IGNOU BPSC 102 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

BPSC 102

BPSC 102 Free Assignment In Hindi

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BPSC 102 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. भारत के संविधान के दार्शनिक आधारों की विवेचना कीजिए।

उत्तर दर्शन का अर्थ है दृष्टिकोण जो कि कार्यप्रणाली में प्रतिबिंबित हुआ था। भारत के संविधान के निर्माण का कार्य संविधान सभा को सौंपा गया था।

संविधान सभा के अंदर राजनीतिक और कानूनी विद्वान मौजूद थे। ये सभी सदस्य अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को संविधान निर्माण में सभा योजन करने को उत्सुक थे।

इसलिए लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, समानता न्याय एवं स्वतंत्रता जैसे सिद्धांतों को भारतीय संविधान में जगह दी गयी और ये सभी सिद्धांत भारत के संविधान के अहम बिंदू माने गये थे जो संविधान सभा ने बनाये थे।

.) संप्रभुता – जब संविधान निर्माताओं ने भारत की राजनीतिक भविष्य के बारे में सोचा तो उन्होंने सबसे ज्यादा भारत की संप्रभुता के बारे में सोचा था।

भारत को संप्रभु बनाना उनके लिए महत्वपूर्ण था और सर्वोच्च शक्ति को उन्होंने लोगों में निहित की थी। केन्द्र एवं राज्यों के सभी अंग तथा कार्यप्रणाली केवल भारत के लोगों से ही शक्ति ग्रहण करते हैं।

.) लोकतांत्रिक मूल्य – संविधान निर्माताओं ने इस सिद्धांत को भी बहुमूल्य माना था। क्योंकि लोकतंत्र या लोकतांत्रिक मूल्य देश को मजबूती प्रदान करते है तथा सभी लोगों की आवाज़ को समान महत्व देते हैं।

.) आम सहमति से निर्णय लेना – ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार आम सहमति की अवधारणा संविधान सभा में आम बात थी। BPSC 102 Free Assignment In Hindi

नेतृत्व के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वह किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले आम सहमति से निर्णय ले क्योंकि यह तार्किक एवं प्रभावी रास्ता माना जाता है किसी समझौते को अंतिम रूप देने के लिए।

यह सिद्धांत भी भारतीय संविधान की रचना के लिये सबसे उपयुक्त था। सबके अधिक आम सहमति शायद संघीय प्रावधान एवं भाषायी प्रावधानों में देखने को मिली है।

.) समायोजन का सिद्धांत – ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार, संविधान निर्माण में भारत का मूल योगदान इसके समायोजन का सिद्धांत था। अर्थात् जाहिर तौर पर असंगत अवधारणाओं में सामंजस्य करने की क्षमता।

इसने संघीय एवं एकल व्यवस्था के बीच सामंजस्य बैठाया, राष्ट्रमंडल एवं रिपब्लिक सरकारों की सदस्यता के बीच सामंजस्य तथा मजबूत केन्द्र सरकार के साथ-साथ पंचायती राज व्यवस्था के प्रावधानों के सामंजस्य की दुहाई देना। चयन एवं परिवर्तन की कला – संविधान सभा केवल अनुकरणात्मक नहीं थी।

विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं से लिये गये प्रावधानों को संविधान सभा ने भारतीय स्थिति के साथ अनुकूल बनाने के लिये प्रयास किये। चयन एवं परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण, ऑस्टिन के अनुसार संविधान में संशोधन की विधि था।

इसने संविधान को लचीला बनाया तथा राज्यों के अधिकारों की भी रक्षा की थी। किसी अन्य देश में संशोधन की प्रक्रिया हमारे देश से अच्छी नहीं है क्योंकि यहाँ संघवाद और ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था दोनों संविधान का आधार स्वरूप है।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

.) मूल अधिकार – विशेष रूप से वल्लभ भाई के कारण मूल अधिकारों को संविधान में न्यायोचित बनाया गया है और ये अधिकार आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के जीवन का आधार माने जाते है। अधिकारों की वजह से ही सभी नागरिक स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकते है।

