IGNOU BHDLA 138 Free Solved Assignment 2022- Helpfirst

BHDLA 138

BHDLA 138 Free Solved Assignment

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BHDLA 138 Free Solved Assignment jan 2022

प्रश्न 1 कहानी विधा का परिचय देते हुए पूस की रात कहानी की अंतर्वस्तु पर प्रकाश डालिए

उत्तर प्रेमचंद जी के अध्ययन से सारा उत्तरी भारत जाना जा सकता हैं. झोपड़ी से महलों तक, कस्बों से गाँवों तक, अमीरों से कृषक तक, पंचायतों से धारा सभाओं तक, समाज के प्रत्येक वर्ग के आचार विचार, रहन सहन, व्यवहार का परिचायक इनसे बड़ा कोई नहीं हैं.

वस्तुतः प्रेमचंद ने कथा को जीवन से जोड़ा था. उनकी कहानियाँ पढ़ते समय हमारा परिवार समाज जीवंत हो उठता हैं. वे स्वयं कहा करते थे कहानी जीवन के बहुत निकट आ गई हैं उसकी जमीन अब उतनी लम्बी चौड़ी नहीं है, उसमें कई रसों कई चित्रों और कई घटनाओं का कोई स्थान नहीं रहा.

वह अब केवल एक प्रसंग का, आत्मा की एक झलक का, सजीव स्पष्ट चित्रण है. अब उसमें व्याख्या अंश का कम और संवेदना का अंश अधिक रहता है. उनकी शैली भी अब प्रवाहमयी हो गई हैं. लेखक को जो कुछ कहना है, वह कम से कम शब्दों में बोलना चाहता हैं.

वह अपने मनोभावों की व्याख्या करने नहीं बैठता, केवल उनकी ओर इशारा कर देता हैं. अब हम कहानी का मूल्य उसके घुटन विचार से नहीं लगाते.

हम चाहते है पात्रों की मनोगत स्थिति स्वयं घटनाओं की सृष्टि करें, खुलासा यह है कि आधुनिक गल्प का आधार अब घटना घटना नहीं, मनोविज्ञान की अनुभूति हैं.BHDLA 138 Free Solved Assignment

वस्तु विधान में प्रेमचंद प्रारम्भ, मध्य और अंत में सदैव सचेत रहे हैं. कहानी की विषय वस्तु कसावटपूर्ण होती हैं. मूल कथा के साथ अवांतर कथाएँ चलती रहती हैं. वे अंत में मूल कथा में समाहित हो जाती हैं. चरित्र चित्रण में भी वे सावधान रहे हैं.

कहानी की रचना भाषा में होती है और भाषा का कलात्मक उपयोग कहानी के कथ्य और प्रतिपादय को संप्रेष्य बनाता है।

इसलिए कहानी रचना के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है कि कहानी का कथ्य और प्रतिपाद्य उत्कृष्ट हो वरन् यह भी जरूरी है कि वह उत्कृष्टता कहानी में अभिव्यक्त भी हो।

यह अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से ही होती है। कहानी का कथ्य अलग-अलग शैलियों को संभव बनाता है। इस प्रकार शैली और भाषा कहानी की संरचना के मुख्य अंग हैं।

शैली : पूस की रात’ प्रेमचंद की अत्यंत प्रौढ़ रचना मानी जाती है। यह कहानी जितनी कम्य और प्रतिपाद्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, उतनी ही भाषा और शैली की दृष्टि से भी। यह कहानी ग्राम्य जीवन पर आधारित है।

लेकिन प्रेमचंद की आरंभिक कहानियों में जिस तरह का आदर्शवाद दिखाई देता था, वह इस कहानी में नहीं है। इसका प्रभाव कहानी की शैली पर भी दिखाई देता है।

प्रेमचंद ने इस कहानी में अपने कथ्य को यथार्थपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया है इसलिए उनकी शैली भी यथार्थवादी है।

यथार्थवादी शैली की विशेषता यह होती है कि रचनाकार जीवन यथार्थ को उसी रूप में प्रस्तुत करता है जिस रूप में वे होती हैं, लेकिन ऐसा करते हए भी उसकी दृष्टि सिर्फ तथ्यों तक सीमित नहीं होती।

इसके विपरीत वह जीवन की वास्तविकताओं को यथार्थ रूप में इसलिए प्रस्तुत करता है ताकि उसके बदले जाने की आवश्यकता को पाठक स्वयं महसूस करे।BHDLA 138 Free Solved Assignment

दूसरे, यथार्थवादी रचनाकार यथार्थ के उद्घाटन द्वारा पाठकों को, समस्या का हल नहीं देता पर उन्हें प्रेरित करता है कि वह स्वयं स्थितियों को बदलने की आवश्यकता महसूस करे और उसके लिए उचित मार्ग खोजे।

इस कहानी में प्रेमचंद की दृष्टि यथार्थ के उद्घाटन पर टिकी है। वे न तो हल्क को नायक बनाते हैं न खलनायक। वे इस समस्या का कोई हल भी प्रस्तुत नहीं करते।

कहानी की रचना के इस तरह करते हैं कि जिससे कहानी में प्रस्तुत की गई समस्या अपनी पूरी तार्किकता के साथ उभरे।

‘पूस की रात’ का अगर हम विश्लेषण करें तो इस बात को आसानी से समझ सकते हैं। कहानी का आरंभ एक छोटी-सी घटना से होता है।

हल्कू के यहाँ महाजन कर्ज माँगने आया है। हल्कू तीन रुपए उसको दे देता है जो उसने केवल कंवल खरीदने के लिए जोड़े हैं। इसके बाद कहानी इस प्रसंग से कट जाती है। दूसरे भाग से कहानी में एक नया प्रसंग आरंभ होता है।

पूस का महीना है। अंधेरी रात है। अपने खेत के पास बनी मंडैया में वह चादर लपेटे बैठा है और ठंड से कॉप रहा है। सर्दी में ठंड से कॉपना पहले प्रसंग से कहानी को जोड़ देता है जब हल्कू को मजबूरन तीन रुपये देने पड़े थे।

यहाँ पहले प्रसंग में उठाया गया सवाल भी उभरता है कि ऐसी खेती से क्या लाभ, जिससे किसान की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं होती? BHDLA 138 Free Solved Assignment

यानी लगातार शोषण और उससे मुक्ति की संभावना का अभाव अंततः किसान को ऐसी मानसिक स्थिति में पहुँचा सकता है जहाँ कहानी के अंत में हल्कू पहुँच जाता है। कहानी के अंत में नीलगायों द्वारा खेत नष्ट होते देखकर भी हल्क अगर नहीं उठता तो इसका कारण केवल ठंड नहीं है।

यहाँ हल्क में अपनी उपज को बचाने की इच्छा ही खत्म हो चुकी है। इस तरह समस्या की भयावहता का चित्रण करता हुआ कहानीकार कहानी को समाप्त कर देता है।

‘पूस की रात’ की शैली की यही विशेषता है और इसी यथार्थवादी शैली ने उनकी इस रचना को श्रेष्ठ बनाया है।

भाषा : प्रेमचंद की कहानियों की भाषा बोलचाल की सहज भाषा के नजदीक है। उनके यहाँ संस्कृत, अरबी, फारसी आदि भाषाओं के उन शब्दों का इस्तेमाल हुआ है जो बोलचाल की हिंदी के अंग बन चुके हैं। प्रायः वे तद्भव शब्दों का प्रयोग करते हैं।

वे कहानी के परिवेश के अनुसार शब्दों का चयन करते हैं, जैसे ग्राम्य जीवन से संबंधित कहानियों में देशज शब्दों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का अधिक प्रयोग होता है।

वाक्य रचना भी सहज होती है। लंबे और जटिल वाक्य बहुत कम होते हैं। प्राय: छोटे और सुलझे हुए वाक्य होते हैं ताकि पाठकों तक सहज रूप से संप्रेषित हो सकें।

‘पूस की रात’ कहानी ग्रामीण जीवन से संबंधित है। इसलिए इस कहानी में देशज और तदभव शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे; तद्म शब्द: कम्मल, पूस, उपज, जनम, ऊस।

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प्रश्न 2 एक साहित्यिक विधा के रूप में डायरी की विशेषताएं लिखिए

