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निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए

(क) इतना जल इतनी शीतलता हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी ? नहीं तो जैसे बेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, …………… दोनों पास-पास बैठ गये।

उत्तर. संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश जयशंकर प्रसाद की चर्चित कहानी ‘आकाशदीप’ से लिया गया है। इस कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त प्रमुख पात्र हैं। एक संकटपूर्ण स्थिति में ये दोनों पात्र अपरिचित होने के बावजूद साथ-साथ संघर्ष करते हैं।

दोनों बंदी होते हैं फिर दोनों प्रयासपूर्वक मुक्त हो जाते हैं। इसके बाद ये दोनों आपस में एक-दूसरे का परिचय प्राप्त करते हैं। परिचय के एक हिस्से में सबसे पहले चम्पा अपना परिचय देती है।

बुद्धगुप्त ने चम्पा के प्रति अपने प्रेम भाव को बहुत शालीन और मार्यादित ढंग से अभिव्यक्त कर दिया। यह अभिव्यक्ति प्रेम के निवेदन की तरह है। इस निवेदन को स्वीकारने या अस्वीकार करने का निर्णय चम्पा को करना है।

बुद्धगुप्त यहाँ प्रार्थी की मुद्रा में खड़ा है। आगे वह कहता है कि चम्पा हमारे पास असंख्य धन राशि है और बहुत सारी नावें भी हैं,

हम नावों में उस धन राशि को भरकर भारत भूमि की ओर चल पडते हैं और वहाँ तुम राज रानी की तरह रहोगी। बुद्धगुप्त की इच्छा है कि आज ही उनका विवाह हो और कल वे भारत भूमि के लिए प्रस्थान करें।

यदि चम्पा सहमत हो तो यह हो सकता है। बुद्धगुप्त स्वयं मानता है कि वह महानाविक है और उसकी आज्ञा समुद्र की लहरें भी मानती हैं। BHDC 134 Free Solved Assignment

बाकी छोटी-मोटी विघ्न बाधा तो सामने आनी ही नहीं है। केवल चम्पा की स्वीकृति की आवश्यकता है अर्थात् जिस जलदस्यु का कहा प्रकृति तक मानती है वह चम्पा के समक्ष निवेदन की मुद्रा में है।

जिसे दया-धर्म से कोई वास्ता नहीं था और जो केवल पशु-बल और धन में विश्वास रखता था उसके हृदय में भी कोमल भावनाएँ जगाने में सक्षम हुई है।

देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिम्ब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा. फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चम्पा ने मुँह फेर लिया।

विशेष : 1. जिस तरह इस अंश में बुद्धगुप्त अपने प्रेम का निवेदन करता है और निर्णय चम्पा पर छोड़ देता है और इस निवेदन में चम्पा की गरिमा का बराबर ध्यान रखा गया हैं।

  1. चरित्रों की चारित्रिक विशेषताएँ भी यहाँ प्रकट हुई हैं। जलदस्यु होकर भी बुद्धगुप्त शालीनता और संबंधों की मर्यादा का ध्यान रखता है। ,
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(ख) बगीचे को आँख से एक साथ बहुत लोग देख सकते हैं, पर उसमें के फल नहीं खा सकते। जहाँ देखने का भी दाम ………………………लुटेरे या डाकू इसी प्रकार दल-बद्ध होकर काम करते हैं।

उत्तर. संदर्भ : यह गद्यांश रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘लोभ और प्रीति से लिया गया है। इस निबंध में शुक्ल जी ने ‘लोभ और प्रीति के मनोभावों का बारीकी से विश्लेषण किया है। किसी वस्तु के प्रति लगाव कब लोभ में परिणत हो जाता है, इसकी व्याख्या यहाँ की गई है।

व्याख्या : शुक्ल जी कहते हैं कि किसी वस्तु का हमें बहुत अच्छा लगना या उससे हमें सुख या प्रसन्नता प्राप्त होना ही उसके प्रति हमारे लोभ को प्रमाणित नहीं करता था। केवल किसी वस्तु का पाना और उससे आनंद मिलना हमारी उसके प्रति लोभ की अभिव्यक्ति नहीं है।

लोभ तब होता है, जब हमारे हृदय में उस वस्तु के प्रति गहरी आसंक्ति हो, लगाव हो। हमारे हृदय में यह इच्छा उत्पन्न हो कि वह वस्तु हमें प्राप्त हो, हमेशा हमारे ही पास रहे, कभी हमसे दूर न हो और वह कभी भी नष्ट न हो तो उस वस्तु के प्रति ऐसी भावना हमारे ‘लोभ’ का कारण होगी ।

किसी को पाने की अपनाने की इच्छा ‘लोभ और प्रीति’ दोनों का ही आवश्यक अंग है।

शुक्ल जी आगे इस बिन्दु को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं कि यदि किसी को कोई बहुत अच्छा लगता है या उसे आता है और प्रिय लगता है तो कहा जाएगा कि वह उसे ‘चाहता’ है।

इसके दो अर्थ हैं- पहला यह कि वह उसे ‘प्रेम’ करता है और दूसरा यह कि वह उसे चाहने की कामना या इच्छा रखता है। लेखक के अनुसार यही चाहना ‘लोभ और प्रीति है।

खंड-ख

2 हिंदी के प्रारंभिक गद्य लेखन पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-हिन्दी का दूसरा पत्र ‘बंगदूत’ का प्रकाशन 9 मई सन् 1829 को कलकत्ता में हुआ था। कलकत्ता से ही 1834 ई. में ‘प्रजामित्र’ नाम का तीसरा हिन्दी पत्र प्रकाशित हुआ।

हिन्दी भाषी क्षेत्र से पहला समाचार पत्र 1844 में निकला था, इसका नाम ‘बनारस’ था और इसे राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ ने निकाला था। 1846 ई. में मौलवी नासिरूद्दीन के सम्पादकत्व में ‘मार्तण्ड’ नामक एक और पत्र प्रकाशित हुआ।BHDC 134 Free Solved Assignment

इस तरह 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई समाचार-पत्र प्रकाशित हुए। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में तो पत्र-पत्रिकाओं की संख्या काफी बढ़ गई। पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी गद्य को विकसित और परिमार्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

