IGNOU BHDLA 137 Free Solved Assignment 2022- Helpfirst

BHDLA 137

BHDLA 137 Free Solved Assignment

BHDLA 137 Free Solved Assignment JAN 2021

1. संप्रेषण की प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन कीजिए।

उत्तर: संप्रेषण की प्रक्रिया: संप्रेषण प्रक्रिया के प्रमुख तत्व कौन कौन से हैं? डेविड के बार्लो के अनुसार सुविधा तथा समझ की दृष्टि से संप्रेषण
प्रक्रिया के प्रमुख तत्त्व हैं :

विचार: किसी सन्देश को प्रेषित करने से पूर्व उस सन्देशवाहक के मस्तिष्क में उस सन्देश के सम्बन्ध में विचार की उत्पत्ति होती है जिसे वह उसके प्राप्तकर्ता को प्रेषित करना चाहता है।

प्रत्येक लिखित या मौखिक सन्देश विचार की उत्पत्ति से प्रारम्भ होता है। अत: मस्तिष्क में उठने वाला कोई भी उद्वेग जिसे व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ बाँटना चाहता है सारांश रूप में उत्पन्न विचार है।

प्रेषक: प्रेषक संप्रेषणकर्ता या सन्देश देने वाले व्यक्ति को कहते हैं। इसके द्वारा सन्देश का प्रेषण किया जाता है। सम्प्रेषक सन्देश द्वारा प्रापक के व्यवहार को गति प्रदान करने वाली शक्ति है।

प्राप्तकर्ता: संप्रेषण में दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्षकार सन्देश प्रापक है। यह पक्षकार सन्देश को प्राप्त करता है। जिसके _ बिना सन्देश की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती।

सन्देश: सन्देश में सूचना, विचार संकेत दृष्टिकोण, निर्देश, आदेश, परिवेदना, सुझाव, आदि शामिल हैं। यह लिखित, मौखिक, शाब्दिक अथवा सांकेतिक होता है। एक अच्छे सन्देश की भाषा सरल स्पष्ट तथा समग्र होनी आवश्यक है। __BHDLA 137 Free Solved Assignment

प्रतिपुष्टि या पुनर्निवेश : जब सन्देश प्रापक द्वारा सन्देश को मूल रूप से अथवा उसी दृष्टिकोणानुसार समझ लिया जाता है जैसा कि सन्देश प्रेषक सम्प्रेषित करता है। तब सन्देश प्राप्तकर्ता द्वारा सन्देश के सम्बन्ध में की गई अभिव्यक्ति का ही प्रतिपुष्टि कहते हैं।

संप्रेषण प्रक्रिया के मॉडल:

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शैमन-वीवर मॉडल: संप्रेषण के सन्देशबद्ध सिद्धान्त का प्रतिपादन शैमन-वीवर द्वारा किया गया। शैमन-वीवर के अनुसार संप्रेषण प्रक्रिया में पाँच तत्त्व निहित हैं जो सूचना स्रोत से प्रारम्भ होकर प्रेषक द्वारा कोलाहल स्रोत को पार करते हुए सन्देश के रूप में उनके लक्ष्य तक प्राप्तकर्ता के पास सम्प्रेपित होते हैं :

i. सूचना सोत : यह सम्प्रेष्ण प्रक्रिया का प्रारम्भ है। आज के वैज्ञानिक युग में सूचना एक साधन बन चुकी है। प्रबन्धन को उचित निर्णय लेने में सूचना अनिवार्य भूमिका निभाती है।

अत: सूचना ही एक ऐसा स्रोत है जिसके द्वारा व्यक्तियों को सोच समझ को परिवर्तित किया जा सकता हैं। संप्रेषण प्रक्रिया में सूचना स्रोत से ही मनुष्य के मस्तिष्क में विचारों की उत्पत्ति होती है जो सन्देश के रूप में परिवर्तित होकर अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचता है।

ii. प्रेषक : जिस व्यक्ति द्वारा संदेश को प्रेषित किया जाता है वह संप्रेषण में प्रेषक कहलाता है। शैमन तथा वीवर मॉडल के अनुसार संप्रेषण में प्रेषक की अहम भूमिका होती है जो सूचना स्रोत से विचारों को एकत्रित करके संप्रेषण के माध्यम से संदेश को उनके प्राप्तकर्ता तक पहुँचाता है।

प्रेषक संदेश को संदेश बद्ध करके भेजता है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

iii. कोलाहल स्रोत : इस मॉडल में कोलाहल या शोर सोत को भी महत्त्व दिया गया है। संप्रेषण प्रक्रिया में जिस माध्यम से सन्देश प्रेषित होते हैं उसमें शोरगुल का पाया जाना स्वाभाविक है जिसकी वजह से सन्देश में अशुद्धि भी हो सकती

iv. प्रापक : सम्प्रेपण का उद्देश्य सन्देश को किसी अन्य तक पहुँचाना होता है। जिसके पास सन्देश प्रेषित किया जाता है वह सन्देश का पापक या प्राप्तकर्ता होता है।

v. लक्ष्य : यह संचार प्रक्रिया की अन्तिम कड़ी है जिसको आधार बनाकर सन्देश देने वाला अपना सन्देश देकर अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

vi. सन्देश: एक ऐसी सूचना जिसे प्रेषक प्राप्तकर्ता के पास भेजना चाहता है वह सन्देश कहलाती है।

