2022 IGNOU BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi-Helpfirst

BEVAE 181

BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

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BEVAE 181 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 1. “सतत विकास एक आदर्श लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के लिए सभी मानव समाजों को प्रयत्नशील रहना चाहिए।” इस कथन का औचित्य 250 शब्दों में सिद्ध कीजिए

उत्तर-सतत विकास से तात्पर्य प्राकृतिक और गैर नवीकरणीय संसाधनों के उपयोस है, यह एक ही समय में उन्हें संरक्षित करते हुए मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करता है, ताकि यह भविष्य की पीढ़ियों की मांगों को भी पूरा कर सके।

ग्रह पृथ्वी पर वर्तमान और भावी पीढ़ियों को जीवित रखने में मदद करने के लिए सतत विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

प्राचीन काल से ही औद्योगिक क्रांति या हरित क्रांति जैसी कई अन्य क्रांतियां हो रही हैं, हालांकि, वर्तमान में, टिकाऊ क्रांति की आवश्यकता है, जो विनाश के कगार पर मौजूद पर्यावरण में बदलाव लाने के लिए होनी चाहिए।

सतत क्रांति हमारे पर्यावरण की रक्षा करने और मानव जाति के अस्तित्व के लिए एक बेहतर जगह बनाने का एकमात्र तरीका है।

सतत विकास का प्राथमिक उद्देश्य हमारी आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय आवश्यकताओं में स्थिरता लाना है, जो वर्तमान और आगामी पीढ़ियों के लिए संसाधनों की समृद्धि और उपलब्धता की ओर जाता है।

सतत विकास का एकमात्र उद्देश्य एक स्वस्थ वातावरण प्राप्त करना है, जहां लोग पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को संयुक्त रूप से संबोधित करते हैं और संसाधनों को अतिरेक से बचाते

सतत विकास के उद्देश्य – सतत विकास के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

(1. दुरुपयोग तथा व्यर्थ उपभोग से पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का परिरक्षण व संरक्षण हो।

(2. इस प्रकार की प्रौद्योगिकी तथा वैज्ञानिक तकनीकों की खोज की जाए, जो प्रकृति के नियमों के अनुकूल हो।

(3. अधिकांश लोगों का जीवन-स्तर, क्षमता तथा न्याय के साथ हो।

(4. विविधता का सम्मान करना तथा स्थानीय तथा देशी समुदायों को और अधिक बुनियादी रुझान वाली तथा प्रासंगिक विकास नीतियों के लिए शामिल करना।

(5. ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की योजना बनाना, जो गरीब देशों की आवश्यकताओं को मान्यता दे तथा उनकी प्राकृतिक संपदा व पर्यावरण को नुकसान पहुँचाये बिना अभिवृद्धि लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करे।

(6. शासन प्रबंध की संस्थाओं का विकेन्द्रीकरण करना तथा उन्हें अधिक लोचशील, पारदर्शी और जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

(7. विश्व के सभी राष्ट्रों में शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्त्व को बढ़ावा देना, क्योंकि शान्ति ही ऐसा माध्यम है, जो उन्हें मानवता के व्यापक हितों में नवीनता लाने में सहायता देगी।

सतत विकास प्रौद्योगिकियों के उपयोग और विकास के प्रति हमारे दृष्टिकोण को धीरे-धीरे बदलकर हमारे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का एक शानदार तरीका है।

जाहिर है, हमें जीवन की बुनियादी जरूरतों, जैसे-भोजन, ऊर्जा, पानी और रोजगार को पूरा करने के लिए संसाध नों का उपयोग करना चाहिए।

हालांकि, हमारे द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रत्येक संसाधन का उपयोग टिकाऊ तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि यह कभी भी विलुप्त न हो और इसलिए जीवित प्राणियों के विलुप्त होने का कारण न हो।

पर्यावरण संरक्षण, स्थायी आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सामाजिक विकास और विकास सहित स्थायी विकास के चार प्रमुख तरीके हैं।

इस ग्रह पर रहने वाले सभी लोगों को सभी संसाधनों का आनंद लेने और सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में रहने का अधिकार है। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इसके लिए, हमें अपने पर्यावरण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने और इस ग्रह पर स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने के लिए उन्हें कम करने में मदद करने की आवश्यकता है।

सतत विकास को प्राप्त करने के लिए प्राथमिकता के क्षेत्र निम्नलिखित हैं

(1) जनसंख्या वृद्धि को धीमा करना-यह अन्य सभी प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को संबोधित करने के लिए अनिवार्य है।BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

(2). गरीबी, असमानता और अल्पविकसित और विकासशील देशों के श्रणों को खत्म करना-इसमें स्वास्थ्य, साक्षरता और दीर्घजीविता को बढ़ाना, रोजगार के अवसर बढ़ाना इत्यादि शामिल हैं। यह प्रजातियों की विलुप्ति/ हानि को रोकने, भूमि निम्नीकरण की मात्रा को कम करने और जल प्रदूषण हटाने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

(3). कृषि को दीर्घोपयोगी बनाना-यह मृदा अपरदन को कम करने और हानिकारक कृषि प्रथाओं के उपयोग को कम करने पर बल देता है। यह जैवविविधता की हानि, भूमि निम्नीकरण और प्रदूषण कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

(4). वनों तथा अन्य पर्यावासों का संरक्षण-यह बंजरभूमियों पर पुनर्वनरोपण और वनरोपण, अन्य सजीव संसाधनों का संरक्षण, ग्रीन हाउस गैसों तथा ओजोन परत क्षणिता का नियंत्रण से संबंधित है।

वायु प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण, ऊर्जा के और खनिजों के क्षय को कम करने के लिए यह महत्त्वपूर्ण तरीका है।

(5). जल और ऊर्जा उपयोग को दीर्घोपयोगी बनाना-यह ऊर्जा सक्षमता को बेहतर बनाने, ऊर्जा संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा संसाध नों को विकसित करने पर बल देता है। यह वायु प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण, ऊर्जा और खनिजों के क्षय को कम करने में महत्त्वपूर्ण है।

(6). जल का दीर्घोपयोग संभव बनाना-इसमें जल उपयोग की सक्षमता और जल की गुणवत्ता को बेहतर बनाना सम्मिलित है। जल प्रदूषण और जल की हानि कम करने और भूमि निम्नीकरण रोकने में महत्त्वपूर्ण है।

(7). अपशिष्ट उत्पादन कम करना-यह उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाकर अपशिष्ट उपचार और पुनर्चक्रण पर बल देता है। यह वायु और जल प्रदूषण को कम करने और ऊर्जा, खनिज तथा जल की क्षीणता को कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

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प्रश्न 2. नीचे दिए गए प्रत्येक प्रश्नों में अंतर उदाहरण सहित 125 शब्दों में कीजिए

(क) आनुवंशिक और प्रजातीय विविधता

उत्तर-आनुवंशिक विविधता-एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों में जीनों के क्रम की भिन्नता के कारण जो भिन्नता होती है, उसे आनुवंशिक विविधता कहते हैं। आनुवंशिक विविधता किसी प्रजाति के प्रत्येक सदस्य में विशिष्ट लक्षण एवं विशेषताओं का समावेश करता है।

इसी कारण समान प्रजाति के अंदर कुछ प्राणी दूसरों से लम्बे होते हैं, कुछ की आंखें भूरी, तो कुछ की नीली होती हैं।

आनुवंशिक विविधता के कारण ही एक प्रजाति के जीव की अलग-अलग नस्लें होती हैं। उदाहरण के लिए, कुत्ते की अलग-अलग नस्लें आनुवंशिक विविधता का ही परिणाम हैं।

आनुवंशिक विविधता विशिष्ट जीव या सम्पूर्ण प्रजाति को बदलते पर्यावरण से अनुकूलन में सहायता करती है और पर्यावरणीय कारकों में दबाव की स्थिति में संपूर्ण प्रजाति के विलुप्त होने के खतरे को कम करती है।

प्रजातीय विविधता-प्रजातीय विविधता का आशय एक विशेष पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों की संख्या अथवा विविधता से है। अलग-अलग प्रजाति के जीवों में आनुवांशिक अनुक्रम में स्पष्ट रूप से भिन्नता होती है और उनके बीच प्रजनन नहीं होता है।

यद्यपि निकट से संबंधित प्रजातियों के आनुवांशिक गुणों में बहुत अधिक समानता होती है, जैसे-मानव और चिम्पांजी के लगभग 98.4% जीन समान BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

एक विशेष पारिस्थितिक तंत्र में प्रजाति विविधता को 0-1 के बीच मापा जाता है। 0 एक आदर्श स्थिति होती है, जो उस पारिस्थितिक तंत्र में अनंत विविधता दर्शाती है, वहीं ‘1’ दर्शाता कि उस विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्र में केवल एक प्रजाति निवास करती है।

(ख) जैव विविधता में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रतियोगिता मूल्य…..

