IGNOU BHDC 108 Free Assignment In Hindi 2022- Helpfirst

BHDC 108

BHDC 108 Free Assignment In Hindi

BHDC 108 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

खंड-क

प्रश्न 1. भाषा विज्ञान का ज्ञान की अन्य शाखाओं से संबंध स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-भाषा विज्ञान में भाषा या भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। और भाषा जीवन का प्रमुख अंग है. क्योंकि भाषा के बिना जीवन और जगत का कोई भी कार्य नहीं हो सकता जो भामा मानब जोजन की समस्त गतिविधियों की मूल आधार होती है। भाषा से ही हम परस्पर एक-दूसरे के विचारों से अवगत होते हैं।

अपनी इच्छा वह अभिलाषा व्यक्त करते हैं और लोग व्यवहार में प्रभावित होते हैं तथा दूसरों को प्रभावित करने की प्रेरणा प्रदान करते है। भागी तो हम ज्ञान विज्ञान के अनुसमानों में सहायता प्रदान करती है और भाषा से हम प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर प्रकृति के विविध रहस्य का उद्घाटन करने में सहमत होते हैं।

जब भाषा हमारे जीवन जगत ज्ञान विज्ञान आदि के सभी क्षेत्रों में अपना अधिकार रखती है। जब भाषा का बनानिक मारामन कारब साल भाषा विनास का समान लान विज्ञान की अन्य शाखा एवं प्रशाखाओं के प्रतिपादक विविध शास्त्रों से होना स्वाभाविक है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इसके अतिरिक्त जब सभी शब्द अपने-अपने ज्ञान विज्ञान द्वारा जीवन और जगत के रहस्यों का अनुसंधान से सर्वेक्षण करते हुए अपने-अपने विषयों का प्रतिपादन करते हैं, तब सभी शास्त्रों का परस्परिक संबंध भी अपरिहार है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इसका कारण यह है कि विषय प्रतिपादक के प्रमुख साधन भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन करने में भाषा विज्ञान का विविध शास्त्रों से निकट एवं घनिष्ठ संबंध है।

भाषा विज्ञान और व्याकरण- किसी भी भाषा का शुद्ध उच्चारण शुद्ध प्रयोग एवं शुद्ध लेखन संबंधित सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसके व्याकरण जानना आवश्यकता होता है। व्याकरण भाषा का केवल मूलाधार ही नहीं होता, अपितु मेरूदंड भी होता है।

वह किसी भी भाषा का ही दर्शन ही नहीं होता, बल्कि पथ प्रदर्शक भी होता है।

व्याकरण और भाषा विज्ञान में कुछ अंतर भी हैं

1 व्याकरण किसी एक भाषा तक ही सीमित रहता है, जबकि भाषाविज्ञान विभिन्न भाषाओं का भी तुलनात्मक विवेचन करता है।

2 व्याकरण किसी एक भाषा के सिद्ध एवं निष्पन्न रूपों की ही मोमंसा करता है, जबकि भाषा विज्ञान सिद्ध एवं असिद्ध सभी प्रकार की मीमांसा एवं विवेचना करता है।

3 व्याकरण में केवल संता, सर्वनाम, क्रिया, बचन अव्यय आदि रूपों का ही विवेचन किया जाता है। और जबकी भाषा विज्ञान में इन भाषा रूपों के अतिरिक्त ध्वनियों, वाक्यों, अर्थों. शब्दों आदि का भी अध्ययन किया जाता है।

4 व्याकरण केवल इतना तक ही बता सकता है कि ‘आग’ शब्द संज्ञा है. एकवचन, स्त्रीलिंग आदि, जबकि भाषा विज्ञान यह भी बताता है कि किस तरह अपनी मूल रूप अग्नि से कालांतर में अग्नि से आग हो गया।

5 व्याकरण हमेशा किसी एक निश्चित समय तक सीमित रहता है, जबकि भाषा विज्ञान का क्षेत्र असीमित और अनंत है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

साहित्य और भाषा-विज्ञान-भाषा के प्रचलित वर्तमान स्वरूप को छोड़ कर शेष सारी अध्ययन सामग्री भाषा-विज्ञान को साहित्य से ही उपलब्ध होती है। यदि आज हमारे सामने संस्कृत, ग्रीक और अवेस्ता साहित्य न होता तो भाषा-विज्ञान कभी यह जानने में सफल न होता कि ये तीनों भाषाएँ किसी एक मूल भाषा से निकली हैं।

इसी प्रकार आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक का हिंदी साहित्य हमारे सामने न होता तो भाषा-विज्ञान हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन किस प्रकार कर पाता।

साहित्य भी भाषा-विज्ञान की सहायता से अपनी अनेक समस्याओं का समाधान खोजने में सफल हो जाता है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने भाषा-विज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर जायसीकृत ‘पद्मावत’ के बहुत से शब्दों को उनके मूल रूपों से जोड़कर उनके अर्थों को स्पष्ट किया है।

साथ ही शुद्ध पाठ के निर्धारण में भी इससे पर्याप्त सहायता ली है। अतः साहित्य और भाषा-विज्ञान दोनों एक-दूसरे के सहायक हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

मनोविज्ञान और भाषा-विज्ञान-भाषा हमारे भावों-विचारों अर्थात् मन का प्रतिबिम्ब होती है अतः भाषा की सहायता से बहुत से समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। विशेष रूप से अर्थविज्ञान को मनोविज्ञान पर पूरी तरह से आधारित है।

वाक्य-विज्ञान के अध्ययन में भी मनोविज्ञान से पर्याप्त, सहायता मिलती है। कभी-कभी ध्वनि-परिवर्तन का कारण जानने के लिए भी मनोविज्ञान हमारी सहायता करता है।

भाषा की उत्पत्ति तथा प्रारम्भिक रूप की जानकारी ममी बाल मनोविज्ञान तथा अविकसित लोगों का मनोविज्ञान जमारी सहायता करता है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

  • शरीर-विज्ञान और भाषा-विज्ञान-भाषा मुख से निकजस वाली क्षति को कहते । अतः भाषा-विज्ञान में हवा भातगासे केसे चलती है, स्वरयंत्र, स्वरतंत्री, नासिकाविवर, कौवा, तालु, दाँत, जीभ, आठ, कंठ, मूर्द्धा तथा नाक के कारण उसमें क्या परिवर्तन होते हैं तथा कान द्वारा केसे ध्वनि ग्रहण की जाती है. इन सबका अध्ययन करना पड़ता है। इसमें शरीर-विज्ञान ही उसकी सहायता करता है। लिखित भाषा का ग्रहण आँख द्वारा होता है और इस प्रक्रिया का अध्ययन भी भाषा-विज्ञान के अन्तर्गत ही होता है। इसके लिए भी उसे शरीर विज्ञान का ऋणी होना पड़ता है।

भूगोल और भाषा-विज्ञान-भाषा-विज्ञान और भूगोल का भी-गहरा सम्बन्ध है। कुछ लोगों के अनुसार किसी स्थान की भौगोलिक परिस्थितियों का उसकी भाषा पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

किसी स्थान में बोली जाने वाली भाषा में वहाँ के पेड़-पौधे, पक्षी, जीव-जन्तु एवं अन्न आदि के लिए शब्द अवश्य मिलते हैं, परन्तु यदि उनमें से किसी को समाप्ति हो जाए तो उसका नाम वहाँ की भाषा से भी जुदा हो जाता हैं। ‘सोमलता’ शब्द का प्रयोग आज हमारी भाषा में नहीं होता।

इस लोप का कारण सम्भवतः भौगोलिक ही है। किसी स्थान में एक भाषा का दूर तक प्रसार न होना, भाषा में कम विकास होना तथा किसी स्थान में बहुत सी बोलियों का होना भी भौगोलिक परिस्थितियों का ही परिणाम होता है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

दुर्गम पर्वतों पर रहने वाली जातियों का परस्पर कम सम्पर्क होने के कारण उनकी बोली प्रसार नहीं कर पाती। नदियों के आर-पार रहने वाले लोगों की बोली-भाषा सामान्य भाषा से हट कर भिन्न होती है।

देशा, नगरों, नदियों तथा प्रान्तों आदि के नामों का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन करने में भूगोल बड़ी मनोरंजक सामग्री प्रदान करता है।

अर्थ-विचार के क्षेत्र में भी भूगोल भाषा-विज्ञान की सहायता करता है। ‘उष्ट्र’ का अर्थ भैसा से ऊँट कैसे हो गया तथा ‘सैंधव’ का अर्थ घोड़ा और नमक ही क्यों हुआ, आदि समस्याओं पर विचार करने में भी भूगोल सहायता करता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

भाषा-विज्ञान की एक शाखा भाषा-भूगोल की अध्ययन-पद्धति तो ठीक भूगोल की ही भांति होती है। इसी प्रकार किसी स्थान के प्रागौतिहासिक काल के भूगोल का अध्ययन करने में भाषा-विज्ञान भी पर्याप्त सहायक होता है।

इतिहास और भाषा-विज्ञान-इतिहास का भी भाषा-विज्ञान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इतिहास के तीन रूपों
(1) राजनीतिक इतिहास,

(2) धार्मिक इतिहास,

(3) सामाजिक इतिहास-को लेकर यहाँ भाषा-विज्ञान से उसका सम्बन्ध दिखलाया जा रहा है

(क) राजनीतिक इतिहास-किसी देश में अन्य देश का राज्य होना उन दोनों ही देशों की भाषाओं को प्रभावित करता है। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के कई हन्नार शब्दों का प्रवेश तथा अंग्रेजी भाषा में कई हजार भारतीय भाषाओं के शब्दों का प्रवेश भारत की राजनीतिक पराधीनता या दोनों देशों के परस्पर सम्बन्ध का परिणाम है।

हिन्दी में अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली शब्दों के आने के कारणों को जानने के लिए भी हमें राजनीतिक इतिहास का सहारा लेना पड़ता है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

(ख) धार्मिक इतिहास-भारत में हिंदी-उर्दू-समस्या धर्म या साम्प्रदायिकता की ही देन है। धर्म का भाषा से घनिष्ट सम्बन्ध है। धर्म का रूप बदलने पर भाषा का रूप भी बदल जाता है। यज्ञ का लोक-धर्म से उठ जाना ही वह कारण है जिससे आज हमारी भाषा से यज्ञ-सम्बन्धी अनेक शब्दों का लोप हो चुका है।

व्यक्तियों के नामों पर भी धर्म का प्रभाव पड़ता है। हिन्दू की भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता होगी तो एक मुसलमान की भाषा में अरबी-फारसी के शब्दों की प्रचुरता देखने को मिलेगी।