मर्फी मॉडल: इस मॉडल के प्रतिपादक मर्फी, ऐच. डब्ल्यू. हिल्डबेन्ड तथा जे. पी. थॉमस हैं। उनके अनुसार संप्रेषण प्रक्रिया के छ: मुख्य तत्त्व होते हैं। इस मॉडल के अनुसार इसमें छ: मुख्य भाग होते हैं :

i. संदर्भ
ii. सन्देशवाहक
iii. सन्देश
iv. माध्यम
v. प्राप्तकर्ता

थिल एवं बोवी मॉडल:

“व्यावसायिक संप्रेषण घटनाओं की एक कड़ी है जिसकी पाँच अवस्थाएं हैं जो प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता को जोड़ती हैं। इस मॉडल के अनुसार सन्देश भेजने वाले के पास कोई विचार होता है जो वास्तविक संसार से सम्बन्धित घटनाओं का सरलीकरण होता है

अर्थात् उस विचार को पुष्ट करने में उसने कई चीजों को छोड़ा होता है तथा अधिकतम को मान्यता दी होती है, इससे प्रारम्भ होकर यही विचार सन्देश के रूप में परिवर्तित होकर सन्देश बन जाता है

जिसे सन्देश के रूप में प्रेषित करके सन्देश प्राप्तकर्ता तक पहुँचा कर उसकी (अर्थात् प्राप्तकर्ता की) प्रतिक्रिया ली जाती है।”BHDLA 137 Free Solved Assignment

बरलों का संप्रेषण मॉडल:

डी. के. बरलों द्वारा सात अवस्थाओं वाला संचार प्रक्रिया का संचार मॉडल प्रस्तुत किया गया। इसके अनुसार संचार प्रक्रिया संचार स्रोत से प्रारम्भ होकर प्रतिक्रिया या प्रतिपुष्टि रूपी अन्तिम कड़ी के रूप में समाप्त होती है।

लेसिकर, पेटाइट एवं फ्लैटले मॉडल:

इस मॉडल को संवेदनशीलता मॉडल के रूप में प्रतिपादित किया गया। इसमें संप्रेषण प्रक्रिया सन्देश प्रेषण से प्रारम्भ होकर क्रम की पुन:आवृत्ति पर समाप्त होता है।

इन विद्वानों ने स्पष्ट किया कि संप्रेषण प्रक्रिया में संवेदन तन्त्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है क्योंकि सन्देश प्राप्तकर्ता द्वारा सन्देश संवेदन तन्त्र द्वारा प्राप्त किया जाता है।

संवेदन तन्त्र संवाद को खोजकर संवाद के साथ-साथ पहले से उपलब्ध कुछ अन्य सूचनाएँ भी एकत्रित करता है।

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2. सर्जनात्मक लेखन में भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: सर्जनात्मक लेखन में भाषा के विविध रूप: सर्जनात्मक लेखन साहित्य रचना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है। जीवन की अनुभूतियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। विविध अनुभूतियों को प्रकट करने के लिए भाषा अपना विविध रूप रचती है।

सर्जनात्मक लेखन में हम अपने समय की छाप को गहराई से देख सकते हैं। समय बदलने के साथ विधाओं में परिवर्तन होता जाता है। हम आज महाकाव्य नहीं रच रहे हैं।

इसके मूल में वही बदली हुई अनुभूति है। हम आस्था और संशय की उन अनुभूतियों को विराटता में अनुभव नहीं कर पाते हैं, जिसमें महाकाव्य का जन्म होता है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

सर्जनात्मक अनुभूति यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, जिसमें दुहराव मात्र नहीं होता है। सर्जनात्मक लेखन जैविक प्रक्रिया है। वह अपने लिए भाषा का विशिष्ट रूप चुन लेती है। इसीलिए साहित्य में विविध विधाओं का विकास होता जाता है।

भाषा में यथार्थ निरीक्षण से व्यंग्य की ताकत पैदा होती है। कबीर में यथार्थ की पकड़ गहरी है। उनकी भाषा में व्यंग्य के तेवर प्रखर हैं। रघुवीर सहाय में व्यंग्य की अनुभूति बहुत कड़ी है।

सर्जनात्मक लेखन की भाषा के अतिरिक्त किसी भाषा में मानवीय भाव और आवेग को पूरी अर्थवत्ता में नहीं पकड़ा जा सकता है। सर्जनात्मक लेखन का अपने परिवेश के साथ विशिष्ट संबंध होता है।

