IGNOU BHDC 109 Free Assignment In Hindi 2022- Helpfirst

BHDC 109

हिंदी उपन्यास

BHDC 109 Free Assignment In Hindi

BHDC 109 Free Assignment In Hindi jan 2022

प्रश्न 1. निम्नलिखित गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।

(क) मुंशीजी तो भोजन करने गये और निर्मला द्वार की चौखट पर खड़ी सोच रही थी-भगवान्! क्या इन्हें सचमुष कोई भीषण रोग हो रहा है? चाहते हैं-समतायी आहा यह बात पहले ही नही ……………………………………………….. इतने स्वांग भरने पड़ते।

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उत्तर – सन्दर्भ पस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचद के उपन्यास ‘निर्मला से लिया गया निर्मला का विवाह एका अधिक आयु के व्यक्ति मुंशी तोताराम ने हुआ है दोनों की आयु में बहुत अंत्र है इस कारण निर्मला को शारीरिक सुख नहीं मिल पाता। इस गद्यांश में निर्मला के मन के विचार प्रकट हो रहे हैं,

जिन्हें वह मुंशीजी और अपने सम्बन्ध को लेकर सोच रही है।

व्याख्या-मंसाराम द्वारा सांप मारने और रुक्मिणी के सामने अपनी मर्दानगी की डोंग मरते समय मुंशी तोताराम को झेंप होती है और वे क्ता खाने चले जाते हैं, किन्तु निर्मला द्वार की चौखट पर खड़ी सोचती है कि मुंशी को कोई भयंकर रोग हो गया है जिसे छिपाने के लिए ये मेरे सामने इस तरह का दिखावा करते हैं।

वह सोचती है कि ईश्वर उसकी अवस्था को और अधिक दारुन तो नहीं बनाना चाहते, वह सोचती है कि अपने पति की सेवा करके सुख प्राप्त कर लेती किन्तु आयु का भेद मिटाना तो उसके वश में नहीं है।

फिर वह सोचती है कि उसके पति उससे क्या चाहते हैं, फिर वह समझ जाती है कि आयु का भेद होने के कारण उसके पति उससे सीधे-सीधे कुछ नहीं कह पाते और तरह-तरह के दिखावे करते हैं,

अगर वह पहले यह बात समझ जाती तो उन्हें इस तरह के दिखावे नहीं करने पड़ते और उसे भी पति के सहचर का सुख मिल जाता।

विशेष- BHDC 109 Free Assignment In Hindi

1. अनमेल विवाह की समस्या पर विचार है।

2. भारतीय नारी के आदर्श की सजीव प्रस्तुति है।

3. पूरुष अधिक आय में विवाह तो कर लेता है, किन्तु इसकी टीस उसके मन में रहती है. इसकी झलक है।

4. भाषा विचारात्मक है।

(ख) मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। तब मैं क्या समझता हूँगा, क्या नहीं समझता हूँगा। फिर भी वह चेहरे पर देखकर बड़ी खीझ मालूम हो रही थी। पर……………………………. जाने मुझे क्या चीज रोक रही थी कि मैं फट नहीं पड़ा।

उत्तर – सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश जैनेन्द्र के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ से लिया गया है। प्रमोद अपनी बुआ मृणाल के प्रति उसके पिता के व्यवहार पर विचार करता है कि पिता ने उसे क्यों मारा होगा,

किन्तु उस समय वह आठवीं कक्षा में पढ़ता था और इन सब बातों को नहीं समझता था, लेकिन अब वह इन सब बातों को समझता है, इसी सन्दर्भ में वह विचार करता है

व्याख्या – उस समय मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तो मुझे दुनियादारी की बातें अधिक समझ नहीं आती थीं, किन्तु पिता का बुआ पर क्रोध करना और उन्हें मारना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था फिर भी उसे गुस्सा आ रहा था अपने पिता पर कि वे बुआ को प्रताड़ित कर रहे हैं।

इस कारण वह पिता से अविनय करने को भी उद्धत था, लेकिन वह यह भी समझने की कोशिश कर रहा था कि कुछ ऐसा अवश्य है, जिससे पिता परेशान है और इसी कारण वे क्रोध में हैं, शायद यही सोचकर प्रमोद चाहकर भी पिता के सामने कुछ कह नहीं सका। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

विशेष- 1. आत्ममंथन शैली है।

2. किशोर बालक परिपक्व न होकर भी स्थिति का आकलन कर सकते हैं. इसी भाव की अभिव्यक्ति है।

3. तत्कालीन भारतीम समाज का चित्रण है।

4. एक बच्चे के पिता और बुआ के साथ आत्मीय सम्बन्ध होने के कारण द्वंद्व का चित्रण है।

(ग) रामघाट पर नित्य बाबा रामचरित मानस सुनाते हैं। काल-किरात आदि गण दूर-दूर से आका आजकल चित्रकूट की गली-गली में भक्तों की भीड़ ………………………………….यत्र-तत्र अपने बसेरे बसाए पड़ी है।.

उत्तर- सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘मानस का हंस’ से उद्धृत है। यह उपन्यास गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर आधारित है। इन पंक्तियों में तुललीदास के रामघाट पर कथा सुनाने का वर्णन है।

व्याख्या – बाबा अर्थात तुलसीदास प्रतिदिन रामघाट पर रामचरितमानस का पाठ करते हैं और जिसे सुनने के लिए काल. किरात, गण आदि ने भी चित्रकूट में ही डेरा डाल दिया है। सभी लोग श्रद्धा के कारण बाबा के लिए फल, फूल, कंद-मूल, दूध-दही लेकर आते हैं।

गोस्वामी जी रामजियावन के घर ठहरे हुए हैं और वहीं रामकथा सुनाते हैं। ऐसे भक्तिमय वातावरण के कारण मानो उसके घर में आठों सिद्धि और नवनिधि का वास हो गया है।

तीसरे पहर कथा प्रारंभ होने पर रामजियावन के घर में भक्तों की भीड़ सजी हुई झांकी देखने के लिए उमड़ पड़ती है। पूरा चित्रकूट भक्तों से भरा पड़ा है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

विशेष-

1 . भक्तिमय वातावरण का सजीव चित्रण है।

2 .गोस्वामी तुलसीदास के जीवन का साधारण मानव के रूप में वर्णन है।

3 .भाषा बोलचाल की एवं भावप्रवण है।

(घ) एक अध्याय था, जिसे समाप्त होना था और वह हो गया। दस वर्ष का यह विवाहित जीवन-एक अंधेरी सुरंग में चलते। ……………………………………………..फिर एक और यात्रा-वैसा ही अंधकार, वैसा ही अकेलापन