डायरी लेखन व्यक्ति के द्वारा लिखा गया व्यक्तिगत अभुभवों, सोच और भावनाओं को लेखित रूप में अंकित करके बनाया गया एक संग्रह है।

विश्व में हए महान व्यक्ति डायरी लेखन करते थे और उनके अनुभवों से उनके निधन के बाद भी कई लोगों को प्रेरणा मिलती है। डायरी गध साहित्य की एक प्रमुख विधा है इसमें लेखक आत्म साक्षात्कार करता है। वह अपने आपसे सम्प्रेषण की स्थिति में होता है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

मानव के समस्त भावों मानसिक उद्वेगों,अनुभूति विचारों को अभिव्यक्त करने में साहित्य का सर्वोच्च स्थान है।समीक्षकों ने डायरी को साहित्य की कोटि में इसलिये रखा है

क्योंकि वह किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के व्यक्तित्व का उदघाटन करती है या मानव समाज के विभिन्न पक्षों का सूक्ष्म और जीवंत चित्र उपस्थित करती हैं।

डायरी लेखक अपनी रूचि आवश्यकतानुसार राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक,धार्मिक साहित्यिक अधिक विभिन्न पक्षों के साथ निजी अनुभूतियों का चित्रण कर सकता है। अंग्रेजी का ‘डायरी’ शबद लैटिन के डायस शबद से बना है जो दैनंदिता का बोधक है।

जब कोई व्यक्ति तिथि सन्-संवत् आदि का उल्लेख करते हुए घटनाओं को उसी क्रम में लिपिबद्ध करता है, जिसक्रम से उसके जीवन में घटित हुई हैं

(या जिस क्रम से उसने उन्हें अपने जीवन-काल में देखा-सना अथवा सोचासमझा है) और उसकी वैयक्तिक अनुभूति का एक अविभाज्य अंश बन गई हों, तब डायरी विधा जन्म लेती है।

1 डायरी को जीवन का सबसे अधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना गया है, क्योंकि डायरी लेखक अपने जीवन की घटनाओं, परिस्थितियों, स्वजनों और परायों के व्यवहार, तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक हलचलों को जिस तरह देखता, परखता, भोगता, जानता, पहचानता है और उसपर जहाँ जैसी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करना चाहता है, सबको यथा तथ्य वर्णित कर देता है। डायरी निजी होती है।

इसे लेखक प्रकाशन के उद्देश्य से नहीं लिखता। वह भावनाओं और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है, जिसके द्वारा निजता का विवेचन होता है। कलात्मकता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। यहाँ लेखक की भावनाएँ निर्झर की तरह अपना रास्ता बना लेती हैं।

शिल्प के प्रति यदि लेखक लालायित है तो स्वाभाविकता समाप्त हो जाती है।3 एक अच्छी डायरी में स्पष्टता, सहजता, संक्षिप्तता, सुसंगठितता, रोचकता आदि गुणों का समावेश होता है।

डायरी में देश, काल और वातावरण का बड़ा महत्त्व होता है । उसकी पृष्ठभूमि की सहायता से लेखक का व्यक्तित्व स्पष्ट होकर सामने आ जाता है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

4डायरी का विभाजन – डायरी का विभाजन अनेक आधारों पर होता है। कवि, कथा-लेखक, आलोचक, राजनीतिक पुरुष समाजसेवी आदि विभाजन लेखकों के आधार पर होता है।

विषय वस्तु के आधार पर प्रकृति चित्रण प्रधान, सामाजिक, सांस्कृतिक विषय प्रधान डायरियाँ लिखी जाती हैं।

किसी विशेष स्थान का चित्रण भी डायरी में होता है।5 डायरी का प्रमुख उद्देश्य आत्म-विवेचन और आत्म-विश्लेषण होता हैं।

लेखक तो अपने भावों, विचारों और घटनाओं को डायरी में सहज रूप से अभिव्यक्ति करता है। लेखक की डायरी से पाठक को प्रेरणा मिलती है, जानकारी और ज्ञान भी।

डायरी के रचना आधार तत्त्वडायरी के रचनातत्व निम्न प्रकार से हैं। इनके आधार पर एक डायरी की रचना होती है- व्यक्तिगत जीवन के क्रमिक चित्र आंतरिक सत्य तल्लीनता सहजता कलात्मकता के प्रति उदासीनता व्यक्तिगत जीवन के क्रमिक चित्र – डायरी निजी लेखन है,

अतः इसमें लेखक के व्यक्तिगत जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है। नितान्त निजी क्षणों में कोई भी व्यक्ति जो सोचता-विचारता है, उसे अपनी डायरी में लिखता है।

किसी व्यक्ति को प्रतिदिन डायरी लिखने की आदत होती है, कुछ व्यक्ति एक-दो अथवा कुछ दिनों के अन्तराल के बाद डायरी लिखते हैं, परन्तु फिर भी यह जरूरी होता है कि डायरी में तिथि क्रम बना रहे।

डायरी लेखक के व्यक्तिगत जीवन का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज होती है।6 आंतरिक सत्य- डायरी का दूसरा महत्त्वपूर्ण विधायक तत्व आंतरिक सत्य है। डायरी में लेखक की निजी अनुभूतियाँ, संवेदनाएँ विचार आदि सत्यता के साथ अंकित रहती हैं, BHDLA 138 Free Solved Assignment

इसलिए निजी अथवा आंतरिक सत्य का उदघाटन डायरी का मखय तत्त्व होता है। इसी से जुड़ा तत्त्व है- आत्म निरीक्षण, आत्म-विश्लेषण और आत्म-समबोधन।

लेखक स्थितियों, घटनाओं और परिस्थितियों के बीच अपने को रखकर आत्मविश्लेषण करता है, इसलिए डायरी प्रायः आत्म परिष्करण और आत्ममुक्ति का सबसे अच्छा साधन भी है।

तल्लीनता – डायरी लेखक तल्लीनता के साथ अपनी अनुभूतियों, प्रतिक्रियाओं, टिप्पणियों आदि को शबदों से बाँधता है। नितान्त निजी क्षणों में और प्रायः एकान्त में वह डायरी लिखता है, इसलिए अन्य साहित्यिक विधाओं की अपेक्षा डायरी लेखन में तल्लीनता सर्वाधिक रहती है।

इस तल्लीनता के तत्व के कारण डायरी-लेखक समय और स्थान की सीमा से दूर चला जाता है। जो समीक्षक डायरी में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं मानते, वे ) केवल सत्य ही डायरी के लिए आवश्यक मानते हैं।

सहजता – तल्लीनता से जुड़ा डायरी का महत्त्वपूर्ण उपकरण सहजता है। तल्लीन होकर सहज रूप में व्यक्ति अपनी डायरी लिखता है। इन दोनों के कारण वह दुराव-छिपाव और बनावट (कृत्रिमता) से बचा रहता है। कोई झूठ उसके पास नहीं फटक पाता। BHDLA 138 Free Solved Assignment

इसलिए डायरी लेखक के लिए सहजता अत्यावश्यक है। कलात्मकता के प्रति उदासीनता – इन दोनों तल्लीनता और सहजता से प्रभावित डायरी का अंतिम विधायक उपकरण है-कलात्मकता के प्रति उदासीनता। वास्तव में यह डायरी का गुण है।

डायरी लेखक यह सोचकर नहीं लिखता कि वह कोई कलात्मक वस्तु सृजित कर रहा है। प्रायः डायरियाँ यह सोचकर भी नहीं लिखी जाती कि इनका प्रकाशन किया जाएगा, इसलिए इन्हें कलात्मक होना चाहिए |

डायरी लेखक यदि विचारवान, सिद्धहस्त लेखक, कलाकार, दर्शनिक हुआ तो सहज शिल्प उसकी डायरी को स्वतः ही कलात्मक बना देगा। कलात्मकता या शिल्प के प्रति यदि उसके मन में आग्रह रहेगा तो वह अपनी डायरी के प्राकृतिक रूप को विकृत कर लेगा।

डायरी-लेखक को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपनी यह डायरी किसी को प्रभावित करने के लिए किसी की आलोचना या प्रशंसा करने के लिए अथवा निश्चय ही एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति के रूप में लिख रहा है।

