल सकता है। एक पार्टी को एक या अधिक राज्यों में मान्यता प्राप्त हो सकती है। चार राज्यों में मान्यता प्राप्त पार्टी को स्वतः ही एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है।

भारत में क्षेत्रीय दलों का इतिहास काफी पुराना है । हमारे देश में अनेक क्षेत्रीय दली का उदय विशेष परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुआ है । पंजाब में 1920 से ही अकालियों की राजनीति चलती आ रही है । कश्मीर में पहले मुस्लिम कांफ्रेंस बनी जिसे बाद में नेशनल कान्फ्रेंस के नाम से जाना गया ।

तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी का गठन हुआ 1949 व में द्रमुक पार्टी का गठन हुआ । इसके अतिरिक्त बंगला कांग्रेस, केरल कांग्रेस, उत्कल कांग्रेस जैसे कांग्रेस क्षेत्रीय दलों तथा विशाल हरियाणा पार्टी, गणतंत्र परिषद आदि का भी उदय हुआ है । BPSC 104 Free Assignment In Hindi

ये सभी दल अलग-अलग राज्यों में प्रभावशाली है न कि किसी विशेष क्षेत्र में क्षेत्रीय दलों के उदय के कारण भारत एक बहुभाषी, बहुजातीय, बहुक्षेत्रीय और विभिन्न धर्मों का देश है । भारत जैसे विशाल एवं विभिन्नताओं से भरे देश में क्षेत्रीय दलों के उदय के अनेक कारण हैं |

पहला प्रमुख कारण जातीय, सांस्कृतिक एव भाषायी विभिन्नताएँ हैं । विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की अपनी समस्याएँ होती हैं जिन पर राष्ट्रीय दलों या केन्द्रीय नेताओं का ध्यान नहीं जाता परिणामस्वरूप क्षेत्रीय दलों का उदय होता है ।

दूसरा केन्द्र अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से करता रहा है । केन्द्र की शक्तियों के केन्द्रीयकरण की इसी प्रवृत्ति के कारण अनेक क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ है ।

तीसरा, उत्तरी भारत की प्रधानता को लेकर आशंकाएँ भी क्षेत्रीय दलों के उदय का कारण रहा है । क्षेत्रीय दलों के उदय का चौथा प्रमुख कारण कांग्रेस दल की संगठनात्मक दोष भी है ।

केन्द्र में कांग्रेस की स्थिति तो मजबूत थी परन्तु राज्यों में कांग्रेस संगठन विखरता जा रहा था परिणामस्वरूप कांग्रेस में संगठन संबंधी फूट और कमजोरियाँ आ गई और राज्य स्तर के अनेक नेताओं ने क्षेत्रीय दलों के गठन में प्रमुख भूमिका निभाई । पाँचवा, क्षेत्रीय दलों उदय का कारण जातीय असंतोष भी रहा है ।

अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सामाजिक न्याय की माँग हेतु भी क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ है । BPSC 104 Free Assignment In Hindi

क्षेत्रीय दलों का स्वरूप हमारे देश में मुख्य रूप से तीन प्रकार के क्षेत्रीय दल पाए जोते हैं । पहला वे दल जो जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा सामुदायिक हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं एवं उन पर आधारित हैं ।

ऐसे दलों में अकाली दल, द्रमुक, शिवसेना, नेशनल कांफ्रेस, क्षारखण्ड पार्टी, नागालैण्ड नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी आदि प्रमुख हैं ।

दूसरे वे दल जो किसी समस्या विशेष को लेकर राष्ट्रीय दलों विशेष रूप से कांग्रेस से पृथक होकर बने हैं ।ऐसे दलों में बंगला कांग्रेस, केरल कांग्रेस, उत्कल कांग्रेस, विशाल हरियाणा आदि है ।

तीसरे प्रकार के दल वे दल हैं जो लक्ष्यों और विचारधारा के आधार पर तो राष्ट्रीय दल हैं किन्तु उनका समर्थन केवल कुछ लक्ष्यों तथा कुछ मुद्दों में केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। ऐसे दलों में फारवर्ड ब्लॉक मुस्लिम लीग, क्रान्तिकारी सोशलिस्ट पार्टी आदि प्रमुख हैं ।

अकाली दल एक राज्य स्तरीय दल है जिसका स्वरूप धार्मिक राजनीतिक रहा है ।

जब भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न उठा तो अकाली दल ने पंजाबी भाषा राज्य की माँग की जिसके परिणामस्वरूप 1966 में पंजाबी भाषा राज्य का गठन हुआ द्रविड़ मुन्नेत्र कडगम और अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम का गठन छुआ छुत एवं जात-पात के बन्धनों को मिटाने के लिए हुआ था ।

इन दोनों क्षेत्रीय दलों का उद्धेश्य है कि समाज के पिछड़े बर्गों को समान अवसर दिए जाए तथा छुआ छूत को पूरी तार समाप्त किया जाए, तमिल भाषा का एवे सस्कृति का प्रचार एवं हिन्दी के जबरनलादे जाने का विरोध किया जाए आदि बहुजन समाज पार्टी का लक्ष्य भी ब्राह्मणवाद का विरोध है,

इनकी मॉग थी कि ऐसी व्यवस्था की जाये जिसमे किसी भी वर्ग या जाति के लिए आरक्षण की आवश्यकता नहीं रहे । मुस्लीम लीग का मुख्य उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के हितों की रक्षा करनी है ।

कांग्रेस दल के कमजोर होने के कारण क्षेत्रीय एच राज्यस्तरीय दलों का महत्त्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका-भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है इस नाते इस देश में प्रत्येक व्यक्ति, जाति, वर्ग और समाज की आवाज सत्ता के केन्द्र तक पहुंचे इसकी व्यवस्था की गई है।