किसी भी विधा में परिवेश की बहुत भूमिका होती है। कहानी, उपन्यास, नाटक के पात्र किस परिवेश के हैं, उसी के अनुकूल ही भाषा की भूमिका होगी।

ग्रामीण पात्र यदि संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग करते हैं तो यह अस्वाभाविक लगेगा। यदि कोई शहरी पात्र है, वह आंचलिक भाषा का प्रयोग करता है, तो उसमें भी स्वाभाविकता नहीं दिखाई पड़ेगी।

रचनाकार जब लेखन में प्रवृत्त होता है, अपने पात्र और परिवेश के अनुकूल भाषा में संवेदना रचता है।

1 फीचर की भाषा :

भाषा की रचनात्मकता को अब हम, विधाओं में उसका किस प्रकार से उपयोग होता है, के माध्यम से समझेंगे। फीचर की बात करते हैं, तो फीचर के विषय में भी जानकारी प्राप्त करना चाहिए।

फीचर लेखन का संबंध समाचार पत्रों से है। समाचार पत्रों में जिस प्रकार से निबंध, लेख आदि छपते हैं, उसी प्रकार से समाचार पत्रों में फीचर का भी स्थान है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

फीचर किन्हीं विशिष्ट घटनाओं पर लिखा जा सकता है। किसी लुप्त होती परंपरा को याद दिलाने के लिए लिखा जा सकता है। किसी नई समस्या पर लिखा जा सकता है।

उसकी विषय वस्तु विविध हो सकती है। हम फीचर लेखन की भाषा की बात करते हैं, तब यह ध्यान में रखना आवश्यक हो जाता है कि फीचर को समाचार पत्रों में छपना है।

समाचार पत्रों की पहुँच तरह-तरह के लोगों तक होती है। जो कम पढ़े-लिखे लोग हैं वे भी समाचार पढ़ते हैं। फीचर लेखन में भाषा की दुरूहता और जटिलता नहीं होनी चाहिए। भाषा की जटिलता से सभी लोग फीचर को पढ़ने में दिलचस्पी नहीं ले सकेंगे।

भाषा में ऐसा प्रयोग हो, जो जन सामान्य की समझ में आने वाला हो। फीचर लेखन की भाषा समाचार की भाषा भी नहीं होनी चाहिए। समाचार की भाषा में एक प्रकार की तात्कालिकता होती है।

पत्रों की परंपरा अत्यंत स्वस्थ और सुंदर है जो जीवंत रखती है संबंधों और संवेदनाओं को। इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता संग्राम में एक सशक्त संचार माध्यम के रूप में पत्र की कितनी अहम भूमिका रही है।

स्वतंत्रता सेनानियों के पत्रों से आज भी तत्कालीन भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का पूरा ब्यौरा मिलता है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के अपनी बेटी को जेल से लिखे गए पत्र एक दस्तावेज बन गए हैं और आज भी उनका महत्व अक्षुण्ण है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

इस फीचर लेखन के वाक्य गठन और शब्द चयन में सहज सौंदर्य है। भाषा समझ में आने वाली है। समाचार पत्रों में लिख रहे हों, तब यह खासकर ध्यान देना चाहिए कि संयुक्त वाक्यों के अधिक प्रयोग से कहीं-कहीं भाषा उलझ जाती है।

2 निबंध की भाषा निबंध :

सर्जनात्मक लेखन की महत्वपूर्ण विधा है। निबंध के विषय भी विविध होते हैं। निबंध रचनात्मक भी हो सकते हैं और आलोचनात्मक भी। यहाँ रचनात्मक निबंध पर विशेष रूप से विचार करेंगे।

निबंध में भाव का जितना महत्व होता है, उतना ही महत्व विचार का भी होता है। निबंध के विषय में आचार्य शुक्ल ने लिखा है ‘यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को भी साथ लेकर।

अपना रास्ता निकालती हुई बुद्धि जहाँ कहीं मार्मिक या भावाकर्षक स्थलों पर पहुँचती है, वहाँ हृदय थोड़ा बहुत रमता अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कहता गया है। निबंधकार किसी भी विचार को चिंतन और तर्क की भाषा में ही नहीं अनुभव की भाषा में भी रखता है।

निबंधकार अपने अनुभव और विचार को मिलाकर क्रमिक गति से निबंध में एकसूत्रता देता है। निबंध में भाव खुले हुए होते हैं। उनमें अंतःसंगति होना आवश्यक है। BHDLA 137 Free Solved Assignment

भाव को भाषा में एक सूत्र में नहीं पिरोया गया, तो अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। निबंध की भाषा में शब्दों का अंतःसूत्र स्वेटर की तरह बुना हुआ होता है।

थोड़े से शब्दों के हेर-फेर से गद्य शिथिल और निर्जीव हो सकता है। आचार्य शुक्ल के निबंध की भाषा देखें, उसमें विचार शब्दों के बीच किस प्रकार से बहते हैं :

विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति के प्रति होने पर लोभ वह सात्विक रूप प्राप्त करता है, जिसे प्रीति या प्रेम कहते हैं। जहाँ लोभ सामान्य या जाति के प्रति होता है वहाँ वह लोभ ही रहता है,

पर जहाँ किसी जाति के एक ही विशेष व्यक्ति के प्रति होता है वहाँ वह, रुचि या प्रीति का पद प्राप्त करता है। लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख । (लोभ और प्रीति)

ललित निबंध की भाषा निबंधकार के व्यक्तित्व से संबद्ध होती है। निबंध की भाषा में लय होती है। उस गद्य की लय में शब्द भी चंचल दिखाई देते हैं।

ललित निबंध के भाव में संगीत जैसी सूक्ष्मता होती है। गीति काव्य की तरह व्यक्तित्व का सहज प्रकाशन होता है।

3 कहानी की भाषा :BHDLA 137 Free Solved Assignment

कहानी साहित्य की विशिष्ट विधा है। कहानी कहना एक प्राचीन कला विधि है। अपने घरों में हम दादी और नानी से कहानी सुनते आ रहे हैं। आधुनिक साहित्य में कहानी का जो विकास हुआ है, वह कहानी उस पुरानी कहानी से भिन्न है।

अपने घरों में सुनी हुई कहानी में कहीं न कहीं हमारी वाचिक परंपरा के संस्कार मौजूद हैं। दोनों प्रकार की कहानी दो __ भिन्न परिस्थितियों की उपज थी। अतः दोनों प्रकार की कहानियों की भाषा भी भिन्न है।

वाचिक स्थिति में पाठ पहले से निर्धारित नहीं होते थे। श्रोता और सामाजिक के संबंधों में भाषा निर्धारित होती थी। वाचन वाक्य रचना, पद विन्यास, क्रिया, सर्वनाम, वचन का निर्णय करती है।

आधुनिक कहानी को वाचक नहीं लेखक लिखता है। आज की कहानी लेखक समकालीन समाज की पहचान के आधार पर एक कल्पित व्यक्ति, जिसके साथ वह एक काल्पनिक संवाद अथवा संप्रेषण की स्थिति बनाता है। हिंदी की पहली कहानी ‘रानी केतकी की कहानी’ कथा संप्रेषण की वाचिक परंपरा से हटकर चाक्षुष में परिवर्तित हो रही थी। जब श्रव्य का स्थान पाठ्य ले रहा था। ‘रानी केतकी की कहानी’ का एक उदाहरण देखें :

इस कहानी का कहने वाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ लोग पुकारते हैं, कह सुनाता हूँ। दहना हाथ मुँह पर फेरकर आपको जताता हूँ BHDLA 137 Free Solved Assignment

जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूद-फाँद लपट-झपट दिखाऊँ जो देखते ही आपके ध्यान छोड़ा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अचपलाहट में हैं, हिरन के रूप में अपनी चौकडी भल जाए।

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खण्ड -ख

3. लिखित भाषा के प्रकार्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लिखित भाषा के प्रकार्यः अभी हमने देखा कि लेखन का सर्वाधिक प्रत्यक्ष प्रकार्य यह है कि वह संप्रेषण के क्षेत्र को व्यापक विस्तार देता है। मानव संप्रेषण में लेखन के कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रकार्य भी हैं जिनका संक्षिप्त परिचय हम यहाँ प्राप्त करेंगे

1) स्मृति में सहायक (memory supportive): संस्कृति अध्येताओं और नृतत्वशास्त्रियों ने वाचिक पंरपरा से जुड़े लोगों की स्मरण शक्ति को अत्यंत आश्चर्य से देखा और उसे महान सिद्ध किया।

उनका यह कहना है कि वाचिक परंपरा से जुड़े हुए लोगों में यह क्षमता थी कि वे लंबे आख्यानों/महाकाव्यों को याद कर लेते थे।

यह बात वास्तव में महत्वपूर्ण है लेकिन इतनी नहीं जितनी कि किसी विश्वविद्यालय की पुस्तक सूची। यही कारण है कि लेखन के विकास में उसका स्मृति प्रकार्य सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

यहाँ-वहाँ कब क्या हुआ इसे हम कुछ समय तक ही याद रख सकते हैं। यदि अतीत की इन सूचनाओं को मौखिक रूप में कुछ पीढ़ियों तक हस्तांतरित करना हो तो पूरे संदेश में निरंतर परिवर्तन आता जाएगा।

इसके विपरीत यदि इन सूचनाओं और संदेशों को लिखित रूप में रखा जाए तो इन्हें कभी भी उनके मूल अथवा अपरिवर्तित रूप में देखा जा सकता है अर्थात इन्हें हमेशा के लिए यथावत सुरक्षित रखा जा सकता है।