इसी प्रकार बहुत-सी प्राचीन ध र्मिक गुत्थियों को भाषा-विज्ञान की सहायता से सुलझाया जा सकता है। धर्म के बल पर कभी-कभी कोई बोली अन्य बोलियों को पीछे छोड़कर विशेष महत्व पा जाती है। मध्य युग म अवयों और कि बिसयलयका कारण हमें धार्मिक इतिहास में ही प्राप्त होता है।

(ग) सामाजिक इतिहास-सामाजिक व्यवस्था तथा हमारी परम्पराएँ भी भाषा को प्रभावित करती हैं। भाषा की सहायता से किसी जाति के सामाजिक इतिहास का ज्ञान भी सरलता से प्राप्त किया जा सकता है भारतीय समाज में परिवारिक सम्बन्धों की विशेष महत्त्व दिया जाता है।

इसलिए भारतीय भाषाओं में, माँ-बाप, बहन-भाई, चाचा, मौसा, फका. बुआ.मौसी. साला, बहनोई, साद, साली. सास-ससुर जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग किया जाता है

किन्तु सरापीय समाज में उन सभी सम्बन्धी क लिए मसल अन आम मदर फादर, ब्रदर, सिस्टर जैसे शब्द ही है जिनमें कुछ ‘इन लॉ’ आदि शब्द जोड़जाड़ कर अभिव्यक्ति की जाती है। अतः भाषा-विज्ञान के अध्ययन में सामाजिक इतिहास पूरी सहायता करता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्था में शब्दों का किस प्रकार निर्माण हो जाया करता है, इस पर भाषा-विज्ञान प्रकाश डालता है। किसी समाज की भाषा में मिलने वाले शब्दों से उसकी समाज-व्यवस्था का परिचय प्राप्त होता है

समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था है, विशाल कुटुम्ब व्यवस्था है या एकल परिवार व्यवस्था है इस बात का उसमें व्यवहार किए गए शब्दों से पता चलता है।

भाषाविज्ञान तथा ज्ञान के अन्य क्षेत्र-भाषाविज्ञान के अध्ययन में तर्कशास्त्र, भौतिकशास्त्र एवं मानव-शास्त्र जैसे अन्य ज्ञान के क्षेत्र भी बड़ी सहायता पहुंचाते हैं। मनुष्य में अनेक प्रकार के अंधविश्वास घर कर लेते हैं, जिनका उसकी भाषा पर प्रभाव पड़ता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

भारतीय सामज में स्त्रियाँ अपने पति का नाम घुमा-फिराकर लेती है, सीधा-स्पष्ट नहीं। रात्रि में विशाल कोड़ों का नाम नहीं लिया जाता है।

वे अपने लड़के का नाम मांगे (मांगा हुआ), छेदी (उसकी नाक छेद कर), बेचू (उसे दो-चार पैसे में किसी के हाथ बेच कर), घुरह(कूड़ा), कतवारू (कूड़ा) अलिचार (कूड़ा) आदि रखते हैं। अंधविश्वासों के अतिरिक्त अन्य बहुत-सी सामाजिक-मनोविज्ञान से सम्बद्ध गुत्थियों के स्पष्टीकरण के लिए मानव-विज्ञान की शाखा-प्रशाखाओं का सहारा लेना पड़ता है।

इस प्रकार ज्ञान के अनेक क्षेत्र-संस्कृति-अध्ययन, शिक्षाशास्त्र, सांख्यिकी, पाठ-विज्ञान-आदि भाषा विज्ञान से गहरा सम्बन्ध रखते हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 2. पद का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए संबंध तत्व के विभिन्न प्रकारों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर-शब्द भाषा की स्वतंत्र और अर्थवान इकाई है। शब्द जब स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होता है और वाक्य के बाहर होता है तब तक | यह शब्द कहलाता है, किंतु जब शब्द वाक्य के अंग के रूप में प्रयुक्त होता है, तब यह पद कहलाता है,BHDC 108 Free Assignment In Hindi

जैसे-‘लड़का’ एक शब्द है,लेकिन लड़का पुस्तक पड़ता है, में लड़का एक पद है। जो शब्द अर्थ कोश से प्राप्त हो जाए. वे कोशकीय शब्द होते हैं, लेकिन कुछ शब्द अर्थ कोश से प्राप्त नहीं हो पाता है, क्योंकि वो कोशीय अर्थ के साथ-साथ संदर्भपरक अर्थ भी लिए होता है, जैसे लड़के, लड़कों आदि।

कोशीय शब्द और व्याकरणिक शब्द-भाषा में कोशीय शब्द से व्यक्ति, वस्तु, विचार या भाव का बोध होता है। कोशीय शब्दों का तात्पर्य अर्थवान शब्दों से है, किंतु पूर्ण अर्थ प्रकट करने के लिए उन्हें वाक्य में प्रयुक्त करना पड़ता है। कुछ कोशीय शब्द व्याकरणिक कार्य भी करते हैं; जैसे

(i) में आजकल सचिन के घर नहीं जाता।
(ii)मुझसे आजकल खाना नहीं खाया जाता।

पहले वाक्य में जाता कोशीय अर्थ दे रहा है. दूसरे वाक्य में जाता सिर्फ व्याकरणिक अर्थ दे रहा है। व्याकरणिक शब्द मुख्य अर्थ न देकर व्याकरणिक अर्थ का काम करता है। जिससे मुख्य अर्थ में विशेष अर्थ आ जाता है। जैसे

(i) आदिवासी जंगल में रहते हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

(ii) जंगल की आग में कई महीनों तक पेड़ पोधे जलते रहते हैं

उपर्युक्त वाक्य में ‘लड़का’, ‘लड़के’-संज्ञा मन हैं। छोटा, लोट-विशेषण हैं। बत, बे-सर्वनाम हैं। बौड़ता है. गौहते हैं-क्रिया है। पीछे पीछे, तेज-अव्यय हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार पद के पाँच भेद हैं

  1. संज्ञा 2. सर्वनाम 3. विशेषण 4. क्रिया 5. अव्यय (अविकारी)-क्रिया-विशेषण, संबंध-बोधक, समुच्चबोधक (योजक), विस्यमयादिबोधक।

उपर्युक्त वाक्यों में ‘लड़का’ का ‘लड़के’, दौड़ता का दौड़ते, वह का वे, छोटा का छोटे रूप बने हैं, किंतु ‘पीछे पीछे’, ‘तेज’ का रूप नहीं बदला है। अत: हम कह सकते हैं कि

  1. वाक्य में प्रयुक्त होने पर जिन शब्दों का रूप बदल जाता है उन्हें विकारी पद कहते हैं; जैसे-संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया!
  2. जिन शब्दों का रूप नहीं बदलता उन्म अविकारी (अल्यम) कहते हैं: जैसे -क्रियाविशेषण, सबभबाधक, समुन्नबोधक (मोजक), विस्यमयादिबोधक।

भाषाविज्ञान में रूपिम की संरचनात्मक इकाई के आधार पर शब्द-रूप (अर्थात् पद) के अध्ययन को पदविज्ञान या रूपविज्ञान (मॉर्कोलोजी) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, ‘शब्द’ को ‘पद’ में बदलने की प्रक्रिया के अध्ययन को रूपविज्ञान कहा जाता है।

रूपविज्ञान, भाषा विज्ञान का एक प्रमुख अंग है। इसके अंतर्गत पद के विभिन्न अंशों-मूल प्रकृति (baseform) तथा उपसर्ग, प्रत्यय, विभक्ति (affixation)-का सम्यक् विश्लेषण किया जाता है इसलिये कतिपय भारतीय भाषाशास्त्रियों ने पदविज्ञान को ‘प्रकृति-प्रत्यय-विचार’ का नाम भी दिया है।

भाषा के व्याकरण में पदविज्ञान का विशेष महत्व है। व्याकरण/भाषाविज्ञानी वाक्यों का वर्णन करता है और यह वर्णन यथासम्भव पूर्ण और लमु हो, इसके लिए वह पदों की कल्पना करता है। अत: उसे पदकार कता गया है। पदों से चलकर ही हम बास्मार्थ और बाक्पोच्चारण तक पहुंचते हैं।

किसी भाषा के पदविभाग को ठीक-ठीक हृदयंगम करने का अर्थ है-उस भाषा के व्याकरण का पूरा ज्ञान। रूप के अध्ययन की दृष्टि के आधार पर रूपविज्ञान के विभिन्न प्रकार गिनाए गए हैं

• वर्णनात्मक रूपविज्ञान-इसमें किसी भाषा या बोली के किसी एक समय के रूप या पद का अध्ययन होता है.

• ऐतिहासिक रूपविज्ञान-इसमें भाषा या बोली के विभिन्न कालों के रूपों का अध्ययन कर उसमें रूप-रचना का इतिहास या विकास प्रस्तुत किया जाता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

• तुलनात्मक रूपविज्ञान-इसमें दो या अधिक भाषाओं के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

भारतीय आचार्यों ने शब्दों की दो स्थितियाँ-सिद्ध एवं असिद्ध दी हैं। इनमें ‘असिद्ध’ शब्द को केवल ‘शब्द’ तथा ‘सिद्ध’ शब्द को ‘पद’ के रूप में परिणत किया जाता है। ‘सिद्धि’ के सुंबत (नाम) एवं तिङत्त (क्रिया) तथा ‘असिद्ध’ के कई भेद प्रभेद किए गए हैं।

यहाँ तक कि संस्कृत का प्रत्येक शब्द ‘धातुज’ ठहराया गया है। व्याकरण शब्द का नामकरण एवं उनकी परिभाषा इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखकर की गई है,

यथा-शब्दानुशसन (महर्षि पतंजलि एवं आचार्य हेमचंद्र) तथा ‘व्याक्रियते विविच्यते शब्दाः अनेन इति व्याकरणम्’ पाश्चात्य विद्वान् धानवंश की आवश्यक नहीं मानते. आधार त्यांशो को नाम एवं आख्यान दोनों के लिये अलग अलग स्वीकार करते हैं।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

वस्तुत: बहुत-सी भाषाओं के लिये धात्वंश आवश्यक नहीं। इस प्रकार रूपांशों की परिभाषा पाश्चात्य विद्वान् ब्लूमफील्ड और नाइडा के अनुसार शब्द भाषा की अर्थपूर्ण लघुतम इकाई है।

यह आभार रूपया तथा संबंध कायांशों में विभक्त हो सकती है। उन्हें क्रम से भाषा के अर्थतत्व एवं संबंधतत्वं कह सकते हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