उत्तर-प्रत्यक्ष प्रतियोगिता मूल्य प्रत्यक्ष उपभोग प्रतियोगिता) मूल्यों के संदर्भ में, आर्थिक स्थानापन्न की तुलना में पारिस्थितिक स्थानापन्नों को परिभाषित करना कहीं अधिक कठिन होता है।

उदाहरण के लिए, फर्नीचर बनाने में प्रयुक्त की जाने वाली एक उच्च कोटि की लकड़ी (जैसे टीक, शीशम आदि) अतिदोहन के कारण अनुपलब्ध हो गई हैं,तो उनके स्थान पर ऐसी लकड़ी का प्रयोग किया जाने लगता है,

जो सुलभ है, टिकाऊ है, परन्तु टीक अथवा शीशम की तुलना में उसके आर्थिक मूल्य तुलनात्मक दृष्टि से निश्चित रूप से कम ही है। इसका तात्पर्य यह है कि इस उदाहरण में जाति विविधता का प्रत्यक्ष मूल्य कम है, यद्यपि उसका पारिस्थितिक मूल्य अधिक है।

इसके विपरीत यदि पसंदीदा लकड़ी का विस्थापन उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, जो लम्बी दूरी की यात्रा कर उसे एकत्र करते हैं, तो उसका आर्थिक मूल्य भी अधिक होगा तथा जाति विविधता का प्रत्यक्ष मूल्य भी अधिक हो जाएगा।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

अप्रत्यक्ष प्रतियोगिता मूल्य-जैव विविधता के परोक्ष उपभोग (प्रतियोगिता) मूल्यों में भी आर्थिक अथवा पारिस्थितिक स्थानापन्न सम्मिलित हो सकते हैं

अर्थात् विविध एवं मूल्यांकित पर्यावरणीय संसाधनों में होने वाली गिरावट के कारण उपलब्ध लाभों को उसके स्थानापन्न की उपयोगिता एवं उपलब्धता के समकक्ष रखकर तुलना करनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, जल आच्छादित दलदली भूमि (wetland) का मूल्य अधिक हो सकता है, क्योंकि उसके पारिस्थितिक स्थानापन्न की उपलब्धता तुलनात्मक दृष्टि से अत्यधिक है।

1 गैर खपत मूल्य-यह समाज कल्याण में योगदान के साथ पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा प्रकृति की सेवाओं से अधिक संबंधित है, जिनके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं होगा।

2 सौंदर्य मूल्य-जैव विविधता के सौंदर्य पक्ष का अर्थ है- पेड़-पौधों की देखभाल और सुरक्षा करना एवं राष्ट्रीय पार्क, वनस्पति तथा जंतु उद्यान, जलजीवशाला आदि स्थाओं पर विविध प्रजातियों को देखने जाना।

3 सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य-मानव समाज की जैव विविधता का सांस्कृतिक मूल्य का आमतौर पर जीवन के रूपों के लिए आदर या जैव विविधता के घटकों के प्रतीक के रूप में वर्णन किया जाता है,

जैसे—भारत एवं अन्य कुछ देशों में बाघ, शेर, छिपकली, कछुए, मछली, मेंढक, बिल्ली, घोड़ा, गाय आदि अनेक धार्मिक तथा आध्यात्मिक मान्यताओं के प्रतीक हैं।

4 नैतिक मूल्य-जैव विविधता के नैतिक मूल्य का अभिप्राय है कि प्रत्येक प्रजाति अपने आप में विशिष्ट है और मानव हस्तक्षेप के बिना विकास की प्रक्रिया का परिणाम है, अतः प्रत्येक प्रजाति को अपना अस्तित्व का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

5 गैर-उपयोगिता मूल्य-ये उन वस्तुओं/जीवों/इकाइयों के लिए मूल्य हैं, जिन्हें हम उपयोग नहीं करते, किंतु इनके अनुपस्थित हो जाने पर इन्हें खोया हुआ मानते हैं। इनमें संभावित या वैकल्पिक मूल्य, पारंपरिक मूल्य और अस्तित्व बनाए रखने के मूल्य शामिल हैं BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

(i) वैकल्पिक उपयोग के मूल्य-वैकल्पिक मूल्य भावी संभावित उपयोग से जुड़े होते हैं अर्थात व्यक्ति को इस आशा के साथ जैव विविधता का संरक्षण करना चाहिए कि इसे भविष्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक आनुवंशिक सामग्री के स्रोत के रूप में, औषधि उपयोग, फसल संवर्धन आदि के लिए उपयोग किया जा सके।

(ii) अस्तित्व मूल्य-ये मूल्य जैविक विविधता के घटकों के लिए गैर-उपयोग अस्तित्व मूल्य भी हो सकते हैं अर्थात जैव विविधता के निरंतर अस्तित्व को बनाए रखने वाले मूल्य।

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प्रश्न 3. नीचे दिए गए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 150 शब्दों में लिखिए।

(क) जैव विविधता हॉटस्पाट क्या है? भारत को जैव विविधता वाला देश क्यों माना जाता है।

उत्तर-जैव विविधता से तात्पर्य विस्तृत रूप से उन विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं और वनस्पति से है, जो संसार में या किसी विशेष क्षेत्र में एक साथ रहते हैं। एक जैव विविधता वाला हॉटस्पॉट ऐसा जैविक भौगोलिक क्षेत्र है, जिसे मनुष्यों से खतरा रहता है।

जैव विविधता हॉटस्पॉट (आकर्षण के केन्द्र) की अवधारणा 1988 में नॉर्मन मायर्स द्वारा विकसित की गई थी, जब वे उष्णकटिबंधीय जंगल पर शोध करते हुए पाया कि पौधों की प्रजातियों के साथ-साथ उनके आवास भी विलुप्ति की ओर जा रहे हैं। हॉटस्पॉट (आकर्षण के केन्द्र) को निर्धारित करने के मानदंड निम्नलिखित हैं

  1. इसमें कम-से-कम 1500 संवहनी पौधे होने चाहिए, जो उस क्षेत्र के अलावा कहीं नहीं पाए जाते हो। दूसरे शब्दों में, हॉटस्पॉट (आकर्षण के केन्द्र) अपरिवर्तनीय हैं।
  2. ऐसा क्षेत्र, जिनका 70% से अधिक मूल पर्यावास नष्ट हो चुका हो और 30% मूल प्राकृतिक वनस्पति विलुप्ति के कगार पर हो।

जैव विविधता पृथ्वी के भौगोलिक क्षेत्रों में समान रूप से वितरित नहीं है। विश्व के कुछ क्षेत्र भी जैवविविधिता के मामले में अत्यधिक समृद्ध हैं। ऐसे क्षेत्रों को हम मेगा डाइवर्सिटी क्षेत्र (Mega diversity region) या हाटस्पॉट (Hot spot) कहते हैं।BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

भारत जैव विविधता समृद्ध देश है। विश्व का 2.4 प्रतिशत क्षेत्रफल होने के बावजूद यह विश्व की 7-8 प्रतिशत सभी दर्ज प्रजातियों (जिनमें 45,000 पादप प्रजातियां एवं 91,000 जंतु प्रजातियां) का पर्यावास स्थल है। विश्व के 34 जैव विविधता हॉट स्पॉट में से चार भारत में हैं।

इसी प्रकार विश्व के 17 मेगा-डायवर्सिटी देशों में भारत शामिल है। इस प्रकार जैव विविधता न केवल इकोसिस्टम कार्यतंत्र के आधार का निर्माण करती है, वरन् यह देश में आजीविका को भी आधार प्रदान करता है।

ऐसे में भारत में जैव विविधता का संरक्षण अपरिहार्य हो जाता है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए कई उपाय किए गए हैं, जैसे-103 राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना, 510 वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना, 50 टाइगर रिजर्व, 18 बायोस्फीयर रिजर्व, 3 कंजर्वेशन रिजर्व तथा दो सामुदायिक रिजर्व की स्थापना।

जैव विविधता के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कार्रवाई योजना (एनबीएपी) तैयार की गई है, जो कि वैश्विक जैव विविधता रणनीतिक योजना 2011-20 के अनुकूल है, जिसे 2010 में कंवेंशन ऑन बायोलॉजिक डाइवर्सिटी की बैठक में स्वीकार किया गया।

भारत में जैव विविधता व संबंधित ज्ञान के संरक्षण के लिए वर्ष 2002 में जैव विविधता एक्ट तैयार किया गया। इस एक्ट के क्रियान्वयन के लिए त्रिस्तरीय संस्थागत ढांचे का गठन किया गया है।

एक्ट की धारा 8 के तहत सर्वोच्च स्तर पर वर्ष 2003 में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय चेन्नई में है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

यह एक वैधानिक निकाय है जिसकी मुख्य भूमिका विनियामक व परामर्श प्रकार की है। राज्यों में राज्य जैव विविधता प्राधिकरण की भी स्थापना की गई है। स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंध समितियों (बीएमसी) का गठन किया गया है।

एनबीए के डेटा के अनुसार देश के 26 राज्यों ने राज्य जैव विविधता प्राधिकरण एवं जैव विविधता प्रबंध समितियों का गठन किया है। BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

जहां वर्ष 2016 में बीएमसी की संख्या 41,180 थी जो वर्ष 2018 में बढ़कर 74,575 हो गईं। अकेले महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश में ही 43,743 बीएमसी का गठन किया गया है।