2) संप्रेषण क्षेत्र का विस्तार (Expansion of communicative area): मौखिक संप्रेषण में वक्ता और श्रोता दोनों की उपस्थिति अनिवार्य है इसलिए इसका संप्रेषण क्षेत्र सीमित होता है। इसके विपरीत लिखित संप्रेषण दूरी और काल दोनों की सीमा को पार कर लेता है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

इसीलिए लेखन को संप्रेषण के क्षेत्र में दूरी का माध्यम कहा गया है जिसमें न केवल लेखक और पाठक की दूरी मिट जाती है बल्कि लेखक और संदेश की दूरी भी सिमट जाती है। इस प्रकार लिखित भाषारूप व्यापक संप्रेषण क्षेत्र तक अपने मूल रूप में फैल सकता है।

3) प्रसारण का माध्यम (Mode of transmission): लेखन का यह प्रकार्य संदेश को भेजने वाले से दूर पहुँचाने में समर्थ बनाता है। लिखित संदेश उच्चरित संदेश की तरह उसी समय प्रेषित करना जरूरी नहीं होता, इसे बाद में भी उपलब्ध कराया जा सकता है।

लिखित भाषा रूप की यह विशेषता उसे प्रसारण माध्यम के रूप में स्थापित करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मौखिक संदेश अपने श्रोता तक पहुँचने के तुरंत बाद ही समाप्त हो जाता है जबकि लिखित संदेश एक वस्तु की तरह लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।

इसका अर्थ यह है कि बोले गए शब्द अपनी प्रकृति में अल्पजीवी (ephemeral) और स्वतःजात (Sponteneous) होते हैं।

4) सामाजिक नियंत्रण (Social Control): लेखन के स्थायित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसमें सामाजिक व्यवहार को नियमित और नियंत्रित करने की शक्ति होती है।

यदि आप सरकारी कार्यालयों के कामकाज को देखें तो आपको ‘आप यह मुझे लिखित रूप में दीजिए’ (Can I have this in writing) जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रयोग में मिलेंगी।

इनसे यह तथ्य प्रमाणित होता है कि लोग मौखिक शब्दों की तुलना में लिखित शब्दों पर अधिक विश्वास करते हैं। अपने सामान्य जीवन में भी हम यह मानते हैं कि ‘सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए’ अथवा ‘वो व्यक्ति कान का कच्चा है’।BHDLA 137 Free Solved Assignment

सामाजिक नियंत्रण के प्रकार्य के स्तर पर दूसरे पक्ष का संबंध, भाषा से है। हम यह जान चुके हैं कि भाषा व्यवहार सामाजिक संप्रेषण का एक अंग है।

4. रिपोर्ट (प्रतिवेदन) पर विचार कीजिए।

उत्तर: प्रतिवेदन: प्रतिवेदन (पति + विद) शब्द के जोड़े जाने के बाद से बना है । जिसका मतलब है । समस्त यानी पूरी जानकारी रखना.

प्रतिवेदन में विशेष कार्य की जानकारी तो दी जाती है साथ ही विभिन्न सुझाव और साथ ही संतोषजनक जवाब भी दिया जाता है । जैसा कि हम सभी जानते हैं देश-विदेश में कई घटनाएं हो होती रहती हैं । जिसको जानने के लिए हम इच्छुक रहते हैं ।

जिसके लिए उस घटना का निरीक्षण या छानबीन की आवश्यकता होती है । जो सरकारी और गैर सरकारी संस्था या उसके द्वारा नियुक्त एक या एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा की जा सकती है.

ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत परिपूर्ण विवरण को प्रतिवेदन कहा जाता है। प्रतिवेदन लिखने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

(1) प्रतिवेदन संक्षिप्त हो।
(2) घटना या किसी कार्रवाई की मुख्य बातें प्रतिवेदन में अवश्य लिखी जानी चाहिए।

(3) इसकी भाषा सरल और शैली सुस्पष्ट हो।BHDLA 137 Free Solved Assignment
(4) विवरण क्रमिक रूप से हो।

(5) पुनरुक्ति दोष नहीं हो यानी एक ही बात को बार-बार भिन्न-भिन्न रूपों में नहीं लिखना चाहिए।
(6) इसके लिए एक सटीक शीर्षक जरूर हो।

प्रतिवेदन के निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

(1) प्रतिवेदन में किसी घटना या प्रसंग की मुख्य-मुख्य बातें लिखी जाती हैं।
(2) प्रतिवेदन में बातें एक क्रम में लिखी जाती हैं। सारी बातें सिलसिलेवार लिखी होती हैं।

(3) प्रतिवेदन संक्षेप में लिखा जाता है। बातें विस्तार में नहीं, संक्षेप में लिखी जाती हैं।

(4) प्रतिवेदन ऐसा हो, जिसकी सारी बातें सरल और स्पष्ट हों; उनको समझने में सिरदर्द न हो। उनका एक ही अर्थ और निष्कर्ष हो। स्पष्टता एक अच्छे प्रतिवेदन की बड़ी विशेषता होती है।

