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हिंदी भाषा : विविध प्रयोग

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BHDLA 135 Free Solved Assignment jan 2022

भाग – 1

प्रश्न 1. लिपिबद्ध भाषा या लेखन कक्षा के उभव से ही भाषा का चरम विकास संभव हो सका। इस पर विचार करते हुए देवनागरी लिपि की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर-भाषावैज्ञानिक दृष्टि से देवनागरी लिपि अक्षरात्मक सिलेबिक लिपि मानी जाती हैं। लिपि के विकाससोपानों की दृष्टि से ‘चित्रात्मक’, ‘भावात्मक’ और ‘भावचित्रात्मक’ लिपियों के अनंतर ‘अक्षरात्मक’ स्तर की लिपियों का विकास माना जाता है।

पाश्चात्य और अनेक भारतीय भाषाविज्ञानविज्ञों के मत से लिपि की अक्षरात्मक अवस्था के बाद अल्फाबेटिक (वर्णात्मक) अवस्था का विकास हुआ।

सबसे विकसित अवस्था मानी गई है-ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) लिपि की। ‘देवनागरी’ को अक्षरात्मक इसलिए कहा जाता है कि इसके वर्ण-अक्षर (सिलेबिल) हैं-स्वर भी और व्यंजन भी।

‘क’, ‘ख’ आदि व्यंजन सस्वर हैं-अकारयुक्त हैं। वे केवल ध्वनियाँ नहीं हैं अपितु सस्वर अक्षर हैं, परंतु यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि भारत की ‘ब्राह्मी’ या ‘भारती’ वर्णमाला की ध्वनियों में व्यंजनों का ‘पाणिनि’ ने वर्णसमाम्नाय के 14 सूत्रों में जो स्वरूप परिचय दिया है,

उसके विषय में ‘पतंजलि’ (द्वितीय शती ई.पू.) ने यह स्पष्ट बता दिया है कि व्यंजनों में संनियोजित ‘अकार’ स्वर का उपयोग केवल उच्चारण के उद्देश्य से है।

वह तत्वतः वर्ण का अंग नहीं है। इस दृष्टि से विचार करते हुए कहा जा सकता है कि इस लिपि की वर्णमाला तत्वतः ध्वन्यात्मक है, अक्षरात्मक नहीं।BHDLA 135 Free Solved Assignment

डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना के अनुसार सर्वप्रथम देवनागरी लिपि का प्रयोग गुजरात के नरेश जयभट्ट (700-800 ई.) के शिलालेख में मिलता है। आठवीं शताब्दी में चित्रकूट, नवीं में बड़ौदा के ध्रुवराज भी अपने राज्यादेशों में इस लिपि का उपयोग किया करते थे।

समूचे विश्व में प्रयुक्त होने वाली लिपियों में देवनागरी लिपि की विशेषता सबसे भिन्न है। अगर हम रोमन, उर्दू लिपि से इसका तुलनात्मक अध्ययन करें तो देवनागरी लिपि इन लिपियों से अधिक वैज्ञानिक है।

रोमन और उर्दू लिपियों के स्वर-व्यंजन मिले-जुले रूप में रखे गए हैं, जैसेअलिफ, बे; ए, बी, सी, डी, ई, एफ आदि। दोनों लिपियों की तुलना में देवनागरी में इस तरह की अव्यवस्था नहीं है. इसमें स्वर-व्यंजन अलग-अ
हैं।

स्वरों के हस्व-दीर्घ युग्म साथ-साथ रहते हैं, जैसे- अ-आ, इ-ई, उ-ऊ। इन स्वरों के बाद संयुक्त स्वरों की बात करते हैं इनको भी इस लिपि में अलग से रखा जाता है, जैसे- ए, ऐ, ओ, औ।

देवनागरी के व्यंजनों की विशेषता इस लिपि को और वैज्ञानिक बनाती है, जिसके फलस्वरूप क, च, ट, त, प वर्ग के स्थान पर आधारित है और हर वर्ग के व्यंजन में घोषत्व का आधार भी सुस्पष्ट है, जैसे- पहले दो व्यंजन (च, छ) अघोष और शेष तीन व्यंजन (ज, झ, ब) घोष होते हैं।

देवनागरी व्यंजनों को हम प्राणत्व के आधार पर भी समझ सकते हैं, जैसे- प्रथम, तृतीय और पंचम व्यंजन अल्पप्राण और द्वितीय और चतुर्थ व्यंजन महाप्राण होता है। इस तरह का वर्गीकरण और किसी और लिपि व्यवस्था में नहीं है।

देवनागरी की कुछ और महत्तवपूर्ण विशेषता निम्नवत् हैं

(1. लिपि चिह्नों के नाम ध्वनि के अनुसार-इस लिपि में चिह्नों के द्योतक उसके ध्वनि के अनुसार ही होते हैं और इनका नाम भी उसी के अनुसार होता है जैसे- अ, आ, ओ, औ, क, ख आदि।

किंतु रोमन लिपि चिह्न नाम में आई किसी भी ध्वनि का कार्य करती है, जैसे- भ(अ) (क) ल(य) आदि। इसका एक कारण यह हो सकता है कि रोमन लिपि वर्णात्मक है और देवनागरी ध्वन्यात्मक।

(2. लिपि चिह्नों की अधिकता-विश्व के किसी भी लिपि में इतने लिपि प्रतीक नहीं हैं। अंग्रेजी में ध्वनियाँ 40 के ऊपर है किंतु केवल 26 लिपि-चिह्नों से काम होता है। ‘उर्दू में भी ख, घ, छ, ठ, ढ, ढ़, थ, ध, फ, भ आदि के लिए लिपि चिह्न नहीं है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

इनको व्यक्त करने के लिए उर्दू में ‘हे’ से काम चलाते हैं। इस दृष्टि से ब्राह्मी से उत्पन्न होने वाली अन्य कई भारतीय भाषाओं में लिपियों की संख्याओं की कमी नहीं है। निष्कर्षतः लिपि चिह्नों की पर्याप्तता की दृष्टि से देवनागरी, रोमन और उर्दू से अधिक सम्पन्न हैं।

(3. स्वरों के लिए स्वतंत्र चिह्न देवनागरी में हरव और दीर्घ स्वरों के लिए अलग अलग चिह्न उपलब्ध हैं और रोमन में एक ही अक्षर से ‘अ’ और ‘आ’ दो स्वरों को दिखाया जाता है। देवनागरी के स्वरों में अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

(4. व्यंजनों की आक्षरिकता- इस लिपि के हर व्यंजन के साथ साथ एक स्वर ‘अ’ का योग रहता है, जैसे अ च, इस तरह किसी भी लिपि के अक्षर को तोड़ना आक्षरिकता कहलाता है।

इस लिपि का यह एक अवगुण भी है किंतु स्थान कम घेरने की दृष्टि से यह विशेषता भी है, जैसे- देवनागरी लिपि में ‘कमल’ तीन वर्षों के संयोग से लिखा जाता है, जबकि रोमन में छः वर्णों का प्रयोग किया जाता है।

(5. सुपाठन एवं लेखन की दृष्टि-किसी भी लिपि के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण होता है कि उसे आसानी से पढ़ा और लिखा जा सके इस दृष्टि से देवनागरी लिपि अधिक वैज्ञानिक है। उर्दू की तरह नहीं, जिसमें जूता को जोता, जौता आदि कई रूपों में पढ़ने की गलती अक्सर लोग करते हैं।

देवनागरी के दोष-देवनागरी के चारों ओर से मात्राएं लगना और फिर शिरोरेखा खींचना लेखन में अधिक समय लेता है, रोमन और उर्दू में नहीं होता। ‘र’ के एक से अधिक प्रकार का होना, जैसे- रात, प्रकार, कर्म, राष्ट्र।

अतः यह कहा जा सकता है कि देवनागरी लिपि अन्य लिपियों की अपेक्षा अच्छी मानी जा सकती है, जिसमें कुछ सुधार की आवश्यकता महसूस होती है जैसे- वर्णों के लिखावट में सुधार की आवश्कता है क्योंकि ‘रवाना’ लिखने की परम्परा में सुधार हो कर अब ‘खाना’ इस तरह से लिखा जाने लगा है।

इसी तरह से लिखने के पश्चात हमें शिरोरेखा पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जैसे- श्भर लिखते समय हमें शिरोरेखा थोड़ा जल्द बाजी कर दे तो श्मरश् पढ़ा जाएगा। इन छोटी-छोटी बातों पर हमें विशेष ध्यान देना चाहिए।

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प्रश्न 2. उच्चारणगत विशेषताओं के आधार हिंदी वर्णमाला का विवेचन कीजिए।

उत्तर-‘स्वतो राजन्ते इति स्वराः’ (महाभाष्य-पतंजलि), जो स्वतः उच्चरित हो, वह स्वर है अर्थात् जिसका उच्चारण किसी अन्य ध्वनियों की सहायता के बिना हो, वह स्वर है।

विश्व की कुछ भाषाएं (दक्षिण अफ्रीका की बान्तू आदि भाषाएं) ऐसी हैं, जिनमें स्वर के बिना ही व्यंजन उच्चरित होते हैं, अतः उपर्युक्त परिभाषा हिंदी अथवा संस्कृत भाषा के लिए उपयुक्त हो सकती है,

परंतु विश्व की सभी भाषाओं के लिए नहीं। स्वर मात्रा के प्रतीक हैं, वे ह्रस्व होते हैं अथवा दीर्घ। संस्कृत में मात्रा के आधार पर स्वरों के तीन प्रकार हस्व, दीर्घ और प्लुत माने गए हैं।

किसी स्वर के उच्चारण में लगने वाला समय, मात्रा कहलाती है। पाणिनि ने स्वर की तीन मात्राएं मानी हैं-ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत।BHDLA 135 Free Solved Assignment

स्वरों का वर्गीकरण-हिंदी में स्वर ध्वनियों का वर्गीकरण मुख्य रूप से तीन आधारों पर किया गया है