उत्तर – सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश मन्नू भंडारी रचित उपन्यास ‘आपका बंटी’ से उद्धृत है। यह उपन्यास आधुनिक महानगरीय जीवन में दांपत्य जीवन की टूटन पर आधारित है, जिसमें पति-पत्नी का अलगाव बच्चों के जीवन को बहुत गहरे प्रभावित करता है और उनके मन-मस्तिष्क को तोड़कर रख देता है।

ऐसी ही स्थिति से गुजरती उपन्यास की नायिका अपने दांपत्य जीवन में हुए अलगाव के बारे में सोच रही है।

व्याख्या – वह अपने वैवाहिक जीवन के बारे में सोचती है कि वह उसके जीवन का एक अध्याय था, जो समाप्त हो गया अर्थात उसका वैवाहिक जीवन समाप्त हो गया। वह सोचती है कि उसके जीवन के ये दस वर्ष किसी अधेरी गुफा में चलते रहने के समान थे अर्थात उसके दांपत्य जीवन में कोई खुशी, कोई आश नहीं थी।

आज जीवन का यह दौर भी समाप्त होने का है किन्तु इस मुकाम पर भी पहुंचकर वह खुश नहीं है अर्थात जीवन के जिस समय परशानी थी उस खिशानी से छुटकारा मिलने के क्षण में भी संतोष न पाकर उसका मन दुखी है कि वह यहां तक स्वयं नहीं पहुंची है, बल्कि उसे इस स्थिति में मानो धकेला गया है, उसे विवश किया है।

पर जीवन का यह छोर भी प्राव है अति कहीं भी जीवन में अकेलापन ही दिख रहा है। उसे लगता है कि उसके जीवन की यह पूरा समय केवल अंधकार में ही बीता है और आगे भी जीवन में अंधकार और निराशा ही है।

विशेष – 1. मगनगरीला आधुनिक जीवन में सदनाहीन होते मानवीय संबंधों का पारिवारिक रिश्तों की लिका –

2. विचारात्मक शैली है।

3. भाषा बोलचाल की है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

भाग-ख

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों (प्रत्येक ) के उत्तर दीजिए।

(क) ‘निर्मला’ उपन्यास की कथावस्तु का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर-‘निर्मला’ उपन्यास में लेखक ने निर्मला के माध्यम से नारी समस्या का यथार्थ चित्रण किया है। दहेज न दे पाने के कारण निर्मला का विवाह टूट जाता है। एक अधेड़ व्यक्ति मुंशी तोताराम से निर्मला का विवाह कर दिया जाता है।

एक पिता समान व्यक्ति को पति के रूप में स्वीकार करना, निर्मला के लिए आसान नहीं होता है। निर्मला का प्यार पाने के लिए तोताराम तरह-तरह के स्वांग रचते हैं।

इसी बीच तोताराम को अपने बड़े पुत्र मंसाराम तथा निर्मला के बीच संबंध का शक हो जाता है. क्योंकि दोनों हमलम हैं। तोताराम अपने पुत्र को घर से दूर रखने का प्रयास करते हैं।

मंसाराम पिता की शंका के कारण मानसिक पीड़ा में जीने लगता है। अंतत: वह मर जाता है। तोताराम को अपनी भूल का एहसास होता है। वे पश्चाताप करने लगते हैं। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

ढंग से काम न करने के कारण घर की आर्थिक स्थिति भी खराब होती गई। तोताराम का सबसे होग पुत्र सियाराम भी एक साधु के जाल में फंसकर घर में चला जाता है।

मुंशी तोताराम भी घर छोड़कर चले जाते हैं। उधर निर्मला का स्वास्थ्य भी दिन-प्रतिदिन गिरता चला जाता है। अपनी पुत्री ननद रुक्मिणी देवी को सौंपकर निर्मला इस संसार को त्याग देती है।

निर्मला की जीवन कथा ही इस उपन्यास का आधार है। प्रेमचन्द ने मुख्य कथा को सशक्त बनाने के लिए प्रासंगिक कथाओं की रचना की है। निर्मला उपन्यास की कथा को हम तीन भागों में बांट सकते हैं

(1) कथा का आरंभ,
(2) कथा का विकास,
(3) कथा की परिणति। कथा का आरंभ

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‘निर्मला’ उपन्यास की कथा का आरंभ वर्णनात्मक ढंग से हुआ है। कथा के आरंभ में ही लेखक ने यह बता दिया है कि वह किस पात्र के द्वारा कथा कहने जा रहा है। उपन्यास के आरंभ में ही लेखक ने दहेज प्रथा की समस्या को सामने रख दिया है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

निर्मला के विवाह खर्च को लेकर उसके माता-पिता के बीच तर्क-वितर्क होता है। उसके पिता घर से निकल पड़ते हैं।

मटा जिसे उदयभानुलाल ने जेल करवाई थी, बदला लेने के लिए उदयभानुलाल की हत्या कर देता है। निर्मला की मां को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगती है, परन्तु भालचन्द्र दहेज न मिलने की संभावना के कारण अपने बेटे की सगाई तोड़ देता है।

कथा का विकास :- उपन्यास के प्रारंभ में निर्मला के पिता की मृत्यु के बाद दहेज न दे पाने के कारण निर्मला की सगाई टूट जाती है। कथा के विकास के लिए उपन्यासकार ने दहेज का प्रसंग लिया है।

निर्मला की माँ उसके लिए योग्य वर नहीं खुन पाती, व्योंकि इसके लिए उसे दहेज देना पड़ता, जो उसके लिए संभव नहीं था, इसलिए निर्मला का विवाह अधेड़ तोताराम से हो जाता है।

निर्मला’ : छोटी-छोटी घटनाए कथा के विकास को आगे बढ़ाती हैं। निर्मला का स्वाभाविक चित्रण किया गया है। जब मंसाराम बीमार हो जाता है तब भी तीताराम का संदेह नहीं होता है, अंततमसाराम की मृत्यु हो जाती है. मसागम को मृत्यु के बाद तोताराम को अपनी भूल का अहसास होता है।

एक दिन तोताराम का मंझला पुत्र जियाराम निमला के गहनों की चोरी कर लेता है। निर्मला उसे देख लता है. परन्तु चुप रहती है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