(5) प्रतिवेदन सच्ची बातों का विवरण होता है। इसमें पक्षपात, कल्पना और भावना के लिए स्थान नहीं है।

(6) प्रतिवेदन में लेखक या प्रतिवेदक की प्रतिक्रिया या धारणा व्यक्त नहीं की जाती। उसमें ऐसी कोई बात न कही जाय, जिससे भम पैदा हो।

(7) प्रतिवेदन की भाषा साहित्यिक नहीं होती। यह सरल और रोचक होती है।

(8) प्रतिवेदन किसी घटना या विषय की साफ और सजीव तस्वीर सुनने या पढ़नेवाले के मन पर खींच देता है।

5. वैयक्तिक लेखन की विभिन्न विधाओं के भाषिक वैशिष्ट्य का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: वैयक्तिक लेखन की विभिन्न विधियों के भाषिक वैशिष्ट्य का विश्लेषण: वैयक्तिक लेखन की विभिन्न विधाओं का उल्लेख हम कर चुके हैं लेकिन यहाँ हम उन्हीं विधाओं की विशेषताओं का अध्ययन करेंगे जिनमें आत्मकथात्मकता और वैयक्तिकता का अंश ज्यादा होता है।

इस इकाई में हम डायरी, आत्मकथा, संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत की भाषागत विशेषताओं का अध्ययन करेंगे। ये विधाएँ ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ साहित्यिक लेखन के अंतर्गत शामिल नहीं किया जा सकता।

इन विधाओं का उपयोग वे लोग भी लेखन के लिए करते हैं, जो साहित्यकार नहीं होते। लेकिन इन विधाओं में लिखकर वे अपने अनुभव से समाज के अनुभव को समृद्ध करते हैं।

1 आत्मकथा हिंदी में आत्मकथा विधा का विकास पश्चिम के प्रभाव के कारण हुआ। स्वयं द्वारा लिखी गई अपनी ही जीवनी आत्मकथा कहलाती है। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति अपनी जीवनी स्वयं लिखता है तब उसे आत्मकथा कहते हैं। –BHDLA 137 Free Solved Assignment

2 संस्मरण ‘हिंदी साहित्य कोश’ के अनुसार ‘संस्मरण-लेखक जो स्वयं देखता है, जिसका वह स्वयं अनुभव करता है, उसी का वर्णन करता है।

उसके वर्णन में उसकी अनुभूतियाँ और संवेदनाएँ रहती हैं। स्मृति ही संस्मरण का रूप है। किसी व्यक्ति, घटना, दृश्य, वस्तु को आत्मीयता के साथ याद करते हुए उसका विवेचन करना ही संस्मरण है।

इसमें लेखक के अनुभव की प्रधानता होती है जो किसी घटना अथवा व्यक्ति से संबंधित होते हैं। संस्मरण में वर्णन और विवरण की अधिकता होती है।

इसमें स्थितियों और व्यक्तियों को एक-एक चरण आगे-पीछे जोड़कर अंकित किया जाता है। स्मृति से जुड़ी अनुभूतियों की भाव-संपदा के आधार पर अभिव्यक्ति होती है।

स्मृति की इस अभिव्यक्ति में आत्मीयता का रंग भी मिला होना जरुरी है। संस्मरण केवल अतीत की घटनाओं पर आधारित होता है।

3 डायरी ‘डायरी’ शब्द हिंदी में अंग्रेजी से आया है और इस शब्द के साथ उसकी पूरी अवधारणा भी पश्चिम से ही ग्रहण की गई है। हिंदी में इसके लिए दैनिकी, दैनंदिनी, वासुरी, वासरिका आदि शब्दों का प्रयोग होता है।

डायरी से रोज लिखे जाने वाले तथ्यों, घटनाओं और कार्यों का पता चलता है। जब कोई व्यक्ति दिन, तिथि, सन् के आधार पर जीवन में घटित अथवा देखी गई धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक या साहित्यिक परिस्थितियों का चित्रण करता है तो वह रचना डायरी के नाम से जानी जाती है।

डायरी लेखक के निजी अनुभव का अभिन्न अंग होती है। अपने निजी कार्यों, विचारों और भावों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति होने के कारण यह विधा अन्य साहित्यिक विधाओं से अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक मानी जाती है। डायरी निजी होती है। लेखक इसे प्रकाशित कराने के उद्देश्य से नहीं लिखता।

4 यात्रा-वृत्तांत व्यक्ति जब अपने द्वारा की गई यात्रा के अनुभवों को कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करता है, तो उसे यात्रा-वृत्तांत कहते हैं। इसमें कल्पना की गुंजाइश नहीं होती और बीते हुए यथार्थ की प्रधानता पाई जाती है। यात्रा में स्थान बदलने की क्रिया महत्वपूर्ण होती है।BHDLA 137 Free Solved Assignment