(1. जिह्वा की ऊँचाई-जिह्वा की ऊँचाई के आधार पर स्वरों को चार वर्गों में विभक्त किया गया है

(i) संवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का जितना अधिक भाग ऊपर उठता है, उससे वायु उतनी ही संकुचित होकर बिना किसी रुकावट के बाहर निकलती है, इससे उच्चरित होने वाले स्वर संवृत कहलाते हैं। ई, इ, ऊ, उ संवृत स्वर हैं।

(ii) अर्धसंवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का भाग कम ऊपर उठता है और वायु मुखविवर में कम संकुचित होती है। इससे उच्चरित स्वर अर्धसंवृत कहलाते हैं। ए’ और ‘ओ’ अर्ध संवृत स्वर हैं।

(iii) अर्धविवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा अर्धसंवृत से कम ऊपर उठती है और मुखविवर में वायु मार्ग खुला रहता है। इससे उच्चरित स्वर अर्धविवृत स्वर कहे जाते हैं। आप और औ अर्धविवृत स्वर हैं

(iv) विवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा मध्य में स्थित होती है और मुखविवर पूरा खुला रहता है, ऐसे उच्चरित स्वर को विवृत _ कहते हैं। ‘आ’ विवृत स्वर है

(2. जिह्वा की स्थिति-किसी स्वर के उच्चारण में जिह्वा की स्थिति के आधार पर स्वरों के तीन भेद किए जाते हैं

(i) अग्रस्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का अग्रभाग सक्रिय होता है, ऐसे उच्चरित स्वर को अग्रस्वर कहते हैं। हिंदी में इ, ई, ए, ऐ, अग्रस्वर हैं।

(ii) मध्य स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का मध्य भाग सक्रिय होता है, ऐसे उच्चरित स्वर को मध्य स्वर कहते हैं। हिंदी में ‘अ’ मध्य स्वर है।

(ii) पश्चस्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का पश्च भाग सक्रिय होता है, ऐसे उच्चरित स्वर को पश्च स्वर कहते हैं। हिंदी में ऊ, उ, ओ, औ एवं आ पश्च स्वर हैं।

(3. होंठो की आकृति-किसी स्वर के उच्चारण में होठों की आकृति के आधार पर स्वरों को दो वर्गों में रख सकते हैं

(i) गोलीय-जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ की स्थिति कुछ गोलाकार होती है, ऐसे उच्चरित स्वर को गोलीय कहते हैं। ऊ, उ, ओ, औ, ऑ गोलीय स्वर हैं। (अंग्रेजी से आए हुए व् स्वर के लिए ऑ का उच्चारण होता है; जैसे-डॉक्टर, नॉर्मल आदि।)BHDLA 135 Free Solved Assignment

(ii) अगोलीय-जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ की स्थिति गोलाकार नहीं होती है, ऐसे उच्चरित स्वर को अगोलीय कहते हैं। अ, आ, इ, ई, ए और ऐ अगोलीय स्वर हैं।

व्यंजन ध्वनियाँ-परंपरागत व्याकरण में जिन ध्वनियों का उच्चारण स्वतः होता है और उसके उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की आवश्यकता नहीं होती, उसे स्वर तथा जिन ध्वनियों के उच्चारण के लिए स्वर की सहायता लेते हैं उन ध्वनियों को व्यंजन कहा गया है।

व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण-परंपरागत वैयाकरणों की दृष्टि से व्यंजन ध्वनियों को स्पर्श, अंत:स्थ एवं ऊष्म वर्गों में रखा गया है।

स्पर्श के अंतर्गत सभी वर्गीय ध्वनियों (क वर्ग से प वर्ग तक कुल पच्चीस ध्वनियाँ) को रखा गया है, अंत:स्थ के अंतर्गत य र ल व को तथा ऊष्म ध्वनियों के अंतर्गत श ष स ह को रखा गया है। यह वर्गीकरण आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर किया गया है।

आधुनिक भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण उच्चारण स्थान (Place of Articulation) एवं उच्चारण प्रयत्न (Manner of Articulation) के आधार पर किया गया है।

उच्चारण स्थान-किन्हीं ध्वनियों का उच्चारण मुखविवर के किस स्थान से हो रहा है। इन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में वायु का दबाव कम होता है अथवा अधिक।

इसके आधार पर व्यंजन ध्वनियाँ अल्पप्राण होती हैं अथवा महाप्राण। इन्हें उच्चारण स्थान के आधार पर इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है

(i) द्वयोष्ठ्य-जिन व्यंजन ध्वनियों का उच्चारण दोनों होठों के स्पर्श से होता है। उन ध्वनियों को द्वयोष्ठ्य ध्वनि कहते हैं। हिंदी में प, फ, ब, भ, म, व द्वयोष्ठ्य व्यंजन हैं।

(ii) दंत्योष्ठ्य-जिन व्यंजन ध्वनियों का उच्चारण ऊपरी दाँत एवं निचले होंठ के स्पर्श से होता है। ऐसी व्यंजन ध्वनियों को दंत्योष्ठ्य ध्वनि कहते हैं। हिंदी में दंत्योष्ठ्य व्यंजन नहीं पाये जाते।

इस प्रकार की व्यंजन ध्वनियाँ फारसी में ‘फ’ व अंग्रेजी में विद्यमान हैं। हिंदी की ‘व’ ध्वनि को कुछ ध्वनिविज्ञानी दंत्योष्ठ्य मानते हैं, परंतु ‘व’ द्वयोष्ठ्य व्यंजन है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

(iii) दंत्य-जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा दांत को स्पर्श करती है। ऐसे उच्चरित व्यंजन दंत्य कहलाते हैं; जैसे-त, थ,द, ध, न, स। दंत्य ध्वनियाँ दंत व वर्क्स दोनों के बीच उच्चरित होती हैं।

(iv) मूर्धन्य-जिन व्यंजन ध्वनियों का उच्चारण मूर्धा से होता है, उन्हें मूर्धन्य कहा जाता है। इनके उच्चारण में जीभ को कठोर तालु के पिछले भाग में स्थित मूर्धा का स्पर्श करना पड़ता है। ट, ठ, ड, ढ ण, ड़ एवं ढ़ आदि मूर्धन्य व्यंजन हैं।

(v) तालव्य-जिन व्यंजन ध्वनियों का उच्चारण तालु स्थान से होता है, उन्हें तालव्य कहते हैं। इनके उच्चारण में जीभ का अगला भाग तालु को छूता है; जैसे-च, छ, ज, झ, ञ, य तथा श।

(vi) कंठ्य-जिन व्यंजन ध्वनियों का उच्चारण कंठ से होता है, उन्हें कंठ्य व्यंजन कहते हैं। इन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ, का पिछला भाग कोमल तालु को छूता है,

इसीलिए कुछ भाषा वैज्ञानिक कंठ्य व्यंजन को कोमल तालव्य व्यंजन मानते हैं। क, ख, ग, घ, ङ कंठ्य ध्वनियाँ हैं।

ध्वनि गुण-ध्वनियों के साथ कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जिन्हें ध्वनियों से अलग नहीं किया जा सकता, परंतु वे अपने आप में ध्वनि नहीं होते, इन्हें ध्वनि गुण कहा जाता है।

भाषाविज्ञान में इन्हें खंडेतर ध्वनियां (Supra Segmental) कहते हैं। ये ध्वनि गुण मात्रा, बलाघात, सुर, अनुनासिकता और संगम आदि के रूप में ध्वनियों में विद्यमान होते हैं।

मात्रा-किसी ध्वनि के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसे हम उस ध्वनि की मात्रा कहते हैं। इसी के आधार पर स्वरों को ह्रस्व एवं दीर्घ कहा जाता है। यदि ये मात्राएं अर्थभेदक होंगी, तो वे ध्वनि स्वनिमिक होती हैं।

हिंदी में स्वरों के मात्रा-भेद के उदाहरण इस प्रकार हैं कल-काल जल-जाल मिल-मील दिन – दीन तुल -तूल आदि। BHDLA 135 Free Solved Assignment

हिंदी में व्यंजन ध्वनियों में भी काल-मात्रा होती है। इसके कारण अर्थभेद भी होता है, परंतु यह काल-मात्रा लेखन में व्यंजन के द्वित्व के रूप में प्रयोग करने की परंपरा है; जैसे-पका-पक्का, सजा-सज्जा, पता-पत्ता आदि।

बलाघात-बोलते समय कभी-कभी किसी ध्वनि पर विशेष जोर दिया जाता है। इसे ही सामान्यतः बलाघात कहा जाता है।

किसी विशेष ध्वनि पर वाक्य अथवा पद की अन्य ध्वनियों की अपेक्षा उच्चारण में अधिक प्राणशक्ति लगाना बलाघात कहलाता है।

बलाघात का अर्थ है-शक्ति अथवा वेग की वह मात्रा, जिससे कोई ध्वनि या अक्षर उच्चरित होता है। इस शक्ति के लिए फुफ्फुस को एक प्रबल धक्का देना पड़ता है।

परिणामतः एक अधिक बलवाला निःश्वास फेंकना पड़ता है, जिससे प्रायः ध्वनि में उच्चता की प्रतीति होती है।

कम अथवा अधिक आघात का प्रयोग कुछ भाषाओं में अर्थ परिवर्तन का कारण भी होता है; जैसे-अंग्रेजी के Present शब्द में यदि प्रथम अक्षर पर अधिक बल दिया जाए तो ‘Present’ (उपस्थिति) का अर्थ होता है और यदि दूसरे अक्षर पर बल दिया जाए तो Present (उपहार) देने का अर्थ होता है

सुर-ध्वनि को उत्पन्न करने वाली कंपन की आवृत्ति ही सुर का प्रमुख आधार होती है। इसी आधार पर इसे उच्च या निम्न कहा जा सकता है। सुर का प्रमुख आधार स्वरतंत्री होती है।

