IGNOU BHDC 133 Free Assignment In Hindi 2021-22- Helpfirst

BHDC 133

BHDC 133 Free Assignment In Hindi

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BHDC 133 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1 जाए सीधी वे सुख से ………….. … सखि, वे मुझसे कह कर जाते।

उत्तर संदर्भ और प्रसंग :

प्रस्तुत पंक्तियां मैथिली शरण गुप्त द्वारा रचित यशोधरा से उद्धृत है। सिद्धार्थ गौतम अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को नेत्र अवस्था में छोड़कर सन्यास धर्म अपनाने और सिद्धि प्राप्त करने हेतु वन में चले गए। इसके पश्चात यशोधरा इस प्रसंग में दुखी होकर सखी से मन की बात कह रही है।

व्याख्या : यशोधरा का विचार है कि सिद्धार्थ ने जाकर उसके प्रति अच्छा ही आचरण किया। विश्व पूर्वक सिद्धि प्राप्त करें। कभी भी यशोधरा के दुख से वे पीड़ित ना हो।

यशोधरा उन्हें किसी भी प्रकार उलाहना नहीं देना चाहती है। इस व्यवस्था में भी वे अधिक प्रिय लग रहे हैं क्योंकि उन्होंने संसार के कल्याण हेतु यह त्याग किया है।

यशोधरा की स्पष्ट मान्यता है कि उनके पति भले ही अपनी गृह त्याग दिया है लेकिन उन्हें सिद्धि अवश्य प्राप्त होगी।

सिद्धि प्राप्ति के पश्चात उनका पुनरागमन होगा और तभी यशोधरा के व्यथित प्राण उन्हें प्राप्त कर सकेंगे उनके दर्शन कर सकेंगे। यह सिद्धि उनसे अधिक संपूर्ण लोगों के कल्याण हेतु फलप्रसू होगी।

विशेष :-
. अवतरित अंश में नारी का त्याग चित्रित हुआ है।

. भाषा की सरलता और सहजता पर कवि का पूरा ध्यान रहा है।

. नाटक, गीत, प्रबंध,पद्य और गद्य सभी के मिश्रण एक मिश्रित शैली में यशोधरा की रचना हई

. बृहतर प्रेम हेतु निजी प्रेम को त्यागने की भावना तत्कालीन युग स्पंदन का प्रतीक है।

. तुक के प्रति कवि का ध्यान परिलक्षित होता है।

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प्रश्न 2 जिस घंभीर मधुर छाया में ……………..बिखराती हो ज्योति घनी रे।

उत्तर संदर्भ और प्रसंग : BHDC 133 Free Assignment In Hindi

प्रस्तुत कविता गीत लहर काव्य संग्रह में संगृहित है। इस गीत की रचना 19 दिसंबर 1931 ईस्वी को जगन्नाथपुरी में हुई थी। इसका प्रथम प्रकाशन 11 फरवरी 1932 ईस्वी को साप्ताहिक पत्र जागरण में हुआ था। जयशंकर प्रसाद की यह कविता पलायन वादी होने के आरोप से जुड़ी हुई है।

इस कविता में प्रसाद नाभिक को संबोधित करके कह रहे हैं कि मुझे एक ऐसी जगह ले चलो जहां सांसारिक झगड़े ना हो।

जहां में प्रकृति के मूल रूप को अपनी आंखों से देख सकू अपने कानों से सुन सकू और अपने हृदय की गहराइयों से महसूस कर सकू। इस कविता में वहां से तात्पर्य वैसी धनिया से है जहां मनुष्य के संघर्षमय माहौल को स्थगित किया जा सके।

व्याख्या : मैं उस जगह पर ढलती हुई शाम के रूप को देखना चाहता हूं और महसूस करना चाहता हूं कि शाम में, कैसे जीवन अपनी कोमल काया को विश्राम के लिए ढीला छोड़ देता है।

जो जीवन दिन भर सक्रिय रहता है वह शाम के विश्राम के लिए अपने शरीर को निष्क्रिय कर देता है। इस दृश्य को देखना चाहता हूं।

मैं उस गहरा ती हुई शाम के तारों की पंक्तियों को निकलते हुए देखना चाहता हूं और महसूस करना चाहता हूं कि यह तारे जीवन छाया के ढुलकते आंसुओं की तरह है।

प्रकृति के यह दृश्य जीवन की छाया के रूप में मेरे सामने घटित होते दिखाइए पढ़े ताकि मैं जान सकू कि मनुष्य का जीवन अपने प्राकृतिक रूप में किस तरह का है।

यह भी समझ सकू कि सांसारिक संघर्षों में जीवन को कितना और स्वाभाविक बना दिया है।

हे नाविक। मुझे उस जगह पर पहुंचकर एक और दृश्य देखना और महसूस करना है। रात के उस रूप को देखना चाहता हूं जिसमें श्रम से थकी सृष्टि विश्राम कर रही हो।

श्रम विश्राम के मिलन बिंदु की तरह बनी हुई उस रात को देखना चाहता हूं। रात मानो ढल रही हो और क्षितिज के तट पर प्रभात अंगड़ाइयां ले रहा हो। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

रात के विश्राम के बाद पुनः सृष्टि के विभिन्न घटक सृजन के कामों में लगते हुए ऐसी दिखाई पड़े मानो सुबह होते ही सृजन का मेला सा लग गया है।

मैं सुबह के उस दृश्य को देखना चाहता हूं कि क्या से पूछा कि आंखों से बरसती अखंड ज्योति, अमरण जागरण का संदेश लेकर आती है। हे नाविक। मुझे तुम ऐसे ही जगह पर ले चलो।

विशेष :-

. यह पलायन का गीत नहीं है।

. इसमें जीवन की आसक्ति से मुक्त होकर जीवन को समझने की कामना है।

. सांसारिक संघर्ष सोनी जीवन को वेदनामय बना दिया है।

. कवि का विचार है कि यह जीवन अपने मूल रूप में आनंदमुलक है।

. इसमें कवि की आकांक्षाओं का संसार व्यक्त हआ है।

. कविता की प्रत्येक पंक्ति में 16-16मात्राएं हैं।

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3 प्रथम रश्मि का आना रंगिणि ………………….. कुक उठी सहसा तरुवासिनि

उत्तर संदर्भ और प्रसंग :

सुमित्रानंदन पंत की प्रथम रश्मि कविता 1919 में लिखी गई थी और वीणा में संग्रहित हुई है। यह कविता छायावाद की शुरुआती कविताओं में प्रमुख है। इसमें छायावादी प्रवृत्तियों को प्रमुखता से व्यक्त होने का अवसर प्राप्त हुआ था। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

पंत ने प्रारंभिक दौर में ही जिस तरह की परिपक्व छायावादी काव्य भाषा प्राप्त कर ली थी उसका सुंदर उदाहरण है यह कविता।

पंत ने इस कविता में चिड़िया को संबोधित करके कुछ बातें कहीं हैं। यह चिड़िया किशोर उम्र की है। यह उसे बाल विहगिनी कहते हैं जिसका अर्थ है बालिका चिड़िया।

प्रकृति में मनुष्य को देखने का यह एक सुंदर उदाहरण है। वे उस चिड़िया से कोमलता पूर्वक बात करते हैं। एक तरफा संवाद में रूमानियत की अंतर धारा बहती हुई जान पड़ती है। नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक छायावाद में 1 अध्याय का नाम ही रखा है प्रथम रश्मि।