उसे तो सहज भाव से तल्लीन होकर अपने मन की बातें अंकित करते चलना चाहिए, तभी वह डायरी सच्ची डायरी होगी।

डायरी में लिखे गए दैनिक अनुभव एक-दूसरे से अलग-थलग कटे हुए होते हैं। उनमें पूर्वापर का अभाव होता है। डायरी पढ़ते समय घटनाओं के पूर्वापर समबन्धों में पारस्परिक भाव उत्पन्न नहीं होता।

डायरी में वर्णन न होकर मन की प्रतिक्रिया आत्मविश्लेषण एवं मन स्थिति अंकित की जाती है। डायरी का सत्य अपेक्षाकृत अधिकपूर्ण आंतरिक और आत्मीय होता हैं। डायरी लेखकर प्रायः कटु से कटु सत्य से भी दूर नहीं भागता।BHDLA 138 Free Solved Assignment

किसी भी अवाछित प्रसंग को ढकना डायरी-लेखक के लिए उचित नहीं, क्योंकि वह तो यह सोचकर लिखता है कि जो कुछ मैं लिख रहा हूँ, वह मेरा निजी है, मेरा अपना है।

क्योंकि डायरी को सभी के पढ़ने की वस्तु नहीं माना गया है, अतः डायरी को हम विभिन्न ‘मूड्स’ के स्नेप्स कह सकते हैं, अर्थात् हम उन्हें मन के चित्र भी कह सकते हैं।

प्रश्न 3.बहुत बड़ा सवाल एकांकी के शीर्षक की सार्थकता प्रतिपादित कीजिए

उत्तर – एकांकी का प्राण है, उसमें सहज-स्वाभाविक संवादों की योजना। इस एकांकी में मोहन राकेश ने अपनी आजमाई हुई तमाम सारी रंगमंचीय युक्तियों को छोड़कर अपने संवाद कौशल का चरमोत्कर्ष प्रकट किया है।

नाटक या एकांकी के संवाद अत्यंत चुस्त-दुरुस्त और छोटे होने चाहिए, जिनसे पात्रों की मनोदशा भी अच्छी तरह व्यक्त हो सके। इसके साथ ही रंगशाला (थिएटर) में उपस्थित दर्शकों पर भी उनका पूरा प्रभाव पड़ना चाहिए। वे यह न समझें कि नाटक देख रहे हैं।

जीवन में साक्षात उपस्थित वास्तविक क्रिया-कलाप की सच्ची अनुभूति दर्शक कर सकें – यह महत्त्वपूर्ण कार्य संवादों के माध्यम से ही पूरा हो पाता है।

इस कौशल का परिचय लेखक ने एकांकी के आरंभ में इस प्रकार दिया है : कहीं प्रश्न का बोध कराता है तो कहीं आश्चर्य का, कहीं उपेक्षा का तो कहीं जिज्ञासा का।

इससे स्पष्ट है कि संवाद-कौशल के साथ ही इस एकांकी द्वारा मोहन राकेश की भाषा संबंधी गहरी परख और अभिधा, लक्षणा, व्यंजना जैसी शब्द-शक्तियों के समुचित प्रयोग की सामर्थ्य भी उद्घाटित हुई है।

वस्तुतः इस एकांकी में सबसे बड़े सवाल के रूप में निम्न वेतन भोगी कर्मचारियों के माध्यम से शिक्षित निम्न मध्यवर्गीय मानसिकता पर कटाक्ष किया गया है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

इनके बीच एकता का अभाव, अपने सामूहिक हितों के प्रति उदासीनता, अनुउत्तरदायित्व पूर्ण वाद-विवाद, एक दूसरे को नीचा और हीन दिखाने की प्रवृत्ति, संगठित संघर्ष की अक्षमता आदि को इस एकांकी में ‘बहुत बड़ा सवाल’ शीर्षक के द्वारा रेखांकित किया गया है। यही वह बहुत बड़ा सवाल है,

उपर्युक्त संवादों के माध्यम से ‘लो पेड वर्कर्स वेलफेयर सोसाइटी’ के सदस्यों के वैचारिक स्तर, उनकी मानसिकता, छिछलेप ‘ और दायित्वहीनता का बोध दर्शक को अच्छी तरह हो जाएगा।

इसके साथ ही यहाँ संवाद की भाषा की एक विशिष्ट प्रकृा. ‘ का भी पूरा परिचय मिलता है।

बातचीत के लहजे, दो शब्दों के बीच का अंतराल, बलाघात, शब्द या वाक्य के अंत का रिक्त स्थान, संबोधन वाचक, प्रश्न वाचक चिह्नों आदि के समुचित प्रयोग द्वारा संवादों को अधिक चुस्त-दुरुस्त और भाषा को अत्यंत व्यंजक बनाने का प्रयास इस एकांकी में किया गया है।

उक्त संवादों में प्रश्न चिह्न (?) कहीं प्रश्न का बोध कराता है तो कहीं आश्चर्य का, कहीं उपेक्षा का तो कहीं जिज्ञासा का।

इससे स्पष्ट है कि संवाद-कौशल के साथ ही इस एकांकी द्वारा मोहन राकेश की भाषा संबंधी गहरी परख और अभिधा, लक्षणा, व्यंजना जैसी शब्द-शक्तियों के समुचित प्रयोग की साम भी उद्घाटित हुई है।

उपर्युक्त विवेचन-विश्लेषण के बाद हम कह सकते हैं कि ‘बहुत बड़ा सवाल’ शीर्षक एकांकी अपने संवाद-कौशल के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

अपने सामाजिक- राजनीतिक परिवेश के प्रति लेखक की मानसिकता का स्वरूप चाहे जैसा हो, जीवन के प्रति उसकी दृष्टि, रुख रुझान चाहे जैसा हो, लेकिन उसकी रंगमंचीय समझ और उसके संवाद-कौशल की दृष्टि से ‘बहुत बड़ा सवाल’ एक सफल एकांकी है।

पात्रों की मानसिकता के साथ एकांकीकार की मानसिकता का तादात्म्य संवादों को स्वाभाविकता ही नहीं जीवन्तता भी प्रदान करता है।

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प्रश्न 4 पथ के साथी संस्मरण में व्यक्त सुभद्रा कुमारी चौहान के व्यक्तित्व का विश्लेषण कीजिए

महादेवी वर्मा द्वारा लिखित संस्मरणों का संकलन ‘पथ के साथी’ 1956 में प्रकाशित हआ था। इस शीर्षक से ही इस संकलन की प्रकृति स्पष्ट हो जाती है।

इसमें उनके उन सहयोगियों और सहकर्मियों की चर्चा है जो उनकी रचना-यात्रा में उनके साथ-साथ चले। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, नरेन्द्र शर्मा आदि हिंदी के लब प्रतिष्ठ साहित्यकार हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान के बारे में लिखा उनका संस्मरण इस इकाई में पाठ के रूप में सम्मिलित किया गया है। हिंदी समाज उनके नाम से भली भांति परिचित है। देश भक्ति से परिपूर्ण वीरता और ओज से भरे गीतों के लिए वह अत्यंत प्रसिद्ध , रही हैं।BHDLA 138 Free Solved Assignment

‘खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी वाली रानी थीः आज भी लोगों में देश भक्ति का जोश भर देता (5) है। इसी तरह ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ गीत भी अत्यंत लोकप्रिय रहा है। इन्हीं सुभद्रा कुमारी चौहान पर महादेवी वर्मा ने यह संस्मरण लिखा है।

सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा दोनों एक ही विद्यालय में पढ़े थे। सुमद्राजी, महादेवी से बड़ी थीं और अपने छात्र जीवन से ही कविता लिखने का उन्हें भी शौक था।

यही वजह थी कि लड़कियाँ या तो कविताएं लिखती ही नहीं थीं या लिखती भी तो छुप- छुपाकर महादेवी जी भी कविताएं लिखती थीं, यह बात सुभद्रा जी को पता चली और फिर इन्हीं कविताओं ने दो कवयित्रियों को एक दूसरे के इतने करीब ला दिया।