अर्थतत्व तथा संबंधतत्व के पारस्परिक संबंधों के मुख्यत: तीन रूप उपलब्ध होते हैं। एक संयुक्त जहाँ दोनों अभिन्न रूप हो जाते हैं. दूसरा ईषत् संयुक्त या अर्धसंयुक्त; इसमें दोनों को पृथक पृथक पहचाना जा सकता है। तीसरे वियुक्त जहाँ दोनों अलग अलग रहकर अर्थ की अभिव्यक्ति करते हैं।

संयुक्त रूप के अंतर्गत प्राचीन आर्य, सामी हामी आदि भाषाओं की गणना की गई है। इसमें मूल प्रकृति बदल जाती है।

ग्रीक प्रथमा एक, बाउस, सं. गोः. ग्रीक पुं.द्वि. जुगोन, सं..युग्म संस्कृत पुलिंग पं.एक. अग्नेः, अरबी कित्ल (वैरी), कत्ल (मारा). कातिल (मारनेवाला), कुतिल (वह मारा गया) आदि।

वियुक्त रूप में संबंधतत्व पृथक् अस्तित्व रखता है। आधुनिक आर्य, चीनी आदि भाषाएँ इसी कोटि की हैं। संस्कृत के अव्यय, आधुनिक आर्यभाषाओं के परसंग इसके उदाहरण है।

यथा सं. इति एवं च आदि, हिंदी को, से, का, की, के. में पर और, जब, आदि। चीनी में ऐसे व्याकरणिक शब्दों को रिक्त या अर्थहीन कहा जाता है। यथा-सि (का),मु (को), सुंग (की)।

संबंध रूप का बोध सुर या बलाघात समाहाता हा चाना, अफ्राका भाषाआम इस उदाहरण का बहुलता हा अग्रजा कन्डक्ट, कन्ठक्ट हुआ(आमा चाना। इसक अतगता शब्दक्रम भी संबंधरूप को प्रकट करता है। उदाहरणार्थ, जिन (बड़ा आदमी).जिन्त (आदमी बड़ा है।)BHDC 108 Free Assignment In Hindi

गोतनि (मैं तुम्हें मारता हूँ) नितन्मो-तुम मुझे मारते हो। इस सबंधतत्वों के द्वारा भाषा की विभिन्न व्याकरणात्मक धाराओं का निर्धारण होता है। इनसे ही भाषा में लिंग, वचन, कारक, पुरुष, काल, प्रश्न, निषेध आदि की अभिव्यक्ति संभव होती है।

भाषाशास्त्रियों के मतानुसार इन सभी व्याकरणात्मक धाराओं का प्रयोग भाषा के उत्तरोत्तर विकास के साथ साथ हुआ।

विभक्तियों के द्वारा वाक्य में प्रयुक्त शब्दों में परस्पर संबंध का निर्धारण होता है। प्राचीन आर्यभाषाओं मंआ आठ विभक्तियाँ थीं, जिनके अब केवल अविकारी और विकारी, दो ही रूप शेष मिलते हैं। विकारी में स्वतः प्रयोग की क्षमता नहीं होती। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

उसके साथ परसर्ग के योग से सबंध प्रकट होता है। (यथा हिंदी, घोड़ों ने, पुत्रों को आदि)। विभिन कारकसबंधों के स्पष्टीकरण के लिये भाषा में परसर्ग व प्रिपोजिशन का विकास हुआ। इस प्रकार भाषा में पुरानी व्याकरणात्मक धाराओं का हास होता रहता है और नई धाराएँ इस अभाव की पूर्ति करती चलती है।

हिंदी की क्रियाओं में भी लिंगभेद मिलता है। अन्य आधुनिक आर्यभाषाओं में यह प्रवृत्ति नहीं पाई जाती। हिंदी में लिंगप्रयोग संबंधी यह विशेष व्याकरणिक धारा है। भाषा की ये सूक्ष्म धाराएँ एक दूसरे से भिन्न होती हैं। इसीलिये एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करना सरल कार्य नहीं होता।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि व्याकरणिक धाराएँ स्वभावसिद्ध एवं तर्कसंगत नहीं हैं। इनका विकास स्थूलता से सूक्ष्मता की भोर हुभा है। इस आधार पर यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि अविकसित भाषाएँ स्भूल और विकसित सूक्ष्म रूप की परिचायक है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 3 क्रियाविशेषण उपवाक्य की संरचना और प्रकारों का विवेचन कीजिए।

उत्तर-जिस प्रकार विशेषण उपवाक्य मुख्य उपवास के किसी संज्ञापन की विमोषता बताता है, उसी तरह क्रियाविशेषण उपवाज्य सामान्यतः मुख्य उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बताते है क्रिया की विशेषता बताने से तात्पर्य यह है कि यह कार्य-व्यापार के घटित होने के समय, स्थान, रीति परिमाण, कारण आदि से संबंधित सूचना देता है। उदाहरण के लिए नीचे के वाक्य देखिए

(1) जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब आप मुझे गणित पढ़ाते थे । (समयन)

(2) जहां गुप्ता जी रहते हैं वहां एक सरकारी अस्पताल भी है। (स्थान)

(3) जैसा लता गाती है वैसा और गयिकाएं नहीं गा सकती । (रीती )

इन वाक्यों में ‘जब’, ‘जहां’ और ‘जैसा’ से शुरू होने वाले उपवाक्य क्रियाविशेषण उपवाक्य हैं और क्रमशः पढ़ाने, स्थित होने और गाने के कार्य-व्यापार के समय, स्थान और रीति की सूचना दे रहे हैं।

क्रियाविशेषण क्रिया की ही विशेषता नहीं बताता, बल्कि विशेषण और स्वयं क्रियाविशेषण की भी विशेषता बताता है, जैसे
(4) गाड़ी धीरे चल रही है। (क्रिया की विशेषता)

(5) गाड़ी बहुत धीरे चल रही है। (क्रियाविशेषण ‘धीरे’ की विशेषता)

(6) गाड़ी बहुत पुरानी है। (विशेषण ‘पुरानी’ की विशेषता)

इसी प्रकार क्रियाविशेषण उपवाक्य के संबंध में भी हम कह सकते हैं कि यह मुख्य उपवाक्य की क्रिया के साथ-साथ उसके किसी | विशेषण और क्रियाविशेषण की भी विशेषता बता सकता है, जैसे

(7) शीला इतनी कमजोर हो गई है कि वह बिस्तर से भी नहीं उठ सकती।

(8) गाड़ी ऐसे धीरे चल रही है जैसे बैलगाड़ी हो। (क्रियाविशेषण ‘धीरे’ की विशेषता)

गौण उपवाक्य (क्रियाविशेषण उपवाक्य) मुख्य उपवाक्य
जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब आप मुझे गणित पढ़ाते थे।
जहां गुप्ता जी रहते हैं वहां एक सरकारी अस्पताल भी है।
जैसा लता गाती है वैसा और गायिकाएं नहीं गा सकतीं।
कि वह बिस्तर से नहीं उठ सकती शीला इतनी कमजोर हो गई है।
जैसे बैलगाड़ी हो गाड़ी ऐसे धीरे चल रही है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

सभी गौण उपवाक्यों के प्रारंभ में, ‘जब’, ‘जहां’, ‘जैसा’, ‘कि’, ‘जैसे’ आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है और सभी मुख्य उपवाक्यों में क्रमशः ‘तो’,’वहां’,’बेसा’,’इतनी’, ‘ऐसे’ आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है।

अतः ये सभी शब्द अकेले नहीं, बल्कि जोड़े के रूप में आते हैं, जिनमें से एक पटक गौण उपनाम के शुरू में प्रमुक्त होता है आदि दूसरा मुख्य उपबाक्स में, जैसे ‘जब…तब तो “जला…बता’ ‘जैसा. …वैसा’, ‘इतना….कि.’.’ऐ… जैसे’। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार के सभी शब्दों को तमने समुच्चयबोधक शब्द कहा है, लेकिन इनमें से जो शब्द क्रियाविशेषण उपवाक्य के प्रारंभ में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें संबंधवाचक क्रियाविशेषण भी कहते हैं, जैसे-जिबा, ‘जहां’ जैसा’, ‘जैसे’ आदि।

इसी प्रकार इनमें से जो सन मुख्य उपबाम में जुड़ते हैं, उन्हें नित्यसंबंधी शब्द कहते हैं, जैसे-‘तब’, ‘तो’, ‘यहां’, ‘बैसा’. ‘कि’ आदि।

इन दानों घटकों में से क्रियाविशेषण उपवाक्य में प्रयुक्त होने वाले संबंधवाचक शब्द (जब जहां, जैसा, जैसे, कि आदि) सामान्यतः अनिवार्य हैं, जबकि मुख्य उपवाक्य में प्रयुक्त होने वाले कुछ नित्यसंबंधी शब्दों (तब तो. वहां, वैसा. वैसे) का कभी-कभी ऐच्छिक लोप भी हो जाता है, जैसे

(1) जब मैं स्कूल में पढ़ता था, (तब) आप मुझे गणित पढ़ाते थे।

(9) जब आप आए. (तो) खाना खत्म हो चुका था ।
(10) जब भी में इस लड़के को देखता हूँ (तो) मुझे अपना बचपन याद आ जाता है।
(11) जहां भी में में जाऊँगा (वहा) तुम्हारे गुण गाऊंगा ।

(3) जैसा लता गाती है. (वैसा) और गायिकाएं नहीं गा सकतीं।

क्रियाविशेषया उपवाक्य के प्रकार- क्रियाविशेषण के पाठ में आप क्रियाविशेषण के विभिन प्रकारों के बारे में पढ़ चुके हैं, जैसे समयवाचक, स्थानवाचक, रातिवाचक क्रियाविशेषण आदि।

क्रियाविशेषण उपवाक्यों के भेद भी सामान्यतः इन्हीं आधारों पर किए जाते हैं। मोटे रूप से क्रियाविशेषण उपवाक्यों के आठ भेद किए जा सकते हैंBHDC 108 Free Assignment In Hindi

* समयवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे घटना या कार्य से संबंधित समय या काल का बोध होता है।

  1. जब में स्कूल में पढ़ता था (तब तो) आप मुझे गणित पढ़ाते थे।
  2. जब टेलिफोन की घंटी बजी (तो/तब) मैं खाना खा रहा था।

* स्थानवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे घटना या कार्य से संबंधित स्थल का बोध होता है।

  1. जहां गुप्ताजी रहते हैं वहीं एक सरकारी अस्पताल भी है।
  2. जहां आप जा रहे हैं वहां कोई सिनेमाघर नहीं है।

* रीतिवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे कार्य-व्यापार की रोति या तरीके का बोध होता है।

  1. जैसा लता गाती है वैसा) और गायिकाएं नहीं गा सकती।
  2. जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं हो पाता।

* परिमाणवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे अधिकता, तुल्यता, न्यूनता तथा अनुपात आदि का बोध होता है।

  1. ज्यों-ज्यों परीक्षा पास आ रही है (त्यों-त्यों) मैं ‘नरवस’ होता जा रहा हूँ।
  2. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती जाती है वैसे-वैसे) सभी जानवर घने जंगलों की ओर चले जाते हैं।

* कारणवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे घटना या कार्यकारण भाव का बोध होता है।

  1. क्योंकि मैं भी उम्मीदवार हूँ इसलिए मुझे भी इन कागजात की जरूरत पड़ेगी।
  2. मिहीं आ सकता क्योंकि मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है।

* शर्तवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इससे कार्य या घटना के संबंध में किसी शर्त या अनुबंध का बोध होता है।

  1. यदि आप चाहें तो अब भी अपना नाम वापस ले सकते हैं।
  2. अगर मेरी बात सच निकली तो आप जो चाहे सजा दे सकते हैं ।
  3. अगर आपको मनमानी ही करनी थी तो मुझसे क्यों पूछा था?

