IGNOU BHDS 183 Free Assignment In Hindi 2022- Helpfirst

BHDS 183

BHDS 183 Free Assignment In Hindi

Table of Contents

BHDS 183 Free Assignment In Hindi jan 2022

खड-क

प्रश्न 1 अनुवाद के महत्त्व और स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर- विश्व की सभ्यताओं और संस्कृतियों के विकास में अनुवाद की विशेष भूमिका रही है। विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों को जानने तथा समझने के लिए अनुवाद को माध्यम बनाना हमारी नियति रही है।

यूनान, मिस्र, चीन आदि प्राचीन सभ्यताओं से भारत का घनिष्ठ संबंध रहा है और इस संबंध में अनुवाद की विशेष महत्ता रही है। बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार समूचे एशिया में अनुवाद की जीवंत परंपरा का परिणाम है।

विश्व भर में गीता तथा उपनिषद् के ज्ञान का अनुवाद अपने ढंग से किया जाता रहा है। बौद्ध धर्म के माध्यम से भारतीय ग्रंथों का अनुवाद चीनी भाषा में हुआ। पंचतंत्र के लघु संग्रहों का अनुवाद अरबी तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं में हुआ।

इससे साहित्य और कला की विश्व चेतना का विकास हुआ। इस प्रकार अनुवाद एक सांस्कृतिक सेतु का काम करता है। अनुवाद के माध्यम से विभिन्न राष्ट्रों की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक निधियों का आदान-प्रदान होता है।

• शिक्षा और अनुवाद-वैसे तो शिक्षा में अनुवाद की आवश्यकता सर्वत्र होती है, उन समाजों में भी जहाँ बहुभाषिकता का अधिक विस्तार नहीं है और शिक्षा एक ही भाषा के माध्यम से दी जाती है।

लेकिन जो समाज भारत जैसा बहुभाषिक है उसमें शिक्षा का माध्यम वहाँ की सभी प्रमुख भाषाएँ होती हैं। इस दृष्टि से भारत शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुभाषिक समाज है।

अनुवाद का शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक महत्त्व है। विश्वभर में उपलब्ध ज्ञान और शोध को शिक्षार्थियों तक पहुँचाना आज बेहद आवश्यक है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

अनुवाद के माध्यम से ही शिक्षार्थियों को नवीनतम जानकारी उपलब्ध करवाई जा सकती है। विद्यालयों में भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी एवं विश्व की अनेक भाषाएँ पढ़ाई जा रही हैं।

• पर्यटन और अनुवाद-पर्यटन का संबंध भाषायी विविधता से होता है। दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में लोग घूमने-फिरने जाते हैं। पर्यटकों की सुविधा के लिए एक से अधिक भाषा में जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।

दुनिया भर से जिज्ञासु लोग विभिन्न देशों एवं उनकी संस्कृतियों को जानने के लिए भ्रमण करते हैं । पर्यटन के क्षेत्र में इस हलचल के चलते अनुवाद का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।

विभिन्न पर्यटन स्थलों के विषय में जानकारी लगभग सभी महत्त्वपूर्ण भाषाओं में उपलब्ध है। सूचना पट्ट, ब्रोशर्स, पंफलेट, मार्गदर्शिका आदि आज विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होती है जिनकी सहायता से विभिन्न भाषा-भाषी पर्यटक अपनी मूल भाषा अथवा अंग्रेजी आदि में सूचना प्राप्त कर सकते हैं।

पर्यटन स्थलों, प्राचीन स्मारकों आदि के बारे में जो प्रचार एवं सूचना साहित्य छापा जाता है अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर उपलब्ध होता है उसे भी कई भाषाओं में प्रस्तुत किया जाता है।

इस प्रकार देशी और विदेशी दोनों की तरह के पर्यटकों को दृष्टि में रखते हुए बहुभाषी समाज में अनुवाद अपेक्षित होता है।

• प्रशासनिक क्षेत्र में अनुवाद-भारत के विभिन्न प्रदेशों की राजभाषा उनके क्षेत्र की प्रमुख भाषा है। हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किए जाने के बावजूद यह प्रावधान है कि जब तक सभी क्षेत्रों में हिंदी लागू नहीं हो जाती तब तक अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में उपयोग में लाई जाती रहेगी।

इसका परिणाम यह हुआ कि आज भी प्रशासनिक स्तर पर द्विभाषा की स्थिति बनी हुई है जिसके चलते प्रशासनिक क्षेत्र में अनुवाद का अत्यधिक महत्त्व है।

अनुवाद के स्वरूप को समझने के लिए अनुवाद को प्रायः दो संदर्भो में लिया जाता है-व्यापक संदर्भ में तथा सीमित संदर्भ में।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(1) अनुवाद का व्यापक संदर्भ-प्रतीक को विज्ञान की मूलभूत इकाई माना जाता है। पीयर्स के मतानुसार प्रतीक वह वस्तु है जो किसी के लिए किसी अन्य वस्तु के स्थान पर प्रयुक्त होती है।

उदाहरण के लिए, यदि हम ‘मेज’ पर विचार करते हैं तो मेज शब्द स्वयं मेज न होकर मेज का प्रतीक मात्र है जिसका चयन हमने उस वस्तु विशेष को पहचानने के लिए किया।

रोमन जैकबसन ने प्रतीक सिद्धांत के आधार पर भाषिक पाठक के अंतरण को तीन आधारों पर देखने का प्रयास किया।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(क) अंतःभाषिक अनुवाद-अंतःभाषिक अनुवाद से तात्पर्य है एक भाषा की प्रतीक व्यवस्था में व्यक्त पाठ को उसी भाषा की अन्य प्रतीक व्यवस्था में रखना अथवा प्रस्तुत करना। इसे अन्वयांतर भी कहा जाता है।

स्पष्ट है कि यहाँ दोनों प्रतीक व्यवस्थाएँ एक ही भाषा से संबंधित होती है। इसका प्रमुख उदाहरण संस्कृत में लिखी गई टीकाएँ हैं जहाँ जटिल संस्कृत में लिखे गए काव्य को सरल टीकाओं में प्रस्तुत किया गया है।

(ख) अंतर्भार्षिक अनुवाद-एक भाषा के प्रतीकों में व्यक्त पाठ को दूसरी भाषा के प्रतीकों में अंतरण को अंतर्भाषिक अनुवाद कहते हैं। इसे भाषांतर भी कहा जाता है। स्पष्ट है कि अंतःभाषिक अनुवाद से अलग यह दो भाषाओं के अंतरण की क्रिया है।

इस अनुवाद प्रकार में अनुवाद के लिए दो भाषाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसे ही अंग्रेजी में ‘प्रॉपर ट्रांसलेशन’ कहा जाता है।

वर्तमान समय में अंतर्भाषिक अनुवाद की विशेष माँग है। विश्व भर में सर्जनात्मक तथा ज्ञानात्मक साहित्य के प्रसार का आधार यही है। इसमें दोनों भाषाओं की सक्रिय भूमिका होने के कारण इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

(ग) अंतर-प्रतीकात्मक अनुवाद-जहाँ अंतःभाषिक और अंतर्भाषिक अनुवाद में प्रतीक 2 का भाषिक इकाई होना अनिवार्य है वहीं अंतर-प्रतीकात्मक अनुवाद में प्रतीक 2 यानी लक्ष्य पाठ भाषिक न होकर भाषेतर होता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो इसमें भाषिक पाठ का अनुवाद भाषेतर इकाई में होता है। उदाहरण के लिए किसी उपन्यास या कहानी का फिल्म, नाटक या धारावाहिक में रूपांतरण । यहाँ अंतरण भाषिक न होकर रूपगत होता है।BHDS 183 Free AssignmeBHDS 183 Free Assignment In Hindint In Hindi

शरतचंद्र, प्रेमचंद, शेक्सपीयर, मन्नू भंडारी, रस्किन बॉण्ड, आदि की रचनाओं का फिल्म में रूपांतरण इसके उदाहरण हैं। प्रसिद्ध कविता का गीत में और गीत या कविता आदि का विज्ञापन के जिंगल में रूपांतरण भी अंतरप्रतीकात्मक अनुवाद के उदाहरण हैं।

(2) अनुवाद का सीमित संदर्भ-अनुवाद का सीमित संदर्भ केवल अनुवाद को एक भाषिक क्रिया मानता है जिसके अंतर्गत स्रोत भाषा के पाठ का लक्ष्य भाषा में अंतरण किया जाता है। सीमित संदर्भ में अनुवाद के दो आयाम बताए गए हैं

(क) पाठधर्मी अनुवाद-पाठधर्मी अनुवाद से तात्पर्य है ऐसा अनुवाद जिसमें पाठ अर्थात स्रोत पाठ सर्वोपरि हो।

ऐसे अनुवाद में अनुवादक से अपेक्षा की जाती है कि वह मूल पाठ के प्रति ईमानदार हो और अनुवाद करते समय मूल की आत्मा को बचाए रखने का सतत् प्रयास करे। अनुवादक को यहाँ अनुवाद प्रक्रिया में छूट लेने की सुविधा नहीं होती।

अनुवादक यहाँ मूल पाठ के कथ्य और शिल्प दोनों के प्रति सचेत रहते हैं और उसे यथासंभव लक्ष्य भाषा में लाने का प्रयास करते हैं। पाठधर्मी अनुवाद कार्यालयी विधि तथा किसी भी प्रकार के ज्ञानात्मक साहित्य के लिए अच्छा माध्यम है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(ख) प्रभावधर्मी अनुवाद-इसके विपरीत प्रभावधर्मी अनुवाद जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है पाठ के प्रभाव को केंद्र में रखकर चलता है।

स्रोत भाषा के पाठ का लक्ष्य भाषा के पाठक एवं समाज पर भी वैसा ही असर पड़े इसके लिए आवश्यक है कि उसे लक्ष्यभाषा की प्रकृति के अनुसार बनाया जाए ।

यह तभी संभव है.जब अनुवादक अनुवाद करते समय उसमें यथासंभव छूट ले। इसके लिए अनुवादक का दोनों संस्कृतियों का ज्ञान एवं समझ होना अपरिहार्य है। प्रभावधर्मी अनुवाद साहित्य के अनुवाद में विशेषतः कविता के अनुवाद में किया जाता है।