सुभद्राजी का विवाह उसी समय हो गया था, जब वह कक्षा आठ में पढ़ रही थीं। लेकिन ऐसे व्यक्ति के साथ जो स्वतंत्रता सेनानी था और जिसे लगातार कारागर की सजा होती रहती थी।

ऐसे व्यक्ति की पन बनने का अर्थ था, जीवन के दाम्पत्य सुखों को तिलांजलि देना और दुखों की शय्या पर ही जीवन काट देना।

लेकिन सुभद्राजी ने ऐसा कुछ नहीं किया | अपने पति के साथ वह भी आजादी की लड़ाई में शामिल हो गई और कारागर की यात्रा उनके जीवन की यात्रा भी बन गई।

घर-गृहस्थी और बच्चों के लालन-पालन के साथ- साथ देश की आजादी को भी जीवन का हिस्सा बना लेना सरल काम नहीं था। यह किसी पुरुष के बस की बात नहीं हो सकती थी। महादेवी ने उनके जीवन के इस पक्ष को अत्यंत मार्मिक ढंग से उजागर किया है।

“घर और कारागार के बीच में जीवन का जो क्रम विवाह के साथ आरंभ हआ था वह अंत लक चलता ही रहा। छोटे बच्चों को जेल के भीलर और बड़ों को बाहर रखकर वे अपने मन को कैसे संयत रख पाती थी यह सोचकर विस्मय होता है।’BHDLA 138 Free Solved Assignment

सुभद्राजी के व्यक्तित्व पर रोशनी डालते हए महादेवी जी लिखती हैं कि ‘अपने निश्चित लक्ष्य पथ पर अडिग रहना और सब कुछ हँसते-हँसते सहना उनका स्वभावजात गुण था।

आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके चरित्र का यह पक्ष उन्हें और महान बना देता है। लेकिन राजनीतिक जागरुकता ही उनके व्यक्तित्व में नहीं थी, सामाजिक जागरुकता भी उतनी ही अधिक थी।

कविता लिखकर जिस विद्रोही स्वभाव का परिचय उन्होंने बचपन में दिया था, वह जीवन पर्यंत रहा। अपने बच्चों पर किसी तरह का अंकुश लगा की बजाए उन्होंने उन्हें स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने का अवसर दिया।

इसी तरह अपनी बेटी का अंतर्जातीय विवाह कर उन्होंने सामाजिक रूढियों को तोड़ने में जो साहस का परिचय दिया वह इस बात से और भी मुखर रूप में सामने आता है कि उन्होंने यह कहते हए कन्यादान की प्रथा का विरोध किया कि स्त्री कोई निर्जीव वस्तु नहीं है जिसका कि दान किया जा सके।

अपने पारिवारिक जीवन में ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उन्होंने अपने प्रगतिशील साहसपूर्ण व्यक्तित्व का परिचय बराबर दिया।

महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद इलाहाबाद में अस्थिविसर्जन के अवसर पर हरिजन महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया वह इसी बात का प्रमाण है।

अपने जीवन में सुभदबाजी ने जो कुछ भी किया, महादेवी वर्मा ने अपने इस संस्मरण में उसके पीछे उनकी सुविचारित दृष्टि वताई है। सुभद्राजी का यह कथन इस बात का द्योतक है: “समाज और परिवार व्यक्ति को बंधन में बांधकर रखते हैं।

ये बंधन देशकालानुसार बदलते रहते हैं और उन्हें बदलते रहना चाहिए वरना वे व्यक्तित्व के विकास में सहायता करने के बदले बाधा पहुँचाने लगते हैं। बंधन कितने ही अच्छे उद्देश्य से क्यों न नियत किये गये हों, हैं बंधन हो, और जहाँ बंधन है वहाँ असंतोष तथा क्रांति है।”BHDLA 138 Free Solved Assignment

सुभद्राजी का उपर्युक्त कथन इस बात का प्रमाण है कि अपने समय और समाज के प्रति उनमें कितनी जागरूकता थी और सुविचारित दृष्टि के साथ सारी बातों को समझने की क्षमता रखती थीं।

सुभद्राजी के व्यक्तित्व के इन पहलुओं को संस्मरण के माध्यम से महादेवी वर्मा ने जिस तरह से उजागर किया है, वह उनकी लेखकीय क्षमता का श्रेष्ठ प्रमाण है।

सुभद्रा कुमारी चौहान के असामयिक निधन के बाद सन् 1949 में जबलपुर में उनकी मूर्ति का अनावरण करते हए महादेवी वर्मा ने कहा था, “नदियों के जय-स्तम्भ नहीं बनाये जाते और दीपक की लौ को सोने से नहीं मढ़ा जाता ……. महादेवी की इस उत्तक्ति में उनके संस्मरण का प्रतिपादय भी ढूंढा जा सकता है।

नदी और दीपक की लौ से सुभद्रा के व्यक्तित्व की तुलना करके वे जैसे उनकी गतिशीलता और तेजस्विता को ही श्रद्धांजलि दे रही थीं।

लेकिन उनके व्यक्तित्व के प्राकृतिक गुणों के संपूर्ण स्वीकार के बावजूद इसमें किसी प्रकार की अतिरंजना का निषेध भी शामिल हैं।

‘पथ के साथी के अन्य संस्मरणों की तरह सभद्राके व्यक्तित्व के भी वे आधारभूत मानवीय पक्षों पर अपने को केंद्रित करके चलती हैं।

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो महादेवी के काव्य की अपेक्षा उनके गद्य को अधिक जीवंत और यथार्थवादी मानते हैं। उनके गद्य की इस जीवंतता का कारण उनका यही यथार्थ और वास्तव के प्रति उनका लगाव है।

संस्मरण के केंद्र में रखे गए व्यक्ति को वे भरपूर आदर देती हैं। आत्मीयता और अंतरंगता की झिलमिल ज्योति उस व्यक्तित्व के चारों ओर झिलमिलाती है लेकिन वास्तविकता की जमीन पर खड़ी होकर ही वे उसके गुणों का बखान करती हैं।

सुभद्रा के संस्मरण में भी सुभद्रा के जीवन का यथार्थ, आर्थिक अभाव और अपनी गृहस्थी के सामाज्य के प्रति उनकी छोटी-छोटी आकांक्षाएँ इस संस्मरण को गहरी विश्वसनीयता देता है।

उनका सारा ध्यान व्यक्ति की विशिष्टताओं को पकड़ने पर केंद्रित रहता है। इस प्रक्रिया में उस केंद्रीय व्यक्तित्व की चिंता ही उनकी मुख्य रचनात्मक चिंता होती है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

वे उसी का संस्मरण लिखती हैं, उसके बहाने अपना नहीं। युगीन परिवेश के विस्तार में जाकर वे केंद्रीय व्यक्तित्व की चारित्रिक रेखाओं को धूमिल नहीं करती | क्षुद्रताओं की अपेक्षा वे व्यक्तित्व की विराटता से साक्षात्कार को ही अपने संस्मरण का प्रस्थान बिंदु मानकर अपनी रचना-यात्रा शुरू करती हैं।

संस्कृत साहित्य, भारतीय संस्कृति और दार्शनिक परंपराओं का विशाल भंडार उनके सामने होने से वे उस व्यक्तित्व का आकलन इसी सुविस्तृत फलक पर करती हैं। उनकी रचना की प्रामाणिकता का मूल स्रोत भी वस्तुतः यही है।

इन सांस्कृतिकपरंपराओं के प्रति अपने गहरे लगाव के कारण ही वे शायद मानती हैं कि मृतात्माओं के उज्ज्वल पक्ष का ही स्मरण किया जाना चाहिए। उन्हें स्मृति में धारण करके ही उन्हें मरण और विस्मरण से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 5 व्यंग्य निबंध विधा की विशेषताएं बताते हुए हरिशंकर परसाई के व्यंग्य की कला का परिचय दीजिए

व्यवसाइयोंद्वारा धर्म को अपने धंधे से जोड़ने की प्रवृत्ति का पर्दाफाश करना इस निबंध का मुख्य उद्देश्य है। करोड़पति वैष्णव ने जिस प्रकार स्वनिर्मित विष्णु मंदिर के नाम अपनी सारी जायदाद लगा दी है,