फोर्ट विलियम कॉलेज-सन् 1800 में अंग्रेजों के प्रयास से कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। सन् 1803 ई. में इस कॉलेज के हिन्दी-उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने हिन्दी और उर्दू में पुस्तकें लिखाने का प्रयत्न किया। इन्होंने कई मुशियों की नियुक्ति की।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “जॉन गिलक्राइस्ट प्रधान रूप से हिन्दुस्तानी या उर्दू के पक्षपाती थे, परन्तु वे जानते थे कि उस भाषा की आधारभूत भाषा हिन्दवी या हिन्दुई थी।

इसी आधारभूत भाषा की जानकारी के लिए उन्होंने कुछ “भाषा मुंशियों की सहायता प्राप्त की।” भाषा मुंशियों में श्री लल्लूलालजी और पं. सदल मिश्र ने हिन्दी गद्य पुस्तकें लिखीं।

मुंशी सदासुखलाल “नियाज* (1746-1824)- मुंशीजी उर्दू और फारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार “इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है,

पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमें मिल जाते हैं।” ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त ‘विष्णु पुराण’ के प्रसंगों के आधार पर आपने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी।

सदासुखलाल जी की भाषा में सहजता और स्वाभाविकता है। इनकी भाषा का यह उदाहरण द्रष्टव्य है कि विद्या इस हेतु पढ़ते हैं कि तात्पर्य इसका जो सतोवृत्ति है वह प्राप्त हो और उससे निज स्वरूप में लय कीजिए।

इस हेतु नहीं पढ़ते हैं कि चतुराई की बातें कहके लोगों को बहकाइए-फुसलाइए और सत्य छिपाइए, व्यभिचार कीजिए और सुरापान कीजिए और मन को, कि तमोवृत्ति से भर रहा है, निर्मल न कीजिए।

मुंशी इंशाअल्ला खाँ (सन् 1756-1818)-इंशाअल्ला खाँ ने सन् 1798 और 1803 के बीच ‘उदयभान चरित या रानी केतकी की कहानी’ की रचना की थी। BHDC 134 Free Solved Assignment

कहानी लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए मुंशीजी ने लिखा था, “एक दिन बैठे-बैठे बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले।

बाहर की बोली और गवारी कुछ उसके बीच में न हो। बस, भले लोग अच्छों से अच्छे आपस में बोलते-चालते हैं ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न हो। यह नहीं होने का।”

लल्लूलाल जी (सन् 1763-1825)-फोर्ट विलियम कॉलेज से संबद्ध थे। इन्होंने भागवत के दशम स्कंध की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की। इसकी भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव है।

अरबी-फारसी के शब्द इसमें कही-कही आ गये हैं, किन्तु कोशिश इनसे बचने की है। द्विवेदी जी के शब्दों में “इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रवाह नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में हैं।’ शुक्ल जी की दृष्टि में इसकी भाषा “नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं हैं।”

पं. सदल मिश्र (सन् 1767-1768)-बिहार के रहने वाले थे और लल्लूलालजी की तरह फोर्ट विलियम कालेज से संबद्ध थे। इन्होंने ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की।

शुक्लजी ने लल्लूलालजी की भाषा से इनकी भाषा की तुलना करते हुए लिखा है कि “लल्लूलालजी के समान इनकी भाषा में न तो ब्रजभाषा के रूपों की वैसी भरमार है और न परम्परागत काव्य भाषा की पदावली का स्थान-स्थान पर समावेश।BHDC 134 Free Solved Assignment

इनकी भाषा पर पूरबी बोली का स्पष्ट प्रभाव दिखायी देता है। आधुनिक हिन्दी गद्य का जो आभास सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में दिखायी देता है, उसी का आगे विकास हुआ है।

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3 त्याग-पत्र के संरचना शिल्प का उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।

उत्तर’त्याग-पत्र’ डायरी और संप्रेषण की शैली में लिखा हुआ उपन्यास है। हम प्रेमचंद के उपन्यास से तुलना करके ‘त्याग-पत्र’ की संरचना और शैली को समझ सकते हैं।

प्रेमचंद लेखक के रूप में अपने उपन्यासों की कथा कहते हैं। वे पूरे समय उपन्यास में उपस्थित रहते हैं। कथा चरित्र और घटनाओं का वे स्वयं वर्णन करते जाते हैं और उसका अर्थ भी करते जाते हैं।

प्रेमचंद के उपन्यासों में लेखक प्रत्येक स्थिति पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित रहता है। उनके उपन्यास की कथा का आरम्भ होता है, फिर कथा विकसित होती है अगर अंत में किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर समाप्त हो जाती है।

‘त्याग-पत्र में ऐसा नहीं होता। इस उपन्यास के प्रारम्भ में ही लिखा हुआ है कि यह मौलिक सामाजिक उपन्यास है और इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। अर्थात यह अनुवाद नहीं है। इसके बाद उपन्यास से जैनेन्द्र कुमार गायब हो जाते हैं।

पाठकों को यह सूचित किया गया है कि यह उपन्यास अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसका हिंदी उल्था यहाँ दिया गया है। इसे सर एम. दयाल ने लिखा है जो संयुक्त प्रांत के चीफ जज थे। फिर उन्होंने जजी से त्यागपत्र दे दिया और हरिद्वार में जाकर रहने लगे।BHDC 134 Free Solved Assignment

दो महीने पहले उनका स्वर्गवास हो गया। उनके कागजों में यह पाण्डुलिपि मिली है, जिसमें व्यक्तियों और स्थानों के कुछ नाम बदल दिए हैं। यह हम आपको पहले भी बता चुके है। अब इस उपन्यास में से एम. दयाल अनुपस्थित हो जाते हैं।

यहाँ प्रमोद नामक नया पात्र आता है। यह प्रमोद उस उपन्यास का कथावाचक है, जो अपनी बुआ मृणाल के जीवन की कहानी कहता है।

आरम्भ में ही यह भी बता दिया जाता है कि मृणाल की मृत्यु हो चुकी है। प्रमोद अपने पद से त्यागपत्र दे देता है। इस संरचना के भीतर यह उपन्यास लिखा हुआ है।