. कठिन शब्द
. प्रथम रश्मि

. सुबह की पहली किरण
. बाल बिहंगिनी

. किशोर उम्र की चिड़िया को संबोधन
. स्वप्न नीड़

. घोंसले मानव चिड़िया के सपनों को जगह देते हैं
. कामरूप
. अपनी इच्छा से रूप धारण करने वाले

व्याख्या :- बालिका चिड़िया को संबोधित करते हुए पंत कह रहे हैं कि हे रंगों वाली चिड़िया। कैसे पता चला कि सुबह होने वाली है? सुबह की पहली किरण के आने से पहले ही तुम उसके आने का संकेत कर देती हो।

तुम कैसे पहचान जाती हो कि प्रथम रश्मि आने वाली है? पंत की इस प्रकार की जिज्ञासा को बाल सुलभ जिज्ञासा कहा गया है। इस कविता में वे कई बार इस तरह की जिज्ञासा प्रकट करते हैं।

आगे पूछते हैं कि हे बाल विहगिनि। तुम्हें इतना सुंदर गायन कहां कहां से प्राप्त किया है?

भोर से पहले तुम अपने घोंसले में सोई थी और सुन्दर सपने देख रही थी। आते समय तुमने अपने शरीर को पंखों से ढक रखा था। इस तरह तुम सुख पूर्वक सोती हुई सपनों में डूबी थी।

तुम्हारे घोंसले के आसपास जुगनू घूम रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वे पहरेदार हूं और तुम्हारे दरवाजे की रक्षा कर रहे हैं। हालांकि सुबह होने तक वे जुगनू मानो थक गए थे और उघते हुए घूम घूम कर पहरेदारी कर रहे थे।

पंत भोर के पहले के कई दृश्य इस कविता में उपस्थित कर रहे हैं। अगला दृश्य यह है कि चांद की किरणों के सहारे बादल धरती पर उतर रहे थे। बादल तो कामरूप होते हैं और आकाश में चलते हैं

मगर चांदनी की डोर पकड़ कर और ओस की बूंदे बनकर वे धरती पर उतर आए हैं। उन बादलों के नवल कलियों के कोमल मुख को स्नेह प्रेम से चुम्मा है कि कलियों ने खेलते हुए मुस्कुराने की कला सीख ली है।

आकाश के तारे रात में दीपकों की तरह चमक रहे थे। भोर होने से पहले ऐसा लगा मानो उन दीपकों में तेल समापन हो गया हो और वे बुझते बुझते से जल रहे हो।

धरती पर हवा लगभग रुक गई थी। बेल के पत्ते ऐसे स्थिर हो गए थे मानों वे सांस भी नहीं ले रहे हो। धरती के सभी प्राणी सोए थे। चारों तरफ अंधेरा छाया था और केवल सपनों का आवागमन मालूम पड़ रहा था। किसी को आभास नहीं था कि अब रात समाप्त हो गई है और प्रथम रश्मि यहां पहुंचने के लिए चल पड़ी है।

विशेष :- छायावाद की शुरुआती कविताओं में प्रमुख है इसके प्रश्नों में बाल सुलभ जिज्ञासा है। यह कविता प्रकृति के सुकुमार कवि पंत की पहचान बन गई है। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

16 और 14 मात्राओं की पंक्तियों के क्रम में पूरी कविता लिखी गई है। प्रकृति में मनुष्य को देखने की छायावादी प्रवृत्ति का यह सुंदर उदाहरण है। अपने ढंग से जागरण की कविता है।

प्रश्न 4 भारतेंदु युगीन काव्य की पृष्ठभूमि पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

उत्तर (1) राजनीतिक पृष्ठभूमि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। यहाँ की राजनीतिक परिस्थिति को उन्होंने ध्यान से परखा उन्होंने देखा कि यहाँ के छोटे-छोटे राजाओं में आपसी शत्रुता कूट-कूट कर भरी हई है।

अपनी कूटनीति के बल पर शासकों से मित्रता और शत्रुता बढ़ा कर उन्होंने राजनीतिक शक्ति प्राप्त करनी शुरू कर दी औरंगजेब के बाद तो मुगल सामाज्य ताश के पत्तों की तरह गिरता गया। 1757 ई. में प्लासी की लड़ाई के बाद अंग्रेजों की शक्ति में बढ़ोत्तरी हई दक्षिण के मराठों की शक्ति को भी अंग्रेजों ने कम करना शुरू किया |

1764 ई. में बक्सर की लड़ाई में मुगलों के अंतिम समाट शाह आलम को भी अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया । अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में पूर्वी हिंदी प्रदेशों पर भी अंग्रेजों का प्रभुत्व कायम होने लगा।

इसके पहले के पचास वर्षों में अंग्रेजों ने मराठों, जाटों और सिखों को परास्त किया | असल में 1764 ई. की बक्सर की लड़ाई में सारा हिंदी प्रदेश अंग्रेजों के अधीन हो गया।

1826 ई. में भरतपुर पर कब्जा करके अंग्रेजों ने अपनी शक्ति बढ़ाई | 1849 ई. के द्वितीय सिख युद्ध के बाद संपूर्ण भारत पर अपनी शक्ति कायम करने के लिए अंग्रेजों के सामने कोई बाधा नहीं रही।

अपनी धूर्तनीति के बल पर उन्होंने 1885 ई. में अवध को भी अपने सामाज्य में मिला लिया। इस प्रकार व्यापार करने के उद्देश्य से आई हुई ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत पर पूर्ण राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो गया|

यदि अंग्रेज भारतीय वस्तुओं का व्यापार करफे मुनाफा ही कमाते तो भारत की आर्थिक स्थिति पर इसका अधिक प्रतिकूल असर नहीं पड़ता कितु इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यह स्थिति बदल गई।

इस देश से कच्चे माल का आयात किया जाता और फिर उससे तैयार माल को यहीं के बाजार में अधिक कीमत पर बेचा जाता। इस बदली हुई परिस्थिति के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को गहरा धकका लगा।

देशी कारीगर कंगाल होने लगे। कर व्यवस्था के कारण जनता को घोर कष्ट होने लगा। भारतीय जनता में असंतोष बढ़ने लगा। उधर जिन राजाओं और सामंतों की सत्ता छिन गई थी उनमें भी बदले की भावना बढ़ रही थी। परिणामत: 1857 ई. में जन विद्रोह भड़क उठा।

मुगल बादशाह बहादुरशाह को अपना नेता घोषित कर सामंतों और राजाओं ने फिर से अपने अधिकार पाने का प्रयत्न किया। उधर जनता भी इस विद्रोह में शामिल हो गई।

चूंकि एक संगठित योजना के अनुरूप विद्रोह की शुरुआत नहीं हई थी, इस कारण जगह-जगह अंग्रेजों ने इस विद्रोह को शक्ति से कुचल दिया। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

विद्रोह के बाद शासन यी बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकज़फर महारानी विक्टोरिया यो हाथ में चली गई। महारानी ने घोषणा पत्र जारी किया। किंतु यह एक छलावा था।

जनता की मलाई का प्रलोभन देकर शासन-तंत्र को मजबूत करने का कार्य हआ | साहित्य की उन्नति के लिए अंग्रेजों ने कोई कार्य नहीं किया। 1835 ई. में कवि घासीराम ने बहुत दुख के साथ लिखा, छोड़ के फिरंगन को राज, लै सुधर्म काज जहाँ होत पुन्य आज चलो वही देस को।”