उसी प्रकार अपने कुकृत्यों को भी उन्हीं के नाम कर वह अपने को पाप मुक्त मान लेता है। लेकिन इस निबंध में वैष्णव एक व्यक्ति मात्र न होकर समूचे व्यावसायिक और औद्योगिक वर्ग का प्रतिनिधि बन कर आया है।

वर्तमान युग में यह ऐसा वर्ग है, जिसकी तिजोरी में धन ही नहीं वरन धर्म, राजनीति, अर्थनीति और प्रतिष्ठा भी बंद जाती है। यहाँ तक कि संस्कृति एव संस्कृति कर्मियों, कला एवं कलाकारों को भी वह अपनी तिजोरी के चक्कर में फंसाए रखने का प्रयास करता है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

एक वामपंथी जागरूक व्यक्ति के रूप में परसाई जी ने इन सभी स्थितियों पर गहन चिंतन किया है।

एक रचनाकार या लेखक के रूप में उन्होंने पूरी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ इन स्थितियों की वास्तविकताओं को व्यंग्य के सहारे उजागर करते हुए पाठक को जागरूक बनाकर सामाजिक परिवर्तन में अपनी भूमिका निभाई है।

‘वैष्णव की फिसलन’ शीर्षक संग्रह के ‘लेखकय में परसाई जी ने आरंभ में ही लिखा है कि व्यंग्य की प्रतिष्ठा इस बीच साहित्य में काफी बढ़ी है – वह शूद्र से क्षत्रिय मान लिया गया है। व्यंग्य, साहित्य में ब्राह्मण बनना भी नहीं चाहता क्योंकि वह कीर्तन करता है।’

परसाई जी का उपर्युक्त कथन उनके व्यंग्य-प्रयोग की दिशा और दशा – दोनों का संकेत करता है। राजनीतिक जोड़-तोड़ हो या साहित्यिक जोड़-तोड़, प्रशासनिक भ्रष्टाचार हो चा.. व्यावसायिक औद्योगिक लूट-खसोट – सर्वत्र उन्होंने व्यंग्य का एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है।

व्यंग्य को हास्य के साथ जोड़कर इसे प्रायः मनोरंजन, हॅसने-हँसाने का साधन माना जाता रहा है। इसलिए साहित्य के क्षेत्र में उसे शूद्र का दर्जा ही मिल पायांना था।

लेकि कबीर, भारतेंदु, निराला, नागार्जुन से लेकर परसाई तक व्यंग्य की एक स्वस्थ परंपरा ने उसे शूद्र से उठाकर क्षत्रिय बना दिया है। कबीर की भांति निर्मम प्रहार परसाई के व्यंग्य की प्रमुख विशेषता है।

वैष्णव की फिसलन’ संग्रह की अंतिम पंक्तियों में कबीर का गौरवगान करते हुए परसाई जी ने लिखा है,

‘कबीर, जिसने अपनी जमीन तोड़ी, भाषा और नयी ताकतवर भाषा गढ़ी, सड़ी-गली मान्यता को आग लगाई, जाति और धर्म के में को लात मारी, सारे पाखंड का पर्दाफाश किया, जो पलीता लेकर कुसंस्कारों को जलाने के लिए घूमा करता था। वह योद्धा कवि था।’ (पृ.112)BHDLA 138 Free Solved Assignment

उनकी कृतियों में उपन्यास- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल; कहानी-संग्रह- हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे; व्यंग्य निबंध संग्रह- तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, ‘पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है,

सदाचार का ताबीज, प्रेमचंद के फटे जूते, आवारा भीड़ के खतरे, सदाचार का ताबीज, अपनी अपनी बीमारी, दो नाक वाले लोग, काग भगोड़ा, माटी कहे कुम्हार से, ऐसा भी सोचा जाता है,

विकलांग श्रद्धा का दौर, तिरछी रेखाएँ और संस्मरणात्मक निबंध- हम एक उम्र से वाकिफ हैं, जाने पहचाने लोग शामिल है.

हरिशंकर परसाई के लेखन की यह विशेषता है कि वे केवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखते. उनका सारा लेखन सोद्देश्य है और सभी रचनाओं के पीछे एक साफ-सुलझी हुई वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि है,

जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, ढोंग, अवसरवादिता, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता आदि कुप्रवृत्तियों पर तेज रोशनी डालने के लिए हर समय सतर्क रहती है.

उनके कहने का ढंग चाहे जितना हल्का-फुल्का हो, किन्तु हर निबंध आज की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है.

‘पगडंडियों का ज़माना’ पुस्तक में हिंदी के सबसे सशक्त और लोकप्रिय व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के लगभग दो दर्जन निबंध संगृहीत हैं.

प्रायः सभी निबंध ‘नई कहानियाँ’, ‘धर्मयुग’, ‘ज्ञानोदय’ आदि प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. शीर्षक निबंध, जिसके आधार पर पूरी पुस्तक नामकरण किया गया है,

आज के इस ज्वलन्त सत्य को उद्घाटित करता है कि सभी लोग किसी-न-किसी तरह ‘शॉर्टकट’ के चक्कर में हैं. इस तर, इस पुस्तक का हर निबंध आज की वास्तविकता के किसी-न-किसी पक्ष पर चुटीला व्यंग्य करता है.

हरिशंकर परसाई देश में सियासत पर व्यंग्य के जागरुक प्रहरी रहे हैं. ऐसे प्रहरी जो खाने और सोने वाले तृप्त आदमियों की जमात में हमेशा जागते और रोते रहे. उनकी रचनाओं में जो व्यंग्य है,

उसका उत्प्रेरक तत्व यही रोना है. रोनेवाले हमारे बीच बहुत हैं. कहते हैं रोने से ही जी हल्का होता है.

जी हल्का करते हैं और फिर रोते हैं. झरना बन जाता है उनका मानस. उनकी शोकमग्नता आत्मघाती भी होती है. जनभाषा के कवि हैं कबीर, जिन्होंने राह के बटमारों की गतिविधियों को खूब पहचाना.

हरिशंकर परसाई जी की पहली रचना “स्वर्ग से नरक जहाँ तक” है, जो कि मई, 1948 में प्रहरी में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास के ख़िलाफ़ पहली बार जमकर लिखा था। धार्मिक खोखला पाखंड उनके लेखन का पहला प्रिय विषय था।

वैसे हरिशंकर परसाई कार्लमार्क्स से अधिक प्रभावित थे। परसाई जी की प्रमुख रचनाओं में “सदाचार का ताबीज” प्रसिद्ध रचनाओं में से एक थी जिसमें रिश्वत लेने देने के मनोविज्ञान को उन्होंने प्रमुखता के साथ उकेरा है।

प्रश्न 6 निराला का की साहित्य साधना निराला को समझने में कितना सहायक है अपना मंतव्य प्रकट कीजिए

निराला की साहित्य साधना हिन्दी के विख्यात साहित्यकार रामविलास शर्मा द्वारा रचित एक जीवनी है जिसके लिये उन्हें सन् 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इस जीवनी का प्रकाशन सन् १९६९ में हआ था। निराला की साहित्य साधना तीन खंडों में लिखी गई है। इसके दवितीय खंड की ‘भूमिका’ में रामविलास शर्मा लिखते हैं कि- “साहित्यकार के व्यक्तित्व का श्रेष्ठ निदर्शन उसका कृतित्व है।

इस कृतित्व का विवेचन पुस्तक के दूसरे खण्ड में है। पहला खण्ड उसकी भूमिका मात्र है।”[2] इसके अतिरिक्त इसके तीसरे खंड में निराला के पत्रों का संग्रह किया गया है।

निराला की साहित्य साधना हिन्दी के विख्यात साहित्यकार रामविलास शर्मा द्वारा रचित एक जीवनी है जिसके लिये उन्हें सन् 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिन्दी में मुक्तछन्द के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। १९३० में प्रकाशित अपने काव्य संग्रह परिमल की भूमिका में उन्होंने लिखा है

“मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है।” मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है।

जिस तरह मुक्त मनुष्य कभी किसी तरह दूसरों के प्रतिकूल आचरण नहीं करता, उसके तमाम कार्य औरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं फिर भी स्वतंत्र। इसी तरह कविता का भी हाल है।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्रण-कौशल।