अपराधी का पता चल जाने के बाद तोताराम पैसे देकर बात दबा देते हैं, परन्तु आत्मग्लानि के कारण जियाराम आत्महत्या कर लेता है।

दूसरे पुत्र को खाने के कारण तोताराम की स्थिति और बिगड़ जाती है। मुकदमे का कार्य ठीक ढंग से न करने के कारण घर की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ जाती है।

तोताराम का सबसे छोटा पुत्र सियाराम साधुओं के प्रलोभन में फंसकर घर से चला जाता है। तोताराम भी उसे खोजने के लिए घर से निकल पड़ते हैं। निर्मला अकेली पड़ जाती है। दुख की इस घड़ी में निर्मला को सुधा का सहारा मिलता है।

कथा की परिणति-कथा के विस्तार के लिए लेखक ने कई प्रसंगों को जोडा है। वर्णन पद्धति के द्वारा कथा आगे बढ़ती है। उपन्यास में निर्मला विभिन्न परिस्थितियों से जूझती है। निर्मला की सहेली सुधा भी चली जाती है। दुख सहते-सहते वह अस्वस्थ हो जाती है।

रुक्मिणी से अपनी पुत्री को अनमेल विवाह से बचाने का निवेदन कर निर्मला प्राण त्याग देती है। उपन्यासकार ने निर्मला के जीवन की त्रासदी का वर्णन करते हुए, उसकी मृत्यु से कथा का अन्त किया है।

निर्मला उपन्यास का प्रमुख लक्ष्य है समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयों की आलोचना प्रस्तुत करना। प्रेमचन्द ने निर्मला उपन्यास में मध्यवर्ग के पारिवारिक और सामाजिक जीवन के माध्यम से अपनी आलोचना प्रस्तुत की है। उपन्यास में काफी विविधता देखने को मिलती है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

निर्मला उपन्यास की मुख्य कथा मुंशी तोताराम तथा निर्मला के इर्द-गिर्द घूमती है, परन्तु अनेक उपकथाओं के द्वारा मुख्य कथा को सशक्त बनाया गया है। निर्मला उपन्यास की कथावस्तु की विशेषताएं इस प्रकार हैं

(1) मुख्य कथा-सूत्रों की पारस्परिकता और एकसूत्रता-निर्मला उपन्यास में मुख्य रूप से पांच कथा प्रसंग मिलते हैं

(क) बाबू उदयभानुलाल और कल्याणी का प्रसंग,

(ख) सुधा और डॉक्टर का प्रसंग,

(ग) रुक्मिणी का प्रसंग.

(घ) मंसारम का प्रसंग,

(ङ) जियातम और सियाराम का प्रसंग।

निर्मला उपन्यास के इस पांचों प्रसंगों का संबंध निर्मला और मुशी तोताराम की मुख्य कथा के साथ है। कल्याणी निर्मला की मां है और उदयभानु लाल उसके पिता हैं। निर्मला के दुखी जीवन के लिए उसके माता-पिता भी जिम्मेदार है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

निर्मला के विवाह से पहले उसके पिता उदयभानु लाल को असामयिक मृत्यु हो जाती है, जिसके कारण निर्मला की मां निर्मला का विवाह एक अधेड़ व्यक्ति मुंशी तोताराम से कर देती है।

निर्मला के दुखद जीवन का आरंभ उसके विवाह के साथ ही प्रारंभ हो जाता है। डॉ. सिन्हा तथा सुधा का प्रसंग एक स्वतंत्र प्रसंग है। डॉ. सिन्हा के साथ ही निर्मला का विवाह ठीक था, परन्तु सगाई टूट जाने पर निर्मला की दुर्भाग्य गाथा शुरू हो जाती है।

यह प्रसंग कथा को अप्रत्यक्ष रूप से भी तथा प्रत्यक्ष रूप ने भी प्रभावित करता है। कथा में नाटकीयता लाने के लिए ही लेखक ने इस प्रसंग को कथा में जड़ा है। डॉ. सिन्हा इसके प्रायश्चित स्वरूप अपनी पत्नी की प्रेरणा से अपने छोटे भाई का विवाह निर्मला की छोटी बहन कृष्णा से कर देता है।

रुक्मिणी, सयाराम, मंसाराम तथा जियाराम का प्रसंग एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। जब निर्मला विवाह कर मुंशी तोताराम के घर आती है तो वहां पहले से ही तीतागम की बहनक्मिणी, उसके तीकी पुत्र, मसाराम सियाराम तव्या जियागममीजूत होता है।

शो तोताराम की बहन कमिणी नेमला को सदा कोसती रहती है, क्योंकि अब घर की मालकिन का पद उससे छिन गया है। अब घर की मालकिन निर्मला है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

रुक्मिणी तोताराम के तीनों बेटों का लिमला के विरुद्ध उकसाती रहती है या उनम हा भावना भाने लगता है कि वह सौतेली मां है तथा उनका जीवन नष्ट करना चाहती है।

मंसाराम के प्रसंग से जहां कहानी को एक नया मोड़ मिलता है, वहीं जियाराम तथा सियाराम के प्रसंग से कहानी में जटिलता उत्पन्न होती है। कथा को सभी प्रसंगों के द्वारा मजबूती मिलती है जिससे कथा की एकसूत्रता तथा संबद्धता कायम रहती है।

(2) प्रासंगिक कथा-सूत्रों की मुख्य कथा-सूत्रों से संबद्धता – उपन्यास के प्रासंगिक कथासूत्र सहायक पात्रों तथा मुख्य पात्रों, दोनों से ही संबद्ध है। निर्मला उपन्यास में बाबू भालचन्द्र तथा मतई का प्रसंग ऐसे ही प्रसंग हैं। उपन्यास में मतई के प्रसंग से ही एक संपन्न परिवार का नाश हो जाता है।

उपन्यास में भालचन्द्र के प्रसंग से ही निर्मला का जीवन कष्टमय हो जाता है। भालचन्द्र धन का लोभी है जिमके कारण निर्मला का विवाह जमसे नहीं हो पाता, अत: निर्मला का विवाह एक अधेड़ व्यक्ति मुंशी तोताराम मे हो जाता है।

उपन्याम में मोटेराम के प्रसंग, नयनसुख के प्रसंग, रंगीलीबाई के प्रसंग तथा साधुओं के प्रसंग द्वारा लेखक ने सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत किया है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