BHDS 183 Free Assignment In Hindi
BHDS 183 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 2 अनुवाद के विभिन्न क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- अनुवाद के विविध क्षेत्र और उनके विभिन्न आयामों की विस्तार से चर्चा इस प्रकार है(1) प्रशासनिक साहित्य और अनुवाद-किसी क्षेत्र में विशिष्ट शासन या किन्हीं मानव प्रबंधन गतिविधियों को प्रशासन कहा जाता है। प्रशासन से तात्पर्य सरकारी कामकाज से है।

चूँकि इसका दायरा बेहद विस्तृत है इसलिए यहाँ केंद्र और राज्य के कार्यक्षेत्र में आने वाले विभाग, अधीनस्थ विभाग, मंत्रालय, सरकारी बैंक, अर्धसरकारी बैंक, संबद्ध कार्यालय, स्वशासी निकाय, आयोग, समितियाँ, सहकारी बैंक तथा इनके अधीन आने वाले अन्य विभाग शामिल हैं।

राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(3) के अनुसार निम्नलिखित के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएँ प्रयोग में लाई जाएँगी BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(क) केंद्रीय सरकार या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या उसकी ओर से केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रण के किसी निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निष्पादित संविदाओं और करारों के लिए तथा निकाली गई अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों, सूचनाओं और निविदा प्रारूपों के लिए।

(ख) संकल्पों, साधारण आदेशों, नियमों, अधिसूचनाओं, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों या प्रेसविज्ञप्तियों के लिए जो केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रण में किसी निगम या कंपनी द्वारा या ऐसे निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निकाले जाते हैं या किए जाते हैं। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(ग) संवाद के किसी सदन या सदनों के समक्ष रखे गए प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों और राजकीय कागज-पत्रों के लिए। प्राधिकृत हिंदी अनुवाद की व्यवस्था इन सबके अनुवाद के लिए की गई है। प्रशासनिक साहित्य की भाषा-प्रशासनिक साहित्य की भाषा का अपना एक सौंदर्यशास्त्र है।

साहित्य की भाषा में एकदम अलग प्रशासनिक भाषा का केंद्रीय तत्त्व संप्रेषणीयता है। इसक लिए कुछ विशेषताएँ निर्धारित की गई हैं जिनके अनुसार प्रशासन की भाषा बोधगम्य हो, सरल-सुव्यवस्थित हो, एकार्थता को, संप्रेषणीयता को केंद्र में रखते हुए अधिक महत्त्व दिया गया है।

प्रशासनिक भाषा का एक अन्य बेहद महत्त्वपूर्ण तत्त्व है निर्वैयक्तिकता। इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ प्रयोग होने वाली भाषा का व्यक्तिविशेष से कोई संबंध नहीं होता ।

यहाँ दिए जाने वाले आदेश व निर्देश व्यक्ति द्वारा न दिए जाकर पद द्वारा दिए जाते हैं। यही कारण है प्रशासनिक भाषा में कर्मवाच्य की प्रधानता नहीं होती बल्कि कर्तृवाच्य की प्रधानता रहती है।

उदाहरण के लि

Submitted for information सूचनार्थ प्रस्तुत
This may please be approved कृपया इसका अनुमोदन करें

Matter is under consideration विषय विचाराधीन है।
Should be give top priority सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
Accepted for payment भुगतान के लिए स्वीकृत

प्रशासनिक साहित्य की भाषा औपचारिकता से परिपूर्ण होती है। इसमें अनेकार्थता की कोई संभावना नहीं होती है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

भाषा सरल एवं बोधगम्य प्रयोग किए जाने वाले शब्दों की अपनी एक तय शब्दावली होती है जिनका संबंध सीधा प्रशासन तथा सरकारी कार्यालय में प्रचलित कार्य प्रणाली से होता है।

यह भाषा आम भाषा से अलग अपने तय अर्थ रखती है जिसमें अर्थविचलन की कोई संभावना नहीं होती।

इसलिए अनुवाद करते समय अनुवादक को भी कुछ खास बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।
भारत सरकार द्वारा प्रशासनिक साहित्य के अनुवाद के लिए अनुवाद प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है।

इसके अंतर्गत 1971 से अनुवाद प्रशिक्षण का कार्य भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के अंतर्गत काम कर रहे केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो को सौंपा गया जिसके तहत सरकारी कार्यालयों में काम कर रहे कर्मचारियों को समय-समय पर अनुवाद की प्रक्रिया और सिद्धांत से अवगत करवाया जाता है।

केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों, विभागों के अनुवाद कार्य से संबंधित सभी कर्मचारियों के लिए केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो द्वारा अनुवाद प्रशिक्षण अनिवार्य है।

केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो अनुवाद प्रशिक्षण के लिए त्रैमासिक, इक्कीस दिवसीय, पाँच दिवसीय अनुवाद प्रशिक्षण जैसे कई कार्यक्रम चलाता है।

विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे अनुवादक इन प्रशिक्षणों की सहायता से अनुवाद के विभिन्न आयामों से समय-समय पर जागरूक होते रहते हैं तथा अपने अनुवाद कौशल को और अच्छा करने का प्रयास करते रहते हैं।

(2) बैंकिंग और अनुवाद-एक परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था का पूँजी के लेन-देन को लेकर अपना एक लंबा इतिहास है किंतु भारत को आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था अंग्रेजी की देन है। इसी के परिणामस्वरूप हम देख सकते हैं कि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर पश्चिम का प्रभाव है।

आज भी भारतीय बैंकों में मूल लेखनत्र फॉर्म, प्रचार सामग्री, दस्तावेज आदि मूलतः अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं।

राजभाषा संबंधी सांविधानिक-विधिक प्रावधानों के कारण बैंक भी राजभाषा प्रयोग के दायरे में आ जाते हैं जिसके कारण अनुवाद को उनके कार्यों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

बैंकिंग का संबंध आम जन और उसकी पूँजी से है इसलिए आमजन की भाषा में बैंकिंग की कार्यप्रणाली को समझाना और पत्र-व्यवहार भारतीय बैंक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है। बैंकिंग के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग मूलतः दो स्तरों पर होता है BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(क) राजभाषा के स्तर पर और
(ख) जनभाषा के स्तर पर।

(3) विधि साहित्य और अनुवाद-भारत ने अपने संविधान में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् शासन-प्रशासन और विधि के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग के लिए भाषा योजना की संकल्पना रखी। भाषा योजना के कुल चार चरण होते हैं-चयन, संहिताकरण, विशदीकरण और अनुपालन ।

इसकी स्थापना के पीछे का उद्देश्य शासन-प्रशासन तथा विधि आदि क्षेत्रों के लिए मानक भाषा और पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण करना था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान निर्माण के दौरान ही यह उपबंध किया गया था कि एक राजभाषा आयोग की स्थापना की जाएगी जो राष्ट्रपति को संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए भाषा के बारे में सिफारिश करेगा।

1955 में राजभाषा आयोग का गठन किया गया जिसके तहत आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया कि विधि के क्षेत्र में हिंदी में समान रूप से काम करने के लिए दो कार्य अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं-(1) विधि शब्दावली का विकास; और (2) समस्त अधिनियमों का हिंदी में पुनः अधिनियमन |

राजभाषा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में विधि शब्दावली के निर्माण के साथ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली के विकास के लिए केंद्र और राज्यों में हो रहे प्रयासों में समन्वय स्थापित करने के लिए समुचित प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

परिणामस्वरूप तत्कालीन राष्ट्रपति ने 1960 में विधि विशेषज्ञों का एक स्थायी आयोग बनाने का आदेश पारित किया और तद्नुसार 1961 में संघ ने राजभाषा (विधायी) आयोग की स्थापना की।

आयोग ने यह निर्णय लिया कि मानक विधि शब्दावली की तैयारी को हिंदी में अधिनियमों के संग्रह के पुनः अधिनियमन के कार्य से अलग न किया जाए । इस प्रकार मानक विधि शब्दावली का निर्माण और अधिनियमों का अनुवाद साथ-साथ चलता रहा।

(4) मीडिया और अनुवाद-वर्तमान काल मीडिया का काल है। तकनीकी विकास के साथ मीडिया का दायरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

मीडिया के अंतर्गत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ अब एक नया माध्यम सोशल मीडिया भी आकर जुड़ गया है। अब बहुत सारी खबरों से हम सोशल मीडिया के माध्यम से परिचित होते हैं।

फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप आदि विभिन्न पोर्टल सोशल मीडिया के अंतर्गत आते हैं जो हमें देश-विदेश तथा विभिन्न विषयों की छोटी-बड़ी खबरों की जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

आज प्रचार-प्रसार के लिए इन माध्यमों को विभिन्न देशों एवं समाजों में बड़े-बड़े राजनेता, फिल्मी हस्तियाँ आदि अपना रहे हैं।

ऐसी स्थिति में अब हमारे समक्ष मीडिया की एक बिल्कुल नई भाषा आ खड़ी हुई है जो अनुवादकों के समक्ष एक नई चुनौती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट की बात करें तो इसमें भी विविधता देखी जा सकती है। राजनीतिक, सामाजिक, खेल, मनोरंजन, बाजार ।

आदि विभिन्न भाषाओं के नमूने यहाँ उपलब्ध हैं। यह तो तय है कि कोई एक पारिभाषिक शब्दावली या कोश; मीडिया के विस्तृत दायरे को देखकर काफी नहीं है।

(5) सर्जनात्मक साहित्य और अनुवाद-सर्जनात्मक साहित्य का उद्देश्य सूचित करना मात्र ही नहीं, अपितु रहस्यों व रसों को उद्घाटित करना होता है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

सर्जनात्मक साहित्य का दायरा काफी विस्तृत है इसमें उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, गीत, गीतिनाटक आदि सब आ जाते हैं। इन सबके अनुवाद के लिए अनुवादक को कुछ विशेष योग्यताओं की आवश्यकता होती है।

काव्यानुवाद-स्रोत भाषा में लिखे गए काव्य का लक्ष्य-भाषा में रूपांतरण काव्यानुवाद कहलाता है। यह आवश्यकतानुसार गद्य, पद्य एवं मुक्त छंद में किया जा सकता है।