चूंकि प्रत्येक व्यक्ति की स्वरतंत्री एक जैसी नहीं होती। इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति का सुर एक जैसा नहीं होता। सुर के तीन भेद बताए गए हैं-उच्च, निम्न और सम।

उच्च में सुर नीचे से ऊपर जाता है, निम्न में ऊपर से नीचे आता है और सम में बराबर रहता है। इसे आधुनिक भाषाविज्ञान में उच्च 6122 सुर, निम्न सुर और सम सुर कहा गया है।

अनुनासिकता-अनुनासिक खंडेतर (Segmental Phoneme) ध्वनि है। इसे स्वरगुण के रूप में जाना जाता है। अनुनासिकता अर्थभेदक इकाई है; जैसे-साँस-सास, सँवार-सवार, भाँग-भांग आदि।

संगम अथवा संहिता-जिन भाषिक ध्वनियों का प्रयोग वाक्य में होता है, उन ध्वनियों की सीमाओं का स्पष्ट होना अनिवार्य होता है। किन्हीं दो भाषिक इकाइयों (ध्वनियों) के बीच कुछ क्षण के लिए रोका जाता है, तो उस अनुच्चरित समय का सीमांकन होता है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

इस प्रकार के समय सीमांकन को संहिता या संगम कहा जाता है। यदि उपयुक्त संगम या संहिता न हो, तो अभिप्सित अर्थ से परे अर्थ मिलने की संभावना बढ़ जाती है; जैसे

खा + ली = खाली। 
पी + ली = पीली। 
उग + आया है = उगाया है। 
 बंद + रखा गया = बंदर + खा गया। 
रोको मत + जाने दो = रोको + मत जाने दो।

भारतीय प्राचीन शास्त्रों में अनेक ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि शुद्ध उच्चारण का कितना महत्त्व था। यदि ‘इंद्रशत्रु’ में प्रथम अक्षर पर उदात्त हो,

तो बहुव्रीहि समास होगा और अर्थ होगा-‘इंद्र है शत्रु जिसका’ और यदि अंतिम अक्षर पर उदात्त होगा, तो तत्पुरुष समास होगा, अर्थ होगा-इंद्र का शत्रु। इस प्रकार सुर-भेद से अर्थभेद हो जाता था।

एक-एक अक्षर के शुद्ध उच्चारण का महत्त्व प्राचीन भारतीय परंपरा में भी था। पाणिनीय ‘शिक्षा’ (ध्वनिविज्ञान) में एक स्थान पर आया है। जब किसी मंत्र में कोई अक्षर कम हो तो जीवनक्षय हो सकता है और जब अक्षर उचित सुर के साथ न पढ़ा जाए,

तो इससे पढ़ने वाला व्याधि से पीड़ित हो सकता है और कोई अक्षर अशुद्ध ही उच्चरित किया जाए, तो वह उच्चरित रूप दूसरे के सिर पर वज्र की तरह पड़ता है।

प्रश्न 3. विज्ञान के क्षेत्र में प्रयुक्त हिंदी की विशेषताएँ सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-ज्ञान-विज्ञान के जटिल विषयों को सरल और सुबोध भाषा में कैसे पेश किया जाता है, इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए

(1. पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग से बचना और उनके स्थान पर उनके निहित भावों या विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना; जैसे

पारिभाषिक

. जल-जमीन दोनों में रह सकने वाले जानवर
. आकाश में उड़ सकने वाले प्राणी
. जल में रहने वाले प्राणी

शब्द BHDLA 135 Free Solved Assignment

. उभयचर
. नभचर
. जलचर

नीचे कुछ और जानवरों के वैज्ञानिक नाम दिये गये हैं। आप सरल लेखन में विस्तृत व्याख्या वाले शब्द लिख सकते हैं, विज्ञान में पारिभाषिक शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

(i) रेंगने वाले जानवर सरीसृप
(ii) बच्चों को दूध पिलाने वाले जानवर स्तनपायी

(iii) अंडे देने वाले प्राणी अंडज
(iv) जिस युग में मानव ने पहली बार पत्थर के औजार बनाये पाषाण युग
(v) जमीन पर रहने वाले जानवर (थलचर)

(2. वैज्ञानिक अवधारणाओं की सूत्रबद्ध परिभाषाओं से बचना और उनके स्थान पर उन्हें सोदाहरण व्याख्यायित करनाउदाहरण-जो जानवर अपने को बदलकर आसपास की चीजों से मिला देते हैं,

उनका जिंदा रहना ज्यादा आसान होता है। उक्त व्याख्या विकासवाद के एक नियम ‘अनुकूलन के सिद्धांत’ पर आधारित है।

(3. सरलता का मतलब विचारों में परिवर्तन करना नहीं है, सिर्फ उन्हें सबकी समझ में आ सकने वाली भाषा में, तार्किक क्रमबद्धता और व्यवस्था के साथ पेश करना चाहिए, ताकि वैज्ञानिक अवधारणाओं के मूल भाव की रक्षा हो सके।

(4. सरल और सुबोध भाषा के लिए जहां तक संभव हो, छोटे और सरल वाक्य बनाना, ऐसे शब्दों का प्रयोग करना, जो आम चलन में हों तथा वैज्ञानिक नामों की बजाय लोक में प्रचलित नामों का उपयोग करना।

उदाहरण-पहली चीज, जिसका आदमी ने पता लगाया, वह शायद आग थी। आजकल हम दियासलाई से आग जलाते हैं, लेकिन दियासलाइयां तो अभी हाल में बनी हैं।

उपर्युक्त तीनों वाक्य एक वाक्य में-मनुष्य ने सबसे पहले आग का पता लगाया, यद्यपि दियासलाई का आविष्कार अभी हाल ही की घटना है। BHDLA 135 Free Solved Assignment

दूसरा उदाहरण-इन्हीं नए पाषाण युग के आदमियों ने एक बहुत बड़ी चीज निकाली। यह खेती करने का तरीका था। उन्होंने खेतों को जोतकर खाने की चीजें पैदा करनी शुरू की। उनके लिए यह बहुत बड़ी बात थी।

उपर्युक्त चार वाक्यों का एक वाक्य-नव पाषाण युग के लोगों ने कृषि करना सीखा, जो उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।

उर्दू के शब्द-हिंदी और उर्दू एक ही क्षेत्र की भाषाएं हैं। दोनों खड़ी बोली से विकसित हुई हैं, इसलिए दोनों में कई समानताएं हैं। उर्दू में अरबी और फारसी के शब्द ज्यादा हैं।

ऐसे हजारों शब्द हिंदी में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। इन अरबी और फारसी के शब्दों को उर्दू शब्द के रूप में पहचाना जाता है।

कुछ उर्दू शब्द देखिए-शुरू, जानवर, चीज, जानदार, दुनिया, सिर्फ, अगर, वजह, ज़रूर, जमाना, जमीन, जिन्दा, मुश्किल, सख्त, अजीब, आसान, कसरत बर्फ सफेद, दरख्त, दुश्मन मुल्क कोशिशः तादाद, दरजा मालूम, मुमकिन आदमी तब्दीली, तरफ, किस्म, पैदा, दरिया, खुश्की, बाज, तरक्की, ताकतवर, मिसाल, हिफाजत, मालिक, फायदा, औजार, मुकाबला, तरीका, नमूना, गुजरना, मयस्सर।

उर्दू शब्द हिंदी में इतने घुल-मिल गये हैं कि उनकी पहचान मुश्किल से होती है। शब्दकोश से हम पहचान सकते हैं कि शब्द कौन-सी भाषा से आया है।

इसके अलावा जिन शब्दों के नीचे नुक्ता (बिंदी) लगा हो, वे आमतौर पर उर्दू के शब्द होते हैं; जैसे-बर्फ, तरक्की, तरफ आदि। हिंदी के अपने शब्दों में नुक्ते नहीं लगते।

क, ख, ग़, ज़, फ़, सिर्फ अरबी-फारसी शब्दों में आते हैं। ये संस्कृत या हिंदी के शब्दों में नहीं आते। यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अंग्रेजी से आए कुछ शब्दों में भी नुक्ता लगता है,

जैसे-ज़ेबरा, ज़िप, फैक्टरी, फेल आदि। अरबी-फारसी में ‘क’, ‘ग’, ‘ज़’ के साथ-साथ ‘क’, ‘ग’, ‘ज’ की ध्वनियां भी हैं, किंतु ‘ख’, ‘फ’ की ध्वनियां नहीं हैं।

‘फ’, ‘ख’ का प्रयोग हिंदी के अपने शब्दों वे साथ ही होता है; जैसे-‘फल, सफल, फूल’। यहां “फल, सफल, फूल” नहीं लिखना चाहिए। इस तरह की गलती, लिखने से अधि क बोलने में होती है।

अरबी-फारसी में फ़ का ही प्रयोग होगा; जैसे–फन, फ़रियाद, फ़साद, फ़तेह, सिर्फ आदि। अरबी-फारसी के कुछ शब्द हिंदी की प्रकृति के अनुसार ढल गये हैं, उनको आम प्रचलित रूप में भी लिखा जाता है।

संदेहार्थ वाक्य BHDLA 135 Free Solved Assignment

(क) गुफाओं में अंधेरा होता था, इसलिए मुमकिन है कि वे चिराग जलाते हों।
(ख) वे पकाना भी नहीं जानते थे, हां शायद मांस को आग में गर्म कर लेते हों।
(ग) वह कमरे में नहीं है, शायद रसोई में हो।

तीनों वाक्यों को ध्यान से पढ़िए। इन वाक्यों में अतीत या वर्तमान में किसी घटना के होने के बारे में संदेह व्यक्त किया गया है यानि ऐसा नहीं भी हो सकता है। ये संदेहार्थक वाक्य हैं।

संभावनार्थक वाक्य

(क) उस जमाने में आजकल से ज्यादा समुद्र और दलदल रहे होंगे।
(ख) इस समय गावस्कर बल्लेबाजी कर रहा होगा।
(ग) तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो आदमी को गुफाओं में रहना होगा।

आप तीनों वाक्यों को ध्यान से पढ़िए। पहले वाक्य में अतीत में घटना होने की संभावना व्यक्त की गई है। दूसरे वाक्य में वर्तमान में घटना होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। तीसरे वाक्य में भविष्य में घटना होने की संभावना व्यक्त की गई है।

अन्य उदाहरण

(क) आदमियों का रहना बहुत मुश्किल होगा और उन्हें बड़ी तकलीफ के दिन काटने पड़ते होंगे।

(ख) शुरू-शुरू में जब आदमी पैदा हुआ तो इसके चारों तरफ बड़े-बड़े जानवर रहे होंगे और उसे उनसे बराबर खतरा लगा रहता होगा।

संभावनार्थक वाक्य और संदहार्थक वाक्य में मूल अंतर यह है कि दोनों में क्रिया के होने की संभावना का स्तर अलग-अलग होता है। पहली तरह के वाक्य में वक्ता/लेखक को क्रिया के होने में कुछ-कुछ विश्वास होता है,

किंतु उसे निश्चित जानकारी नहीं है। जबकि दूसरे तरह के वाक्य में क्रिया के होने से उसे संदेह है। वहां विश्वास नहीं है. केवल अनुमान है।

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प्रश्न 4. निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए।

(क) प्रयोजनमूलक हिंदी और सामान्य हिंदी में अंतर?