.) धर्मनिरपेक्ष राज्य – धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत वह सिद्धांत है जो कि भारत के नागरिकों के लिए पूर्ण रूप से अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिये हैं

धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत को संविधान सभा में काँगेस के एक वर्ग ने स्थापत्य किया था, जिनका मानना था कि भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य होना चाहिये।

.) समाजवाद – वल्लभभाई पटेल के प्रभाव के कारण ही हमारे संविधान में समाजवाद के सिद्धांतों को जगह दी गयी। यह पहले कभी नहीं था जैसा कि वर्तमान संविधान
में है।

.) अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण – समायोजन के सिद्धांत से संबंधित प्रावधान के समानांतर ही संविधान सभा ने समाज के अल्पसंख्यक तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने का प्रावधान किया था।

संविधान सभा की दो महिला सदस्यों ने इस सिद्धांत को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनमें अमृत कौर तथा बेगम एजाज रसूल प्रमुख थी जिन्होंने यह कहा कि सभी अल्पसंख्यक वर्ग भारत के आंतरिक भाग हैं उन्हें आरक्षण की जरूरत है ताकि उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके।

.) वयस्क मताधिकार – संविधान सभा ने वयस्क मताधिकार को एकदम सही माना था।राजेन्द्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरु दोनों महत्वपूर्ण सदस्य थे जिन्होंने वयस्क मताधिकार का समर्थन किया था तथा सभी नागरिकों को वोट का अधिकार देकर अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। . .

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प्रश्न 2. भारत के सामाजिक न्याय लक्ष्यों की प्राप्ति में राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों के महत्व की व्याख्या कीजिए?

उत्तर मौलिक कर्तव्यों का नैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व है। यदि कोई नागरिक अपना कर्तव्य ठीक से निभाये तभी वह अपने अधिकारों का सही तरह से इस्तेमाल कर सकता है।

अपने कर्तव्यों को पूरा करने के बाद ही आप पर्यावरण एवं आर्थिक विकास को प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही आप मानवीय विकास को भी प्राप्त कर सकते हैं।

भारत में मौलिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिये लोगों में चेतना जागृत हुई है। न्यायालय, नागरिक समाज संगठन, राजनीतिक दल एवं सरकार ने भी मौलिक कर्तव्यों के महत्व को रेखांकित किया है क्योंकि ये कर्तव्य समाज के संपूर्ण विकास के लिए अनिवार्य है।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

जैसा कि आपने इस इकाई के अंदर पढ़ा होगा मौलिक कर्तव्यों को संविधान में 42वें संशोधन के बाद शामिल किया था जो कि इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के दौरान पारित किया था।

( मोरारजी देसाई की सरकार ने भी मौलिक कर्तव्यों के प्रावधानों में परिवर्तन नहीं किया। इससे यह साबित हुआ कि मौलिक कर्तव्यों का कितना महत्व है।

इन्हीं महत्व को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ये कर्तव्य व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाने तथा नागरिकों में अच्छे गुण पैदा करने के लिए पर्याप्त है।

उदाहरण के लिए कुछ स्वार्थी तत्व पर्यावरण को एवं जैव-विविधता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, विशेषकर मसूरी-देहरादून क्षेत्र में।

वे अपने मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन कर रहे हैं जिसमें उन्हें पर्यावरण की रक्षा एवं जैव-विविधता की रक्षा करने को कहा गया है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी खनन पर रोक लगाई थी मसूरी-देहरादून बेल्ट में तथा पर्यावरण एवं

जैव-विविधता की रक्षा के लिए अन्य सुझाव भी दिये थे। इस प्रकार, न्यायालय ने मौलिक कर्तव्यों की महत्ता को रेखांकित किया तथा उसके संरक्षण के लिए निर्देश भी दिये।।

क) केन्द्र एवं राज्य सरकारें लोगों के बीच चेतना जाग्रत करे ताकि लोग मौलिक कर्तव्यों के बारे में जानकारी हासिल कर सके।

ख) स्वतंत्रता के अधिकार विशेषकर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करनी चाहिये तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिये।