पिछले कुछ दषकों से हो रहे चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो यह समझ आता है कि वर्तमान में ये क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

क्षेत्रीय दलों के कारण इन राष्ट्रीय दलों को कई राज्यों में इनका सहारा लेना पड़ता है और हालात ये है कि भारतीय जनता पार्टी जो वर्तमान में केन्द्र की सत्ता में उसका कई राज्यों में वजूद तक नहीं है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस जिसने सबसे लम्बे समय तक देश में राज किया है वह अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है।

क्षेत्रीय दलों के बढ़े प्रभाव ने इन राष्ट्रीय दलों के समक्ष कई जगह तो अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण हो गई है ।

आज राजनीतिक महाकुण्ड में क्षेत्रीय दलों को जो महत्त्व दिया जा रहा है उसका देश के एकात्मक संधीय ढाँचे पर गम्भीर बहुमुखी प्रभाव पड़ेगा ।

हमारे यहां पर क्षेत्रीय दल कुकुरमुत्तों की भांति है। ये दल वर्ग संघर्ष और प्रांतवाद-भाषावाद के जनक हैं। कुछ पार्टियां वर्ग संघर्ष को कुछ पार्टियां प्रांतवाद और भाषावाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियां बन गयीं हैं।

इनकी तर्ज पर जो भी दल कार्य कर रहे हैं उनकी ओर एक विशेष वर्ग के लोग आकर्षित हो रहे हैं, जिन्हें ये अपना वोट बैंक मानते हैं। इस वोट बैंक को और भी सुदृढ़ करने के लिए ये दल किस सीमा तक जा सकते हैं-कुछ कहा नहीं जा सकता।

देश के सामाजिक परिवेश में आग लगती हो तो लगे, संविधान की व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ती हों तो वे भी उड़ें राष्ट्र के मूल्य उजडते हों तो उजडें इन्हें चाहिए केवल वोट इनकी इस नीति का परिणाम यह हुआ है कि भाषा प्रांत और वर्ग की अथवा संप्रदाय की राजनीति करने वालों के पक्ष में पिछले 20 वर्षों में बड़ी शीघ्रता से जन साधारण का ध्रुवीकरण हआ है। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

भाषा, प्रांत और वर्ग की कट्टरता के कीटाणु लोगों के रक्त में चढ़ चुके हैं फैल चुके हैं और इस भांति रम चुके हैं कि जनसाधारण रक्तिम होली इन बातों को लेकर कब खेलना आरंभ कर दे-कुछ नहीं कहा जा सकता।

क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों को अपने राज्य में चुनाव लड़वाते हैं और राज्य की राजनीति में राष्ट्रीय दलों का सहयोग लेकर सत्ता पर आसीन होते हैं ।

इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिनको अपने राज्य की राजनीति के लिए राष्ट्रीय दलों के सहारे की भी जरूरत नहीं है और जब ये क्षेत्रीय दल राष्ट्र की राजनीति में आते हैं तो ये राष्ट्रीय दल इनके सहारे से अपनी सरकार बनाते हैं।

क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय हितों की रक्षा के नाम पर या जाति व्यवस्था के नाम पर उदित होते हैं और इसी कारण ये अपना प्रभाव अपने राज्य में बनाने में सक्षम रहे हैं।

जातिय, भाषायी, सांस्कृतिक विभिन्नता एवं देश की विशालता भी क्षेत्रीय दलों के जन्म का प्रमुख कारण रही है।

एक बड़ा कारण क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व में आने का कांग्रेस पार्टी भी रही है। कांग्रेस पार्टी में जब जब संगठन में बिखराव हुआ तब तब कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपने अपने क्षेत्र में दल बनाए और कांग्रेस से अलग हो गए।

ममता बनर्जी, शरद पंवार, स्वर्गीय पी ए संगमा सहित ऐसे कई उदाहारण है जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपने दल बनाए और आज वे कांग्रेस के लिए सरदर्द बने हुए हैं।

इस तरह क्षेत्रीय दल के नेताओं की सोच अपने क्षेत्र विशेष की जाति, समाज व क्षेत्र के विकास की रहती है और इस कारण राज्य स्तर पर तो यह दल खूब विकसित हो जाते हैं परंतु जब देश की राजनीति की बात आती है तो ये दल देश की राजनीतिक सोच के आगे बौने नजर आने लगते हैं।

सिर्फ सीट पाने की महत्वकांक्षा के कारण और अपने पास सर गिनाने लायक सीटे होने के कारण इस दल के नेता पद पा लेते हैं, ऐसे हालात में राष्ट्रीय दलों की मजबूरी होती है कि वे इन क्षेत्रीय दलों को महत्व दें और अपनी पार्टी लाइन से हटकर इनके साथ समझौता करें। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 2. भारत की चुनावी राजनीति में मतदान व्यवहार के निर्धारक के रूप में जाति की भूमिका समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

उत्तर मत व्यवहार का अध्ययन चुनाव अध्ययनों का एक हिस्सा है। चुनावों के अध्ययन के विषय को सेफोलोजी कहते हैं। इसका उद्देश्य चुनावों के दौरान मतदाताओं के व्यवहार के बारे में प्रश्नों का विश्लेषण करना होता हैं।

मतदाता किसी उम्मीदवार को वोट क्यों देते हैं? या वे चुनाव में एक ही पार्टी को क्यों पसंद करते हैं? क्या ये आर्थिक कारक? क्या यह मजबूत नेतृत्व या करिशमाई नेतृत्व हैं? ये कुछ सवाल हैं जिन पर मतदान के निर्धारकों के संबंध में अध्ययन किया जाता है।