उत्तर-प्रयोजनमूलक हिन्दी में प्रयोजन शब्द का अर्थ है-‘उद्देश्य’। जिस भाषा का प्रयोग किसी विशेष प्रयोजन के लिए किया जाए, उसे ‘प्रयोजनमूलक भाषा’ कहा जाता है।

हिंदी में प्रयोजनमूलक हिन्दी शब्द functional language’ के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, जिसका तात्पर्य है- जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयोग में लायी जाने वाली भाषा।’

इसका प्रमुख लक्ष्य जीविकोर्पान का साधन बनना होता है। यह हिंदी साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन, कार्यालय, मीडिया, बैंक, विधि, कृषि, वाणिज्य, तकनीकी, विज्ञापन, विज्ञान, शैक्षिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग में ली जा रही है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

विभिन्न व्यवसायों से संबंधित व्यक्तियों जैसे- डॉक्टर, वकील, पत्रकार, मीडियाकर्मी, व्यापारी, किसान, वैज्ञानिक आदि के कार्य-क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषा ही ‘प्रयोजनमूलक’ भाषा कहलाती है।

प्रयोजनमूलक हिंदी का व्यक्तिगत अर्थ है- वह हिंदी जिसका प्रयोग प्रयोजन विशेष के लिए किया जाए।

साथ ही इस हिंदी के माध्यम से ज्ञान विशेष की प्राप्ति और विशिष्ट सेवात्मक क्षेत्रों में कौशल, निपुणता एवं प्राणिण्य प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

प्रयोजनमूलक भाषा का क्षेत्र सीमित होते हुए भी यह कमी भी साधन से साध्य नहीं बनती है। इसका लक्ष्य सेवा-माध्यम होता है, जो जीविकोपार्जन का साधन बनता है।

डॉ. अर्जुन चव्हाण ने प्रयोजनमूलक हिंदी के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं

• हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता से परिचित कराना।
• स्वयं रोजगार उपलब्ध कराने में युवकों की मदद करना।

• विविध सेवा-क्षेत्रों में युवक-युवतियों को सेवा के अवसर उपलब्ध करा देना।
• रोजी-रोटी की समस्या हल करने में छात्र सक्षम हो, इस दृष्टि से उसका पाठ्यक्रम तैयार करना।

• अनुवाद कार्य को बढ़ावा देना तथा इसके जरिए सफल अनुवादक तैयार करना।
• कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली हिंदी भाषा का समग्र ज्ञान प्रदान करना।

सामान्य हिंदी :

प्रयोग के आधार पर हमारे समक्ष भाषा के दो रूप उपस्थित होते हैं औपचारिक भाषा रूप तथा अनौपचारिक भाषा रूप। आम बोलचाल में हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, उसका रूप अनौपचारिक होता है।

इस रूप में सामान्य हिंदी से तात्पर्य हिंदी के उस रूप से जिसका प्रयोग हम दैनिक कार्यों के संदर्भ में करते हैं।

इसका अभ्यास हमें बचपन से ही होता है क्योंकि इसका संबंध हमारे जीवन के विभिन्न संदर्भो से ही होता है। इसके प्रयोग के लिए हमें विशिष्ट प्रयास नहीं करना पड़ता, वरन सहज रूप से जो कुछ भी हम बोलते हैं, वह इसके अंतर्गत आ जाता है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

आजकल बड़े शहरों में शिक्षित वर्ग के बीच सामान्य हिंदी का एक अलग ही स्वरूप दिखाई देने लगा है, जो हिंदी अंग्रेजी मिश्रित रूप है। वैसे तो हिंदी में अनेक अंग्रेजी शब्दों को स्वीकार कर लिया गया है तथा ये हिंदी की शब्दावली में घुलमिल भी गए हैं,

परन्तु हिंदी बोलते समय बीच-बीच में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना आज एक आम बात हो गई है। अनायास ही हिंदी का यह स्वरूप आज उभर रहा है। आप कभी दो लोगों की बातचीत को ध्यान से सुनिए तथा उस बातचीत में आए अंग्रेजी शब्दों की सूची बनाइए।

आप देखेंगे कि इस तरह की शब्दावली आपको पर्याप्त मात्रा में मिल जाएगी, विशेषरूप से शिक्षित युवावर्ग में नीचे दिए गए कुछ वाक्यों पर ध्यान दीजिए आप पायेंगे कि इस प्रकार की हिंदी का प्रयोग हर दूसरे व्यक्ति के यहाँ से सुनने को मिल जाता है

(1. आज मैं स्टेशन अपने फादर को सी आफ करने मदर के साथ गई थी।

(2. जब तक रिजल्ट आउट नहीं होगा, तब तक टेंशन बनी रहेगी।

(3. आज का स्टूडेंट बहुत फ्रस्ट्रेटेड है। इतना हार्डवर्क करके भी कहीं एडमिशन नहीं मिलता।

(4. यार, आज तो मूवी देखी जाए। डिनर बाहर ही कर लेंगे। अच्छा इंज्वायमेंट रहेगा।

(5. पेपर्स जल्दी लाओ। सिंगनेचर्स करके अभी हेड भिजवाना है। थोड़ा भी डिले हो गया तो एक्सप्लानेशन कॉल हो जाएगी।

कहने का तात्पर्य यह है कि सामान्य हिंदी आम बालेचाल की हिंदी होती है जिसका प्रयोग हम अपने दैनिक जीवन में विविध संदर्भो में करते हैं। हम अपने से बड़ों से बातचीत करते हैं, अपने मित्रों से भी बात करते हैं तथा अन्य विभिन्न लोगों से बातचीत करते हैं।

सामान्य बोलचाल के इस स्तर पर निश्चित रूप से हम यह भेद करते हैं। कि हम किससे बात कर रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं तथा बात करने का प्रयोजन क्या है? पर यहाँ इतना तो स्पष्ट है कि सभी स्थितियों में हम बोलचाल के रूपों का ही इस्तेमाल करते हैं। BHDLA 135 Free Solved Assignment

(ख) कार्यालयी हिंदी

उत्तर-कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही बढ़ा है, लेकिन सरकारी कार्यालयों में जो पद्धति अपनायी गई,

उसका स्वरूप अंग्रेजी शासन व्यवस्था के समान ही रहा, इसलिए कार्यालयी कामकाज के लिए अनुवाद का सहारा लिया गया। संपूर्ण कार्यविध साहित्य अंग्रेजी में था।

कार्यालयी हिंदी के विकास में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कार्यालयी हिंदी में सरलता, स्पष्टता और बोधगम्यता प्रशासन ने आम जनता के लिए की है, जिससे उन्हें समझने में आसानी हो सके।

कार्यालयी भाषा औपचारिक होती है तथा इसकी औपचारिकता अधिकारी तंत्र के पदानुक्रम पर भी आधारित होती है। इसके साथ इसमें पारिभाषिक शब्दावली का सुनिश्चित अर्थ में प्रयोग होता है।

भाषा का मुख्य उद्देश्य है अपनी बात सामने वाले से या जिसके लिए प्रयुक्त हो उसे आसानी से समझाई जा सके वह आसानी से ग्राह्य हो।

समस्त उपबंधों के होते हुए भी आम लोगों में यह धारणा है कि हिन्दी का प्रयोग कठिन होगा क्योंकि साहित्यिक हिंदी अपेक्षाकृत कठिन होता है और यदि इस हिंदी का प्रयोग आम पत्राचार में किया जाए तो हास्यास्पद या समझने में कठिनाई आएगी।

शायद इसी भ्रम के करण लोग हिंदी को अपनाने से कतराते हैं। इस समस्या के निजात के लिए भारत सरकार, राजभाषा विभाग द्वारा आसान हिंदी के प्रयोग पर बल दिया जाता है।

आसान हिंदी का अर्थ है- स्थानीय एवं आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए किया जाए। इस प्रकार से हिंदी का प्रचलन बढ़ेगा। BHDLA 135 Free Solved Assignment

चूंकि हमारा देश विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों से युक्त है अतः आसान हिंदी समझ पाना सबके लिए आसान होगा तथा क्षेत्र विशेष के प्रचलित शब्दों के प्रयोग से भाषा की धारा भी सुचारु रूप से चलती रहेगी तथा इससे हिन्दी का प्रयोग भी बढ़ेगा।

आमतौर पर देखा गया है कि आसान शब्दों को ग्रहण करने में जितनी आसानी होगी, उतनी ही कठिनाई एवं भारी भरकम शब्दों के साथ आएगी। जिन सरकारी कार्यालयों में इस विधि का अनुसरण किया गया, वहाँ हिंदी का प्रचार प्रसार अपेक्षाकृत अधिक ही हुआ।