ग) लोगों को चुनाव में अपना वोट देने के लिए संवेदनशील बनाया जाना चाहिए क्योंकि वोट डालना उनका कर्तव्य है। इसके साथ ही उन्हें कर देने और सरकार के कार्यों में भागीदारी करने के लिए भी संवदेनशील बनाया जाना चाहिये।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

घ) वर्मा समिति की सिफारिशों को तत्काल लागू किया जाना चाहिए जिसमें उन्होंने मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन पर अधिक बल दिया था।

ड़) औद्योगिक संगठनों को अपने कर्मचारियों के बच्चों के लिए शिक्षा का प्रावधान करना चाहिये।

त्रीय कार्य – II

प्रश्न 3. मूल संरचना (Basic Structure) के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

उत्तर मूलभूत आधार सिद्धांत के अनुसार संसद किसी भी संशोधन के द्वारा संविधान के मूलभूत ढाँचे को नहीं बदल सकती। इसमें मूल आधिकार, न्यायिक समीक्षा, धर्मनिरपेक्षता तथा संसदीय लोकतंत्र शामिल है।

यह सिद्धांत 1973 में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के बाद अस्तित्व में आया था। इसे हम केशवानंद भारती विरूद्ध केरल राज्य के केस के रूप में जानते है।

इस केस में मठाधीश केशवानंद भारती ने सर्वोच्च न्यायालय में केरल सरकार के एक निर्णय को चुनौती दी थी। इसके अंदर केरल सरकार ने भूमि सुधार के तहत् निजी जमीन को अधिग्रहण कर लिया था।

इस निर्णय के विरूद्ध में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि संविधान के मूल सिद्धांत अर्थात् मूल अधिकारों को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि निजी संपत्ति का अधिकार संविधान का मूल ढाँचा नहीं है।

इसके बाद 1978 में 44वें संविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से हटा दिया गया। जैसा कि मूल अधिकारों को लागू करना कोर्ट की जिम्मेदारी है इसलिए कोर्ट ही इन्हें विशेष रूप से संरक्षित रखती है।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं कोर्ट मूल अधिकारों की रक्षा के लिये रिट जारी करता है। केशवानंद भारती केस से पूर्व भी कोर्ट ने गोलकनाथ विरुद्ध पंजाब राज्य मामले में 1967 में भी मूल अधिकारों की रक्षा की थी।

संविधान के अनुसार राज्य सभा एक उच्च सदन है। यह राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। राज्य सभा के कुल सदस्यों की संख्या 250 है जिसमें 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है।

ये 12 सदस्य साहित्य कला, विज्ञान एवं समाज सेवा में अनुभव प्राप्त व्यक्ति होते है। बाकि के सदस्य राज्यों की विधानसभा द्वारा चुनकर भेजे जाते है।

इनका चुनाव राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। लोक सभा के विपरीत राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। राज्य सभा में प्रतिनिधित्व एक समान नहीं है।

यह पूरी तरह से राज्य की जनसंख्या पर निर्भर है। अर्थात् जिस राज्य की जनसंख्या अधिक है उस राज्य का प्रतिनिधित्व अन्य छोटे राज्यों की तुलना में अधिक होता है।

राज्य सभा के सदस्यों की संख्या एक से लेकर अधिकतम 34 है। यह राज्यवार जनसंख्या पर निर्भर है। नागालैण्ड से जहां सिर्फ एक ही सदस्य है वहीं उत्तर प्रदेश से 34 सदस्य है। क्योंकि दोनों राज्यों की जनसंख्या में काफी अंतर है।

राज्य सभा का चरित्र एक प्रकार से संघवाद का प्रतीक है। लोक सभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी मामलों की सूचना प्राप्त करने का राज्य सभा को अधिकार है। लेकिन राज्य सभा को मंत्रीपरिषद के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर वोट देने का अधिकार नहीं है।