भारत में राजनीतिक विद्धान, समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, मीडिया हाउस और राजनीतिक दल चुनावी अध्ययनों में लगे हुए हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में 1951-52 के प्रथम आम चुनावों के समय से 1950 के दशक से चुनाव अध्ययन शुरू हुए थे। लेकिन व्यवस्थित तरीके से चुनावी अध्ययन 1960 के दशक से शुरू हुए थे।

रजनी कोठारी और मायरन वीनर जैसे राजनीतिक वैज्ञानिकों ने इसका आरंभा किया था। जाति मतदान व्यवहार का सबसे प्रमुख कारक माना जाता है। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

यद्यपि जाति स्वतंत्र भारत में चुनाव का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी तत्व है लेकिन 1990 के दशक से यह अधिक प्रभावशील हो गया है।

इसका प्रमुख कारण है वी.पी. सिंह सरकार ने ओ.बी.सी. के लिये मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना था जिसने केन्द्र सरकार की संस्थाओं में इन वर्गों के लिये आरक्षण का सुझाव दिया था।

इसने उत्तर भारत में प्रमुख दलों जैसे बी.एस. पी., एस.पी. और आर.जे.डी. को उभरने का मौका दिया।

इन राजनीतिक दलों की पहचान दलितों, पिछड़े वर्गों या कृषक वर्गों के दलों के रूप में हुई है। इनके उदय के पूर्व काँग्रेस पार्टी विभिन्न जातियों के गठबंधन का प्रतिनिधित्व करती थी।

इन पार्टियों ने निम्न जातियों के महत्व को रेखांकित किया है और इन जातियों ने चुनावी राजनीति में अपनी अहम भूमिका निभाई है।

इन जातियों के उदय ने विभिन्न जातियों के बीच प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा दिया है। भारत में चुनावी अध्ययनों से यह पता चला है कि भारत में लोकतंत्र के स्तर में जाति एक महत्वपूर्ण मापदंड के तौर पर कार्य करती है।

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि विभिन्न जातियों की विशेषकर दलितों एवं पिछड़े वर्गों की भागीदारी ने लोकतंत्र में एक शांत क्रांति (Silent Revolution) अथवा प्रजातांत्रिक उथल-पुथल का संकेत दिया है।

जाति के राजनीतिकरण ने कमजोर वर्गों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समुचित भूमिका निभाने का अवसर प्रदान किया है। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

राजनीतिक दल भी अपने कार्यक्रमों, घोषणा पत्रों को बनाते समय जाति का विशेष ध्यान रखते हैं। जाति नीति-निर्माण को भी प्रकाशित करती है।

राजनीतिक दल अपने प्रत्यशियों का चयन उनकी जाति के आधार पर तय करते हैं। जो प्रत्याक्षी चुनाव लड़तें हैं वो सीमित जातियों से होते हैं लेकिन जो जातियाँ मतदान में हिस्सा लेती हैं वो संख्या में अधिक होती है।

ऐसे मामलों में, जातियाँ अपनी-अपनी जाति के प्रत्याशियों को वोट देती हैं।

क्या इसका अर्थ यह है कि जाति का महत्व कम हो जाता है? क्योंकि मतदाता उम्मीदवारों के लिये अपनी जाति के साथ-साथ अन्य जाति के प्रत्याशी को भी वोट देते हैं।

आमतौर पर जाति समूह (एक से अधिक जातियाँ) ऐसे उम्मीदवार को वोट देने का निर्णय करता है जो अपनी जाति का नहीं होता क्योंकि मतदान देने वाली जातियाँ अनेक होती हैं तथा उम्मीदवार एक जाति का होता है।

शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में चुनावों में जाति अधिक निर्धारक कारक होता है। जाति कारक न केवल पार्टी के गठन को प्रभावित करता है बल्कि, राष्ट्रीय पार्टी के साथ जाति विशेष के संबंध को भी प्रभावित करता है।

जैसा कि पुष्पेन्द्र ने एक लेख में उल्लेख किया है, जिसमें 11वीं लोकसभा चुनाव (1996) में उच्च जाति के नेताओं ने खासकर उत्तरी भारत में काँग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और भाजपा के पीछे चले गये।

आंतरिक विभाजन तथा संघर्षों क बावजूद क्षेत्रीय दलों और पिछड़ी जातियों के उदय को विभिन्न क्षेत्रीय दलों और मतदाताओं के रूप में जबरदस्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला है।

जिन पक्षों की पहचान विशिष्ट जातियों के साथ की जाती है, वे मुख्य जातियों में अपना समर्थन आधार बनाए रखना चाहते हैं। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

जिन पार्टियों का समर्थन का आधार प्रमुख जातियां होती है वो उन्हें बनाए रखना चाहती है। उदाहरण के तौर पर बी. एस.पी., एस.पी., आर.जे.डी., जे.डी.यू.। इन पार्टियों का आधार दलित एवं पिछड़े वर्ग हैं जबकि बी.जे.पी. का आधार मुख्यता उच्च जातियां है।

लेकिन कई अवसरों पर जातियों का एक वर्ग अन्य पार्टियों को भी समर्थन करता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि ये जातियाँ अपने दलों से असंतुष्ट हो जाती है। उदाहरण के लिए यू.पी. में 1990 में, कई पिछड़ी जातियों ने बी.जे.पी. को समर्थन दिया था।

शोधकर्ताओं ने इसे बी.जे.पी. का मंडलीकरण कहा था। इस शताब्दी के प्रथम दशक तक कई उच्च जातियों ने बी.एस.पी. एवं एस.पी. का भी समर्थन किया था। शाह के अनुसार पाटियाँ विभिन्न जातियों के सदस्यों को पार्टी का टिकट देकर अकॉमॉडेट (शामिल) करती हैं।