उपन्यास का अंत होते-होते एम. दयाल फिर आते हैं और अपना त्यागपत्र लिखते हैं और उपन्यास समाप्त हो जाता है। इसको इस तरह से समझ सकते हैं- लेखक जैनेन्द्र कुमार→चीफ जज सर एम. दयाल →कथावाचक प्रमोद→कथा की प्रमुख पात्र मृणाल→और अंत में उपन्यास के पाठक ।

1 संवाद: योजना ‘त्याग-पत्र’ में संवाद बहुत कम हैं। लेखक प्रमोद के माध्यम से वर्णन करता जाता है। जहाँ वह उपस्थित रहता है, वहाँ जो कुछ सुनता है. उन्हें वह पुनः प्रस्तुत करता है।

इन संवादों के माध्यम से पाठक को मृणाल की मनःस्थिति, उसकी सामाजिक स्थिति और उसके विचारों का पता चलता है। यह अवश्य है कि इन संवादों में मृणाल बहुत तर्कशील, जीवंत और इसी पात्र के रूप में हमारे सामने आती है।

प्रमोद और मृणाल की बातचीत हो रही है। मृणाल बीमार है। “चलो, तुम्हें यहाँ के अस्पताल में भर्ती करा दूं।” उन्होंने कहा-जो बात मैंने कही वह तेरी समझ में नहीं आई न चलो ठीक है।

नहीं भाई, अस्पताल में क्यो जाऊँगी। मैंने बताया-अस्पताल में इंतजाम ठीक हो जाएगा। प्राइवेट वार्ड में कर दूंगा। खर्च की फिक्र कुछ मत करो, बुआ ।BHDC 134 Free Solved Assignment

बुआ ने बीच में टोक कर कहा-“लेकिन वही तो फिक्र मुझे है, प्रमोद । तुम बहुत सा रुपया दे जाओ तो क्या अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में दौड़कर मैं चली जाने वाली हूँ? प्रमोद देह है, तब तक दस बीमारियाँ लगी हैं। घबराहट किस बात की है।

2 भाषा : जैनेन्द्र कुमार की भाषा प्रेमचंद की भाषा परंपरा से भिन्न है। ‘त्याग-पत्र में जैनेन्द्र कुमार ने उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली का प्रयोग नहीं किया।

वे आमतौर पर सरल तत्सम शब्दों से युक्त सहज भाषा का प्रयोग करते हैं। इसके साथ ही वे जयशंकर प्रसाद की भाँति आलंकारिक तत्सम शब्दों का प्रयोग भी नहीं करते।

वे अपनी भाषा को भरसक काव्यात्मक होने से बचाते हैं। इनकी भाषा प्रौढ़ और गंभीर है। चूंकि ‘त्याग-पत्र’ एक चिंतनपरक उपन्यास है, इसलिए इसकी भाषा भी चिंतनपरक है। वे हास्य का प्रयोग लगभग नहीं करते।

कई बार उनकी भाषा में व्यंग्य अवश्य आता है, परन्तु यह व्यंग्य भी मर्यादा की सीमा में रहता है। मृणाल और प्रमोद दोनों औपचारिक और गंभीर भाषा में सोचते और बोलते हैं। अपना क्रोध और नाराजगी भी वे स्यत भाषा में अभिव्यक्त करते हैं।

उदाहरण के लिए मृणाल का पति मृणाल को अपने घर से निकाल देता है। उस समय भी उसकी भाषा असंयत नहीं होती। वह सहज, सरल और संयत स्वर में मृणाल से कहता है- “मैं तेरा पति नहीं हूँ” या “हाँ जाओ। अपने मैके चली जाओ।” या “फिर जो चाहे कर. चाहे जहाँ जा।”

3 शैली : जैनेन्द्र कुमार का यह उपन्यास वर्णनात्मक शैली में लिखा हुआ उपन्यास नहीं है। ऐसी वर्णनात्मक शैली का प्रयोग प्रेमचंद के उपन्यासों में मिलता है। जैनेन्द कुमार ने आत्मकथात्मक और संस्मरणात्मक शैली में इस उपन्यास की रचना की है।BHDC 134 Free Solved Assignment

वर्णनात्मक शैली में लेखक स्वयं सर्वज्ञ होता है तथा वही संपूर्ण घटनाओं का वर्णन करता है। जबकि इस उपन्यास में लेखक से अलग एक कथावाचक है। इस कथावाचक से अलग एक लेखक की कल्पना भी की गई है जो आगे चलकर कथावाचक से अभिन्न हो जाता है।

यह कथावाचक पाठकों को अपनी बुआ मृणाल के जीवन की कहानी सुनाता है अर्थात् इस उपन्यास का पाठक एक तरह का श्रोता है। प्रमोद बुआ की कथा सुना रहा है।

चूंकि इन कथाओं का साक्षी प्रमोद होता है, अतः वह अपनी समझ और जानकारी से पाठकों को अवगत कराता चलता है। पाठक को तो विशेष वर्णन भी पढ़ा सकते हैं,

लेकिन श्रोता के पास न इतना धैर्य होता है और न इतना समय होता है, इसलिए संक्षेप में मूल बात और घटनाओं को कह दिया जाता है। उपन्यास में जहाँ प्रमोद अनुपस्थित रहता है, वहाँ की सूचनाएँ पाठक को अन्य पात्रों से मिलती है। इन अन्य पात्रों में उपन्यास की नायिका मृणाल को भी शामिल किया जा सकता है।

निम्नलिखित विषयों पर टेप्पणी (प्रत्येक पर लगभग 200-250 शब्दों में) लिखिए :

(क) वापसी का कथासार

उत्तर- ‘वापसी’ नयी कहानी दौर की एक महत्वपूर्ण कहानी है। इस कहानी की रचयिता उषा प्रियंवदा की संभवतः सबसे चर्चित कहानी। कहानी एक सेवानिवृत्त व्यक्ति गजाधर बाबू को केन्द्र में रखकर लिखी गयी है।

अपनी रेलवे की पैंतीस साल की नौकरी से रिटायर्ड होकर वे अपने घर आते हैं। अपने बीबी और बच्चों के बीच। बच्चे जो अब जवान हो गये हैं। बड़े बेटे और बड़ी बेटी की शादी हो गयी है। छोटा बेटा और बेटी कॉलेज में पढ़ते हैं।BHDC 134 Free Solved Assignment

उन्हें उम्मीद होती है कि उनका घर लौटना उनके लिए एक सुखद अनुभव होगा। उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अकेलेपन से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन ऐसा नहीं होता। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पारिवारिक दुनिया बहुत बदल गयी है।