इन संस्थागत ढांचों का उद्देश्य देश की जैव विविधता एवं संबंधित ज्ञान का संरक्षण, इसके सतत उपयोग में मदद करना तथा यह सुनिश्चित करना कि जैविक संसाधनों के उपयोग से जनित लाभों को उन सबसे उचित व समान रूप से साझा किये जाएं जो इसके संरक्षण, उपयोग एवं प्रबंधन संलग्न है।

(ख) जलीय पारितंत्रों में पाये जाने वाले विभिन्न जीवों के स्तर को उदाहरण और चित्र सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर-किसी जलीय वस्तु (जैसे तालाब, नदी, समुद्र) के पारितंत्र (ecosystem) को जलीय पारितंत्र (Aquatic ecosystem) कहते हैं। जलीय पारितन्त्र के अन्तर्गत के सभी जीव जन्तु (organisms) आ जाते हैं,

जो उस पर्यावरण पर निर्भर होते हैं या एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। जलीय इकाइयों में विविध प्रकार की वनस्पति व जन्तु पाए जाते है। जलीय तंत्र में विशिष्ट क्षेत्र हैं, जिनमें विविध व विशिष्ट प्रकार के जन्तु, पौधे व सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

पादप व जन्तु जगत में यह विविधीकरण प्रमुखतः तापमान, लवणता, थर्मोक्लाइन, प्रकाशित मंडल, फोटिकजोन जल में प्रकाश का प्रवेशन, घुले हुए पोषक तत्व, कीचड़, रेत और अजैविक पदार्थों की उपस्थिति के कारण होता है। प्रकाश, तापमान, ऑक्सीजन जैसे कारक जलीय पारितंत्र की प्रकृति को प्रभावित करते हैं।

जलीय पारितंत्रों को तीन श्रेणियों में रखा गया है

(1. अलवण जल पारितंत्र-झील, अनूप (swamps) कुंड (pools), सरिताएं (streams) और नदिया।
(2. समुद्री पारितंत्र-उथले और खुले महासागर
(3. खारा जल पारितंत्र-ज्वारनदमुख, लवणकच्छ (marshes) मैंग्रोव अनूप (mangrove swamps) और वन।

(ग) सतह आर भूजल क बाच अतर समझाइए। जल क निम्नाकरण क विभिन्न कारका का स्पष्ट काजिए।

उत्तर-सतह जल
• सतही जल-यह एक नदी, झील या अन्य सतह गुहाओं में पाया जाने वाला जल है।
• सतह का पानी आमतौर पर खनिज सामग्री में बहुत अधिक नहीं होता है।
• इसकी कम खनिज सामग्री के कारण सतही जल को शीतल जल कहा जाता है।

भूजल
• भूजल पानी या मिटटी या चटान की उपसतह दवारा निहित हैं
• भूजल में आमतौर पर सतह के पानी को तुलना में कम संदूषण होता है क्योंकि चट्टान कुछ दूषित पदार्थों को हटाने के लिए ek filter ke roop में कार्य करती है

अधिकांश जल संसाधन जैव और रासायनिक प्रदूषकों से दूषित हैं। बढ़ते औद्योगीकरण और निर्माण गतिविधियों, बदलती जलवायु परिस्थितियां भी भारत में पानी की कमी का कारण हैं। जलस्रोतों का निम्नीकरण और उनका संदूषण आज एक गंभीर समस्या है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

सघन कृषि, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनोरोपण के कारण अधिकांश जल निकाय, जैसे-नदियां, झीलें, महासागर, नदमुख और भूजल निकाय गंभीर प्रदूषण का सामना कर रहे हैं।

मृदा अपरदन के कारण नदियों और झीलों में सिल्ट/गाद का जमाव उनकी जलधारण क्षमता को निरंतर कम करता जा रहा है, जिससे वर्ष दर वर्ष भयंकर बाढ़ आती है।

सुरक्षित पेयजल की कमी की स्थिति का सामना औसत से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों और उन क्षेत्रों में भी कर रहे हैं जहां प्रचुर जल निकाय हैं।

जल निकायों में वाहित मल और औद्योगिक वहि:स्त्रावों के विसर्जन से जल प्रदूषित होने के साथ जलीय पादपों और शैवाल प्रफुल्लनों (algalblooms) की वृद्धि भी बढ़ा देता है, जिससे अंततः जलनिकाय लुप्त हो जाते हैं। यह जलीय जीवों जैसे मछलियों का अपक्षय और विनाश भी करता है।

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(घ)

उत्तर

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नाइट्रोजन वायुमंडल में सबसे प्रचुर मात्रा में है और, डीएनए जैसे प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिद्ध के निर्माण खंड के रूप में, सभी जैविक जीवन का एक महत्वपूर्ण घटक है।

नाइट्रोजन चक्र-एक जटिल जैव-रासायनिर्क चक्र हसिम नाइट्रोजन को अपने निष्क्रिय एटमोस्फियस्कि मालिक्यूलर फॉर्म (N2)से एक रूप में परिवर्तित किया जाता है जो जैविक प्रक्रिया में उपयोगी होता है।

एक पारिस्थितिकीय परिप्रेक्ष्य से नाइट्रोजन चक्र में निम्न चरणों का समावेश होता है

  1. नाइट्रोजन फिक्सेशन (Nitrogen fixation in hindi)-वायुमंडलीय नाइट्रोजन मुख्य रूप से एक निष्क्रिय रूप (N2) में होता है जो कुछ जीवों द्वारा ही उपयोग किया जा सकता हैं; इसलिए इसे नाइट्रोजन निर्धारण नामक प्रक्रिया में आर्गेनिक-या निश्चित रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए।

अधिकांश वायुमंडलीय नाइट्रोजन जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से ‘निश्चित’ है। सबसे पहले, नाइट्रोजन वातावरण से मिट्टी और सतह के पानी में जमा किया जाता है, BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

मुख्य रूप से वर्षा के माध्यम से एक बार मिट्टी और सतह के पानी में, नाइट्रोजन परिवर्तनों के एक सेट से गुजरता है- इसके दो नाइट्रोजन परमाणु अलग होते हैं और हाइड्रोजन के साथ अमोनिया बनाने के लिए गठबंधन करते हैं।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

यह सूक्ष्मजीवों द्वारा किया जाता है जो तीन व्यापक श्रेणियों में आते हैं: बैक्टीरिया जो कुछ पौधों के साथ सिम्बायोटिक संबंधों में रहते | हैं, मुक्त एनारोबिक बैक्टीरिया और एलगी।

अल्फल्फा और बीन्स जैसी फसलों को अक्सर मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी को ठीक करने के लिए लगाया जाता है और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया अन्य यौगिकों में संयोजन के लिए वायुमंडलीय नाइट्रोजन अणुओं को अलग-अलग परमाणुओं में विभाजित करने के लिए नाइट्रोजेनेस के रूप में जाना जाने वाला एंजाइम लगाते हैं।

उच्च ऊर्जा निर्धारण की प्रक्रिया के माध्यम से नाइट्रोजन की एक छोटी मात्रा ‘निश्चित’ होती है जो मुख्य रूप से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया और नाइट्रेट्स में परिवर्तित करने वाली रोशनी स्ट्राइक के रूप में होती है।

नाइट्रोजन को मानव निर्मित प्रक्रियाओं के माध्यम से भी तय किया जा सकता है, मुख्य रूप से औद्योगिक प्रक्रियाएं जो अमोनिया और नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक बनाती हैं।

(2. नाइट्रीफिकेशन-कुछ पौधों द्वारा अमोनिया का उपयोग किया जा सकता है, पौधों द्वारा उठाए गए अधिकांश नाइट्रोजन को अमोनिय से जीवाणुओं द्वारा परिवर्तित किया जाता है न जो नाइट्राइट में और फिर नाइट्रेट में कई जीवों के लिए अत्यधिक जहरीला होता है।

इस प्रक्रिया को नाइट्रिफिकेशन कहा जाता है, और इन बैक्टीरिया को नाइट्रीफाइंग बैक्टीरिया के रूप में जाना जाता है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

(3. एस्सिमिलेशन-विभिन्न रूपों में नाइट्रोजन यौगिक, जैसे कि नाइट्रेट, नाइट्राइट, अमोनिया और अमोनियम पौधों द्वारा मिट्टी से उठाए जाते हैं जिन्हें तब पौधे और पशु प्रोटीन के गठन में उपयोग किया जाता है।

(4. अमोनीफिकेशन-जब पौधे और जानवर मर जाते हैं, या जब जानवर अपशिष्ट को उत्सर्जित करते हैं, ऑर्गेनिक पदार्थ में नाइट्रोजन मिट्टी में फिर से रिएंटर करता है जहां इसे अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा तोड़ दिया जाता है, जिन्हें हमारे द्वारा डिकंपोजर्स कहा जाता है। BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

यह डिकॉम्पोजिशन अमोनिया उत्पन्न करता है जो तब अन्य जैविक प्रक्रियाओं के लिए उपलब्ध होता है।

(5. डीनाइट्रीफिकेशन-नाइट्रोजन वाष्पीकरण नामक प्रक्रिया के माध्यम से वायुमंडल में वापस आ जाता है, जिसमें नाइट्रेट को गैसीय नाइट्रोजन में परिवर्तित कर दिया जाता है।