* विरोधवाचक क्रियाविशेषण उपवाक्य
इसे कुछ विद्वान रियायतवाची क्रियाविशेषण उपवाक्य भी कहते हैं। इससे दो कार्यों पर घटनाओं के बीच विरोधाभास या विरोधी सूचना का बोध होता है।

  1. यद्यपि साहब मेरे पुराने दोस्त है. (फिर भी) में उनका एहसान नहीं लेना चाहता।
  2. हालांकि उन्होंने मुझे पूरी छूट दे दी थी. (फिर भी) मैंने बाहर जाना ठीक नहीं समझा।

* प्रयोजनवाची क्रियाविशेषण उपवाक्य

इससे कार्य या घटना के प्रयोजन का बोध होता है।

  1. लेन-देन की बात पहले ही साफ कर लो जिससे बाद में गलतफहमी न रहे।
  2. दरवाजा खोल दो ताकि ताजी हवा भीतर आए।

कभी-कभी कुछ उपवाक्य विशेषण उपवाक्य तथा क्रियाविशेषण उपवाक्य दोनों की भूमिका निभाते हुए देखे जा सकते हैं। देखिए BHDC 108 Free Assignment In Hindi

  1. जिस समय मैं स्कूल में पढ़ता था. उस समय आप मुझे गणित पढ़ाते थे।
  2. जिस जगह गुप्ता जी रहते हैं उस जगह एक सरकारी अस्पताल भी है। खंड-ख

प्रश्न 4. अर्थ-परिवर्तन या अर्थ-विकास की दिशाओं का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर-भाषा परिवर्तनशील है। ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य के स्तर पर परिवर्तन की चर्चा विस्तार से हो चुकी है। अर्थ परिवर्तन को अर्थ विकास भी कहा जाता है। वैसे भाषा में किसी भी अंग का परिवर्तन क्यों न हो, वह एक प्रकार से विकास का सूचक होता है।

भाषा में व्याकरण जिसे अशुद्ध कहकर त्यागने की बात करता है. वहीं भाषा विज्ञान उसे परिवर्तन-विकास व प्रगति का सूचक कहकर स्वीकार करता है। इस प्रकार समय के साथ-साथ जिस प्रकार से शब्द, पद, बास्म में परिवर्तन तुआ त्यों-त्यों ‘अर्थ’ में भी परिवर्तन होता गया है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

(क) अर्थ विस्तार-वह शब्द जो पहले किसी एक अर्थ का वाचक हो वथा बाद में उसका अर्थ विस्तार अन्य वस्तुओं तक हो जाए उसे अर्थ विस्तार कहा जाता है जैसे-प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में ‘कुशल’ शब्द का अर्थ था-कश लाने में प्रवीण या ‘चतुर’, क्योंकि ‘कुस’ एक प्रकार की नुकीली नोक वाला भास था जिसे बड़ी सावधानी से उखाड़ना पड़ता था, असावधानी से हाथ अथवा उंगली में उसकी नोक गड़ जाती थी।

इस प्रकार वहाँ ‘कुश’ लाने वाले के अर्थ में कुशल का प्रयोग होता था, लेकिन आज किसी भी कार्य को भली-भाँति करने वाले के लिए ‘कुशल’ शब्द का प्रयोग होने लगा है। पहले ‘प्रवीण’ का अर्थ केवल ‘अच्छी तरह वीणा बजाने वाला’ होता था।

‘आजकल’ जूते गाँठने में प्रवीण, घड़े बनाने में, प्रवीण, कलम गढ़ने में प्रवीण में प्रवीण आदि कहलाते हैं, हालांकि इन्होंने बीणा कभी देखी भी नहीं है। इसी प्रकार पहले ‘अभ्यास’ का अर्थ था-बार-बार बाण फेंकना, परन्तु आज तो प्रत्येक काम के लिए अभ्यास शब्द का प्रयोग होने लग गया-वह लिखने का अभ्यास कर रहा है।

पहले तेल’ का अर्थ था ‘तिल का सार या तेल’, आज अर्थ विस्तार होकर चमेली, अरण्डी, सोयाबीन, मूंगफली, बादाम, सरसों, आँवला, नारियल तेल के लिए शब्द का प्रयोग हो रहा है।

आरम्भ में ‘स्याह’ का अर्थ था ‘काला’, लोग स्याह रंगों से लिखते था और उसका अर्थ था सिहो। परन्तु आम अर्थ विस्तार होकर नीली. पोली, लाल, काली सभी प्रकार की लिखने की स्याही का अर्थ प्रकट करने लगा है।

पहले सब्जी ‘शब्द’ जिसमें सब्ज का अर्थ ‘हुरा’ होता था और सब्जी का अर्थ केवल हरी सब्जी था लेकिन आज-गोभी कला, टिण्डा अरबी आल राजमा, चने की सब्जी छाल) के लिए यह शब्द प्रयुक्त हो रहा है।

(ख) अर्थ संकोच-जहाँ शब्द के विस्तृत अर्थ की परम्परा समाप्त होकर केवल उसका सचित अर्थ बना रह जाए, वहाँ अर्थ संकोच होता है। प्राचीन काल में जंगल में रहने वाले अर्थात् शिकार योग्य हरक पशु को ‘मृग’ कहा जाता था,BHDC 108 Free Assignment In Hindi

परन्तु वर्तमान में इसका अर्थ संकुचित होकर ‘केवल’ हरिण के लिए रह गया। गो ‘शब्द की व्युत्पत्ति’,गम धातु से हुई है। जिसका अर्थ है ‘गमन करने वाला’ अर्थात् चक्ले वाला, लेकिन आज सभी चलने वाले पशुओं को ‘गो’ न कह कर इससे केवल ‘गाय’ का अर्थ प्रकट होने लगा है।

पहले बह प्रत्येक कार्य जो श्रद्धापूर्वक किया जाता था, ऐसे सभी कार्यों को ‘श्राद्ध’ कहा जाता था, लेकिन आज इसका अर्थ संकोच होकर केबल मुत्यु के बाद ही श्राद्ध का प्रयोग होने लगा है। ‘पय’ शब्द का अर्थ प्राचीन संस्कृत में ‘दूध’ तथा ‘पानी’ दोनों के लिए प्रयुक्त होता था,

जो आज केवल ‘ध’ का अर्थ देता है। ‘सर्प’ रेंग कर चलने वाले प्रत्येक जीव का बोधक था, लेकिन आज केवल ‘साँप’ का अर्थ देता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

‘पर्वत’ अर्थात् ‘पा (पोरों) वाला, इसीलिए प्राचीन संस्कृत में इसका अर्थ ‘नरकल, सरकंडा, गन्ना, बाँस’ भी होता था, लेकिन आज अर्थ संकुचित होकर केवल ‘पर्वत’ रह गया।

इस प्रकार अर्थ संकोच के अन्य कारणों में-‘समास’, ‘उपसर्ग’. विशेषण, पारिभाषिकता, नामकरण, प्रत्यय आदि को विशेष भूमिका होती है। जैसे इन समस्तपदों-पीताम्बर, नीलाम्बर, दशानन आदि का अर्थ संकुचित होकर एक व्यक्ति विशेष श्रीकृष्ण, बलराम व रावण’ के लिए ही प्रयुक्त होता है,

न कि हर उस व्यक्ति को पीताम्बर कह दिया जाए, जो पीले वस्त्र पहनता है। हर लम्बे पेट बाले को लम्बोदर’ नहीं कहा जा सकता। अब इसका अर्थ संकुचित व रूढ़ होकर समस्तपद के सहारे ‘श्रीगणेश’ का ही वाचक है.

किसी अन्य ‘पेट’ का नहीं। इसी प्रकार यदि लाल गुलाब कहा जाता है तो वह केवल लाल विशेषण से बंधकर मात्र एक ही प्रकार के ‘लाल गुलाब’ फूल |BHDC 108 Free Assignment In Hindi

का अर्थ देता है, वरना तो गुलाब के फूल कई प्रकार के रंगों के होते हैं। यदि ‘हार’ शब्द में उपसर्ग ‘प्र’ लगा दिया जाए तो ‘हार’ प्रत्येक खेल में, युद्ध में या कार्य से होने वाली ‘हार’ का अर्थ न देकर ‘प्रहार’ एक प्रकार से आक्रमण करना या ‘चोट पहुँचाना’ के अर्थ तक संकुचित होकर रह गया।

इसी प्रकार ‘चार’ शब्द में विभिन उपसर्गों का योग कर दिया जाए तो ‘संचार’. उपचार, व्यभिचार, विचार, प्रचार आदि पद बन जाएंगे और अर्थ भी अलग-अलग हो जाएमा, पारिभाषिक दृष्टि से देखें तो रस का प्रयोग कई अर्थों में हो सकता है, गने का रस, आँवले का रस, मौसमी का रस, आदि लेकिन औषधि विज्ञान में किसी जड़ी-बूटी का ‘रस’ ही होगा. साहित्य में विभावादि के संयोग से उत्पन्न आनन्दानुभूति ‘काव्य’ रस रूप में आएगा, ‘व्याकरण में परस्पर दो शब्दों के मेल से पहले शब्द की अन्तिम’ तथा ‘बाद’ के शब्द की प्रथम ध्वनि के मेल से जो ध्वनि परिवर्तन होगा उसे सन्धि कहेंगे,