उदाहरणस्वरूप अंग्रेजी का शब्द approval के लिए हिंदी के कई विकल्पों का प्रयोग किए जा सकता है, जो अनुमोदन, संस्तुति आदि हो सकता है।

यह भी प्रावधान किया गया कि यदि कोई कार्मिक हिंदी लिखने में वर्तनी संबंधित यदि कोई त्रुटि भी करता है,

तो उसे इस बात के लिए हतोत्साहित करने की बजाय प्रोत्साहित किया जाए कि उसने हिंदी में लिखने का प्रयास तो प्रारम्भ किया। कई बार ऐसा देखा गया ही कि अंग्रेजी में प्राप्त पत्रों को हिंदी में अनूदित करवाने की आवश्यकता पड़ जाती है।

अनुवाद करते समय अधिकांशतः लोग शब्दानुवाद का प्रयास करते हैं। शब्दानुवाद कुछ हद तक तो ठीक है पर जब हम यह अनुवाद आसानी से भाषा के कथ्य को समझने के लिए करते है

तो कहीं-कहीं शब्दानुवाद के कारण उस विषय का मूल अर्थ भारी और उबाऊ होने के साथ समझ से परे हो जाता है।

ऐसे में यह सलाह दी जाती है कि भावानुवाद किया जाए तथा दिये गए अंग्रेजी पाठ के मूल कथ्य को प्रदर्शित किया जाए ताकि उसे समझने में आसानी हो तथा उसके अनुरूप पत्राचार किया जा सके।

सरकारी कामकाज में पहले देखा गया है कि अंग्रेजी के कुछ ऐसे वाक्य होते हैं, जिनका हिंदी अनुवाद बड़ा ही कठिन लगता है या हिंदी में उन शब्दों या वाक्यों का प्रयोग करना बड़ा ही अटपटा लगता है,

जैसे- I am directed to say / I am directed to forward… ऐसा माना जाता है कि पत्र जारी करने वाला अधिकारी अपने से कुछ नहीं कर रहा है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

वह सरकार के अनुदेश पर समस्त कार्य करता है. इसीलिए हमेशा पत्राचार में यह वाक्य प्रयोग किया जाता है। इनका हिन्दी में अनुवाद मुझे यह कहने का निदेश हुआ है/मुझे…. अग्रेषित करने का निदेश हुआ है।

अंग्रेजी के पत्र में सम्बोधन के लिए Dear Sir का प्रयोग होता है, पर हिंदी में महोदय लिखा जाता है। अंग्रेजी पत्राचार में Yours faithfully, लिखा जाता है, पर इसके हिंदी रूप में आपका विश्वासी लिखना कतई उपयुक्त नहीं होगा। इसके स्थान पर हम ‘भवदीय’ लिखते हैं।

कार्यालयीन हिन्दी एवं अंग्रेजी में यदि हम अंतर देखें का प्रयास करें, तो सदा यह सलाह दी जाती है कि आसान हिन्दी का प्रयोग करें। इसके लिए आपके मन में जो विचार आता है,

या जो कहा जाना है उसे साफ एवं स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें। राजभाषा अधिनिय के उपबंधों के अनुसार हिन्दी में प्रस्तुत किए गए मसौदे या नोट के लिए कोई भी अधिकारी उसके अंग्रेजी अनुवाद की मांग नहीं कर सकता है।

चूंकि बहुत कम लोग ही सीधे अंग्रेजी में सोचकर अपनी बात अंग्रेजी में ही लिख पाने में समर्थ होते हैं, अधिकांशत: आम भारतीय कोई भी बात अंग्रेजी में लिखने से पूर्व अपने मातृभाषा में सोचता है फिर उन शब्दों या वाक्यों को मन ही मन अंग्रेजी में अनूदित करने का प्रयास करता है।

अब अनुवाद की प्रक्रिया में हमेशा व्याकरणिक शुद्धियों का ध्यान रखना पड़ता है। यदि थोड़ी सी अशुद्धि हो जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाने का अंदेशा रहता है। अंग्रेजी लिखने के इस प्रयास में अत्यधिक मानसिक श्रम करना पड़ता है ।

इसके इतर यदि हम हिन्दी में लिखने का प्रयास करते हैं तो हमें अधिक श्रम करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

हिन्दी में लिखने का सबसे बड़ा फाइदा यही है कि वाक्य संरचना में शब्दों की क्रम यदि आगे पीछे भी हो जाए तो वाक्य का अर्थ नहीं बदलता है । और फिर अपनी भाषा में अपनी बात कहना अधिक आसान होता है।

हिन्दीतर भाषाई क्षेत्र के लोगों के लिए भी अपने मातृभाषा से अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में कोई बात अनूदित कर कहना अत्यधिक आसान होता है। ऐसे में हिन्दी में सरकारी काम अत्यधिक आसान होता है । बस मन का डर दूर कर प्रयास करने की आवश्यकता है।

भाग – 2

प्रश्न 5. भाषण की शैलीगत विशेषताएँ बताते हुए संबोधन कारक का परिचय दीजिए।

उत्तर-लेखन की भाषा और भाषण (बोलचाल) की भाषा में फर्क होता है। यदि वक्ता ने भाषण देने से पूर्व उसे लिखित रूप नहीं दिया है, तो वक्ता को बोलते हुए अपने वाक्य की रचना करनी पड़ती है, भाषण में छोटे-छोटे वाक्य होते हैं, जो कई उपवाक्यों से मिलकर बनते हैं।

लिखित भाषा की तरह लंबे, मिश्रित एवं जटिल वाक्य नहीं होते हैं, वक्ता अपने भाषण द्वारा अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए बात पर बल देने तथा लोगों को प्रभावित करने के लिए एक ही शब्द या वाक्य को कई रूपों में दोहराता है।

वक्ता, श्रोताओं को अपनी बातों में शामिल करने के लिए उन्हें प्रत्यक्ष संबोधित करता है।

  1. पुनरावृत्ति-वक्ता भाषण में अपनी बात को स्पष्ट करने तथा उस पर बल देने के लिए बातों की पुनरावृत्ति करता है। उदाहरण के लिए, पाठ के रूप में इस इकाई में दिए जाने वाले भाषण के निम्नलिखित अंश प्रस्तुत हैं।

(क) आज का दिन, यह 13 अगस्त का दिन भारतवर्ष के लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इस दिन हमने एक नया पन्ना पलटा।

यहाँ रेखांकित वाक्यों में, कथन की पुनरावृत्ति है, जो अपनी बात को स्पष्ट करने तथा उस पर बल देने के लिए प्रयुक्त हुई है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

(ख) वर्षगाँठ चाहे व्यक्ति की हो, वर्षगाँठ चाहे देश की हो, एक शुभ अवसर होता है, खुशी का दिन होता है।
इस वाक्यांशों में भी पुनरावृत्ति अपनी बात पर बल देने के लिए है।

(ग) वक्ता अपनी भाषण में पुनरावृत्ति के लिए एक ही शब्द के कई पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग भी कर सकता है, जिससे उसकी बात पर अधिक-से-अधिक बल पड़े, जैसे

श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे राधा! जाकर अपनी सखी, सहेलियों से कह दो मेरे जैसा मित्र, सहचर नहीं मिलेगा। (इस वाक्यांश में सखी, सहेली, मित्र एवं सहचर पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग बल देने के लिए किया गया है।)

  1. वाक्य-क्रम-भाषण की भाषा कुछ अव्यवस्थित होती है, क्योंकि वक्ता अपनी बातों को क्रम देते हुए बोलता है। भाषण की भाषा में लिखित भाषा की तरह पदों का क्रम तथा संगठन नहीं होता है।

उदाहरणार्थ हमारे जो प्रश्न हैं, वे बहुत बड़े हैं, लेकिन ऐसे नहीं है कि जो हिम्मत से काबू नहीं कर सकें उन पर।
उदाहरण में दिया गया वाक्य हिंदी व्याकरण के अनुसार गलत है, लेकिन बोलते समय भाषा के इस रूप में प्रयोग को दोष/गलत नहीं माना जाता है।

इसका सही वाक्य क्रम होगा-हमारे जो प्रश्न हैं, वे बहुत बड़े हैं, लेकिन ऐसे नहीं हैं कि उन पर हिम्मत से काबू नहीं किया जा सके।

हिंदी के वाक्यों में प्राय: पहले कर्ता फिर कर्म और अंत में क्रिया का प्रयोग होता है। जैसे- ‘मीरा स्कूल जाती है।’

      कर्ता,   कर्म,   क्रिया
      'मीरा' 'स्कूल' 'जाती है' 
  1. उपवाक्य-ऐसा पदसमूह, जिसका अपना अर्थ हो, जो एक वाक्य का भाग हो और जिसमें उद्देश्य और विधेय हो, उपवाक्य कहलाता है। उपवाक्यों के आरम्भ में अधिकतर ‘कि’, ‘जिससे’, ‘ताकि’, ‘जो’, ‘जितना’, ‘चूंकि’, ‘यदि जब’, ‘जहाँ’ इत्यादि समुच्चयबोधक लगे होते हैं।

वक्ता अपने भाषण में उपवाक्यों का अधिक प्रयोग करता है, जिससे वाक्य-रचना ऐसी होती है कि कथ्य स्पष्ट होने के साथ-साथ बात पर भी पूरा बल पड़े, ताकि सुनने वाले प्रभावित हों।

वाक्य, शब्दों का ऐसा समूह है जिससे पूरा विचार प्रकट होता है, लेकिन जब कोई पूरा विचार एक से अधिक वाक्यों में प्रकट होता है और उन्हें एक ही वाक्य में प्रस्तुत किया जाता है, तब उनमें से प्रत्येक बाक्य को उपवाक्य कहते हैं। BHDLA 135 Free Solved Assignment

जैसे-“यह सभी जानते हैं कि शिक्षा व्यक्ति का मूल अधिकार है, लेकिन शिक्षा प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को स्वयं परिश्रम करना पड़ता है।” इस वाक्य में दो उपवाक्य हैं।.