किंतु महारानी विक्टोरिया के घोषणा-पत्र से सभी अमित हए । तत्कालीन कवियों ने रचनाओं में महारानी की प्रशंसा के गीत गाए। कुछ कार्यों से भारतीयों को लाभ भी हआ।

कॉलेजों की स्थापना से नई शिक्षा की शुरुआत हई। यातायात के साधनों, रेल, डाक, तार की व्यवस्था से अप्रत्यक्ष रूप से भारतीयों को लाभ हुआ। प्रेस की स्थापना से साहित्यिक रचनाओं के प्रचार-प्रसार में सहायता मिली।

किंतु 1885 ई. के पहले तक अंग्रेजों ने जितने भी कदम उठाए उसमें यहाँ के लोगों पर हर प्रकार के प्रतिबंध और शोषण से संबंधित कार्य शामिल थे।

भारतीयों को पश्चिम में पनपी समानता की विचारधारा का पता लग गया था | तत्कालीन प्रबुद्ध नेतागण देश के सामाजिक-राजनीतिक उत्थान के कार्य में लग गए थे। किंतु देश में ऐसे आधार की तलाश जारी थी

जिससे हर क्षेत्र के नेता एकजुट होकर विदेशी शासन के खिलाफ आवाज उठाते | अंततः सन् 1885 ई. में भारतीयों की अखिल भारतीय कांग्रेस की स्थापना से वह मंच मिल गया और अब संगठित रूप से जन आंदोलन शुरू हुआ | BHDC 133 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार भारतेंदु के आगमन और उनके जीवन की अल्पावधि के बाद एक ऐसा आंदोलन शुरू हुआ जिसने भारतीय जीवन के विभिन्न पक्षों को प्रभावित किया।

2) सामाजिक पृष्ठभूमि :– नई शिक्षा पद्धति के कारण भारतीय समाज में परिवर्तन का दौर शुरु हुआ। विदेशी शासन के कारण जनता का जो शोषण हो रहा था उसके विरुद्ध समाज में क्रांति का स्वरूप उभरने लगा था। भारतेंदु और उनके सहयोगियों का ध्यान सामाजिक कुरीतियों की ओर गया।

समाज की दुर्दशा देख कर तत्कालीन नेतागण जिनमें राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, रानाडे आदि थे, द्रवित हो उठे।

वे सामाजिक सुधार के लिए आगे बढ़े। मादक द्रव्यों, मांस आदि पर प्रतिबंध, धर्म के प्रसार तथा ईश्वर प्रेम के प्रचार के उददेश्य से 1873 ई. में ‘तदीय समाज’ की स्थापना हई भारतेंदु ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण अपनी रचना ‘भारत देशा’ में भी किया है।

भारतेंद् पुरुष और स्त्री की समानता और स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। नवजागरण के उद्देश्य से उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया।

समाज में घिर आई बुराइयों को दूर करने के लिए उन्होंने मंदिरों और मस्जिदों में व्याप्त भष्टाचार का भंडाफोड़ किया। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

तत्कालीन समाज दो वर्गों में बँट गया था। एक वर्ग प्राचीन मान्यताओं का पक्षपाती था तो दूसरा वर्ग अग्रगामी सोच वाला था। प्रगतिशील सोच वाले नेताओं ने सामाजिक संकीर्णताओं और रुढ़ियों को खत्म करने के लिए अनेक प्रयास किए। पर्दा प्रथा के कारण नारियों का उत्थान रुका हआ था।

उन्हें किसी प्रकार का सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं था। इस प्रकार समाज का आधा हिस्सा अविकसित था। स्त्रियों को भोग्य वस्तु समझा जाता और कई-कई स्त्रियों रखना शान-शौकत समझा जाता था।

सन् 1872 ई. में केशवचंद्र सेन के प्रयत्न से सरकार ने बाल-विवाह और बह-विवाह पर प्रतिबंध लगाया। राजा राममोहन राय के कठिन प्रयास से सन् 1829 ई. में सती प्रथा को दंडनीय घोषित किया गया।

किंतु इस प्रथा के बंद होने पर एक और समस्या समाज के सामने उठ खड़ी हई, वह थी विधवाओं की समस्या। ईश्वरचंद्र विदयासागर ने इस समस्या का समाधान पेश किया।

उनके प्रयास से ही सन् 1856 ई. में विधवा विवाह को वैध घोषित किया गया। धर्म के क्षेत्र में उस समय बहदेववाद का बोलबाला था। हिंदू धर्म के अंतर्गत ही कई संप्रदाय खड़े हो गए थे।

शैय, शाकस, वैष्णव विचारधारा वाले अपने-अपने संप्रदाय को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हए थे। कर्मकांड को बढ़ावा देकर पुजारी वर्ग लोगों से लाभ कमा रहा था। ये जनता को देवता के कोप का भय दिखाकर ठगते |

इन सब कुरीतियों को रोकने के लिए समाज सुधारकों ने आंदोलन शुरु किया। दूसरी ओर ईसाई पादरी भी अपने मत का प्रचार करने में लगे हुए थे। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

हिंदू समाज के सारे रीति-रिवाजों में खामियों निकाल कर ईसाई धर्म का प्रचार करना ही पादरियों का मुख्य कार्य बन गया था कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग जाग उठा था। उसमें सोचने समझने की शक्ति आ चुकी थी।

अपने समाज के रीति रिवाजों को वैज्ञानिक ढंग से परखने की शक्ति ने जहाँ अच्छी बातों को बनाए रखा वहीं उन बातों को दूर करने का प्रयास किया जिससे वास्तव में हानि ही हानि हो रही थी।

समाज में नई चेतना लाने के लिए पश्चिम में हई ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के समाचार को प्रचारित कियागया। तत्कालीन साहित्यकारों ने कविताओं और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से जन जागरण में हाथ बँटाया।

3) साहित्यिक पृष्ठभूमि भारतेंदु युग से पहले सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में रीतिकालीन परंपरा का ही जोर था। अंग्रेजों के आगमन के बाद इस स्थिति में परिवर्तन आया अंग्रेजों ने अपनी जरूरत के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज की इससे गद्य का विकास हुआ |

आधुनिक युग की बदली हुई परिस्थिति में साहित्य के विषय बदल गए |

अब देश की दुर्दशा, धन के शोषण आदि विषयों पर लिखा जाने लगा। हालाँकि कविता में ब्रजमाषा तथा रीतिकालीन विषय की उपस्थिति बनी रही।

भाषा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन उपस्थित होने लगा। ब्रजभाषा और अक्धी को लेकर जो मान्यता स्थापित हो गई थी उसमें परिवर्तन आ गया। अब ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली में साहित्य रचा जाने लगा।

यद्यपि ब्रजभाषा में रचना एकदम समाप्त नहीं हो गई किंतु खड़ी बोली के गद्य के अनुकूल होने के कारण ब्रजभाषा की प्रमुखता कम हो गईं | खुसरो और कबीर द्वारा बनाई गई भाषा का विकास होने लगा।

कितु हिंदी साहित्य में इस प्रकार का परिवर्तन क्या बिना किसी के नेतत्व के हो गया। ऐसा नहीं था। हिंदी साहित्य के इसयुगांतकारी परिवर्तन को लाने का श्रेय युगपुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र को है।