कविता का अनुवाद वास्तव में सबसे जटिल कार्य है। किसी भी अन्य विधा के अनुवाद की तुलना में कविता का अनुवाद अधिक चुनौतीपूर्ण है।

चूंकि कविता के अनुवाद में अर्थ, आशय, शब्द योजना छंद, लय, संस्कृति, काव्य सौंदर्य आदि सबका अनुवाद किया जाना अपेक्षित होता है इसलिए यह लगभग असंभव प्रतीत होता है। कविता का अनुवाद वास्तव में लक्ष्यभाषा में उसकी पुनर्रचना ही है।

कविता के अनुवाद के लिए अनुवादक को कविता की गहरी समझ होनी चाहिए । कविता का अनुवाद यदि कोई कवि ही करे तो बेहतर होगा क्योंकि इसके लिए मूल कविता और उसके भाव को आत्मसात् करके उसे पुनर्जीवन दिया जाता है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

कविता के अनुवादक को सहृदय होना अत्यंत आवश्यक है चूँकि यहाँ अनुवाद केवल भाषा और भाषा में निहित भावों का ही नहीं होता अपितु संकेतो-बिम्बों-प्रतीकों के साथ पंक्तियों के बीच की चुप्पी का भी होता है । साहित्य और उससे भी कविता के गूढ़ पाठक होना इसकी योग्यता है।

कथा साहित्य का अनुवाद-कथा साहित्य का अनुवाद कविता अथवा नाटक के अनुवाद से किसी भी तरह से सरल नहीं है। कथा साहित्य का अनुवाद भी एक जटिल कार्य है।

सर्जनात्मक साहित्य की प्रमुख विधाएँ -कहानी तथा उपन्यास दोनों ही कथा साहित्य के अंतर्गत आती हैं।

सर्जनात्मक साहित्य की भाषा अपने आप में बेहद लक्षणात्मक होती है।

सांस्कृतिक रूप से समृद्ध यह भाषा अपने समाज से प्राणतत्व प्रदान करती है। अपने समाज में गहरी रची-बसी होने के कारण कथा साहित्य में मुहावरे, लोकोक्तियाँ, भाषा की क्षेत्रीयता आदि अनेक ऐसे तत्त्व होते हैं

जो किसी भी अनुवादक के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकते हैं। कथा साहित्य में कविता के अन्य गुणों के साथ एक कथातत्त्व भी होता है जो समाज विशेष की अंतरंग छवि को प्रस्तुत करता है।

फणीश्वर नाथ रेणु का मैला आंचल, श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी, राही मासूम रज़ा का आधा गाँव, यशपाल का झूठा सच, भीष्म सहानी का तमस, कृष्णा सोबती का मित्रो मरजानी तथा जिंदगीनामा, कृष्ण बलदेव वैद का उसका बचपन, मैत्रेयी पुष्पा का चाक, राकेश कुमार सिंह का पठार पर कोहरा – ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि कथा साहित्य में रचनाकार न केवल विषय की गहराई में उतरते हैं अपितु उनका अपना परिवेश, भाषा, संस्कृति तथा समाज भी रचना में परिलक्षित होता है।

ऐसी स्थिति में अनुवादक के सामने भाषा से भी बड़ी चुनौती लेखक अथवा रचना का परिवेश होता है जिसका अनुवाद एक बेहद जटिल कार्य हो जाता है।

इसीलिए कहा जाता है कि सर्जनात्मक साहित्य के अनुवादक के लिए न केवल भाषा अपितु भाषा की संस्कृति और प्रवेश की समझ होना भी अनिवार्य है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

कथा साहित्य के अनुवाद में अनुवादक को कृति की मूलनिष्ठता के प्रति जहाँ वफादारी निभानी होती है, वहाँ उसे भाषा की सहजता, रवानी, स्पष्टता और बोधगम्यता का भी ध्यान रखना पड़ता है।

नाट्यानुवाद-नाट्यानुवाद शुरू करने से पहले मूल नाटक को केवल पढ़ना ही नहीं, आत्मसात् करना भी जरूरी है।

आत्मसात होने की प्रक्रिया में वह नाटक अनुवादक के मन में अपना रंगमंच खड़ा करने लगता है। साहित्य की अन्य विधाओं से अलग नाटक दृश्य काव्य है। दृश्य काव्य होते ही यह साहित्य की अन्य विधाओं से कुछ स्तरों पर अलग खड़ा हो जाता है।

नाट्यसाहित्य की विशेषता है उसका प्रस्तुतीकरण तथा उसके संवाद । यही दो बिंदु उसे अधिक जीवंत बनाते हैं इसलिए नाटक रचते समय नाटककार, उसका मंचन करते समय निर्देशक तथा अनुवाद करते समय अनुवादक को विशेष सतर्कता बरतनी होती है।

नाट्यानुवादक को दोनों भाषाओं के ज्ञान के साथ, साहित्यिक रुचि, कथ्य की समझ तथा रंगमंचीय विशिष्टताओं का भी ज्ञान होना चाहिए। लक्ष्यभाषा की रंगमंचीय परंपरा एवं विशेषताओं के साथ-साथ उसे सोतभाषा की नाट्य परंपरा का भी ज्ञान आवश्यक है।

BHDS 183 Free Assignment In Hindi
BHDS 183 Free Assignment In Hindi

खंड-ख

प्रश्न 3 अनुवाद के विविध साधनों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- वास्तव में अनुवाद एक जटिल कार्य है। मूल में एक भाषा में लिखे गए पाठ को दूसरी भाषा और उसके माध्यम से दूसरे समाज व संस्कृति में लाना अनुवादक का कार्य है।

ऐसा करते हुए उसे मूल लेखक की मनःस्थिति तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक-मानसिक स्तर तक पहुँचना होता है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

दूसरे शब्दों में कहें तो उसे परकाया प्रवेश करना होता है। यूँ तो मूल रचनाकार भी सृजन करते समय परकाया प्रवेश की स्थिति से गुजरते हैं किंतु अनुवाद के स्तर पर आकर यह परकाया प्रवेश दोगुना हो जाता है। इसलिए अनुवाद को एक दुसाध्य कार्य कहा गया है।

अनुवाद को निश्चित विधान मानने वाली दृष्टि अनुवादक से यह अपेक्षा रखती है कि उसमें साहित्यकार की सर्जनात्मक प्रतिभा, वैज्ञानिक की तर्क शक्ति तथा शिल्पगत दक्षता आदि गुण होना आवश्यक है।

अनुवाद करते समय अनुवादक से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दो भाषाओं के साथ-साथ दो समाज, संस्कृतियों, दो विभिन्न परिवेशों से भी परिचित हों जो वास्तव में असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।

इसीलिए अनुवादक को अनुवाद करते समय विभिन्न ज्ञान स्रोतों की आवश्यकता पड़ती है। अनुवादक के इन सहायकों को ही अनुवाद के विविध साधन या उपकरण कहा जाता है।

इन विविध साधनों में विभिन्न प्रकार के कोश, विभिन्न संस्थाएँ, वेबसाइट, कंप्यूटरीकृत कोश – विश्वकोश, शब्दकोश, मशीनी अनुवाद आदि महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

अनुवादक की सहायता के लिए और अनुवाद कर्म को सफल बनाने के लिए अनुवाद के विविध उपकरण बेहद कारगर सिद्ध होते हैं। इन महत्त्वपूर्ण उपकरणों में सबसे अहम् भूमिका विभिन्न प्रकार के कोशों की होती है।

कोश की परिभाषा-कोश एक ऐसा शब्द है जिसका व्यवहार अनेक क्षेत्रों में होता है और प्रत्येक क्षेत्र में उसका अपना अर्थ और भाव है। हिंदी शब्द सागर के अनुसार, कोश वह ग्रंथ है जिसमें अर्थ एवं पर्याय सहित शब्द इकटठे किए गए हों।

डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, कोश ऐसे संदर्भ ग्रंथ को कहते हैं जिसमें भाषा विशेष के शब्दादि का संग्रह हो या संग्रह के साथ उनके उसी या दूसरी या दोनों भाषाओं के अर्थ पर्याय, प्रयोग या विलोम हो या विशिष्ट अथवा विभिन्न विषयों की प्रविष्टियों की व्याख्या नामों (स्थान, व्यक्ति आदि) का परिचय या कथनों आदि का संकलन क्रमबद्ध रूप में हो। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने कोशों का विभाजन दो भागों में किया है

• भाषिक कोश BHDS 183 Free Assignment In Hindi
• भाषेतर कोश

भाषिक कोश के अंतर्गत वे कोश आते हैं जिनका सरोकार सीधा-सीधा भाषा से है। इसके दायरे में एकभाषिक कोश, द्विभाषिक कोश, बहुभाषिक कोश, पर्याय कोश, थिसॉरस, मुहावरा-लोकोक्ति कोश आदि आते हैं।

भाषेतर कोश से तात्पर्य कोश के उन प्रकारों से है जिनका क्षेत्र भाषा तक सीमित नहीं होता।

दूसरे शब्दों में कहें तो वे कोश जिनका उपयोग हम शब्द का अर्थ ढूँढ़ने के लिए नहीं अपितु अवधारणा अथवा संकल्पना का अर्थ, उसके मायने और भाषा विशेष में उसका स्थान और उसकी उपयोगिता जानने के लिए करते हैं।

भाषेतर कोशों में विश्व कोश, साहित्य कोश, धार्मिक कोश, विषय कोश आदि आते हैं। एकभाषिक कोश-एक भाषा वाले कोश को एकभाषिक कोश कहते हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एकभाषिक कोश से तात्पर्य उन कोशों से है जिनमें एक भाषा के शब्दों के उसी भाषा में अर्थ दिए जाते हैं। द्विभाषिक कोश-द्विभाषिक कोश वह होता है जिसमें दो भाषाएँ होती हैं, जैसे हिंदी-अंग्रेजी या अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश ।

अनुवाद कार्य के लिए द्विभाषिक कोश अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अनुवादक दो भाषाओं को जानने के कितने भी दावे कर लें लेकिन मनुष्य की निश्चित सीमा होने के कारण वे किसी भी भाषा को पूर्णतः नहीं जान पाते।