(3) संपूर्ण कथाओं की एकसूत्रता-‘निर्मला’ उपन्यास के सभी प्रसंग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कोई प्रसंग उपन्यास को पूर्णता प्रदान करता है, तो कोई प्रसंग उपन्यास को गति प्रदान करता है। सभी प्रसंगों में एकसूत्रता विद्यमान है।

(4) अन्तर्कथाओं का वस्तु-विन्यास में स्थान-उपन्यासकार ने उपन्यास में कहीं-कहीं पात्रों के विगत जीवन के बारे में भी वर्णन किया है। इन्हें ही अन्तर्कथाएं कहा जाता है। इनसे जहां उपन्यास की रोचकता बढ़ती है वहीं पात्रों को समझने में भी सहायता मिलती है।

उदाहरण के लिए, उपन्यास में मुंशी तोताराम, रुक्मिणी देवी तथा मतई के विगत जीवन का वर्णन किया गया है।

(5) कथाओं का विस्तार-‘निर्मला’ उपन्यास में कथाओं का विस्तार आवश्यकता के अनुरूप ही किया गया है। उपन्यासकार ने जिस स्थान पर पात्रों की आवश्यकता जरूरी नहीं समझी, वहां उनका उल्लेख नहीं किया है। कथाओं के विस्तार से उपन्यास में स्वाभाविकता का पुर आ गया है।

उपन्यास में कथा-प्रसंग सुनियोजित हैं। उदाहरण के लिए. मतई का प्रसंग समयानुकूल आता है। कल्याणी का प्रसंग भी सिर्फ शुरू में ही आया है। इसी प्रकार मेहन सिन्हा का प्रसंग भी प्रारंभ में ही है।

लेखक ने जब उचित समझा तभी इन पात्रों को उपन्यास में उपस्थित किया है। कथाओं की इस प्रकार योजना से संपूर्ण कथानक में एकसूत्रता तथा संगठनात्मकता लाने में सहायता मिली है।

(ख) जैनेन्द्र के उपन्यासों की विशेषताएं बताइए।

उत्तर-जैनेन्द्र का रचना संसार आजादी से पहले (1929 से) लेकर आजादी के बाद तक फैला हुआ है। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौर में ‘परख’, ‘सुनीता’: ‘त्यागपत्र’ और ‘कल्याणी’ उपन्यासों की रचना की। उस दौर में हिंदी समाज में क्रांतिकारी आंदोलन की चर्चा भी जोरों पर थीं। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

प्रेमचंद और जैनेन्द्र गाँधी जी के समर्थक होने के बाद भी जैनेन्द्र के ‘परख’, ‘सुनीता’,’त्यागपत्र’ या ‘कल्यणी’ उपन्यासों में स्वाधीनता आंदोलन की छाया नहीं है। जैनेन्द्र प्रेमचंद के निकटस्थ लोगों में से थे, कोकिन जैनेन्द्र ने साहित्य रचना के लिए प्रेमचंद से अलग रास्ता चुना।

जैनेन्द्र ने अपने पूरे रचनाकाल में राजनीतिक जीवन को अपने रचना के केंद्र में नहीं रखा। पृष्ठभूमि के रूप में भले ही क्रान्तिकारी पल आए हों, किंतु जैनेन्द्र उसले पृन समर्थन के लिए पछि (लिसकर मजिक उसकी शांचवा फार है।

जैनचं ऐसे पात्रों को एकामी और कुतित मानते हैं। गांधी जी के आंदोलन में भाग लेने के बाद भी स्वतंत्रता आन्दोलन उनकी रचनात्मकता का प्रेरक नहीं बना।

जैनेन्द्र ने प्रेमचंद के प्रभाव से अपने आप को मुक्त रखा और हिंदी कथा साहित्य को नई दिशा दी वही जैतून का महत्व है। हिंदी में जैनेन्द्र के लेखन से ही मनोवैज्ञानिक उपन्यासों को धारा प्रारम्भ हुइ प्रेमचंद के उपन्यासों में व्यक्ति-चरित्र समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, BHDC 109 Free Assignment In Hindi

किंतु जैनेन्द्र के यहाँ चरित्र व्यक्ति ही बना रहता है। इनके उपन्यासों में समाज व्यक्ति को समझने में पृष्ठभूमि का काम करता है। एक ओर प्रेमचंद के संश्लिष्ट चरित्र भी संश्लिष्ट समाज को प्रस्तुत करते हैं।

उपन्यासों में समाज के यथार्थ का चित्रण करने के कारण प्रेमचंद की कथाभूमि विस्तृत होती थी. लेकिन जैनेन्द्र को यह सब नहीं दिखाना था, इसलिए उनके उपन्यासों में कथानक बहुत छोटा होता है और उनमें पात्रों की संख्या भी सीमित होती है।

जैनेन्द्र के उपन्यासों में कथासार आठ-दस पृष्ठों में सिमट सकता है. इसलिए उनके उपन्यासों में घटनाएँ बहुत कम होती हैं।

उनके पात्रों के जीवन में घटित एक-आध घटना में भी लेखक उसकी संगति में उस पात्र का मनोविज्ञान बताने लग जाता है। उस घटना का विरोध या प्रतिकार या परिवर्तन नहीं होने से जैनेन्द्र के उपन्यास आकस्मिकता, कौतूहलता आदि से परे हैं।

उपन्यास पढ़ते समय पाठक |किसी काल्पनिक कथा का आनंद न लेकर प्रस्तूत जीवन को सहज रूप में देखते हुए चलते हैं। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

विषयवस्तु :

जैनेन्द्र के उपन्यासों की कथा के केंद्र में व्यक्ति रहता है। बाहरी वातावरण से उसका संवाद कम होता है। जैनेन्द्र चित्रण करते हैं और चित्रण में कुछ अपने आप छूटता जाता है।

जैनेन्द्र के उपन्यासों में कोई उपदेश, सामाजिक परिवर्तन और सुधार की बात नहीं होती, वे केवल अपनी बात कहते है। वे कथा में व्यंजना की अभिव्यक्ति से काम चला लेते हैं।

जैनेन्द्र के पात्र भी बोलते कम हैं, आत्मचिंतन अधिक करते हैं, जिस कारण उनके पात्रों का संघर्ष आंतरिक होता है।