(i) यह सभी जानते हैं कि………….अधिकार है

(ii) (लेकिन) ‘शिक्षा प्राप्त करने……………परिश्रम करना पड़ता है।’ ।

बोलने और लिखने, दोनों तरह की वाक्य रचनाओं में उपवाक्यों का प्रयोग किया जाता है, परंतु बोलने की भाषा में इसका अत्यधिक प्रयोग होता है। भाषण में उपवाक्य पूरी वाक्य रचना में बिखरे होते हैं, लेकिन लिखित में वाक्य-रचना छोटी और गठीली होती है।

जैसे-आज बाजार बंद था, इसलिए वहाँ पर कुछ भी नहीं मिला। (भाषण का वाक्य) (11 शब्द) लिखने की भाषा में वाक्य रचना-बाजार बंद होने के कारण कुछ भी नहीं मिला। (भाषण का वाक्य)(9 शब्द)

संबोधित करना : वक्ता के भाषण में संबोधन की भाषा होती है, जिससे वह अपने श्रोताओं को सीधे संबोधित करता है। भाषण में वाक्य की शुरुआत इस प्रकार होती है।

जैसे-‘आप जानते हैं कि’, ‘यहाँ पर खड़े होकर’, ‘हमारे किसान भाई’, ‘मजदूर भाइयो’, ‘मैं यहाँ बता देना चाहती हूँ’ आदि।
भाषण में वाक्य कई बार अपने श्रोताओं को अलग-अलग वर्गों में बाटकर उनसे संबंधित बिन्दुओं पर अपने भाषण को केंद्रित करता है।

संबोधन कारक :

संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जिससे किसी को बुलाने, पुकारने या बोलने का बोध होता है; जैसे-मेरे प्यारे देशवासियो! मेरे भाइयो! बहनो! आदि, तो इस तरह के शब्दों को ही व्याकरण में संबोधन कारक कहते हैं। संबोधन की पहचान विस्मयादिवाचक चिह्न (!) से होती है।

संबोधन कारक की रचना निम्न प्रकार से देख सकते हैं

        एकवचन        बहुवचन

पुल्लिग बालक! बालको
स्त्रीलिंग लड़की! लड़कियो!

संस्कृत भाषा में संबोधन कारक के कुछ अन्य रूप भी मिलते है। मूल शब्द के साथ संबोधन कारक के कुछ निम्नलिखित उदाहरण —

मूलशब्द संबोधन

प्रिय प्रिये!
राधा राधिके!
ब्राह्मण हे ब्राह्मण
बालिका बालिके!

प्रश्न 6. निबंध रचना के नियमों के आधार पर विद्यार्थी जीवन में अनुशासन महत्व’ विषय पर निबंध लिखिए।

उत्तर-अनुशासन वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति का एक नियंत्रित व्यवहार है, जो हर कायदे और नियम का पालन करता है और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि नियमों का पालन कहाँ किया जा रहा है।

विद्यार्थी का जीवन मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला है। किसी भी बच्चे का सबसे पहला शिक्षक उसका परिवार ही होता है। परिवार से ही बच्चे को हर प्रकार की प्रारम्भिक शिक्षा मिलती है और अनुशासन की शिक्षा भी सबसे पहले परिवार ही देता है।

अनुशासन कोई सजा नहीं है, यह तो बस एक कड़वी दवा है। परिवार और विद्यालय ये दोनो ही बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाते है। अनुशासन में संस्कार का दायित्व मिला होता है और इन संस्कार से व्यक्ति मे अनुशासन आता है। BHDLA 135 Free Solved Assignment

अनुशासन हीन व्यक्ति सदैव असफलता और लालच से घिरा होता है और वह समाज को भी नष्ट कर सकता है। अनुशासन उन अच्छी किताबों व उन अच्छे लोगो की तरह है,

जिन्हें अगर अपना लिया तो समझिये कि जीवन मे अब आपको आपका लक्ष्य प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता।

अनुशासन हमेशा आपको एक सफल इंसान बनाएगा और सफलता आपको अवश्य मिलेगी।

हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन का एक महत्वपूर्ण स्थान है। हमें हमेशा अनुशासन का पालन करना चाहिए। फिर हम स्कूल में हो या कॉलेज में, घर पर हो या बाहर।

किसी कार्यालय में काम करने वाले व्यक्तियों या फिर खेल के मैदान में कोई खिलाड़ी दोनों को ही अनुशासन का पालन करना चाहिए।

इसका पालन करने वाले लोगों को हमेशा तरक्की मिलती है। वे अपने सभी काम समय से पूरा कर लेते हैं। वह कम समय मे अधिक अनुभव प्राप्त कर लेते हैं।

अनुशासन वह डोर है, जो हमें सफलता तक ले जाती है, जैसे डोर बिन पतंग नहीं उड़ती, वैसे ही अनुशासन बिन सफलता नहीं मिलती। जिन लोगों के जीवन में अनुशासन की कमी होती है,

वह कभी भी अपना काम समय पर पूरा नहीं कर पाते और उन्हें कई प्रकार की कष्ट व कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

हम सभी अपने दैनिक जीवन में विभिन्न प्रकार से अनुशासन का पालन करते हैं, जैसेकुछ लोग सुबह जल्दी उठते हैं, कुछ रोज सुबह एक गिलास पानी पीते हैं, कुछ रोज सुबह उठकर व्यायाम करते हैं और विद्यार्थी भी सही समय पर यूनिफॉर्म में विद्यालय जाते हैं आदि।

ये सभी अनुशासन के ही उदाहरण हैं। अनुशासन हमारे जीवन का अभिन्न व अनिवार्य अंग है। अनुशासन से जीवन सुखमय तथा सुंदर बनता है। अनुशासनप्रिय व्यक्ति लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर लेते हैं।

हमें अनुशासन को अपनाकर अपने जीवन को सुखी, सुन्दर व सम्पन्न बनाना चाहिए।

अनुशासन एक ऐसी चीज है जो व्यक्ति को अच्छे नियंत्रण में रखती है। वह व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने और सफलता प्राप्त कर के लिए प्रेरित करती है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

हम में से हर एक ने अपनी आवश्यकता और जीवन के प्रति समाज के अनुसार विभिन्न रूपों में अनुशासन का अनुभव किया है। सभी के जीवन में इसकी उपलब्धता को सही रास्ते पर जाने के लिए आवश्यक है।

स्व-अनुशासन सभी के लिए आवश्यक है, क्योंकि आधुनिक समय में किसी के पास दूसरों को अनुशासन में रहने के लिए प्रेरित करने का समय नहीं है।

अनुशासन के बिना कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता है और अपने कैरियर में शैक्षणिक या अन्य सफलता का आनंद नहीं ले सकता है।

किसी को नियमित व्यायाम करने की आवश्यकता है। माता-पिता को आत्म अनुशासन की आदतों को विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों को एक अच्छा अनुशासन सिखाने की आवश्यकता होती है।

उन्हें हर समय अच्छा व्यवहार करने और सही समय पर सभी कामो को करने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है।

अनुशासन हमारे शरीर मन और आत्मा को नियंत्रण में रखने और परिवार में माता-पिता तथा शिक्षकों और बड़ों के आदेशों का पालन करने की शिक्षा देता है। अनुशासन का पूरे जीवन में बहुत महत्व है। यह हमें हमारे कार्यों को गंभीरता तथा समय से पूरा करना सिखाता है।

सूर्य हर दिन सही समय पर उगता है और सही समय पर ही अस्त भी होता है, चांद भी हमेशा अपने निश्चित समय पर ही दिखाई देता है और पूरी रात चमकता है, नदी हमेशा बहती है, माता-पिता अपने बच्चों से हमेशा प्यार करते हैं, शिक्षक हमेशा हमें सिखाते हैं।BHDLA 135 Free Solved Assignment

ऐसे ही अनुशासन हमारे कार्य को हमें सरलता से निश्चित समय पर पूरा करना सिखाता है। हमें समस्याओं से पीड़ित हुए बिना आगे बढ़ने के लिए अपने जीवन में अनुशासन का पालन करना चाहिए।

हमें अपने माता-पिता, बुजुर्गों व शिक्षकों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। हमें अनेक अनुभव के बारे में जानने और उनकी जीत और असफलताओं से सीखने के लिए उन्हें सुनना चाहिए।

जब भी हम किसी चीज को गहराई से देखना शुरू करते हैं, तो यह हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक देती है।

“अनुशासन की कमी प्रतिभावान लोगों को भी असफल बना देती है।”

मौसम सही समय पर बदलते रहते हैं। प्रकृति के सभी काम निश्चित रूप से अपने-अपने समय पर होते हैं, ताकि हमारे जीवन को संतुलित बनाया जा सके। इसलिए हमें भी धरती पर जीवन चक्र को बनाए रखने के लिए अनुशासन में रहने की आवश्यकता है।

अनुशासनहीनता जीवन में बहुत भ्रम पैदा करती है और व्यक्ति को गैर जिम्मेदार वह आलसी बनाती है। यह आत्मविश्वास के स्तर को कम करती है और मन को एक साधारण काम करने के बारे में अनिश्चित बनाती है।

हालांकि अनुशासन में रहना हमें जीवन की उच्चतम सीढ़ी की ओर अग्रसर करता है और हमें सफलता पाने में मदद करता है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

प्रश्न 7. पाठ्यक्रम में सम्मिलित इतिहास विषयक पाठ की वर्तनी की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर-इतिहास का प्रयोग विशेषतः दो अर्थों में किया जाता है। एक है प्राचीन अथवा विगत काल की घटनाएं और दूसरा उन घटनाओं के विषय में धारणा। इतिहास शब्द का तात्पर्य है ‘यह निश्चय था’।