विदेशी भाषाओं के संदर्भ में तो यह कथन और समीचीन हो जाता है। स्रोतभाषा के पाठ को पढ़ते तथा अनूदित करते समय ऐसी कई समस्याएँ पाठक अथवा अनुवादक के सामने आती हैं। द्विभाषिक कोश ऐसी स्थिति में बेहद उपयोगी सिद्ध होता है।

साथ ही, द्विभाषिक कोश में शब्दों के अर्थ के साथ-साथ उनके सही उच्चारण तथा प्रयोग आदि की भी जानकारी मिल जाती है। र्थादि दिए जाते हैं।

बहुभाषिक कोश का प्रयोग उस स्थिति में होता है जब अनुवाद करते समय दो भाषाओं के बीच एक सेतु भाषा का भी प्रयोग किया जाए।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

उदाहरणस्वरूप तमिल से गुजराती में अनुवाद करते समय यदि अनुवादक को इनमें से कोई एक भाषा नहीं आती है तो वे हिंदी अथवा किसी अन्य भाषा के माध्यम से अनुवाद कार्य कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में त्रिभाषिक अथवा बहुभाषिक कोश की आवश्यकता अनुभव होगी।

त्रिभाषिक कोश के अतिरिक्त भी कई भाषाओं के कोश उपलब्ध हैं जो अनुवाद की आवश्यकता और भाषा की संप्रेषणीयता को ध्यान में रखते हुए निर्मित किए गए हैं। थिसॉरस-थिसॉरस का सृजन मूलतः बतौर शब्द खज़ाना किया गया था।

थिसॉरस से तात्पर्य एक ऐसे कोश से है जिसमें अवधारणाओं अथवा संकल्पनाओं के आशय के अनुसार शब्दों का संयोजन किया जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो थिसॉरस के अंतर्गत एक शब्द उसकी अवधारणा से मिलते अन्य शब्द, मुहावरे, भाषिक प्रयोग आदि एक ही स्थान पर मिल जाते हैं।

ऐसे में रचनाकार अथवा अनुवादक को एक अर्थ तथा उससे मिलते अन्य अर्थों की खोज में भटकना नहीं पड़ता। थिसॉरस तथा पर्याय कोश की अवधारणा में कुछ समानता देखी जाती है।

यानी दोनों ही कोशों में एक ही शब्द के विभिन्न पर्याय तथा उनके विस्तृत आशय दिए जाते हैं। मुहावरा-लोकोक्ति कोश-मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ समाज, संस्कृति तथा परंपराओं के साथ भाषा के अंतर्गुफन की परिचायक है।

अनुवादक को अनुवाद तथा विशेष तौर पर सर्जनात्मक साहित्य के अनुवाद के दौरान अनेक प्रकार की भाषागत समस्याओं का सामन करना पड़ता है। भाषा में मुहावरे तथा लोकोक्तियों का प्रयोग भाषा पर रचनाकार की पकड़ की ओर संकेत करता है।

वहीं इनका सही-सही अनुवाद भाषा पर अनुवादक की सही पकड़ का भी द्योतक है। मुहावरे तथा लोकोक्तियों का अनुवाद अपने आप में एक जटिल कार्य है जिसे ध्यान में रखते हुए विभिन्न भाषाओं में मुहावरे तथा लोकोक्ति कोशों का निर्माण किया गया है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

मुहावरे तथा लोकोक्ति का अनुवाद करते हुए अनुवादक को बेहद सावधानी रखने की जरूरत पड़ती है। भाषा का लाक्षणिक तथा व्यंजनापरक प्रयोग होने के कारण इनका अनुवाद भी अभिधापरक नहीं हो सकता।

ऐसी स्थिति में या तो अनुवादक को समतुल्य मुहावरे-लोकोक्तियों की खोज लक्ष्यभाषा में करनी पड़ती है अथवा मुहावरे-लोकोक्ति का सही अर्थ समझते हुए उनका यथासंभव अनुवाद करना होता है।

भाषेत्तर कोश-भाषेत्तर कोश में प्रमुख हैं-विश्वकोश. विषयकोश तथा साहित्यकोश। विश्वकोश-हिंदी साहित्य कोश हिंदी साहित्य एवं उससे संबंधित विषयों का विश्वकोश (encyclopedia) है।

विश्वकोश का अंग्रेजी पर्याय है एनसाइक्लोपीडिया। विश्वकोश में विश्व के अनेक विषयों की जैसे-धर्म, संस्कति, दर्शन, कला, इतिहास, भूगोल आदि की विस्तृत जानकारी दी जाती है।

विश्वकोश चूँकि एक भाषा अथवा एक भाषा के निश्चित ज्ञान, तक सीमित नहीं है इसलिए इसकी गणना भाषेतर कोशों में की जाती है। इसमें कोश के अनुसार वर्णानुक्रम का ध्यान रखा जाता है ताकि किसी भी शब्द अथवा अवधारणा को सरलता से खोजा जा सके।

किसी भी शब्दकोश का उद्देश्य दिए गए शब्द के उसी अथवा अन्य भाषा में अर्थ प्रदान करना होता है। इसी कारण सीमित भी होता है जबकि विश्वकोश से तात्पर्य ऐसे कोश से हैं जिसके अंतर्गत किसी एक शब्द अथवा अवधारणा को विभिन्न दृष्टिकोणों से तथा व्यापक रूप में समझाया जाता है।

अनुवादक चूँकि दूसरी और कई बार अपनी भाषा की संस्कृति, समाज और उससे जुड़ी विभिन्न अवधारणाओं से पूरी तरह परिचित नहीं होते ।

ऐसी स्थिति में वे विश्वकोश की मदद से न केवल अर्थ की तह तक पहुँचते हैं अपितु उसका उचित अनुवाद भी संभव हो पाता है।

विषय कोश-विषय कोश के अंतर्गत संबद्ध विषय तथा उससे जुड़ी विभिन्न संकल्पनाओं, अवधारणाओं आदि की विस्तृत जानकारी उपलब्ध होती है।

विषय कोश के अंतर्गत किसी शब्द विशेष का विषय विशेष में क्या अर्थ होता है, इसके बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

भाषा, दर्शन, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि के कोश उस विषय के गहन अध्ययन में बहुत सहायक हैं।

साहित्यकोश-जिस प्रकार विषय कोश किसी विषय के क्षेत्र में गहन अध्ययन हेतु उपयोगी सामग्री उपलब्ध करवाता है, उसी तरह साहित्यकोश साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न कालों, युगों, अवधारणाओं, प्रवृत्तियों, प्रयोगों, महत्त्वपूर्ण रचनाकारों आदि के विषय में गहन अध्ययन हेतु जानकारी उपलब्ध करवाता है।

विश्वसाहित्य में कई अवधारणाएँ प्रमुख रही हैं।

वे सभी अवधारणाएँ किसी एक समाज, राष्ट्र एवं संस्कृति की देन नहीं है। विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न समाज के साहित्य और साहित्यालोचन में नई अवधारणाओं की शुरुआत हुई जिन्हें समय-समय अन्य भाषाओं के साहित्य में भी अपना लिया गया।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

साहित्यानुवाद करते समय अनुवादक के लिए अपेक्षित है कि उन्हें इन विभिन्न अवदानों के विषय में समुचित जानकारी हो। ऐसी स्थिति में साहित्यकोश अनुवादक के सहायक हो सकते हैं।

प्रश्न 4 साहित्यानुवाद के अर्थ और प्रकार को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- स्रोत-भाषा में लिखित साहित्य का लक्ष्य-भाषा में अनुवाद करने को साहित्यिक अनुवाद कहते हैं। साहित्य की विधाओं में कविता,लघुकथा, कहानी, उपन्यास, एकांकी, नाटक, प्रहसन (हास्य), निबंध, आलोचना, रिपोर्ट, डायरी लेखन, जीवनी आत्मकथा, संस्मरण, गल्प (फिक्शन), विज्ञान तथा कथा (साइंस फिक्शन), व्यंग्य, रेखाचित्र, पुस्तक समीक्षा या पर्यालोचन तथा साक्षात्कार शामिल हैं।

साहित्यिक कृतियों का अनुवाद, सामान्य अनुवाद से उच्चतर माना जाता है।

साहित्यिक अनुवादक कार्य के सभी रूपों जैसे भावनाओं, सांस्कृतिक बारीकियों, स्वभाव और अन्य सूक्ष्म तत्त्वों का अनुवाद करने में भी सक्षम होना चाहिए।

कुछ लोग कहते हैं कि साहित्यिक अनुवाद वास्तव में संभव नहीं है। दो संस्कृतियों के बीच अनुवाद रूपी पुल के निर्माण में साहित्यिक अनुवाद की भूमिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

इसका सीधा सा कारण यह है कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का साहित्य उस क्षेत्र की संस्कृति, कला और रीतियों का प्रतिनिधित्व करता है। कहा भी गया है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।

बस यही वह चीज है जो साहित्यिक अनुवाद को बेहद उत्तरदायी और कठिन कर्म बना देती है। किसी भी एक साहित्यिक कृति का उसकी मूल भाषा से लक्ष्य-भाषा में अनुवाद करते समय कितनी ही सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

ये सभी सावधानियाँ सांस्कृतिक भिन्नताओं के चलते समस्याओं का रूप ले लेती हैं क्योंकि सांस्कृतिक भिन्नता को समाप्त करने के लिए भाषा को मूल रचना की भाषा में व्यक्त प्रतीकों, भावों और उन अनेक विशेषताओं को सटीक तरीके से लक्ष्य-भाषा में उतारना होता है और साथ ही यह ध्यान रखना होता है कि लक्ष्य-भाषा में उतरी कृति पढ़ने वाले को सहज और आत्मीय लगे।

साहित्य की विभिन्न विधाओं में से किसी एक भाषा में रचे गए सर्जनात्मक साहित्य को जब किसी दूसरी भाषा में अंतरित किया जाता है तो वह ‘साहित्यानुवाद’ कहलाता है। साहित्यानुवाद’ को ‘साहित्यिक अनुवाद’ भी कहा जाता है।

जिस प्रकार किसी एक भाषा में साहित्य सृजन अलग-अलग विधाओं में किया जाता है, उसी आधार पर सर्जनात्मक साहित्य के दूसरी भाषा में अनुवाद को भी विधावार अलग-अलग नामों से भी संबोधित किया जाता है।