1950 के दशक के चुनावों के दौरान, जातिवादी संगठनों ने अपनी एकता बनाये रखी और अपने समर्थकों को वोट देने के लिए उत्साहित किया।

उन्होंने अपनी जाति के अपने सदस्य को वोट देने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया चाहे वे किसी भी दल के उम्मीदवार हों। तथापि, कभी भी जातियाँ एकजुट (en bloc) जाति के आधार पर वोट नहीं डालती हैं।

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सत्रीय कार्य – II

प्रश्न 3. अलग तेलंगाना राज्य आंदोलन के कारणों की व्याख्या करें।

उत्तर सन् 2014 में आंध्र प्रदेश राज्य के कुछ जिलों को मिलाकर तेलंगाना राज्य का निर्माण हुआ था। एक राज्य बनने से पहले तेलंगाना आंध्र प्रदेश राज्य का विशेष पहचान वाला राज्य था।

यह आंध्र प्रदेश के दो अन्य क्षेत्रों – रायलसीमा और तटीय आंध्र से भिन्न था। हैदराबाद निजाम के शासन में तेलगाना हैदराबाद राज्य तथा तेलंगाना और आंध्र मद्रास प्रेजिडेंसी के हिस्से थे।

कांग्रेस तथा भारतीय कम्युनिस्ट दल ने तेलंगाना, आंध तथा रायलसीमा क्षेत्रों को भाषा के आधार मिलाकर एक आंध्र राज्य बनाने की माँग की थी। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

1953 आंध्र तेलुगु भाषा के आधार पर एक राज्य निर्माण की मांग गांधीवादी पाँटी श्रीरामलू के लिए भूख हड़ताल की थी जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। उन्होंने मांग की थी आंध्र प्रदेश को भूतपूर्व मद्रास प्रेजीडेस तथा हैदराबाद राज्य के तेलंगाना क्षेत्रों को मिलाकर बनाया जाए।

पाँटी श्रीरामलू की मृत्यु के बाद केंद्रीय सरकार राज्य पुर्नगठन आयोग (एस. आर. सी.) की स्थापना की जिसका उद्देश्य नये राज्यों के निर्माण की आवश्यकताओं तथा उनके आधारों की जाँच करना था।

एस. आर. सी. ने 1955 में रिपॉर्ट जमा की तथा पाया की तेलंगाना , रायलसीमा तथा तटीय आंध्र क्षेत्रों में एकरूपता का अभाव था।

आयोग ने एक पाँच साल के लिए तेलंगाना राज्य बनाने का सुझाव कुछ शर्तों के आधार पर किया। यह शर्त थी कि तेलंगाना राज्य के अस्तित्व में आने के पाँच साल बाद तेलुगु भाषा के आधार पर तेलंगाना के साथसाथ तटीय आध और रायलसीमा को मिलाकर एक राज्य का निर्माण किया जाए।

परन्तु पाँच साल की समाप्ति से पहले तेलुगु भाषा के आधार पर 1956 में रायलसीमा, तटीय आंध्र और तेलंगाना को मिलाकर आंध्र प्रदेश राज्य का निर्माण किया गया।

आंध्र प्रदेश के निर्माण को तेलंगाना क्षेत्र में इस संदेह के साथ देखा गया कि यह उनके ऊपर आंध्र क्षेत्र के लोगों कावर्चस्व स्थापित कर देगा क्योंकि तेलंगाना क्षेत्र के लोग आंध्र क्षेत्र के लोगों से आर्थिक और शैक्षिक आधार से पिछड़े थे। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

यह आशंका इसके बावजूद हुई कि आन्ध्र प्रदेश के विभिन्न क्षेत्र एक समान तेलुगु भाषा बोलते थे। आंध्र राज्य बनने के विरोध में एक आंदोलन हुआ। जिसके परिणामस्वरूप तेलंगाना और आंध्र क्षेत्रों के कांग्रेसी नेताओं के मध्य 1956 में एक समझौता हुआ।

इस समझौते के जेटिलमेन एग्रीमेंट (Gentleman Agreement) के नाम से जाना गया था तथा इसका उद्देश्य तेलंगाना क्षेत्र के हितों की रक्षा करना था। अन्य आश्वासनों के साथ, जेंटिलमेन एग्रीमेंट के दो मुख्य आश्वासन थे।

प्रथम, एक क्षेत्रीय समिति का निर्माण किया जाएगा जो क्षेत्रीय समस्याओं का निरीक्षण कर उनके समाधान का सुझाव देगी। द्वितीय, यदि मुख्यमंत्री एक क्षेत्र से होगा तो उपमुख्यमंत्री दूसरे क्षेत्र से होगा।

जेंटिलमेन एग्रीमेंट के हस्तातरित होने के कुछ समय पश्चात तेलंगाना क्षेत्र के लोग में रोश पैदा हो गया कि समझौते का पालन नहीं किया गया।

तेलंगाना क्षेत्र के लोगों ने शिकायत की कि उनका क्षेत्र आतंरिक उपनिवेश बन गया; विद्यार्थी, नौकरशाह, अध्यापक, वकील तथा व्यापारी आंध्र क्षेत्र से थे; उनका मानना था कि तेलंगाना आंध्र प्रदेश में एक पिछड़ा क्षेत्र बना रहा।

नवयुवकों के एक बुद्धिजीवी समूह ने तेलंगाना प्रजा समिति (टीपीएस) का निर्माण किया जो एक गैर राजनीतिक संगठन था तथा जिसका उद्देश्य तेलंगाना राज्य के लिए लामबंदी करना था।