आंतरिक भाव हो या बाह्य जगत के दृश्य-रूप, संगीतात्मक ध्वनियां हो या रंग और गंध, सजीव चरित्र हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगनेवाले तत्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवंत चित्र उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उन चित्रों के माध्यम से ही निराला के मर्म तक पहुँच सकता है।

निराला के चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन भी समाहित रहता है। इसलिए उनकी बहुत-सी कविताओं में दार्शनिक गहराई उत्पन्न हो जाती है।

इस नए चित्रण-कौशल और दार्शनिक गहराई के कारण अक्सर निराला की कविताएं कुछ जटिल हो जाती हैं, जिसे न समझने के नाते विचारक लोग उन पर दुरूहता आदि का आरोप लगाते हैं।

उनके किसान-बोध ने ही उन्हें छायावाद की भूमि से आगे बढ़कर यथार्थवाद की नई भूमि निर्मित करने की प्रेरणा दी।

विशेष स्थितियों, चरित्रों और दृश्यों को देखते हुए उनके मर्म को पहचानना और उन विशिष्ट वस्तुओं को ही चित्रण का विषय बनाना, निराला के यथार्थवाद की एक उल्लेखनीय विशेषता है।

निराला पर अध्यात्मवाद और रहस्यवाद जैसी जीवन-विमख प्रवृत्तियों का भी असर है। इस असर के चलते वे बहुत बार चमत्कारों से विजय प्राप्त करने और संघर्षों का अंत करने का सपना देखते हैं।

निराला की शक्ति यह है कि वे चमत्कार के भरोसे अकर्मण्य नहीं बैठ जाते और संघर्ष की वास्तविक चनौती से आँखें नहीं चराते।

कहीं-कहीं रहस्यवाद के फेर में निराला वास्तविक जीवन-अनभवों के विपरीत चलते हैं। हर ओर प्रकाश फैला है, जीवन आलोकमय महासागर में डब गया है, इत्यादि ऐसी ही बातें हैं। लेकिन यह रहस्यवाद निराला के भावबोध में स्थायी नहीं रहता, वह क्षणभंगुर ही साबित होता है।

अनेक बार निराला शब्दों, ध्वनियों आदि को लेकर खिलवाड़ करते हैं। इन खिलवाड़ों को कला की संज्ञा देना कठिन काम है। लेकिन सामान्यत: वे इन खिलवाड़ों के माध्यम से बड़े चमत्कारपूर्ण कलात्मक प्रयोग करते हैं।

इन प्रयोगों की विशेषता यह है कि वे विषय या भाव को अधिक प्रभावशाली रूप में व्यक्त करने में सहायक होते हैं। निराला के प्रयोगों में एक विशेष प्रकार के साहस और सजगता के दर्शन होते हैं।

यह साहस और सजगता ही निराला को अपने युग के कवियों में अलग और विशिष्ट बनाती है। ।

प्रश्न 7: आत्मकथा और जीवनी विधा का अंतर स्पष्ट कीजिए

यदि आत्मकथा व जीवनी में अंतर की बात करें तो दोनों में सबसे बड़ा अंतर ये होता है की दोनों में किसी व्यक्ति की घटनाओं, प्रसंगों और चरित्र का विवरण देना होता है. लेकिन यदि लेखक खुद के बारे में ही ये सारी जानकारी देता है

तो उसे आत्मकथा कहते हैं और यदि लेखक किसी दूसरे के बारे में ये सारी जानकारी देता है तो उसे जीवनी कहते हैं. ये तो था सबसे महत्वपूर्ण अंतर दोनों में लेकिन इसी कथन से जुड़े बहुत से अंतर खुद व खुद सामने आ जाते हैं.

आत्मकथा कोई भी लेखक लिखता है तो वो अपने विषय में लिखता है तो एक सामन्य सी बात है उसे खुद के चरित्र, जीवन घटनाओं, प्रषंगों आदि की जानकारी बहुत गहराई से होगी जिसे वो बहुत शुद्धता के साथ लिख सकता है.

और वहीं जीवनी किसी दूसरे व्यक्ति के ऊपर लिखने योग्य चीज है जिसके विषय में लेखक को सम्भवता जानकारी तो अच्छी हो सकती है

लेकिन उतनी गहराई से वो किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में नहीं जान सकता है और न ही उसके बारे में लिख सकता है जितने गहराई से वो खुद का अनुकलन कर सकता है. कोई भी आत्मकथा जीवनी की अपेक्षा अधिक सटीक और विश्वशनीय होती है.

क्योंकि उसमे छिपा हुआ ।दा नायक खुद लेखक है जो अपने जीवन के दुःख सुख को ईमानदारी से पन्नो में उतारता है. और वहीं जीवनी में किसी भी नायक की जानकारी पहले पता की जाती है

उसके बाद उसके विषय में लिखा जाता है. और जो जानकारी नायक के विषय में लिखी जा रही है उसमे त्रुटि होने संका हो सकती है आत्मकथा में नायक को अपने जन्म से लेके मृत्यु तक की पूरी और सही जानकारी होती है

जिसे वो आत्मकथा के रूप में लोगों के बीच में वितरित करता है और वहीं जीवनी में किसी भी नायक की जानकारी खोजनी पड़ती है जिसके गलत होने की संभावना बहुत है.

इसमें नायक के इतिहास, वर्तमान, उसके चरित्र आदि की जानकारी को लिखा जाता है जो किसी दूसरे के द्वारा बताया गया या कहीं से खोजा गया होता है

जिसमे गलत जानकारी की अशुद्धियाँ भी हो सकती हैं और ये पूर्ण रूप से शुद्ध हो ये चीज जरूरी नहीं लोगों का कहना है की जीवनी एक प्रकार का साहित्यिक विधा है

जिसमे किसी विशेष व्यक्ति के पुरे जीवन की जानकारी किसी और लेखक द्वारा दी जाती है और वहीं आत्मकथा स्वयं लेखक की जीवन गाथा है जो खुद उसी लेखक द्वारा लिखी या दी जाती है.

प्रश्न 8.जठन आत्मकथा के शीर्षक का निहितार्थ स्पष्ट कीजिए

जूठन हिंदी भाषा के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित आत्मकथा है। पुस्तक दलित जाति में जन्मे लेखक की कठिनाइयों और संघर्षों का वर्णन प्रस्तुत करती है और साथ ही भारतीय जाति प्रथा, सवर्ण मानसिकता और आरक्षण जैसे सवालों को भी उठाती है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

पुस्तक केवल एक व्यक्तिविशेष की अपनी आत्मकथा होने के अतिरिक्त उस समुदाय विशेष की त्रासद कथा भी वर्णित करती है जिसमें लेखक पैदा हुआ||2||3| पहली बार इसका प्रकाशन 1997 में हुआ।

बाद में 2003 इसका अंग्रेजी अनुवाद छपा और 2008 में अरुण प्रभा मुखर्जी द्वारा किया गया अनुवाद कोलंबिया प्रेस, न्यूयार्क द्वारा प्रकाशित किया गया। आत्मकथा का दूसरा खण्ड 2015 में प्रकाशित हुआ।

जूठन का भारतीय साहित्य में अपना एक विशेष स्थान है और दलित साहित्य में यह एक अग्रदूत रचना मानी जाती है। इसका शीर्षक जूठन हिंदी के प्रसिद्ध लेखक राजेन्द्र यादव द्वारा सुझाया गया था।

पुस्तक विवादों में रही जब 2018 में इसके अंग्रेजी संस्करण के कुछ अंशों को हिमाचल विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से बाहर किये जाने का मुद्दा उठा||

जाति और अन्य कई आधारों पर विभेद के मुद्दों को उठाने वाली फ़िल्म आर्टिकल 15 (2019) के मुख्य अभिनेता आयुष्मान खुराना ने अपने एक साक्षात्कार में जूठन से प्रेरणा लेने की बात स्वीकार की। ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दी में दलित आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण रचनाकार हैं ।

उनके साहित्य में महज आक्रोश और प्रतिक्रिया से परे समता, न्याय और मानवीयता पर टिकी एक नई पूर्णतर सामाजिक चेतना और संस्कृतिबोध की आहट है ।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा” जूठन ने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया था। अपनी संवेदना और मार्मिकता के कारण प्रस्तुत अंश मन पर गहरा असर छोड़ता है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