इस आधार पर, गद्य साहित्य के अनुवाद को ‘गद्यानुवाद’, पद्य (कविता) साहित्य के अनुवाद को ‘पद्योनुवाद (काव्यानुवाद) तथा नाटक के अनुवाद को नाट्यानुवाद’ कहते हैं।

साहित्य की कथा और कथेतर (अन्य) विधाओं में रचित साहित्य को भी इसी प्रकार संबोधित किया जा सकता है।

साहित्यानुवाद के संदर्भ में विशेष ध्यान रखने योग्य यह भी है कि साहित्य की प्रत्येक विधा का अपना अलग वैशिष्ट्य होता है। इसी तरह, विभिन्न विधाओं में रचित साहित्य का अनुवाद भी अपनी अलग विशिष्टता लिए हुए होता है।

अगर अनुवादक को प्रत्येक विधा विशेष की विशिष्टता और उसे लक्ष्य भाषा में ढालकर प्रस्तुत करने की अल्पज्ञता (कम ज्ञान) है तो वह मलतः अनवादक की सीमा कही जाएगी.न साहित्यानुवाद कर्म की असंभाव्यता।

वस्तुतः अनुवादक को विधा-विशेष की विषयवस्तु और अंतर्वर्ती भावना को ग्रहण कर कलात्मक अनुभूति तक पहुँचते हुए उसके कथानक, वर्णन, चरित्र, शैली आदि की विशिष्टता को लक्ष्य भाषा में उबुद्ध कर अभिव्यक्त करने में सफलता प्राप्त करनी होती है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

अनुवादक को रचयिता के व्यक्तित्व में प्रवेश कर उसके अनुभवों को स्वयं अनुभूत करने की साधना करनी पड़ती है, ‘परमानस प्रवेश करना पड़ता है।

अर्थात उसे मूल रचयिता की मनोभूमि पर निर्वैयक्तिक भाव से उतरकर पाठ को आत्मसात करके अपनी चेतना में रचयिता की सर्जनात्मक मन स्थिति का उद्बोध करते हुए समान कलात्मक अनुभूति को दूसरी (लक्ष्य) भाषा में प्रस्तुत करना होता है।

इसके लिए अनुवादक में पुनःसृजन की ऐसी क्षमता होनी चाहिए जैसी मूल लेखन में सृजन की होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि अनुवादक का सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न होना जरूरी है।

इसकी कसौटी तो यह रहती है कि अनूदित रचना पढ़कर पाठक को ऐसी अनुभूति प्रतीत हो मानो रचनाकार ने अपनी ही कृति को दूसरी भाषा में पुनःसृजित कर दिया है।

साहित्य विधा में अंतर के कारण कहीं यह अनुभूति स्थूल होती है और कहीं अपेक्षाकृत सूक्ष्म । अनुभूति की यह सूक्ष्मता, तरलता और अमूर्तता अनुवादक के द्वारा दूसरी भाषा में समांतर उबुद्ध कर्म (अर्थात साहित्यानुवाद) को अपेक्षाकृत जटिल बना देती है।

वैसे, साहित्यिक अनुवाद – चाहे वह गद्यबद्ध हो अथवा पद्यबद्ध – समांतर अनुभूति को उबुद्ध करने में सफलता प्राप्त करने में ही साहित्यानुवादक की सफलता है।

लेकिन इस सफलता की तभी उपलब्धि हो पाती है, जब अनुवादक को साहित्य की विधा विशेष की विशिष्टता का बोध हो और वह उस वैशिष्ट्य को दूसरी भाषा में साहित्य की विधा विशेष में सार्थक तरीके से प्रस्तुति कर पाए।

प्रश्न 5 साहित्यिक अनुवाद का क्या महत्त्व है?

उत्तर- अनुवाद मानव सभ्यता के साथ ही विकसित एक ऐसी तकनीक है जिसका आविष्कार मनुष्य ने बहुभाषिक स्थिति की विडम्बनाओं से बचने के लिए किया था । वर्तमान युग ‘अनुवाद का युग है।

वर्तमान युग में अनुवाद की माँग और कार्य-क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इससे विभिन्न भाषाओं के बीच की दूरी कम हो रही है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

प्रांतीय भाषाओं में रचित साहित्य को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय महत्त्व भी मिल रहा है। इससे एक भाषा की सामग्री से एकाधिक भाषाओं के पाठक लाभान्वित होते हैं। साहित्यानुवाद की महत्ता विभिन्न संदर्भ लिए हुए है, इसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है

• राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता के पल्लवन में साहित्यानुवाद की सार्थक भूमिका है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विभिन्न भाषा-भाषियों में व्याप्त अनेकताओं के बीच प्रवाहित एकता की धारा की समझ के विकास में अनुवाद की सर्वाधिक उपादेयता है।

साहित्यानुवाद, भारतीय जनमानस में एकता और समानता की उच्च भावना का संचार करता है। भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य की परंपरा इस तथ्य का उद्घाटन करती है कि सभी भाषाओं में मूलतः भावात्मक एकता ही है।

उत्तर भारत में जहाँ गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस लिखी वहीं तमिल में कंबन, मलयालम में एषुत्तच्छन, बंगाल में कृत्तिवास, असमिया में शंकरदेव, ओड़िया में बलरामदास, मराठी में एकनाथ आदि ने रामकाव्य की रचना की ।

निर्गुण ब्रह्म की उपासना का हिंदी में कबीर, पंजाबी में नानकदेव, मराठी में ज्ञानेश्वर, नामदेव, कश्मीरी में लल्लेश्वरी, सिंधी में सामी और तेलुगु में वेमना ने जनमानस को संदेश दिया।

• किसी भी भाषा की श्रेष्ठ/महान साहित्यिक कृतियों के प्रति विश्व-मानव की जिज्ञासा अन्य भाषा-भाषियों को साहित्यिक अनुवाद करने की प्रेरणा का आधार बनती हैं।

साहित्यानुवादक अन्य भाषाओं में उपलब्ध महान साहित्यिक कृतियों को अपनी भाषा के पाठकों तक पहुँचाना चाहता है ताकि वे भी उत्तम कृतियों के पठन-वाचन का आनंद ले सकें, उनका आस्वादन कर सकें।

इसी कारण शेक्सपीयर, टॉलस्टॉय आदि विश्व-विख्यात साहित्यकारों की कृतियाँ विश्व की अनेकानेक भाषाओं में अनूदित हुई।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

इसी प्रकार, बंकिम चंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ ठाकुर, कालिदास, वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास, प्रेमचंद आदि की रचनाएँ केवल भारतीय भाषाओं में ही न अपितु अनेकानेक विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हुईं।

इसी का परिणाम रहा था कि महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ का पढ़कर जहाँ जर्मन कवि गेटे चमत्कृत थे वहीं शेलिंग, शॉपेनहावर तथा टी एस. एलियट भारतीय उपनिषदों से साक्षात् कर पाए।

‘मेघदूत’ के एच.एच. विल्सन द्वारा किए गए ‘मेघदूत’ के पद्यानुवाद से पाश्चात्य रोमांटिक कवियों को प्रेरणा मिली।

• भाषा और साहित्य का संस्कृति की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। साहित्य वह माध्यम है, जिसके द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं और विश्वासों की अभिव्यक्ति होती है, जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा होती है।

इसलिए अनुवाद, संस्कृति के विकास का एक बड़ा माध्यम है। एक भाषा का साहित्य मौखिक अथवा लिखित – किसी भी रूप में दूसरी भाषा में, दूसरी से तीसरी, चौथी आदि भाषा में स्थान पाता चलता है।

साहित्यिक यात्रा का निरंतर चलता यह चक्र, संस्कृति और सभ्यता के विकास एवं प्रसार को गति प्रदान करता है।

उदाहरण के लिए, भारतीय ग्रंथों के अनुवाद से पूर्वी एशिया के चीन, जापान, इंडोनेशिया, श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार), थाईलैंड, कंपूचिया, लाओस आदि अनेक देशों में बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ।

अरबों ने गणितशास्त्र, खगोल विज्ञान और आयुर्वेद से संबंधित भारतीय ग्रंथों के अनुवाद किए। भारत-अरब के इस साहित्यिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप समूचे यूरोप में भारतीय गणित का प्रचार हुआ।

इतिहास साक्षी है कि अनूदित साहित्य यूरोप में पुनर्जागरण के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ है। जैसे, ‘एलिजाबेथन युग में इतालवी और फ्रांसीसी क्लासिकों के अनुवादों ने यूरोपीय पुनर्जागरण से उन्मुक्त मानवीय चेतना की हलचलों ने ब्रिटिश संवेदना को झकझोर कर रख दिया।

वहीं, 18वीं-19वीं शताब्दी के यूरोपीय चेतना के दूसरे पुनर्जागरण में संस्कृत और फारसी से किए गए अनूदित साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

‘मेघदूत’ के एच एच. विल्सन कृत पद्यानुवाद ने अन्य रोमांटिक कवियों को तथा चार्ल्स विल्किन्स द्वारा किए गए गीता के पद्यानुवाद ने विलियम ब्लेक को प्रेरणा प्रदान की और यूरोपीय समाज-संस्कृति को समृद्ध किया।

• साहित्यानुवाद का भाषा के विकास की दृष्टि से भी महत्त्व है। अनुवाद के प्रसार से विभिन्न देशों की भाषाएँ अन्य भाषाओं से शब्दावली प्राप्त करती हैं ताकि सार्थक अनुवाद का प्रयोजन सिद्ध हो सकें।

अनुवाद के प्रयोजन से अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करने के मूल में जहाँ अंगीकरण की प्रवृत्ति झलकती है वहीं अनुकूलन की प्रवृत्ति भी नजर आती है।

जैसे, हिंदी में प्रयुक्त होने वाले ‘मुआवजा’. ‘कुर्की’, ‘जुर्माना’ आदि उर्दू शब्द; तथा कप्यूटर’, ‘स्कूल’, ‘कॉलेज’, ‘रेलवे’, ‘मिनट’, ‘गैस’, ‘बोनस’, ‘चैक’ आदि अंग्रेजी के शब्द अंगीकरण के प्रमाण हैं।

अंग्रेजी भाषा ने ‘maya’, ‘decoit’, ‘yoga’, ‘jungle’, ‘chutney’, ‘curry’ आदि भारतीय शब्दों को अपनाया है।