उन्हीं के प्रयास से हिंदी गद्य की विविध विधाओं में समयोचित परिवर्तन हुआ | भारतेंदु ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी| आइए इस युग के साहित्य का परिचय प्राप्त करें।

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प्रश्न 5 द्विवेदी युग के प्रमुख कवियों का परिचय दीजिए।

उत्त्तर महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका युग : द्विवेदी युग का नामकरण आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर किया गया। उन्होंने ‘सरस्वती’ नामक पत्रिका के सम्पादक के रूप में हिंदी जगत की महान सेवा की और हिंदी साहित्य की दिशा एवं दशा को बदलने में अभूतपूर्व योगदान किया।

महावीरप्रसाद द्विवेदी सन 1903 में सरस्वती पत्रिका के सम्पादक बने। इससे पहले वे रेल विभाग में नौकरी करते थे। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से कवियों को नायिका भेद जैसे विषय छोड़कर विविध विषयों पर कविता लिखने की प्रेरणा दी, काव्यभाषा के रूप में ब्रजभाषा को त्यागकर खड़ी बोली का प्रयोग करने का सुझाव दिया। जिससे गद्य और पद्य को भाषा एक हो सके।

द्विवेदी जी ने ‘कवि कर्त्तव्य’ जैसे निबंधों द्वारा कवियों को उनके कर्तव्य का बोध कराते हुए अनेक दिशा निर्देश दिए। जिससे विषय-वस्तु, भाषा-शैली, छंद योजना आदि अनेक दृष्टियों से काव्य में नवीनता का समावेश हुआ।

द्विवेदी जी ने भाषा संस्कार, व्याकरण शुद्धि, विराम चिह्नों के प्रयोग द्वारा हिंदी को परिनिष्ठित रूप प्रदान करने का प्रशंसनीय कार्य किया।

हिंदी नवजागरण और सरस्वती पत्रिका :

हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल वस्तुतः जागरण का सन्देश लेकर आया। सन 1857 ई. में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने नवजागरण का बिगुल बजा दिया और भारतीय जनमानस में देशभक्ति, स्वतंत्रता, राष्ट्र उत्थान, स्वदेशाभिमान की भावनाएं जाग्रत होने लगीं।

इसीलिए हिंदी नवजागरण को हिन्दू जाति का जागरण माना है। सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन सन 1900 ई.से प्रारम्भ हुआ तथा सन 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका सम्पादन भर संभाला।

द्विवेदी जी इस पत्रिका में ऐसे लेखों को प्रकाशित किया जिन्होंने नवजागरण की लहर को प्रसारित करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी से प्रेरणा लेकर तथा उनके आदर्शों को लेकर आगे बढ़ने वाले अनेक कवि सामने आए जिसमें प्रमुख हैं-मैथिलीशरण गुप्त, गोपालशरण सिंह, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ और लोचनप्रसाद पाण्डेय आदि।

इसके अलावा बहुत सारे ऐसे कवि जो पहले ब्रजभाषा में कविता लिख रहे थे तथा उनकी विषय वस्तु एवं शैली प्राचीन पद्धति पर थी,

अब द्विवेदी जी एवं ‘सरस्वती’ से प्रेरित होकर काव्य के चिर-परिचित उपादानों को छोड़कर नए विषयों पर खडी बोली में कविता लिखने लगे।

ऐसे कवियों में प्रमुख हैं- अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ तथा राय देवीप्रसाद पूर्ण’। इन सभी कवियों की कविताएं नवजागरण, राष्ट्रीयता, स्वदेशानुराग एवं स्वदेशी भावना से परिपूर्ण हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है-“खड़ी बोली के पद्य विधान पर द्विवेदी जी का पूरा-पूरा असर पड़ा। बहुत से कवियों की भाषा शिथिल और अव्यवस्थित होती थी।

द्विवेदी जी ऐसे कवियों की भेजी हुई कविताओं की भाषा आदि दुरुस्त करके ‘सरस्वती’ में छापा करते थे। इस प्रकार कवियों की भाषा साफ होती गई और द्विवेदी जी के अनुकरण में अन्य लेखक भी शुद्ध भाषा लिखने लगे।” वस्तुतः ‘सरस्वती’ पत्रिका ने भाषा और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में परिष्कार किया।

मैथिलीशरण गुप्त :- राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के सबसे बड़े कवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से विदेशी पराधीनता से राष्ट्र को मुक्त करने के लिए सुप्त जनमानस को झकझोर कर राष्ट्र गौरव की चेतना जगाई। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

उक्त बातें सिमुलतला आवासीय विद्यालय में महाकवि राम इकबाल सिंह राकेश साहित्य परिषद के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती के अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य डॉ. राजीव रंजन ने कही।

उन्होंने कहा कि आज के समय में जब युवाओं के मन में राष्ट्रीय चेतना का लोप होता जा रहा है, राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की कृतियां और कविताएं उन्हें भारतीय सनातन संस्कृति और राष्ट्रवाद के गौरव से भर सकती है।

आज जरूरत है कि स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में गुप्त की रचना को शामिल किया जाए। व्यंग्यकार डॉ. सुधांशु कुमार ने कहा कि गुप्त की रचनाएं भारतीय सनातन संस्कृति की झांकी और राष्ट्रीयता का उद्घोष है।

द्विवेदी युग के वह सबसे बड़े कवि थे। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को काव्यभाषा के आसन पर बिठाया और अत्यंत सहज सरल काव्य शैली से सामान्य सुप्त जनमानस को झकझोरा।

डॉ. शिप्रा ने कहा कि रामचरित मानस के बाद साकेत सबसे महान प्रबंध काव्य है जिसमें भारतीय वैज्ञानिक सनातन संस्कृति और उज्ज्व ल परंपरा संरक्षित है।

रंजय कुमार और राधाकांत दुबे ने मैथिली शरण गुप्त की कविताओं को भारतीय गौरव की आधारशिला बताया। शिक्षिका कुमारी नीतू ने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त बड़े कवि थे।

उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से विदेशी पराधीनता से राष्ट्र को मुक्त करने के लिए जनमानस को जगाने का काम किया।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध : द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि और गद्य लेखक अयोध्या सिंह उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में निजामाबाद में हुआ था !

इनके पिता का नाम पं० भोलासिंह उपाध्याय था, इन्होंने सिख धर्म को अपनाकर अपने नाम में सिंह शब्द को जोड़ लिया, किन्तु इनके पूर्वज सनाढ्य ब्राह्मण थे और पूर्वजों का मुगल शासकों के दरबार में बहत ही सम्मान था, हरिओध जी की प्रारम्भिक शिक्षा इनके गाँव निजामाबाद में सम्पन्न हुई. पांच वर्ष की अवस्था में इन्होंने ।

अपने चाचा के संरक्षण में फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया, गाँव से आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये बनारस के क्वींस कालेज में अंग्रेज़ी पढने गये किन्तु कुछ समय के उपरांत इनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया जिसकी वजह से इन्होंने क्वींस कालेज की शिक्षा को अधूरे पर ही छोड़कर वापस अपने गाँव निजामाबाद आ गये, गाँव आने के बाद इन्होंने अपने घर से ही संस्कृत,उर्दू, फारसी ओए अंग्रेज़ी आदि का गहन अध्ययन किया,