लेखक का पूरा परिवार गाँव में मेहनत – मजदूरी का काम करता था जिसमें एक – एक घर में 10-15 मेवेशियों का काम , बैठकखाने की सफाई का काम करना पड़ता था ।

सर्दी के महीनों में यह काम और कठिन हो जाता था क्योकि प्रत्येक घरों से मवेशियों के गोबर उठाकर गाँव से बाहर कुरड़ियों पर या उपले बनाने की जगह तक पहँचाना पड़ता था ।

इस सब कामों के बदले मिलता था दस जानवर पीछे 12-13 किलो अनाज दोपहर में बची-खुची रोटी मिलती थी जो खासतौर पर चहड़ों (दलित) को देने के लिये बनाई जाती थी |

कभी – कभी जूठन भी भंगन की टोकरी में डाल दी जाती थी । दिन-रात मर-खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं, कोई शर्मिंदगी नहीं, पश्चाताप नहीं।

यह कितना क्रूर समाज है जिसमें श्रम का मोल नहीं बल्कि निर्धनता को बरकरार रखने का एक षड्यंत्र ही था सब।

शादी – ब्याह के मौके पर जूठे पतल चूहड़ों के टोकरे में डाल दिये जाते थे, जिन्हें घर ले जाकर वे जूठन इकट्ठी कर लिया करते थे । पत्तलों से पूड़ियों के टूकड़े जो बचे होते थे उन्हें चारपाई पर कोई कपड़ा डालकर उस पर सूखा कर रख लिये जाते थे ।

मिठाइयाँ जो इकट्ठी होती थी वे कई-कई दिनों तक अथवा बड़ी बारातों की मिठाइयाँ कई-कई महीने तक आपस में चर्चा कर – करके खाते रहते थे । सुखी हुई पूरियों की लुग्दी बनाकर अथवा उबाल कर मिर्च – मसाले डालकर खाने में मजा आता था ।BHDLA 138 Free Solved Assignment

आज जब इन सब बातों के बारे में लेखक सोचता है तो मन के भीतर काँटे जैसा उगने लगता है । कैसा जीवन था ।” लेखक अपनी माँ के साथ सुखदेव सिंह त्यागी की बेटी के विवाह में टोकरी लेकर घर के बाहर जूठन समेटकर इकट्ठा करती है ।

सुखदेव सिंह के घर के बाहर आने पर लेखक की माँ अपने लिये पत्तल पर खाने हेतु कुछ पुरियों की माँग करती है , बदले में उसे सुखदेव सिंह की फटकार मिलती है । वह चुपचाप टोकरी लेकर घर चली जाती है । यह उसकी महानता का प्रतीक है ।”

जूठन” शीर्षक आत्मकथा के माध्यम से लेखक ने अपने बचपन का संस्मरण एवं परिवार की गरीबी का वर्णन करते हए इस बात को सिद्ध करने का प्रयास किया है कि गरीबों के पास गरीबी है किन्तु साथ ही दिल और दिमाग भी है साथ ही संतोष भी ।

ये विशेषताएँ अमीरों में नहीं पायी जाती । गरीब चुप – चाप अपमान बर्दाश्त कर लेता है , उसे भूल भी जाता है । दुर्व्यवहार करनेवाले को माफ भी कर देते है ।

प्रश्न 9.संस्मरण लेखन की विशेषताएं बताइ

संस्मरण के लेखक के लिए यह नितांत आवश्यक है कि लेखक ने उस व्यक्ति या वस्तु का साक्षात्कार किया हो जिसका वह संस्मरण लिख रहा है। BHDLA 138 Free Solved Assignment

वह अपने समय के इतिहास को लिखना चाह रहा है परंतु इतिहासकार की भांति वह विवरण प्रस्तुत नहीं करता। इतिहासकार के वस्तुपरक दृष्टिकोण से वह बिल्कुल अलग है।

संस्मरण में जीवन के कुछ महत्वपूर्ण क्षणों या घटनाओं की स्मृति पर आधारित रोचक अभिव्यक्ति होती है संस्मरण यथार्थ जीवन से संबंधित संक्षिप्त रोचक चित्रात्मक भावुकतापूर्ण लेखक के व्यक्तित्व के आभा से पूर्ण प्रभाव पूर्ण शैली में लिखित घटना संस्मरण कहलाती है।

संस्मरण में मुख्यतः बीती हुई बातें याद की जाती है तथा उसमे भाषात्मक्ता अधिक रहती है इसमें लेखक – रेखाचित्रकार की भांति तत्व निर्लिप्त नहीं रहता।

यदि संस्मरण लेखक अपने विषय में लिखता है तो वह रचनात्मक आत्मकथा के अधिक निकट होती है , यदि वह अन्य व्यक्तियों के संबंध में लिखता है तो वह जीवनी के निकट होती है।

विशेषताएं
अतीत की स्मृति

संस्मरण अतीत पर आधारित होता है इसमें लेखक अपने यात्रा , जीवन की घटना , रोचक पल , आदि जितने भी दुनिया में रोचक यादें होती है , उसको सहेज कर उन घटनाओं को लिख रूप में व्यक्त करता है।

जिसे पढ़कर दर्शक को ऐसा महसूस होता कि वह उस अतीत की घटना से रूबरू हो रहा है उसको आत्मसात कर रहा है। किंतु संस्मरण को रेखाचित्र, जीवनी , रिपोर्ताज, यात्रा आदि से अलग महत्व दिया गया है।

आत्मीय एवं श्रद्धापूर्ण अन्तरंग सम्बन्ध जब तक लेखक आत्मीयता से किसी स्मृति अतीत को याद कर अंकित नहीं करेगा तब तक संस्मरण प्रभावशाली नहीं हो सकता। BHDLA 138 Free Solved Assignment

इसके साथ ही आवश्यक है कि किसी श्रद्धेय पुरुष या चरित्र के प्रति श्रद्धा भाव, जो मानव-मात्र को प्रेरणा दे सके|किसी अद्भुत क्षण को याद कर भी उस पल को भी लिख सकता है।

प्रामाणिकता

संस्मरण विधा में कल्पना का कोई स्थान नहीं होता क्योकि कल्पना का समावेश होते ही संस्मरण की विधा नष्ट हो जाता है। इस विधा में कल्पना के लिए कोई खास जगह नहीं होती।उन्हीं घटनाओं का वर्णन होता है जो जीवन में घट चुकी हैं और प्रामाणिक हैं।

वैयक्तिकता संस्मरण की महत्वपूर्ण विशेषता वैयक्तिकता मानी जाती है। इसका सहारा लिए बिना संस्मरण नहीं लिखा जा सकता। संस्मरण में लेखक के अपने जीवन में किसी न भुला सकने वाली घटना का वर्णन होता है।

वह घटना को हु बहु पाठक के समक्ष रखता है जिसे पढ़कर पाठक को उस घटना को करने का मौका मिलता है।

चित्रात्मकता

संस्मरण की एक विशेषता होती है की वह जितनी चित्रात्मक होगी संस्मरण उतना ही सफल होगा क्योकि चित्र मानव मष्तिष्क पर अधिक प्रभाव डालती है वह मष्तिष्क में अमित छाप छोड़ती है।

लेखक चुन-चुनकर शब्दों का प्रयोग कर आलंबन का चित्र प्रस्तुत करता है। वह इस प्रकार विवेचन करता है कि चित्र सहज ही बनने लगते हैं।BHDLA 138 Free Solved Assignment

कथात्मकता

संस्मरण कथात्मक साहित्य विधा है। यह कथा काल्पनिक न होकर सत्य पर आधारित होती है। कथा का ताना-बाना जीवन की घटनाओं से बुना जाता है और पाठक के साथ सहज तादात्म्य हो जाता है।

तटस्थता

तटस्थता भी संस्मरण की अनिवार्य शर्त है। लेखक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वयं को महिमामंडित करने की प्रवृति से दूर रहकर जीवन में घटित सत्य को सामने लाए, भले वह सत्य स्वयं के लिए कितना ही कटु क्यों न हों?