धन विधेयक जैसे मामलों में भी राज्य सभा को अधिक शक्ति नहीं है। फिर भी संविधान ने राज्य सभा को कुछ विशेष शक्तियाँ प्रदान की है। राज्यों का प्रमुख प्रतिनिधित्व होने के कारण, राज्य सभा को दो प्रमुख शक्तियाँ प्राप्त है।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

अनुच्छेद 249 के अंतर्गत राज्य सभा कोई भी प्रस्ताव पारित कर सकती है। संसद किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर कानून बना सकती है राज्य सभा राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार रखती है।

राज्य सभा की दूसरी शक्ति है अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना करना। इस प्रकार राज्य सभा भारतीय विधायिका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उसी तरह से है जिस तरह इंग्लैण्ड में लॉर्ड सभा है।

यह एक महत्वपूर्ण सदन है जिसके सभी सदस्य सम्माननीय होते है। . राज्य सभा एक स्थायी सदन है। इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता है। इसके एक तिहाई सदस्य दो वर्ष के बाद अवकाश ग्रहण करते है।

खाली पदों पर तुरंत चुनाव करवाये जाते है। राज्य सभा के सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। लेकिन वह समय पूर्व भी अपने पद से इस्तीफा दे सकता है। या उसे किसी कारणवश अयोग्य भी घोषित किया जा सकता है।

1975 में इंदिरा गाँधी विरूद्ध राज नारायण केस में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल आधार सिद्धांत को प्रयोग किया था उसके बाद 39वाँ संविधान संशोधन को भी हटा दिया गया जिसमें यह कहा गया कि राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा लोक सभा अध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक समीक्षा की परिधि से दूर रखा जाय।

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प्रश्न 4. राज्य सभा की विशेष शक्तियों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर संविधान के अनुसार राज्य सभा एक उच्च सदन है। यह राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। राज्य सभा के कुल सदस्यों की संख्या 250 है जिसमें 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है।

ये 12 सदस्य साहित्य कला, विज्ञान एवं समाज सेवा में अनुभव प्राप्त व्यक्ति होते है।

बाकि के सदस्य राज्यों की विधानसभा द्वारा चुनकर भेजे जाते है। इनका चुनाव राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। BPSC 102 Free Assignment In Hindi

लोक सभा के विपरीत राज्य सभा के सदस्यों का चनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। राज्य सभा में प्रतिनिधित्व एक समान नहीं है।

प्रश्न 5. मंत्रिमंडल प्रणाली में सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।

उत्तर मंत्रीपरिषद सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर कार्य करती है। इस सिद्धांत के अंतर्गत सभी मंत्री अपने कार्य के प्रति एवं सरकार के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं।

सामूहिक नेतृत्व के अंतर्गत, सभी मंत्री कैबिनेट के निर्णयों की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से साझा करते हैं। शंका एवं असहमति केवल, कैबिनेट के कमरे तक सीमित रहती है।

एक बार यदि कोई निर्णय ले लिया तो यह सम्पूर्ण सरकार का निर्णय माना जाता है।

यदि कोई मंत्री सरकार के निर्णयों से सहमत नहीं है तथा उनका समर्थन नहीं करता है तो उसे नैतिक आधार पर मंत्रीपरिषद से त्यागपत्र देना पड़ता है।

यदि मंत्रीपरिषद का गठन विभिन्न राजनीतिक दलों के गठबंधन से किया गया हो तो यह न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर आधारित होता है ताकि सभी मंत्रालयों में सामन्जस्य बना रहे तथा सभी राजनीतिक दलों को न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ खड़ा रहना चाहिये ।

यदि वे ऐसा नहीं करते तो मंत्रीपरिषद अस्तित्व में नहीं रह सकती। मंत्रीपरिषद के भीतर एकता न केवल इसके लिए अनिवार्य है बल्कि इसको कुशलता और कार्यक्षमता के लिए भी जरूरी है।

इसके लिए जनता का विश्वास जीतना भी आवश्यक है। जनता सरकार के सदस्यों के बीच सार्वजनिक आक्षेप और लोक नीति जैसे मामलों में आपसी टकराव इसके पतन का प्रमुख कारण था 1979 में।

प्रश्न 6. समवर्ती सूची क्या है?