अनुभव की ताजगी के कारण जैनेन्द के आरंभिक उपन्यास अधिक प्रभावशाली हैं। उन्होंने प्रारम्भ में नई दृष्टि से चीजों को रखा, जबकि प्रेमचंद रचनात्मकता का विकास कर नवीन दृषि मे यथार्थ की नई जमीन की पड़ताल करने में सक्षम हो जाते हैं, किंतु जैनेन्द्र वैसा नहीं कर पाते।

जैनेन्द्र का वर्णन डायरी या मुख्य पात्र के साक्ष्य से चलता है। ‘त्यागपत्र’ उपन्यास में सारा वर्णन जज प्रमोद करता है. लेकिन वह सिर्फ उन्हीं घटनाओं का वर्णन कर सकता है, जिनका वह स्वयं साक्षी रहा है।

अत: इस शैली के उपन्यासों में प्रामाणिकता और गहराई तो हो सकती है, परन्तु विविधता नहीं हो सकती इसलिए विषय-वस्तु की दृष्टि से जैनेन्द्र के उपन्यास मनोवैज्ञानिक उपन्यास कहे जाते हैं।

जैनेन्द्र ने अपने उपन्यासों में परंपरागत नैतिकता को अस्वीकार किया है, जिससे उनके पात्रों के जीवन में पीड़ा का संचार होता है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

जैनेन्द के अधिकतर पात्र अपनी इस पीड़ा को अपनी नियति मान लेते हैं और इस पीड़ा से बचने का भी कोई उपाय नहीं करते। यही पीड़ा आगे चलकर आत्मपीड़ा बन जाती है। यह आत्मपीड़ा जैनेन्द्र के उपन्यासों का प्रमुख भाव है।

यह पीड़ा व्यक्ति में कुंठा उत्पन्न कर उसके व्यक्तत्व में गाँठ डाल देती है। कुछ आलोचक जैनेन्द्र के पात्रों को भौतिक दृष्टि से असंगत मानते हैं।

उनके पात्र नारी के समर्पण को देखकर पलायन कर जाते हैं। इसी कारण आलोचक मानते हैं कि जैनेन्द्र के समाज में पलायन का दर्शन है। वे अध्यात्मिकता का सहारा लेकर अपने नारी पात्रों को अनैतिकता की तरफ ढकेलते हैं।

जैनेंद्र के उपन्यासों का एक विशेषता है कि उनके पात्रों को मनोवैज्ञानिक कुठा से मुक्ति नारा देता है। इसके बावजूद जैनेन्द्र में परंपरा और आधुनिकत का द्वंद्व है।

वे आधुनिकता से आरम कर टास के सामने मुटा हैक है नके उपन्यासों में प्रेम से संबद्ध यह भावना देखी जा सकत है कि विचार के रूप में प्रेम बहुत पवित्र है, स्वाभाविक है, अच्छा है, वरेण्य है. लेकिन शारीरिक संबंधों में यह दूषित हो सकता है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

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(ग) मानस का हंस’ के राजनीतिक और धार्मिक परिवेश पर विचार कीजिए।

उत्तर- तुलसीदास के जीवन को यदि आधार मानें तो मानस का हंस का परिवेश तीन मुगल बादशाहों का समय है। मध्यकाल में भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन आ रहे थे।

लोदियों का शासन भारत में स्थापित हो चुका था। सन् 1526 में भारत में बाबर ने पानीपत के पहले युद्ध में इबाहिम लोदी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली।

बाबर के बाद सन् 1530 से 1556 ईस्वी तक हुमायूं और उसके बाद सन् 1556 ईस्वी से 1605 ईस्वी तक अकबर का शासन रहा। अकबर के बाद सन् 1605 ईस्वी से सन् 1627 ईस्वी तक बादशाह जहाँगीर का काल रहा है। हुमायूं के समय तक भारत में मुगल शासन स्थिर न था।

राजनीतिक अस्थिरता के दौर में मुगल, पठानों से लड़ रहे थे। जब भी कोई नगर जीता जाता तो बड़े पैमाने पर पर लूटपाट होती।

‘मानस का हंस’ में अनेक स्थानों पर इस अस्थिरता के चित्र मिलते हैं। मुगल शासन को स्थिरता मिलती है, बादशाह अकबर के शासन काल में मध्यकाल में अनेक प्रकार के राजनीतिक-सामाजिक समीकरण बन रहे थे।

जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता और साझी संस्कृति के अनेक रूप दिखाई देते हैं। यद्यपि तुलसीदास हिंदू धर्म के सर्वाधिक सम्मानीय चरित ‘राम’ को अपनी लेखनी से शब्दों में उकेर रहे थे, परंतु उनका अपने समय के मुस्लिम समुदाय से किसी प्रकार का बैर भाव नहीं दिखाई देता।BHDC 109 Free Assignment In Hindi

मध्यकाल में राजपूत सत्ता के पतन के बाद पठानों और मुगलों के बीच संघर्ष चल रहा था। उपन्यासकार ने स्थानीय राजाओं और मुगलों के संघर्ष को धर्म की दृष्टि से नहीं अपितु सत्ता के संघर्ष के तौर पर देखा है।

उपन्यास के प्रारम्भ में ही बाबा नरहरिदास महत जी से कहते है, “राजनीतिक स्थिति अब तो सदा ऐसे ही रहेगी महंत जी। शेर खां आवे चाहे चीता खाँ। वस्तुतः धर्म-धर्म से नहीं लड़ रहा, यह बात अब सिद्ध है।

नहीं तो पठान भला मुगलों से लड़ते। “इसी प्रकार एक अन्य प्रसंग में जब देश में अकाल पड़ रहा था तब आम जनता इस बात की आशा कर रही थी कि हिंदू राजा जनता के लिए अपने खजाने और भंडार गृह खोल देगा, तब भी जनता को निराशा होती है।

अकाल अमृतलाल नागर के समय हिंदू राजा हेमू से मदद मांगने के प्रश्न पर एक वृद्ध कहता है-“हिंदू हः हः ह, अरे बाबा, हिंदू-मुसलमान तो हम-तुम पंच होते हैं।

राजा राजा होता है। हेमू के हाथी चावल चीनी और घी के लड्डू खा-खाकर मरने-मारने के लिए तैयार हो रहे हैं। वह बस लडवइयों को ही भर-पेट खिला सकता है। हमारा कोई नहीं। राम | भी नहीं।”

भूख और लाचारी के इस दृश्य से साफ है कि सत्ताओं को पहली चिंता उनकी सत्ता की होती हैं आम जनता की नहीं। चाहे वह हिंदू या फिर मुसलमान। तुलसीदास के जीवन के अनेक प्रसंगों से स्थापित करते हैं कि उनका व्यक्तित्व धार्मिक संकीर्णता से कहीं ऊपर था। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