हिंदी के संस्मरणकारों में पद्म सिंह शर्मा को इस विधा का पहला लेखक माना जाता है। आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, इस क्षेत्र के बड़े नाम हैं।

महादेवी वर्मा हिंदी संस्मरण-साहित्य में मील का पत्थर हैं। इनके प्रारंभिक संस्मरण ‘कमला’ पत्रिका में प्रकाशित हुए। ‘पथ के साथी’, ‘मेरा परिवार’, इनके संस्मरण संकलन हैं।

हालाँकि आत्मीयता की गहनता और चित्रात्मक शैली ने भ्रम पैदा किए हैं और इन्हें संस्मरणात्मक रेखाचित्र कहा जाना चाहिए। किन्तु निश्चित तौर पर महादेवी अपने आप में संस्मरण का स्वर्णिम इतिहास हैं।

प्रश्न 10.प्रेमचंद की कहानी कला पर प्रकाश डालिए

प्रेमचंद की कहानी कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रेमचंद ने हिंदी कहानियों के उद्देश्य व दृष्टिकोण में परिवर्तन किया तथा विषय – वस्तु में व्यापक विस्तार किया। प्रेमचंद के पूर्व कहानियाँ आदर्शवादी उद्देश्य को समाहित करती थी।BHDLA 138 Free Solved Assignment

प्रेमचंद ने अपनी कहानियों की शुरुआत ‘आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद’ से किया लेकिन लेखन के अंतिम दौर में ‘चरम यथार्थवाद’ की स्थापना की। इसके अलावा प्रेमचंद पूर्व कहानियाँ कुछ विषयों तक ही सीमित थीं लेकिन प्रेमचंद ने हिंदी कहानियों में विषय वैविध्य को स्थापित किया।

जैसे – पूस की रात में किसानों की समस्या, बूढ़ी काकी में वृद्धों की समस्या, दूध का दाम दलित समस्या, कफन गरीबी की समस्या, नया विवाह में महिलाओं की समस्या आदि।

यथार्थवाद’ से किया लेकिन लेखन के अंतिम दौर में ‘चरम यथार्थवाद’ की स्थापना की। इसके अलावा प्रेमचंद पूर्व कहानियाँ कुछ विषयों तक ही सीमित थीं लेकिन प्रेमचंद ने हिंदी कहानियों में विषय वैविध्य को स्थापित किया।

जैसे – पूस की रात में किसानों की समस्या, बूढ़ी काकी में वृदधों की समस्या, दूध का दाम दलित समस्या, कफन गरीबी की समस्या, नया विवाह में महिलाओं की समस्या आदि।

अगली विशेषता यह है कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में हिंदुस्तानी भाषा शैली का प्रयोग किया, जो कि उस समय की लोक भाषा भी थी। प्रेमचंद पूर्व हिंदी की भाषा शैली को लेकर यह विवाद था कि वह फारसीनिष्ठ होनी चाहिए या संस्कृतनिष्ठ।

प्रेमचंद ने इस विवाद को समाप्त करने के साथ ही लोक भाषा और साहित्यिक भाषा के दवैत को भी समाप्त किया। इसके अलावा प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में महावरों व लोकोक्तियों का प्रयोग करने के साथ ही हास्य – व्यंग्य का भी प्रयोग किया।BHDLA 138 Free Solved Assignment

अगली विशेषता यह है कि प्रेमचंद ने हिंदी कहानी में स्वतंत्र चरित्र के निर्माण की शुरुआत की, जो आदर्शवादी ना होकर यथार्थवादी थे।

प्रेमचंद पूर्व कहानियों में चरित्र लेखक के हाथ की कठपुतली होते थे लेकिन प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में स्वतंत्र चरित्र का निर्माण किया, जो परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करते थे।

अगली विशेषता यह है कि प्रेमचंद की कहानियाँ एक व्यापक सामाजिक आधार पर विकसित हुई हैं। प्रेमचंद की रचना काल के समय भारत का स्वाधीनता संघर्ष अपने चरम स्तर पर था।

ऐसे समय में प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में निम्न वर्ग व ग्रामीण जीवन की जन समस्याओं को उकेरा। इसके साथ ही ‘ईदगाह’ व ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी कहानियों में प्रेमचंद अपनी कहानियों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी समाहित करते हैं, जो उनकी लोकतांत्रिक मानसिकता व समावेशी दृष्टि का परिचायक है।

प्रेमचंद के कहानी कला की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इन्होंने अपनी कहानियों में मनोविज्ञान का बेहतरीन प्रयोग किया है। उल्लेखनीय है कि हिंदी साहित्य के कुछ कहानीकार जैसे जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी

और अज्ञेय; पश्चिमी विचारक सिगमंड फ्रॉयड के मनोविश्लेषणवाद से प्रभावित थे और इन कहानीकारों ने फ्रॉयड के मनोविश्लेषणवाद को ही आधार मानकर मनोवैज्ञानिक कहानियों की रचना की।

लेकिन प्रेमचंद के मनोविज्ञान का आधार किसी दार्शनिक के विचार नहीं थे। प्रेमचंद को समाज की अच्छी समझ थी।

इसी समझ और अपने जीवन अनुभवों को आधार बनाकर प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में मनोविज्ञान का सुंदर प्रयोग किया। अपनी कहानियों में प्रेमचंद ने समाज के विभिन्न वर्गों के मनोविज्ञान का चित्रण खूबसूरती के साथ किया है।BHDLA 138 Free Solved Assignment

प्रेमचंद के रचनाकाल में भारतीय समाज में दलितों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। प्रेमचंद ने ठाकुर का कुंआ, दूध का दाम, सद्गति आदि कहानियों में दलित मनोविज्ञान का चित्रण किया है।

‘सद्गति’ मे प्रेमचंद ने दलित मनोविज्ञान के दो पक्षों को उकेरा है – एक वर्ग ऐसा है जो शोषण को स्वीकार्य समझता है तो दूसरी ओर दलितों में एक उभरता हुआ वर्ग ऐसा भी है जो इस शोषण का विरोध करने को भी तैयार है।

अलग्योझा, बड़े घर की बेटी और नया विवाह आदि कहानियों में प्रेमचंद ने नारी मनोविज्ञान का चित्रण ‘सभ्यता का रहस्य’ में किसान मनोविज्ञान, ‘बूढी काकी’ में वृद्ध मनोविज्ञान तथा ‘ईदगाह’ में बाल मनोविज्ञान की सूक्ष्म परतों को प्रेमचंद ने उधेड़ा है।

ध्यातव्य है कि ईदगाह में प्रेमचंद ने अन्य कहानियों की तरह वर्गगत मनोविज्ञान का चित्रण नहीं किया है। हामिद के चरित्र के माध्यम से व्यक्तिगत मनोविज्ञान का चित्रण किया है।

प्रेमचंद के कहानियों में एक विशेष शैली का प्रयोग भी दिखता है, जिसे आत्मकथात्मक शैली या किस्सागो शैली कहते हैं।

इस शैली के अंतर्गत प्रेमचंद ने कहानी के मुख्य चरित्र का चित्रण ‘मैं ( उत्तम पुरुष) के माध्यम से किया। इस शैली का प्रयोग ‘मुफ्त का यश’, ‘गिल्ली डंडा’ जैसी कहानियों में दिखता है।

अतः उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने हिंदी कहानी की नवजात परंपरा को अपने लेखन के द्वारा एक परिपक्व परंपरा में रूपांतरित किया। BHDLA 138 Free Solved Assignment

अपने लेखन कला के माध्यम से जिस प्रकार प्रेमचंद ने स्वतंत्र चरित्रों का निर्माण किया, चरम यथार्थवाद की स्थापना की और चरित्र प्रधान कहानियों की नींव डाली – यह सब विशेषताएँ बाद के हिंदी कहानी आंदोलनों का आधार बनीं और नई कहानी आंदोलन के कहानीकारों ने ‘भोगे हुए यथार्थ’ को प्राथमिकता देते हुए इन विशेषताओं को पूर्णता तक पहुँचाया।

अतः इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रेमचंद की कहानी कला के वैशिष्ट्य ने हिंदी कहानी के विकास में महती भूमिका का निर्वहन किया।

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