रिश्तों की जिस आँच को वे अभी भी अपने अंदर महसूस करते हैं, परिवार के अन्य सदस्य नहीं महसूस करते। यही वजह है कि उनके बीच एक दूरी कायम हो गयी है। बच्चे ही नहीं वे अपनी पत्नी के साथ भी अपने को नहीं जोड़ पाते।

उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनके लौटने की किसी की खुशी नहीं है बल्कि वे घर में अवांछित मेहमान की तरह है। उनकी मौजूदगी ने उनके सहज जीवन को असहज बना दिया है।

यह भावना उनमें इतनी बलवती हो जाती है। कि वे उसी जगह लौट जाते हैं जहाँ से वे गये थे। कहानी का शीर्षक ‘वापसी’ इसीलिए रखा गया है। अपने ही घर परिवार से इस तरह दूर हो जाने का कारण क्या है, इस बारे में कहानी कुछ नहीं कहती।

पाठक को ही कहानी पढ़कर यह समझना होता है कि गजाधर बाबू और उनके परिवार के बीच कायम दूरी का कारण क्या है और इसके लिए कौन दोषी है।

क्या दोष उन परिस्थितियों का है जिनके बचे सभी पात्र जीते हैं। या उन नये जीवन मूल्यों का जिसे न समझ पाने के कारण गजाधर बाबू अपने को परिवार के साथ जोड़ नहीं पाते।

गजाधर बाबू और उनकी पत्नी में मूल्यगत भेद नहीं है। दोनों ही बच्चों के व्यवहार को उचित नहीं मानते। लेकिन पत्नी अपनी असंतुष्टि को अपनी बड़बड़ाहट और पति से शिकायत के पीछे छुपा लेती हैं।

बच्चों से टकराने से बचती हैं लेकिन गजाधर बाबू को जो उचित नहीं लगता उसे स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को टोकते हैं, उनकी आलोचना करते हैं और क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह बताते हैं। इस तरह गजाधर बाबू की मौजूदगी बच्चों के सहज जीवन में अवरोध बन जाती है।

इसीलिए वे अपनी माँ से अपने पिता की आलोचना करते हैं। माँ को इस टकराहट में घर की शांति भंग हो जाने का अंदेशा महसूस होता है। यही वजह है कि बच्चों की आलोचना करते हुए भी वह बात का समर्थन नहीं करती कि गजाधर बाबू बच्चे के जीवन में दखलंदाजी करे।BHDC 134 Free Solved Assignment

घर से दूर रहने के कारण गजाधर बाबू यह नहीं सोच पाते कि दुनिया बहुत बदल गयी है। लड़कियों की प्राथमिकता अब चुल्हा चौकी नहीं बल्कि पढ़ना-लिखना है।

इसी तरह बेटे-बहू भी घर-परिवार में स्वतंत्रता और समानता दोनों चाहते हैं। उन्हें यह पसन्द नहीं है कि उनकी निजी दुनिया में कोई दखल दे, भले ही वह पिता ही क्यों न हो।

यदि गजाधर बाबू इस बात को समझ पाते, तो उन्हें बच्चों के व्यवहार से न तो आघात लगता और न ही वे अपने को इतना अकेला महसूस करते। कहानी की सीमा यह है कि वह गजाधर बाबू के नजरिए को तो सहानुभूति के साथ प्रस्तुत करती है लेकिन दूसरे दृष्टिकोणों को समझने का प्रयत्न उसमें नहीं है।

दोनों को (गजाधर बाबू और परिवार के शेष सदस्य) अपनी-अपनी आत्मगत दुनिया में बाँध दिया गया है। उनके बीच गजाधर बाबू की पत्नी पुल बन सकती थी, लेकिन बाबू अपनी पत्नी से भी संवाद कायम करने में नाकामयाब रहते हैं।

(ख) एकांकी नाटक

उत्तर- एकांकी के तत्व-तत्व उन मूल पदार्थों या अंगों को कहते हैं जिससे किसी वस्तु का निर्माण होता है। एकांकी के शिल्पगत अंगों का समावेश उसके तत्वों में होता है।

संस्कृत नाट्यशास्त्र में नाटक के तीन मूल तत्व माने गए हैं-वस्तु, नेता और रस। पाश्चात्य नाट्यशास्त्र के विचारकों के अनुसार नाटक के मूल तत्व की संख्या छह मानी गयी है
(1) कथानक (2) सम्वाद (3) पात्र (4) देशकाल (5) शैली और (6) उद्देश्य

पाश्चात्य विचारकों के मत का खंडन रामगोपाल चौहान ने किया है कि नाटक के ये छह तत्व, जो आज माने जाते हैं, भ्रामक हैं। वस्तुत: नाटक के तीन तत्व हैंBHDC 134 Free Solved Assignment
(i) कथावस्तु (ii) सम्वाद और (iii) दृश्यविधान।

बाकी सभी तत्व इन तीन आधारभूत तत्वों के अन्तर्गत समाहित हो सकते हैं। नाटक मूलतः दृश्य होता है। अर्थात उसका अभिनयात्मक होना आवश्यक है, अत: इन तीनों तत्वों का आधारभूत गुण अभिनयात्मक होना चाहिए।”

उनका यह मत उचित ही जाना गया वह कहते हैं कि, “किसी भी रचना के मूल तत्व होने का गौरव वही तत्व प्राप्त कर सकते हैं,

जिनकी अवहेलना रचनाकार किसी भी दशा में न कर सके और अन्य रचना विधानों से उसके पार्थक्य हो स्पष्ट कर दें।” उनके विचारों को रेखाचित्र द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

कथा-कथा, चरित्र-चित्रण, उद्देश्य
सम्वाद सम्वाद, भाषा शैली
दृश्य-विधान-वातावरण-सृजन, देश-काल तथा रंगानिर्देश।

अन्य एकांकीकारों ने कथा में चरित्र’ चित्रण, उद्देश्य को समाविष्ट न कर उन्हें स्वतंत्र तत्व कहा है। वैसे ही सम्वाद और भाषा-शैली को भी अलग तत्व माना है। इसलिए एकांकी के मूल तत्व हैं