उत्तर समवर्ती सूची में 47 विषय है। ये विषय केन्द्र और राज्य दोनों की परिधि के अंतर्गत आते है। इनके उपर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र एवं राज्य दोनों को है।

स सूची में निम्न विषय है:– विवाह एवं तलाक, कृषि भूमि के अतिरिक्त संपत्ति का स्थानांतरण, ठेकेदारी, दिवालियापन और दिवाला, ट्रस्टी और ट्रस्ट, नागरिक प्रकिया, न्यायालय की अवमानना, खाने की चीजों में बदलाव, डर्ग एवं विष/जहर, आर्थिक एवं सामाजिक योजना, ट्रेड यूनियन, सुरक्षा, श्रमिक कल्याण, विद्युत, अखबार, किताबें तथा मुद्रणालाय, स्टाम्प शुल्क इत्यादि ।

भारत की संसद तथा राज्यों की विधानसभा को इस सूची के विषयों पर कानून बनाने का समवर्ती अधिकार दिया गया है। यदि एक बार संसद ने इस सूची के विषयों पर कानून बना दिया तो संसद के कानून राज्य के बनाये कानूनों पर लागू होंगे। BPSC 102 Free Assignment In Hindi

इसके लिए एक विशेष स्थिति में यह बदल भी सकता है। इसके अनुसार यदि, विधानसभा ने कोई कानून पहले बना लिया हो और वह राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जा चुका हो ऐसी स्थिति में विधानसभा द्वारा बनाया कानून मान्य होगा।

इससे राज्यों की विधानसभा की ताकत को भी सशक्त बनाया गया है। इसमें यह भी प्रावधान है कि किसी विशेष स्थिति या परिस्थिति में राज्य को अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 7. सरकारिया आयोग पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर 1983 में, केन्द्र सरकार ने सरकारिया आयोग का गठन किया था, जिसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया थें इसका मुख्य उद्देश्य केन्द्र -राज्य संबंधों पर संविधान के प्रावधानों की समीक्षा करना था।

संघ-राज्य संबंधों के मुद्दों पर विभिन्न राज्य सरकारों से चर्चा के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट अक्टूबर 27. 1987 को सौंप दी थी। सरकारिया आयोग ने एक मजबूत केन्द्र का समर्थन किया जो कि एक मात्र राष्ट्रीय एकता के लिये आवश्यक है।

इसने यह सिफारिश की कि अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास रहनी चाहिए ये जिसमें मुख्य तौर पर करों से संबंधित विषय शामिल है जबकि अन्य विषय करों के अतिरिक्त समवर्ती सूची में रखे जाने चाहिये।

लेकिन इसने संघीय सरकार के अंदर केन्द्रियकरण की शक्तियों का समर्थन नहीं किया था।

इस आयोग ने एक स्थायी तौर पर अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय परिषद की स्थापना की सिफारिश की थी, ताकि यह केन्द्र एवं राज्यों से संबंधित समस्याओं के बारे में चर्चा कर सके।

इसने शक्तियों के विभाजन के लिए संतुलन बनाने की कोशिश की थी। इसने यह सुझाव दिया कि जब भी।

केन्द्र सरकार समवर्ती सूची में शामिल किसी भी विषय पर कानून बनाने का विचार करती है तो उसे राज्य सरकारों से पूर्व अनुमति लेनी चाहिये तथा इसे अंतर्राज्जीय-परिषद में भी सामूहिक रूप से चर्चा करनी चाहिये, अनुच्छेद 268 के तहत् ।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

सरकारिया आयोग रिपोर्ट की सिफारिशों के अनुसार राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने 25 मई 1990 को राष्ट्रपति के अध्यादेश से अन्तर्राज्यीय-परिषद के गठन की स्थापना की।

इस परिषद में प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केन्द्र-शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और केन्द्र सरकार के छ: केबिनेट मंत्री शामिल हैं।

इस परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री है, तथा उनकी अनुपस्थिति में कोई भी केबिनेट मंत्री जिसे प्रधानमंत्री ने नियुक्ति किया हो।