यह एक सरल स्वभाव के बालक थे जो अपनी सरलता के कारण काफी चर्चित थे, 1884 ई० में इन्होने निजामाबाद के उच्च प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक के पद पर अपनी सेवाओं को देना आरम्भ किया, नौकरी प्रारम्भ करने के कुछ वर्षों में ही इनका विवाह आनन्द कुमारी के साथ हो गया

रामनरेश त्रिपाठी BHDC 133 Free Assignment In Hindi

रामनरेश त्रिपाठी का जन्म सन् 1889 ई0 में जिला जौनपुर (उ0 प्र0) के अन्तर्गत कोइरीपुर ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। घर के धार्मिक वातावरण तथा पिता की परमेश्वर भक्ति का पूरा प्रभाव बालक रामनरेश पर प्रारम्भ से ही पड़ा।

केवल नवीं कक्षा तक स्कूल में पढ़ने के पश्चात् इनकी पढ़ाई छूट गयी। बाद में इन्होंने स्वाध्याय से हिन्दी, अंग्रेजी, बँगला, संस्कृत, गुजराती का गम्भीर अध्ययन किया और साहित्यसाधना को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। सन् 1962 ई० में इनका स्वर्गवास हो गया।

त्रिपाठीजी मननशील, विद्वान् तथा परिश्रमी थे। ये द्विवेदी युग के उन साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने द्विवेदी मण्डल प्रभाव से पृथक रहकर अपनी मौलिक प्रतिभा से साहित्य के क्षेत्र में कई कार्य किये।

त्रिपाठीजी स्वच्छन्दतावादी कवि थे,ये लोकगीतों के सर्वप्रथम संकलनकर्ता थे। काव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध, आलोचना तथा लोक-साहित्य आदि विषयों पर इनका पूर्ण अधिकार था। त्रिपाठीजी आदर्शवादी थे।

चनाएँ : इनकी रचनाओं में नवीन आदर्श और नवयुग का संकेत है। इनके द्वारा रचित पथिक और ‘ मिलन’ नामक खण्डकाव्य अत्यन्त लोकप्रिय हए। इनकी रचनाओं की विशेषता यह है कि उनमें राष्ट्र-प्रेम तथा मानव-सेवा की उत्कृष्ट भावनाएं बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित हुई हैं।

इसके अतिरिक्त भारतवर्ष की प्राकृतिक सुषमा और पवित्रप्रेम के सुन्दर चित्र भी इन्होंने अपनी कविताओं में चित्रित किये हैं। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 6 छायावाद के रचना विधान पर विचार कीजिए।

त्तर छायावाद ने शिल्प विधि में अपनी पृथक पहचान बनाई है। इन कवियों के काव्य सौष्ठव को समझने के लिए इनके बिम्ब-विधान अथवा कल्पना विधान को भली-भांति समझना होगा और उसी के साथ-साथ इनकी काव्य-भाषा तथा काव्य शिल्प को भी।

स्वच्छंद कल्पना का नवोन्मेष : छायावादी कविता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है- अनुभूति और कल्पना का नवोन्मेष । प्रसाद जी का कल्पना-विधान तो बहुत ही विलक्षण है।

कामायनी में श्रद्धा की मुख-छवि कवि को घटाटोप के बीच में खिले गुलाबी रंग के बिजली के फूल जैसी प्रतीत होती है। उस मुख पर थिरकती हुई स्मिति को कवि ने अनेक उत्प्रेक्षाओं द्वारा स्थापित किया है।

प्रसाद जी की कल्पनाएँ बहुत सुदूरगामी हैं। प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने बड़े विराट एवं सूक्ष्म बिम्ब प्रस्तुत किए हैं। कवि ने पृथ्वी को सिन्धु की सेज पर संकुचित बैठी हुई नवोढ़ा वधू के रूप में जिस प्रकार चित्रित किया है,

वह एक विदग्ध कल्पना है “सिन्धु सेज पर धारा वधू अब, तनिक संकुचित बैठी सी”। इसी प्रकार हिमालयी प्रकृति को श्वेत कमल कहना और उस पर प्रतिबिम्बित अरूणिमा को “मधुमय पिंग पराग” कहना विलक्षण उक्ति है।

कल्पना और अनुभूति का ऐसा मणिकांचन संयोग दुष्कर है। प्रसाद की काव्य कला बिंबविधायिनी कल्पना और रूपक रचना के सहारे बहुशः व्यक्त हुई है।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

“बीती विभावरी जागरी” शीर्षक गीत इसका विरल उदाहरण है। इन कल्पना चित्रों में बड़ी गूढार्थ व्यंजना है। कवि ने अप्रस्तुतों का प्रयोग करके यत्र-तत्र बिंबमाला-सी उपस्थित कर दी है। बिंबधर्मिता उनकी काव्य कुशलता की सर्वोपरि सिद्धि है।

काव्य-भाषा : छायावादी कवियों ने काव्य शिल्प को सर्वाधिक प्राथमिकता दी है। प्रसाद जी के अनुसार काव्य के सौन्दर्यबोध का मुख्य आधार है- शब्द विन्यास-कौशल।

निराला ने भी काव्य के भावात्मक शब्दों को ध्वनि और शब्द व्यापार कहा है और पन्त ने शब्द चित्र, चित्रभाषा तथा भावावेश मयी भाषा पर बल दिया है। वस्तुतः इन कवियों को शब्द प्रिय रहे हैं।

निराला जी तो घोषणा करते हैं कि “एक-एक शब्द बंधा ध्वनिमय साकार महादेवी जी भी टकसाली और स्वच्छ भाषा के प्रयोग में बहुत सचेत रही हैं।

तात्पर्य यह है कि छायावादी काव्य भाषा ललित-लवंगी कोमल-कांत-पदावली की भाषा है। उसमें असाधारण लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ, प्रतीकार्थ, अमूर्तन व्यापार और संप्रेक्षण की संवेदना है।

काव्य-शिल्प :

छायावादी काव्य की छन्द योजना वैविध्यमयी है। निराला जी ने प्रथम बार मुक्त छन्द का आविष्कार करके कविता को तुकबंदी से मुक्त किया था। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

इन कवियों ने प्रायः सभी प्रकार के प्रयोग किए हैं, जिसमें अंग्रेजी के सानेट, फारसी के बहर, गजल, संस्कृत के वार्णिक और मात्रिक छंद उल्लेखनीय हैं।

इन्होंने लोकधुनों को अपने छंदों में बांधा है और अपने कुछ नये छंद निर्मित किए हैं। इनके छंदों में ध्वन्यात्मकता का निर्वाह हुआ है और ओज, प्रसाद, माधुर्य तथा प्रायः समस्त कृतियों अथवा शैलियों का प्रयोग भी।

प्रश्न 7 महादेवी वर्मा के काव्य की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित कीजिए।

उत्तर छायावादी कवियों के काव्य में प्रकृति चित्रण एक प्रमुख विशेषता रही है। आपके काव्य में भी प्रकृति का मर्मस्पर्शी और मनोहारी चित्रण उपस्थित है।

आपकी कविताएँ गीतों के रूप में भी प्रसिद्ध हैं। लय, ताल, गति, तुकबन्दी आदि की उपस्थिति के कारण गेयता का तत्त्व भी आपकी लगभग सभी कविताओं में उपस्थित है।

आपके काव्य में बिम्ब और प्रतीकों का भी कुशलतापूर्वक प्रयोग किया गया है।

भाषा में तत्सम शब्दों की प्रधानता है लेकिन तत्सम शब्दों की उपस्थिति के बाद भी आपका काव्य जटिल नहीं हुआ है।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