(क) कथानक (ख) पात्र (ग) सम्वाद (घ) उद्देश्य (ङ) देश-काल (च) भाषा-शैली और (छ) रंग-संकेत।

एकांकी के लक्षण-किसी भी विधा की अपनी विशेषता होती है। उन विशेषताओं के कारण ही उस विधा का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। एकांकी विधा की भी कुछ विशेषताएँ हैं जिन्हें हम एकांकी के लक्षण कह सकते हैं। निम्नलिखित विशेषताएँ ही एकांकी के लक्षण हैं

(1) एकांकी में केवल एक अंक, एक घटना एवं एक परिस्थिति होनी चाहिए।
(2) एकांकी का लक्ष्य सुनिश्चित हो।

(3) कथानक में संक्षिप्तता, गति में तीव्रता, विकास में आकस्मिकता और एकाग्रता होनी चाहिए।
(4) अतिरंजकता को स्थान ना देते हुए इनमें स्वाभाविक यथार्थवादी चित्रण की अपेक्षा की जाती है।

(5) पात्रों की भरमान नहीं होती, पात्र आवश्यकता के अनुसार ही होते हैं।
(6) पात्र जीते-जागते पाणी तथा उसके समान लगने वाले ही होने चाहिए।

(7) संवाद प्रभावी और चरित्र को स्पष्ट करने वाले होने चाहिए।
(8) संकलन-त्रय और रंगमंचीय गुणों से युक्त होना चाहिए। ताकि सफल रंगमंचीय प्रयोग हो सके।
(9) कौतूहल एवं मनोरंजकता आरंभ से अंत तक बनी रहे जिससे पाठक या सामुहिक को रसानुभूति हो।

खंड-ग

5 ‘लोभ और प्रीति के भाव-पक्ष पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- लोभ और प्रीति भावों की मनोवैज्ञानिक और व्यवहारपरक व्याख्या करना इसका उद्देश्य है, इसे समझने में हमें कोई कठिनाई नहीं होती। लेकिन इतना ही इसका उद्देश्य नहीं है।

लोभ और प्रीति भावों पर विचार करते हुए वे अन्य बातों पर भी अपना मत व्यक्त करते हैं। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि निबंध अवान्तर बातों को स्पष्ट करने के लिए ही लिखा गया है।

शुक्लजी के निबंधों में उनकी जीवन दृष्टि और विश्व दृष्टि भी व्यक्त होती है, मसलन, लोभी और प्रीति की बात करते हुए वे देश प्रेम पर भी विस्तार से विचार करते हैं।BHDC 134 Free Solved Assignment

देश प्रेम पर यह विचार हमें इस बात को स्पष्ट करने से नहीं रोकता कि निबंध में यह विषय अनायास ही नहीं आ गया है वरन् लेखक सोद्देश्य इसकी चर्चा कर रहा है। इसी प्रकार प्रीति का व्याख्या करते हुए वे प्रेम के विभिन्न रूपों और स्तरों की व्याख्या करते है।

भक्ति काव्य का उदाहरण देकर वे उस प्रेम की श्रेष्ठता बताते हैं जो लोकोन्मुख हो। स्वयं शुक्लजी के शब्दों में, उस एकान्तिक प्रेम की अपेक्षा जो प्रेमी को एक घेरे में उसी प्रकार बन्द कर देता है जिस प्रकार कोई मर्ज मरीज को एक कोठरी में डाल देता है,

हम उस प्रेम का अधिक मान करते हैं जो एक संजीवन रस के रूप में प्रेमी के सारे जीवन पथ को रमणीय और सुन्दर कर देता है, उसके सारे कर्मक्षेत्र को अपनी ज्योति से जगमगा देता है जो प्रेम जीवन की नीरसता को हटाकर उसमें सरसता ला दे, वह प्रेम धन्य है।

जीवन के प्रति अनुराग, कर्म पर बल और स्वदेश के प्रति प्रेम इन बातों को यदि एक साथ मिलाकर देखें तो हमें निबंध के उद्देश्य को समझने में कठिनाई नहीं होगी।

लोभ और प्रीति के मनोभावों द्वारा वे जीवन और जगत् के प्रति एक सकारात्मक और विवेकपूर्ण दृष्टिपूर्ण विकसित करना चाहते हैं।

ऐसा दृष्टिकोण जो इन मनोभावों को असंयमित न होने दे और जो लोगों को कर्म की ओर प्रेरित करे। मनोभावों की जीवन में अहम् भूमिका होती है, लेकिन उनमें सन्तुलन भी होना जरूरी है।

इस निबंध में शुक्लजी इस बात को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “पर किसी मनोविकास की उचित सीमा का अतिक्रमण प्रायः वहाँ समझा जाता है जहाँ और मनोवृत्तियाँ दब जाती हैं या उनके लिए बहुत कम स्थान रह जाता है।”

इस दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि शुक्लजी की दृष्टि में सभी मनोविकारों की जीवन में थोड़ी-बहुत सकारात्मक भूमिका जरूर होती है।BHDC 134 Free Solved Assignment

प्रीति को तो आमतौर पर सकारात्मक माना ही जाता है, लेकिन लोभ भी जीवन में अच्छी भूमिका निभा सकता है। यही नहीं लोभ का सकारात्मक पक्ष ही उसे प्रेम के रूप में परिणत करता है।

शुक्लजी का यह मानना है कि जीवन और जगत के प्रति हमारे मन में किसी तरह का आकर्षण नहीं होगा तो हममें स्वदेश के प्रति भी प्रेम जागृत नहीं होगा।

प्रकृति के प्रति प्रेम, स्थान के प्रति प्रेम, वस्तुओं के प्रति प्रेम और लोगों के प्रति प्रेम के होने पर ही इंसान में अपने देश के प्रति प्रेम, जागृत होता है। इसी प्रक्रिया में प्रेम मनुष्य को सक्रिय बनाता है।

उसे कर्मशील बनाता है। यहाँ कर्म पर शुक्लजी का इतना बल देना इसीलिए है क्योंकि उस युग में भारत पराधीन था। देश को पराधीनता से मुक्ति तभी प्राप्त हो सकती थी, जब लोगों में न सिर्फ स्वदेश के प्रति प्रेम हो बल्कि वह प्रेम उन्हें सक्रिय भी करे।