यह परिषद मुद्दों के उपर अपने दिशा निर्देश तय करती है और चर्चा के लिये परिषद में लाती है। इसकी मीटिंग वर्ष में तीन बार बुलाने का भी प्रावधान है।

इसने यह भी सिफारिश की कि, किसी उच्च कोटी के व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त किया जाना चाहिये तथा अनुच्छेद 356 के तहत् राष्ट्रपति शासन की सिफारिश को न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत रखना चाहिये।

इसने यह भी सिफारिश की, कि करों एवं शुल्कों के बीच साध्यता होनी चाहिये, निगम कर का केन्द्र एवं राज्यों के बीच बंटवारा होना चाहिये, तथा अंतर राज्य जल विवाद के लिये एक ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना चाहिये।

ट्रिब्यूनल का गठन आवेदन के मिलने के एक वर्ष के अंदर हो जाना चाहिये ताकि यह पांच वर्षों में प्रभावी रूप से कार्य कर सके।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 8. सर्वोच्च न्यायालय का सलाहकार क्षेत्राधिकार क्या है?

उत्तर संविधान का अनुच्छेद 143 सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श की अधिकारिता प्रदान करता है। सार्वजनिक महत्व की विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय राष्ट्रपति माँग सकता है जिसके बारे में उसका विचार हो कि ऐसी राय प्राप्त करना है।

परामर्शवादी भूमिका सर्वोच्च न्यायालय की साधारण भूमिका से अलग है। इसके तीन प्रमुख कारण है।

(1) यदि दो पक्षों में कोई मुकदमा न हो,

(2) परामर्शीय राय सरकार पर बाध्य नहीं होगी, तथा

(3) कोर्ट का यह निर्णय लागू न माना जाये। सर्वोच्च न्यायालय की परामर्श तभी तक मान्य है जब तक कि किसी महत्वपूर्ण मसलों पर उसकी राय नहीं माँगी गयी हो। इसी प्रकार यह सरकार के लिए भी एक अच्छा विकल्प होता है किसी राजनीतिक मुद्दों को हल करने के लिए।

प्रश्न 9. अनुच्छेद 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर अनुच्छेद 360 के अनुसार वित्तीय आपातकाल भारत में वित्तीय अस्थिरता या संकट की स्थिति में लगाया जाता है। अभी तक भारत में वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया है।

यदि भारत में वित्तीय आपातकाल लगाने की नौबत आई तो इसे संसद द्वारा पारित किया जाना आवश्यक है। इसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखना होगा। यदि इस दौरान लोकसभा का विघटन हो जाये तो वित्तीय आपात भी स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

तीस दिनों की समाप्ति के बाद तथा यह पुनर्गठन तक जारी रहेगा। वित्तीय आयात के दौरान राष्ट्रपति सरकारी अफसरों के वेतन एवं भत्तों में कटौती करने का आदेश दे सकता है उनमें उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल होंगे।

यहां तक कि अनुच्छेद 207 के अधीन धन विधेयकों तथा अन्य विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाए जब वे राज्य विधानमंडलो द्वारा पारित कर दिये जाएं।

जम्मू और कश्मीर के मामले में वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उसे अनुच्छेद 370 के तहत् विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है।

प्रश्न 10. पांचवीं अनुसूची पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के अंतर्गत पाँचवी अनुसूची के प्रावधान शामिल है। ये प्रावधान उन आदिवासी क्षेत्रों में लागू होंगे जो असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्य से अलग हों।

इन विशेष प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य है आदिवासी लोगों के हितों की रक्षा करना एवं उनके भूमि, आर्थिक संसाधन एवं आवास की सुरक्षा करना।

इसके अलावा इन प्रावधानों का प्रमुख उद्देश्य है उनके रीति-रिवाज, परंपरा को बचाके रखना और अनुसूचित क्षेत्रों में तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास करना।

ये अनुसूचित क्षेत्र वे क्षेत्र है जो पाँचवी अनुसूची के भाग सी में दिये गये है। ये वो क्षेत्र है जिनको राष्ट्रपति ‘अनुसूचित क्षेत्र घोषित करता है।