जबकि राजनीति में दो देशों के झगड़े या अन्य समस्या के समाधान हेतु ‘सन्धि’ होती है। इसी प्रकार गृहस्थी, वानप्रस्थ, आदि शब्दों का अर्थ भी संकुचित होगया है. क्योंकि घर में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को गृहस्थ नहीं कहा जा सकता, BHDC 108 Free Assignment In Hindi

उसी प्रकार-वन में रहने वाले सभी मनुष्यों को ‘वानप्रस्थ’ नहीं कहा जा सकता, ये तो | अपना संकुचित विशिष्ट अर्थ ही प्रकट करेंगे।

(ग) अर्थादेश-डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, “भाव-साहचर्य के कारण कभी-कभी शब्द के प्रधान अर्थ के साथ एक गौण अर्थ भी चलने लगता है। कुछ दिन में ऐसा होता है कि प्रधान अर्थ का धीरे-धीरे लोप हो जाता है और गौण अर्थ में ही शब्द प्रयुक्त होने लगता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार एक अर्थ के लोप लाने तथा नबीन अर्थ के आ जाने को अर्थादेश’ कतने हैं।” कहने का तात्पर्य यह कि अर्थादेश में किसी शब्द के अर्थ का विस्तार या संकुचन नहीं होता, बल्कि अर्थ पूर्णतःबदल जाता है। जैसे ‘गवार’ शब्द का पहले अर्थ होता था ।

‘गाँव में रहने वाला लेकिन वर्तमान में यह ‘असभ्य अर्थ का वाचक हो गया है। वे गओं में ‘असुर शब्द देवता का अर्थ देता था, लेकिन अब यह पूर्णत:बदलकर राक्षस का अर्थ देता है. इसका पूर्व अर्थ देवता पता नहीं कहाँ लुप्त हो गया।

इस प्रकार अर्थादेश के अन्तर्गत अर्थ परिवर्तन दो दिशाओं में होता है-(1) अर्थोत्कर्ष, (2) अर्धापकर्ष।

(1) अर्थोत्कर्ष-दस परिवर्तन के अंतर्गत किसी शब्द का पूर्व अर्थ अच्छा नहीं होता, हीन होता है, लेकिन परिवर्तित अर्थ पहले के | अर्थ से श्रेष्ठ होता है। जैसे पहले संस्कृत में ‘साहस’, ‘अदम्य साहस’ आदि शब्दों के अर्थ-कर, नृशंस, व्यभिचार, हत्या, डाका आदि हुआ करता था,

लेकिन आज ‘साहस’ का अर्थ अच्छा होकर हिम्मत के साथ किए जाने वाले कार्यों के संदर्भ में होने लगा है। उसमें साहस है इसलिएडित को जंगल में चला जाएगा, साहसी बच्चे सफल ही होते हैं।

महिला ने बड़े साहस से काम लिया व चोर को मार भगा दिया। राष्ट्रपति ने गणतंत्र दिवस पर साहसी बच्चों को पारितोषिक प्रदान किए आदि वाक्यों में ‘साहस’ शब्द अपने बुरे अर्थ को छोड़ अच्छे अर्थ को ग्रहण कर चुका है। यहाँ साहस का अर्थात्कर्ष हुआ है।

पहले ‘कर्पट’ का अर्थ होता था ‘चीथड़ा, जीर्णशीर्ण वस्त्र, लेकिन अब | अर्थात्कर्ष के साथ यह हर प्रकार के कपड़े के अर्थ का बोध करवाने लगा है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

‘मुग्ध’ शन का संस्कृत में अर्थ था ‘मूल’ लेकिन आज उसमें मूढ़ता का कोई निड दिखाई नहीं देता। हर कोई कहता है कि नायक-नायिका को देखकर मुग्ध हो गया, अर्थात्, अब इसका अर्थ ‘मूढ’ न होकर ‘मोहित’ हो गया है, जो अच्छा है।

(ख) अर्थापकर्ष-जहाँ शब्द अपने पहले के अच्छे, श्रेष्ठ अर्थ का लोप कर निकृष्ट अर्थ, हीन अर्थ का वाचक हो जाए उसे अर्थापकर्ष कहते हैं। जैसे ‘गवार’ शब्द का अर्थ ‘पहले गाँव में रहने वाला होता था.

लेकिन अब अर्थापकर्ष होकर इसका अर्थ ‘असभ्य’ हो गया है, जुगुप्सा ‘शब्द’, ‘गुप’, धातु से निर्मित है, जिसका पहले ‘छिपाने या पालने के अर्थ में प्रयोग होता था, लेकिन अब इसका अर्थापकर्ष तोकरं अर्थ हो गया-‘घृणा’। यहाँ इसका अर्थ ‘पालन’ से गिरकर ‘घृणा’ अर्थ में प्रयुक्त होना ‘जुगुसा’ का अर्थापकर्ष ही है।

‘नग्न’, ‘लुचित’ ये दोनों शब्द पहले जैन धर्म में साधुओं के लिए बहुत सम्मान के साथ प्रयुक्त होते थे, लेकिन अब इनका तद्भव रूप’नंगा’,’लुच्चा’ बदमाश के लिए प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार ‘लिंग’ का पहले अर्थ था-‘लक्षण’ लेकिन। वर्तमान में आम बोलचाल में इस शब्द का प्रयोग ही ‘अश्लीलता’ की कोटि में आता है।

पहले ‘हरिजन’ का अर्थ ‘भगवान के भक्तों’ का बोध करवाता था, लेकिन वर्तमान में अर्थापकर्ष ने इसे अनुसूचित जातियों के अर्थ ‘हरिजन’ का प्रतीक बना छोड़ा।

‘पापण्ड’ शब्द बौद्धकाल में ‘सम्मान के पात्र अनुयायियों का सूचक था. इन्हें सम्राट अशोक दान भी देते थे; जो आज पाखण्ड, पाखण्डी के रूप में प्रयुक्त होने लगा है। (इसी प्रकार ‘महाजन’ श्रेष्ठ व्यक्ति का बोध करवाता था’ तो आजकल ‘सूदखोर’ का अर्थ प्रकट करता है।

प्रश्न 5. देवनागरी लिपि में एकरूपता लाने के उद्देश्य से अब तक हुए सुधार के प्रयासों पर प्रकाश डालिए

उत्तर-भाषा-भेद को एक जीवंत भाषा का मूल तत्त्व माना जाता है। जो भाषा जितनी जीवंत होती है, उस भाषा में समय, स्थान और प्रयोग के आधार पर उतनी ही भिन्नता दिखाई देती है। लेखन भाषा के बदलते रूप को स्थिरता प्रदान करता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

लेखन को एक निश्चित सीमा तक ही परिवर्तनशील माना जाता है। लेखन में व्यवहार रूपी भिन्नता आज भी अनेकों स्तरों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती है; जैसे पक्का, वक्ता आदि। कभी-कभी लिखित भाषा इस विभिन्नता के कारण अबोधगम्य हो जाती है।

टंकण और मुद्रण के क्षेत्र में लिपि-चिहनों को यह विभिन्नता काफी कठिनाई उत्पन्न करती है लिमि को विभिन्नता में एकता स्थापित करना मानकीकरण के आधार पर संभव होता है।

मानकीकरण के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा की दृष्टि से देवनागरी लिपि का कौन-सा रूप मान्य है और कौन-सा रूप अमान्य है।

मानकीकरण से तात्पर्य

मानकीकरण के द्वारा लिपि की विभिन्नता में एकता लाने का कार्य किया जाता है। भाग में मानकीकरण के पश्चात और भी ज्यादा स्थिरता दिखाई देने लगती है। भाषा को संप्रेषणीयता में काफी बद्धि दिखाई देने लगती है और उसका प्रयोग भी काफी बोधगम्य हो जाता है।

‘अ ध्वनि को लिपि-चिन के माध्यम से इस तथ्य को समझा जा सकता है। जैसे-नाम, बात. कण. सच्चा, सत्य। इन दोनों अर्थात. नाम, बात में पहली बनि आ रही है और इसको पूर्ण स्वर लिपि के द्वारा ही लिखा गया है। इस ध्वनि के दो लिपि-चिन -पहला पूर्ण आ और मात्रा चितन है।

इसमें इस बात का ज्ञान होना आवश्यक है कि स्वरों का पूर्ण रूप कब लिखा जाए और कब किसकी मात्रा लगामी जाए।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

थोड़ा ध्यान से देखने पर यह बात सिद्ध हो जाती है कि अगर स्वर अक्षर में पहले आता है, तो उसे पूर्ण लिपि चिहन में ही लिखा जाएगा और मात्रा चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जब अक्षर में व्यंजन के बाद स्वर को जोड़कर बोला जाता है।

इसी प्रकार से व्यंजन लिपि में भी भेव बिसाई देता है। जैसे-जब किसी भी अक्षर के माननात स्वर आता है, तो उस समम व्यंजन को पूर्ण लिखा जाता है।

जैसे-कण शब्द क् + अ व+ ण् + अ को क और ण पूर्ण लिपि चिह्न द्वारा ही व्यक्त किया गया है। जब संयुक्त व्यंजन होते हैं, तो पहले व्यंजन में थोड़ा-सा परिवर्तन दिखाई देने लगता है। जैसे-बच्चा, सत्य आदि।

इस बात को भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि पूर्ण व्यंजन के अंदर ‘अ’ की ध्वनि विद्यमान रहती है या नहीं। ‘कण’ शब्द के ‘क’ में क् + अ दोनों ही प्रकार की ध्वनियों का समावेश है, जब व्यंजन के साथ अन्य स्वर को संयुक्त किया जाता है, तो उसे मात्रा चिह्न द्वारा संकेतित किया जाता है, जैसे-काम शब्द का आ।

एक ही स्वर के लिए प्रयुक्त पूर्ण स्वर-लिपि चिह्न आ, इ, ई, ऊ, व उसके स्मा …… आदि अनेक रूप सार्थक स्मों हैं? इस बात पर ध्यान देना अत्यधिक आवश्यक है।

ये दो भिन रूप ‘अक्षर’ में अपनी स्थित्तिनुसार ही अपने अर्थ को ग्रहण करते हैं। इस बात को स्पष्टता घोड़ा ध्यान देने में ही हो जाएगी। ‘र’ के लिपि चिह्न के प्रयोग में भी यह दृष्टिगत होता है; जैसे-रय = र, कर्म = ( ).क्रम: (.), राष्ट्र :(.)