टी पी एस के निर्माण के कुछ समय पश्चात् इसमें चेन्ना रेडडी तथा काँडा लक्ष्मण जैसे राजनीतिज्ञ शामिल हो गए। टीपीएस ने 1971 को लोक सभा चुनाव तेलंगाना राज्य बनाने के मुद्दे पर लड़ा। इसने तेलंगाना क्षेत्र की 14 में 10 सीटों पर विजय प्राप्त की। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

चुनाव के बाद टीपीएस का कांग्रेस में विलय हो गया तथ तेलंगाना का मुद्दा पीछे रह गया, यद्यपि, एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय की हैदराबाद में स्थापना हो गई थी।

1985 में जी. ओ. 610 द्वारा एन टी रामाराव के नेतृत्व वाली टी.डी पी. सरकार ने तेलंगाना क्षेत्र की समस्याओं को सम्बन्धित किया। इस जी. ओ. में नौकरिये में कुछ चयनों पर तेलंगाना में वहाँ के लोगो को रखने का आश्वासन दिया गया।

यद्यपि चद्रबाबू नायडू की सरकार तेलंगाना राज्य निर्माण की विरोधी थी,

इसने जी. ओ. 610 के लागू करने के उद्देश्य से एक व्यक्ति की सदस्यता वाले आयोग – जे. एस. गर्गलान आयोग की नियुक्ति की गर्गलानी आयोग के अनुसार जी. ओ. 610 का उलंघन किया गय तथा तेलंगाना क्षेत्र के व्यक्तियों के स्थान पर आंध्र क्षेत्र के व्यक्तियों की नियुक्ति की गई तेलंगाना राज्य की मांग को 2001 में के. चंद्रषेखर (के सी आर) द्वारा स्थापित तेलंगान राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) ने फिर से उठाया। इसने 2004 के लोकसभा तथा विधानसभ चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा।

टी आर एस – कांग्रेस गठबंधन ने 2004 में सरकार बनाई, जिसमें कांग्रेस का मुख्यमंत्री बना। केंद्र में भी टीआरएस कांग्रेस के साथ यूपीए क सदस्य थी। यूपीए सरकार ने एक उप-समिति का गठन किया जिसके प्रणव मुखर्जी तथा शरद पवार सदस्य थे।

इस समिति का उद्देश्य तेलंगाना राज्य निर्माण के मुद्दे की समीक्षा करना था। इस समय, कांग्रेस तथा टीआरएस में मतभेद हो गए। परिणामस्वरूप 2006 में टीआरएस यूपीए से बाहर निकल गया।

प्रश्न 4. मल आयोग की रिपोर्ट पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर कालेकर रिपोर्ट की सिफारिशों को अस्वीकार करने से पिछड़े वर्ग नाराज हो गये। 1950 के दशक में कालेकर की रिपोर्ट को अस्वीकार किये जाने के समय से लेकर 1990 में वी. पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा तक पिछड़े वर्ग, समाजवादी नेताओं और राजनीतिक दलों तथा किसानों के नेताओं ने केन्द्र में सर्वजनिक स्थानों पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू करने के लिए समर्थन प्राप्त किया।

राज्यों में आरक्षण के संबंध में दक्षिण भारत के राज्यों में 1950 से 1970 के दशकों में आरक्षण लागू कर दिया था और उत्तर भारतीय राज्यों में यह माँग अधिक बनी रही।

1970 के दशक के मध्य तक सार्वजनिक संस्थाओं में पिछड़े वर्गों का आरक्षण समाज के लिए एक साझा एजेंडा बन गया। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

किसान नेता चौधरी चरण सिंह को किसानों का खासकर जाट, यादव, कुर्मियों का समर्थन था तथा हिंदी बेल्ट में अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग फेडरेशन (ए.आई.बी.सी.एफ) का भी बना। 1977-79 में जनता पार्टी ने केन्द्र में सरकार बनाई थी उसमें मुख्य रूप से पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व था।

पिछड़े वर्गों की पहचान करते और केन्द्र सरकार के संस्थानों में आरक्षण शुरू करने के प्रयास सुझाने के लिए मोरारजी देसाई सरकार पर दबाव डाला गया और पिछड़ा वर्ग आयोग गठन करने की माँग की गई।

इस प्रकार 1979 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने दूसरे पिछड़े वर्ग आयोग का गठन किया जिसे हम मंडल आयोग के नाम से जानते हैं। इसके अध्यक्ष बी. पी. मण्डल थे।

मंडल आयोग ने पिछड़ेपन के लिए ग्यारह मापदंड तय किये थे और उन्हें तीन श्रेणियों में रखा। इनमें सामाजिक, आर्थिक और शेक्षिक श्रेणी थी जो कि पिछड़े वर्गों की पहचान कर सके।

आयोग ने लगभग 3743 जातियों की पहचान की जो कि पिछड़े वर्ग में आ सके इनकी जनसंख्या करीब 52 प्रतिशत थी। जैसा कि सब जानते हैं 1931 की जनगणना के बाद जाति जनगणना हुई थी।

इसी जनगणना को आधार बनाकर मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों की पहचान की थी। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1980 में पेश की थी। इसके बाद इसे लागू करने की माँग उठने लगी।

विभिन्न राजनीतिक दलों के ओ.बी.सी. नेताओं ने इसे लागू करने की माँग उठाई। काँग्रेस से निकलने के बाद वी. पी. सिंह ने जनता दल का गठन किया। जनता दल में कई ओ.बी.सी. नेता भी शामिल थे।

इसके परिणामस्वरूप जनता दल के चुनावी घोषणा पत्र में मंडल आयोग की सिफारिसों को लागू करने को शामिल किया गया था। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