इसी प्रकार, ‘फतासी’, ‘रपट’, ‘अपीलीय’, ‘गोदाम’, ‘तकनीक’, ‘कामदी’ और ‘रिपोर्ताज’ आदि शब्दों का प्रयोग क्रमशः ‘fantasy’, ‘report’, ‘appellate’, ‘godown’, ‘technique’, ‘comedy’ और ‘reportage’ शब्दों की ध्वनियों में थोड़े-बहुत परिवर्तन करके शब्दों का रहा है।

इसके अलावा, ‘काला धन’, ‘स्वर्ण जयंती’, ‘पाँच तारा’, ‘श्वेत-पत्र’ आदि ऐसे ही कुछेक शब्द हैं जो अंग्रेजी के क्रमशः ‘black money’, ‘golden jubilee’, ‘five star’, ‘white paper’ शब्दानुवाद के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

• साहित्यकार की मनोभूमि से जुड़ने तथा उसके आत्म-विस्तार को स्वर देने का आधार अनुवाद ही है। साहित्य मानव-जीवन की, उसके भाव एवं विचार की तार्किक अभिव्यक्ति का एक माध्यम है।

रचनाकार अपनी कल्पना शक्ति और सर्जनात्मकता से अपने भावों को भाषा के जरिए व्यक्त करता है,

जिन्हें समझने के लिए अनुवादक को अपनी मनोभूमि के तार, साहित्यकार की मनोभूमि से जोड़ने पड़ते हैं, लेखक के वैचारिक धरातल में गहन रूप से प्रवेश करना पड़ता है। वह इस कार्य को ‘परकाया प्रवेश’ के आधार पर संपन्न करता है।

प्रश्न 6 पद्य साहित्य के अनुवाद की चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर- विभिन्न विद्वान कविता के अनुवाद को लेकर विभिन्न विचार व्यक्त करते रहे हैं।

जहाँ आधुनिक समय में ग्रीक रचनाकार होमर के अनुवादक मैथ्यू ऑनल्ड मानते थे कि अनुवादक को मूल के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान होना चाहिए और कविता का अनुवाद करते समय कवि के पूरे मानस, उसकी सामाजिक-मानसिक परिस्थिति,

उसकी शैली आदि को पूरी तरह से अनुवाद में उतार देना चाहिए वहीं उत्तर आधुनिक समय के अनुवाद चिंतक लेफेवेयर कविता के अनुवाद के समय अपवर्तन अथवा rewriting की बात करते हैं और सुजित मुखर्जी नवसृजन यानी new writing की।

वहीं एजरा पाउंड के अनुसार कविता के अनुवाद में यदि उसका मूल उत्स भी बच जाए तो अनुवाद को सफल माना जाना चाहिए।

अपनी पुस्तक On Translating Homer में मैथ्यू ऑनल्ड लिखते हैं “union of the translator with his original, which alone can produce a good translation”. अर्थात अनुवादक का मूल रचना के साथ एकीकरण ही एक अच्छे अनुवादक को जन्म दे सकता है और इसी आधार पर उन्होंने होमर के अनुवादकों – चैपमेन, पोप, न्यूमैन आदि की आलोचना की ।

कविता के अनुवाद में कवि की निष्ठा कविता के अनुवाद के समय, शैली, उसके अनुवाद के महत्त्व आदि विभिन्न बिंदुओं पर निर्भर करती है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(1) शिल्प और शैली के स्तर पर-मैथ्यू ऑनल्ड के अनुसार अनुवादक को कवि के विषय, नाद, शैली, शिल्प आदि हर स्तर पर निष्ठावान होना चाहिए। फैज़ अहमद फैज़ की प्रसिद्ध पंक्तियाँ भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नारे की तरह इस्तेमाल हुई।

ऐसी कविता में तुकबंदी और लय का बहुत अधिक महत्त्व होता है। ऐसी कविता के अनुवाद के समय उसके कथ्य के साथ शिल्प का महत्त्व बहुत अधिक हो जाता है। उदाहरण के लिए

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बा अब तक तेरी है

तेरा सुतवा जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है। (फैज़ अहमद फैज़)
अनुवादक ने अनुवाद में कथ्य के साथ शिल्प को महत्त्व देते हुए कविता की लय और तकांत वत्ति दोनों का ध्यान रखा तै

Speak, for your lips are free
Speak, for your tongue is still yours
Your upright body belongs to you
Speak, for your soul is still yours.

यहाँ कविता के अनुवाद की मैथ्यू ऑर्नल्ड द्वारा बल दी गई रणनीति को समझा जा सकता है जहाँ अनुवाद में कथ्य के साथ-साथ शिल्प का भी बेहद महत्त्व है तथा शिल्प के अभाव में कविता का अच्छा अनुवाद संभव नहीं। अनुवाद में रस और भाव के साथ छंद, लय, ध्वनि और नाद की भी उतनी ही महत्ता है।

(2) शीर्षक के स्तर पर-शीर्षक की महत्ता कविता में बहुत अधिक होती है। शीर्षक से ही कविता के स्वरूप का भान होता है। कविता के अनुवाद में शीर्षक के अनुवाद पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, अमेरिकन कवयित्री एमिली डिकिंसन की कविता Hope is the thing with feathers का हिंदी अनुवाद देखते हैं। इस कविता का अनुवाद रजनीश मंगा ने किया है जिसका शीर्षक है आशा एक चिड़िया का नाम है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

Hope Is The Thing With Feathers by Emily Dickinson
‘Hope’ is the thing with feathers

that perches in the soul
And sings the tune without the words–
And never stops-at all

And sweetest-in the Gale-
is heardAnd sore must be the storm
That could abash the little Bird
That kept so many warm

I’ve heard it in the chillest land
And on the strangest Sea—
Yet, never, in Extremity,
It asked a crumbof Me.

आशा एक चिड़िया का नाम है —

आशा एक चिड़िया का नाम है
जो हमारी आत्मा में बसती है
और गाती है निःशब्द गीत
और कभी रुकती नहीं- पल भर भी

गीत मधुरतम-तुंद हवाओं में सुनिएगा
और तब भी जब तूफान भयंकर सम्मुख हो
उस नन्हीं सी चिड़िया को न कर पाया पस्त
जिसने सब में प्यार व गर्मजोशी बांटी हो

मैंने देखा-सुना हुआ है प्रचंड ठंड के स्थानों में
और धुर अपरिचित समुद्र में भी
या घोर विपत्ति आ जाने पर भी,
ठसने मेरे लिए कभी द्वार न अपने बंद किए

कविता के शीर्षक में ही अनुवाद द्वारा ली गई छूट देखी जा सकती है। जहाँ मूल कविता का शीर्षक है Hope is the thing with feather वहीं हिंदी में इसका अनुवाद किया गया है – आशा एक चिड़िया का नाम है।

अनुवादक चाहते तो इसका शब्दानुवाद कह सकते थे कि ‘आशा एक पंखों वाली शय का नाम है

लेकिन कवि ने कविता के पूरे भाव और संदेश को समझते हुए इसका अनुवाद करने का प्रयास किया है हमें यह समझना होगा कि कविता के अनुवाद में निष्ठा के मायने बेहतर अनुवाद से है जिसके तहत अनुवादक आवश्यकता पड़ने पर छूट ले सकते हैं।

(3) शब्दों के स्तर पर-इसी कविता से दो पंक्तियाँ लेकर यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है

And sings the tune without the words,
And never stops—at all

इन दो पंक्तियों के अनुवाद को ध्यान से देखिएऔर गाती है निःशब्द गीतऔर कभी रुकती नहीं- पल भर भीअंग्रेजी कविता की इन पंक्तियों में जहाँ कवयित्री ने tune without the word कहा है,

वहीं उसका अनुवाद करते हुए अनुवादक ‘निःशब्द गीत’ शब्द का प्रयोग करते है। स्पष्ट है कि अनुवाद करते समय अनुवादक का मूल उद्देश्य शब्द के स्थान पर शब्द रख देना नहीं अपितु कविता के प्रति पूरी तरह न्याय करना था।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

अनुवाद में अनुवादक ने न केवल कविता की आत्मा को बचाया है वहीं कविता के स्थायी भाव उदासी को पूरी तरह सहेजा है जो कविता की शाब्दिक पंक्तियों के भीतर छिपा है।

शिल्प की दृष्टि से भी अनुवादक ने बहुत सावधानी बरती है। एमिली डिकिंसन (1830-1886) के काव्यशिल्प के बारे में कहा जाता है कि वे बेहद छोटी-छोटी पंक्तियों में कविता लिखती थीं।

अनुवाद करते समय अनुवादक ने कवयित्री के शिल्प के साथ भी पूरा न्याय किया है। मूल रूप से कहा जाए तो 1 2 छोटी पंक्तियों की कविता का 12 छोटी पंक्तियों में ही अनुवाद किया गया है।

खंड – ग

प्रश्न 7 प्रशासनिक भाषा के वैशिष्ट्य का वर्णन कीजिए।

उत्तर- भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। ऐसी भाषा जो प्रशासन या राजकाज में प्रयुक्त होती है, उसे प्रशासनिक भाषा कहा जाता है। प्रशासनिक भाषा का स्वरूप सामान्य भाषा से भिन्न होता है।

इसका समूचा स्वरूप सरकार की विशिष्ट कार्य-प्रणाली पर आधारित है और यह कार्य-प्रणाली के पीछे निहित सिद्धांतों से नियंत्रित भी है।

वास्तव में सरकार एक अमूर्त सत्ता है। इसके अधिकारों का उपयोग किसी अधिकारी विशेष द्वारा नहीं वरन् अधिकारी समूह द्वारा होता है।

ये सरकारी अधिकारी सरकारी तंत्र के विभिन्न अधिकारियों के बीच अलग-अलग स्तरों पर विभाजित होते हैं।

यही कारण है कि प्रशासनिक हिंदी विशेषकर कार्यालयी हिंदी की संरचना में वास्तविक कर्ता का लोप होता है। यदि वास्तविक कर्ता का प्रयोग होता भी है तो अप्रत्यक्ष रूप में या प्रतीक रूप में। सरकारी अधिकारी का कोई भी निर्णय उसका निजी निर्णय नहीं होता है।