इस प्रकार इन चारों का प्रयोग अपने निर्धारित स्थान पर होता है और में चारों प्रयोग पूर्ण रूप से सार्थक हैं। इस नियम को समझने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

1 यदि ‘र’ के पश्चात स्वर आए. तब पूर्ण ‘र’ लिखा जाता है।

2 संयुक्त व्यंजनों में यदि प्रथम आभा ‘र’ आता है, तो उस स्थिति में ‘1’ को चन्द्राकार के रूप में () व्यंजन के ऊपर लिखा जाता है; जैसे-कर्म, धर्म आदि।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

3 जब संयुक्त व्यंजन के बीच में दूसरा व्यंजन ‘र’ हो, तो उसे पहले व्यंजन के नीचे एक छोटी तिर्यक रेखा के रूप में लिखा जा सकता है। जैसे-प्राण, वन आदि।

4 दूसरे व्यंजन के रूप में ट, ठ, ड, ढ के साथ आने पर ‘र’ अपना रूप (.) ले लेता है; जैसे-ड्रामा, ट्राम।

इस प्रकार उपर्युक्त कभनों से यह स्पष्ट हो जोता है कि एक ही वर्ण को दो प्रकार से लिखा जाता है और दो लिपि चिन्नों के द्वारा एक ही स्वर को व्यक्त किया जाता है।

देवनागरी के मानकीकरण की आवश्यकता :

लिपि का सबंध भाषाई कौशल के के दो प्रश्नो से जुड़ा होता हैं 1( लेखन ) 2 ( पठन ) सार्थक इकाइयों को लेखन कौशल के माध्यम से लिखित चिह्नों के द्वारा व्यक्त किया जाता है।

पाठक दो प्रकार की प्रक्रियाओं से पठन-कौशल के अन्तर्गत बंधा हुआ होता है। लेखन का संबंध अर्थ ग्रहण से होता है और पठन का संबंध सस्वर पाठ करने में होता है।

सभी भाषाओं के लेखन में किसी भी प्रकार से समरूपता दिखाई नहीं देती। यदि अंग्रेजी की वर्तनी व्यवस्था को देखा जाए, तो उसके स्वर K’ का उच्चारण Call, Cool आदि शब्दों में ‘क’ है, लेकिन Cell. Twice में ‘स’ की भिन्न ध्वनि आती है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

इस आधार पर यह स्पस्ट हो जाता है कि एक लिपि चिह्न की दो प्रकार की ध्वनियाँ होती हैं।

देवनागरी लिपि में ध्वनि व लिपि के लिए एक के लिए एक का ही नियम प्रयुक्त किया जाता है। इस लिपि में लिपि-चिह्न के आधार पर दो प्रकार के रूप देखे जा सकते हैं

1.(क) स्वर के लिए मुख्य लिपि-चिह्न-अक्षर में यदि स्वर पहले आए. तो उसे प्रमुख स्वर लिपि चिह्न के द्वारा व्यक्त किया जाता है। जैसे-आग (आ). ईख (ई). ऊन (ऊ) आदि।

(ख) स्वर हेतु गौण लिपि चिह्न-व्यंजन के पश्चात जब अक्षर में स्वर को जोड़ा जाता है, तो उसे मात्रा लिपि चिह्न के द्वारा | प्रदर्शित किया जाता है। जैसे-नाम (1). गीत (१).खून (..) आदि।

  1. (क) व्यंजन हेतु मुख्य लिपि-चिह्न-व्यंजन के बाद स्वर आने पर उसे मुख्य व्यंजन लिपि चिह्न के द्वारा लिखा जाता है। जैसे-धन।

(ख) व्यंजन हेतु गौण लिपि-चिह्न-अक्षर में व्यंजन के पष्ठचात व्यंजन आने पर प्रथम व्यंजन को आधे रूप में व्यक्त किया जाता है। जैसे तथ्या यहाँ ‘त’ व्यंजन के पश्चात थय व्यंजन आने से पूर्व व्यंजन को आधे रूप में लिखा जाता है।

अत: स्पष्ट है कि एक ही ध्वनि के लिए देवनगरी लिपि में दो लिपि-चिह्न दिखायी देते हैं। इसी प्रकार से व्यंजन लिपि-चिह्न के भी दो रूप दिखायी देते हैं। यह विविधता भाषा में विकल्पन को बल देती है। विकल्पन को दो भागों में बांटा गया है-(1) नियंत्रित. (2) अनियत्रित।

निमंत्रित विकल्पन के विकल्प रूपों को नियमों, उपनियमों के माध्यम से निमंत्रित करना काफी सरल होता है, जबकि अनिमंत्रित विकल्पन के लिए किसी भी प्रकार का कोई नियम नहीं होता।

मुक्त विकल्पन के कारण ध्वनियों की भाति लिपि में भी दुरुहता आ जाती है। एक ध्वनि के लिए एक से अधिक लिपि-चिह्न, पठन, टंकण आदि क्षेत्रों में काफी कचिनाई उत्पन्न करते हैं।

इसीलिए देवनागरी के मानकीकरण की आवश्यकता मुक्त विकल्पन को समाप्त करने के लिए महसूस की गई थी। मुक्त विकल्पन को कई उदाहरणों में स्पष्टता से देखा जा सकता है। जैसे

स्वर के लिए मुख्य लिपि चिह्न-अ =अ।

व्यंजन के लिए ख-रव, श-का BHDC 108 Free Assignment In Hindi

व्यंजन के लिए गौण लिपि चिहन-पक्का-पका चिहन-चिद्व आदि।

देवनागरी वर्गों का मानकीकरण

देवनागरी वर्गों को पृथक-पृथक लिखा जाता है। जो हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं, उन सभी लोगों का क्षेत्र काफी विस्तृत होता है।

कुछ वर्षों के लिखने के ढ़ग से प्रत्येक क्षेत्र में कुछ विकिपती दिखायी देती है और इस विविधता से जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है, वे इस प्रकार से है

  1. टकण-या की कठिनाई।
  2. भाषा सीखने-सिखाने में कठिनाई।

3.मुद्रण की कठिनाई।

भारत सरकार ने इन सभी कठिनाइयों को दूर करने के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय को मानक देवनागरी लिपि निर्धारित करने का काम सौंपा है। विद्वानों से विचार-विमर्श करके इस निदेशालय ने देवनागरी के वर्गों का मानक रूप प्रस्तुत किया है।

वर्णों का रूप मानक होना चाहिए या अमानक, इस बारे में काफी गहनता से विचार-विमर्श किया गया और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि वर्गों में समता अनिवार्य रूप से हो।

इस बात पर विशेष बल दिया गया कि शिक्षा, पाठ्यपुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं जैसे क्षेत्रों के लोग भी इसी मानक रूप का प्रयोग करें।

मानक हिन्दी वर्णमाला- इसमें वर्णमाला का प्रयोग निम्न प्रकार से होगा

स्वर-अ, आ, इ.ई. 3, क ए, ऐ, ओ, औ। स्वर वर्ण माला में स्वर की मात्राओं को किसी भी प्रकार से सम्मिलित नहीं किया जाएगा। बारहखड़ी सिखाने के लिए अध्यापन के समय इनका व्यंजनों के साथ यथा रूप प्रयोग करना बताना चाहिए। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

मूल व्यंजन- क, ख, ग, घ, ङ
च, छ, ज,झ,ज
ट, ठ, ड, ढ, ण
त, थ, द, ध, न
प, फ, ब, भ, म
य, र, ल, व, शा . स. है….

प्रत्येक व्यंजन के साथ मूल व्यंजनों के शुद्ध रूप को दर्शाते समय हलंत चिह्न (.) का प्रयोग करना चाहिए। संयुक्त वर्णों का मानकीकरण

1 खड़ी पाई वाले व्यंजन-खड़ी पाई वाले व्यंजनों के संयुक्त रूप परंपरागत तरीके से खड़ी पाई को हटाकर ही बनाए जाने चाहिए। जैसे-नगण्य, शय्या, उल्लेख, त्र्यबक, स्वीकृति।

2 संयुक्त वर्ण के निर्माण में ‘क’ और ‘क’ का प्रयोग इस प्रकार होना चाहिए-मुक्त, दफ्तर आदि।

3 ड.छ, ट, ठ, ड, ड, और द को संयुक्ताक्षर हलन्त (() चिह्न के द्वारा लिखना आवश्यक है; जैसे-टटू गड्ढा, विद्या आदि।

4 ‘र’ के तीन रूपों को स्वीकार किया गया है; जैसे-क्रम ), कर्म (). राष्ट्र (.)।

5.”5 और ‘ज्ञ’ संयुक्ताक्षरों को पृथक वर्णों के रूप में लिखा जाता है. लेकिन इन्हें एक ही वर्ण के रूप में लिखना चाहिए।

6’श्र’ का जो रूप है, उसी के अनुसार इसका प्रयोग किया जाएगा। इसे च के रूप में नहीं लिखा जाएगा।

अनुस्वार (शिरोबिन्दु/बिंदी) तथा अनुनासिकता चिहून

भाषाविदों के अनुसार अनुनासिकता को स्वा का ज्ञासिक्य विकार और अनुस्वार को व्यंजन माना गया है। इन दोनों ही अर्थों में काफी भिन्नता दिखाई देती है, इसलिए हिंदी में इन दोनों का ही प्रयोग अनिवार्य है|

अनुस्वार-दूसरे वर्गीय वर्णों से पहले संस्कृत शब्दों का अनुस्वार पहले की भांति ही रहेगा; जैसे- संरक्षण, संवाद, अंश, कंस आदि। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

अनुस्वार का प्रयोग संयुक्त व्याजम के रूप में जहाँ पचम वर्ण के बाद सवय शोष चार वर्षों में से कोई एक वर्ण हो. ती एकरूपता के लिए ही करना चाहिए; जैसे गंगा, पंकज, कंठ, संबंध आदि।

यदि किसी अन्य वर्ग का कोई भी वर्ण पंचमाक्षर के पश्चात आता है तो पंचमाक्षर अनुस्वार को सिप में गिरवर्तित नहीं होगा बीस मिमय उन्मुख आदिा अलरवार का प्रयाग सकता कि तलाम शब्दों के अंत में किया जाता जैसे-एवं (एवम्), शिवं (शिवम्)।

अनुनासिकता (चन्द्रबिन्दु)

अनुनासिकता स्वरों का ध्वनि गुण है। यह व्यंजन नहीं है। चन्द्रबिन्दु का हिंदी के शब्दों में उचित प्रकार से प्रयोग करना अनिवार्य है।

जब भी अनुनासिक स्वरों का उच्चारण किया जाता है, तो उसमें नाक से हवा निकलती है। जैसे-आँ.. माँ है आदि। अनुनासिकता का प्रयोग करते समय वों पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग अनिवार्य है।

विसर्ग (:)

विसर्ग का प्रयोग उन शब्दों में किया जाता है, संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग किया जाता है और मदि वे तत्सम रूप में प्रयोग किए जाएं। जैसे दुःखानुभूति।