1989 के लोक सभा चुनावों में इसे विशेष रूप से घोषणा पत्र में शामिल किया गया था। इन चुनावों में काँग्रेस की पराजय हुई थी और वी. पी. सिहं ने नेतृत्व (1989-90) में गैर काँग्रेसी दल जनता दल की सरकार बनी थी।

यह एक गठबंधन की सरकार थी जिसमें राष्ट्रीय मोर्चा और वाम-मोर्चा शामिल थे। क्योकि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की माँग घोषणा पत्र में शामिल थी इसलिए वी.पी. सिंह की सरकार ने जुलाई, 1990 में इसे लागू करने की घोषणा की।

इस रिपोर्ट के लागू हाने के बाद देश में हिंसात्मक प्रदर्शन हुए, विशेषकर उत्तर भारत में।

कई याचिकाएं भी इसके खिलाफ दायर हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी याचिकाओं को एक साथ 1992 में इन्द्रा साहनी बनाम सरकार के मामले में सुनवाई की।

इसने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के विधि को उचित ठहराया। लेकिन इसमें कुछ शर्ते लगाई: पहली, इन वर्गों के अंदर क्रीमी लेयर लोगों को (आर्थिक रूप से मजबूत) लोगों को इससे बाहर रखा जाये।

उन्हें ओ.बी.सी. आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इसका मतलब है कि गैर क्रीमी लेयर, को आय की न्यूनतम सीमा में रखी गयी है। दूसरी, आरक्षण की अधिकतम सीमा वर्गों को 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।

इसमें एस.सी., एस. टी. के लिए 22.5 प्रतिशत रखी गयी जबकि ओ.बी.सी. के लिये यह सीमा 27.5 प्रतिशत रखी गयी थी। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मुताबिक सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को 1993 में स्वीकार कर लिया था। 2006 में यू.पी.ए. ने सरकार ने केन्द्रिय सरकार ने शैक्षिक संस्थाओं में ओ.बी.सी. आरक्षण का विस्तार कर दिया था।

प्रश्न 5. बहुदलीय व्यवस्था पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर बहु-दलीय प्रणाली यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें दो से अधिक दल मौजूद है जो सत्ता के लिए एक दूसरे के साथ संघर्ष करते है।

भारत और कई यूरोपीय देशों के पास एक बहुआयामी प्रणाली ही बहु-दलीय प्रणाली में तीन, चार या इससे अधिक दल गठबंधन सरकार बनाने और शासन के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम अपनाने के लिए एकजुट होते है।

बहुदलीय प्रणाली दो प्रकार की है: अस्थिर और स्थिर काम कर रहे भारत में 1996-1998 के दौरान इस प्रणाली की तरह बर्ताव करती है। और इस प्रकार सरकार को स्थिरता प्रदान करती है।

हालांकि उनमें दो से अधिक राजनैतिक दल हैं। बहुदलीय प्रणाली गठबंधन सरकार को बढ़ावा देती है और 1990 के दशक से भारत में गठबंधन सरकार रही हैं।

इस प्रणाली की कमी यह है कि मंत्रीपरिषद के सदस्य अपने दल के अध्यक्षों के नेतृत्व में कार्य करने के बजाय ब्लैकमेल (भयादोहन) या सरकार में फेर बदल करने के लिए प्रयास करते है। सरकार की अस्थिरता इस प्रकार की पार्टी पदति में एक समस्या थी। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 6. उग्रवाद (Insurgency) और आतंकवाद (Terrorism) में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- आतंकवाद आधुनिक दुनिया का एक हिस्सा बन गया है और हम सभी आतंकवाद के भयानक परिणामों से अवगत हैं। वास्तव में, दुनिया सभ्य दुनिया के चेहरे से इस आधुनिक बुराई को निकालने के लिए एकजुट तरीके से आतंक पर एक युद्ध लड़ रही है।

धार्मिक या राजनैतिक छोर को हासिल करने के लिए हिंसा का इस्तेमाल या हिंसा का खतरा व्यवस्थित तरीके से होता है जो निर्दोष लोगों के साथ सॉफ्ट टारगेट बनता है। उग्रवाद नामक एक और संबंधित शब्द है जो दुनिया के कई देशों को परेशान कर रहा है।

आतंकवाद और उग्रवाद के बीच लोगों में दो अवधारणाओं की बराबरी करने के लिए बहुत समानता है। यह लेख आतंकवाद और उग्रवाद के बीच के अंतर को उजागर करने का प्रयास करता है।

यह एक तथ्य है कि, आधुनिक समय में, समाजों में हमेशा ऐसे लोग और समूह होते हैं, जो उन लोगों की नीतियों और कार्यक्रमों से दुखी महसूस करते हैं जो अधिकार में हैं और विद्रोह का मंचन करके अपने लिए स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

यह ध्यान में रखना होगा कि विद्रोह उन लोगों द्वारा किया जाता है, जिन्हें जुझारू के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।

विद्रोही उस अधिकार को कायम रखने की कोशिश करते हैं जो अन्य देशों और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त है। विद्रोह का एक राजनीतिक मकसद होता है जिसमें सरकार के शासन से आजादी हासिल करना होता है।

लोकप्रिय जनसमर्थन पर हारने वाले छोटे विद्रोह को ब्रिगैंडरी कहा जाता है और इस विद्रोह में भाग लेने वाले लोगों को ब्रिगेड कहा जाता है न कि विद्रोही।

उग्रवाद एक ऐसी समस्या है जिसका सामना ज्यादातर देशों में कई जातीय पहचान या समाजों में विभाजन से होता है, जो कुचल आकांक्षाओं और आशाओं को जन्म देता है।

उग्रवाद को एक संप्रभु राज्य की आंतरिक समस्या के रूप में माना जाता है, और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है।

आतंकवाद और उग्रवाद में क्या अंतर है?