यह अमूर्त या अदृश्य सरकार का निर्णय होता है जिसने अपने अनेक अधिकारों में से एक अधिकार या उसके किसी अंश को अपनी ओर से किसी अधिकारी को दे रखा होता है और वह अधिकारी अमूर्त सरकार की ओर से उसका प्रयोग करता है।

प्रशासनिक भाषा सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ-साथ जनसामान्य से भी संबंधित होती है।

यानी जो लोग प्रशासन की व्यवस्था कर रहे हैं और जिनके लिए कर रहे हैं उन दोनों का भाषा व्यवहार इससे जुड़ा होता है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

इसलिए सरकारी कामकाज की भाषा की प्रकृति के आधार पर कार्यालयी या प्रशासनिक भाषा की विशेषताएँ हैं, जो निम्न हैं

(1) बोधगम्यता एवं एकार्थता-बोधगम्यता एवं एकार्थता प्रशासनिक भाषा की पहली शर्त होती है। भाषा की बोधगम्यता एवं एकार्थता को बनाए रखने के लिए कार्यालयी साहित्य में अभिधापरक भाषा का ही प्रयोग किया जाता है।

अभिधात्मक प्रयोग से प्रशासनिक भाषा पूरी तरह से एकार्थक रूप धारण कर लेती है। इससे कथ्य में स्पष्टता आती है। विषय-वस्तु को सीधे स्पष्ट शब्दों में कहा जाना इसमें जरूरी होता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को दिल्ली जल बोर्ड से एक पत्र मिलता है कि उसने पिछले चार वर्षों से पानी के बिल का भुगतान नहीं किया है

इसलिए अब उसे चेतावनी दी जाती है कि वह बकाया राशि का भुगतान यथाशीघ्र कर दे नहीं तो उसका कनेक्शन काट दिया जाएगा।

(2) निर्वैयक्तिकता-सरकारी तंत्र में अधिकारों का वितरण सुनिश्चित क्रम में होता है। अतः प्रत्येक अधिकारी या तो अपने उच्चाधिकारी के आदेश का पालन करता है या निम्न अधिकारी को आदेश देता है या सरकार के निर्णयों की सूचना देता है।

दूसरे शब्दों में सरकारी अधिकारी का सरकारी आदेश से कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं होता।

वह अधिकारी व्यक्तिगत रूप में कुछ न कहकर निर्वैयक्तिक रूप में कहता है; जैसे, पत्र भेजा जा रहा है। कार्यालय में व्यक्ति प्रशासन का अंग होता है, इसलिए कार्यालय के सभी पत्रादि प्रशासन की ओर से लिखे जाते हैं।

(3) आज्ञार्थक या सुझावपरक वाक्य प्रयोग-प्रशासनिक तंत्र में कर्मचारियों की कई श्रेणियाँ होती हैं। कोई अधिकारी होता है तो कोई उसके अधीनस्थ कर्मचारी। फिर अधीनस्थ कर्मचारी के नीचे भी कोई अन्य कर्मचारी होता है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

इनके बीच आदेशों का आदान-प्रदान होता है। प्रशासनिक व्यवस्था में आदेश तथा आदेश पालन की परंपरा होने के कारण आज्ञार्थक या सुझावपरक वाक्यों का अधिक प्रयोग होता

प्रश्न 8 प्रशासनिक अनुवाद की मूलभूत अपेक्षाएँ क्या हैं?

उत्तर- संसद तथा सरकारी विभागों आदि के कार्यों में द्विभाषिक स्थिति के प्रशासनिक अनुवाद के लिए जो भाषा उपयोग में लाई जाती है – उसके संबंध में सामान्य धारणा यह होती है कि वह बिल्कुल सही अभिप्राय को व्यक्त करे, उसमें बात को सीधे ढंग से अभिव्यक्त किया जाए और वह सर्वसाधारण के लिए सुग्राह्य हो।

ऐसे अनुवाद में दीर्घ वाक्य-योजना, आवश्यक अर्थ-जटिलता, अनावश्यक मुहावरा-प्रयोग से बचा जाना चाहिए ।

प्रशासनिक अनुवाद की भाषा शासन और जनता से एक साथ जुड़ी रहती है, इसलिए इसमें सरलता और बोधगम्यता का होना आवश्यक है।

इसी तरह विधि से संबंधित सामग्री के संदर्भ में हमेशा यह ध्यातव्य है कि उसमें शब्दावली एवं वाक्य-विन्यास का ऐसा प्रयोग हो कि एक ही अर्थ निकल सके।

अन्यथा अर्थ-विचलन होने से अनर्थ हो सकता है। इस आधार पर प्रशासनिक अनुवाद के लिए कुछ मूलभूत अपेक्षाएँ होती हैं, जो कि इस प्रकार हैं

(1) सरल भाषा-प्रयोग-साहित्यिक अथवा मानविकी या ज्ञान के साहित्य आदि विषय के अनुवाद की भाषा विषय के स्तर के अनुसार होती है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

किंतु प्रशासनिक अनुवाद में यह ध्यान में रखना जरूरी है कि हमारा उद्देश्य भाषा का ज्ञान या पांडित्य दिखावा न होकर सरकार या प्रशासन के मंतव्य को सरलतम शब्दों में समझाना मात्र है।

अतः यह अपेक्षित होता है कि प्रशासनिक हिंदी में प्रयुक्त शब्द सरल, स्पष्ट और सुबोध हो ।

यदि भाषा में अस्पष्टता, क्लिष्टता और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग होता है तो संदिग्ध अर्थ की गुंजाइश हो जाती है। ये संदिग्ध अर्थ प्रशासन के लिए घातक सिद्ध होकर कार्रवाई में बाधा डालते हैं।

अतः प्रशासनिक हिंदी में, जहाँ तक हो सके, सरल भाषा का ही उपयोग करना चाहिए। जैसे कि ‘Previous half year’ का अनुवाद पूर्व-वर्षार्ध’ न करके ‘पिछला आधा वर्ष ज्यादा उचित है।

‘पूर्व वर्षार्ध में भाषा की क्लिष्टता दिखाई दे रही है। इसी तरह ‘return to duty’ के लिए कार्यार्थ प्रत्यागमन’ न कहकर काम पर लौटना का प्रयोग करना अधिक उचित है।

इसी तरह ‘During the year under report’ का सही अनुवाद इस वर्ष में होना चाहिए न कि ‘रिपोर्टाधीन वर्ष के दौरान।

(2) विविध रूदिबद्ध रूपों का निर्वाह-कार्यालयों द्वारा भेजे जाने वाले पत्रों, अर्ध-सरकारी, पत्रों, ज्ञापनों, मसौदों, कार्यालय ज्ञापनों, अनुस्मारकों आदि की अपनी-अपनी रूढ़ अभिव्यक्तियाँ तथा रूप-रचना (फॉर्मेट) होती है।

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते समय अनुवादक को इन रूढ़ अभिव्यक्तियों का निर्वाह करना अनिवार्य होता है क्योंकि ऐसा नहीं करने पर अनुवाद की भाव-भंगिमा खराब हो जाती है।

जैसे- “failing which’ का रूढिबद्ध अनुवाद ‘ऐसा न करने पर है। यदि कोई अनुवादक इसका अनुवाद में असफल रहने पर’ करता है तो गलत है।

इसी प्रकार के कुछ अन्य उदाहरण हैं- ‘I beg to submit (निवेदन है कि), In consultation with (से परामर्श करके), I am directed to state (मुझे यह कहने का निदेश हुआ है), Smt. B is hereby informed (श्रीमती ‘ख’ को सूचित किया जाता है)आदि।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(3) सही पर्याय प्रयोग की आवश्यकता-कुछ शब्द प्रशासनिक क्षेत्र में ऐसे होते हैं जिनका अर्थ सामान्य तथा एक-सा लगता है। साधारण बोलचाल में हम ऐसे शब्दों के लिए एक ही शब्द से काम चला सकते हैं।

किंतु जब कार्यालय की औपचारिकता का ध्यान रखते हुए सरकारी प्रयोजनों के लिए उन शब्दों का प्रयोग किया जाए तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम उसके लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग में लाएँ।

प्रशासनिक अनुवाद में उचित शब्द-चयन और सटीक पर्याय-चयन की विशेष महत्ता होती है।

उदाहरण के लिए, ‘Order’, ‘Direction’, ‘Instruction’, ‘Ordinance’ और ‘Command’ शब्दों को लिया जा सकता है।

ये पाँचों शब्द साधारण बोलचाल की भाषा में तो एक-से लगते हैं लेकिन जब इनका प्रशासनिक अनुवाद किया जाता है तो ये पाँचों शब्द विशेष प्रयोजन-विशेष के लिए प्रयुक्त होते हैं।

इसलिए इनका अनुवाद क्रमशः ‘आदेश’, ‘निर्देश’, ‘अनुदेश’, ‘अध्यादेश’ और ‘समादेश’ किया जाएगा।

प्रश्न 9 पारिभाषिक शब्दावली के अभिलक्षण पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- पारिभाषिक शब्दावली के विभिन्न लक्षण निम्न हैं

• परिभाष्यता-उसका परिभाषित (defined) होना ही पारिभाषिक शब्दों की प्रमुख विशेषता अथवा अभिलक्षण है। कहने का तात्पर्य यह है कि पारिभाषिक शब्द परिभाषित होते हैं, उन्हें परिभाषा दिए बिना समझा नहीं जा सकता।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

पारिभाषिक शब्दों को उनकी अवधारणा के अनुरूप परिभाषा देते हुए अथवा अवधारणा की व्याख्या करते हुए समझा-समझाया जाता है। ‘ताप’, ‘गुणांक’, ‘ओम’, ‘वोल्ट’, सॉफ्टवेयर’, ‘घनत्व’, ‘गुण-सूत्र’ आदि पारिभाषिक शब्द कुछ ऐसे उदाहरण है जो परिभाष्य होते हैं।

• असामान्यता-‘असामान्यता’ पारिभाषिक शब्दावली का विशिष्ट अभिलक्षण है। असामान्य का अर्थ है-पारिभाषिक शब्दों । संबद्ध भाव-विचार अथवा परिकल्पना आमतौर पर व्यवहार में प्रयुक्त नहीं होती।