बाबा तुलसीदास ने मुगल बादशाह अकबर का समय भी देखा था। वे जहाँगीर के समय से उस युग की तुलना करते हुए उपन्यास में एक स्थान पर वे कहते हैं, “अकबरशाह के समय थोड़ा बहुत सुशासन आया था, अब वह भी समाप्त हो गया। शासक दिल्ली में रहता है।

उसे नित्य हीरे, मोती, जवाहिर और सोना चाहिए। स्त्री और धन की लूट का नाम ही कलिकाल है। सारे पाप वहीं से प्रारम्भ होते हैं।

महाकवि तुलसीदास का मानना था कि कलिकाल शासक लुटेरे बन जाते हैं। धार्मिक परिवेश आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने “हिंदी साहित्य का इतिहास’ में लिखा है, “धर्म का प्रवाह कर्म, जान और भक्ति इन र्तन धाराओं में चलता है।

इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा में रहता है। किसी एक के भी अभाव में वह विकलांग रहता है। कम क बिना च लूला, लंगड़ा, ज्ञान के बिना अंधा और भक्ति के बिना हृदयहीन क्या निष्प्राण रहता है।

लगभग यह स्थिति मध्यकालीन भारत में थी। धर्मिक पाखंडों और श्रेणीबद्धता ने अनेक पाखंडी, अनाचारी आर अयोग्य व्यक्तियों की धार्मिक स्थल का विधन में पहुंचा दिया था।BHDC 109 Free Assignment In Hindi

उपन्यास में तुलसीदास जब अपने आराध्य राम की जन्मभूमि अयोध्या पहुंचा दिया था। उपन्यास में तुलसीदास जब अपने आराध्य राम की जन्मभूमि अयोध्या पहुँचते है तो पाते हैं कि इस धर्म नगरी में धम नहीं रह पाया समाज के साधु वर्ग मात्र अपने स्वार्थो की सिद्धि में लगा हुआ है।

तुलसी अयोध्या आते हैं तो यह सोचकर आते हैं अपने आराध्य राम की पुण्य भूमि को जब वे देखेंगे तो पाएंगे कि पूरी पुण्य भूमि राममय है।

वे उसी मठ में पहुंचते हैं कि जहाँ नरहरि बाबा बालक तुलसी को पंच संस्कार कराने के लिए आए थे। परंतु वे पाते हैं कि मत में कोई साधु भाग घोट रहा है. कोई अन्य साधु पर लंगोटी चुराने का आरोप लगा रहा है तो कोई यजमान के यहाँ खाने में मिले मालपुए की प्रशंसा कर रहा है।

तुलसीदास सोचते हैं, कि यहाँ किसी के हृदय राम नहीं है। एक साधु उस मठ की वास्तविकता बताते हुए कहता है.”हिया तो शब, तो शब शाधू महात्मा तर माल चाभते हैं और भगतनिन शे रशजोग साधते हैं और ये शरक हियाँ ब्रह्मचर्य फैलइहै। कलयुग का शतयुग बनायें चले हैं। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

‘यहाँ से निराश होकर जब तुलसीदास रामानुजी सम्पदाय, के मन में कोतारी बन जाते हैं तो और भी निकरता मे मतों के भीतर को परिवेश को बहुत गहराई से देखते हैं।

अपने इस अनुभव को तुलसीदास बतलाते हुए लिखते हैं.”रामानुजी सम्प्रदाय के मत में मैं कोठारी बन गया। महंत जी यों तो भले थे। कुशल, लोक व्यवहारी थे।

हाकिम हुक्का, धनी मानियों प्रायः मिलते-जुलते रहते थे परंतु चापलूसी बहुत पसंद करते थे। जो व्यक्ति उनके दरबार में बैठा रहे उनकी हाँ में ही मिलाता रहे. उनकी रक्षिता-पिया को सराहे और मान दे वही उनका स्नेहमाजन बन सकता है।

परंतु तुलसीदास कमी महतजी की चापलूसी नहीं करते और न ही न उनकी रक्षिता-प्रिया छबीली के आदेशों का पालन करते हैं। जब महंत जी उन्हें अपमानित करते हैं तो वे आत्मसन्मान को बचाने के लिए मत का त्याग कर देते हैं। परंतु समस्त धार्मिक समुदाय ही भ्रष्ट था ऐसा नहीं है।BHDC 109 Free Assignment In Hindi

नरहरि बाबा. शेष सनातन और स्वयं तुलसीदास इस बात का प्रमाण हैं कि धर्म के वास्तविक रूप यानी दया. करुणा. परदुःखकातरता, उपकार, निःस्वार्थ सेवा जैसे भावों को जीने वाले तथा उनका प्रसार करने वाले अनेक संत उस समय में मौजूद थे।

बाबा तुलसीदास ने तो महामारी के समय सामान्य जन की सेवा का बीड़ा उठाया था और लो और एक ब्राहमण की हत्या करने वाले को क्षमा भी कर दिया था। धर्म यह व्यापक स्वरूप तुलसी के जीवन में साफ दिखाई देता है।

समाज में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच एक साझा संस्कृति पनप रह थी। स्वयं तुलसीदास अयोध्या में मस्जिद में जाकर सोते हैं। उनका मानना था कि सभी धर्म एक ही ईश्वर की ओर ले जाने वाले रास्ते हैं।

भाग-ग

प्रश्न 3. (क) पार्वती अम्माँ का चरित्र

उत्तर-पार्वती अम्माँ ‘मानस का हंस’ उपन्यास के प्रारंभ में आने वाली महत्त्वपूर्ण स्त्री चरित्र हैं। उपन्यास के प्रमुख चरित्र तुलसीदास को रचने और गढ़ने का दायित्व निभाने वाली पार्वती अम्मा निश्चय ही एक विशिष्ट पात्र हैं। उपन्यास में पूर्वदीप्ति पद्धति के माध्यम से तुलसीदास, पार्वती अम्माँ का स्मरण करते हैं।

ज्योतिषी पिता के घर में जन्मे बालक तुलसी के आगमन पर पत्नी के निधन से नवजात को अनिष्ट की आशंका मानकर पिता ने एक दासी को उसे सौंप दिया। दासी ने अपनी सास पार्वती अम्माँ को बालक सौंप दिया। जन्म से ही उपेक्षित और स्नेहहीन बालक को स्नेह का अवलंब देने वाली चरित्र गावती अम्माँ हैं।