आपका काव्य अलंकारों से सुसज्जित है। सबसे अधिक लगाव आपको रूपक अलंकार से है। कुछ लोगों का आरोप है कि आपका काव्य पलायनवादी है लेकिन यदि सूक्ष्म स्तर पर आपके काव्य का अध्ययन किया जाए तो यह कर्मवाद की प्रेरणा देता है।

यदि रस योजना की बात करें तो आपके काव्य में शृंगार रस की उपस्थिति बहुतायत में है। संयोग और वियोग दोनों उपस्थित हैं लेकिन विरह वेदना के कारण वियोग शृंगार की प्रधानता हैं।

समग्रतः स्पष्ट है कि आपके काव्य में विरह की वेदना के साथ ही प्रेमानुभूति-वैयक्तिकताचित्रात्मकता-दार्शनिकता-आत्मीयता-संगीतात्मकता-भाव प्रवणता-आत्मनिवेदन-मार्मिकता और भावनात्मक रहस्यवाद जैसे तत्त्व उपस्थित हैं।

आपके काव्य में उपस्थित विरह वेदना की गहनता के कारण आपको ‘आधुनिक युग की मीरा’ भी कहा जाता है। छायावादी काव्य एक नई संवेदनशीलता का काव्य था। इस युग के कवि विशिष्ट अर्थ में संवेदनशील थे।

महादेवी वर्मा के संदर्भ में उनका व्यक्तित्व अपनी इंद्रधनुषी आभा लिए उनके काव्य-लोक में उपस्थित होता है। इस प्रसंग में उनका नारी होना उनके पक्ष में जाता है। उन्होंने काव्य रचना को अत्यंत गंभीरता से लिया है।

उनकी जीवन-दृष्टि मानवीय गुणों से सम्पृक्त और संवेदनाओं से अनुप्राणित है। उसमें उदात्त और गौरवमय भाव मिलते हैं और समस्त प्राणि-जगत के प्रति उनकी करुणा उमड़ी पड़ती है।

आगे के अंशों में हम इन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे और महादेवी की कविताओं में उनका अवतरण भी देखेंगे। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

छायावादी युग भारतीय नवजागरण का काल था, जहाँ सभी स्तरों पर मुक्ति के लिए संघर्ष सक्रिय था। नारी भी अपनी मुक्ति की खोज में रत थी। महादेवी में मुक्ति की उड़ान स्पष्ट, असीम और अनंत है।

उनमें नारी के अभिमानी रूप की अभिव्यंजना हुई है। मुक्ति की आकांक्षा भाषा के स्तर पर भी प्रकट होती है और शिल्प के स्तर पर भी। छायावादी भाव-बोध के लिए गीत आदर्श विधा बनकर आई।

महादेवी ने अपने काव्य के लिए गीत विधा को ही चुना। वस्तुतः अपने गीत काव्य में महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना का सहज प्रत्यक्षीकरण हुआ है।

अपने युग का अध्यात्म और भौतिकता का द्वंद्व उन्हें रहस्य का आवरण लेने को बाध्य करता है और वह अभिव्यक्ति के स्तर पर प्राय: प्रतीक का सहारा लेती हैं।

महादेवी की रहस्य भावना पर हम आगे सविस्तार चर्चा करेंगे। जबकि उनकी प्रतीक योजना पर हम अलग इकाई में प्रकाश डालेंगे।

महादेवी की काव्य संवेदना की निर्मिति और विकास में उनके व्यक्तिगत एकाकीपन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसकी वेदना विभिन्न आयामों में उनके काव्य में प्रकट हुई है। वेदना के विविध रूपों की उपस्थिति उनके काव्य जगत की विशिष्टता है।

प्रश्न 8 भारतेंदु युगीन काव्य की नवीन प्रवृत्तियों की चर्चा कीजिए।

उत्तर देशप्रेम की व्यंजना :अंग्रेजों के दमन चक्र के आतंक में इस युग के कवि पहले तो विदेशी शासन का गुणगान करते नजर आते हैं परम दुखमय तिमिर जब भारत में छायो, तबहिं कृपा करि ईश ब्रिटिश सूरज प्रकटायो॥ BHDC 133 Free Assignment In Hindi

किंतु शीघ्र ही यह प्रवृत्ति जाती रही।मननशील कवि समाज राष्ट्र की वास्तविक पुकार को शीघ्र ही समझ गया और उसने स्वदेश प्रेम के गीत गाने प्रारम्भ कर दिए

   बहुत दिन बीते राम,प्रभु खोयो अपनो देस।
   खोवत है अब बैठ के,भाषा भोजन भेष ||
   (बालमुकुन्द गुप्त)

विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार,ईश्वर से स्वतंत्रता की प्रार्थना आदि रूपों में भी यह भावना व्यक्त हुई।इस युग की राष्ट्रीयता सांस्कृतिक राष्ट्रीयता है, जिसमें हिंदू राष्ट्रीयता का स्वर प्रधान है।

देश-प्रेम की भावना के कारण इन कवियों ने एक ओर तो अपने देश की अवनति का वर्णन करके आंसू बहाए तो दूसरी ओर अंग्रेज सरकार की आलोचना करके देशवासियों के मन में स्वराज्य की भावना जगाई। अंग्रेजों की कूटनीति का पर्दा फाश करते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा

   सत्रु सत्रु लड़वाइ दूर रहि लखिय तमाशा।
   प्रबल देखिए जाहि ताहि मिलि दीजै आसा॥

इसी प्रकार जब काबुल पर अंग्रेजों की विजय होने पर भारत में दिवाली मनाई गई तो भारतेंदु ने उसका विरोध करते हुए लिखा BHDC 133 Free Assignment In Hindi

   आर्य गनन को मिल्यौ, जो अति प्रफुलित गात।
   सबै कहत जै आजु क्यों, यह नहिं जान्यौ जात॥
   सुजस मिलै अंग्रेज को, होय रूस की रोक।
   बट्टै ब्रिटिश वाणिज्य पै, हमको केवल सोक॥

सामाजिक चेतना और जन-काव्य : समाज-सुधार इस युग की कविता का प्रमुख स्वर रहा।इन्होंने किसी राजा या आश्रयदाता को संतुष्ट करने के लिए काव्य-रचना नहीं की, बल्कि अपने हृदय की प्रेरणा से जनता तक अपनी भावना पहुंचाने के लिए काव्य रचना की।ये कवि पराधीन भारत को जगाना चाहते थे,

इसलिए समाज-सुधार के विभिन्न मुद्दों जैसे स्त्रीशिक्षा,विधवा-विवाह,विदेश-यात्रा का प्रचार, समाज का आर्थिक उत्थान और समाज में एक दूसरे की सहायता आदि को मुखरित किया; यथा – निज धर्म भली विधि जानें, निज गौरव को पहिचानें। स्त्री-गण को विद्या देवें, करि पतिव्रता यज्ञ लेवैं ॥

(प्रताप नारायण मिश्र)

    हे धनियो क्या दीन जनों की नहिं सुनते हो हाहाकार।
    जिसका मरे पड़ोसी भूखा, उसके भोजन को धिक्कार॥

भक्ति-भावना : इस युग के कवियों में भी भक्ति-भावना दिखाई पड़ती है,लेकिन इनकी भक्तिभावना का लक्ष्य अवश्य बदल गया।