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6. समाचार की भाषा की क्या विशेषतएँ होती हैं? सोदाहरण समझाइए।

उत्तर: समाचार की भाषा की विशेषताए: समाचार लिखना आरंभ करने से पहले हमेशा कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। आपको यह याद रहना चाहिए कि समाचार पढ़ने वाले बहुत से लोगों का भाषा-ज्ञान मामूली-सा हो सकता है।

अगर आपने कठिन भाषा लिखी तो वे आपकी बात समझ नहीं पाएंगे। समाचार पढ़ते हुए पाठक बहुत सजग हो यह भी आवश्यक नहीं है। हो सकता है, उसे दफ्तर जाने की जल्दी हो।

गृहिणी को घर का काम करना हो। बस या रेल में बैठकर शोर-शराबे के बीच अखबार पढ़ा जा रहा हो। ऐसी सारी स्थितियों को ध्यान में रखकर आपको समाचार की भाषा लिखनी है ताकि पाठक समाचार में कही गई बात को पढ़ते ही समझ जाए।

इसके लिए समाचार की भाषा में निम्नलिखित विशेषताएँ लाना आवश्यक है:

(i) उतनी ही बातें लिखिए जो आवश्यक हों।
(ii) छोटे-छोटे पैरा बनाइए।

(iii) छोटे और सरल वाक्य बनाइए । जटिल और लंबे वाक्यों से बचिए ।
(iv) बोलचाल की भाषा का प्रयोग कीजिए।

(v) उन्हीं शब्दों का प्रयोग कीजिए जो आम जनता में प्रचलित हों। कठिन और व्याख्या की आवश्यकता वाले शब्दों से बचिए ।BHDLA 137 Free Solved Assignment

(vi) कठिन पारिभाषिक शब्दों से बचिए लेकिन समाचारों में आमतौर पर व्यवहार में आने वाले ऐसे शब्दों का प्रयोग अवश्य करें जो किसी विशिष्ट क्षेत्र के लिए उपयुक्त हों।

(vii) ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए जो पाठकों का हृदय स्पर्श करें।

(viii)अगर किसी घटना की विस्तृत रपट लिख रहे हों तो उसे ऐसी भाषा में बांधिए जिससे सारा घटनाचक्र दृश्य रूप में उपस्थित हो जाए और लोगों के हृदय को छुए।

(ix) भाषा में हल्कापन या अश्लीलता नहीं होनी चाहिए तथा किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए अपमानजनक न हो।

(X) भाषा हिंदी की प्रकृति के अनुकूल हो। अगर अनुवाद भी किया गया है तो भी अनुवाद की भाषा को हिंदी के रूप में ढालिए।

ये कुछ बातें हैं, अगर इनको ध्यान में रखा जाए तो समाचार की भाषा सभी के लिए ग्राह्य बन सकती है। अब हम समाचारों के कुछ नमूनों द्वारा भाषा की विशेषताओं को पहचानेंगे। नीचे हम एक समाचार की भाषा के दो नमूने पेश कर रहे हैं। आप भाषा के अंतर को स्वयं पहचान सकते हैं।

खण्ड -ग

7. व्यावसायिक पत्र

उत्तरः व्यावसायिक पत्र: व्यावसायिक पत्रों को अच्छी खबर, बुरी खबर, धन्यवाद, स्वीकृति, निमंत्रण, अनुरोध, समस्या, अस्वीकृति या शिकायतों को व्यक्त करने के लिए लिखा जाता है।

यह आम तौर पर ईमेल के माध्यम से भेजे जाते हैं और यह कंपनी के लेटरहेड पर लिखा होता है। एक व्यावसायिक पत्र तीन भागों में बँटा होता हैBHDLA 137 Free Solved Assignment

i. परिचय – पिछले मेल का संदर्भ देते हुए और/या अभिवादन करते हुए शुरु होता है।

ii. मध्य- में विवरण और अतिरिक्त जानकारियाँ होती हैं।

iii. निष्कर्ष – सुझाव या कार्रवाही का उल्लेख और फिर समाप्ति।

‘व्यावसायिक पत्र-लेखन’ या वाणिजिक पत्र से आशय है व्यवसाय से सम्बन्धित, एक व्यवसायी द्वारा दूसरे व्यवसाय अथवा एक व्यक्ति द्वारा किसी व्यवसायी को पत्र लिखना अर्थात माल के सम्बन्ध में पूछताछ करने, आदेश देने,

खराब माल की शिकायत करने माल प्राप्ति की सूचना दे रूपये का तकादा करने या अपने माल का प्रचार करने, आदि से सम्बन्धित जो पत्र एक उद्यमी या व्यवसायी दूसरे बड़े व्यवसायी को या बड़े व्यवसायी द्वारा छोटे उद्यमी को माल बना के आदेश आदि हेतु पत्र व्यवहार हो तो वह व्यावसायिक प्रत्राचार के अन्तर्गत आता है।