यह सक्रियता पराधीनता के विरुद्ध जन संघर्ष में भागीदारी के रूप में ही सामने आ सकती है। जिसके पनपने को वे उपयुक्त नहीं मानते! हमारा तात्पर्य धन के प्रति लोभ से है और जिसे वे अन्य स्थान पर व्यापारी प्रवृत्ति के बढ़ने के रूप में रेखांकित करते हैं।

धन के प्रति लोभ को वे न तो व्यक्ति के लिए और न समाज के लिए हितकर मानते हैं। इसी बात को वे इस रूप में भी कहते हैं कि क्षात्र धर्म का ह्रास देश और समाज के लिए अनिष्टकारी है।

इस प्रकार शुक्लजी लोभ और प्रीति निबंध के माध्यम से निबंध विधा में अपनी रचनात्मक कौशलता का ही परिचय नहीं देते बल्कि औपनिवेशिक पराधीनता के तत्कालीन दौर में लोगों के मन में स्वदेश प्रेम की भावना भरते हैं और इस दिशा में प्रयत्न करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

6 सहस्र फणा का माण-दाप का शला का विश्लषण काजए।

उत्तर कुबेरनाथ राय का यह निबंध कहानी और निबंध का मिश्रण है। कल्पना और विचार का समन्वय है। तथ्य और वायवीयता का मिला-जुला रूप है। BHDC 134 Free Solved Assignment

इस निबंध के प्रारंभ में मेघ का आगमन होता है। यह मेघ कामरूपी यायावर मेघ है। यह मेघ ही पाठकों को मणिपुर के संबंध में जानकारी देता है। कुछ कहानी कहता है, कुछ संस्मरण सुनाता है।

कुछ इतिहास, मिथक और भूगोल में घुमाता है। इतना तो स्पष्ट है कि मेघ धरती को, मणिपुर को, मणिपुर के इतिहास-भूगोल को ऊपर से उड़ता हुआ देखता है। वह स्वयं भी पल-पल परिवर्तित होता रहता है।

निबंध जहाँ कहानी का रूप धारण करता है, वहाँ हमारे सामने दो पात्र आते हैं- एक मेघ, जो कहानी कहता है और दूसरा काबुई कन्या, जिसका नामकरण मेघ दामिनी के रूप में करता है “मैं क्या हूँ, मैं कह नहीं सकता”, इस अनिश्चयात्मक वाक्य से निबंध का प्रारम्भ होता है।

वह बताता है कि इस नीले आकाश में वह निरंतर अपनी आकृति बदलते हुए चल रहा है अपनी ही आकृति बदलना सरल कार्य नहीं है, परन्तु गुप्तचरों की तरह मेघ यह काम आसानी से कर लेता है।

“कभी डोर कटी पतंग जैसी कभी रुई के छूह या पर्वत शिखर जैसी, कभी पूँछ कटे-सिंह जैसी तो कभी हाथी-ऊँट

जैसी तरह-तरह की आकृति मेघ बना लेता है। वह कहीं का कहीं चल देता है। अभी वह उज्जैन में महाकाल की आरती देख रहा था, फिर वह घूमता हुआ मणिपुर पहुँच जाता है।

यहाँ पर नदी के जल में अपना मुँह धोती हुई काबुई कन्या दिखाई देती है। आसमान में बादल हैं। नीचे नदी के जल में मुँह धोती हुई उस काबुई कन्या का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।

थोड़ी देर में मेघ और प्रतिबिंब मिल जाते हैं और तब वह मेघ मानुष तन धारण करके नीचे उतर जाता है। यहाँ से ये दोनों पात्र साथ-साथ रहते हैं।BHDC 134 Free Solved Assignment

‘काबुई मणिपुर की उस जाति की कन्या है जो चारणों और भाटों की तरह गीतों और कथाओं को अपने कण्ठ में बसा लेती है।

उसके सौन्दर्य पर मुग्ध मेघ कहता है कि उसकी “अंग कांति शुद्ध पिघले स्वर्ण की तरह थी, जिसका रूप तीक्ष्ण तलवार जैसा तरंगित था, जिसकी भंगिमा काल-प्रवाह पर दृष्टि शासन करने वाली रानियों जैसी थी।’ ऐसी अद्भुत-अपूर्व-काल्पनिक काबुई कन्या बादल के साथ है।

अब “मैं उसी के साथ चल रहा हूँ अगरु वनों की शांत श्यामल छाया में। शाखाओं के अग्रभाग जड़ीभूत हो गए है और उनसे काला गुरु मह-मह फूट रहा है। इसी वृक्ष की छालों पर प्राचीन मणिपुरी पुराण लिखे गए हैं

वह मणिपुर के “अगरुवनों, चन्दन वनों में ईश्वर के गुप्तचर की तरह भटक रहा है। जहाँ उसकी भेंट उस कन्या से होती है, जिस कन्या के “चेहरे को सन्ध्या का आलोक और अधिक मनोरम” बना रहा था।

शायद इसी कारण मणिपुर में इरा आलोक को ‘कन्या आलोक’ कहते हैं। इरा काबुई कन्या को वह नया नाग देता है-‘दागिनी ।

अब “गेघ और दागिनी सारी रात भटकते रहे। गणिपुर उपत्यका के अगरुवन, चंदनवन, देवदारु वन के चीच।” यह दामिनी मेघ को मणिपुर के मिथकों की जानकारी देती है।

उसके इतिहास को नए ढंग से प्रस्तुत करती है। निबंध में लेखक इसी के हवाले से बहुत सी विश्वरानीय और अविश्वसनीय बातें पाठकों को बताते चलते हैं।BHDC 134 Free Solved Assignment

निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी प्रत्येक पर लगभग 200-250 शब्दों में) लिखिए :

(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी क निबंध साहित्य

उत्तर- द्विवेदी जी के सारे निबंध चिंतन के केंद्र में मनुष्य है । उनकी दृष्टि में मानव समाज को सुन्दर बनाने की साधना ही साहित्य’ है । उनके निबंध इस कसौटी पर पूरे ही नहीं उतरते अपितु इस संबंध में आदर्श रूप भी स्थापित करते हैं ।

निबंधों में समूचे मानव मूल्यों को स्थान एवं प्रवेश देने का प्रयास किया गया है। अपने निबंध साहित्य में उन्होंने प्राचीनकाल के अप्रासंगिक एवं निरर्थक हो चुके मूल्यों पर जोर दिया है।