डीनाईटिफिकेशन मुख्य रूप से गीली मिट्टी में होता है जहां पानी सूक्ष्मजीवों को ऑक्सीजन प्राप्त करना मुश्किल बनाता है।

इन परिस्थितियों में कुछ जीवों को – डीनाइट्रिफाइंग बैक्टीरिया के रूप में जाना जाता है। जो एक नाइट्रोजन गैस को उपज के रूप में छोड़कर, ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए नाइट्रेट को संसाधित करते हैं।

प्रश्न 4. केन्द्रीय भागीदारी वन प्रबंधकों की आवश्यकता क्यों होती हैं? किस तरह वन अधिकार अधिनियम 2006, जनजातीय और वनवासियों की सहायता करता है। उपयुक्त उदाहरण सहित 200 शब्दों में वर्णन कीजिए

उत्तर-आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वनवासियों को उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने और जंगल पर उनके अधि कारों को मान्यता देने के लिए संसद ने दिसम्बर, 2006 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून पास कर दिया था और एक लम्बी अवधि के बाद अंतत: केन्द्र सरकार ने इसे 1 जनवरी 2008 को नोटिफाई करके जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू कर दिया।

वनाधिकार कानून 2006 के अनुसार 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सभी समुदायों को वनों में रहने और आजीविका का अधिकार मिला है,

पर दूसरी ओर कानून की धारा 2(ण) के अनुसार अन्य परम्परागत वन निवासी को अधिकार के लिए (उक्त अवधि से पहले वन क्षेत्र में काबिज रहे हो) तीन पीढ़ियों (एक पीढ़ी के लिए 25 साल) से वहां रहने का साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद होगा। इसका साक्ष्य प्रस्तुत करना इन समुदायों के लिए मुश्किल भरा होगा।

जैसे यदि झाबुआ में भील अनुसूचित जनजाति है, तो उसे 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज होने की दशा में वन भूमि पर अधिकार मिलेगा, पर यदि वही भील दूसरे जिले में हो, जहां पर वह अनुसूचित नहीं है,

तो उसे अन्य परम्परागत वन निवासी के रूप में दावा पेश करना पड़ेगा यानी एक ओर उसी समुदाय का व्यक्ति कानून से लाभान्वित होगा और दूसरी ओर उसे लाभ मिल पाने की सम्भावना कम होगी।

वनाधिकार कानून 2006 में धारा 2 (छ) में ग्राम सभा की दी गई परिभाषा के तहत पाड़ा, टोला और अन्य परम्परागत ग्राम सभाओं को मान्यता दी गयी है। पर नियम की धारा 3 (1) में इसे स्पष्ट नहीं किया गया है, इसमें कहा गया है कि ग्राम पंचायत द्वारा ग्राम सभाओं का संयोजन किया जाएगा।

कानून की धारा 5 (1) में वन अधिकारों के धारकों के कर्तव्य बताए गए हैं, नियम की धारा 6 (1) में भी यही बात कही गई है पर कानून की धारा 3 (1) (झ) में धारकों को यह अधिकार दिए गए हैं कि उन्हें ऐसे किसी सामुदायिक वन संसाधन का संरक्षण, पुनरुजीवित या संरक्षित या प्रबंध करने का अधिकार है,

जिसका वे सतत् उपयोग के लिए परम्परागत रूप से संरक्षा और संरक्षण कर रहे हैं।

नियमों में ठेकेदार, व्यापारी एवं भू-माफिया को जंगल अधिकारों से रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।आदिवासियों के लिए जाति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने का प्रावधान है, तो अन्य जातियों के लिए ऐसे प्रावधान नहीं रखे गए हैं।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

नियमों के तहत वनों पर अधिकार के लिए वन अधिकार समिति द्वारा दावों का सत्यापन करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसमें साक्ष्यों की प्रस्तुति के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाने की बात की गई है, वह बेहद जटिल है।

अधिकांश वनवासी जनजाति के लिए दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करना दुरूह कार्य है।

कानून में एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान यह है कि धारा 3 (2) के तहत वनग्रामों के विकास के लिए यानी विद्यालय, अस्पताल, आंगनबाड़ी, राशन दुकान, पेयजल, सड़क, सामुदायिक केन्द्र आदि के लिए वन भूमि के परिवर्तन का उपबंध किया जाएगा, जिसके तहत प्रति हेक्टेयर 8 तक पेड़ों को गिराया जा सकता है।

निश्चय ही इस प्रावधान से वन पर आश्रित समुदाय के विकास के लिए नए रास्ते खुलेंगे। लगभग डेढ़-दो सौ सालों से यह कहा जा रहा है कि देश में जंगल और वन्य जीवों के खात्मे के लिए जंगल में रहने वाले, खासतौर से आदिवासी समुदाय जिम्मेदार है।

यही वजह है कि देश में अंग्रेजों के समय से ही जंगल और वन्यजीवों को बचाने के उद्देश्य से जो कानून बनाए गए, उनमें जंगलवासियों के लिए कोई स्थान नहीं बचा।

इसके बाद कभी जगल और वन्य जीवों को बचाने के नाम पर, तो कभी विकास के नाम पर उन्हें जंगल से उजाड़ने का सिलसिला शुरू हो गया।

लेकिन ऐतिहासिक रूप से जारी इस अन्याय को जंगलवासी लम्बे समय तक सहने को इच्छुक नहीं हुए और अपने अधिकारों के लिए गोलबंद होकर आवाज उठाने लगे।

यह साफ दिखाई देने लगा कि जंगल और वन्य जीवों को जंगल पर परम्परागत रूप से आश्रित लोगों से खतरा नहीं है, बल्कि वन माफियाओं से खतरा है।

जंगलों का दोहन और वन्य पशुओं का शिकार सबसे ज्यादा पिछली सदी में ही हुआ है और इनके संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों का कोई लाभ भी दिखाई नहीं पड़ा।

दूसरी ओर जंगलों से बेदखल होते समुदाय अपने जीवन और अस्मिता के संघर्ष से जूझते हुए अपने अधिकारों की मांग करते रहे। अंततः सरकार को भी इस बात का अहसास हुआ कि जंगल पर आश्रित समुदाय के साथ वास्तव में अन्याय हुआ है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इस कानून के पारित हो जाने के बावजूद इसको लागू करने में कई अड़चनें आईं। इसे लेकर कई संगठनों एवं वन्य जीव संरक्षकों ने विरोध जताया। उनका साफ कहना था कि कानून बन जाने से वन्य जीवों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

लेकिन दूसरी ओर यह देखा गया है कि जबसे जंगल के आश्रितों को जंगल से खदेड़ा गया है, तबसे कई दुर्लभ जानवरों के अस्तित्व पर संकट गहराया है। इसके बावजूद जंगल के आश्रितों को ही दोषी माने जाने की परम्परा चलती रही है।

आदिवासियों के हितों के लिए संघर्षरत संगठनों का कहना है कि जहां-जहां आदिवासी जंगलों में बसे हुए हैं, वहां-वहां जंगल बचे हुए हैं। उनका कहना है कि वन माफिया उन्हीं इलाकों में सक्रिय हैं, जहां से लोग विस्थापित हो गए हैं।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

जब अंतर साफ नजर आने लगा, तो सरकार के लिए यह कहना कठिन हो गया कि वन आश्रितों के कारण वनों को नुकसान हो रहा है।

वन आश्रितों की संस्कृति में पेड़-पौधे एवं वन्य जीव रचे-बसे हुए हैं, इसलिए उन्हें प्रकृति प्रेमी और जंगल के वास्तविक अधिकारी माना जाना चाहिए।

प्रश्न 5. भारत में अ-प्रदूषणकारी ऊर्जा तंत्रों के विकास का आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। इस प्रश्न का उत्तर उदाहरण सहित 200 शब्दों में कीजिए।

उत्तर-भावी ऊर्जा आवश्यकताएं और संरक्षण-ऊर्जा का उत्पादन व्यावसायिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, जलविद्युत/हाइड्रोइलैक्ट्रिक) और गैर-व्यावसायिक स्रोतों (गोबर, जलाने की लकड़ी और कृषि अपशिष्ट) से होता है ।

व्यावसायिक ऊर्जा के प्रतिव्यक्ति उपभोग क उपयोग कभी-कभी किसी देश द्वारा अर्जित आर्थिक विकास के सूचक के रूप में भी किया जाता है।BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

भारत का प्रति व्यक्ति व्यावसायिक ऊर्जा उपभोग विश्व औसत का सिर्फ 1/8 है। व्यावसायिक ऊर्जा देश में उपयोग की जाने वाली कुल ऊर्जा के आधे से थोड़ा अधिक है , शेष गैर व्यावसायिक क्षेत्र से आता है। व्यावसायिक ऊर्जा में उपभोग से कृषि का भाग पिछले ढाई दशक में तेजी से बढ़ा है।

संरक्षण और ऊर्जा : ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण, मनुष्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की परस्पर क्रिया से उठने वाले दो मुद्दे हैं।