तद्भव शब्द के रूप में यदि विसर्ग का लोप हो चुका है. तो उसमें बिसर्ग का प्रयोग नहीं किया जाएगा। | जैसे-दुस-मुख के सायो। तत्सम शब्दों के अन्त में प्रयुक्त विसर्ग का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। जैसे-अत:, पुनः स्वत: आदि।

परिवर्धित देवनागरी

लिपि न तो भाषा होती है और न ही किसी भाषा का अंग होती है। लिपि के माध्यम से भाषा की इकाई को लिखित बिहनों के द्वारा व्यक्त किया जाता है। एक लिपि के माध्यम से अनेक भाषाओं को लिपिबद्ध किया जा सकता है। जैसे-संस्कृत भाषा को देवनागरी लिपि के साथ-साथ रोमन लिपि में भी बाँधा जा सकता है।

हिन्दी में अरबी, फारसी व अंग्रेजी के कुछ इस प्रकार के शब्द समाहित हैं, जिनकी ध्वनि को व्यक्त करने में देवनागरी लिपि में चिह्नों की कमी के कारण लेखन में काफी कठिनाई महसूस होने लगी है।

इस कमी को निम्नलिखित चिहनों के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जा सकता है-(1) नुक्ता, (2) अर्धचन्द्रकार। जैसे-फन-फ़न, बॉल-बॉल आदि।

इन शब्दों के बिना चित्नों का अर्थ एकबम परिवर्तित हो जाता है और ये सभी चिहन देवनागरी व्यवस्था के अभिन्न अंग हिन्दी के लिए स्वीकार्य हो चुके हैं।

परिवर्धित देवनागरी : संदर्भ और आवश्यकता

देवनागरी वर्णमाला का विस्तृत रूप परिवर्धित देवनागरी है, जिसके माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं को लिपिबद्ध किया जा सकता है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

परिवर्धित रूप का निर्माण करने के लिए भारत की भाषाओं को ध्वनिगत विशेषताओं को लिखित रूप देने के लिए विशेष चिह्नों का प्रयोग करने की योजना तैयार की गई है।

स्वभावतः परिवर्धित देवनागरी संपर्क लिपि है। हिन्दी भाषा के दो संदर्भ हैं

पहला संदर्भ-इनका संबंध उन्हीं भाषाओं के लेखन से है, जिनके लिए देवनागरी का पारम्परिक रूप प्रयोग किया जाता है। जैसे-संस्कृत, हिन्दी आदि।

दूसरा संदर्भ-यह संपर्क लिपि से बंधा हुआ है। इनका प्रयोग उन भाषाओं के लिए किया जाता है, जो भाषाएँ लिपिबद्ध करने के लिए विकसित की जा रही हैं और जिन भाशाओं की कोटी भी लेखन व्यवस्था उपलब्ध नही है।

देवनागरी लिपि में सम्पर्क लिपि के रूप में भारत की समस्त भाषाओं की ध्वनियों को व्यक्त करने की शक्ति है। भारत में इस प्रकार की अनेकों भाषा में जी पूर्णत: लिपिविहीन है। इस प्रकार की भाषाओं के लिए परिवर्धित देवनागरी की सपकी लिपि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

देवनागरी में लिपि चिह्नों को और दूसरी भाषाओं की प्रत्येक भाषाओं के लिए किसी भी प्रकार से बढ़ाने का प्रयास नहीं किया गया है वरन उस भाषा के लिपि चिटना के समान ही देवनागरी लिपि चित्रण को स्पष्ट रूप से देखा गया है।

इस प्रकार देवनागरी लिपिको सभी भाषाओं को अभिव्यक्त करने वाली लिपि माना जाता है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं में देवनागरी लिपि का लिपिकरण करना रहा है।

खंड-

प्रश्न 6. (क) भाषा और बोली

उत्तर-भाषा-भाषा वह साधन है, जिससे हमारे विचार व्यक्त होते हैं और हम इसके लिए ध्वनियों का उपयोग करते हैं। इस तरह से भाषा शब्दों और वाक्यों का ऐसा समूह है, जिससे मन की बात बताई जाती है। भाषा एक राष्ट्रीय समाज की प्रतिनिधि होती है।

भाषा का उपयोग समाज में साहित्यिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और प्रशासनिक आदि सभी औपचारिक कार्यों में किया जाता है।BHDC 108 Free Assignment In Hindi

हिंदी खड़ी बोली का रूप है। 700 वर्ष तक हिंदी बोली के रूप में प्रचलित रही थी। भाषा का व्याकरण मानिक रूप से मान्यता से प्राप्त है।

बोली-बोली भाषा का सबसे छोटा स्वरूप होता है और सीमित होता है। यह आमतौर पर व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है और इसका प्रयोग भी आधारित होता है।

बोलियों के समूह की उपबोली बनती है। उपबोली के समूह से ही बोली बनाई जाती है। भाषा का विकास बोलियों द्वारा ही होता है। बोलियों के व्याकरण का मानकीकरण होता है और बोली लिखने या बोलने वाले से ठीक से अनुसरण करते हैं और व्यवहार करते हैं।

बोली भी सक्षम हो जाती है कि, लिखित साहित्य का रूप धारण कर सके और उसे भाषा का स्तर प्राप्त हो जाता है।

(ख) स्वरों का वर्गीकरण

उत्तर-हिंदी में स्वर ध्वनियों का वर्गीकरण मुख्य रूप से तीन आधारों पर किया गया है1. जिहूवा की ऊंचाई-जिह्वा की ऊँचाई के आधार पर स्वरों को चार वर्गों में विभक्त किया गया है

(ii) संवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिहवा का जितना अधिक भाग ऊपर उठता है, उससे वायु उतनी ही संकुचित होकर बिना किसी रुकावट के बाहर निकलती है. इससे उच्चरित होने वाले स्वर संवृत कहलाते हैं। ई. इ. ऊ. उ संवृत स्वर हैं। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

(ii) अर्धसंवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का भाग कम ऊपर उठता है और वायु मुखविवर में कम संकुचित होती है। इससे उच्चरित स्वर अर्धसंवत कहलाते हैं। ‘ए’ और ‘ओ’ अर्ध संवृत स्वर है।

(iii) अर्धविवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा अर्धसंवृत में कम ऊपर उठती है और मुखविवर में वायु मार्ग खुला रहता है। इससे उच्चरित स्वर अर्धविवृत स्वर कहे जाते हैं। अ. ऐ और औ अर्धविवत स्वर हैं।

(iv) विवृत-जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा मध्य में स्थित होती है और मुखविवर पूरा खुला रहता है, ऐसे उच्चरित स्वर को विवृत कहते हैं। ‘आ’ विवृत स्वर है।

  1. जिह्वा की स्थिति-किसी स्वर के उच्चारण में जिह्वा की स्थिति के आधार पर स्वरों के तीन भेद किए जाते हैं

(1) अग्रस्वर-जिन स्वरों के उच्चारण मेजिया का आभाग सक्रिय होता है। में उत्तरित स्वर को अग्रस्वर कहते हैं। हिंदी में इ.ई. ए. ऐ, अग्रस्वर हैं।

(ii) मध्य स्वर-विनाखरी के अचारणामि जिल्ला का मध्य भंग सक्यिा होता है. ऐसे चरितास्वर को मध्यांक कहते हैं। हिंदी में ‘अ’ मध्य स्वर है।

(iii) पश्चस्वा-जिना स्वरों के उच्चारणा में बिहवा का पश्व भाग सक्रिय होता है ऐसे उच्चरित स्वर को पश्च स्वर कहते हैं। हिंदी में ऊ. उ.ओ. ओ एवं आ पश्च स्वर हो

  1. होठों की आकृति- किसी स्वर के उच्चारण में होठों की आकृति के आधार पर स्वरों को दो वर्गों में रख सकते हैं

(i) गोलीय-जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ की स्थिति कुछ गोलाकार होती है, ऐसे उच्चरित स्वर को गोलीय कहते हैं। ऊ, उ, ओ, औ, ऑ गोलीय स्वर हैं। (अंग्रेजी से आए हुए व् स्वर के लिए ओं का उच्चारण होता है। जैसे-डॉक्टर, नॉर्मल आदि।) BHDC 108 Free Assignment In Hindi

(ii) अगोलीय-जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ की स्थिति गोलाकार नहीं होती है, ऐसे उच्चरित स्वर को अगोलीय कहते हैं। अ,आ, इ. ई. ए और ऐ अगोलीय स्वर हैं।

(ग) खण्ड्येतर स्वनिम

उत्तर-भाषा व्यवहार में केवल ध्वनियों का ही प्रयोग नहीं होता, बल्कि ध्वनि के साथ कुछ अन्य तत्वों का भी प्रयोग होता है, जिससे भाषा स्वाभाविक प्रतीत होती है।

इन तत्वों को ध्वनि-गुण (खंडेतर अभिलक्षण) कहते हैं। इन्हें मात्रा, बलाघात. सुर, अनुनासिकता और संगम आदि के रूप में निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जाता है

मात्रा- किसी ध्वनि के उच्चारण में लगने वाले समय को ‘मात्रा’ कहते हैं। इसी के आधार पर स्वरों को हस्व एवं दीर्घ कहा जाता है।

बलाघात- जब बोलते समय किसी ध्वनि या शब्द पर विशेष बल दिया जाता है, तो इसे ‘बलाघात’ कहते हैं। कुछ भाषाओं में शब्द के भाग या ध्वनि पर अलग-अलग बल देने से अर्थ परिवर्तन होता है,

जैसे-अंग्रेजी के ‘Present’ शब्द में प्रथम अक्षर पर बल देने पर ‘Present का अर्थ ‘उपस्थित’ होता है और दूसरे अक्षर पर बल देने पर Persent का अर्थ ‘उपहार’ होता है।

सुर- एक बाक्य बोलते हुए आबाज की लय की अवस्था सुर कहलाती है। इसके तीन भेद हैं-उन, निम्न और सम उच्च में मुर नीचे से ऊपर जाता है, निम्न में ऊपर से नीचे आता है और सम में बराबर रहता है।

अनुनासिकता- ध्वनि या शब्द का प्रयोग करते हुए नासिक्यता का प्रयोग अनुनासिकता है।

संगम अथवा संहिता (Juncture)-दो शब्दों या सार्थक ध्वनि-समूहों के बीच विराम का प्रयोग संगम या संहिता है। इसके कारण अर्थभेद हो जाता है। इसका सर्वप्रसिद्ध उदाहरण निम्नलिखित है