अब वे मुक्ति के लिए नहीं, अपितु देश-कल्याण के लिए भक्ति करते दिखाई देते हैं – कहाँ करुणानिधि केशव सोए। जगत नाहिं अनेक जतन करि भारतवासी रोए। (भारतेंदु हरिश्चंद्र)

हिंदू-संस्कृति से प्यार: पिछले युगों की प्रतिक्रिया स्वरूप इस युग के कवि-मानस में अपनी संस्कृति के अनुराग का भाव जाग उठा। यथा –BHDC 133 Free Assignment In Hindi

     सदा रखें दृढ़ हिय मँह निज साँचा हिन्दूपन।
     घोर विपत हूँ परे दिगै नहिं आन और मन ||
    (बालमुकुन्द गुप्त)

प्राचीनता और नवीनता का समन्वय: इन कवियों ने एक ओर तो हिंदी-काव्य की पुरानी परम्परा के सुंदर रूप को अपनाया, तो दूसरी ओर नयी परम्परा की स्थापना की।

इन कवियों के लिए प्राचीनता वंदनीय थी तो नवीनता अभिनंदनीय।अत: ये प्राचीनता और नवीनता का समन्वय अपनी रचनाओं में करते रहे।

भारतेंदु अपनी “प्रबोधिनी” शीर्षक कविता में “प्रभाती” के रूप में प्राचीन परिपाटी के अनुसार कृष्ण को जगाते हैं और नवीनता का अभिनंदन करते हुए उसमें राष्ट्रीयता का समन्वय करके कहते हैं :
डूबत भारत नाथ बेगि जागो अब जागो.

निज भाषा प्रेम : इस काल के कवियों ने अंग्रेजों के प्रति विद्रोह के रूप में हिंदी-प्रचार को विशेष महत्त्व दिया और कहा –

क) निज-भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
(भारतेंदु)

ख) जपो निरंतर एक जबान, हिंदी,हिंदू, हिंदुस्तान।
(प्रताप नारायण मिश्र)

यद्यपि इस काल का अधिकतर साहित्य ब्रजभाषा में ही है, किंतु इन कवियों ने ब्रजभाषा को भी सरल और सुव्यवस्थित बनाने का प्रयास किया।खड़ी बोली में भी कुछ रचनाएँ की गई, किंतु वे कथात्मकता और रुक्षता से यक्त हैं।

शृंगार और सौंदर्य वर्णन : इस युग के कवियों ने सौंदर्य और प्रेम का वर्णन भी किया है,किंतु उसमें कहीं भी कामुकता और वासना का रंग दिखाई नहीं पड़ता।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

इनके प्रेम-वर्णन में सर्वत्र स्वच्छता एवं गंभीरता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य से एक उदाहरण दृष्टव्य है: हम कौन उपाय करै इनको हरिचन्द महा हठ ठानती हैं। पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँकियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं॥

हास्य-व्यंग्य: भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं उनके सहयोगी कवियों ने हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति भी मिलती है। उन्होंने अपने समय की विभिन्न बुराइयों पर व्यंग्य-बाण छोड़े हैं। भारतेंदु की कविता से दो उदाहरण प्रस्तुत हैं:

क) भीतर भीतर सब रस चूसै
हंसि-हसि कै तन-मन-धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज,
क्यों सखि सज्जन नहिं अंगरेज॥

ख) इनकी उनकी खिदमत करो,
रुपया देते-देते मरो ।
तब आर्वै मोहिं करन खराब,
क्यों सखि सज्जन नहीं खिताब॥

प्रकृति-चित्रण : इस युग के कवियों ने पूर्ववर्ती युगों की अपेक्षा प्रकृति के स्वतंत्र रुपों का विशेष चित्रण किया है। भारतेंदु के “गंगा-वर्णन” और “यमुना-वर्णन” इसके निदर्शन हैं।

ठाकुर जगमोहन सिंह के स्वतंत्र प्रकृति के वर्णन भी उत्कृष्ट बन पड़े हैं। प्रकृति के उद्दीपन रूपों का वर्णन भी इस काल की प्रवृत्ति के रूप जीवित रहा।

रस : इस काल में शृंगार, वीर और करुण रसों की अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति प्रबल रही, किंतु इस काल का शृंगार रीतिकाल के शृंगार जैसा नग्न शृंगार न होकर परिष्कृत रुचि का शृंगार है।देश की दयनीय दशा के चित्रण में करुण रस प्रधान रहा है।

भाषा और काव्य-रूप : इन कवियों ने कविता में प्राय: सरल ब्रजभाषा तथा मुक्तक शैली का ही प्रयोग अधिक किया।ये कवि पद्य तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि गद्यकार भी बने।

इन्होंने अपनी कलम निबंध, उपन्यास और नाटक के क्षेत्र में भी चलाई। इस काल के कवि मंडल में कवि न केवल कवि था बल्कि वह संपादक और पत्रकार भी था।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार भारतेंदु-युग साहित्य के नव जागरण का युग था, जिसमें शताब्दियों से सोये हुए भारत ने अपनी आँखें खोलकर अंगड़ाई ली और कविता को राजमहलों से निकालकर जनता से उसका नाता जोड़ा।

उसे कृत्रिमता से मुक्त कर स्वाभाविक बनाया,शृंगार को परिमार्जित रूप प्रदान किया और कविता के पथ को प्रशस्त किया।

भारतेंदु और उनके सहयोगी लेखकों के साहित्य में जिन नये विषयों का समावेश हुआ ,उसने आधुनिक काल की प्रवृत्तियों को जन्म दिया। इस प्रकार भारतेंदु युग आधुनिक युग का प्रवेश द्वार सिद्ध होता है।

प्रश्न 9 प्रियप्रवास का महत्व बताए ।

उत्तर प्रियप्रवास विरहकाव्य है। कृष्णकाव्य की परम्परा में होते हुए भी, उससे भिन्न है। “हरिऔध” जी ने कहा है – मैंने श्री कृष्णचंद्र को इस ग्रंथ में एक महापुरुष की भाँति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं।

कृष्णचरित को इस प्रकार अंकित किया है जिससे आधुनिक लोग भी सहमत हो सकें।

महापुरुष के रूप में अंकित होते हुए भी “प्रियप्रवास” के कृष्ण में वही अलौकिक स्फूर्ति है जो अवतारी ब्रह्मपुरुष में। कवि ने कृष्ण का चरित्रचित्रण मनोवैज्ञानिक दृष्टि से किया है, उनके व्यक्तित्व में सहानुभूति, व्युत्पन्नमतित्व और कर्मकौशल है।

कृष्ण के चरित्र की तरह “प्रियप्रवास” की राधा के चरित्र में भी नवीनता है। उसमें विरह की विकलता नहीं है, व्यथा की गंभीरता है। उसने कृष्ण के कर्मयोग को हृदयंगम कर लिया है।

कृष्ण के प्रति उसका प्रेम विश्वात्म और उसकी वेदना लोकसेवा बन गई है। प्रेमिका देवी हो गई है, वह कहती हैं :

   आज्ञा भूलूँ न प्रियतम की, विश्व के काम आऊँ
   मेरा कौमार-व्रत भव में पूर्णता प्राप्त होवे।

“प्रियप्रवास” में यद्यपि कृष्ण महापुरुष के रूप में अंकित हैं, तथापि इसमें उनका यह रूप आनुषंगिक है। वे विशेषत: पारिवारिक और सामाजिक स्वजन हैं।BHDC 133 Free Assignment In Hindi