कोयला और तेल का विद्युत् उत्पादन में अत्यधिक उपयोग ने अम्ल वर्षा, और वायुमंडल में कार्बन-डाई-ऑक्साइड के बढ़ते स्तर जैसी अनेक समस्याएं उत्पन्न की हैं।

विशाल बांध भारत जैसे बिजली की कमी वाले विकासशील देशों में आर्थिक विकास में काफी योगदान दे सकते हैं किंत ज वनों, खेतों और वन्यजीव आवासों को जलमग्न कर देते हैं और स्थानीय जनों के समूचे समुदायों को विस्थापित कर देते हैं।

अतः भारत सरकार द्वारा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को विकसित करने के लिए उसी प्रकार की सहायता और संसाधन प्रदान करने की पहल की गई है।

अ-प्रदूषणकारी ऊर्जा तंत्रों का विकास

(i) चूल्हा में सुधार-भारत जैसे वकासशील देशों में गरीब ग्रामीण लोग ऊर्जा को आवश्यकता अधिकतर ईंधन की लकड़ी जलाकर पूरी करते हैं। खाना पकाने के पारंपरिक तरीके अस्वास्थ्यकर होते हैं। भारतीय ऊर्जा विज्ञानियों ने धुआंरहित चूल्हे बनाए हैं। इनसे ईंधन की बचत भी होती है।

(ii) शहरी वाहित मल (सीवेज) से ऊर्जा-शहरी वाहित मल (सीवेज) उपचार संयंत्र मानव मल/मूत्र से मीथेन गैस के निष्कर्षण के लिए जो आपंक (sludge) के रूप में होता है,

अवायुजीवी पाचन इकाईयों का उपयोग करते हैं। आपंक से उत्पादित होने वाली गैस आपंक गैस कहलाती है, जिसमें बायोगैस की भांति बड़ी मात्रा में मीथेन होती है।

भारत में डिस्टिलरी (शराब कारखानों) से सहउत्पाद रूप में अनेक जैवकार्बनिक अपशिष्ट निकलते हैं। देश में पहली बार गुजरात की एक डिस्टिलरी द्वारा अपशिष्ट पुनर्चक्रण और निस्तारण के लिए एक नई तकनीक विकसित की गई है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

(iii) सौर ऊर्जा-ग्रामीण निर्धनजन की मांगों को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा के दोहन के क्रमबद्ध प्रयास किए जा रहे हैं।

सौर ऊर्जा से खाना पकाना, पानी गर्म करना, पानी का विलवणीकरण, स्थान को गर्म करना, फसल को सुखाना आदि तापीय रूपांतरण के कुछ तरीके हैं।

उच्च तापमान उपयोगों के लिए सस्ते सौर संग्राहक विकसित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।

देश में 380 से अधिक सौर ऊर्जा चालित पानी गर्म करने के संयंत्र प्रचालन में हैं। 1000 से अधिक बड़ी क्षमता वाले जल तापन तंत्रों का संस्थापन होने वाला है। सौर ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में भी परिवर्तित किया जा सकता है।

(iv) पवन ऊर्जा-पवन ऊर्जा क्रमबद्ध उपयोग के लिए विश्वसनीय है। अधिकतम दोहन क्षमता का आंकलन लगभग 3.2×10 जूल/वर्ष का है।

इसे यांत्रिक और वैद्युत ऊर्जाओं में परिवर्तित किया जा सकता है और यह विशेषरूप से सुदूर क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है।

वर्तमान में इस ऊर्जा का उपयोग अजमेर, राजस्थान में चार स्थानों पर भूजल को पंप करने के लिए किया जा रहा है। DNES ने देशभर में 924 पवन ऊर्जा चालित (विंड) पंप लगाए हैं।

उपयुक्त स्थानों (जैसे लद्दाख) पर पवन ऊर्जा जेनरेटरों का विचार किया जा रहा है, जिनकी कुल क्षमता 2MW (मैगावाट) होगी, जो प्रकाश व्यवस्था और पानी को पंप करने के लिए बैटरियों को चार्ज करने की युक्तियों में भी काम करेंगे।

खंड – ख

प्रश्न 6. नीचे दिए गए प्रत्येक को 60 शब्दों में वर्णन कीजिए।

(क) पर्यावरणीय न्याय

उत्तर-पर्यावरण न्याय एक ऐसा लक्ष्य है जिसके मूल, जाति, वर्ग और राष्ट्रीयता की परवाह किए बिना पर्यावरण कानूनों, नियमों और नीतियों के कार्यान्वयन और विकास में सभी समुदायों के सभी लोगों के लिए उचित और उचित उपचार की आवश्यकता है।

पर्यावरणीय न्याय का लक्ष्य तब प्राप्त होता है, जब सभी को पर्यावरण के खतरों के प्रदूषण के खिलाफ एक ही तरह की सुरक्षा प्राप्त होती है और प्रत्येक व्यक्ति की निर्णय लेने में भूमिका होती है जो कि पर्यावरण की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

एक समुदाय का स्वास्थ्य तब पीड़ित होता है जब लोगों के पास स्वस्थ घर, भोजन, परिवहन, ताजी हवा, आदि तक पहुंच नहीं होती है. पर्यावरणीय न्याय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक मानव अधिकार है और इस दुनिया में हर कोई स्वस्थ जीवन जीने का हकदार है।

दूसरे शब्दों में, पर्यावरणीय न्याय पर्यावरणीय इक्विटी की ओर की जाने वाली कार्रवाई है, जो कंपनियों, उद्योगों, एजेंसियों, कारखानों के कार्यों का साक्षात्कार करती है, ताकि पर्यावरण की रक्षा के लिए उनके द्वारा उठाए गए उपायों और प्रदूषणों का उत्सर्जन हो सके।

यह उन समुदायों की सुरक्षा के लिए मानक और कानून स्थापित करने की प्रक्रिया भी है जो अपने आस-पास के इलाके में जहरीले कचरे और प्रदूषकों के डंपिंग के कारण जोखिम में हैं।

यह उन संगठनों को भी अनुदान प्रदान करता है जो इन समुदायों को जोखिम से बचाने का कार्य करते हैं।

(ख) एजेंडा 21

उत्तर-एजेंडा 21 संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार की गई एक कार्य-योजना है और 1992 में रियो डी जनेरियो (ब्राजील) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण और विकास सम्मेलन में 178 देशों की सरकारों द्वारा हस्ताक्षरित है।

इसका लक्ष्य-“क्योंकि हम बहुत अधिक हैं और इस ग्रह को बचाने” के रूप में अभिजात वर्ग के विचार के अनुसार आबादी घटाने के लिए दुनिया भर में सरकारों द्वारा लागू किया जाना है।

एजेंडा 21 सतत विकास के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की एक गैर-बाध्यकारी कार्रवाई योजना है। यह 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन (पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) का एक उत्पाद है। यह संयुक्त राष्ट्र, अन्य बहुपक्षीय

संगठनों और दुनिया भर में व्यक्तिगत सरकारों के लिए एक कार्यसूची है जिसे निष्पादित किया जा सकता है-स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तरों पर एजेंडा 21 में “21” 21 वीं सदी के मूल लक्ष्य को संदर्भित करता है,

जहां वे तब तक अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे थे। इसकी पुष्टि की गई है और संयुक्त राष्ट्र के बाद के सम्मेलनों में कुछ संशोधन किए गए थे।

चूंकि यह पाया गया कि 2000 एक अत्यधिक आशावादी तारीख थी, इसलिए इसकी नई समयावधि 2030 को लक्षित कर रही है। इसका उद्देश्य वैश्विक सतत विकास को प्राप्त करना है।

एजेंडा 21 पहल का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि प्रत्येक स्थानीय सरकार को अपना स्वयं का स्थानीय एजेंडा 21 आकर्षित करना चाहिए। 2015 क बाद से, सतत विकास लक्ष्यों को नए एजेंडा 2030 में शामिल किया गया है।

(ग) हरितगृह प्रभाव

उत्तर-धरती के बढ़ते तापमान के मद्देनजर विज्ञानियों ने जिन ग्रीन हाउस प्रभाव की परिभाषा दी है, दरअसल वह एक उपयोगी प्रक्रिया है। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इस प्रक्रिया के तहत सूर्य से आने वाली प्रकाश की किरणों की अतिरिक्त ऊष्मा को पृथ्वी का वायुमंडल अवशोषित कर लेता है और उसके गर्म हुई पृथ्वी की सतह और पौधों से उत्पन्न हुई इन्फ्रारेड प्रकीर्णन की ऊष्मा को दोबारा बाहर के वातावरण यानी अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है।

इस प्रक्रिया के चलते ही धरती के वायुमंडल में सहन करने योग्य जीवनदायी गर्माहट बनी हुई है।

यह ग्रीन हाउस प्रभाव का ही परिणाम है कि पृथ्वी का औसत तापमान 15 से 17 डिग्री सेल्सियस बना हुआ है और वह 33 डिग्री कम होकर शून्य से भी 15 और 17 डिग्री सेल्सियस नीचे नहीं पहुंचा है तथा शीत युग की वापसी नहीं हुई है,

लेकिन दूसरी ग्रीन हाउस गैसों यानी कार्बन-ऑक्साइड, मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ता स्तर तापमान में अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर रहा है।