गगतागगी-अपने घर से निष्काषित बालक को सहारा और ममता देने वाली पार्वती अम्मा एक विलक्षण पात्र हैं। बाल्यावस्था में तुलसी जैसे अनाथ बालक का दायित्व पार्वती अम्माँ भिक्षा से उदरपृर्ति करते हुए भी ममता से भरपूर थी। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

उन्होंने बालक तुलसी का स्नेह और ममता से दुलराया और ईश्वर भक्ति की और भी प्रवृत्त किया। प्रयास भनेक अंशों में तुलसी पार्वती सामाँ का कल्पी दिखाई देते हैअपनी कथा सुनने का कहते हैं-“मेरी आदि गुरु परम तपस्विनी पार्वती अम्माँ ही थीं।

मानो शकर भगवान ने मुझे जिलाए रखने के लिए ही जगदम्बा पार्वती को भिखारिन बनाकर भेज दिया था।”

विरुद्धों के सामंजस्य वाले गुणों से भरपूर-उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने तुलसी के जीवन का रचने की प्रक्रिया में पार्वती अम्माँ को सर्वोपरि रखा है।

जाति में होन. समाज में स्त्री और विपन्न आर्थिक स्थिति वाली पार्वती अम्माँ के प्रसंग में हर बार तुलसी आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं। इसका प्रमुख कारण है पार्वती अम्माँ अपनी साधारण स्थिति में भी अपने विचारों, अपनी आस्थाओं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि के कारण असाधारण चरित्र हैं।

पार्वती अम्माँ को चर्चा आते ही तुलसीदास उनके चारित्रिक गुणों को बताते हैं-“दरिद्रता में इतना वेभव, दुर्बलता में इतनी शक्ति और कुरूपता में इतनी सुंदरता मैंने पार्वती अम्माँ के अतिरिक्त औरों में प्रायः कम ही देखी।”

तुलसीदास ने अपने जीवन में अनेक स्त्रियों को निकट से देखा-जाना था। उनमें से वे पार्वती अम्माँ को यदि दरिद्रता में वैभवसम्पन्न कहते हैं तो यह वैभव उनके अनूठे संतोषी व्यक्तित्व का है।

दुर्बलता में शक्ति है तो यह उनकी मन का अटूट साहस है। कुरूपता में सुंदरता है तो यह उनके सदचरित्र और उदात्त जीवन का सौंदर्य है। इस तरह विरुद्धों के सामंजस्य से बना उनका व्यक्तित्व आकर्षित भी करता है और प्रेरित भी। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

वास्तविक माता न होते हुए भी पार्वती अम्माँ ने न सिर्फ तुलसी का भरण पोषण किया बल्कि बालक को निष्ना और सुरुचिपूर्ण तरीके से पाला। जिस बालक को जन्म से ही अपने घर से उपेक्षा मिली उसे जीते जी पार्वती अम्माँ ने कभी उपेक्षित नहीं किया।

भक्तकवि तुलसी को भक्ति का मंत्र देने वाली पार्वती अम्माँ ही थीं। माँ बच्चे के जीवन की पहली गुरु होती है और तुलसी पार्वती अम्माँ को इसी रूप में सदा मानते रहे। एक निरक्षर स्त्री ने गुरु बनकर उन्हें भक्ति का मंत्र दिया।

उपन्यास में राजा भगत द्वारा पार्वती अम्माँ के पढ़ाने-लिखाने के बारे में पूछे जाने पर तुलसी बतलाते हैं-“पार्वती अम्माँ तो बेचारी मुझे इतना ही पढ़ा गई कि जब-जब भीर पड़े तब-तब बजरंग बली को देगे।

कहो कि हे हनुमान स्वामी, तुम हमें राम जी के दरबार में पहुंचा दो जिससे कि हम अपनी भली-बुरी निवेदन कर लें।” यही नहीं बाल्य अवस्था से ही भिक्षाटन से अपमान अनुभव करने वाले बालक तुलसी को समझाते हुए पार्वती अम्माँ कहती हैं-“यह दुख नहीं तपस्या है बेटा। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

पिछलं जनमों में जे पाप किए हैं वो इस जनम में तपस्या करके हम धो रहे हैं कि जिससे अगले जनम में हमें सुख मिले।” जीवन की प्रतिकुलताओं और पीड़ा को सहने का पार्वती अम्माँ का बतलाया. यह दर्शन विफल नहीं जाता। पार्वती अम्माँ की मृत्यु के बाद संघर्षों से जूझने में यह मत्र सफल होता है।

जीवन के अंतिम समय में इस दर्शन को तुलसी इस प्रकार समझते-समझाते हैं “पार्वती अम्माँ सच हो कहती थी कि जससे यम जी तपस्या कराते हैं उसे ही दुख-दुर्भाग्य के अथाह समुद्र में भयंकर क्रूर तिमि-तिमिगलों के बीच में छोड़ देते हैं।

उनसे अपनी रक्षा करना ही अभागे की तपस्या कहलाती है। अब सोचता हूँ राम जी ने मुझ पर अत्यंत कृपा करके ही यह सारे दुख डाले थे। इन्हीं दुखों की रस्सी का फंदा डालकर मैं राम-नाम की ऊँची अटारी पर आज तक चढ़ता चला आया हूँ।”

(ख) ‘मृगनयनी’ का कथासार

उत्तर-‘मृगनयनी’ वृन्दावनलाल वर्मा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक रचना है। इसमें 15वीं शती के ग्वालियर राज्य के राजपूत राजा मानसिंह तोमर तथा उनकी गूजरी रानी मृगनयनी की प्रेम कथा हो इसके माध्यम से मानसिंह तोमा का चरित्र चित्रण किया गया है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

साथ ही तत्कालीन ग्वालियर रियासत एवं इतिहास की भी झलक देखने को मिलती है।

कथासार –

ग्वासलियर के दक्षिण-पश्चिम में राई नामक ग्राम में निम्मी और उसका भाई अटल रहते थे। लाखी, निम्मी की सखी थी। निम्मी और लाखी के सौन्दर्य और व्या वध की चर्चा मालवा को राजधानी माण्डा मवार को बाजधानी चित्तौड़ और गुजरात की राजधानी अहमदाबाद तक पहुची।