जैसा पुस्तक के नाम से स्पष्ट है, मुख्य प्रसंग है – “प्रियप्रवास”, परिवार और समाज के प्रिय कृष्ण का वियोग।

अन्य प्रसंग अवांतर हैं। यद्यपि वात्सल्य, सख्य और माधुर्य का प्राधान्य है और भाव में लालित्य है, तथापि यथास्थान ओज का भी समावेश है।

समग्रत: इस महाकाव्य में वर्णनबाहुल्य और वाक्वैदग्ध्य का आधिक्य है। जहाँ कहीं संवेदना तथा हार्दिक उद्गीर्णता है, वहाँ रागात्मकता एवं मार्मिकता है।

विविध ऋतुओं, विविध दृश्यों विविध चित्तवृत्तियों और अनुभूतियों के शब्दचित्र यत्रतत्र बड़े सजीव है।

प्रश्न 10 निराला काव्य की अंतर्वस्तु को रेखांकित कीजिए।

उत्तर निराला काव्य की अंतर्वस्तु

1.काव्य संवेदना : निराला का काव्य लोक निराला के समान ही विराट, उदार और विस्तृत है। निराला के पास महाकवि की वह सूक्ष्म दृष्टि थी जिसने अपने आसपास के जीवन को बड़ी गहराई से देखा निराला काव्य में छायावादी युग की अंतर्वस्तु के सभी तत्व तो मिलते ही हैं

साथ ही प्रयोग सील एवं प्रगति वादी विचारों की गहरी छाप भी मिलती है किंतु निराला सारे वादों की सीमा को पार करते चले गए हैं। उनकी काव्य संवेदना के लिए सारे सीमित बाद छोटे हैं।

निराला काव्य में संवेदना के मुख्य स्वर निम्न प्रकार से देखे जा सकते हैं

राष्ट्रीयता की भावना : निराला नवजागरण काल के कवि हैं। राष्ट्र को पराधीनता के बंधन से मुक्त देखने की लालसा BHDC 133 Free Assignment In Hindi

उस काल के प्राय : सभी कवियों के काव्य का मुख्य विषय रहा है। निराला काव्य में राष्ट्रीय भावना का धरातल बड़ा विस्तृत और बहुरंगी है। निराला ने असंख्य गीतों में भारत के गौरव का गाना मा भारती का शत-शत समरण कर जातीय जीवन में उत्तेजना के प्राण फुके हैं।

अद्वैत भागना : राष्ट्रीयता के अतिरिक्त अन्य तत्वों की संवेदना का संसपर्क निराला काव्य की अंतर्वस्तु में मुख्यता गया गया है।

करुणा एवं पीड़ा : निराला काव्य में पीड़ा एवं करुणा की गहरी व्यंजनाएं देखने को मिलती हैं। कवि की संवेदना का विस्तार स्वर से लेकर जगती की विभिन्न बदलती हुई स्थितियों तक छाया हुआ है।

व्यंग्य एवं आक्रोश : निराला काव्य की संवेदना में व्यंग्य एवं आक्रोश का भाव बड़े पहने रूप से व्यक्त किया गया है। सामाजिक विषमताओं के प्रति निराला सदैव ही विद्रोही रहे हैं।

2.परंपरा और आधुनिकता की टककराहट

निराला का व्यक्तित्व बहुआयामी है जिसमें अनेक विरोधी तत्वों का सामाजिक से हम देखते हैं। महान काव्य की संवेदना भी असीम और उदात्त होती है।

निराला की प्रकृति ही स्वच्छंद थी परंपरा के बाधक रूप से उन्होंने सदैव टक्कर ली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का युग परंपराओं का युग कहलाता है।

  1. काव्य अनुभूति में विद्रोह का स्वर या भाव भूमि

निराला क्रांतिकारी कवि हैं। सामाजिक रूढ़ियों और विष्णु ताऊ के प्रति उनकी निर्भीक वाणी ने सदैव चोट की है। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

  1. सौंदर्य अनुभूति के उपादान

कवि की विधि है संवेदना प्रवण का ह्रदय। जिसमें अनगिनत भावनाओं का विशाल रूप निवास करता है। विश्व के विस्तृत असम राज्य में कभी अपनी सौंदर्य अनुभूति के रूप की ही झांकी देखता है।

प्रश्न 11 मैथिलीशरण गुप्त की काव्य में अंतर्निहित मानवतावादी दृष्टिकोण का परिचय दीजिए

उत्तर आधुनिक युग में मनुष्य का विश्वास अलौकिक शक्तियों पर से हटता गया क्योंकि विश्व में मनुष्य के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि अलौकिक शक्ति एक कल्पना मात्र है।

आस्था का केंद्र मनुष्य ही है। मनुष्य स्वयं अपना भाग्य विधाता है सृष्टि के क्रम विकास में उसका स्थान सर्वश्रेष्ठ है। यही विश्वास आधुनिक मानवतावादी विचार धारा की मूल चेतना है।

गुप्त जी के काव्य पर इस मानवतावादी विचार धारा का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

उनके काव्य के विषय अधिकार पौराणिक कथानकों पर आधारित हैं विशेष रूप से नहुष और दिवो दास काव्य इसी दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं जिसमें मानव के स्वावलंबी बनने की और विकास की ओर बढ़ने के संकल्प को व्यक्त किया है। लीला नामक काव्य में विश्वामित्र का कथन

       अमर जो ना कर सके उसे नर कर सकते हैं
        व्रत साधन पर अमर भला कब मर सकते हैं

विकास के पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प लिए मानव आज उस संकल्प की पूर्णता की ओर अग्रसर है। मानवीय मूल्यों की स्थापना और उसके अनुसार चलने की कटिबद्धता मानव निभा रहा है। द्वापर में उग्रसेन कर रहा है

              सच पूछो तो ऐसा अद्भुत अपना यह मानव ही
              कभी देव बन जाता है तो कभी दानव भी
              मैं कहता हूं यदि मनुष्य ही बने मनुष्य हमारा
              तू कट जाए देवों का कलह कलुष यह सारा।

गुप्ता जी ने अपने काव्य में जातिवाद वर्ण भेद जैसी सामाजिक बुराइयों का विरोध किया और इन बुराइयों के कारण मनुष्य मनुष्य के बीच जो दरार पड़ी थी उस दरार को मिटाने के प्रयास सोया मनुष्य ही करें इस उद्देश्य को पूर्ण करने हेतु गुप्तजी ने अपने द्वापर, गुरुकुल काव्य संग्रह की रचना की थी।

मानवतावादी दृष्टिकोण से ही गुप्तजी ने नारी की सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने हेतु यशोधरा, साकेत, विष्णुप्रिया काव्यों की रचना की। BHDC 133 Free Assignment In Hindi

इन कार्यों के प्रमुख नारी पात्र त्याग दया करुणा अहिंसा आदि बौद्ध धर्म के तत्वों को अपनाते हुए मानवता की स्थापना के लिए कार्यशील दिखाई देते हैं।

बौद्ध धर्म के तत्व मानवतावाद की स्थापना के मूल तत्व माने गए हैं। गुप्त जी का विश्वास था कि अनेक विसंगतियां और त्रुटियों के बावजूद विश्व का विकास होगा क्योंकि मनुष्य ही इस विकास के केंद्र में है।

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