केवल औद्योगिक गतिविधियों से ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के अनेक क्रियाकलापों से भी कार्बन-डाई-ऑक्साइड की अतिशय मात्रा वायुमंडल में पहुंच रही है।

उदाहरणस्वरूप बिजली पैदा करने वाले ताप बिजलीघरों में कोयले के जलने और वाहनों में पेट्रोलियम पदार्थों के प्रयोग तहत आज तकरीबन 4 अरब टन जीवाश्म ईंधन जलाया जा रहा है और इसमें हर साल 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है।

इसी तरह धान के खेतों और कार्बनिक पदार्थों के सड़ने से मीथेन गैस की जो मात्रा वायुमंडल में पहुंच रही है, वह धरती की सेहत को गड़बड़ा रही है।

इसी तरह कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं से ‘लाफिंग गैस’ कहे जाने वाली नाइट्रस ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पृथ्वीवासियों को रुलाने का सबब बन रही है।

देखा जाए तो कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस का दोष ही नहीं है। सीएफसी यानी क्लोरो कार्बन वर्ग की गैसें भी धरती का स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार हैं।

सीएफसी वर्ग के रसायन अग्निशमन, प्रशीतन, प्लास्टिक और इलेक्ट्रानिक उद्योग में धड़ल्ले से प्रयोग में लाए जा रहे हैं। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इन रसायनों से निकलने वाली गैसें धरती का सुरक्षा कवच कही जाने वाली ओजोन परत के छीजने का कारण बन रही हैं।

सीएफसी का बेतहाशा उत्पादन करने वाले पश्चिमी देश जानते हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने में कार्बन डाई ऑक्साइड से ज्यादा सीएफसी गैसों का हाथ है। ओजोन परत को इससे हानि तो पहुंचती ही है।

(घ) जलवायु परिवर्तन

उत्तर-वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप उत्पन्न मौसम एवं जलवायु में परिवर्तन आज वैश्विक समस्याओं में से एक है।

आर्थिक एवं विकासात्मक गतिविधियों का विस्तार, बढ़ती जनसंख्या और जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल आदि ऐसे कारण हैं, जिनसे मानवजनित ग्रीन हाउस गैसों का अत्यधिक उत्सर्जन हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी अनुमानों से संकेत मिलता है कि विकासशील देशों पर कई तरह के दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं, जिनसे अतिवादी घटनाओं जैसे लू चलने और भारी वर्षा होने की आवृत्ति, अवधि और तीव्रता में बदलाव आये हैं।

जलवायु परिवर्तन से मानव स्वास्थ्य को रोगवाहकों (मच्छर आदि) से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाएगा।

जलवायु परिवर्तन का विकासशील देशों पर विषमतापूर्ण दुष्प्रभाव पड़ेगा और इससे स्वास्थ्य क्षेत्र भोजन, स्वच्छ जल और अन्य संसाधनों तक पहुँच के मामले में पहले से जारी असमानताएं और भी बढ़ जाएंगी।

भारत जलवायु परिवर्तन के मामले में विशेष तौर पर गम्भीर रूप से चिन्तित है, क्योंकि यह जलवायु की दृष्टि से आजीविका के लिये कृषि एवं वानिकी जैसे क्षेत्रों पर निर्भर है, जो जलवायु की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील है।

‘पृथ्वी के तापमान के बढ़ने तथा धरती की जलवायु में परिवर्तन से केवल समुद्र तल के ऊपर उठने की ही समस्या का सामना होगा, ऐसा बिल्कुल नहीं है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इसके अतिरिक्त सूखा का प्रभाव बढ़ेगा, खासकर दक्षिणी यूरोप में मध्य एशिया में, सहारा के नीचे वाले भाग में अफ्रीका में, दक्षिण पश्चिम अमेरिका, मैक्सिको आदि में।

जलवायु परिवर्तन के विषय में बढ़ती चिंता से World Meteorological Organisatin (WMO) तथा United Nations Environment Programme (UNEP) ने सन् 1988 में जलवायु परिवर्तन पर Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) बनाया।

इसमें पूर्वानुमान लगाया गया है कि वर्ष 2100 तक धरती की सतह का तापमान 1.4°C-5-8°C बढ़ सकता है।

यह तापन पिछले 10,000 वर्षों में हुई तापमान वृद्धि से भी अधिक है। यदि तापमान के परिवर्तन की दर इतनी तेज रही तो पारितंत्र और जीव परिवर्तित पर्यावरण के अनुकूल नहीं ढल पाएंगे।

1990 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा निर्णय करके 1991 में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र प्राधार सभा (United Nations Framework Convention on Climate Change, UNFCCC) का प्रारंभ किया गया, जिसे मई 1992 में स्वीकार कर लिया गया।BEVAE 181 Free Assignment In Hindi 2022

इसका 50 देशों ने समर्थन किया और नवम्बर 2011 तक 194 देश और । क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था संगठन, यूरोपीय यूनियन (The Europian _Union) इसके सदस्य हैं। ..

प्रश्न 7. (क) अनुपयुक्त अपशिष्ट निस्तारण के कोई चार प्रभावों का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए।

उत्तर-संकटदायी अपशिष्ट उत्पादन को दो श्रेणियों में बाटा जा सकता है-प्रक्रिया अभिमुख और प्रदूषण नियंत्रण-अभिमुख। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

प्रक्रिया-अभिमुख अपशिष्ट कच्चे माल के प्रसंस्करण द्वारा उत्पाद प्राप्त करने के दौरान उत्पन्न होता है। प्रदूषण नियंत्रण अभिमुख अपशिष्ट गैसीय और द्रव बहि:स्रावों (effluents) के उपचार से उत्पन्न होता है।

निस्तारण के प्रचलित तरीके :

भारत में संकटदायी अपशिष्टों के हस्ताचरण, उपचार और निस्तारण का उपयुक्त नियामक नियंत्रण नहीं है, जिस कारण स्थान आसानी से उपलब्ध नहीं है और अपशिष्ट उत्पादक के लिए सुगम्य जगहों पर इसे निस्तारित कर दिया जाता है।

भारत में संकटदायी औद्योगिक अपशिष्टों के निस्तारण के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है

(1. नगर के कचरे के साथ निस्तारण,
(2. नदी के संस्तरों और तटों पर निस्तारण,
(3. खुले गड्ढों में जलाना,
(4. निचले क्षेत्रों, नदमुखों और सागरों में निस्तारण,
(5. स्व-रचित भस्मीकारकों में जलाना।

अनुपयुक्त अपशिष्ट निस्तारण के प्रभाव :

संकटदायी अपशिष्ट के अनुपयुक्त निस्तारण के कारण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण खराब हो रहे हैं। खुले खत्ते/डंप, लैन्डफिलिंग, जलाशयों में विसर्जन अथवा खुले गर्तों में जलाने में संकटदायी अपशिष्टों के निस्तारण में रूपांतरण की आवश्यकता है।

मिट्टी और भूजल का संदूषण अनुपयुक्त अपशिष्ट निस्तारण का प्रमुख संकट है।
संकटदायी अपशिष्ट निस्तारण स्थलों के संदर्भ में कम-से-कम पाँच रास्तों से मानव उद्भासन संभव है

(i) पानी पीते समय,
(ii) साँस लेते समय,

(iii) नहाने और धुलाई के समय त्वचा द्वारा अवशोषण,
(iv) प्रदूषित भूजल के लिए उद्भासित पादपों अथवा जंतुओं से प्राप्त वस्तुओं के उपभोग द्वारा अंतर्ग्रहण,
(v) संदूषित मृदा के हस्ताचरण के समय त्वचा द्वारा अवशोषण।

(ख) ओजोन परत ह्रासन क्या है। इसके प्रभाव को समझाइए।

उत्तर-पृथ्वी के वायुमंडल को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-क्षोभमंडल (troposphere), समतापमण्डल (stratosphere) तथा मध्यमण्डल (mesosphere)। समतापमण्डल 15 से 50 कि.मी. की दूरी तक फैला है और ओजोन इसी भाग में पाई जाती है।

ओजोन की सर्वाधिक सांद्रता समतापमण्डल में पाई जाती है, जहाँ यह लगभग 300 पी.पी.बी. (भाग प्रति अरब) होती है। यह भूमध्य रेखा के समीप लगभग 25 कि.मी. ऊपर और धुवीय क्षेत्रों में लगभग 15 कि.मी. ऊपर पाई जाती है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

समतापमण्डल की ओजोन परत पराबैंगनी सौरा विकिरण के लगभग 99% भाग का अवशोषण करती है। पराबैंगनी विकिरण का तरंगदैर्ध्य 01.m से 04.nm के बीच होता है।

इसे ऊर्जा के बढ़ते क्रम के आधार पर UVA, UVB तथा UVC में उपविभाजित किया जा सकता है। UVB तथा TVC अत्यधिक ऊर्जावान होने के कारण।

पृथ्वी पर जीवन के लिए खतरनाक हैं। UTA वायुमण्डल की ओजोन परत द्वारा अवशोषित नहीं होती और उसका केवल 2 से 3 प्रतिशत ही पृथ्वी की सतह तक पहुंच पाता है।