8. संवाद संप्रेषण का एक सशक्त माध्यम है।

उत्तरः संवाद संप्रेषण का एक सशक्त माध्यम: एक स्थान से दूसरे स्थान सन्देश भेजने और उसका उत्तर प्राप्त करने आपको किसी माध्यम की आवश्यकता होती है ।

जो कि संप्रेषण के साधन कहलाते हैं। संप्रेषण के विभिन्न माध्यम हैं- डाक पत्र प्रेषण सेवा, करीयर सेवा, टेलीफोन, टेलीग्राम, इन्टरनेट, फैक्स, ई-मेल, वायस मेल, आदि।

इन साधनों को संप्रेषण सेवाएं भी कहते हैं व्यवसाय हतु प्रभावी संप्रेषण सेवाओं को दो भागों में बाटा जा सकता है:- 1. डाक सेवाए 2. दूरसंचार सेवाएं।BHDLA 137 Free Solved Assignment

डाक सेवाएं:

भारत में डाक प्रणाली का प्रारम्भ 1766 में लार्ड क्लाइव ने सरकारी डाक भेजने के लिए किया था। यह जन साधारण के लिए सन् 1837 से ही उपलब्ध हुई।

भारतीय डाक सेवा नेटवर्क की गणना विश्व की बड़ी डाक सेवाओं में होती है। इसमें पूरे देश में 1,55,516 डाक घर हैं जिनमें से 1,39,120 ग्रामीण क्षेत्रों में है।

इनका मुख्य कार्य पत्रों, पार्सल, पैकेट को एकत्र करना, उनको छांटना एवं उनका वितरण करना है। डाक से लिखित सन्देश भेजने के लिए पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र या लिफाफों का प्रयोग किया जाता है।

ये सन्देश परिवहन के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाए जाते हैं। डाक सेवाओं में दो के भीतर एवं देश के बाहर सन्देश भेजने की सेवाएं दी जाती है।

9. भाषा का व्यावहारिक पक्ष

उत्तरः भाषा का व्यवहारिक पक्षः भाषा वह साधन है जिसके दवारा हम अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं और इसके लिये हम वाचिक ध्वनियों का प्रयोग करते हैं।

भाषा, मुख से उच्चारित होने वाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह है जिनके द्वारा मन की बात बताई जाती है। BHDLA 137 Free Solved Assignment

किसी भाषा की सभी ध्वनियों के प्रतिनिधि स्वर एक व्यवस्था में मिलकर एक सम्पूर्ण भाषा की अवधारणा बनाते हैं।

व्यक्त नाद की वह समष्टि जिसकी सहायता से किसी एक समाज या देश के लोग अपने मनोगत भाव तथा विचार एक दूसरे से प्रकट करते हैं।

मुख से उच्चारित होने वाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह जिनके दवारा मन की बात बताई जाती है जैसे – बोली, जबान, वाणी विशेष।

सामान्यतः भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा आभ्यंतर अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है।

यही नहीं वह हमारे आभ्यंतर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परम्परा से विच्छिन्न है।

इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं।

10. कार्यवृत्त

उत्तर: कार्यवृत: किसी बैठक की चर्चा का या किसी सुनवाई का तात्कालिक लिखित विवरण कार्यवृत्त कहलाता है। कार्यवृत्त से बैठक में हुए कार्यकलापों का एक सार मिल जाता है।

कार्यवृत्त चल रही बैठक के दौरान लिखा गया एक ब्यौरा होता है जिसे प्रोटोकॉल या नोट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें उपस्थित लोगों की सूची, उठाए गए मुद्दे, संबंधित प्रतिक्रियाएं और मुद्दों को हल करने के लिए – लिये गए अंतिम फैसले शामिल होते हैं।BHDLA 137 Free Solved Assignment

इसका उद्देश्य उपलब्धियों और समय-सीमा के साथ-साथ कौन से कार्य किसे सौंपा गए हैं -इसका हिसाब रखना होता है।

बैठक के कार्यवृत का प्रारूप: आम तौर पर मीटिंग के कार्यवृत्त में निम्नलिखित भाग होते हैं –
i. कंपनी का नाम – पेज के ऊपरी भाग में बायीं ओर।

ii. दिनांक – पेज के दाहिने तरफ सबसे उपर।

iii. टॉपिक – दो बार रिटर्न की दबाने पर पेज के ठीक बीच में।

iv. हाजिर लोग- हाजिर व्यक्तियों के नाम और उनके पद (तालिका के 2 कॉलमों में)।

v. गैरहाजिर लोग – अनुपस्थित व्यक्तियों के नाम, उनकी भूमिकाएं और उनकी अनुपस्थिति का कारण। (3 कॉलमों में)

vi. मीटिंग में उठाए गए मुद्दे – वक्ताओं के नाम और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे।

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