इतिहास के अंतर्गत हम जिस विषय का अध्ययन करते हैं, उसमें अब तक घटित घटनाओं या उससे संबंध रखने वाली घटनाओं का कालक्रमानुसार वर्णन होता है।

दूसरे शब्दों में, मानव की विशिष्ट घटनाओं का नाम ही इतिहास है या फिर प्राचीनता से नवीनता की ओर आने वाली मानव जाति से संबंधित घटनाओं का वर्णन ही इतिहास है।

इन ऐतिहासिक साक्ष्यों का वर्णन ही इतिहास है। इन ऐतिहासिक साक्ष्यों को तथ्य के आधार पर प्रमाणित किया जाता है।

आधुनिक युग की उन्नति का आधार हमारा इतिहास है, इससे मानव को अपने अतीत का ज्ञान होता है। इतिहास का विषय-क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, क्योंकि जीवन के हर पहलू का बीता हुआ पल इतिहास की श्रेणी में आता है।

समाज में मानव का जीवन उसकी विभिन्न क्रियाओं के आधार पर विभिन्न ‘सामाजिक विज्ञानों’ के लिए विषयवस्तु की उत्पत्ति एवं विकास हुआ है।

पाठ्यक्रम में निर्धारित इकाई के अंतर्गत इतिहास की घटनाओं का वर्णन करते समय भाषा का रूप कैसे बदलता है तथा ‘इ’, ‘ई’, ‘ईय’, ‘इक’ और ‘इत’ प्रत्ययों का विवेचन करते हुए इनसे बनने वाले शब्दों का परिचय है।

उपर्युक्त प्रत्ययों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पारिभाषिक शब्दों को समझने और उनके उचित प्रयोग को जानने की आवश्यकता है। BHDLA 135 Free Solved Assignment

र्तनी संबंधी कुछ नियम : BHDLA 135 Free Solved Assignment

यह पाठ इतिहास विषय पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित है। इससे संबंधी कई शब्द प्रयुक्त हुए हैं; जैसे-आंदोलन, अधिवेशन, राष्ट्रीय, संगठित आदि। किसी विषय विशेष से संबंधित शब्दों की पारिभाषिक शब्द कहते है

प्रत्ययों से शब्द रचना :

एक शब्द में दूसरे शब्दों के मेल से भाषा के बहुत सारे शब्द बनते हैं; जैसे-दया शब्द से निर्दय, दयावान, दयनीय, दयालु आदि शब्द बनते हैं। इसे प्रत्यय-प्रयोग कहते हैं। प्रत्यय का सही ज्ञान होने से प्रत्ययों से बनने वाले शब्दों में वर्तनी दोष नहीं होता है।

(i) प्रत्यय ‘ईय’ से बनने वाले शब्दों में दीर्घ /ई/ होता है; जैसे-स्वर्गीय, शासकीय।
इन शब्दों में ‘स्वर्ग’ से ‘स्वर्गीय’ बनता है, बाकी शब्द भी इसी प्रकार बने हैं।

(ii) प्रत्यय ‘इत’ विभिन्न प्रकार के शब्दों में जुड़ता है; जैसे

             हर्ष - हर्षित 
             आनंद - आनंदित
             शोभा - शोभित
             पुष्प - पुष्पित 

(iii) प्रत्यय ‘ई’ का प्रयोग संज्ञा शब्दों से विशेषण एवं भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए किया जाता है; जैसे-धनी, लालची, बुद्धिमानी, पहाड़ी, ऊनी आदि। कुछ अकारांत और आकारांत शब्दों में ‘ई’ प्रत्यय जुड़ने पर उनका रूप ऐसे बनता है

        चतुर - चतुराई 
       अच्छा - अच्छाई
        भल  - भलाई

(iv) प्रत्यय ‘इ’ सिर्फ संस्कृत शब्दों में आता है; जैसे-क्रांति, गति, प्रकृति आदि।

वर्तनी के दो रूप : BHDLA 135 Free Solved Assignment

हिंदी भाषा में कुछ शब्द दो वर्तनी रूपों में आ गए हैं। हिंदी में गए-गये, गई-गयी दोनों रूप प्रयोग किए जाते हैं। इसी प्रकार कुछ अन्य शब्दों में भी यह स्थिति है

   आयी - आई
   पायी - पाई 
   लिये - लिए 

उर्दू तथा अंग्रेजी से हिंदी में आए कुछ अन्य शब्दों में भी दो वर्तन रूप हैं, जैसे

        बर्बादी - बरबादी 
        सर्कस - सरकस

संस्कृत से आए हुए कुछ अन्य शब्दों की वर्तनी में दो वर्तनी रूप हैं और दोनों सही माने जाते हैं, जैसे

        महत्व - महत्व
        पूर्ति - पूर्ति
        अर्ध - अर्द्ध 

पाठ में प्रयुक्त कुछ शब्दों की वर्तनी की विशेषताएं :-

(i) पूर्ण, स्वरूप, हीन, शील, शाली आदि प्रत्यय मूल के साथ मिलकर आते हैं। उदाहरण के लिए, महत्त्वपूर्ण, परिणामस्वरूप, शक्तिहीन, प्रगतिशील, शक्तिशाली।

(ii) हिंदी में दोनों प्रकार से लिखे जाने वाले संस्कृत के हलंत शब्द, जैसे

         पश्चात - पश्चात् 
         संस्थान - संस्थान्
         वरन   - वरन्

(iii) दो शब्दों में अंतर

         नम्र - नम्रता 
         भिक्षा - भिक्षुक
         पूर्ण - पूर्णता 

(iv) कुछ अंग्रेज़ी शब्द उच्चारण की विशेषता के कारण ‘ए’ से लिखे जाते हैं, किंतु उनका उच्चारण ‘ऐ’ जैसा होता है, जैसे-एक्ट, एसोसिएशन।

(v) संस्कृत शब्द ‘उपरि’ से दो शब्द बनते हैं

उपर्युक्त – ऊपर लिखा गया
उपर्युक्त (उपरि + उक्त) – ऊपर बताया गया। BHDLA 135 Free Solved Assignment
कई लोग अक्सर ‘उपरोक्त’ लिखते हैं, जो गलत है।

भाग – 3

प्रश्न 8. निम्नलिखित पारिभाषिक शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए

(i) विलोम शब्द

उत्तर-किसी शब्द का उल्टा अर्थ बताने वाले शब्द को विपरीतार्थक या विलोम शब्द कहते हैं। इस इकाई में भी कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनके विपरीत अर्थ देने वाले शब्द भी है; जैसे-समानता और असमानता, अमीर और गरीब, निम्न और उच्च आदि। विलोम शब्द में उपसर्ग का भी प्रयोग होता है; जैसे–’अ’ उपसर्ग

        उचित - अनुचित
        सफल - असफल
        आदि - अन्त 
        सुकाल - अकाल
        निगमन - आगमन 

स्वर के आरंभ में ‘अ’ के स्थान पर ‘अन’ उपसर्ग का प्रयोग जैसे-

      अंत अनंत 
      अग्रज - अनुज
      अतिवृष्टि - अनावृष्टि 

‘वि’ उपसर्ग वाले विलोम शब्द; जैसे

      अनुरक्त - विरक्त 
      अतल - वितल 
      आकर्षण - विकर्षण 

संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार ‘वि’, ‘नि’ आदि के बाद के व्यंजन ‘स’, ‘ष’ में परिवर्तित हो जाते हैं; जैसे-विषाद, निषिद्ध। BHDLA 135 Free Solved Assignment

कुछ विलोम शब्द और उनकी रचना —

         स्वाधीन (स्व + अधीन) - पराधीन (पर + अधीन) 
         धनी (धन + ई) - निर्धन (निः + धन) 
         सापेक्ष (स + अपेक्ष) - निरपेक्ष (निः + अपेक्ष) 

(ii) संधि

उत्तर-संधि (सम् + धि) शब्द का अर्थ है-‘मेल’ या ‘जोड़’। दो निकटवर्ती वर्गों के परस्पर मेल से जो परिवर्तन होता है, वह संधि कहलाता है; जैसे-देव + इंद्र = देवेन्द्र, सर्व + उत्तम = सर्वोत्तम आदि।

संधि के प्रकार :-

 धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
 अ + अ = आ 

  नर + इंद्र = नरेंद्र
  अ+इ = ए 

ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश - 
 अ + उ = ओ 

ऐसे स्वरों के मेल को ‘स्वर संधि’ कहा जाता है।

जगत् + ईश = जगदीश  
त् + ई = दी 

सत् + जन = सज्जन  
त् + जज्ज 

सम् + मति = सम्मति
म् + म = म्म

व्यंजन का व्यंजन से अथवा किसी स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।

निः + आहार = निराहार – विसर्ग का र
दु: + साहस = दुस्साहस – विसर्ग का स् BHDLA 135 Free Solved Assignment

विसर्ग के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मेल को विसर्ग संधि कहते हैं।

(iii) प्रविशेषण

उत्तर-विशेषण से पहले भी यदि एक अन्य विशेषण का प्रयोग किया जाए, तो उसे प्रविशेषण कहते हैं, जैसे-‘अत्यंत सुंदर भवन’। इसमें ‘अत्यंत’ प्रविशेषण है। प्रविशेषण विशेषण पर बल प्रदान करने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

(iv) प्राकृतिक गैस

उत्तर-प्राकृतिक गैस (Natural gas) कई गैसों का मिश्रण है जिसमें मुख्यतः मिथेन होती है तथा 0-20% तक अन्य उच्च हाइड्रोकार्बन (जैसे इथेन) गैसें होती हैं। प्राकृतिक गैस ईधन का प्रमुख स्रोत है। यह अन्य जीवाश्म ईधनों के साथ पायी जाती है।