ओजोन परत UVE किरणों के लिए एक निस्यदक का कार्य करके हमें 0V विकिरण से बचाती है। UVC को ऑक्सीजन तथा ऊपरी वायुमण्डल की ओजोन अवशोषित कर लेती है।

ओजोन की सांद्रता डॉब्सन इकाई (Dobson Unit, DU) में मापी जाती है और एक डाब्सन इकाई मान 1 पी.पी.बी. ओजोन के बराबर होता है। सन् 1985 में पता चला कि दक्षिण ध्रुव प्रदेश के ऊपर बसंत ऋतु में ओजोन का पर्याप्त ह्रास होता है।

आंकड़ों के अनुसार ओजोन की सांद्रता सन् 1970 में 300 20 से घटकर 1984 में 20010 पहुंच गई थी। यह 1988 में थोड़ा बढ़कर 25010 हुई, परंतु सन् 1994 में बहुत कम होकर लगभग 88 DU हो गई।

ओजोन परत के पतला होने को ओजोन ह्रासन (Ozone hole) कहते हैं।

सन् 1974 में मारिओ मोलीना तथा एफ. भोरवुड रोलैंड ने बताया कि क्लोरोफ्लुओरोकार्बन (CFCs) ओजोन ह्रासन के कारण हैं।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

क्लोरोफ्लुओरो कार्बनों का उपयोग शेविंग क्रीम, हेयर स्प्रे, निर्गंधीकारकों, पेंटों, कीटनाशकों के पैकेजिंग में प्रयोग होने वाले स्प्रे केनों में नोदकों के रूप में, रेफ्रीजरेशन, वातानुकूलन तथा फोम के लिए भी होता है।

क्लोरोफ्लुओरोकार्बन स्थिर अनभिक्रिय यौगिक हैं। यह मानव स्वास्थ्य, जानवरों, पौधों, सूक्ष्मजीवों, अन्य पदार्थों तथा वायु गुणवता पर निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव डालते हैं

1 मनुष्यों तथा जानवरों के स्वास्थ्य पर प्रभाव-मानवों में पराबैंगनी विकिरणों के उद्भासन से सफेद मोतिया, त्वचा कैंसर, प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना जैसे प्रभाव पड़ते हैं।

2 स्थलीय पौधों पर प्रभाव-पौधों में प्रकाश संश्लेषण ठीक से नहीं हो पाता, जिससे अनेक पौधों में वृद्धि, उत्पादकता और गुणवत्ता कम हो जाती है। उत्परिवर्तन से जैवविविधता भी प्रभावित हो सकती है।

3 जलीय पारितंत्रों पर प्रभाव-पराबैंगनी विकिरण के प्रभाव से पादप प्लवक कम हो जाने से मछली उत्पादन प्रभावित होता है और _ अनेक जलीय जीवों की आरंभिक विकास अवस्थाएं भी क्षतिग्रस्त होती हैं।

4 पदार्थों पर प्रभाव-यू.वी.बी. किरणों से बहुलकों की निम्नीकरण दर बढ़ जाती है।

22 मार्च, 1985 को विएना के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद 16 सितम्बर, 1987 को ओजोन परत का ह्रासन रोकने के बारे में एक समझौता हुआ, जिसे मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) कहते हैं।

इसके अंतर्गत ओजोन को कमजोर करने वाले पदार्थों (Ozone Depleting Substances : ODS) CFCs, हैलॉस, CHCI तथा CH, CCI के उपयोग को पूरी तरह समाप्त करने के लिए एक समय-सारणी तैयार की गई। भारत ने 17 सितंबर, 1992 को मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल को स्वीकार किया।

(ग) केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक संस्था के रूप में भारत में पर्यावरण सम्प्रेषण के प्रदूषण स्तर की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) एक सांविधिक संगठन है। इसका गठन जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अधीन सितंबर, 1974 में किया गया था।

इसके अलावा, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अधीन भी शक्तियां और कार्य सौंपे गए।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

यह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक फील्ड संघटन का काम करता है तथा मंत्रालय को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के उपबंधों के बारे में तकनीकी सेवाएं भी प्रदान करता है।

जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 तथा वायु (प्रदूषण, निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में निर्धारित किए गए अनुसार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख कार्य हैं,

(i) जल प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण तथा न्यूनीकरण द्वारा राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में नदियों और कुओं की स्वच्छता को बढ़ावा देना और
(ii) देश की वायु गुणवत्ता में सुधार करना तथा वायु प्रदूषण का निवारणा, नियंत्रण और न्यूनीकरण करना।

वायु गुणवत्ता की निगरानी वायु गुणवत्ता प्रबंधन का एक महत्त्वपूर्ण भाग है।

राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) की शुरुआत वायु गुणवत्ता की मौजूदा स्थिति एवं रुझानों को जानने तथा उद्योगों और अन्य स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को विनियमित करने के उद्देश्य से की गई है, ताकि वायु गुणवत्ता के मानक प्राप्त किए जा सकें।

यह उद्योगों के सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरण संबंधी प्रभावों के आंकलन (इंडस्ट्रियल सिटिंग) एवं शहरी आयोजनों के लिए जरूरी पृष्ठभूमि वायु गुणवत्ता डाटा भी उपलब्ध कराता है।

(घ) सामूहिक कार्य किस तरह पर्यावरणीय मुद्दों और चिंताओं में सहायता करता है?

उत्तर-आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है। भोगवादी संस्कृति का प्रभाव ऐसा हुआ है स्थित भयानक हो गई है और लोगों ने इसके कारणों को खोजना प्रारंभ किया।

1927 में वैज्ञानिकों ने हरित ग्रह प्रभाव की खोज की लेकिन तब तक पर्यावरण अपना बदला लेना प्रारंभ कर दिया कुछ ऐसी आपदाएं जिससे संपूर्ण विश्व पर्यावरण सुरक्षा में अपनी भागीदारी देने के लिए खड़ा हुआ।

उन घटनाओं में 1972 की स्वीडन की अम्लीय वर्षा, 1984 का भोपाल गैस कांड, 1985 में ओजोन परत में छिद्र, 1986 में चेर्नोबिल काण्ड प्रमुख हैं। इसके अलावा जल, ध्वनि, वायु आदि प्रदूषण से पर्यावरण की सुरक्षा करने का प्रश्न संपूर्ण समाज के सामने खड़ा हुआ।

भोगवादी संस्कृति के कारण जनसंख्या विस्फोट मशीनीकरण का अत्यधिक उपयोग तथा तकनीकी के अप्रत्याशित प्रसार ने पर्यावरण को नष्ट करने का प्रयास किया इससे धरती का तापमान बढ़ा और मधुमक्खी, गौरैया, तितली आदि छोटे जीव-जंतु समाप्ति के कगार पर आ गए।

इन समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से जन भागीदारी का प्रारंभ हुआ। भारत में 1927 में वनों को बचाने के लिए भारतीय वन अधिनियम लाया गया।BEVAE 181 Free Assignment In Hindi

उसके बाद पर्यावरण सुरक्षा पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक कार्यक्रम शुरू हुए जिनमें 1972 में विश्व पर्यावरण सम्मेलन (स्टॉकहोम), वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (भारत),

1973 में वृक्षों को बचाने के लिए भारत में चिपको आंदोलन, 1992 में पृथ्वी सम्मेलन, 1995 में राष्ट्रीय पर्यावरण ट्रिब्यूनल एक्ट, 1997 में क्योटो सम्मेलन, 2002 में विश्व पृथ्वी सम्मेलन, और 16 फरवरी 2005 को प्रभावी हुआ क्यूटो प्रोटोकॉल प्रमुख है।

कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बाद भी पर्यावरण संकट का ठोस हल न निकलता नहीं दिख रहा है इसके पीछे प्रमुख कारण जनभागीदारी का ना होना है। किसी भी परिवर्तन में जनभागीदारी का सर्वाधिक महत्व होता है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

इन सभी कार्यक्रमों में जन सहयोग द्वारा हम पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं तथा इन सब के अलावा व्यक्तिगत रूप से भी जनभागीदारी । हो सकती है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

जल संरक्षण, ध्वनि नियंत्रण, वन्य जीव संरक्षण, वन संरक्षण पौधारोपण, पशुओं का गोबर तथा अन्य अपशिष्ट के माध्यम से हम पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं। हमें अपने जीवन में कम से कम एक वृक्षारोपण कर उसको पल्लवित और पुष्पित अवश्य करना चाहिए।

मानव जाति से इस सृष्टि में सह अस्तित्व की भावना शुरू से ही रही है लेकिन जब इस भावना में अंतर आया तब पर्यावरण संकट छाने लगा इस संकट को दूर करते हुए पशु-पक्षियों जीव जंतुओं सबका सहयोग करने के लिए सह अस्तित्व की भावना से रहना होगा।

प्रश्न 8. “संरक्षित क्षेत्र प्रजातियों के यथास्थल संरक्षण, में एक मुख्य भूमिका निभाता है।” इस कथन की व्याख्या वर्तमान के संदर्भ में 200 शब्दों में उदाहरण सहित कीजिए।