पाँचवी अनुसूची में जो अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का तरीका अपनाया गया है वह प्रथम अनुसूचित जनजाति आयोग की सिफारिशों पर आधारित है। यह आयोग देबर आयोग के नाम से भी जाना जाता है। इस आयोग की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं : BPSC 102 Free Assignment In Hindi

i) आदिवासी जनसंख्या की प्रधानता

ii) क्षेत्र की सघनता एवं उसका उचित आकार

iii) क्षेत्र की अविकसित प्रकृति, और

iv) लेगों की आर्थिक स्थिति में असमानता। ये अनुसूचित क्षेत्र मूल रूप से आदिवासी लोगों के आवासीय क्षेत्र है, जिन्हें हम अनुसूचित जन जाति कहते है।

ये आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा और राजस्थान जैसे राज्यों में बहुतायत संख्या में पाये जाते है। पाँचवी अनुसूची के भाग 6 (2) में इन क्षेत्रों के परिवर्तन से संबंधित प्रावधान दिये गये है।

इसके लिए राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है और वो इस पर अपना आदेश दे सकते हैं। राष्ट्रपति निम्नलिखित आदेश दे सकता है :

i) किसी भी क्षेत्र को या उसके एक विशेष भाग को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का आदेश दे सकते है

ii) राज्य सरकार के साथ बातचीत के पश्चात् किसी भी अनुसूचित क्षेत्र के आकार को बढ़ा सकते है,

iii) किसी भी राज्य की सीमा में परिवर्तन कर सकते हैं या किसी भी राज्य को केन्द्र में शामिल कर सकते या नया राज्य बना सकते है।

iv) वे राज्य के राज्यपाल के साथ वार्तालाप करके किसी भी राज्य के क्षेत्र से संबंधित नया आदेश दे सकते है या उनको अनुसूचित क्षेत्रों के रूप में पुनः पारिभाषित कर
सकते हैं।

पाँचवी अनुसूची में राज्यपालों को विशेष जिम्मेदारी दी गयी है कि वे अनुसूचित क्षेत्रों में शांति एवं सुशासन स्थापित करे। इसके लिए राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्रों के लिए कानून बना सकते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के लिये निम्न कानून बना सकते हैं। BPSC 102 Free Assignment In Hindi

i) अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों की भूमि पर पाबंदी लगा सकते हैं या उनकी जमीन पर नियंत्रण लगा सकते है। _

ii) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को जमीन आंवटित करने के लिए नियम लगा सकते हैं।

iii) अनुसूचित जन जाति के लोगों को पैसे उधार देने के लिए साहूकारों के लिए कानून बनाना।

अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जन जाति के ऊपर नियंत्रण रखने और प्रशासन के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान भी किया गया है वह है आदिवासी सलाह परिषद ।

पाँचवी अनुसूची के भाग बी के खंड 4 में यह प्रावधान किया गया है कि सभी राज्यों को जहाँ अनुसूचित क्षेत्र है वहां पर इस आदिवासी सलाह परिषद का गठन करना संवैधानिक कर्तव्य है।

राष्ट्रपति यह भी निर्देश दे सकता है कि जिन राज्यों में अनुसूचित जन जाति के लोग है लेकिन वह अनुसूचित क्षेत्र नहीं है वहां पर आदिवासी सलाह परिषद का गठन किया जा सकता है।

इसमें 20 सदस्यों से अधिक नहीं होने चाहिये एवं उसमें भी तीन चौथाई सदस्य राज्य विधान सभा में अनुसूचित जन जाति के प्रतिनिधि होने चाहिए।

जैसाकि पाँचवी अनुसूची के खंड 4 (2) में दिया गया है, आदिवासी सलाह परिषद की प्राथमिक जिम्मेदारी है, राज्य सरकार को अनुसूचित जन जाति के कल्याण से संबंधित मामलों में सलाह देना या अन्य ऐसे मामले जिसे राज्यपाल उचित समझता है।BPSC 102 Free Assignment In Hindi

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