इसलिए पारिभाषिक शब्द दैनिक जीवन से काफी दूर होते हैं। दैनिक जीवन-व्यवहार की भाषा के लिए पारिभाषिक शब्द असामान्य होते है।

उदाहरण के लिए, ईडा’, ‘पिंगला’, ‘बक-अंड न्याय’, ‘अधिसूचना’, ‘प्रतिभू’, ‘कर्षण’, ‘नाभिकीय’ आदि पारिभाषिक शब्द ऐसे है जो दैनंदिन व्यवहार की भाषा में प्रयोग नहीं किए जाते हैं।

• अप्रतिस्थापना-अप्रतिस्थापना का अर्थ है – पर्याय द्वारा अपूरणीयता। अर्थात् किसी ज्ञान-क्षेत्र विशेष के पारिभाषिक शब्द के लिए एक ही निश्चित पर्याय रखा जा सकता है। इसके लिए कोई भी दूसरा पर्याय प्रयुक्त नहीं किया जा सकता।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

इसका यह अर्थ निकलता है कि विशिष्ट ज्ञान-क्षेत्र की अवधारणा–विशेष के लिए प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट पारिभाषिक शब्द का स्थान कोई अन्य शब्द नहीं ले सकता।

जैसे प्रशासनिक क्षेत्र में ‘issue’ (जारी), विधि के क्षेत्र में ‘Proclamation’ (उद्घोषणा), ‘Notification’ अंतरिक्ष-क्षेत्र में ‘INSAT’ (इनसेट), ‘Satelite’ (सेटेलाइट) आदि।

इसी तरह से गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में प्रयुक्त गुण-सूत्र, समीकरण, प्रतीक-चिह्न, द्विपदनाम, यौगिक नाम आदि के पर्याय पारिभाषिक शब्दों को व्यवहार में नहीं लाया जा सकता।

• विशिष्ट/नियत अर्थ के संवाहक-किसी भी भाषा के शब्द विशिष्ट अर्थ को संवहण किए हुए होते हैं। ज्ञान-विशेष के संदर्भ में ये ‘एक अवधारणा अथवा अर्थ एक शब्द का सिद्धांत पर आधारित होते हैं अर्थात् पारिभाषिक शब्द एक ही पारिभाषिक अर्थ को व्यक्त करता है।

और यह अर्थ विषय-क्षेत्र विशेष के संदर्भ में सुनिश्चित होता है। इनके पर्यायवाची नहीं होते हैं। उल्लेखनीय है कि शब्द अप सुनिश्चित अर्थ की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते ।

जैसे, ‘पद’ पारिभाषिक शब्द को लिया जा सकता है जो प्रशासन के क्षेत्र में ओहदा या कार्यालय में व्यक्ति के स्तर (post) के लिए, काव्य के क्षेत्र में पद्य (verse) के लिए, समाजशास्त्र के क्षेत्र में सामाजिक प्रस्थिति (status) और व्याकरण में शब्दरूप (word) के लिए प्रयुक्त होता है।

इसी प्रकार, अगर हम अंग्रेजी के ‘charge’ शब्द को देखें तो वह क्षेत्र की भिन्नता के आधार पर भिन्न-भिन्न अर्थ की अभिव्यंजना करने वाला शब्द सिद्ध होता है।

प्रशासन के क्षेत्र में वह कार्यभार’ का स है तो विज्ञान में ‘आवेश’ का, लेखा-विधि में व्यय’ अथवा ‘खर्च’ का, विधि में ‘आरोप’ का, वाणिज्य में, ‘उधार’ का और आम बोलचाल की सामान्य भाषा में ‘दायित्व’ अथवा ‘जिम्मेदारी’ के अर्थ की व्यंजना करता है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

• विषय सापेक्षता-प्रत्येक विषय के विकास के लिए उसके अनुकूल ऐसी पारिभाषिक शब्दावली के विकास की आवश्यकता पड़ती है जिसमें विचारों-भावों को पूरी क्षमता के साथ अभिव्यक्त किया जा सके।

इस कारण प्रत्येक तकनीकी शब्द किसी न किसी विषय-क्षेत्र से संबद्ध होता है और उसी से ही अपना तकनीकी अर्थ एवं परिभाषा प्राप्त करता है। प्रत्येक तकनीकी अथवा पारिभाषिक शब्द में कुछ निश्चित भाव-अवधारणाएँ एवं अर्थ निहित होता है।

प्रश्न 10 पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के तकनीक पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- शब्दावली निर्माण की दिशा में पहला प्रयास यह रहता है कि अवधारणा के व्यावहारिक अर्थ को व्यक्त करने वाला अपने भाषा-भंडार में उपलब्ध पर्याय का चयन किया जाए।

जिन शब्दों के लिए हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में पर्याय प्रचलित है, उनके लिए उन पर्यायों का ही इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए ‘hour’ का समकक्ष ‘घंटा’ शब्द मौजूद था तो उसे रखा गया है, जबकि ‘मिनट’ और ‘सेकंड’ शब्दों को ग्रहण कर लिया गया है।

इसी भाँति जिन ज्ञान शाखाओं की शब्दावली प्राचीन भारतीय विद्याओं में विद्यमान है- उदाहरण के लिए गणित, दर्शन, अर्थशास्त्र, साहित्यशास्त्र-वहाँ उन्हीं पर्यायों को अपनाया जाता है, प्रमेय’, ‘स्नातक’, ‘अभिनय’ आदि ऐसे ही शब्द हैं।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

इसी भाँति भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी शब्दों के लिए प्रचलित पर्यायों को लिया गया है। जैसे ‘bligited area’ के लिए मराठी का ‘झोपड़पट्टी’ शब्द रखा गया है।

जो संकल्पनाएँ नई हैं उनके लिए शब्दों के ग्रहण की पद्धति के अलावा नए शब्दों का निर्माण भी किया जाता है। इस प्रक्रिया में अनुवाद का भी सहारा लिया जाता है।

इस तरह विभिन्न श्रेणियों के शब्दों को मिलाकर राष्ट्रीय शब्दावली परिवार विकसित किया गया है जिसमें परंपरागत, आगत और नवनिर्मित तीनों तरह के शब्द हैं। इन शब्दों के निर्माण में निम्नलिखित प्रक्रियाएँ अपनाई गई हैं

(1) अंगीकृत-पारिभाषिक शब्दावली निर्माण करते समय वैज्ञानिक शब्दावली निर्माण आयोग ने बड़ी मात्रा में अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का चयन किया है।

रासायनिक तत्त्वों और यौगिक अथवा रेडिकलों के नामों (जैसे-कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन) व्यक्तियों के नाम पर बनाए गए शब्दों (वोल्ट मीटर, एम्पियर आदि), द्विपद नामावली (जैसे सराका इंडिका), टमारिंडस इंडिका आदि को अंगीकृत कर लिया गया है।

पेट्रोल, रेडियो, रेडार, डीजल, इंजन, मोटर, बिस्कुट आदि जैसे भारतीय भाषाओं में रचे-पचे शब्दों को भी स्वीकार किया गया है। अंगीकृत शब्दों का लिप्यंतरण देवनागरी में करते समय भारतीय भाषाओं की प्रकृति को ध्यान में रखा जाता है।BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(2) अनुकूलन-अनुकूलन से अर्थ है ‘शब्द को भाषा के अनुकूल ढालना।’ जब विदेशी भाषा का कोई शब्द किसी भाषा में ग्रहण कर लिया जाता है तो उसे उस भाषा का (जिसमें उसे ग्रहण किया गया है) शब्द मानकर प्रयोग किया जाता है।

संकर शब्दों (hybrid words) के उदाहरण के रूप में ‘आयनीकरण’,’वो वोल्टता’, ‘साबुनीकारक’ आदि।

यहाँ क्रमश: ‘आयन’ के साथ ‘करण'”वोल्ट’ के साथ ‘ता’, ‘साबुनी’ के साथ ‘कारक’ प्रत्ययों का प्रयोग किया गया है यानी विदेशी शब्द में हिंदी प्रत्यय लगाकर संकर शब्द निर्मित किए गए हैं।

अनुकूलन की यह प्रवृत्ति हर भाषा की सहज प्रकृति होती है। उदाहरण के लिए रेलगाड़ी’, ‘बस अड्डा’ जैसे शब्द हिंदी में पहले से मौजूद हैं। इस प्रवृत्ति से भाषा का सहज वाक्य विन्यास कायम रहता है।

(3) नवनिर्माण-जिन पारिभाषिक शब्दों के समुचित पर्याय भारतीय भाषाओं में उपलब्ध न हों तथा जिन्हें अंगीकृत करना भी उपयोगी न हो, उनके लिए पर्यायों के नवनिर्माण का सिद्धांत अपनाया गया है।

इस तरह नए शब्द के निर्माण के लिए संस्कृत की धातु लेकर उनमें उपसर्ग और प्रत्यय लगाकर शब्द बनाए जाते हैं।

क्रिया’ शब्द से ‘प्रक्रिया’, ‘संक्रिया’, ‘अभिक्रिया’, ‘अनुक्रिया’ आदि शब्द बनाए गए हैं। नवनिर्माण की यह पद्धति संकल्पनात्मक शब्दों के लिए तो बहुत ही उपयोगी और व्यावहारिक है। इसलिए राष्ट्रीय शब्दावली के निर्माण में इसे खुलकर अपनाया गया है। BHDS 183 Free Assignment In Hindi

(4) अनुवाद-शब्दावली निर्माण की प्रक्रिया में अनुवाद की भूमिका भी बड़ी महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विकास के साथ जीवन पद्धतियों में बदलाव हुआ है। इस प्रकार अनेक प्रकार की नई-नई संकल्पनाएँ एवं स्थितियाँ विकसित हुई हैं और होती रहती हैं।

उनकी अभिव्यक्ति के लिए नई शब्दावली बनती है अथवा पुरानी शब्दावली में अर्थ विस्तार होता है।

राष्ट्रीय पारिभाषिक शब्दावली को इस विकास के लिए अनुवाद की आवश्यकता पड़ती है। इस पद्धति में कभी-कभी संकल्पना को प्रकट करने वाले पूरे शब्द समूह का अनुवाद कर लिया जाता है।

BHDS 184 Free Assignment In Hindi jan 2022

OTHER ASSIGNMENT

Leave a Comment

error: Content is protected !!