उत्तर-संरक्षित जैवमंडल (कई स्थानों पर आरक्षित जैवमंडल भी कहा जाता है) या बायोस्फेयर रिजर्व, यूनेस्को द्वारा अपने कार्यक्रम मैन एंड द बाओस्फेयर (मानव और जैवमंडल) (MAB) के अंतर्गत दिया जाने वाला एक अंतरराष्ट्रीय संरक्षण उपनाम है।

संरक्षित जैवमंडलों का विश्व नेटवर्क विश्व के 7 देशों के सभी 53 संरक्षित जैवमंडलों का एक संग्रह है (मई, 2009 तक। संरक्षित जैवमंडल के रूप में मान्यता प्राप्त स्थल, किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते का विषय नहीं है, परंतु इनके लिए एक समान मानदंडों का पालन करना होता है।

यह उस देश के संप्रभु अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जहाँ पर यह स्थित हैं, हालांकि ये विचारों और अनुभवों को क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित जैवमंडलों का विश्व नेटवर्क के अंतर्गत साझा करते हैं।

संरक्षित जैवमंडलों का विश्व नेटवर्क के वैधानिक ढाँचे के अनुसार जैवमंडलों का निर्माण उद्देश्य “मानव और जैवमंडल के बीच एक संतुलित संबंध का प्रदर्शन करना और इसे बढ़ावा देना है”।

अनुच्छेद 4 के अंतर्गत, किसी भी संरक्षित जैवमंडल के अंतर्गत सभी उपस्थित पारिस्थितिक तंत्रों का समावेश होना चाहिए यानि इसे तटीय, पार्थिव या समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के संयोजन से मिलकर बना होना चाहिए।

उपयुक्त अंचलों के निर्माण और प्रबंधन के माध्यम से, इन पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण और उनमें जैव विविधता को बनाए रखा जा सकता है।BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

संरक्षित जैवमंडल का डिजाइन के अनुसार किसी भी जैवमंडल को तीन क्षेत्रों में विभाजित होना चाहिए जिनमे पहला है, एक कानूनी रूप से सुरक्षित प्रमुख क्षेत्र; दूसरा, एक बफर क्षेत्र जहां गैर संरक्षण गतिविधियाँ निषिद्ध हों और तीसरा, एक संक्रमण क्षेत्र जहां स्वीकृत प्रथाओं की सीमित अनुमति दी गयी हो।

यह स्थानीय समुदायों के लाभों को ध्यान में रखकर किया जाता है, ताकि यह समुदाय प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग स्थाई रूप से (एक लंबे समय तक) कर सकें। इस प्रयास के लिए प्रासंगिक अनुसंधान, निगरानी, शिक्षा और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

उपरोक्त सुझाई सभी बातों पर अमल कर जैव विविधता समझौते की कार्यसूची 21 (एजेंडा 21) को लागू किया जाता है।यह आनुवंशिक विविधता बनाए रखने वाले ऐसे बहुउद्देश्यीय संरक्षित क्षेत्र हैं, जहाँ पौधों, जीव-जंतुओं व सूक्ष्म जीवों को उनके प्राकृतिक परिवेश में संरक्षित करने का प्रयास किया जाता है।

यहाँ लोगों को इससे संबधित प्रशिक्षण भी दिया जाता है एवं जैव विविधता तथा पारिस्थितिक तंत्र के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रयास भी किया जाता है।

प्रश्न 9. “प्रदूषित जल हमारे स्वास्थ्य और अन्य जीवों के लिए खतरा है”। जल प्रदूषकों के विभिन्न कारकों के आधार पर इस कथन की व्याख्या 200 शब्दों में कीजिए।

उत्तर-जब झीलों, नहरों, नदियों, समुद्र तथा अन्य जल निकायों में विषैले पदार्थ प्रवेश करते हैं और यह इनमें घुल जाते हैं अथवा पानी में पड़े रहते हैं या नीचे इकट्ठे हो जाते हैं,

जिसके परिणामस्वरूप जल प्रदूषित हो जाता है और इससे जल की गुणवत्ता में कमी आ जाती है तथा जलीय पारिस्थितिकी प्रणाली प्रभावित होती है।

प्रदूषकों का भूमि में रिसन भी हो सकता है, जिससे एकत्र भूमि-जल भी प्रभावित होता है। जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं

• घरेलू सीवेज-जैसे-घरों से छोड़ा गया अपशिष्ट जल तथा सफाई सीवेज वाला जल।

• कृषि अपवाह-जैसे कृषि क्षेत्रों का भू-जल जहाँ रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग हुआ हो।

• औद्योगिक बहिःस्राव-जैसे-उद्योगों में विनिर्माण कार्यों अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं का अपशिष्ट जल।

जल प्रदूषण के प्रभाव-जल प्रदूषण से व्यक्ति ही नहीं अपितु पशु-पक्षी एवं मछली भी प्रभावित होते हैं। प्रदूषित जल पीने, पुन. सृजन कृषि तथा उद्योगों आदि के लिए भी उपयुक्त नहीं हैं।

यह झीलों एवं नदियों की सुन्दरता को कम करता है। प्रदूषित जल, जलीय जीवन को समाप्त करता है तथा इसकी प्रजनन- शक्ति को क्षीण करता है।

जलजनित रोग संक्रामक रोग होते हैं, जो मुख्यतः प्रदूषित जल से फैलते हैं। हैपेटाईटिस, हैजा, पेचिश तथा टाइफाईड आम जलजनित रोग है, जिनसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के बहुसंख्यक लोग प्रभावित होते है।

प्रदूषित जल के संपर्क से अतिसार, त्वचा सबंधी रोग, श्वास समस्याएं तथा अन्य रोग हो सकते हैं, जो जल निकायों में मौजूद प्रदूषकों के कारण होते हैं। BEVAE 181 Free Solved Assignment In Hindi

जल के स्थिर तथा अनुपचारित होने से मच्छर तथा अन्य कई परजीवी कीट आदि उत्पन्न होते हैं जो विशेषत: उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कई बीमारियां फैलाते हैं ।

प्रश्न 10. प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़ और चक्रवात किस तरह जीवन और संपत्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं? इस प्रश्न का उत्तर उपयुक्त उदाहरण देते हुए 250 शब्दों में लिखिए।

उत्तर-बाढ़-बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाढ़ अनगिनत मनुष्यों के जीवन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है।

बांग्लादेश और भारत में मिलाकर प्रतिवर्ष वैश्विक रूप से बाढ़ से मरने वालों में से दो-तिहाई से भी अधिक जन सम्मिलित हैं। दक्षिण एशियाई देशों में प्रतिवर्ष बाढ़ के लाखों लोग विस्थापित हो जाते हैं।
बाढ़ें विभिन्न कारणों से आती हैं

• अत्यधिक और लंबी अवधि तक वर्षा।
• हिम और बर्फ का पिघलना।

• बाँधों का टूटना।
• वन अपरूपण और भूस्खलन।

• नदियों के तल मे गाद का जमा होने से उनकी धारण क्षमता कम होना।
• प्रभावित निकटवर्ती देशों अथवा राज्यों के अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी।

बाढ़ संवेदनशील क्षेत्रों में बाँध और जलाशय निर्मित करके, नदियों और नहरों के तटबंधों को मजबूत बनाकर नदियों, नहरों और जलाशयों की धारण क्षमता को निरंतर गहरा करते रहकर बेहतर करके बाढ़ की विभीषिका को कम किया जा सकता है।

मौसम की भविष्यवाणी और बाढ़ मैदान प्रबंधन तकनीकों से जान और क्षति का जोखिम कम करना संभव है।

चक्रवात-चक्रवात (Cyclone) तटीय क्षेत्रों में आने वाली प्रमुख आपदा है। गर्म इलाके के समुद्र में मौसम की गर्मी से हवा गर्म होकर अत्यंत कम वायु दाब का क्षेत्र बनाती है।

हवा गर्म होकर तेजी से ऊपर आती है और ऊपर की नमी से मिलकर संघनन से बादल बनाती है। इस वजह से बने खाली जगह को भरने के लिए नम हवा तेजी से नीचे जाकर ऊपर आती है।

जब हवा बहुत तेजी से उस क्षेत्र के चारों तरफ घूमती है, तो घने बादलों और बिजली के साथ मूसलाधार बारिश करती है।

तेज घूमती इन हवा के क्षेत्र का व्यास हजारों किलोमीटर हो सकता है। उष्णकटिबंधीय चक्रवात, जो 1970 मे उत्तरी बंगाल की खाड़ी मे आया था, 6 मीटर तक ऊंची लहरें उठी थीं और हजारों व्यक्ति मारे गए थे तथा तटीय क्षेत्र की कल मत्स्य पालन क्षमता का 65% नष्ट हो गया था।

रिमोट सेन्सिंग सेटेलाइटों (दूर संवेदी उपग्रह) तथा मौसम की स्थिति के विषय मे देशों के बीच जानकारी साझा करने में सहयोग से चक्रवात के बनने का पूर्वानुमान करना और उसकी गति की निगरानी करना संभव हो गया है। इससे चक्रवात आने से पूर्व बचाव के उपाय किए जा सकते हैं।

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