रोको मत, जाने दो।
रोको, मत जाने दो।

(घ) पूर्वी हिंदी की बोलियाँ

उत्तर-पूर्वी हिंदी की बोलियाँ

1 अवधी- अवधी पूर्वी हिंदी (purvihindi) की प्रमुख बोली है जो अवध प्रदेश के अन्तर्गत बोली जाती है। ऐसा माना जाता है कि अयोध्या से अवध शब्द विकसित हुआ और इसी के आधार पर इस बोली कोअवधी कहा गया। जार्ज ग्रियर्सन ने इसे अर्धमागधी अपभ्रंश से उद्भूत माना है,

परन्तु डॉ. बाबूराम सक्सेना इसमें पाति से अधिक समानता पाते हैं। वहीं डॉ. भोलानाथ तिवारी इसे ‘कोसली’ से उद्भूत | मानते हैं। अवधी प्रायः नागरी लिपि में लिखी जाती है परन्तु मध्यकाल में केथी और फारसी लिपि में भी इसे लिखा जाता रहा है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

जार्ज ग्रियर्सन ने अवधी बोलने वालों की संख्या एक करोड़ साह कमल लाय. बताई है। किजिनगणना के अनुसार अवधी बोलने वालों की संख्या 136259 है। अवधी बोली में साहित्य रचना व्यापक मात्रा में हुई है। अवधी को प्रथम रचना मुल्ला दाऊद कृति ‘चंदायन’ को मानी जाता है।

तुलसीदारी कृती रामचरितमानस’ एवं जायसी कृति ‘पद्यावा जैसे हिंदी महाकाव्य इसी भाषा अवधी में लिखे गए हैं। हिंदी की प्रेमाश्रयी शाखा के लगभग सभी कवियों ने अवधी में ही साहित्य रचना की है। इनमें प्रमुख हैं जायसी, मंझन, कुतबन, नूर मुहम्मद आदि।

अवधी बोली की उपबोलियाँ- अवधी बोली की उपबोलियों की संख्या तेरह बताई जाती है, जिनमें प्रमुख हैं-मिर्जापुरी (मिर्जापुर में प्रयुक्त अवल), बनौधी (पश्चिमी जौनपुर), बैसवाड़ी (उन्नाव एवं रायबरेली के बीच के क्षेत्र की बोली), गंगापारी, पूर्वी, उत्तरी, जोलहा, गहोरा, जूडर आदि।

अवधी बोली का क्षेत्र- उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, गोंडा, बहराइच, लखनऊ, उन्नाव, बस्ती, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई का कुछ भाग, अयोध्या, फैजाबाद, सुलतानपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़, बाराबंकी, कानपुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर का कुछ भाग तथा जौनपुर ( कुछ भाग ) जिलों में फैला हुआ है।

अवधी बोली की विशेषताएँ-अवधी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1 अवधी में ‘ए’, ‘ओ’ के इस्व और दोघं दोनों रूप तथा स. श, ष स्थान पर ‘स’ का प्रयोग।

2 अवधी बोली में ‘ऐ’ का उच्चारण ‘अइ’ और ‘औं’ का उच्चारण ‘अ’ रूप में होता है, जैसे, ‘ऐसा’ की जगह ‘अइसा’,’औरत’ की जगह ‘अउरत’।

3 अवधी भाषा के कुछ ध्वनि परिवर्तन निम्नलिखित हैं।

4 बघेली- बघेली बघेले राजपूतों की वजह से रीवा और आसपास का क्षेत्र बघेलखण्ड कहलाया और बघेलखण्ड की बोली बघेली कहलाई। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

बघेली और अवधी में इतनी अधिक साम्यता है कि कुछ विद्वान बघेली को अवधी की एक बोली मानते हैं। जार्ज ग्रियर्सन ने भी जनमत को ध्यान में रखकर ही बचेली को स्वतंत्र बोली स्वीकार किया था। इसकी सीमावर्ती बोलियाँ है-बुन्देली, अवधी और भोजपुरी।

बघेली बोली को पहले केथी लिपि में लिखा जाता था, परन्तु अब यह देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार बघेली बोलने बालों की संख्या लगभग 46 लाख है। लेकिन बघेली बोलने वालों की संख्या लगभग 60 लाख है।

बघेली बोली (bagheli boli) में कोई साहित्य रचना प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन लोक साहित्य पर्याप्त मिलता है। बघेली बोली के अन्य नाम रीवाई और बघेलखंडी भी हैं।

बघेली बोली की उपबोलियाँ बपेली बोली की प्रमुख उपबोलियाँ निम्नलिखित हैं-तिरहारी, बुन्देली. गहोरा, जुड़ार, बनाफरी, मरारी, पोवारी, कुम्भारी, ओझी, गोंडवानी तथा केवरी आदि।

छत्तीसगढ़ी- इसका भी विकास अर्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से हुआ है। इस बोली (Chhattisgarhi bony पर नेपाली, बंगला तथा उड़िया का प्रभाव भी पड़ा है। मुख्य रूप से नागरी लिपि में लिखी जाती है, परन्तु इसकी दो उपबोलियों, भुलिया तथा कलंगा के लिए उड़िया लिपि का प्रयोग किया जाता है।

जार्ज ग्रियर्सन ने इसके बोलने वालों की संख्या 33 लाख बताई है। 1961 की जनगणना के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 2962038 थी।

साहित्य की रचना छत्तीसगढ़ी बोली में नहीं हुई, किन्तु लोक-साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ी बोली के अन्य नाम छत्तीसगढ़ी बोली का मुख्य क्षेत्र छत्तीसगढ़ होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ी कहते हैं।

बालाघाट के लोग इसे खल्हाटी अथवा खलोटी भी कहते हैं। पूर्वी सम्भलपुर के पास इसे ‘लरिया’ नाम से जाना जाता है। कुछ भागों में इसे खल्ताही भी कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ी बोली की उपचोसिय न्तीसगली की प्रमुख उपयोक्तियां निम्नलिखिता है सुरगुजिमा, कलंगा, भुलिआ, सतनामी, कॉकरी, सदरी कोरवा, बेगानी, बिंझवाली, बिलासपुरी तथा हलबी।

इनमें से ‘हलबी’ का प्रयोग बस्तर जिले में होता है। जार्ज ग्रियर्सन इसे | मराठी की एक उपभाषा मान हैं। पुरंत सुनीति कमाउ बरी के अनुसार यह छत्तीसगृही Chhatisgarhil की एक उपबोली है।

(ङ) राजभाषा बनाम राष्ट्रभाषा

उत्तर-राजभाषा का सीधा-सदा है राजकाज अनि मान-प्रशासन संभवा सरकारी कामकाज की भाषा। संविधान सभा की स्वीकृति से 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी राजभाषा बनी।

इस प्रकार स राजभाषा एक संवैधानिक शन्न है, जिसको परिभाष इस प्रकार से दी जा सकती है-समान्य शासन-प्रशासन, न्याय-प्रक्रिया, संसद-विधान मंडल एवं सरकारी कार्यालयों में प्रयोग हेतु संविधान द्वारा स्वीकृत भाषा एवं लिपि तथा भारतीय अंकों का रूप ही राजभाषा है।

राजभाषा के ही समांतर राष्ट्रभाषा शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। राजभाषा के स्वरूप को अच्छी तरह समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि राष्ट्रभाषा क्या है? राष्ट्रभाषा का अर्थ-एक राष्ट्र में समस्त राष्ट्रीय तत्वों को व्यक्त करने वाली भाषा जो राष्ट्र में भावनात्मक एकता कायम रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हो राष्ट्रभाषा है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

भारत एक ऐसा बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है, जहां समृद्ध संस्कृति की विशाल परंपरा है, जो यहां की विभिन भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।

इस प्रकार से इस राष्ट्र में अनेक भाषाएं व्यवहित होती हैं। इनमें से प्रमुख 22 भाषाओं को राष्ट्रीय स्वीकृति मिली है तथा उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है।

इनमें हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो लिखने, पढ़ने, बोलने तथा समझने में अपेक्षाकृत सहज है तथा सभी भाषाओं के बीच संपर्क-सूत्र | का काम करती है।

प्रत्येक भारतवासी इसे समझता और थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ बोलता है। इस प्रकार हिंदी का प्रयोग अखिल भारतीय स्तर पर सर्व स्वीकृत माध्यम के रूप में हो रहा है।

हिंदी का यह राष्ट्रभाषा रूप है। राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग संविधान के अनुसार नियम बनाकर हो रहा है, इसलिए सैद्धांतिक स्तर पर राजभाषा और राष्ट्रभाषा एक ही चीज नहीं है, उनमें पर्याप्त अंतर है।

वर्तमान समय में हिंदी राष्ट्रभाषा भाषा के साथ-साथ संघ तथा ।। राज्यों की राजभाषा है।

राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

1 राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है, जबकि राष्ट्रभाषा स्वाभाविक रूप से सृजित शब्द। इस प्रकार राजभाषा प्रशासन की भाषा है तथा राष्ट्रभाषा जनता की भाषा।

2 समस्त राष्ट्रीय तत्वों की अभिव्यक्ति राष्ट्रभाषा में होती है, जबकि केवल प्रशासनिक अभिव्यक्ति राजभाषा में होती है। BHDC 108 Free Assignment In Hindi

3 राजभाषा की शब्दावली सीमित है, जबकि राष्ट्रभाषा की शब्दावली विस्तृत।

4 राजभाषा, नियमों से बंधी होती है, जबकि राष्ट्रभाषा स्वतंत्र या मुक्त प्रकृति की होती है।

5 राजभाषा में शब्दों का प्रवेश, निर्माण अभया अनुकूलन (विशेषकर तकनीकी प्रकृति के शब्दों का) विद्वानों एवं विशेषज्ञों की समिति की राम से किया जाता है, जबकि राष्ट्रभाषा में शब्द समान से आता है तभा प्रचलन के आधार पर रूड़ होकर मान्यता प्राप्त करता है इसके निर्माण में सभी का हाथ होता है।

6 राजभाषा, हिंदी भाषा का प्रयोजन मूलक रूप है इसलिए तकनीकी सृजन है। जबकि राष्ट्रभाषा, हिंदी भाषा का स्वाभाविक तथा पारंपरिक रूप है।

7 रानभाषा के प्रयोग का क्षेत्र सीमित होता है, जबकि राष्ट्रभाषा का क्षेत्र इतना व्यापक कि उसका व्यवहार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी होता है।

8 राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग उत्तरोत्तर अंग्रेजी की जगह पर हो रहा है जबकि राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग स्वाभाविक स्वरूप से देश-विदेश सर्वत्र हो रहा है।

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