उस समय दिल्लीत के तख्त पर गयासुद्दीन खिलजी बैठ चुका था। माण्डू के बादशाह बर्बरा और गयासुद्दीन ने निम्मी और लाखी को प्राप्तण करने की योजनाएँ बनाई। राई गाँव के पुजारी ने उनके सौन्दर्य और लक्ष्यावेध प्रशंसा ग्वालियर के राजा मानसिंह के समक्ष की।

लाखी की माँ मर गई. इसलिए लाखो, निम्मी और अटल के पास रहने लगी। गयासुद्दीन खिलजी ने, नटों के सरदार को निम्मी और लाखी को लाने के लिए, योजना तैयार की। नटों और नटनियों ने निम्मलिऔर लाखी को फसलाना प्रारम्भ किया। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

एक दिन राजा मानसिंह शिकार खेलने राई गांव पहुंचे। निम्मी के सौन्दर्य और शिकार में लक्ष्यवेध से मुग्ध होकर विवाह करके उसे ग्वालियर ले गये।

निन्नी गूजर थी और राजा क्षत्रिय इसलिये गांव वालों ने मान सिंह और गुज्जरी के विवाह का विरोध किया। पुजारी ने उनका विवाह नहीं कराया।

वे नटों के दल के साथ नरवर के किले की तरफ आ गये। लाखी को नहरों के षड्यंत्र का पता लग गया, इसलिए उसने उनके षड्यंत्र को विफल कर उन्हें समाप्त कर दिया।

महाराजा मानसिंह अटल और लाखी को ले गए और ग्वालियर में उनका विवाह निम्मी, विवाह के पश्चागत ‘मृगनयनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। मृगनयनी के पहले राजा के आठ पत्नियाँ थी,

जिनमे सुमनमोहिनी सबसे बढ़ी थी। इसी के पुत्र को राजगद्दी मिली क्योंकि निम्मी नीची जाति की होने के कारण इसके पुत्र को राजगद्दी ना देकर कुळ गांव दिए जिससे नाराज होकर निम्मी अपने पुत्रों को लेकर चली गयी और वहीं से गुज्जरों में तेंवर गोत्र की शुरुआत हुई। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

(ग) ‘आपका बंटी’ के शीर्षक की उपयुक्तता

उत्तर-किसी भी उपन्यास का शीर्षक उसकी कथा केंद्रीय विचार, भाव, चरित्र, युग, समस्या और परिवेश आदि को व्यक्त करने वाला होता है। प्रेमचंद का उपन्यास ‘गोदान’ कृषक समाज के आर्थिक अभाव और जीवन में होरी नाम के किसान की एक साधारण-सी इच्छा के पूरे न होने को प्रतीकित करता है।

प्रेमचंद रचित ‘निर्मला’, जैनद्र के उपन्यास ‘सुनौता’, मैत्रयी पुष्पा के ‘अल्मा कबूतरी’ आदि उपन्यासों के शेर्षक कथा के केंद्रीय चरित्रों के नाम पर आधारित है।

इसी तरह रेणु का मैला आंचल’. श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी, यशपाल का ‘बठा-सच’. भीष्म साहनी का ‘तमस’ उमश: परिवेश, युगीन समस्याओं और प्रवृत्तियों को उभारने वाले शीर्षक हैं. जिनका कथा की आधरभूमि से गहरा तादात्म्य है।

‘आपका बंटी’ उपन्यास का शीर्षक दो धरातलों पर पाठक का ध्यान आकर्षित करता है। इस उपन्यास से गुजरते हुए पाठक अनुभव करता है कि कथा में घटित घटनाओं का बंटी नाम के बच्चे पर व्या और कितना गहरा असर पड़ रहा है।

उसका जीवन इनसे प्रभावित होकर लगातार उसे अपने मम्मी-पापा से दूर अकेलेपन की ओर धकेल रहा है। उपन्यास की भूमिका में उपन्यासकार ने स्पष्ट किया है कि यह बंटी कवल अजय और शकन की उपेक्षित संतान ही नहीं है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

बल्कि यह कहानी आधुनिक जीवन में उन सभी तलाकशुदा परिवारों की कहानी बन जाती है, जहाँ बच्चों को बंटी की तल जीवा को विपरीत परिस्थितियों का शिकार होकर जीना पड़ता है।

उपन्यासकार के मंतव्य और इस उपन्यास के शीर्षक के विषय में निर्मला जैा का कहना है वो हराका में मन्नू मंडारी के उपन्यारा आपका बंटी” का प्रकाशन साहित्य जगत में एक बड़ी घटना थी।

इसका कारण यह था कि तलाकशुदा दन्यत्ति के बच्चों की समस्या को पूरे विस्तार से परखने का पयस्ता मीनिक और उन्लेखनीय प्रयास था। लपन्यास का सीर्थक हो जसको कल्य की ओर संकेत करता ही था,

उसका अंत भी जिस बिंदु पर ले जकर किया गया है, उससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि समाज की यह ऐसी समस्या है जिसका निश्चित हल किसी के पास नहीं हो सकता है कि लेखिका का मंतव्य कुछ ऐसा रहा हो।

निर्मला जैन आपनी आलोचना में इस उपन्यास को बंटी की नहीं, राकुन के नजारिए और उससे सहानुभूति का कहानी अधिक मानता है। BHDC 109 Free Assignment In Hindi

शकुन से सहानुभूति रखने के बावजूद हम जपन्याम में स्थितियों से संघर्षरत बंटी की कथा पातक को विचलित करती है। बंटी की जिज्ञासाएं, उसकी चंचलता, माँ के प्रति गहरा अनुराग और चिंता, फूफी और दोस्त टीटू संग उसके लड़ाई- झगडे, पिता से उसका प्रेम. जोशी से उसकी नफरत, माँ के प्रति बदला दृष्टिकोण-सभी घटनाओं के केंद्र में बंटी ही है और वही इन घटनाओं का भोक्ता भी है।

घटनाएँ चाहे किसी भी पात्र के साथ घटित हों, पाठक की दृष्टि बंटी पर केंद्रित रहती है। अंत की दृष्टि से भी देखें तो बंटी के हॉस्टल जाने का प्रसंग बेहद मार्मिक है।

इस तरह उपन्यास का शीर्षक एक ओर बंटी के चरित्र को केंद्र में रखता है, तो दूसरी ओर लेखिका आधुनिक एकाकी परिवारों में जीवन बिता रहे अनेक बटियों की ओर भी इशारा करती हैं।

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