विचार एवं व्यक्तित्व का जैसा सहभाव दविवेदी जी के निबंध लेखन में दृष्टिगोचर होता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है । मस्ती और फक्कड़पन अनेक निबंधों में मिलता ही है चाहे निबंध का विषय जो भी हो ।

विरोधी विचारधाराओं का समावेश उनके चिंतन और लेखन की विशेषता है-“आदर्शवाद के धरातल पर विरोधी विचारधाराओं, परम्परा तथा प्रयोग, संस्कृति तथा सभ्यता, समाज तथा व्यक्ति, धर्म तथा विज्ञान, मानववाद तथा मानवतावाद, गाँधी तथा मार्स, प्राचीन तथा नवीन जीवन बोध में सामाजस्य एवं समन्वय स्थापित कर रखा है

द्विवेदी जी ने विविध विषयों, विचारों पर विभिन्न कोणों, शैलियों से लिख कर हिंदी निबंध-विधा को समृद्ध एवं पुष्ट और परिपक्व किया है ।

द्विवेदी जी के निबंधों में भारतीय संस्कृति के प्रति अनन्य स्नेह और संपृक्ति दिखाई देती है । उनके निबंध भारतीय संस्कृति के पर्याय हैं ।

इनमें मानव प्रेम, देश प्रेम, अध्यात्मिकता, उदारता, समर्पण-भावना, कर्तव्य-भावना, मानसिक संयम, असीम श्रद्धा और अगाध विश्वास आदि तत्व विदयमान हैं ।

इनका कदाचित ही ऐसा कोई निबंध हो जिसके केंद्र में भारतीय संस्कृति एवं मानव की बात न करते हों”मनुष्य की मनुष्यता यही है कि वह दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है ।

यह आत्म निर्मित्त बंधन ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है । अहिंसा, सत्य और अक्रोधमूलक धर्म का मूल उत्स यही है ।” यद्यपि द्विवेदी जी के मनोविज्ञान को लेकर कहीं बात नहीं की गई है, पर मनोभावों की सूक्ष्म पकड़ होने के कारण उनके निबंध मनोविज्ञान के प्रभाव से युक्त लगते हैं ।

समीक्षक श्यामनंद किशोर इस संबंध में लिखते हैं- “साहित्य सृष्ठा दविवेदी जी के मनोविश्लेषण के लिए उनका निबंध साहित्य अत्यधिक उपयुक्त है । प्रसंग गर्भत्व विवेदी जी के निबंधों को वृहतर आयाम प्रदान करता है ।

प्राचीन काल के अनेक प्रसंग और श्लोक, अर्वाचीन साहित्य के अनेक विवरण उनके निबंधों को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान करते हैं । वे किसी सीधे-साधे शब्द या वाक्य को इतने निश्छल ढंग से निबंध में प्रयुक्त करते हैं कि उससे अर्थवत्ता निःसृत हो जाती है ।BHDC 134 Free Solved Assignment

चिरपरिचित शब्दों के अछूते प्रयोग द्विवेदी जी की लोक-संस्कृति से भिन्न है ।” द्विवेदी जी की मनोवैज्ञानिक सी सूक्ष्म दृष्टि, विषयविवेचन, भाषा, शैली सभी अदभुत और विलक्षण है ।

अपनी सहज आत्मीयता एवं विनोद-प्रियता के कारण । पाठकों से उनका संवाद शीघ्र ही स्थापित हो जाता है । वक्तृव्य प्रधान शैली के कारण निबंधों में कथात्मकता, रक्षात्मकता और रोचकता की वृद्धि होती है ।

उनके निबंध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ ज्ञान की असंख्य आलोक किरणों से सहज ही बौद्धिक दीप्ति प्रदान करते हैं। द्विवेदी जी ललित निबंध के प्रवर्तक माने जाते हैं ललित निबंध निबंधकला की दृष्टि से श्रेष्ठतम हैं ।

इनमें भावनात्मकता एवं अनुभूति की त्रिवेणी प्रवाहित होती रहती है, जो गहन संवेदना से परिपूर्ण है । इसमें भावुकता एवं सहृदयता का ज्वार-भाटा सा उठ पड़ता है ।

पाण्डित्य से युक्त गवेषणात्मक निबंध लेखन के अलावा उन्होंने ललित निबंध लेखन में भी विलक्षण कौशल प्रदर्शित किया है ।

ललित निबंध की कोटि में प्राचीन एवं अर्वाचीन विषयों पर विभिन्न निबंध लिखे हैं । इनमें भारतीय धर्म, संस्कृति और साहित्य आदि को निरुपित किया गया है।

अशोक के फूल’, ‘शिरीष के फूल’, ‘कटज’, ‘मेरी जन्म भूमि’, ‘क्या आपने मेरी रचना पढ़ी’, ‘आम किर बौरा गए’, ‘बसंत आ गया’, ‘नाखून क्यों बढ़ते है?’ आदि इसी कोटि के निबंध हैं ।

इन निबंधों में छोटी सी बात को लेकर द्विवेदी जी उनके संबंध में आदि से अंत का वर्णन बहुत ही सहजता एवं मधुरता से करते है ।

डॉ अर्जुन देव शर्मा के शब्दों में-“आम फिर बौरा गए, शीर्षक मात्र से ऐसा प्रतीत होता है कि मानों इन आम बौरों की शोभा से लेखक आत्मविभोर की स्थिति गृहण कर अपने शब्दों में उच्छवासित कर रहा है ।

“8 आचार्य द्विवेदी जी ने हिंदी निबंध साहित्य को व्यापक तथा समृद्ध बनाने का महान कार्य किया है ।

इनके निबंधों की एक विशेषता उनके व्यंग्य का नुकीलापन है जो इतना सूक्ष्म और सौम्य है कि चुभते हुए कष्ट भी नहीं देता । यह डॉक्टर के इंजेक्शन की भांति बारीक से बारीक सुई है ।

‘संस्कृत और साहित्य’ नामक निबंध में वे कहते हैं- “नई शिक्षा के परिचय से विश्वास भी ढीला होता जाता है । कम से कम शहरों में बसी जनता उनके अर्थहीन आचार-विचार के जंजालों से नहीं दबी है, जितने उनके ग्रामीण पूर्वज थे ।”BHDC 134 Free Solved Assignment