. उग्रवाद जगह में अधिकार के खिलाफ एक विद्रोह है और ज्यादातर स्थानीयकृत है जबकि आतंकवाद कोई सीमा नहीं जानता है। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

. जबकि आतंकवाद की कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा नहीं है क्योंकि इस तथ्य के कारण कि एक व्यक्ति का आतंकवादी दूसरे व्यक्ति का स्वतंत्रता सेनानी है, निर्दोष नागरिकों के मन में आतंक पैदा करने के लिए हिंसा का उपयोग आतंकवाद का मूल उद्देश्य है।

. विद्रोह एक सशस्त्र विद्रोह या विद्रोह है जिसका एकमात्र उद्देश्य सरकार को उखाड़ फेंकना है।

. कभी-कभी आतंकवाद और उग्रवाद अविभाज्य होते हैं, लेकिन सभी विद्रोह आतंकवाद को अधिकार के रूप में उखाड़ने की विधि के रूप में उपयोग नहीं करते हैं.

. आतंकवाद लोगों के समूह की दुर्दशा की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए एक चतुर चाल है।

प्रश्न 7. जाति संगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दे क्या हैं?

उत्तर जाति संगठनों द्वारा उठाये गये मुद्दों में प्रमुख – आत्म-सम्मान, गौरव, मानव अधिकार, न्याय, संसाधनों का बंटवारा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, और जाति के अंदर आंतरिक समस्याऐं इत्यादि होते हैं।

दलित एवं अन्य पिछड़े वर्ग के संगठन वर्तमान में जारी आरक्षण को सही मानते हैं तथा वे इस निजि क्षेत्र में भी लागू करने की माँग कर रहे हैं। कुछ उच्च जातीय संगठन भी उच्च जातियों के लिए आरक्षण की माँग करते हैं।

इसके जवाब में अभी हाल ही में 124वां संविधान में संशोधन करके आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई है जिसमें उच्च जातियाँ भी शामिल है।

रूडोल्फ एण्ड रूडोल्फ के अनुसार जाति संगठन जातियों को सशक्त बनाने में अपनी लोकतांत्रिक भूमिका निभा रहे हैं। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

यद्यपि, सभी जातियों ने अपने संगठन बना लिये हैं, लेकिन दलित एवं पिछड़े वर्गों के संगठन अपने वर्गों को सशक्त बनाने में अपनी भूमिका अधिक निभा रहे हैं।

ये संगठन न केवल आंतरिक मतभेद एवं विवादों को सुलझाते हैं बल्कि, चुनावों में भी भागीदारी के लिए लोगों को संगठित करते हैं। कई प्रकार के मुद्दों को वे उठाते हैं जैसे, आत्म-सम्मान, जाति-आधारित हिंसा, उत्पीड़न, शारीरिक प्रताड़ना तथा मानव अधिकार जैसे ‘मुद्दे भी शामिल हैं।

इसके अलावा भी मुद्दे है जैसे आरक्षण, छूआछूत इत्यादि। ये सभी मानव अधिकार से जुड़े मुद्दे है क्योंकि यू.एन, मानव अधिकार की परिभाषा के अनुसार वे सभी अधिकार जो कि व्यक्ति से जुड़े हुए हों, मानव अधिकार की श्रेणी में आते हैं।

जातिगत संगठन अपनी जाति के सदस्य जिन्होंने परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त किया था खेल एवं अन्य गतिविधि में नाम कमाया है उनको सम्मानित करते हैं।

ये संगठन इनके सम्मान में समारोह भी आयोजित करते हैं कई संगठन डा. अम्बेडकर के नाम पर भी बनाये गये है जिनका मकसद डा. अम्बेडकर के विचारों को प्रसारित करना तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है।

प्रश्न 8. कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला क्या है?

उत्तर अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधानों की सीमाएं हैं। इनमें से प्रमुख सीमाएं इस प्रकार है:- पिछड़े वर्गों की जातियों का एक समूह है, जिनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक स्तर असमान हैं।

अन्य पिछड़े वर्गों में राजनीतिक और आर्थिक रूप में प्रभावशाली कृषि समुदाय जैसे यादव, कुर्मी, जाट, बोकालिण्गा, गुर्जर इत्यादि शामिल है तथा सामाजिक रूप से उपेक्षित जातियां भी थी जो “जजमानी व्यवस्था से जुड़ी थी, BPSC 104 Free Assignment In Hindi

जिन्हें हम अति पिछड़े वर्ग (एम.बी.सी.) के रूप में भी जानते हैं। हालांकि इनमें बड़ी संख्या में जातियां है, लेकिन एकल जातियों की तुलना में उनकी संख्या बहुत कम है।

अति पिछड़े वर्गों का आरोप है कि अपनी प्रबल स्थिति के कारण; किसान जातियाँ या मध्यम जातियों अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का उपयुक्त बड़ा हिस्सा प्राप्त करने में सफल रही है।

उनकी यह माँग है कि अन्य जातियों के कोटा को विभिन्न जातियों में विभाजित किया जाये। इसकी मांग उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में उठाई जाने लगी।

कर्पूरी ठाकुर सूत्र का सुझाव था कि कोटे को उप-विभाजित किया जाये। जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे. 1970 में उन्होंने पिछड़े वर्ग को अत्यंत पिछड़े वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ई.बी.सी.) के नाम से विभाजित करके आरक्षण की शुरुआत की थी।

प्रश्न 9. भारत में स्वायत्तता आंदोलनों की क्या विशेषताएं हैं?