(v) नेट बैंकिंग

उत्तर-नेट बैंकिंग एक बहुत ही अच्छी टेक्नोलॉजी है जिसके लिए हमें बार-बार बैंकों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। हमें बैंकों की लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ेगा। हम अपने बैंक की जो भी जानकारी चाहते हैं हमें सब नेट बैंकिंग की सहायता से मिल जाएगी।

हम अपने बैंक कितना लेनदेन कर रहे हैं जो भी पासबुक में ब्योरा होता है वह सारा आपका नेट बैंकिंग पर आ जाएगा। सरलतापूर्वक घर बैठे देख सकते हैं।BHDLA 135 Free Solved Assignment

आपको कहीं पर भी शॉपिंग करनी है, आपको पेमेंट करनी है तो आप नेट बैंकिंग की सहायता से कर सकते हैं। नेट बैंकिंग की मदद से हम बहुत प्रकार का खाता खोल सकते हैं

प्रश्न 9. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए

(क) राष्ट्रभाषा

उत्तर-राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है-समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात आमजन की भाषा (जनभाषा), जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार-विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है।

राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद संपर्क की आवश्यकता की उपज होती है। वैसे तो सभी भाषाएं राष्ट्रभाषाएं होती हैं,

किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तत्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही राष्ट्रभाषा है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत के संदर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति हिंदी ने की। यही कारण है कि हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा बनी। –

राष्ट्रभाषा शब्द कोई सांविधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है।

राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है।

राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की संपर्क-भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। BHDLA 135 Free Solved Assignment

राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है, क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।

(ख) राजभाषा हिंदी का स्वरूप

उत्तर-राजभाषा वह भाषा है, जो सरकारी राजकाज, प्रशासनतंत्र के कार्य के संपादन संबंधी गतिविधि की, कार्यकलापों की भाषा है।

यह भाषा आमतौर पर समस्त देश में अथवा देश के अधिकांश भागों में परस्पर भिन्न-भिन्न भाषा भाषियों के बीच संपर्क माध्यम का कार्य करती है,

तो साथ ही देश की शिक्षा, देश के ज्ञान-विज्ञान, रीति-नीति, कला, संस्कृति आदि से संबंधित समस्त कार्यकलापों का निर्वाह भी करती है। राजभाषा हिंदी इन दायित्वों का बखूबी से निर्वाह करती है।

इस भाषा में जो बात कही जाए, उसका अर्थ वही निकलना जरूरी है। इसमें शासकीय कार्यों में प्रयुक्त की जाने वाली भाषा अर्थ की दृष्टि से औपचारिक, स्पष्ट तथा सुनिश्चित होती है।

यह भाषा सबके समझ में आने वाली भाषा है, जिससे इसकी सरलता तथा स्पष्टता दृष्टिगत होती है।

राजभाषा और साहित्यिक हिंदी दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं। साहित्य भाषा में बात सीधे या घुमा-फिरा कर भी प्रयोग की जा सकती है। इस भाषा के अंतर्गत लाक्षणिक, व्यंजनाश्रित तथा प्रतीकात्मक और अनेकार्थी की पूरी संभावना रहती है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

इसमें लालित्यपूर्ण और सांकेतिक भाषा का भी प्रयोग किया जा सकता है, परंतु राजभाषा हिंदी का प्रयोग सरकारी कामकाज में होने के कारण इस भाषा का सरल, स्पष्ट तथा एकार्थक और सहज होना जरूरी है, क्योंकि इस भाषा का प्रयोग अहिंदी भाषी लोग भी करते हैं।

पारिभाषिक और तकनीकी शब्दावली का प्रयोग राजभाषा के क्षेत्र में होता है। पारिभाषिक अर्थात ज्ञान विशेष के क्षेत्र में परिसीमित और निश्चित होना। शब्द का अर्थ वहीं हो. जो प्रयोक्ता को अभिष्ट हो. या कहना चाहता हो।

राजभाषा हिंदी का प्रयोग अंग्रेजी के साथ-साथ मिलता है; जैसे-विश्वविद्यालयों में आवेदन पत्र के फॉर्म, मनीऑर्डर फॉर्म, रेल आरक्षण फॉर्म, बैंकों से संबंधित फॉर्म आदि में तथा कई तरह के कार्यालयों, कैलेंडरों में महीनों के नाम हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होते हैं।

ऐसे ही विभिन्न स्थानों पर हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं के साथ कहीं-कहीं क्षेत्रीय भाषाओं का भी प्रयोग होता है। छात्रों के लिए यह विचारणीय विषय है कि ऐसा क्यों होता है।

प्रश्न 10. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखित

(क) बीमा क्षेत्र में प्रयुक्त हिंदी

उत्तर-बीमा का महत्त्व वाणिज्य के क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। व्यापार में उत्पन्न होने वाले आकस्मिक आर्थिक संकटों से बचने के लिए बीमा एकमात्र साधन है।BHDLA 135 Free Solved Assignment

बीमे की नियमित अल्पराशि देकर व्यापारी निश्चित हो जाता है। बीमा का मूल कार्य होता है, दुर्घटनाओं से हुए नुकसानों की क्षतिपूर्ति करना। बीमा प्रणाली के मुख्य घटक हैं-बीमाकर्ता, बीमा शुल्क, बीमा पत्र आदि।

राजभाषा हिंदी के प्रयोग एवं क्रियान्वयन के सांविधिक प्रावधानों का पालन भारतीय जीवन बीमा निगम में किया जाता है। आम जनता तथा व्यापारियों अपना संपर्क बना चकी हैं. जिससे हिंदी का प्रयोग इनके कार्यों में लाभदायक होता है।

हिंदी का क्रियान्वयन इन बीमा कंपनियों द्वारा लगातार हो रहा है, क्योंकि ग्राहकों को पत्र-व्यवहार, सामान्य प्रपत्रों का प्रकाशन तथा विज्ञापन में हिंदी का प्रयोग किया जा रहा है।

बीमा प्रणाली से जुड़ी पारिभाषिक शब्दावली का विकास उनके अंग्रेजी पर्यायों के साथ हिंदी में हो चुका है।

तकनीकी शब्दावली-जोखिम-Risk, क्षति-Loss, क्षतिपूर्ति-Indemnity, बीमा-Insurance, बीमा-पत्र-Policy, बीमा-किश्त-Premium, बीमाधारी-Policy holder, उत्तरदायित्व-Responsibility, जीवन बीमा-Life insurance, अग्नि बीमा-Insurance against fire. सामुद्रिक बीमा-Marine insurance संपत्ति-Asset चल संपत्ति Movable assets. अचल संपत्ति-Immovableassets, माल-Goods, गोदाम-Godown, प्रमाण पत्र-Certificate, रोकड़ हानि-Loss of cash, जांच-पड़ताल-Inquiry, बीमाकृत-Insured, दर-Rate, ब्याज-Interest आदि।

बीमा प्रणाली द्वारा आजकल डाक और रेल-सेवा के कई कार्य किए जा रहे हैं, जिसमें हिंदी भाषा का प्रयोग भी होता है।

बीमाकृत द्वारा रुपये भेजना, पत्र पार्सल बीमाकृत माल अब रेल से भेजना ज्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित होता है। इसमें बीमा की फीस साध रण डाक या रजिस्ट्री से अधिक दिया जाता है।

(ख) विपणन में प्रयुक्त हिंदी

उत्तर-वाणिज्य गतिविधियों में उत्पादन से लेकर उपभोक्ता के पास माल या वस्तु पहुंचाने तक की प्रक्रिया शामिल है, जिसे विपणन की शृंखला (Marketing Channel) कहते हैं।

मांग व्यापार का मूल है, इसलिए विपणन के माध्यमों के उपयोग से पहले वस्तु के संभावित क्रेता की कुल मांग का विश्लेषण किया जाता है। मांग और विश्लेषण को नियंत्रित करने वाले तत्त्व हैं

दर – Rate
उत्पादन – Production

संवेष्टन – Packaging
विज्ञापन – Advertisement

चिह्न – Brand
मूल्य – Price
यातायात – Transportation

इंटरनेट और डिजिटल मार्केटिंग के आने के बाद से परंपरागत विपणन के वितरण का माध्यम अब बदल गया है। अब दलाल और बिचौलियों के बिना ही उपभोक्ता ई-ट्रेनिंग हेतु बने ऑनलाइन प्लेटफार्म पर जाकर सीधे उत्पादक से ही वस्तु खरीद सकता है। BHDLA 135 Free Solved Assignment

सरकार द्वारा GEM (Government E-Marketing) नाम एक ऑनलाइन प्लेटफार्म निर्मित किया गया है, जहां से सरकारी संस्थानों को वस्तुओं की खरीद करना अनिवार्य है।

वाणिज्य विस्तार का केन्द्र उपभोक्ता है, जिससे उस तक जनसंचार के माध्यमों का उपयोग कर वस्तुओं के गुण, मूल्य आदि जानकारी पहुंचाने में तेजी आई है।

वाणिज्यिक गतिविधि में ‘बिक्री को बढ़ाने’ में विज्ञापन का सबसे ज्यादा सहयोग है। पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, पोस्टर, पैंफ्लेट आदि के माध्यम से विज्ञापन को विस्तार दिया जाता है। भारत में भी विज्ञापन अब विश्व स्तर पर होता है।

प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता ने विज्ञापनों की भाषा और प्रस्तुतीकरण ने व्यापारिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, जिसमें हिंदी का प्रयोग इन सभी माध्यमों में निरंतर हुआ है।

हिंदी विज्ञापन का प्रयोग श्रव्य-दृश्य, दृश्य-श्रव्य, में लगातार होता रहा है। विज्ञापन के चार गुणों के कारण इसकी भाषा सर्वथा संपन्न एवं सफल रही है, जो निम्न प्रकार हैं

(1. आकर्षक तत्त्व-Attention value
(2. श्रव्यता एवं सुपाठ्यता-Readability and listenability

(3. स्मरणीयता-Memorability BHDLA 135 Free Solved Assignment
(4. विक्रय की शक्ति-Selling Power

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