डॉ .प्रभाकर माचवे उनके निबंधों की दोनों विशेषताओं सहजता एवं व्यंग्य की ओर विशेष ध्यान आकर्षित करते हए इन शब्दों में संकेत करते हैं- “निबंध की शैली में वही सहजता है जैसे गपशप कर रहे हैं, बात-बार में बात निकली जा रही है |

कभी कोई पुरानी स्मृति का टुकड़ा उज्ज्वल हो रहा है, कोई एक दम अनूठी एक नयी उद्भावना सामने आ रही है तथा उनके निबंधों में चुहल है, व्यंग्य है, करारी सामाजिक आलोचना है, वाग-वैदग्ध्य है, संस्मरणों का सिलसिलेवार काफिला है ।

सचित रत्नाकर और सुभाषित रत्न भण्डागार के असंख्य उद्धरण मणि हैं ।” आपके । निबंधों के बारे में डॉ बच्चन सिंह का कथन है- “उनके निबंध न तो गंभीरता का तेवर छोड़ते हैं और न सहजता का बाना ।”

(ख) लोभ और प्रीति की भाषा

उत्तर- भावों और मनोविकारों पर विचार करने की शुक्लजी की अपनी विशिष्ट विवेचन और विश्लेषण पद्धति है। मूल विषय को अच्छी तरह समझा जा सकें उनमें विषय के वर्गीकरण और विश्लेषण की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है, साथ ही निबंध में वे आत्मभिव्यक्ति का समावेश करते हैं।

जहाँ आवश्यकता होती है, वहाँ अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए व्यंग्य का सार्थक प्रयोग करते हैं। उनके निबंधों में समास और व्यास शैलियों का प्रयोग इसी दृष्टि से किया गया है।

शुक्लजी की भाषा टकसाली हिन्दी है, जिसमें संस्कृत, उर्दू और लोकभाषा का सहज समावेश होता है।

उनके भाव और मनोविकार संबंधी निबंधों का आधार मनोविज्ञान है। किन्तु शुक्लजी निबंध में मनोविज्ञान से यथोचित सामग्री को स्थान देकर, उसका विश्लेषण लोकदृष्टि से करते हैं।

वे लोकमंगल की भावना के पक्षधर है। शास्त्रीय विषय लेकर भी वे उसको व्यापक रूप में साहित्य की अवधारणाओं के माध्यम से संप्रेषित करते हैं।BHDC 134 Free Solved Assignment

उनके निबंधों में शास्त्रीयता, अनुभव और व्यंग्य-विनोद का अनुपम समन्वय है। उनका शिल्प व्यास और समास शैली का समन्वय है। उनका चिंतन भारतीय अवधारणा के अनुकूल समन्वयधर्मी चिंतन है।

शुक्लजी विषय की गहराई तक पहुँचते हैं और फिर अपने लेखन को शास्त्र, अनुभव और व्यंग्य-विनोद के माध्यम से भाषा के कलेवर में प्रस्तुत करते हैं। शास्त्र उन्हें परिभाषा, वर्गीकरण और व्याख्या प्रदान करता है,

अनुभव उन्हें लोकमंगल की अवधारणा प्रदान करता है और चिंतन मनन उनके निबंधों को मूल्य प्रदान करता है तथा उनकी वैयक्तिकता और व्यंग्य-विनोद उनके निबंध को ग्राह्य और सरस बनाते हैं। शुक्लजी की वैयक्तिक संस्पर्श अर्थ से इति तक निबंधों में परिव्याप्त है।

लोभ और प्रीति निबंध के संदर्भ में जब हम बिन्दु पर विचार करते हैं कि उनका यह स्पर्श यदा-कदा उनके भावुक विवरणों में अथवा लोकमंगल की भावनाओं में दिखाई पड़ता है। लोकमंगल की भावनाओं के साथ वे प्रायः व्यंग्य-विनोद का आश्रय लेते हैं।

उदाहरण के लिए, देश-प्रेम को व्याख्यायित करते हुए, प्रकृति के प्रति अनुराग को अभिव्यक्त करते हैं यह बात हम पहले भी लिख चुके हैं।

शुक्लजी के निबंधों में वैयक्तिक स्पर्श जहाँ एक ओर गुरु गंभीर विषय को रोचकता प्रदान करता है वहीं तयुगीन स्थितियों से आमना-सामना भी कराता है।BHDC 134 Free Solved Assignment

शुक्लजी के निबंध गंभीर निबंध है और पूरी गंभीरता से उनकी सरंचना की गई है किन्तु ये शुष्क नहीं है, शुक्लजी का वैयक्तिक संस्पर्श इन निबंधों को शुष्क होने से बचाता है और रमणीयता प्रदान करता है। यह संस्पर्श भाषा को प्रवाह देता है और भावक का झकझोरता है।

संभवतः ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ विचारों की उत्तेजना प्रदान करना इन निबंधों का लक्ष्य है और शुक्लजी के निबंध इस लक्ष्य की सिद्धि करने में समर्थ है। शुक्लजी के यहाँ व्यंग्य विनोद का प्रयोग सप्रयोजन है।

व्यंग्य विनोद से पाठक को गंभीरता के बीच एक सुखद अनुभव की प्रतीति होती है। यह सुखद प्रतीति केवल सुखद ही नहीं रहती है, यह तयुगीन दशा-दिशा को भी प्रस्तुत करती है।

यह दशा-दिशा पाठक को जीवन दिशा का ज्ञान कराती है, कर्म के लिए प्रेरित करती है, एक उत्तेजना प्रदान करती है और खिलखिलाहट से भर देती है।

पं. रामचन्द्र शुक्ल निबंधकार संसार की किसी भी भाषा के लिए गौरव हैं उनके निबंधों विवेचना और सर्जना का समन्वय है।

आत्माभिव्यक्ति तथा व्यंग्य-विनोद इनके निबंधों को हल्का-फुल्का नहीं बनाते, वरन् पाठक का भावक की आँख में उंगली गड़ा कर सत्य का निदर्शन कराते हैं।

वे रुचि भी जाग्रत करते हैं और चिंतन को भी गति प्रदान करते है। हिन्दी जगत को जो अनुदान शुक्लजी ने दिया वह अतुलनीय है। BHDC 134 Free Solved Assignment

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