उत्तर हालांकि स्वायत्ता आदोलनों का उद्देश्य अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर आए बिना राज्य के पुनर्गठन वाले क्षेत्रों के बीच शक्ति संबंधों को स्थापित करना है, फिर भी सभी स्वायत्ता आंदोलनों की यह पहली माँग नहीं थी।

कुछ स्वायत्ता के आंदोलनों ने एक या अधिक राज्यों में से पृथक राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू किया, किंतु आंदोलन के दौरान मौजूदा राज्य में स्वायत्ता प्राप्त करने की उनकी माँग को छोड़ दिया गया।

मेघालय के मामले में आंदोलन ने असम को पृथक राज्य बनाने के अपने उद्देश्य से शुरू किया, लेकिन अलग राज्य के समर्थकों ने सन् 1971-1972 में राज्य के भीतर एक राज्य का दर्जा स्वीकार कर लिया।

पृथक राज्य के आंदोलन और विद्रोह की माँग की तरह, स्वायत्ता आंदोलनों को निम्नलिखित विशेषताएं हैं :

1) ये उन क्षेत्रों में उठाये जाते हैं जहाँ पर लोगों के साथ भेदभाव होता है। ये भेदभाव आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक तौर पर संसाधनयुक्त क्षेत्रों द्वारा किया जाता है।

2) इन माँगों को समाज के मुखर तबकों द्वारा उठाया जाता है जैसे मध्यम वर्ग, छात्र, नागरिक समाज के संगठन एवं राजनैतिक दल। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

3) स्वायत्ता की माँग करने वालों का आरोप है कि उनका क्षेत्र “आंतरिक उपनिवेश” बन गया है, विशेषकर विकसित क्षेत्रों का उपनिवेश’। उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण बाहरी लोगों द्वारा दिया जाता है तथा वे उन्हें अपने संसाधनों के प्रयोग बदले कोई भरना रोयल्टी भी नहीं मिलती।

4) उनके क्षेत्र को राज्य के राजनीतिक संस्थानों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता है तथा उनकी सहमति के बिना निर्माण लिये जाते हैं।

5) उनकी भाषा एवं संस्कृति को उचित पहचान नहीं दी जाती हैं तथा कई मामलों में उनके ऊपर भाषा थोपी जाती है।

6) स्वायत्ता आंदोलनों का कुछ राजनैतिक संदर्भ भी होता है।

भारत में स्वायत्ता आंदोलन के ये कुछ समान कारक हैं, लेकिन उनका प्रभाव एवं आकार से अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

प्रश्न 10. पंजाब में विद्रोह के क्या कारण थे?

उत्तर पंजाब में विद्रोह 1970 के दशक के अंत में शुरू हुआ एवं 1980 के दशक तक यह चरम सीमा तक पहुंच गया था। इस विद्रोह को हम खालिस्तान आंदोलन के रूप में भी जानते है,

जिसमें अलग सिख राज्य “खालिस्तान’ की माँग की गई थी। खालिस्तान राज्य की माँग 1971 में आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव के बाद की गयी थी। यह हिंसावादी आंदोलन था जिसमें हजारों लोग मारे गये थे। खालिस्तान आंदोलन का नेतृत्व भिंडरावाले ने किया था।

1983 में, गिरफ्तारी से बचने के लिये भिंडरावाले ने अपने समर्थकों सहित स्वर्ण मंदिर में नजरबंद हो गया, वहीं से उसने विद्रोह का प्रचार किया। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए 6 जून, 1984 को इंदिरा गाँधी सरकार ने सैनिक कार्यवाही के आदेश दिये, जिसे हम “ऑपरेशन ब्लू स्टार’ कहते हैं। इस कार्यवाही का मकसद था स्वर्ण मंदिर परिसर को आंतकवादियों से मुक्त करवाना।

इस कार्यवाही में भिंडरावाले सहित करीब 200-250 खालिस्तानी आंतकवादी मारे गये थे। इस कार्यवाही का सिख समुदाय में भारी विरोध हुआ तथा इंदिरा गाँधी सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ती गयी। इसके परिणामस्वरूप 1984 में अपने ही अंगरक्षकों द्वारा, जो कि सिख थे, इंदिरा गाँधी की हत्या की थी।

इस ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के कुछ वर्षों बाद विद्रोह धीमा हो गया तथा 1991 में पंजाब पुलिस के मुखिया के.पी.एस. गिल ने ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर” की शुरुआत की थी।

पंजाब में विद्रोह पैदा होने के कई प्रकार के कारण दिये गये हैं। इनमें राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारण प्रमुख हैं।

अतुल कोहली ने राजनीतिक कारणों की बात कहते हुए यह दलील पेश की कि दूसरे स्वभाग्य निर्पण आंदोलन की तरह, “पंजाब मे विद्रोह का प्रमुख कारण केन्द्र का राज्य की राजनीति में दखल देना तथा केन्द्रीय नेतृत्व का अन्य मामलों में भी लोगों को शामिल न करना था। BPSC 104 Free Assignment In Hindi

एक अन्य कारण यह भी था कि पंजाब में काँग्रेस एवं अकाली दल के बीच में प्रतिस्पर्धा के कारण भी खालिस्तान आंदोलन उभरा। अन्य सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारणों में मुख्य रूप से ग्रीन रिवोल्यूशन (हरित क्रांति) का प्रभाव, पंजाबी संस्कृति का ह्यस भी लोगों के गुस्से का कारण बना।

खालिस्तान आंदोलन के समर्थकों का मानना था कि, स्वतंत्र खालिस्तान राज्य के बनने के बाद पंजाब में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संकटों को दूर करने में मदद मिलेगी।

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